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राजस्थान का जल स्थापत्य(बीकानेर, शेखावाटी, मेवाड और हाडौती के संदर्भ में)

रितेश व्यास
भारतीय अर्थव्यवस्था का मूलाधार कृषि है और कृषि के लिए जल प्रबन्धन अत्यन्त आवश्यक आधार हैं। प्राचीन काल से ही जल को जीवन का आधार माना गया है। जल मानव जीवन की प्राथमिक आवश्यकता है। वर्तमान दौर में नवीन आविष्कारों और प्रयोगों से जल और भी महत्त्वपूर्ण बन गया है। राजस्थान में भी जल के महत्त्व को अत्यन्त गहराई से समझा है। सम्पूर्ण क्षेत्र अतिवृष्टि और अनावृष्टि के मायाजाल में फँसा हुआ है। प्रदेश का एक इलाका जहाँ रेगिस्तान से अटा हुआ है, तो दूसरा अरावली पहाडियों से घिरा है। इन दोनों क्षेत्रों में वर्षा की अनियमितता ने यहाँ के निवासियों को जल संरक्षण और उसके प्रबन्धन की ओर अग्रसर किया। जहाँ अधिक वर्षा होती है उन्होंने भी जल संरक्षण किया तथा जहाँ कम होती है, उन्होंने भी इस ओर विशेष ध्यान दिया। जल है तो कल है का मूल मंत्र उन लोगों के लिए ही है, जहाँ जल की कमी रही। जीवन के आवश्यक घटक के रूप में जल का स्थान सबसे ऊपर है, क्योंकि राजस्थान में जल की बूँद महज एक जल की बूँद नहीं बल्कि उसका महत्त्व किसी रजत बूँद से कम नहीं है। यही कारण है कि प्रदेश के हर कोने में हमें इस घटक के संरक्षण और संवर्धन के प्रतीक अर्थात् तालाब, तलाई, जोहडे, सरोवर, कुण्ड, बाँध, झीलें आदि मिल जाते हैं। इनका स्वरूप, आकार, बनावट अपने क्षेत्र की सांस्कृतिक ऐतिहासिक परम्परा के वाहक के रूप में दृष्टिगत होती है, जिसका संक्षिप्त विवरण शोध पत्र का आधार है।
सभी इलाकों में यद्यपि इनका निर्माण जल के संरक्षण के लिए ही किया गया जिससे जीव का जीवन बचाया जा सके, लेकिन उनकी बनावट, आकार और तकनीक सभी क्षेत्रों में भिन्न दिखाई देती है। इसे हम देश काल परिस्थिति के प्रभाव और परिणाम के रूप में देख सकते हैं।
बीकानेर-
बीकानेर अपने सांस्कृतिक वैभव के लिए विश्व में विशिष्ट पहचान रखता है। इसमें यहाँ के जलस्रोतों की महत्ती भूमिका रही। शहर निरन्तर परिवर्तनशील रहा है। यह परिवर्तन भौगोलिक विस्तार से ज्यादा जीवन शैली और व्यवहार में प्रभावी रहा। बीकानेर नगर में तालाब के प्रति प्रेम अन्य शहरों जैसा ही रहा। इसका मुख्य कारण पानी की कमी थी। बीकानेर के लोगों का यह प्रेम नगर स्थापना (वि.सं.1545) के समय से पूर्व भी यहाँ की संस्कृति का अंग रहा है। शहर के तालाब अपने आकार के कारण अलग-अलग नामों से पुकारे जाते हैं। जो बडे आकार का होता है उसे तालाब और छोटे आकार का तालाब तलाई कहलाता है।1 शहर में यही दो प्रकार के जलस्रोत हैं। सामान्यतः तालाब में जनाना घाट, मर्दाना घाट, गऊ घाट, रानी घाट, चेतन घाट, रामघाट, क्रिया घाट आदि बने होते हैं, लेकिन सभी तालाबों में ऐसा हो जरूरी नहीं है।2 बडे तालाब में जल की अधिक आवक होने के कारण लोगों का आवागमन भी ज्यादा होता है, अतः उसका विस्तार क्षेत्र भी ज्यादा होता है।






शहर के तालाब पूर्णतया कच्चे तल के बने हैं। परकोटे के करीब 1 किलोमीटर की दूरी पर पश्चिमी छोर पर लम्बी-चौडी आगौर लिए संसोलाव और हर्षोलाव बडे तालाबों की श्रेणी में आते हैं। मुडिया कंकर की आगौर से अटे ये तालाब अपने समय में बारिश में पूरे परवान पर होते थे। लम्बी चौडी पक्की दीवारों से सुरक्षित ये सरोवर आज भी अपनी क्षमता के अनुसार जलसंग्रह करते हैं। इन तालाबों की सबसे खास बात इनके गऊ घाट की बनावट होती थी। इसमें पशु आराम से खडे होकर पानी पीते थे। बडे-बडे रोडों के बीच खाली स्थान छोडते हुए इनका निर्माण किया जाता था, जिससे खुर खाली स्थान में अटक जाए और पशु का संतुलन बना रहे। गऊघाट का नामकरण हमारी संस्कृति में गाय के प्रति हमारी श्रद्धा के प्रतीक के रूप में रखा है लेकिन यह घाट सभी पशुओं के लिए खुला रहता था और आज भी है।
सौन्दर्य या स्थापत्य की दृष्टि से इन तालाबों में कुछ खास नहीं है। संसोलाव के बीच में छतरी का निर्माण हुआ है, लेकिन शहर के अन्य तालाबों में सिर्फ तालाब ही है।3 उनमें स्थापत्य और सौन्दर्य पर कोई खास बात हमें दिखाई नहीं देती। जस्सोलाई तलाई तो आज है ही नहीं। शहर में कुल 40 के करीब ताल-तलैया थी, जिनमें से आज कुछ ही बचे हैं, लेकिन नाम सभी के जिंदा हैं। बनावट के दृष्टिकोण में सभी का स्वरूप एक जैसा ही रहा है, क्योंकि इनका मुख्य उद्देश्य जल संग्रहण करना ही था। यह संग्रहण कितनी मात्रा में हुआ इसके लिए कुछ एक तालाबों जैसे देवी कुण्ड सागर और घडसीसर में पत्थर के मापक स्तंभ भी लगे मिलते हैं।4
इस प्रकार एक सामान्य संरचना को आधार बनाकर बीकानेर शहर तथा आसपास के क्षेत्रों में तालाबों का निर्माण हुआ। इन तालाबों के पास ही कुँए बने थे। इनमें, अधिकांशतः आज बंद हैं, लेकिन इनकी बनावट शैली में एकरूपता दिखती है। लाल दुलमेरा पत्थर से बने इन कुँओ में स्थापत्यकौशल दिखाई देता है। आचार्यों का कुँआ, मोहता कुँआ, मालियों का कुँआ, रानीसर कुँआ आदि में खेली, छोटे-छोटे कुण्ड और कलात्मक छतरियाँ इनकी खास बनावट को इंगित करती है। तालाबों के पास कुओं के बनाने का मुख्य उद्देश्य तालाब द्वारा संगृहित भूमिगत जल को कुँए के माध्यम से निकालना रहा था। यह तत्कालीन निर्माणकर्ताओं की दूरदर्शी सोच का परिणाम था। स्थानीय पत्थर, स्थानीय कारीगर और स्थानीय चूना इन तीनों के सुनियोजित संयोजन ने तालाब के निर्माण को यथार्थ में बदल दिया। लेकिन आज शहर भी वही है लोग भी वही हैं लेकिन यहाँ की फिजा बदल गई है। इसके चलते शहर के सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति सजगता का अभाव हुआ और इससे होने वाले नुकसान की भरपाई असम्भव सी लग रही है।
बनावट की दृष्टि से मूँधडा तालाब जिसे फूलनाथ बावडी भी कहते हैं, अनोखी है। इसकी बनावट के कारण इसे अष्टकोण बावडी के नाम से पुकारते हैं। श्रीयंत्र की तरह बनी अपनी तरह की एकमात्र संरचना है। खुली सीढीदार बावडी और नीचे से एकदम शंकु आकार की हो जाती है। शहरी परकोटे के बाहर बने लगभग प्रत्येक मंदिर में बावडियाँ बनी हुई हैं, जो पूरी तरह बन्द कमरे की तरह है। इनका पानी मन्दिर में काम आता है। रियासतकालीन श्री लक्ष्मीनाथजी मन्दिर, भाण्डाशाह जैन मन्दिर, जूनागढ किले में तथा शहर के भीतर व बाहर कई ऐसे कुँए बने हैं जो शहर की जलसंग्रहण परम्परा के संवाहक हैं।
शेखावाटी अंचल-

सीकर, चूरू और झुंझुनूं का संयुक्त रूप शेखावाटी के नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र अपनी भित्ति चित्रकला और जलस्रोतों के निर्माण के लिए विश्व में अपना विशेष स्थान रखता है। पूरा अंचल जहाँ एक ओर भित्तिचित्रों के कारण ओपन आर्ट गैलरी कहा जाता है, तो वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र में बने जलस्रोत व्यापारिक मार्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अंचल के जलस्रोत जिनमें जोहडे, बावडियाँ और कुँए प्रमुख हैं। जो अपनी विशिष्ट बनावट शैली के कारण पहचाने जाते हैं।
जाहेडे खास पद्धति से बने हैं, जो राज्य के अन्य क्षेत्रों में बने तालाबों से एकदम भिन्न हैं। यह एक विशेष प्रकार का तालाब होता है। शेखावाटी में इसकी बनावट लगभग एक जैसी है। जोहडा-जाहेडी, बंध- बंधिया, ताल-तलैया, एवं पोखर-पोखरी वो शब्द हैं, जो तालाब के आकार को ध्यान में रखकर रखे जाते थे।5 सीकर, झुंझुनूं, चूरू में बने जोहडे सुन्दर चौकोर पक्के फर्श के हैं। वैसे आमतौर पर तालाब का फर्श कच्चा होता है, अर्थात फर्क मिट्टी का होता है, लेकिन यहाँ जोहडों का फर्श पक्का है। इनके बीच का हिस्सा ही कच्चा बनाया गया है। स्थानीय लोगों से पता चलता है कि यहाँ के जलस्रोतों की इस बनावट का कारण यह था कि बारिश का पानी जमीन एक जगह से ही जाए। इस तकनीक से भूमिगत जल एक ही जगह इकट्ठा हो जाता है। जिस प्रकार मकान की छत का पानी एक नाली या पाइप के द्वारा नीचे उतारा जाता है, ठीक उसी प्रकार इनकी बनावट भी ऐसी है। जोहडे का पानी जमीन में एक ही जगह से जाए।

तालाब में आने वाला पानी साफ हो ऐसा प्रयास राजस्थान में बने तालाबों में दिखाई देता है। इनमें कई जगह जलछिद्र होते हैं, जिनसे पानी तालाब में प्रवेश करता है। लेकिन बाहरी पानी के शुद्धीकरण के उपाय शेखावाटी में सर्वश्रेष्ठ हैं। जोहडों के एक तरफ गऊघाट होता है। ये उसी तरफ बनाया जाता है जिस ओर जोहडे की आगौर की ढलान ज्यादा होती है। जिससे बारिश के समय पानी अधिक आ सके। घाट और जोहडे के बीच एक बडी दीवार होती है जो दोनों को अलग करती है। यह गऊघाट जोहडे जितना ही गहरा होता है। बारिश का पानी पहले यहाँ इकट्ठा होता है और एक निश्चित ऊँचाई पर बने छिद्र तक भर जाने के बाद पानी जोहडे में जाता है। यह पानी को फिल्टर करने का कार्य करता है। ढलान से बहकर आई भारी अशुद्धियाँ यहीं रह जाती हैं। सेठों का जोहडा, लक्ष्मणगढ, गनेडी वालों का जोहडा, फतेहपुर, फतेहसागर जोहडा, बग्गड, शिकारगाह की बावडर में ऐसे ही घाट बने हैं। सभी जोहडे समचौरस हैं। इनकी चारदीवारी पर सुन्दर भित्तिचित्र बने हैं। चारों कोनों पर छत्रियाँ भी बनी हैं। छत्रियों पर चढने के लिए सुगम सीढियाँ हैं, जोहडे के द्वार पर तिबारी बनी है।
यहाँ के कुँए भी पूरे राजस्थान में सबसे अलग हैं। एक और जहाँ पक्के फर्श के जोहडों ने शेखावाटी क्षेत्र को विशेष पहचान दी है, ठीक वैसे ही यहाँ के कुँए भी अपनी बनावट के लिए प्रसिद्ध हैं।6 यहाँ के कुँए चार मरब (मीनारों) वाले हैं। कुँए ऊँचे चबूतरों पर बनाए जाते थे और कुँए के कोनों पर करीब 10 से 15 फीट ऊँचे मरबे बने थे। ये कुँए स्थानीय जलस्तर की गहराई के आधार पर ही बनाए जाते थे। लगभग सभी कुँए व्यापारिक मार्गों और जोहडों के समीप ही बने हैं। निश्चित ही जोहडों से भूमि में गया पानी इन के माध्यम से बाहर निकाला जाता था। आज भी कईं कुँए शहर और गाँव की आपूर्ति कर रहे हैं। यह कुँए मुख्य मार्गों पर निश्चित दूरी पर मिलते हैं। जो मुख्य इसलिए बनाए जाते थे कि यहाँ से गुजरने वाली राहगीरों और व्यापारी काफिलों को अपनी यात्रा के दौरान पानी की कमी से न जूझना पडे। इसमें कोई दो राय नहीं कि राजस्थान के सेठ-साहूकारों ने अपने अर्थ का प्रयोग अर्थ (पृथ्वी) के लिए ही किया था। शेखावाटी के साहूकारों ने भी पूरे क्षेत्र में ऐसी ही संरचनाएँ बनाई है, जिनका फायदा आज भी लोगों को हो रहा है। कुँए के मरबे राहगीरों को पानी की उपलब्धता का आशातीत संकेत थे। शेखावाटी में शायद ही कोई गाँव और कस्बा हो जहाँ पुराने कुँए ना हों।
अलसीसर गाँव में 20 साधारण कुओं के साथ तीन ऐसे कुँए भी है वैसे अन्यत्र नहीं मिलते। आकर्षक और विशाल कुँओं में पशुओं के पानी की व्यवस्था के अलावा पानी खिंचवाने, स्नानादि और मौसम से बचाव की व्यवस्थाएँ भी हैं। इनके ऊपर चार छोटे कक्षों के साथ शिव मंदिर और हनुमान जी के मंदिर हैं। यह कुँए स्वच्छता और अध्यात्म के केन्द्र हैं।7
कुँओं की तरह यहाँ की बावडियाँ भी अपनी स्थापत्य शैली से स्वयं को आकर्षित करती हैं। बावडियों की विशेषता है कि कुँए के साथ-साथ जमीन से पानी की सतह तक सीढियाँ बनी हैं। कोई भी व्यक्ति सीढियों से अंतिम छोर तक जा सकता है।8 बावडी के दाएँ-बाएँ और कुछ छोटे कक्ष भी बने हैं। जिनमें कम पानी होने पर यात्री या राहगीर आराम कर सकते थे। तुलसियाना बावडी, खेतान की बावडी, मेडतनी बावडी, सोनगिरी की बावडी, श्रीमाधोपुर की 52 गेट बावडी, बबई की बावडी, कोतवाल की बावडी आदि इसके उदाहरण हैं।9 जोहडों में पन्नासर तालाब खेतडी की बनावट अन्य जोहडों से एकदम भिन्न है। विक्रम संवत् 1928 में बने इस जोहडे के पीछे रेड का टीला है। बारिश में बडी मात्रा में पहाडी से होते हुए पानी आता है। निर्माणकर्ता ने पहाडी के पास एक बडी मजबूत दीवार और एक नाला बनाया जिस में बहता हुआ पानी कई चरणों में होकर तालाब तक पहुँचता है। समचौरस आकार में शहर के करीब बना ये तालाब शेखावाटी के सबसे समृद्ध तथा पुरातात्त्विक विभाग राजस्थान सरकार द्वारा संरक्षित जोहडों में से एक है। रेढ की पहाडी ही इस तालाब के पानी की आवक का मुख्य स्रोत है। इसकी लम्बाई-चौडाई लगभग 150 फीट है।10

इसी तरह उदयपुरवाटी की मोहनशाह की बावडी, कोट बांध (सरजू सागर बांध) माधव सागर जोहडा आदि वे जलस्रोत हैं जो अपनी विशिष्ट बनावट शैली, तकनीक और जल संग्रहण के लिए प्रसिद्ध है। चुरू का सेठानी का जोहडा भी अंचल का प्रमुख जलस्रोत है। 1898 में भगवान दास बाघला ने अकाल राहत के दौरान इसे बनवाया था। यह क्षेत्र का सबसे विशाल जोहडा है जिसकी बनावट सबको आकर्षित करती है। यह एक मात्र ऐसा जोहडा है जिसके लगभग 8 द्वार हैं। इसका गऊ घाट भी कलात्मक दृष्टि से बहुत सुदृढ है जिस पर तिबारियाँ बनी हैं।11 ये जलस्रोत इस बात का प्रमाण हैं कि राजस्थान में जहाँ जल की कमी रही वहाँ बरसो पहले ही स्थानीय लोगों ने जल प्रबन्धन के तरीके अपना लिए थे।
मेवाड-
मेवाड का क्षेत्र अपनी सांस्कृतिक विरासत तथा उसकी लम्बी वंश परम्परा के लिए विख्यात है। यहाँ के किले विश्व के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोडते। राणा सांगा, महाराणा कुंभा
तथा प्रताप का गौरव किसी से छुपा नहीं है। इसी तरह इनके दौर में बने जलस्रोत भी अपनी विलक्षणता के लिए प्रसिद्ध हैं। पथरीला इलाका होते हुए भी निर्माण शैली अद्वितीय थी क्योंकि पत्थर सहज सुलभ था। यहाँ के जलास्रोत भी तकनीकी विकास से अछूते नहीं थे। राजवल्लभ में जलाशय के निर्माण के बारे में कहा गया है कि उसकी नींव इतनी गहरी होनी चाहिए कि नीचे पत्थर निकल आए।12 इस क्षेत्र के तालाब चौकोर, तिकोण, अनेक कोण वाले, लम्बे और अर्ध चन्द्राकार प्रकार के मिलते हैं।
यहाँ नंदा, त्रिकुटा, एक मुखी, दो मुखी, जया (तीन मुखी) षट्कूट, चार मुख वाली बावडियों के निर्माण की जानकारी मिलती है।13 इन बावडियों में बडी-बडी सीढियाँ, नालियाँ तथा इनके चारों ओर तोरण भी बनाए जाते थे। इनके बीच में कूट भी बनाए जाते थे।14 बावडियों की तरह इस क्षेत्र में कुण्ड भी मिलते हैं। इनके बीच गवाक्ष व किनारों में शालाएँ बनाई जाती थी। कुँए, बावडी तथा कुण्ड में पानी आने वाले स्थानों पर स्थान छोडा जाता था, जिससे उसने पानी आना रुके नहीं। सुभद्र, भद्र आदि तरह के कुण्ड निर्माण की जानकारी मिलती है। कुण्ड बनाने की भी विशेष विधि थी। विश्ववल्लभ में एक स्थान पर लिखा है कि कुण्ड के नीचे रेत आ जाने पर जल में सडने वाली लकडियों को उसके सिरे पर उतारा जाता था। लकडियों की रोक के कारण रेत पुनः कुए को भर नहीं पाती।15
यह एक सामान्य प्रकिया होती है कि जहाँ पानी आने की सम्भावाना हो वहीं बिना प्रमाण के भी तालाब बनाए जा सकते हैं। दो पहाडों के बीच या पहाडी की घाटी को बाँधकर कम खर्च में बडे-बडे तालाब बनाने के निर्देश हैं। जहाँ आसपास अधिक जमीन हो तो उसकी जल भराव क्षमता बढ सकती है, ऐसे तालाब अच्छे माने जाते हैं।16

इसी तरह मेवाड क्षेत्र में बाँधों के निर्माण पर जोर रहा। राजस्थान में सबसे ज्यादा बाँध इसी क्षेत्र में हैं। राजसमुद्र में जल के विभिन्न तरीके अपनाकर कठोर चट्टानों के आने तक नींव खोदी गई थी।17 जयसमुद्र में भी जल को निकालकर 6.70 मीटर नींव खोदी गई थी।18 मुख्य बाँध के अतिरिक्त पीछे की तरफ एक दीवार बनाकर बीच वाले हिस्से में मिट्टी पत्थर इत्यादि भरवा दिया जाता था। इसमंल पेड या दूब लगा दी जाती थी। ये पेड-पौधे तथा यह क्षेत्र बाँध की सुदृढता में सहायक थे।19 जयसमुद्र के बीच का हिस्सा लगभग 200 वर्ष तक खाली रहने के बाद भी जल की तरफ से बाँध इतना मजबूत था कि कभी नहीं टूटा।20 इसी प्रकार जनसागर में 1875 में अतिवृष्टि के बाद भी बाँध को कोई नुकसान नहीं पहुँचा।21 ये इनके निर्माण तकनीक का ही परिणाम था कि ये बाँध उस समय भी सुरक्षित थे और आज भी अपना वैभव लिए हैं। मजबूत नींव के कारण भूमि का कटाव न होना इसका मुख्य कारण रहा। मेवाड में बने सभी जलाशयों पर बाँध पर बनी घाटनुमा सीढियाँ स्नान आदि व पारम्परिक सुविधाओं के साथ ही बाँध को सुदृढता प्रदान करती है। पालों पर बने बुर्ज भी जल के दबाव को कम करने में सहयोगी हैं।
उदयसागर, जयसमुद्र आदि जलाशयों का निर्माण इस तकनीक से किया गया है कि इसमें गिरने वाली नदियों के जल का दबाव सीधा बाँध पर न होकर पहाडों पर रहता है। यहाँ के जलाशयों की पाल का वजन बढाने हेतु बडे-बडे पत्थरों को चूने से मिश्रित कर नींव से भरा गया था। बाँध को मजबूती देने के लिए पहले कच्चा तथा बाद में पक्का बाँध बनाया जाता था। पिछोला में इन सावधानियों को अनदेखा किया गया जिसके कारण उसमें रिसाव हुआ।22 त्रिमुखी बावडी तथा घोसुण्डी की बावडी भी अपनी स्थापत्य दृष्टि से सबको प्रभावित करती है। इन बावडियों की चिनाई इतनी बेहतरीन ढँग से हुई है कि यदि नींव का कोई पत्थर स्थान छोड भी दे तो उसे नुकसान नहीं होता। यही कारण है कि मेवाड के कई मन्दिर, बावडियाँ आदि बिना रख-रखाव के आज भी वैसे ही हैं।23
उदयपुर के आसपास पिछोला, रंगसागर, बडी का तालाब, देवाली का तालाब और उदयसागर को इस प्रकार बनाया है कि एक सरोवर भरने पर उसका जल दूसरे में पहुँच जाता था।
इस प्रकार अचल में जलाशय निर्माण में इञ्जिनियरिंग का पूरा ध्यान रखा गया। बाँध आवश्यकता से अधिक मजबूत बनाए गए। यहाँ के पहाडों ने भी बाँध का काम किया, जिसम जलाशयों की भराव क्षमता अधिक हो गई। यहाँ की भूमि की रचना एवं कठोर चट्टानों के कारण तथा साधनों के अभाव में कुँए खुदवाना कठिन काम था। फिर भी नदियों के पास कुँओं में कम गहराई पर स्थाई जल प्राप्त हो जाता था इसलिए ज्यादातर कुँए नदियों के पास ही खोदे गए। प्राचीन काल से चली आ रही जलाशय निर्माण की परम्परा को ध्यान में रख कर राजाओं ने 17वीं शताब्दी में 80,000 की जनसंख्या के लिए बडी तादाद में जल संसाधनों का निर्माण करवाया था, तो आज भी नगर की लगभग पाँच लाख जनसंख्या एवं कई उद्योगों के बाद भी उदयपुर के लोगों के जीवन का आधार बने हुए हैं।24
पिछोला, उदयसागर, जावर का तालाब, देवारी का तालाब, रूपसागर, राजगढ का तलाब, जनसागर, रंगसागर, राजसमुद्र, देवगांव का तालाब, बेगूं का तालाब, देवाली तालाब, जयसमुद्र, घोसुण्डी की बावडी, सुर्य कुण्ड, गोगून्दा की बावडियाँ, सुघा की बावडी, ताराबाव सादडी, कर्णबाव, साँवल बाव, त्रिमुखी बावडी, भुवाणा बावडी, बेगूं के कुण्ड, देवरा बावडी आदि मुख्य हैं।25 18वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में सहेलियों की बाडी के बीच होद वाला स्थान मध्यकालीन भारत की जलयन्त्र प्रणाली (फव्वारे की व्यवस्था) का अद्वितीय नमूना है।26
इन जलस्रोतों पर स्थापत्य एवं मूर्तिकला के उत्कृष्ट कार्य में अपनी आधार योजना से निर्माण की प्रतिष्ठा तक प्राचीन एवं मध्यकालीन भारतीय वास्तुशास्त्रों के निर्देशों का पालन किया था। राज्य के कला में दक्ष शिल्पियों द्वारा निर्मित ये स्थापत्यस्मारक मेवाड और राजस्थान ही नहीं पूरे भारत की अमूल्य स्थापत्य निधि के रूप में आज भी विद्यमान हैं।
हाडौती अंचल-
प्रत्येक अंचल सामाजिक सरोकारों के क्षेत्र में स्वयं को आगे रखने का प्रयास करता रहा है। वहाँ के राजे-महाराजे, सेठ साहूकारों ने राज्य की जनता के कल्याणार्थ अपने जलस्रोतों का निर्माण करवाया। कुण्ड, बावडियों का उपयोग व्यापारिक काफिलों द्वारा भी किया जाता था। इसके अलावा बाहर से साधारण दिखने वाली ये बावडियाँ सैनिक अभियानों के समय तथा आपातकालीन स्थितियों में नए रूप में ऊभर कर सामने आती थी। इनका निर्माण शिकार हेतु सुरक्षित स्थल के रूप में भी किया जाता था जिसे शिकारगाह के नाम से पुकारते थे।
वैसे तो इस पूरे अंचल में अनेक बावडियों, जो अपनी बनावट शैली और तकनीक के कारण विख्यात हैं, वे सभी बावडियाँ लगभग 100 फीट गहरी मिलती हैं। छोटी काशी बूँदी में सैंकडों बावडियाँ हैं। इसलिए बूँदी शहर को स्टेप वेल्स आफ सिटी बावडियों का शहर बूँदी (राजस्थान) के नाम से भी जाना जाता है।27
बूँदी नगर में लगभग 75 के करीब छोटी-बडी बावडियाँ हैं और अगर आसपास के गाँवों को जोड लिया जाए तब यह आँकडा 300 के पार चला जाता है। इसलिए ही इसे बावडियों का शहर कहा जाता है। सभी बावडियाँ स्थानीय पत्थर से सीढीदार और कई विभागों में बनी हैं। बूंदी शहर के बीचों बीच स्थित रानीजी की बावडी की गणना एशिया की सर्वश्रेष्ठ बावडियों में की जाती है।28 इसमें लगे सर्पाकार तोरणों की कलात्मक पच्चीकारी देखते ही बनती है। बावडी की दीवारों में विष्णु के अवतार मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, इन्द्र, सूर्य, शिव, पार्वती एवम् गज लक्ष्मी आदि देवी देवताओं की मूर्तियाँ लगी हैं। बावडी की गहराई छयालीस मीटर है। इस अनुपम बावडी का निर्माण राव राजा अनिरूद्ध सिंह की रानी नाथावती ने 1699 ई. में करवाया था। इस कलात्मक बावडी में प्रवेश के लिए तीन दरवाजे हैं। डूमरा की बावडी, बडे तोप खाने के कोट की बावडी, डहरी बावडी, शुक्ल बावडी, चतरा बावडी, व्यास बावडी, खोडी बावडी, खोजाबेट बावडी, गणेश बाग बावडी, पण्डित जी बावडी, प्रमुख बावडियाँ है। ये सभी बावडियाँ 60-80 फीट के करीब गहरी हैं और 20-40 फीट चौडी हैं। खोजा गंट बावडी 108 फीट लम्बी है। इनमें कई बावडियाँ अंग्रेजी के एल आकार की हैं। ये दो से तीन मंजिला हैं जिससे इनकी गहराई का अनुमान लगाया जा सकता है। ये बावडियाँ राहगीरों, व्यापारिक काफिलों तथा सैनिक जत्थों के उपयोग के लिए बनाई गई थी। ये सभी लगभग 500 से 1000 साल पुरानी हैं।29 इनके प्रवेश द्वार, बारादरी, आले, तोरण द्वार, चबूतरा, ऊँची दीवारें, घिरनी के अलावा बून्दी शैली की चित्रकला भी देखी जा सकती है। भावल्दी बावडी में ये सभी अलंकरण स्थापत्य तथा तकनीक देखी जा सकती है। यह बावडी एक भूमिगत संरचना है जो 150 फीट लम्बी और 22 फीट चौडी है और गहराई लगभग 66 फीट है। इसमें राजपूत और मुगलिया प्रभाव दिखाई देता है। इनके अलावा जैतसागर, कनक सागर, सिंहोलाव तालाब आदि भी बूंदी की जल संग्रहण परम्परा के संवाहक थे।30
भारत में बावडी निर्माण की परम्परा बहुत पुरानी है। जहाँ एक ओर यह जन उपयोगीकला के रूप में देखी जाती थी वहीं दूसरी ओर इसका सांस्कृतिक महत्त्व भी काफी था। जनमानस की सुविधा का ध्यान और जल संरक्षण के लिए उच्चस्तरीय वास्तुकला, तकनीकी ज्ञान, यह कुछ ऐसे कारक थे जिसने देश में बावडियों के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाई। बावडी बनवाना यूँ तो हिन्दू राजाओं की परम्परा का अंग थी पर मुगलों ने भी इस परम्परा का निर्वहन खुले दिल से किया। राजस्थान में बावाडी केवल जल के उपयोग की चीज नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का केन्द्र भी होती थी, यहाँ पूजा-अर्चना भी होती है। बूंदी में बनी यह बावडियाँ यह दर्शाती हैं कि प्राचीन भारत में जल-प्रबन्धन की व्यवस्था कितनी बेहतरीन थी।31
बूँदी में पाई जाने वाली झीलें प्राकृतिक झीलें नहीं हैं, बल्कि इनका निर्माण यहाँ के राजाओं ने करवाया था। ये झीलें आज बूँदी की खूबसूरती का खास हिस्सा हैं। दुर्ग पहाडी के साये में स्थित नवलसागर उनमें से एक है। चतुर्भुज आकार की इस झील के मध्य वरुण देवता का मंदिर है।
कुछ दूर सुखसागर झील एक हरे-भरे उद्यान के मध्य पसरी है। जहाँ राजाओं की ग्रीष्म विश्रामगृह सुख महल भी बना है। इसी तरह फूलसागर में भी 20वीं शताब्दी में निर्मित यहाँ का नवीनतम महल स्थित है।
कोटा भी हाडौती का दूसरा प्रमुख जिला है जहाँ भी लगभग 100 के करीब जलस्रोत है। बारह बावडियाँ, रामपुरा बावडी, चश्मे की बावडी, हाडा बावडी, फूटी बावडी, महाजन बावडी, छीपों की बावडी, चौमाकोट बावडी, बनियानी बावडी, कचोलिया बावडी, तीन मंजिला बावडी आदि वो संरचनाएँ हैं जो लगभग 500 साल पुरानी हैं और अपनी बनावट, तकनीक और खूबियों के कारण आज भी जीवन दे रही है। इसी तरह दीगोद तालाब, बडा तालाब, दाता तालाब, रामसागर, रामपुरा भी स्थापत्य व सांस्कृतिक वैभव के प्रतीक हैं। प्रहलादपुरा कुँआ, राजपूतों का कुँआ, भोपन कुँआ, राज का कुँआ, बादली कुँआ भी हाडौती की जल संग्रहण परम्परा का प्रतिनिधित्व करते हैं।32
झालावाड में व्यासों की बावडी, बाईजी की बावडी, त्रिमुखी बावडी, राज बावडी, केसर बावडी, सुदामा बावडी, गोरवालों की बावडी तत्कालीन बनावट शैली का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसी प्रकार बारां में इकलेरा बावडी, बेगन बावडी, करमा बावडी, गढ बावडी, मकबरा बावडी, मुण्डियार बावडी, कालिका माता बावडी, पदम बावडी जैसी करीब 80 बावडियाँ, कुण्ड और कुँए हैं जिनमें से कई आज भी पानी दे रही हैं। यहाँ भी तिबारियाँ, देव प्रतिमाएँ व ताके हैं।
उपरोक्त संरचनाएँ जल संग्रहण परम्परा के प्रति हमारी दूरगामी सोच को प्रदर्शित करती है।
सन्दर्भ
1. ब्रजरतन जोशी, जल और समाज, 2005, पृ. 13
2. वही, पृ. 48
3. वही, पृ. 50
4. वही, पृ. 50-51
5. रीतेश व्यास, जल स्रोतों के निर्माण की तकनीक और महत्त्व, पृ. 118
6. वही, पृ 65
7. वही, पृ. 68
8. वही, पृ. 51
9. वही, पृ. 52-53
10. वही, पृ. 65-66
11. वही, पृ. 104-105
12. राजवल्लभ, अध्याय 1, श्लोक 27, डॉ. ईश्वर सिंह राणावत, राजस्थान के जल संसाधन, पृ. 226
13. विश्ववल्लभ, उल्लास, 2
14. डॉ. ईश्वर सिंह राणावत, पृ. 226
15. विश्ववल्लभ, उल्लास, 1 (उद्कागम निरूपण) व श्लोक 12-39
16. वही-1
17. राजप्रशस्ति, सर्ग 9, श्लोक 24-29
18. जयसमुद्र प्रशस्ति सर्ग 12
19. डॉ. ईश्वर सिंह राणावत, पृ. 232
20. वीर विनोद भाग-1, पृ. 104
21. देवनाथ पुराहित, हिस्ट्री ऑफ मेवाड, पृ. 40
22. डॉ. ईश्वर सिंह राणावत, पृ. 237
23. वही, पृ. 238
24. वही, पृ. 242
25. वही, पृ. 242
26. वही, पृ. 246
27. अनुकृति उज्जैनिया, हाडौती के जलाशय निर्माण एवं तकनीक, इण्डिया वाटर पोर्टल।
28. वही, हाडौती के प्रमुख जलाशय, इण्डिया वाटर पोर्टल।
29. कुसुम सोलंकी, सभ्यता के विभिन्न आयामों को दर्शाती राजपुताना की पारम्परिक बावडियाँ, शोध पत्रिका, अंक
41, पृ. 269, सितम्बर-दिसम्बर, 2011
30. बूंदी ए सिटी ऑफ स्टेपवेल, ए सर्वे रिपोर्ट बॉय द सिविल एडमिनिस्ट्रेशन, जिला बूंदी, 2006।
31. आकृति, हाडौती कला विशेषांक, राजस्थान ललित कला अकादमी, जुलाई से सितम्बर 1997, पृ. 35।
32. स्टेप वेल्स ऑफ बूंदी, जिला प्रशासन बूंदी, 2006, पृ. 9
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