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सन्त पीपाजी : लोकधर्मी जीवन दर्शन

बंशीलाल
हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल स्वर्णयुग माना गया है। मध्ययुगीन राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक परिस्थितियों की प्रतिकूलता में भी यहाँ के सन्त साधकों ने अपने व्यक्तित्व-कृतित्व से तत्कालीन समाज परिवेश में व्याप्त धार्मिक कर्मकाण्डों, बाह्याडम्बरों, रूढीवाद, सामाजिक कुप्रथाओं व विषमताओं का एक स्वर में विरोध करते हुए मानव मन की शुद्धता, ईश्वरीय अनुराग-भक्ति, सामाजिक समरसता एवं लोक कल्याण की भावना पर बल दिया। भारतीय संस्कृति-समाज पर सन्त काव्य परम्परा के सकारात्मक प्रभाव को अस्वीकृत नहीं किया जा सकता। प्रायः सभी सन्त साधकों ने आत्मचेतना, स्वानुभूति एवं लोकधर्मी साधना से समाज के समक्ष लोक कल्याणकारी मार्ग प्रस्तुत किया।
भक्ति द्राविड ऊपजी, ल्याये रामानन्द।
परगट कियो कबीर ने, सप्तदीप नौ खण्ड।।
स्वामी रामानन्द, नाभादास कृत भक्तमाल में सिद्धपुरुष ही नहीं बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत के ध्वजवाहक तथा सामाजिक समरसता के जीवन्त प्रमाण माने जाते हैं। भक्ति चेतना एवं सम्प्रदाय के प्रचार-प्रसार में स्वामी रामानन्दजी ने सामाजिक समानता को महत्त्व देते हुए, जातिगत बन्धन को अस्वीकृत कर जाति-पाँति पूछे नहिं कोय, हरि को भजे सो हरि को होय का ध्येय वाक्य रखा। वैचारिक मतभेद से स्वामीजी ने रामानुज सम्प्रदाय से पृथक होकर रामानन्दी सम्प्रदाय की स्थापना की एवं अपने शिष्यों के समक्ष राम नाम का मंत्र फूँक कर वैष्णव धर्म के प्रचार प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। स्वामी जी सच्चे अर्थों में धार्मिक सहिष्णुता के समन्वयक, सामाजिक समानता के शिखर-पुरुष माने जाने चाहिए।
सन्त पीपाजी के व्यक्तित्व-कृतित्व से सम्बन्धित हस्तलिखित, परची, ऐतिहासिक, साहित्यिक ग्रन्थों यथा-पीपा परची, खिलचीपुर री ख्यात, मारवाड रा परगना री विगत, अचलदास खीची री वचनिका, चौहानकुलकल्पद्रुम इत्यादि के अवलोकन अनुशीलन से स्पष्ट होता है कि इनका सम्बन्ध राजस्थान प्रदेश के गढगागरोन खीची चौहान राजवंश से है। गागरोन राजवंशावली के अनुसार इनके पिता का नाम कडवाराव खीची एवं माता का नाम जगीसरी कुँवर बताया गया है। अन्य भक्तिकालीन सन्तों की तरह ही सन्त पीपाजी के जन्मकाल विषय पर विद्वानों में मतभेद है।
सन्त साहित्य अध्येता परशुराम चतुर्वेदी ने सन्त पीपाजी का जन्मकाल सन् 1408 ई. से 1418 ई. (वि.सं. 1465 से 1475) माना है। गागरोन राजवंश की वंशावली को आधार मानकर विद्वान अलेक्जेंडर कनिघम इनका जीवनकाल सन 1360 (वि.सं. 1417) से प्रारम्भ मानते हुए, जन्म संवत विक्रमी 1417 से 1442 ( सन् 1360 से 1385 ई.) के मध्य मानते है। एम ए मेकालिफ तथा जे.एन.फर्कुहर ने सन्त पीपाजी का जन्मकाल सन 1425 ई. (वि.सं. 1482 ) माना है। सन्त साहित्य अध्येता डॉ. पीताम्बर दत्त बडथ्वाल ने इनका जन्म सन् 1353 ई. से 1403 ई. (वि.सं. 1410 से वि.सं. 1460 ) माना है। प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान जोधपुर में संरक्षित पीपा की कथा क्रमांक 30673 में पीपाजी का जन्मकाल सन् 1323 ई. (वि.सं.1380) तथा देहावसान सन 1384 ई.(वि.सं.1441) उल्लिखित है। सन्त पीपाजी साहित्य अध्येता डॉ. पूरन सहगल ने सन् 1359 ई., विद्वान ब्रजेन्द्रकुमार सिंघल एवं श्री ललित शर्मा ने इनका जन्मकाल सन् 1333 ई. माना है। समस्त विद्वानों के पीपाजी के जन्मकाल विषयक मतों का समग्र विवेचन करने के आधार पर कहा जा सकता है कि इनका जन्मकाल वि.सं. 1350 से वि.सं.1400 के मध्य युक्तियुक्त बैठता है।1
राजवंशीय पृष्ठभूमि में जन्मे-पले राजा प्रतापराव आत्ममुक्ति की उत्कण्ठा, ईश्वरीय अनुराग तथा लोकमंगल-लोककल्याण की पुनीत भावनावश समस्त साँसारिक-भौतिक सर्वसुलभ सुखविलास वैभव को तिलांजली देकर राजा से संन्यासी बनकर तत्कालीन समाज के समक्ष अनुकरणीय उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। समाज, परिवेश में अपनी सहज व सुग्राह्य लोकवाणी के माध्यम से सामाजिक जागरूकता, धर्मी चेतना और आदर्श जीवनमूल्यों को प्रतिष्ठित करने का पुनीत कृत्य किया। वाणी के समग्र अनुशीलन से स्पष्ट होता है कि सन्तप्रवर पीपाजी ने अपने काव्य में भक्ति, नीति व धार्मिक चेतना का अनुपम समायोजन करते हुए तत्कालीन जनमानस को वसुधैव कुटुम्बकम् एवं प्रगतिशील विचारधारा को आत्मसात् करने हेतु प्रेरित किया।
सन्त पीपाजी की वाणी समृद्ध होने के साथ वर्तमान परिदृश्य में उपादेय है। पीपावाणी में ब्रह्म, जीव, जगत्, माया, काया-ब्रह्माण्ड अन्तर्सम्बन्ध, योग, साधना, इन्द्रिय-निग्रह, भक्ति, मोक्ष इत्यादि आध्यात्मिक विषयों पर रामानन्दी चिन्तन परिप्रेक्ष्य में चिन्तन दृष्टिगोचर होता है। इनके पदों में स्पष्ट है कि सृष्टि के समस्त तत्त्वों में परमात्मा का वास रहता है एवं ब्रह्म घट-घट में विद्यमान है। पीपाजी की साखियों और पदों की डूब में उतरने पर स्पष्ट होता है कि ये अद्वैतवाद से प्रभावित थे। इनके पदों में ब्रह्म-जीव का अभेद सम्बन्ध है; जीव की चेतना को जाग्रत् करने वाली शक्ति (जीवात्मा) को परमात्मा का ही अंश परिलक्षित होता है। जगत को अस्थिर, असत्य, मायामृगी प्रपंचकारी निरुपित करने के कारण इन पर वेदान्त दर्शन का प्रभाव माना जा सकता है। इसी प्रभाववश वाणी में माया को न सिर्फ आत्ममुक्ति में बाधक, बल्कि विषैली नागिन समदृष माना गया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इन के माया विषयक विचारों पर वेदान्त, नाथपंथ, पूर्वकालिक-समकालीन सन्तों तथा गुरुभाइयों का प्रभाव रहा है जो अन्य सन्त साधकों की भाँति जीवात्मा को मोहमाया, मानवीय मनोविकारों से बचने की सीख देता है।
सन्त पीपाजी के आध्यात्मिक पदों के भाव-गाम्भीर्य को इंगित करते हुए सन्त साहित्य अध्येता आचार्य परशुराम चतुर्वेदी कहते हैं -सन्त पीपाजी का जो ब्रह्माण्डे, सोई पिण्डे पद गुरु अर्जुनदेव द्वारा सम्पादित आदिग्रन्थ में राग धनाश्री के रूप में संगृहीत है जिसमें जो पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड में है का सिद्धान्त प्रतिपादित किया है।2 मानवमात्र काया में ब्रह्माण्ड की परिकल्पना उनके गम्भीर आध्यात्मिक चिन्तन का परिचायक है। मनुष्य की काया और ब्रह्माण्ड अन्तर्सम्बन्ध को आत्मानुभूत कर सन्त पीपाजी कहते हैं कि- जिस प्रकार ब्रह्माण्ड पाँच तत्त्वों से निर्मित है, ठीक उसी प्रकार मानव शरीर भी पंचतत्वों से निर्मित है।
सन्त पीपाजी की वाणी में सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक परिवेश के विभिन्न पहलुओं पर चिन्तन हुआ है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि वाणी में विषयों की विविधता दृष्टिगोचर होती है। एक तरफ नारी के प्रति आदर-सम्मान भाव रखते हुए समस्त अमानुषिक बन्धन तोडने का सन्देश देते हुए कहते है- पीपा पीव सूं परदो किसो तो दूसरी तरफ असामाजिक, नकारात्मक प्रवृत्ति के लोगों को परनारी परतख छुरी कहकर परनारी से दूर रहने की नसीहत देते हैं; बाह्याडम्बरों का विरोध करते हुए सालिगराम न पूजो स्वामी का आग्रह करते हैं, तो दूसरी ओर सन्तों एक राम सब माही का सन्देश देते हैं। परोपकार, परमार्थ भाव रखने वाले सज्जन की प्रशंसा करते हुए पीपा सोई सत्पुरुष, साचो सन्त से विभूषित करते हैं। गुरु की महत्ता को इंगित करते हुए सतगुरु साँचो जौहरी, परसे ज्ञान कसौट साखी से गुरु की महिमा का वर्णन करते है, तो एक ओर सन्त संगति की महत्ता बताते हुए सिध के कांठे बैठता, साधिक सिध होय का उपदेश देते हैं।
सन्त पीपाजी के पदों और साखियों का अनुशीलन करने पर स्पष्ट होता है कि इन्होने ब्रह्म के निर्गुण-सगुण विषयक विचारों में समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए उदारचेत्ता हृदय का परिचय दिया। इनकी वाणी में न तो दर्शन की गंभीर, क्लिष्ट तात्त्विक समीक्षा है और न ही सगुण- निर्गुण का खण्डन-दुराग्रह। इनकी वाणी में तो सतगुरु के सान्निध्य-प्रसाद से सृष्टि के शाश्वत सत्य ब्रह्म को आत्मानुभूत करने का आग्रह मात्र है। स्पष्ट है कि इनकी वाणी में निर्गुण ब्रह्म की आराधना के साथ सगुण साकार स्वरूप दर्शन मिलते हैं, परन्तु ये निर्गुण स्वरूप के अधिक निकट लगते हैं। सगुण विषयक पदों पर गम्भीरता से अध्ययन करने अन्ततः ब्रह्म के निर्गुण स्वरूप की ही प्रतीति होती है।3
पीपाजी लोकमंगल के आराधक, उपासक सन्त साधक थे जिन्होंने उपदेशात्मक शैली से धार्मिक आडम्बरों, सामाजिक कुप्रथाओं व मानवीय मनोविकारों का खण्डन करते हुए लोक कल्याण की भावना पर बल दिया। सामाजिक समरसता, सर्वधर्म समभाव के व्यावहारिक धरातल पर खडे होकर उन्होंने तत्कालीन वर्ण व्यवस्था में रचनात्मक सुधार किया तथा पंचम वर्ण की मौलिक अवधारणा प्रस्तुत की। तत्कालीन समाज में प्रचलित सामाजिक वर्ण व्यवस्था में एक अतिरिक्त श्रमिक वर्ण की धारणा में मानवतावादी दृष्टिकोण को केन्द्र में रखकर समाज के पिछडे, दमित, दलित, उपेक्षित वर्ग को सम्बल प्रदान करने की नैतिक जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए, इस नवीन वर्ग का सृजन किया जो सत्य, न्याय, श्रम, अहिंसा-सदाचार की भावभूमि पर अवलम्बित है।
भक्तिकालीन परिवेश, सम्वेदना और संचेतना में सन्त पीपाजी अपना अनूठा, भिन्न व्यक्तित्व रखते हैं। पीपाजी के समग्र जीवन परिचय को जानने समझने के पश्चात् हम पाते हैं कि तत्कालीन सदी में ऐसा राजर्षि सन्त मिलना दुर्लभ है जो आत्ममुक्ति की चाह, ईश्वरीय आराधना और लोक कल्याण में अपने राजपाट को ठोकर लगाकर संन्यासी साधक-पथ चयन करें। पीपा परिचयी के आधार पर स्वामी रामानन्द के गागरोन पधारने, सन्त पीपाजी के पूर्णतया राजकाज त्यागने और गागरोन नगरी की प्रजा के सन्त पीपा के जयकारों के साथ ही सन्त पीपाजी का सन्तीय जीवन प्रारम्भ होता है।
सन्त पीपाजी के व्यक्तित्व का समग्र अनुशीलन करने पर स्पष्ट होता है कि वे नारी चेतना, सम्बल के पक्षधर के रूप में दिखाई देते हैं। नाभादास कृत भक्तमाल एवं पीपा परची में उल्लेखित है कि सन्त पीपाजी ने अपनी रानी सीता को ईश्वरीय भक्ति में सम्बल प्रोत्साहन के साथ ही स्वामी रामानन्द का शिष्यत्व ग्रहण करने हेतु प्रेरित किया। राज परिवार, राजसी वैभव से सम्बन्ध रखने वाली नारी का अपने पति के साथ भक्ति पथ का अनुकरण कर संन्यासी जीवन निभाना तत्कालीन सामाजिक परिवेश की क्रान्तिकारी घटना मानी जानी चाहिए। नारी समर्थन, नारी चेतना एवं नारी सशक्तिकरण की इस घटना में वर्तमान दौर के नारी विमर्श की जडों को तलाशा जा सकता है।
लागी संग रानी इस दोय, कही मानी नहीं, कष्ट को बतावे, डरपावे मन लावही।
काहू पे न होय , दियो रोय, भोय भक्ति आई, छोटी नाम सीता, गरे डारी न लाजावाही।4 - (भक्तमाल)
जीव को परमात्मा का अंश मानकर मानवमात्र को सत्कर्म करने का सन्देश देते हैं। अपनी साखियों में सदाचार, प्रगतिशीलता, सत्कर्म, समानता, समरसता एवं व्यावहारिकता को महत्त्व देते हुए कहते हैं कि समाज परिवेश सुधार हेतु प्राणिमात्र का आत्मपरिष्कार आवश्यक है। भूमण्डलीकरण, उत्तर-आधुनिकता की अन्धी दौड, प्रतिस्पर्द्धा, बाजारवाद, भौतिक चकाचौंध से त्रस्त मानव मात्र को इनकी वाणी अवश्य ही सुकून पहुँचाती है। अतः स्पष्ट है कि सन्त पीपाजी की वाणी में समाज-परिवेश को जागरूकता-नवचेतना एवं प्रगतिशील विचारधारा से जोडने का सार्थक सकारात्मक प्रयास हुआ है।
देशकाल, परिवेश, परिस्थितियों के अनुरूप राजर्षि पीपाजी ने सादगी,सरलता और विनम्र सन्तीय भाव के साथ बाह्याडम्बरों, बाह्याचारों, दुर्विकारों, दुर्व्यसनों का खण्डन कर जन-जागरण करने का साधुप्रयत्न किया। उन्होंने जाति-पाँति, ऊँच-नीच का विरोध कर सामाजिक समन्वय स्थापित कर प्रगतिशील चेतना का शंखनाद किया। समस्त वर्गों, धर्मों के प्रति समन्वयवादी दृष्टिकोण रखते हुए स्वविवेक, चिन्तन और अनुभूत सत्य से जनकल्याणकारी कृत्य कर लोकमंगल लोकधर्म के आराधक सन्त के रूप में प्रतिष्ठित हुए। समन्वयवादी दृष्टिकोण आधारित पद में पीपाजी कहते है कि परमात्मा की दृष्टि में समस्त प्राणी सामान हैं। सृष्टि के समस्त प्राणियों की समानता-समरसता पर बल देते हुए जातिगत वैमनस्य को जड से नष्ट करने का सन्देश देते हैं -
ना को पुरिस नहीं को नारी,
ना को दाता न कोई भिखारी।
ना को रंक न को राजा,
लघु दीरघ झूठ करी जाना।। 5
सन्त पीपाजी स्वामी रामानन्दी शिष्य परम्परा के अन्य लोकप्रिय सन्तों से व्यावहारिक धरातल पर अपनी अलग छवि रखते हैं। इन्होंने तत्कालीन समाज की विकृतियों पर गुरुभाई कबीर की भाँति कठोर, तीक्ष्ण प्रहार न कर प्रबन्धनीय, समायोजित प्रक्रिया स्वरूप समाधान करने का प्रयास किया। वे वाणी के डिक्टेटर नहीं बल्कि परफेक्टर थे। उन्होंने समतावादी सामाजिक संरचना का ढाँचा तैयार किया। विशिष्ट से सामान्य बन वैराग्य धारण करने वाले पीपाजी ने सदाशयता एवं सादगीपूर्ण लोक व्यवहार को अपनी जीवनशैली में उतारा तथा समाज के समक्ष सकारात्मक सन्देश प्रस्तुत किया। उनकी विचारधारा जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, धर्म की कट्टरता के आधार पर न होकर मानव धर्म-मानव कल्याण की स्वस्थ परिपाटी आधारित थी।
सत्य-न्याय, समानता की पृष्ठभूमि में पोषित पीपाजी की वाणी में निहित सारतत्त्व वर्तमान परिदृश्य में पढने ही नहीं, बल्कि जीवन में ढालने योग्य है। मानव धर्म की संकल्पना, लोक मंगल की लोक परम्परा को आगे बढाते हुए सन्त पीपाजी ने सामाजिक समन्वय, धार्मिक सहिष्णुता और विश्वबन्धुत्व की भावना को पोषित-पल्लवित रखने का स्तुत्य कर्म किया। मानव मूल्यों के जीवन्त प्रतिष्ठापक सन्त पीपाजी, लोकमंगल के साधक, आराधक सन्त माने जाने चाहिए जिनकी अमृतमयी लोकवाणी में निहित विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
सन्दर्भ सूची
1 . रामानन्दी द्वादश शिष्यों की प्रामाणिकता : सन्त पीपाजी विशेष-डॉ. बंशीलाल, पृष्ठ संख्या- 59, राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, प्रथम संस्करण- 2021 ई.
2. उत्तरी भारत की सन्त परम्परा - आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, पृष्ठ संख्या-172, साहित्य भवन प्रा.लि. रानीमंडी, इलाहाबाद, संस्करण- 2014
3. रामानन्दी द्वादश शिष्यों की प्रामाणिकता : सन्त पीपाजी विशेष - डॉ. बंशीलाल, पृष्ठ संख्या-188, राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर, प्रथम संस्करण- 2021 ई.
4 . श्री भक्तमाल-श्री नाभादास, श्री प्रीयादास प्रणीत टीका कवित्त, पृष्ठ संख्या- 496, रूपकला तेजकुमार बुक डिपो, संस्करण- 2014 ई.
5. पीपा के पद (ह.ग्र.) क्रमांक-9, 1843 ई., भा.वि.म.शो.प्र. बीकानेर

सम्पर्क - सहायक आचार्य - हिन्दी
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