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आदिवासी समाज और संस्कृति -दक्षिणी राजस्थान के सन्दर्भ में

रेखा खराडी
भारतीय संस्कृति और सभ्यता बहुआयामी है, जिसमें भारत का स्वर्णिम इतिहास, भूगोल, सभ्यताएँ आदि देश की विरासत या धरोहर हैं। भारत अलग-अलग धर्मों को मानने वाला, अलग-अलग भाषाओं को बोलने वाला देश है। इसके अलग-अलग राज्यों की अपनी अलग-अलग संस्कृति और परम्परा रही है। इन विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों और सभ्यताओं ने न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व को प्रभावित किया है। हमारे देश की यह विभिन्नता में एकता, विशालता, उदारता और प्राणी मात्र के प्रति प्रेम और सहिष्णुता की दृष्टि उसे विश्व की सभी संस्कृतियों से अलग और विशिष्ट बनाती है। सामाजिक दृष्टि से भारत को जातिगत विभिन्नता के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नामक चार वर्णों में विभाजित माना जाता है। जबकि आदिवासी समाज और संस्कृति का अपना अलग महत्त्व है। आदिवासी राजा-महाराजाओं के शासनकाल में युद्ध में लडने के लिए जाते थे। इस दृष्टि से देखा जाए तो वे क्षत्रिय माने जाएँगे।
भारत के संविधान में आदवासियों को अनुसूचित जनजाति के नाम से उल्लेखित किया गया है। देश में ऐसे आदिवासी समूह 700 के लगभग है। 1871 से लेकर 1941 तक आदिवासियों को भारत के धर्मो से अलग माना गया, जैसे Other Religion 1871, एबरिजनल-1881, फॉरेस्ट ट्राइब-1891, एनिमिस्ट-1901, एनिमिस्ट-1911, प्रिमिटिव-1921, ट्राईबल रिलिजन-1931, ट्राइब-1941 इत्यादि नामों से वर्णन किया गया है। 1951 की जनगणना के बाद उन्हें अलग मानना बन्द कर दिया गया। आदिवासियों ने जब भी अपने हक के लिए आवाज उठाई, तो उनको नक्सलवादी कहा गया। इसके बावजूद आदिवासी समाज और संस्कृति की अपनी अलग पहचान रही है। उनका अपना भू-भाग, अपनी बोली, भाषा, साहित्य, संस्कृति और सभ्यता है।
राजस्थान में आदिवासी समुदाय विशेष रूप से दक्षिणी राजस्थान में बाँसवाडा, डूँगरपुर, उदयपुर, राजसमन्द, पाली, सिरोही आदि जिलों में निवास करते हैं। इनकी सर्वाधिक जनसंख्या उदयपुर जिले में है। आदिवासी इन जिलों में ऊबड-खाबड, वनों में और पहाडियों पर निवास करते है। इनके घर गाँवों में पहाडियों पर दूर-दूर होते हैं। गाँव में भी इनके अलग-अलग फलां होते हैं। छोटे गाँव को फलां और बडे गाँव को पाल कहा जाता है। पहाडियों में रहने वालों को पालवी तथा मैदानों में रहने वालों को बागडी कहा जाता है। इनके घरों को कू या टापरा कहा जाता है, लेकिन आधुनिकता की दौड में आदिवासी पीछे नहीं हैं, अब शिक्षित और नौकरीपेशा वाले आदिवासियों के घर पक्के बनने लगे हैं। अशिक्षित लोग कच्चे मकानों एवं झोंपडियों में रहते हैं।
आदिवासियों के मकान बनाने में वनों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। मकान की दीवारें मिट्टी की बनाई जाती हैं, फिर ऊपर ढकने के लिए लकडियों की अत्यधिक आवश्यकता होती है। वागडी में घर के ऊपर प्रयोग आने वाली लकडियों को अलग-अलग नाम दिया जाता है। वागडी में बोम्बिया, पाट, दुरजे, माली, वली आदि अलग-अलग नाम दिए हैं, ये जो लकडियों से पूरा घर ऊपर से ढक दिया जाता है, जिसे छाजेरा भी कहते हैं। उसके बाद उसे घास-पत्तियाँ या केलुओं से ढका जाता है। इनमें विशेष रूप से सागवान, नीम, आम, धमकनिया, धामन, इमली, उमरा, करंज, बांस, शीशम आदि पेडों की लकडियाँ काम में लाते है। घर के चारों तरफ बाहरी सुरक्षा के लिए कांटों की बाड लगायी जाती है, जिनमें अधिकतर थूर का प्रयोग होता है।
आदिवासी समाज में अधिकतर संयुक्त परिवार दिखाई देते हैं। इनके परिवार में पति-पत्नी, बालक तथा अविवाहित भाई-बहन के अतिरिक्त माता-पिता भी साथ रहते है। संयुक्त परिवार में लगभग तीन से चार पीढियों के लोग साथ में रहते हैं। जगदीशचन्द्र मीणा लिखते है, भीलों की इकाई में सबसे बडे पुत्र को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे। पिता की मृत्यु के बाद उसे परिवार के मुखिया के रूप में अपना दायित्व निभाना पडता था, कभी-कभी विधवा माता तथा बडे पुत्र में मतभेद होने पर गाँव की पंचायत में परिवार का समस्त दायित्व माता स्वयं स्वीकार करती थी।1
आदिवासी समाज में पारिवारिक झगडे गाँव में लोगों के आपसी विवाद का समाधान गाँव के पंच एवं मुखिया मिलकर करते हैं। गाँव के अधिकतर झगडे फसाद गाँव वाले स्वयं मिलकर समाधान कर लेते हैं, पुलिस तक जाने की कभी आवश्यकता नहीं होती है।
आदिवासियों के मकान एवं रहन-सहन, भोजन आदि पर टिप्पणी करते हुए मोहनलाल जोड कहते हैं- भीलों के मकान और समाज में कोई पवित्र-अपवित्र की सोच विचार नहीं होता है। जैसे ये लोग खाना भी मकान के किसी भी भाग में बैठकर खा सकते हैं। मकान अंदर से साफ सुथरा और लिपा-पुता होता है। मकान में कोई खास अलग कमरों की व्यवस्था नहीं होती है। भील या आदिवासी अपना वैवाहिक जीवन भी इन्हीं खुले कमरों में बिताते है।2
मोहनलाल जोड अपनी पुस्तक में यह उल्लेख करते हैं कि ये लोग जूते पहनकर रसोई में आ जाते हैं। मैं इनके इस कथन का विरोध करती हूँ, क्योंकि आदिवासी समाज में ऐसा नहीं होता, जूते पहनकर ना तो कोई रसोई में जाता है और न ही खाना खाता है।
आदिवासी अपने खान-पान में हरी पत्तियों की साग-भाजी का प्रयोग करते हैं, जिनमें पालक, मेथी, बथुआ, प्याज की पत्तियाँ, ढेमडा, सरसों की पत्तियाँ आदि शामिल होती हैं। आलू-प्याज, बैंगन, भिंडी, तोरई आदि सब्जियों के अलावा दालों का भी प्रयोग करते हैं। चपातियों में मक्का, बाजरा, कोदरा, गेहूँ (गेहूँ-चना-जौ का मिश्रण) का आटा प्रयोग में लेते हैं। आदिवासी मांसाहारी भी अधिक होते हैं, वे मूर्गा, मछली, बकरा, भेड आदि के माँस का प्रयोग करते हैं। महुए के फलों को आटे में मिलाकर भी रोटियां बनाते हैं, जिससे ढेकला कहा जाता है। महुए के फलों की शराब बनाते हैं और उसका नियमित सेवन करते हैं। किसी की मृत्यु या विवाह के अवसर पर भी महुए की शराब का सेवन अनिवार्य रूप से किया जाता है।
विवाह- विवाह एक सामाजिक व्यवस्था है और आदिवासियों में विवाह को सामाजिक मान्यता प्राप्त है। आदिवासी समाज में विवाहित युवक-युवतियों को अविवाहित युवक-युवतियों की तुलना में अधिक सम्मान दिया जाता है। आदिवासी समाज में बहुप्तविवाह प्रथा है। इनके विवाह से पूर्व और विवाह के पश्चात् भी सम्बन्ध बने रहते हैं। आदिवासी भील मीणाओं में विवाह को कितना महत्त्व दिया जाता है, इसका वर्णन करते हुए सुश्री मालनी काले ने अपनी पुस्तक भील संगीत एवं विवेचन में लिखा है कि प्रत्येक भील युवक एवं युवती विवाह को अत्यधिक महत्त्व देते हैं, भील युवक कठिन परिश्रम करके भी विवाह के लिए धन एकत्रित करता है।
विवाह के प्रकार -
1. मोरबन्दिया विवाह - सामान्यतया यह विवाह मुख्य रूप से प्रचलन में है। यह विवाह परिवार वालों की सहमति से होता है। इसमें दापा, सगाई, लग्न, तोरण और फेरे आदि रस्मों से विधिवत् किया जाता है। यह विवाह सम्मानजनक भी माना जाता है।
2. देवर-भाभी विवाह - इसमें बडे भाई की मृत्यु हो जाने पर उसके छोटे भाई के साथ विवाह करा दिया जाता है। परन्तु इसमें भी दोनों की आपसी सहमति होती है। इसे देवर बट्टा या वागड में इसे देवर को पहनाना भी कहा जाता है। इसमें एक विधवा का विवाह भी हो जाता है और अवैध सम्बन्धों जैसी समस्या या शोषण जैसे अपराध भी नहीं होते।
3. जीजा-साली विवाह - इसमें बडी बहन की मृत्यु, बाँझ होने पर या असाध्य बीमारी से ग्रसित होने के कारण छोटी बहन का विवाह जीजा से करवा दिया जाता है।
4. प्रेम विवाह - इसमें लडकी और लडका एक-दूसरे से प्रेम करने लग जाते हैं और जब विवाह करने जैसी स्थिति न होने पर दोनों घर वालों से छुपकर विवाह कर लेते हैं।
इसके अलावा भी आदिवासी समाज में विनिमय विवाह, सेवा विवाह, हरण विवाह, ऋय विवाह, भगोरिया विवाह जैसे अनेक प्रकार हैं। लेकिन शिक्षा के विकास के कारण अब लोगों में जागरूकता आ जाने पर इस प्रकार के विवाह कम हो गये हैं या यों कहा जाए कि लगभग समाप्त हो गए हैं।


विवाह से सम्बन्धित प्रथाएँ -
1. दापा प्रथा : लडके-लडकी की आपसी सहमति से विवाह के अवसर पर दापा लिया जाता है। इसमें लडकी के परिवार वाले लडके से जो पैसे लिए जाते हैं, जिसमें पाँच रुपये, ग्यारह रुपये, इक्कीस रुपये, इक्यावन रुपये या एक सौ एक रूपये तक लिया जाता है। किंवदन्ती है कि लडकी के ससुराल जाकर खाना व पानी नहीं पी सकते। इसलिए पहले दापा लिया जाता है। समय के बदलाव के साथ-साथ प्रथाएँ बदलती जाती हैं, लेकिन यह प्रथा आज भी चल रही है।
2. नोतरा (निमन्त्रण देना) प्रथा : विवाह के अवसर पर सभी रिश्तेदारों के घर पीले चावल रखे जाते हैं। यह एक प्रकार का निमन्त्रण देने का तरीका है। इसमें एक व्यक्ति लडकी-लडके के रिश्तेदारों के घर जाता है और उनके घर के दरवाजे पर पीले चावल रखता है और विवाह के दिन की सूचना देता है। इसे नोता देना कहते हैं।
इसके अलावा विवाह से पूर्व नारियल कपडा देकर सम्बन्ध तय करना, लग्न बन्धन, पीठी करना, गणेश स्थापना, माण्डवों (मण्डप करना) बारात (जान) फेरे वगैरह अनेक रस्में निभायी जाती हैं।
विवाह के अवसर पर गाये जाने वाले गीत -
1. पीठी की रस्म पर गाया जाने वाला गीत र्‍
पीठी ल्यो रे लाडकडा
पीठी वरणा था जो
अंतर ल्यो रे लाडकडा
अंतर वरणा था जो
2. मोरिया करना : पीठी के बाद गाँव के लोग लडके-लडकी को एक लकडी के पाटले पर बिठाते हैं और उसे ऊँचाकर नचाते हैं और लाड-प्यार करते हुए गीत गाते हैं -
मोरजू ऊँचू करो रे हरनाटो वाजे
किना-किना राज में रे हरनाटो वाजे
बापा जी ना राज में रे हरनाटो वाजे
3. गणेश स्थापना पर गाया जाने वाला गीत -
कंकुं केरी चैक पूरावो
मोटानो कुंवर महलों में बैठो
चैखतिया ना चैक पूरावो
मोटा ना कुंवर महलों में बैठा
4. माण्डवा (मण्डप) के अवसर पर गाया जाने वाला गीत
माण्डवा हुतरो मोकला जी जी ना व्हाला-
मामा आवहे हामटा जी जी ना व्हाला
आवहे ऐवा बैस है जी जी ना व्हाला
5. बारात प्रस्थान के समय गाया जाने वाला गीत :
(1) झटपट हवाई ल्यों कुँवर परणवा जावू है परदेश
धोती पेरी ल्यों कुँवर परणवा जावू है परदेश
अन्तर मेकी ल्यो कुँवर परणवा जावू है परदेश
असल हवाई ल्यो कुँवर परणवा जावू है परदेश
(2) कुँवर राईचम्पा ने छाइले कुंवर ऊबा रेजो
कुंवर गामे वाहे रेजू कुँवर ऊबा रेजो
कुंवर कुटूम वाहे रेज कुँवर ऊबा रेजो
6. तोरण चढने पर गाया जाने वाला गीत -
(1) चडजो रे कणा गाम नो फेरो रे झरमरिया लाल
चडजो रे कानपूर वालो ठेको रे झरमरिया
दाबजी रे वैवाई तारी झौपडी रे
दाबह ने कन्या काडह रे झरमरिया लाल
7. टीलडी चढाते वक्त गाया जाने वाला गीत -
टीलडी लाजों वे तेलाव, ने तो रेजे झापा बार
रुपया लाजों वे ते लाव, ने तो रेजे झापा बार
मांडीला लाजों वे ते लाव ............
8. फेरे लेते वक्त गाया जाने वाला गीत- उस वक्त ये विशेष भजन गाया जाता है -
परणे-परणे सीता ने श्री राम रे
परणे-परणे नानडिया दो परणे रे
पहले-पहले मंगतिया वरतावो रे
नानडिया ना मंगतिया वरतावो रे
परणे-परणे सीता ने श्री राम रे
9. नखत करते समय गाया जाने वाला गीत -
वैवाई तारा घेरे मारो कइयो भाई
घणी घणी ने आले मारू पामेरू रे
वैवाई आडले-आंडलू भरजू मारू पामेरू रे
मारे कइयो भाई धणी-धणी ने आले
अणा कईया वैवाई ने तिजोरी भराई गई
मारू पामेरू रे
विवाह के अवसर पर गाये जाने वाले गीतों के सम्बन्ध में मोहनलाल जोड लिखते हैं - मण्डप के नीचे पुरोहित (ब्राह्मण) अग्नि जाग्रत् करता है, देवों को आह्वान करता है और मंत्रोच्चार करता है। वर-वधू को इस प्रगट अग्नि के सात परिक्रमा दिलाई जाती है। इस अवसर पर वर पक्ष की स्त्रियाँ यह गीत गाती हैं -
लाडा हाजे काटो हाथ रे लाडा तान मान रे
लाडा खेतडी परनी जाहे लाडा तान मार रे।
कृषि -
आदिवासी प्राचीनकाल से जंगलों में अपना जीवनयापन करते आये हैं। इनका मुख्य व्यवसाय कृषि करना है। आदिवासी कृषि कार्य, वन उपज को एकत्र करना, पशुपालन, आखेट, जंगलों से अनुपयोगी लकडियाँ निकालना, झुम पद्धति से कृषि करना, मजदूरी आदि कार्य करते हैं। आदिवासी समाज के कृषि कार्य एवं तरीकों पर जगदीशचन्द्र मीणा लिखते हैं- सृष्टि के प्रारम्भ से ही आदिम संस्कृति को मानव सभ्यता का मूलाधार माना गया। इस समय उनका सारा जीवन वनों पर आधारित रहा। मानव अपने जीवन निर्वाह के लिए कन्द-मूल पर निर्भर रहता था। पानी का उपयोग झरनों, नदी, नालों से करता था। शरीर की सुरक्षा में पत्तों, पशुओं की खालों का उपयोग करता था, अर्थात् उस समय सारा जीवन यायावर एवं वनीय आधार पर निर्भर था।
मध्यकाल में दक्षिणी राजस्थान की भील जनजाति दाजिया या झुमटो पद्धति से भूमि को साफ कर कृषि करने लगे। इस पद्धति के अन्तर्गत भीलों द्वारा जंगलों को काटकर जला दिया जाता था। जलाए गए स्थान को कुदाली, गैंती आदि औजारों से समतल बना देते तथा बारिश के दिनों में नमी बढ जाती, तब इन्हीं औजारों से खोदकर बीज डाल देते थे। भील लोग इस तरह की कृषि व्यवस्था को एक स्थान पर तीन-चार वर्ष तक करते थे, बाद में इसी तरह दूसरी जगह जंगल काटकर जलाते थे।5
लेकिन समय के साथ-साथ कृषि कार्य में भी परिवर्तन आ गया है, अब आदिवासियों के पास अपनी जमीन है। अब आदिवासी स्थायी रूप से गाँवों में बस गए हैं, लेकिन आदिवासियों की कुछ अपनी आस्थाएँ और परम्पराएँ हैं, जिन्हें वो आज भी सँभाले हुए हैं। खेती करने के तरीकों में भी परिवर्तन आ गया है, आज तकनीकी ने गाँव तक अपने पाँव फैलाए हैं।
कृषि से सम्बन्धित परम्पराएँ और आस्थाएँ -
प्रकृति-पूजक आदिवासी हर अवसर पर प्रकृति के भौतिक पदार्थों की पूजा करते हैं। खेती करने से पूर्व आदिवासी आखातीज के दिन हल और कृषि से सम्बन्धित औजारों की पूजा करते हैं। बैलों की पूजा करते हैं, उनको खिलाते हैं। उसके बाद घर में भी कुछ मीठा बनाते हैं और सभी मीठा भोजन करते हैं। उसके बाद हल लेकर खेत में जाते हैं और खेत में थोडा बीज बोते हैं, उसे हलोतरा करना कहते हैं।
दक्षिणी राजस्थान में 1980 से पहले सूखा अधिक पडता था और सालभर में दो फसल तक होती थी। लेकिन अब तकनिकी विकास और शिक्षा के विकास से कृषि का भी विकास और सुधार हुआ है। अब दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी अंचल में कृषि-कार्य मशीनों से भी होने लगे हैं। बीज बोने से लेकर फसल काटकर अनाज को अलग करना और साफ करने का कार्य ट्रैक्टर, थ्रेसर के माध्यम से होने लगा है।
***
सन्दर्भ ग्रन्थ -
1. जगदीशचन्द्र मीणा - भील जनजाति सांस्कृतिक एवं आर्थिक जीवन, हिमान्शु पब्लिकेशन्स उदयपुर 2003, पृ.सं. 16
2. मोहनलाल जोड - भील संस्कृति, अरिहन्त प्रकाशन, जोधपुर 2015 पृ.सं. 65
3. डॉ. सी.एल. शर्मा - भील समाज, कला एवं संस्कृति, मालती प्रकाशन, जयपुर 1998, पृ.सं. 81
4. मोहनलाल जोड - भील संस्कृति, अरिहन्त प्रकाशन, जोधपुर, 2015 पृ.सं. 38
5. जगदीशचन्द्र मीणा- भील जनजाति का सांस्कृतिक एवं आर्थिक जीवन, हिमान्शु पब्लिकेशन्स, उदयपुर 2003, पृ.सं. 51, 52
6. वही, पृ.सं. 52

सम्पर्क - अतिथि सहायक आचार्य,
श्री भोगीलाल पण्ड्या राजकीय महाविद्यालय,डूंगरपुर, राज.
rekhakharadiw®{}{@gmail.com