fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

राजस्थान के लोकनृत्य

भरत कुमार
लोक नृत्य लोक संस्कृति का महत्त्वपूर्ण अंग है। प्राचीन काल में मनुष्य आनन्द के समय अपनी भाव-भंगिमाओं का प्रदर्शन करता था। लोकनृत्य किसी व्यक्ति विशेष की देन न होकर सामूहिक मनोरंजन एवं उल्लास की देन है। नृत्य शब्द की व्युत्पत्ति नट धातु से हुई है, नट धातु से ही नर शब्द बना है। यास्क मुनि ने नर शब्द का भाव स्पष्ट करते हुए लिखा है कि चूँकि विभिन्न क्रियाकलापों के दौरान मनुष्य के हाथ-पाँव हिलते रहते हैं, अतः वे नर कहलाए। यास्क मुनि ने निरुक्त नामक ग्रन्थ में ऋग्वेद की ऋचा वहिष्ठो वां स्वानां इतो हुवन्नरा (ऋग्वेद 8/26/56) की व्याख्या इस प्रकार की है। नरा मनुष्या नृत्यंति कर्मसु (निरुक्त 5-1) प्राचीन रंग परंपरा में अभिनेता नृतक भी होता है। नाटक की प्रस्तुति नृत्यात्मक होती थी, उसकी क्रिया नटन कहलाती है। उसका प्रदर्शन नाट्य कहलाता है। जिसका आशय गायन, वादन एवं नर्तन तीनों होता है। तब से सभी मंचीय कलाकार इन तीनों विधाओं में पारंगत होते हैं।
नृत्यकला को प्राचीन थाती के रूप में व्याख्यायित करते हुए पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने कहा है कि भारतीय लोक नृत्यों में देश की स्वस्थ कला परंपरा का, जन-मन की उमंगें, जीवन की मुस्कान, प्रकृति का वैभव, मनुष्य की सौन्दर्य उपासना और मन के बन्धन मुक्त उडान के दर्शन होते हैं। मेरे से कोई पूछे कि जवाहरलाल भारत की प्राचीन संस्कृति और उसके जन का भी स्फूर्तिपूर्ण जीवन और कला प्रेम का सबसे सुन्दर प्रदर्शन कहाँ होता है। तो मैं कहूँगा हमारे लोक नृत्यों में। यह प्राचीन थाती अपने स्वच्छ रूप से न केवल जीवित रहे वरन् निरन्तर प्रगति की ओर अग्रसर हो जिससे वह साधारण जनता का स्वस्थ मनोरंजन करती हुई उसमें उमंग, नया जोश तथा नई चेतना भर सकें।
लोक में महाराणा कुंभा द्वारा रचित ग्रन्थ संगीतराज के नृत्यरत्न कोश में नृत्य की महिमा आंगिक, वाचिक, आहार्य एवं सात्विक अभिनय की विवेचना के साथ ही हस्तमुद्राएँ, भाव-भंगिमाएँ, नृत्य में प्रयुक्त होने वाले सभी अंग, प्रत्यंग एवं उपागों की सूक्ष्म क्रियाओं को भेद एवं उपभेद के साथ वर्णित किया गया है। नाट्यशाला के निर्माण से लेकर सभासन्निवेश, नाट्यवेश तथा नट-नटनियों के प्रवेश तक का विस्तृत वर्णन इस भाग में मिलता है।
प्रत्येक प्रान्त में लोक नृत्य वहाँ के रीति-रिवाज, रहन-सहन और आचरण को दर्शाते हैं। इस प्रकार से लोक नृत्य हमारे सामाजिक सम्बन्ध का नृत्यम् इतिहास है। इस इतिहास से हमारे पीढियों के मानवीय सम्बन्ध, विश्वास व धारणाएँ जीवन के मार्मिक अनुभव, प्रेम की मधुर कल्पना और समाज को एक सूत्र में पिरोने की लालसा का भावात्मक प्रतिफल है।
नृत्य जीवन का एक आनन्द है जो प्राणी मात्र के लिए प्रकृति का अनुपम उपहार है। नृत्य कला उतनी ही प्राचीन है जितनी मानव जाति की। भाषा का विकास होने से पूर्व आदिमानव ने अपने भावों को अंग संचालन द्वारा प्रकट करने का प्रयास किया तभी से नृत्यकला का सूत्रपात माना जाता है। नृत्य अंगों और भावों की सौन्दर्यमयी भाषा है हर्ष, करुणा एवं शोक आदि भावों की उत्पत्ति मानवजाति के जन्म के साथ हुई है अतः नृत्य का इतिहास भी उतना ही प्राचीन है, जितना आदि मानव का।
नृत्य मानव की आन्तरिक वृत्तियों का अभिनय करने की कला है। यह नृत्य कला उतनी ही प्राचीन है, जितनी मानव जाति। भारत में नृत्य की परंपरा वैदिक काल से पहले पायी जाती है। सिंधु सभ्यता में नृत्य सम्बन्धित कुछ आकृतियों तथा मूर्तियाँ प्राप्त हुई है। नृत्याभिनय वाली मूर्तियों को बनाना इस बात को प्रमाणित करता है कि उस समय नृत्य कला सामान्य जनता के मनोरंजन का माध्यम रही है।
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार लोक नृत्य आदिम जाति से शुरू हुआ जब मानव ने यह अनुभव किया कि लोक नृत्य भावनाओं के सम्प्रेक्षण का एकमात्र स्थान है। लोक नृत्य के द्वारा ही उसने पार-लौकिक संसार को समझने का प्रयास किया। उसने लोक नृत्यों को देवी शक्तियों को समझने और प्रसन्न करने का साधन बनाया। आराधना, विपदाओं को दूर भगाने, शत्रु पर विजय पाने, ऋतुओं का बदलाव, सूर्योदय और सूर्यास्त के समय होने वाली नैसर्गिक अनुभूति, चन्द्रमा की बढती हुई कान्ति, उसकी श्रम साधना, अच्छी फसल के लिए वर्षा आगमन, मानव के लिए हितकारी अनेक साधन और जीवन की देहरी से प्रौढता में प्रवेश करने की सिहरन आदि अनेक बातों के लिए आदिमानव ने लोक नृत्य को सबसे सशक्त और प्रभावी माध्यम बनाया।
नृत्य केवल मनोरंजन के लिए ही नहीं, अपितु जीवन का अभिन्न अंग है। साधारणतया उसमें सारा लोक समाज भाग लेता है, जिसे लोकनृत्य कहते हैं। राजस्थान में लोक नृत्य का यहाँ की माटी में गहरा सम्बन्ध है। इसलिए यहाँ अलग-अलग अंचलों में विभिन्न प्रकार के लोक नृत्य विकसित हुए जैसे-
पहाडी भागों के लोकप्रिय नृत्य निम्नलिखित हैं-
(क) मीणों और भीलों के नृत्य -
घूमर, गैर, विवाह
नृत्य, तेजा और गौरी नृत्य
(ख) बनजारों के नृत्य
(ग) बागडिया नृत्य
(घ) गरासियों के नृत्य - बालर, गेर और चंग नृत्य
(ङ) कालबेलियों के नृत्य - ईडानी, शंकरिया और
पणिहारी
(च) पडभोपाज और रंगा स्वामी के नृत्य
(छ) भवाई नृत्य
रेगिस्तानी भागों के नृत्य निम्नलिखित हैं -
(क) झूमर और घुमर
(ख) बीकानेर का अग्नि-नृत्य
(ग) जालोर का ढोल नृत्य
(घ) डीडवाना और पोकरण का तेरहताली नृत्य
शेखावाटी और पूर्वी राजस्थान के नृत्य निम्नलिखित हैं-
(क) गीदड और डफ के नृत्य
(ख) सांसियों और कंजरों के नृत्य
(ग) नायक, चमारों और मेहतरों के नृत्य
(घ) कच्छी घोडी नृत्य
(ङ) चौक च्यान्नी नृत्य

(च) टंटियों नृत्य
राजस्थान के प्राकृतिक वातावरण में पहाड, नदियाँ, झीलें, मरुस्थल, वन, जंगल, जल एवं वायु आदि का प्रभाव मानव की जीवनशैली, चरित्र, कार्य, संगीत, वाद्य एवं नृत्य आदि पर प्रभाव परिलक्षित होता है।

गैर नृत्य - पौराणिक काल में रास नृत्य में राजस्थान और गुजरात में अनेक वृत्ताकार नृत्यों को जन्म दिया, जिसमें गुजरात का डांडिया रास, मारवाड का डांडिया गैर, शेखावाटी का गीदड, मेवाड और बाडमेर का गैर नृत्य आदि, यह नृत्य मुख्यतया पश्चिमी राजस्थान में होली के अवसर पर किया जाता है। इस सन्दर्भ में घेर, गैर व गेहर एक महत्त्वपूर्ण शब्द है। यह नृत्य गोल घेरे में किया जाता है इसलिए इस नृत्य का नाम घेर पडा और धीरे-धीरे इस शब्द को आगे गैर कहा जाने लगा तथा गैर शब्द ही प्रचलन में आ गया। यह नृत्य मुख्यतया होली के अवसर पर किया जाता है। होली के दिनों में मेवाड और मारवाड क्षेत्र में गैर नृत्य की धूम मची रहती है। इस नृत्य में पुरुष लकडी की छडियाँ लेकर गोल घेरे में नृत्य करते हैं। गैर नृत्य में गीत भी गाये जाते हैं। यह नृत्य धीमी गति से आरम्भ होता है। धीरे-धीरे लय बढती है और कई प्रकार के घेरे बनते हैं। इकहरे, दोहरे और घेरे में घेरा चलता रहता है।
घूमर नृत्य - घूमर नृत्य राजस्थान के सबसे अधिक लोकप्रिय नृत्यों में से है। इस घूमर नृत्य को नृत्यों का सिरमौर कहा जाता है। यह नृत्य राजस्थानी लोक संस्कृति की आत्मा का प्रतीक माना जाता है। यह नृत्य लोकजीवन तथा लोकमानस से जुडा हुआ है। घूमर नृत्य माँगलिक अवसरों, पर्व, त्योहार एवं उत्सवों पर महिलाओं द्वारा किया जाता है। लहंगे के घेर को घुम्म कहते हैं। पूर्व विकसित शतदल की भाँति अस्सी कली का घाघरा फैलाकर चंद्राकार हो जाता है। जब वह घुम्म वृत्ताकार रूप में फैलता है तो नृत्यांगना को और उल्लास मिलता है। तथा यह बार-बार इस लहंगे के घेर को बनाने की चेष्टा करती है। घूमर नृत्य के साथ-साथ राजस्थान में घूमर गीत का विशेष महत्त्व है। इस गीत की कोमलकान्त पदावली और ध्वनि के अनुसार ही नृत्य की पग-ध्वनि कोमल और मधुर होती है। घूमर नृत्य का सर्वाधिक प्रचलित राजस्थान-व्यापी गीत है-

म्हारी घूमर है नखराली अे माय
घूमर रमवा म्है जास्यां
म्हानै रमती नै काजल टीकी लाद्यो अे माय
घूमर रमवा म्है जास्यां
म्हानै रमती ने लाडूडो लाद्यो अे माय
म्हानै सिसोदियां री सीस गुथावे अे माय
म्हानै देवडा रै घरे मत दीजो अे माय
म्हानै राठौडां रै घर भल दीजो अे माय
म्हानै राठौडां री रीत सुहावे अे माय
म्हारी घूमर है नखराली अे माय
घूमर रमवा म्हैं जास्यां

गीत के बोल विभिन्न क्षेत्रों और समाजों में अपनी-अपनी रुच्यानुकूल बना लिए जाते हैं। जिस वंश और समाज से जिसका अच्छा व्यवहार होता है उसके लिए कह देते हैं कि वहाँ मुझे देना और इसके विपरीत जहाँ नाता नहीं है उसे घूमर कहती है वहाँ मुझे मत देना।
अग्निनृत्य - जसनाथी सम्प्रदाय का अग्निनृत्य एक आश्चर्यजनक नृत्य है। सम्प्रदाय की एक विशेष प्रवृत्ति है। अग्निनृत्य सम्प्रदाय के सांस्कृतिक पक्ष को सबल बनाता है। जसनाथी साहित्य में गाने, बजाने और नृत्य करने के सम्बन्ध में उल्लेख है जैसे-

आगळ नाचै अपछरा, मंगल गावै नार
शंख पंचायण बाजसी, झालर रै झिणकर
नव नाथां गुरु गोरख आया, नाद बजायो ओंकार
उपर्युक्त पंक्तियों से साजों(वाद्यों) के बजने, गाये जाने और साथ ही नृत्य शब्द का प्रयोग हुआ है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि सम्प्रदाय में प्रारम्भ से ही गाने-बजाने और नाचने का प्रचलन था। उस समय वाद्यों में मंजीरे और मादल ही बजाए जाते थे। इन्हीं पर सिद्धों की गायकी सम्पन्न होती थी। गायकी में नगाडों का प्रयोग तो सिद्ध रुस्तमजी के समय (वि. सं. 1736) से ही होने लगा है। दो नगाडे बजाने का कुरब तो दिल्ली सल्तनत ने सिद्ध रुस्तमजी को बख्शा था, जसनाथी-मतानुयायियों के लिए नाचना और गाना अपने सम्प्रदाय की सार्थकता प्रकट करने का कारण माना गया है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। निम्नांकित लोकोक्ति में इसी भाव की अभिव्यंजना हुई है -
गावै नी बजावै, आवै नी छाया
भगवों भांड्यो ए ! पापणी काया
अतः नाचना और गाना सम्प्रदाय के लिए आवश्यक है। यहाँ छाया शब्द नृत्य के अर्थ में प्रयुक्त हुआ जान पडता है।
तेरहताली नृत्य - यह नृत्य विशेषकर डीडवाना और पोकरण तहसीलों में किया जाता है। भोमियाँ जाति के लोग अपने इष्ट देवता रामदेवजी को प्रसन्न करने के लिए रात्रि में जागरण करके नाचते व गाते हैं। इन्हें कामड कहते हैं। इस नृत्य का प्रदर्शन पुरुषों द्वारा न किया जाकर कामड जाति की औरतों द्वारा किया जाता है। स्त्रियाँ मंजीरों को अपने शरीर पर अलग-अलग स्थानों पर बाँध कर एक-सी धुन में बजाती हुई अनेक प्रकार की काठी मुद्राएँ, नाना हावभावों का प्रदर्शन और कई आँगिक चेष्टाएँ करती रहती हैं। इनमें 13 मंजीरों में से 9 मंजीरे तो औरत के दाएँ पाँव पर बँधी रहती है और शेष चार में से दो पसलियों के नीचे तथा अन्य दो हाथों में रहती है। अपने हाथों की मंजीरों से अन्य मंजीरों को बजाते हुए नृत्य प्रस्तुत करने वाली स्त्री तेरह प्रकार के भावनाट्य प्रस्तुत करती है। प्रदर्शन के समय कामड पुरुष तानपूरे पर भजन गाते रहते हैं।

ये कामड लोग रामदेवजी के ही उपासक हैं। इस खेल में कभी तो एक ही औरत नृत्य करती है और कभी-कभी चार-पाँच औरतें सामूहिक नृत्य प्रस्तुत करती हैं। नृत्य की समाप्ति पर दोनों हाथों में काँसे की थालियाँ लेकर उन थालियों को नचाते हैं। इस नृत्य में निम्न मुद्राएँ प्रस्तुत की जाती है, जिसमें अनाज साफ करना, अनाज कूटना, अनाज काटना, बाजरे का आटा गुन्दना, बाजरे की रोटी बनाना, जमे हुए दूध से घी तैयार करना, चरखे पर सूत कातना, सूत समेटना, सिर पर कलश रखना, इत्यादि भाव ये अपने नृत्य में प्रदर्शित करती हैं अर्थात् दैनिक क्रियाकलाप इनके नृत्य में दिखाई देते हैं।
लांगुरिया नृत्य - प्रतिवर्ष चैत्र कृष्णा एकादशी से चैत्र शुक्ला दशमी तक पूरे पन्द्रह दिन पूर्वी राजस्थान के करौली उपखण्ड में मैया कैलादेवी का धार्मिक मेला भरता है। यहाँ आने वाली महिलाओं को जोगणी और हर पुरुष को लांगुरिया सम्बोधित किया जाता है।





लांगुरिया देवी मैया का परम भक्त था। उसकी विशाल प्रतिमा भी मैया की मूर्ति के सामने ही स्थापित की हुई है। यहाँ लांगुरिया नाम के गीत ही अधिक गाये जाते हैं। इस मेले में मीणा और गुर्जर जाति के युवाओं द्वारा मुख्य रूप से यह लांगुरिया नृत्य किया जाता है।
गीदड नृत्य - यह राजस्थान का सामूहिक लोकनृत्य है, जो बडे गोल दायरे में चक्कर लगा कर नाचा जाता है। राजस्थान का गीदड नृत्य और गुजरात का गरबा नृत्य परस्पर मिलते हैं। ये धीमी लय के गीत बडे चित्ताकर्षक होते हैं। इसमें लोग स्वाँग भर-भर कर नाचते हैं, इसलिए दृश्य और भी मनमोहक होते हैं।

गीदड नृत्य का एक गीत निम्नलिखित है -
गीदड खेलण म्हे जास्यां,
खाड बिचालै गीदड मांडी पड रही नोबत चोट,
खेलण म्हे जास्यां।
बांध कसूमल पागडी केसरिया बंडी पै’र- गीदड.....
खाड बिचाळै भीड घणेरी आपा सब नर-नार-
गीदड.......
लोग ओ गाल्यो घेरियां लुगायां गावै,
खेलण म्हे जास्यां।

डंके की ताल, नृत्य की गति और गीत के शब्द व धुन में पूर्ण समन्वय है। गीत के भावों से उठने वाली तरंगों के साथ-साथ धमाके के साथ नाच के कदम पडते हैं। यह नृत्य विशेषकर शेखावाटी के झुंझुनूं और सीकर तथा चुरू जिलों में किया जाता है। यह पुरुषों द्वारा किया जाता है। होली के त्योहार पर मुख्य रूप से किया जाता है। इस नृत्य में भक्तिपूर्ण एवं श्रृंगार रस से युक्त धमाले गायी जाती हैं।
कालबेलिया नृत्य - पश्चिमी राजस्थान में कालबेलिया जाति के पुरुष साँपों को पकडकर गाँवों-गाँवों में दिखाने का मनोरंजन किया करते हैं। इनके नृत्य को सपेरा नृत्य भी कहा जाता है। यह नृत्य जैसलमेर में होने वाले प्रसिद्ध मरु महोत्सव में दिखाया जाता है। इसमे साँपों को पकडना, उनसे खेलना, साँपों को शरीर पर धारण करना आदि क्रियाओं के हाव-भाव इसमें दिखाए जाते हैं। पुंगी नामक वाद्य भी बजाते हैं जो बीन जैसा होता है। यह बडा मोहक वाद्य है। पुरुष पुंगी को लहराकर बजाते हैं और उसकी धुन पर उसी जाति की स्त्रियाँ स्वर मिलाकर गाती हैं और नाचती भी हैं तथा नाग अपना फण ऊँचा करके मोहित होकर झूमता रहता है। नाग में संगीत के स्वरों का माधुर्य पहचानने की प्राकृतिक शक्ति है और वह मुग्ध हो जाता है।

गवरी नृत्य- यह दक्षिणी राजस्थान के मेवाड, बांसवाडा व डूंगरपुर क्षेत्र के निवासी भीलों द्वारा किया जाने वाला प्रसिद्ध नृत्य है, मूलतः गमेती भीलों (वह भील जो स्थायी रूप से ग्रामीण इलाकों में बस चुके है और जिनकी आजीविका खेती बन चुकी है) का अनुष्ठान होने के बावजूद गवरी की रसाई अन्य ग्रामीण जातियों में भी है। गवरी में गाँव के कुम्हार से लेकर अन्य सभी जातियों के लोग किसी न किसी रूप में शरीक रहते हैं।
गवरी भाद्रपद में रक्षाबन्धन के दूसरे दिन आरम्भ होकर निरन्तर चालीस दिन चलने वाला अनुष्ठान नृत्य है। भील समुदाय में ऐसी मान्यता है कि पार्वती भील कन्या है। गवरी अनुष्ठान पार्वती अथवा गौरी के अपने संजातियों के बीच रहने आने का अनुष्ठान है। चालीस दिन पूरी जाति दैवी सान्निध्य का अनुभव करती है। देश-काल के यथार्थ से परे एक कल्पित देश-काल सामुदायिक विचरण ही गवरी का लक्ष्य या कि अभिप्रेत है।

अनुष्ठान में मुख्य भूमिका निभाने वाले भोपों एवं अन्य मुख्य पात्र (दो राईयाँ, बूडियाँ जो कि शंकर का प्रतीक है) कुटकडिया (जिसे नाटकीय मुहावरे में सूत्रधार भी कहा जाता है) देवी की सवारी के लिए नाहर बनाते हैं जिसकी प्राण-प्रतिष्ठा होने पर बच्चों सहित औरतें आशीर्वाद लेने आती हैं।
गणगौर नृत्य- गणगौर नृत्य चतुर्मास में किया जाता है। लडकियाँ अपने आने वाले जीवन के लिए पार्वती माता की पूजा करती हैं और अच्छे पति की तलाश में यह करती है। विवाहित महिलाएँ अपने सुखद जीवन के लिए यह व्रत रखती हैं।

महिलाएँ रंग-बिरंगे वस्त्र, चाँदी के तथा काँचे के आभूषण पहनती है, एवं गीत गाते हुए पार्वती मंदिर जाती है। गणगौर नृत्य करते समय महिलाएँ हाथ में चाँदी तथा स्टील का लोटा पानी से भरा हुआ एवं उसमें कुछ पुष्प एवं पूजर पत्ते डालकर सिर पर सुसज्जित कर गीत गाती हुई नृत्य करती हैं। अर्थात् महिला पूरे नृत्य में अपने परिवार की कुशलमंगल एवं स्वयं के लिए अच्छे गण माँगती है।
अतः हम कह सकते हैं कि इन नृत्यों के अलावा भी राजस्थान के विभिन्न अंचलों में नृत्य की धूम मची हुई है। इसमें ढोल नृत्य, भवाई नृत्य, नेजा नृत्य, कच्छी घोडी नृत्य, बम नृत्य, चंग नृत्य, पणिहारी नृत्य, वालर नृत्य, चरी नृत्य, गोगा नृत्य एवं चकरी नृत्य आदि आते हैं। राजस्थान की नृत्यकला वर्तमान में विश्वप्रसिद्ध है। क्योंकि नृत्य करने वाले कलाकार के हाव-भाव, सौन्दर्य एवं शारीरिक चेष्टाओं का सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है। हमें इस आनन्दमयी परम्परागत कालजयी परम्परा को विलुप्त होने से बचाने के लिए प्रयास करना चाहिए। इसके लिए अधिक से अधिक आलेख, शोध एवं सर्वेक्षण करना आज के समय की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची -
1. राकेश रेणू (सं.) : आजकल, आजकल प्रकाशन विभाग, दिल्ली, नवम्बर- 2019, पृ. सं. 21
2. वीरेन्द्र सिंह यादव : लोक साहित्य एवं लोक संस्कृति, ओमेगा पब्लिकेशन्स, दिल्ली, 2012 पृ. 115
3. सत्यनारायण समदानी : मीरायन, मीरा स्मृति संस्थान, चितौडगढ, सितम्बर-नवम्बर, 2020, पृ.77
4. ईशा भट्ट : राजस्थानी लोक परिधानों का लोक नृत्यों के सौन्दर्य पर प्रभाव एक प्रयोगात्मक अध्ययन, वनस्थली विधापीठ, राजस्थान, 2012, पृ. सं. 126 वही, पृ. सं. 128
5. स्वर्णलता अग्रवाल : राजस्थान के लोकगीत, राजस्थान साहित्य अकादमी(संगम), उदयपुर, 1967, पृ. सं. 183
6. ईशा भट्ट : राजस्थानी लोक परिधानों का लोक नृत्यों के सौन्दर्य पर प्रभाव एक प्रयोगात्मक अध्ययन, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान, 2012, पृ. सं. 136,
7. वही, पृ. सं. 139
8. स्वर्णलता अग्रवाल : राजस्थान के लोकगीत, राजस्थान साहित्य अकादमी(संगम), उदयपुर, 1967, पृ. सं. 187
9. सूर्यशंकर पारीक : सबद ग्रन्थ, श्रीदेव जसनाथ सिद्धाश्रम (बाडी) धर्मार्थ ट्रस्ट सादुल कॅालोनी, बीकानेर, 1996, पृ. सं. 684
वही, पृ. सं. 684
10. सोहन दान चारण : राजस्थानी लोक साहित्य का सैद्धांतिक विवेचन, राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर, 2016, पृ. सं. 257
11. रामेश्वर आनन्द सोनी : राजस्थानी राग-रस-रंग, भारतीय विद्या मंदिर, कोलकाता, 2016, पृ. सं. 89
12. स्वर्णलता अग्रवाल : राजस्थान के लोकगीत, राजस्थान साहित्य अकादमी(संगम), उदयपुर, 1967, पृ. सं. 190
13. रामेश्वर आनन्द सोनी : राजस्थानी राग-रस-रंग, भारतीय विद्या मंदिर, कोलकाता, 2016, पृ. सं. 94
14. पीयूष दईया : लोक, भारतीय लोक कला मण्डल, उदयपुर, 2002, पृ. सं. 529
15. वही, पृ. सं. 530
16. ईशा भट्ट : राजस्थानी लोक परिधानों का लोक नृत्यों के सौन्दर्य पर प्रभाव- एक प्रयोगात्मक अध्ययन, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान, 2012, पृ. सं. 151
सम्पर्क - शोधार्थी, हिन्दी विभाग,
मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय, उदयपुर
email - bharatk181090@gmail.com
मो.- 9680459368