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सब घट एकै आतमा क्या हिन्दू मूसलमान : संत दादू

अवनीकांत सिंह
मध्यकालीन सन्त कवियों की दृष्टि व्यापक और हृदय उदार था। उनकी इस उदारता व सहजता में तत्कालीन परिस्थितियों व समरस सोच का अहम योगदान रहा है। मध्यकालीन समाज में दो संस्कृतियों का समानान्तर संघर्ष चल रहा था। एक का नेतृत्व शासक तो दूसरे का शासित वर्ग (भारतवासी) कर रहा था। सत्ता की बागडोर सँभालने वाले यहाँ के पारम्परिक ज्ञान से अनभिज्ञ थे। वे सत्ता की शक्ति द्वारा भारतीय मानस पर वर्चस्व स्थापित करने में संलग्न थे। सत्ता का आश्रय लेकर चलने वाली संस्कृति में सामंजस्य के बिन्दु कम, टकराव के अधिक थे। इसके प्रतिरोध में खडी जनता उद्विग्न हो उठी। परिणामतः आत्मरक्षा में खडी भारतीय संस्कृति कहीं-कहीं कठोर दिखने लगी। सामाजिक बन्धनों का कडाई से परिपालन करने में सहजता अवरुद्ध हो गई थी। सत्ता का मजहबी स्वरूप अमानवीय हो गया था। अतः भारतवासियों में मानसिक स्तर पर एक भयंकर द्वन्द्व चलने लगा था।
तत्कालीन समाज राजनीतिक अस्थिरता और सांस्कृतिक टकराव में उलझा था। शास्त्रसम्मत धार्मिक विधानों का निर्वहन कठिन था। कभी-कभी सहमति के शब्द कानों को प्रीतिकर अवश्य लगते थे, पर जनमानस का बृहदंश उससे दूर खडा था। कभी शरीयत के विषदंत तो कभी सनातन संस्कृति की हठवादिता सामाजिक समन्वय में अवरोध उत्पन्न कर रही थी। कट्टरता के प्रतिकार में समन्वयशील सन्तों की चेतना जाग उठी। सन्त मात्र आराधक ही नहीं, सामाजिक संवेदना के समर्थ स्वरदाता भी थे। उनकी समन्वयी चेतना का बीज सदियों पूर्व आलवारों तथा नायनारों की बाणियों में अँकुरित हो चुका था। यह अध्यात्म के साथ सामाजिक सौहार्द का अभियान था। यद्यपि इसमें अध्यात्म का रंग गहरा था पर मध्यकाल में सन्तों ने इसे सामान्यजन की सामाजिक चेतना से आपूरित कर दिया था। मध्यकालीन समाज में सनातनी और इस्लामी संस्कृति में विचारों का आदान-प्रदान होने लगा था। इस्लामी संस्कृति अन्धविश्वास से ग्रस्त थी। दरगाह, मजार, पीर, औलिया, मुर्शीद के ठिकाने और स्मारक बनने लगे थे। उसी प्रकार सनातन संस्कृति में ओझा-सोखा, भूत-भवानी, बरम तथा अनेक प्रकार की चमत्कारिक कहानियाँ प्रचलित हो चुकी थीं। लोक पीडा का अनुभव करने वाले सन्तों की दृष्टि समाज की इस दुरवस्था से खिन्न थी। उनके आलोचनात्क स्वर इन्हीं विसंगतियों से संघर्ष कर रहे थे। सन्तों का उद्देश्य जीवन में धर्म के इतर आडम्बरों का समापन व सहजता का प्रसार रहा है। मानवता के पक्ष म यह पहल, पहली बार दिखी थी। पहली बार साम्प्रदायिक पीठों और पाठों का मोह त्याग कर प्रत्यक्ष जीवन से जुडाव हुआ था। कट्टरता के आर-पार की यह दृष्टि दादू में बडी चटक दिखती है-
सब हम देख्या सोधिकर दूजा नाहीं आन।
सब घट एकै आत्मा क्या हिन्दू मूसलमान।।
दादू साहब उच्चकोटि के भक्तकवि थे। सोलहवीं शती (1544 ई.) में अहमदाबाद (गुजरात) में उनका जन्म हुआ। नरैना (राजस्थान) में पंथ की स्थापना हुई थी। सम्राट् अकबर से भेंट के प्रसंग प्राप्त होते हैं। इनके एक सौ पचास शिष्यों में बावन अत्यन्त प्रतिभाशाली थे। रज्जब, गरीबदास, सुन्दरदास, जगजीवन, बखना इत्यादि को भक्ति के क्षेत्र में विशेष ख्याति मिली। इन सन्तों ने भक्ति साधना द्वारा साहित्य-सृजन का एक बडा अध्याय निर्मित किया था। सन्त समाज को अनुप्राणित कर भक्ति के प्रचार-प्रसार में संलग्न कर देना दादू की बडी विशेषता थी। कहना न होगा कि दादू की भक्ति साधना अत्यन्त समृद्ध और उज्ज्वल रही है। आचार्य रामानन्द के शिष्य सन्तकबीर में उनकी दृढ आस्था थी। रामानन्द-कबीर-कमाल-जमाल, विमल, बुड्ढन और दादू की सुदीर्घ परम्परा मध्यकालीन भक्ति को महत्त्वपूर्ण बना देती है। दादू, सन्त कबीर को श्रद्धा के साथ स्मरण करते हैं-
साँचा सबद कबीर का मीठा लागै मोंहि।
दादू सुनता परमसुख केता आनंद होंहि।।
कबीर और दादू के प्रियतम में एकरूपता है-
जो था कंत कबीर का, सोई बर बरिहौं।
मनसा बाचा कर्मना, और न करिहौं।।
दादू साहब ने ब्रह्य को अनुभव का विषय बताकर जनता को धार्मिक वितंडावाद से बचाने का अद्भुत प्रयास किया था। उपास्य के सन्दर्भ में मंदिर-मस्जिद की अनिवार्यता को अनावश्यक घोषित किया था। सन्तों का अनभै साँचा दादू दयाल की वाणी में दिखता है। अपनी संस्कृति को सँजोने के लिए उस समय सम्प्रदायों व पन्थों की स्थापना हो रही थी। नये सम्प्रदायों की बाढ सी आ गई थी। लोकमानस में अनेक प्रकार के भ्रम उत्पन्न हो रहे थे। अधकचरे विचार, अहमन्यता, सम्प्रदाय प्रमुख बनने की महात्त्वाकाँक्षा नये सम्प्रदायों को जन्म दे रही थी। दर्शन की जगह प्रदर्शन प्रमुख था। सन्त, सम्प्रदायों का यह दिखावा मध्यकालीन सामन्तों की शान-शौकत को भी पराजित कर देता था। हाथी-घोडा, गाजा-बाजा, अस्त्र-शस्त्र, प्रदर्शन, चमत्कार, कपोल कल्पित कथाएँ, बेशकीमती वेशभूषा, आभूषणों का मोह सन्त समाज के एक वर्ग को अपनी गिरफ्त मंड ले चुका था। स्वर्ण सिंहासन, स्वर्ण निर्मित चँवर प्रतिष्ठा के मानक बनते जा रहे थे। धर्म का वास्तविक स्वरूप गायब था। मनसबदारों व सामन्तों की वेशभूषा सन्तों-महन्तों का परिधान बनती जा रही थी। सन्त दादू को ये दृश्य व्यथित कर रहे थे। उन्हें अनुभव होने लगा था कि सम्प्रदायों के मकडजाल में लोक हृदय ठगा जा रहा है। जनता को भ्रम से बाहर करने के लिए सन्त शुद्ध व सात्त्विक सम्प्रदायों का परिचय देने लगे थे-
भाई रे ऐसा पंथ हमारा।
द्वेष रहित, पंथ गहि पूरा, अवरण एक अधारा।।
वाद-विवााद काहू सो नाहीं, माँहि जगत थैं न्यारा।
मैं, तैं, मेरी यह मत नाहीं, निरवैरी निरविकारा।।
पूरण सबै देखि आया पर, निरालंब निरधारा।
दादू का विश्वास है कि प्रियतम के प्रकाश में हिन्दू-मुसलमान का भेद मिट जाता है। हिन्दू की पूजा, मुसलमान की नमाज, ब्रह्म की विराट्ता के समक्ष तृण के समान हैं। उपास्य की विराट्ता मन्दिर-मस्जिद की परिधि से बाहर है। किसी एक परिभाषा में बंद होना उपास्य को प्रिय नहीं। वह तो सर्वत्र व्याप्त है। वह काशी, काबा, राजा, रंक, मुल्ला, पुरोहित, कीट-पतंग, जल-थल में विद्यमान है। फिर सम्प्रदायों के बीच विवाद क्यों? धर्म के नाम पर हिंसा और संघर्ष क्यों? ये सब धर्म के वाह्य कलेवर हैं। दादू की पंक्ति इसका प्रमाण है-
हिन्दू-तुरुक जानै दोई।
साँई सबनि का सोई हेरै, और न दूजा देखौ कोई।।
कीट पतंग सबनि में जल-थल संग समाना सोई।।
दादू की दृष्टि में वह प्रेमगम्य है। अहंकारशून्य होने में ही उसकी प्राप्ति है। विकारों के शमन से भक्ति भाव में वृद्धि होती है। उसकी तमन्यता में शत्रुता विगलित हो जाती है। इश्क-प्रेम ही उसकी जाति है, इश्क ही उसका रंग और अस्तित्व है। वह तो प्रेम का पर्याय है-
आपा मेटै हरि भजै तनमन तजै विकार।
निरबैरी सब जीव सौं, दादू का मत सार।।
दादू इश्क अल्लाह की जाति है, इश्क अल्लाह का अंग।
इश्क अल्लाह वजूद है, इश्क अल्लाह का रंग।।
परमात्मा को प्रेम ही प्रिय है। प्रेम का भाव हृदय में समान मात्रा में विद्यमान रहता है। ईश्वर और समाज दोनों से जुडने का साधन प्रेम ही है। इसीलिए दादू ने प्रीति को ईश्वर और जीव के बीच का सेतु माना है। प्रीति में हिन्दूपन की गन्ध भी है और इस्लाम का रंग भी प्रीति से मनष्यता का विस्तार होता है, वह भक्ति-साधना का मूल मंत्र है-
प्रीति सी न पाती कोऊ, प्रेम से न फूल और।
चित्त सो न चंदन सनेह सो न सेहरा।।
युद्ध-जर्जरित तत्कालीन समाज में दादू की भक्ति शीतलता प्रदान करती दिखती हैं; सबको जोडने का आह्वान करती है। हिन्दू-मुसलमान से कहती है कि धर्म का मूल प्रेम के विस्तार में है, भावनाओं की संकीर्णता में नहीं।
मध्यकालीन समाज की प्रमुख विशेषता धार्मिकता थी। यद्यपि तद्युगीन परिस्थितियों ने धर्म को विवादित कर दिया था। अतः अन्धविश्वास और बहुदेववाद का प्रसार तेजी से हो रहा था। इसीलिए सन्तों ने एक ब्रह्म की बात कही। ईश्वर-अल्लाह को एक कहा। पूजने की अपेक्षा नाम साधना पर बल दिया है, गुण-विस्तार को सराहा है। कहना है कि सन्तों की वाणियों में प्रमुख रूप से आराध्य की एकता के साथ समाज और व्यक्ति, सम्प्रदाय और पंथ की एकता का स्वर मुखरित हुआ है। सन्तों का यह अभियान अध्यात्म के साथ समाज और समाज के साथ व्यक्ति को जोडने का महत प्रयास था। पूजा-पाठ व नमाज-इबादत तक ही उनका अभियान सीमित नहीं था। वे मनुष्य की एकता में परमतत्त्व का दर्शन करते हैं। दादू दयाल की बानियों में एकता का यह स्वरूप कई रूपों में मुखरित हुआ है। अतः उनकी बानियाँ समाज के लिए उपयोगी बन जाती हैं। उनकी दृष्टि में हिन्दू मुसलमान में कोई भेद नहीं है। धर्म के नाम पर विवाद अहंकार का प्रदर्शन है। दादू प्रियतम से मधुर संवाद करते नजर आते हैं-
क. दादू सुंदरि सेज पर, सदा एक रस होय।
दादू खैलै पीव सौं, ता सम और न कोय।।
ख. दादू कै दूजा नहीं एकै आतम राम।
सतगुरु सिर पै-साधु सब, प्रेम भगति बिसराम।।
दादू पन्थ की दो धारणाएँ हैं। पहली भक्ति के चरम आनन्द की अभिव्यक्ति और दूसरी रूढियों, अन्धविश्वासों और कुरीतियों का खण्डन। इसमें जातिवाद, धार्मिक वैमनस्य, मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा और कर्मकाण्डों की निरर्थकता पर विचार हुआ है। दादू का स्पष्ट मत है कि अन्धविश्वासों और मिथ्या धारणाओं से समाज टूटता है। अतः हिन्दू और मुसलमान समाज में व्याप्त रूढियों को वह व्यर्थ कहते हैं। हिन्दू समाज द्वारा ब्रह्म के कृत्रिम रूपों को वह धर्म की मूल भावना के विरुद्ध बताते हैं-
कृत्रिम नहीं सो ब्रह्म है, घटै-बढै नहिं जाय।
मूरख निहचल एकरस, जगत न नाचै आय।।
मुसलमानों को फटकारते हैं-
जिसका था तिसका हुआ, तब काहे का दोस।
दादू बन्दा बन्दगी, मियाँ ना कर रोस।।
समन्वय की भूमि पर दादू कहते हैं कि परमेश्वर का हृदय में प्रवेश करते ही जगत् की कामनायें निरर्थक लगने लगती हैं। इसकी पुष्टि में वे विविध उक्तियों द्वारा मंदिर-मस्जिद व देवालय के नाम पर प्रदर्शन को निरर्थक बतात हैं। अनुभव और अनुभूति के स्तर पर ही उसे जाना पहचाना जा सकता है-

जब घटि अनभै ऊपजै, तब किया करम का नास।
भय भ्रम भागै सबै, पूरन ब्रह्म प्रकाश।।
अल्लाह और ईश्वर की भक्ति में रोजा, व्रत व उपवास की आवश्यकता नहीं। उनके प्रमुख शिष्य जगजीवनदास कहते हैं कि- भाई रे! पंथ-पंथ का कहिये। वह परमेश्वर न पन्थ के आचारों में निहित है न पुस्तक के पृष्ठों में, वह तो आत्मा के साथ निरन्तर लीला-मगन रहता है-
भाई रे! घर ही में घर पाया। (दादू दयाल)
सन्त दादू की बानियों में समाज के विभिन्न वर्गों के बीच समन्वय का सुदृढ सेतु दिखाई पडता है। इसमें भक्ति-साधना की अहम भूमिका है। जाति-पाँति, ऊँच-नीच, सम्प्रदाय-पन्थ, शासक-शासित, ज्ञान-कर्म और समाज की एकता में प्रेम ही प्रमुख तत्त्व है। प्रेम के साम्राज्य में हिन्दू-मुसलमान एक हो जाते हैं, वहाँ पुस्तकीय ज्ञान सारहीन हो जाता है। पंथीय मान्यता व्यर्थ साबित होती है, मुल्ला-पुरोहित, शास्त्र-पुराण, अपूर्ण से दिखते हैं, कुरान-किताब का कोई अर्थ नहीं होता, मन्दिर-मस्जिद अनुपयोगी लगते हैं। सत्य तो केवल प्रभु का नाम और उसकी भक्ति है-
तब हम एक भये रे भाई,
मोहन मिलि साँची मति आई।
नाना भेद भरम सब भागा,
तब दादू एक रंगै रंग लागा।।
भ्रम का समापन भक्ति ही करती है। भ्रम को समाप्त कर देने पर सबका स्वरूप एक जैसा दिखता है। संसार के भेदभाव मिट जाते हैं। साईं दर्शन के अतिरिक्त सब कुछ धुँधला दिखता है। धर्म की इस भूमिका में पहुँचा भक्त मानापमान विवर्जित होता है। उसका विश्वास उस चिरंतन भक्ति साधना में निहित होता है जिसके सहारे अनेक भक्त अभय पद प्राप्त कर चुके हैं।
दादू की पृष्ठभूमि आध्यात्मिक होने के साथ सामाजिक भी है। वह एकांगी नहीं है। इसमें मानव-कल्याण के भाव भरे हैं। उनकी बानियों में समष्टि कल्याण का निदर्शन मिलता है। रूढियों और कुरीतियों पर उन्होंने कुठाराघात किया है। सन्त दादू का विश्वास है कि अध्यात्म की चेतना सामाजिक एकता का निर्माण करती है। जिस प्रकार व्यक्ति की सुषुप्त चेतना को परमात्मा से जोड कर मुक्ति मिलती है, उसी प्रकार सांसारिक दुखों से मुक्ति के लिए समाज को प्रेम से जोडना पडता है। प्रेम का विस्तार ही सामाजिक एकता का आधार है। ईश्वर के प्रति आध्यात्मिक चेतना और समाज के प्रति रागात्मक भाव का स्वरूप तत्त्वतः एक ही हैं। इसीलिए उन्हें राम और अल्लाह में अभेद दिखता है। हिन्दू और मुसलमान में समता दिखती है। सवर्ण और अवर्ण में एक ज्योति का प्रकाश झलकता है। गरीब और अमीर में समता की पदचाप सुनाई पडती है। अभेद की इस स्थिति को प्राप्त दादू समभाव से संसार में विचरण करते हैं।
सम्पर्क - बी.एफ.एस. 13, हरनारायण विहार सारनाथ, वाराणसी-221007 मो.-8587013190