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ललित कलाओं में राजस्थान

राजेश कुमार व्यास
संस्कृति अपने में व्यापक अर्थ समेटे हुए है। जीवन जीने के ढँग से इतर इसे देखेंगे तो यह भी लगेगा, संस्कृति मूलतः अपने को पहचानने के संस्कारों से भी गहरे से जुडी हुई है। अपनी पहचान हमें कैसे होती है? तभी ना, जब हम अपने किए पर विचारने के लिए कुछ देर ठहर कर सोचें! मुझे बहुत बार यह भी लगता है कि संस्कृति के जरिये ही लोकतन्त्रिक मूल्यों की स्थापना का व्यवहार में सामूहिक उद्यम हो सकता है। इसलिए कि इसमें अपनी ही नहीं दूसरों की भी स्वतन्त्रता कायम रखे जाने की बात निहित है। सभ्य होने का बाह्य स्वरूप संस्कृति में ही तो हमें दिखता है। हमारी अभिवृत्तियों और ज्ञान को भी दिशा संस्कृति से ही मिलती है। पीढी-दर-पीढी संस्कृति के मूल्य हस्तान्तरित होते हैं। पर लगता है, भूमण्डलीकरण और बाजारवाद के साथ ही वैयक्तिक स्थापनाओं के अतिरिक्त आग्रह में इधर हम सांस्कृतिक शून्यता की ओर जा रहे हैं।
साहित्य और कलाओं की दृष्टि से हमारे पास समृद्ध-सम्पन्न परम्परा तो है, पर इस परम्परा को पुनर्नवा करने, इससे समाज को बौद्धिक रूप में सम्पन्न करने, मूर्धन्य प्रतिभाओं और उनके विपुल अवदान से नई पीढी को साक्षात् कराने का कोई जतन इधर नजर नहीं आता है। अतीत में झाँकेंगे, तो पाएँगे राजस्थान सांस्कृतिक दृष्टि, सांस्कृतिक मूल्यों से आरम्भ से ही सम्पन्न रहा है। संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकला और स्थापत्यकला तक का यह प्रदेश आरम्भ से ही गढ सा रहा है, पर सोचिए! कलाओं, स्थापत्य की हमारी धरोहर में इधर कहीं किसी स्तर पर बढत हुई है? कहने को साहित्य और कलाओं के मेले, उत्सवों का आयोजन हमारे यहाँ पहले से बढा है, परन्तु उनमें समाज की सहभागिता, नई पीढी के लिए चिन्तन के नये वितान खोलने की दृष्टि कहीं नजर नहीं आती।
संस्कृति अपने व्यापक रूप में समाज की तमाम कलाओं, साहित्य, ज्ञान, विचारधारा, सामाजिक, धार्मिक-प्रथाओं, कानून एवं क्षमताओं के साथ आदतों का मिला-जुला रूप ही तो है। इसी से व्यक्ति वैयक्तिक और सामाजिक जीवन के आदर्श निर्मित करता है। संस्कृति व्यक्ति नहीं, समाज की सम्पत्ति है। हाँ, उसके स्वरूप-निर्माण और विकास में प्रत्येक व्यक्ति का कम या अधिक योगदान अवश्य रहता है। इसी कारण वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है या कहें हरेक की भागीदारी इसमें जरूरी है। इसीलिए कहें वही सत्ता सार्थक है जिसमें संस्कृति की सोच हो। संस्कृति में निवेश भविष्य का संचय है। मानवीयता के लिए निवेश है। समाजगत अपेक्षाओं की पूर्ति संस्कृति में निवेश के जरिये ही सम्भव है। कोई भी लोकतन्त्र परिष्कृत तभी माना जाता है जब वहाँ प्रश्नवाचक संवाद हो। भौतिक जरूरतों के लिए ही नहीं, संस्कृति के लिए भी संवाद वहाँ हो। विडम्बना यह है कि संस्कृति के प्रश्न पर हम सभी मौन हैं। जबकि लोकतन्त्र की मजबूती स्वतन्त्र विचारों से है, बासी विचारों से नहीं। नवीन स्थापनाएँ संस्कृति की समझ से ही हो सकती हैं।
मुझे लगता है, सांस्कृतिक जीवन्तता के लिए परम्परा ही महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उस परम्परा से जुडे मूल्यों, लोगों की समय संगतता में पहचान भी जरूरी है। अच्छा लिखा हुआ, सिरजा कोई कला-रूप तभी प्रासंगिक रह सकता है, जब समय से उसका निरन्तर संवाद हो। पूर्व के महत्त्वपूर्ण लिखे, विचारे और प्रस्तुत सांस्कृतिक धरोहर को आयोजनधर्मिता के संवाद नैरन्तर्य से ही जीवन्त रखा जा सकता है। याद करें, उस दौर में जब भारतीय संस्कृति, जीवन मूल्यों और कलाओं को अंग्रेजी शिक्षा-दीक्षा की छाया लील रही थी, आनन्दकुमार स्वामी ने कलाओं की हमारी रस-सृष्टि, अन्तर्निहित सौन्दर्य से विश्वभर को रू-ब-रू कराया। उसी से भारतीय कला समीक्षा के नवीन द्वार खुल सके। महर्षि अरविन्द ने विलियम आर्चर द्वारा किए किए भारतीय संस्कृति के प्रहारों के जवाब में फाउण्डेशंस ऑफ इण्डियन कल्चर जैसी विरल पुस्तक लिखी। राम मनोहर लोहिया ने कृष्ण, शिव, राम आदि चरित्रों की व्याख्या कर पुराणों से हमारा आधुनिक समय-संवाद कराया। विद्यानिवास मिश्र के लिखे की लोक लय, कुबेरनाथ राय, छगन मोहता, मुकुन्द लाठ के साहित्य, संस्कृति एवं कलाओं के अनुशीलन में की गयी मौलिक व्याख्याओं की सौंपी विचार-विरासत समय से संगत ही तो हैं। इस संगत को क्या हम आगे बढा पाए हैं?
अज्ञेय ने साहित्य की सभी विधाओं में महती लेखन किया, तो वत्सल निधि के जरिये अपने समय के मूर्धन्यों का समय-संवाद भी सम्भव कराया, भागवतभूमि यात्रा और अन्य लेखक शिविरों की आयोजनधर्मिता में संस्कृति के जड होते जा रहे मूल्यों को जीवन्त किया। इस कडी में ही देखें तो राजस्थान आयोजनधर्मिता और संस्कृति से उपादानों में कभी अग्रणी रहा है। पुस्तक संस्कृति का जो उजास बीकानेर के प्रकाशकों ने देशभर में फैलाया, वह आज भी याद किया जाता है, परन्तु प्रकाशकों की बढी संख्या के बावजूद गुणवत्ता की वैसी परम्परा अब कहाँ! याद है, भारतीय संस्कृति, दर्शन, यात्राओं और साहित्य की विविध विधाओं की अनमोल धरोहर, बहुत सुन्दर छपाई में बीकानेर के वाग्देवी प्रकाशन, उसके संस्थापक दीपचंद सांखला के जरिये ही कभी इन पंक्तियों के लेखक तक ही नहीं, देशभर में पहुँची। इससे पहले सूर्य प्रकाशन मंदिर के सूर्य प्रकाश बिस्सा ने महती पुस्तकों का प्रकाशन किया। सूर्य प्रकाशन मंदिर प्रांगण में कभी उन्होंने अज्ञेय की कविताओं का पाठ ही नहीं सम्भव कराया, बल्कि उनकी त्रिशंकु जैसी कृति और रांगेय राघव, विष्णु प्रभाकर जैसे लेखकों की भी पहली कृतियाँ बगैर किसी व्यावसायिक हित के प्रकाशित की। क्या इस परम्परा को हम सहेज कर रख पाए हैं?
आजादी के बाद कला-संस्कृति के विरल संस्थान राजस्थान में इसीलिए खोले गए थे कि उनके जरिये संस्कृति के सरोकारों में विशद् ज्ञान को अँवेरा जा सके। सरकारी ही नहीं निजी क्षेत्र में भी हमारे यहाँ कला-संस्कृति को लेकर सजगता रही है परन्तु धीरे-धीरे न जाने क्या हुआ कि संस्थाओं की स्थापना के उद्देश्य मूल्य तिरोहित होते चले गए और आज स्थिति यह है कि बहुत-सी संस्थाओं के कार्य संचालन कार्य कागजों भर में ही रह गए हैं। मौलाना अबुल कलाम आजाद अरेबिक परशियन रिसर्च इन्स्टीट्यूट, कथक केन्द्र, भारतीय लोक कला मण्डल आदि की स्थापना हमारे यहाँ इसीलिए हुई थी कि इनके जरिये राजस्थान की धरोहर विश्वभर में पहुँचे। होना तो यह चाहिए था कि यहाँ लोक और शास्त्रीय कलाओं और प्राच्य विद्याओं से जुडे ज्ञान को इस तरह से संजोया जाता और इस तरह के आयोजन होते कि दूसरे स्थान भी इनकी दुहाई देते पर मुझे नहीं लगता, इन संस्थानों के उद्देश्य और स्थापना के बारे में राजस्थान के लोगों को भी वृहद् स्तर पर जानकारी है। शिल्प ग्राम, मीरा कला मंदिर, जवाहर कला केन्द्र, लोक संस्कृति शोध संस्थान, बोरून्दा, राजस्थान स्टेट आर्काइव, बीकानेर इन सबकी स्थापना के निहितार्थ यही थे कि परम्परा को संजोते हमारा राजस्थान सांस्कृतिक दृष्टि से देशभर में सर्वाधिक सम्पन्न होता पर आज इन संस्थाओं में जिस तरह की सांस्कृतिक शून्यता दिखाई देती है, वह चिन्तनीय है।
मैं यह मानता हूँ कि समाज में सौन्दर्याभिरुचि विकसित करने, अच्छे पढने और जड होते साहित्यिक, सांस्कृतिक परिदृश्य में कुछ नया करने की गैर व्यावसायिक दृष्टि, चिन्तन ही सांस्कृतिक रूप में हमें जीवन्त रख सकता है। इस पर हमारा अतीत तो सुनहरा है परन्तु इधर नया क्या किया जा रहा है, इस पर विचार करने की क्या इस समय में जरूरत नहीं है!
विचार करें, यह वही राजस्थान है जिसकी चित्रकला विश्वभर के संग्रहालयों मे संगृहीत है, परन्तु हमारे यहाँ हमारी उस प्राचीन कला के प्रति उदासीनता ऐसी है कि कभी कहीं उस पर कोई विमर्श तक नहीं होता। अभी कुछ दिन पहले जवाहर कला केन्द्र के उत्साही क्यूरेटर और कलाओं से गहन नाता रखने वाले लतीफ उस्ता ने राजस्थान की समृद्ध चित्रकला के सौन्दर्य पर बोलने के लिए आमंत्रित किया, तो अनुभूत हुआ, ऐसा कोई संवाद कितने बरसों के बाद किसी ने किया है। गौर करेंगे तो पाएँगे, आज भी जिस मुगल कला की दुहाई विश्वभर में दी जाती है उसका बहुत सारा भाग राजस्थान की चित्रकृतियाँ ही हैं। बीकानेर में वहाँ के राजाओं ने 1591 में ही लाहौर से अली रजा और रुकुनुद्दीन, इन दो कलाकारों को बुलाया था और उन्होंने बहुत सुन्दर कलाकृतियाँ सिरजी। यह मुगल पेंटिंग से सर्वथा इतर स्थानीय रंग और परिवेश में इतनी जीवन्त थी कि बाद में इन्हीं से प्रेरणा लेकर दूसरे स्थानों पर कलाकृतियाँ बनी। उस्ता कलाकारों ने बाद में अपने तई जो सर्वथा नवीन कलाकृतियाँ पीढी दर पीढी सिरजी वे भी अनमोल धरोहर हैं। ऐसे ही राजस्थान में सातवीं शती से ही घाणेराव में अपभ्रंश के मेल से मारवाड शैली की सिरजी कलाकृतियों का इतिहास मिलता है। मेवाड शैली में पोथी चित्रण शैली के साथ विविध स्तरों पर जो कलाकृतियाँ बनीं उन पर किसी तरह का कोई मुगल प्रभाव नहीं था। किशनगढ शैली में बणी-ठणी यानी राधा का जो सौन्दर्यांकन हुआ वह अन्यत्र दुर्लभ है। राजस्थानी के विभिन्न अंचलों में बनी कलाकृतियाँ बहुत से स्तरों पर आज भी मुगल शैली की कही जाती हैं। असल में आज जिसे भारतीय मिनिएचर कला कहा जाता है उसमें बहुत बडा भाग राजस्थान की कला शैलियों का ही है।
सुप्रसिद्ध सारंगी वादक श्री रामनारायणजी जब जयपुर आए थे तो उनसे लम्बा संवाद हुआ था। उन्होंने इस बात पर दुःख जताया कि किशनगढ शैली के और दूसरी राजस्थानी शैलियों के विरल चित्र बोस्टन, जर्मनी और योरोप के दूसरे देशों के संग्रहालयों में है, परन्तु राजस्थान में उनके उद्गम और परम्परा के बारे में ही चर्चा नहीं होती। आजादी के अमृत महोत्सव पर राजस्थान की इस अनमोल कला पर नया कुछ हो और इससे नई पीढी को जोडे जाने के जतन क्या नहीं होने चाहिए!
अभी कुछ समय पहले ही खजुराहो नृत्य समारोह में बोलने के लिए जाना हुआ था। वहाँ भारतीय नृत्य परम्परा पर अपने व्याख्यान में मैंने विशेष रूप से नृत्य सम्राट् उदयशंकर के नृत्य को याद किया था। उदयशंकर कहाँ के थे? राजस्थान की झालावाड रियासत में उनके पिता कार्य करते थे। स्कूल ऑफ रॉयल आर्ट में वह चित्रकला की पढाई करने गए थे परन्तु डांसेज ऑफ शिवा पुस्तक के आवरण पर शिव के ताण्डव नृत्य को देखकर ही उन्होंने तय कर लिया था कि वह नृत्य विधा मं् जाएँगे। उदयपुर अंचल में होने वाले गवरी और दूसरी लोक नृत्य परम्पराओं से ही उन्होंने प्रेरणा ली। इसके बाद तो भारतीय शास्त्रीय और लोक नृत्यों के बेले से मेल करते हुए उन्होंने नृत्य का सर्वथा नया विश्व मुहावरा ही बना दिया। पर सोचें, राजस्थान की जिन लोक नृत्यों ने उन्हें प्रेरणा दी उन लोक नृत्यों के संरक्षण पर कितना हम सजग हैं। बीकानेर में होली से एक माह पहले तक लोकनाट्य रम्मतें होती हैं। कलाओं के अन्तःसम्बन्धों का उनमें अनूठा उजास होता है, शेखावटी के गींदड, मारवाड का डांडिया, मेवाड, बाडमेर के गैर नृत्य, भीलों का गवरी नृत्य नाट्य, गरासियों और सांसियों के बहुत से नृत्य रूप ऐसे हैं जो धीरे-धीरे लोप हो रहे हैं। समय रहते इन लोक नृत्यों की परम्परा को संजोया नहीं गया, तो संस्कृति की इस नृत्य लय का सदा के लिए हमसे बिछोह हो जाएगा।
यह लिख रहा ह और कहीं पढा याद आ रहा है कि कथक की आज जो विरासत है, उसके बीज बीकानेर, चूरू क्षेत्र में पडे थे। कथक के जयपुर घराने की बात होती है परन्तु यह घराना समृद्ध-सम्पन्न चूरू के उन कथकियों से हुआ है जिन्होंने पहले पहल इस नृत्य में विरल प्रयोग करते इसको एक रूप प्रदान किया, पर चिन्तन में इस पर कहीं कोई थोडा भी उजास रह नहीं गया है। क्या यह नहीं होना चाहिए कि कथक की विरासत में हमारे उस अतीत को भी याद करने का कोई उपक्रम ऐसे किसी कथक संग्रहालय रूप में हो कि कथक को हम हमारे अतीत में गुन-बुन सकें। जयपुर कथक घराना विदेशों तक पहुँच गया, परन्तु हमारे यहाँ उसके बीज क्या सूख नहीं रहे हैं! जयपुर में बाकायदा कथक केन्द्र वर्षों से कार्य कर रहा है, परन्तु उसका होना न होना एक है। उसका होना कहीं नजर कहाँ आता है! क्या यह नहीं होना चाहिए था कि इस कथक केन्द्र की पहचान अपने आयोजनों से, विमर्श से विश्वभर में होती। ऐसे ही धु*वपद की डागर घराने की और हवेली संगीत की जो परम्परा राजस्थान में रही है, उसने विश्वभर में अपनी लौ जलाई है, परन्तु अपने यहाँ इस परम्परा की बढत कितनी हुई है, इस पर विचारने की जरूरत है। राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट के भी यही हाल हैं। आजादी से पहले 1857 में इसकी स्थापना मदरसा-ए-हुनरी नाम से हुई थी, 1886 में इसका नाम बदलकर महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स हो गया था। कला शिक्षण में यह विश्वभर में प्रसिद्ध रहा है। यहाँ असीत कुमार हलधर, शैलेन्द्र नाथ डे जैसे कला मर्मज्ञों ने शिक्षण करवाया था पर देश का इतना प्राचीन यह कला शिक्षण संस्थान आज किस रूप में है, इस पर विचार करने की जरूरत है।
लोकतन्त्र में परम्परा और उसकी विशिष्टता जनभागीदारी की सतत तलाश है और यह किसी भी समाज में कला, संस्कृति और साहित्य के स्वस्थ मूल्यों से ही हो सकती है। सोचता हूँ, कलाओं का मूल आधार संस्कृति ही तो है। जीवन से जुडे संस्कारों की नींव भी संस्कृति ही तैयार करती है। ऐसे दौर में जब जीवन मूल्यों का ह्रास हो रहा है, यह जरूरी है कि संस्कृति से जुडे सरोकारों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाए। कईं बार यह भी लगता है, सरकारी अकादमियाँ और संस्थाएँ सांस्कृतिक, साहित्यिक उन्नयन का कार्य कथित रूप में करती भी हैं, परन्तु उनकी प्राथमिकताओं में संस्कृति से जुडे पहलुओं का स्थूल रूप भर है। यानी साहित्य अकादेमी साहित्य के लिए, संगीत नाटक अकादेमी संगीत, नृत्य और नाट्य के लिए, ललित कला अकादेमी प्रदर्शनकारी कलाओं के लिए कार्य करती है परन्तु उनमें जो गंभीर दृष्टि पुरातन और नुतन को जोडने के संदर्भ में होनी चाहिए वह नजर नहीं आती।
राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती अरसे से प्रकाशित होती आ रही है। प्रकाशित होने को यह प्रकाशित होती रही है, परन्तु प्रकाश आतुरजी के समय जो पहचान देशभर में इसकी बनी, वह बाद में लोप हो गयी। यह सुखद है, इधर स्तरीय गंभीर सामग्री प्रकाशन के साथ फिर से इसकी साख बनी है। इस बात को गंभीरता से समझने की जरूरत है कि संस्कृति और सत्ता को अलग नहीं किया जा सकता। सरकार की प्राथमिकता कलाओं और संस्कृति पर जितनी अधिक होगी, उतना ही राज्य सुव्यवस्थित विकास की ओर अग्रसर होता है। कुछ समय पहले बिहार संग्रहालय में एक व्याख्यान के लिए जाना हुआ। सुखद लगा, बिहार सरकार ने अपने पुराने संग्रहालय को बरकार रखते सर्वथा नवीन संग्रहालय पटना में निर्मित किया और वहाँ यक्षिणी और दूसरी विश्वप्रसिद्ध मूर्ति और दूसरी कलाओं को व्यवस्थित संजोया गया है। सबसे बडी बात यह कि नया संग्रहालय संस्कृति और कलाओं के विमर्श का भी अब बडा केन्द्र बन गया है। इसलिए कि आधुनिक दृष्टि से विकसित संग्रहालय केवल पुरानी कलाकृतियों के संग्रहण उद्देश्य से ही स्थापित नहीं किया गया है बल्कि वहाँ पर संस्कृति की विचार विरासत की बढत भी है।
राजस्थान में एक से बढकर एक संग्रहालय हैं, पर वे पुरानी वस्तुओं, कलाकृतियों के संगृहण की दृष्टि से ही महत्त्व भर के रह गए हैं। विचार करें, अपने यहाँ संगृहित विरल ऐतिहासिक वस्तुओं, कलाकृतियों और अनमोल सम्पदा में आमजन की उत्सुकता जगाने, उनको वहाँ से जोडने, कलाओं से जुडी हमारी प्राचीन विरासत से विमर्श की वहाँ कितनी पहल हुई है? क्यों नहीं यह हो कि कुछ प्रमुख संग्रहालयों को इस दृष्टि से भी विकसित किया जाए कि वे राजस्थान की हमारी प्राचीन कलाओं, संस्कृति और आधुनिकता की दृष्टि स विमर्श के भी बडे केन्द्र बनें।
संग्रहालय ज्ञान के अनुपम भण्डार होते हैं। देश या स्थान की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के बारे में वहीं से जाना जा सकता है। अतीत में प्रवेश करने, उसमें झाँकने की दीठ भी कहीं है तो वह संग्रहालयों में ही है। पर वहाँ संग्रहण के इतर कुछ नहीं होगा तो उनकी कोई सार्थकता नहीं है। कला संग्रहालयों पर लोग तब अधिक से अधिक आएँगे और वह विमर्श के केन्द्र रहेंगे। जब वहाँ कला के शास्त्रीय रूपों के साथ ही परम्परा और लोक के बीज भी हों। यह सही है हमारे संग्रहालय पुरा वस्तुओं के अनुपम भण्डार हैं पर इतना ही सच यह भी है कि अधिकतर संग्रहालयों में राजसी वैभव की ही महिमा का अधिक गान है। राजा-महाराजा कैसे रहते थे, उनके द्वारा उपयोग में ली गई वस्तुएँ, वस्त्र, अस्त्र-शस्त्र आदि इनमें अधिक हैं। क्या ही अच्छा हो, वह सब भी यहाँ संगृहित करने के जतन ह जिससे राजस्थान की लोक संस्कृति और जीवन के अतीत से भी लोग साझा हो सकते हैं।
मध्यप्रदेश में 2013 में जनजातीय संग्रहालय की जब स्थापना हुई तो देशभर से कला आलोचकों को भी बाकायदा आमन्त्रित किया गया था। तभी वहाँ जाना हुआ था, यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ था कि श्यामला हिल्स पर स्थापित जनजातीय संग्रहालय भोपाल में जनजातीय क्षेत्रों को जैसे प्रत्यक्ष साकार करता है। कलाकार हरचंदन सिहं भट्टी और दूसरे बहुत से कलाकारों ने मिलकर आदिवासी इलाकों की भौगोलिकता के साथ वहाँ की संस्कृति को इस संग्रहालय में खण्ड खण्ड में अखण्ड किया हुआ है। आदिवासियों द्वारा निर्मित कलाओं, आदिवासी बच्चों के खेल, मूर्तिशिल्प, लोक देवी-देवताओं और वहाँ के रहन-सहन, जीवन को पूरी तरह से यह संग्रहालय आधुनिक रूप में जीवन्त करता है। ऐसे लगता है, आप संग्रहालय में प्रवेश करने के बाद औचक जनजातीय क्षेत्रों में पहुँच गए हैं। भूरीबाई जैसे कलाकारों के साथ गोण्ड और दूसरे आदिवासी कलाकारों के सहयोग से यह सम्भव हुआ। राजस्थान में बाँसवाडा, डुँगरपुर और दूसरे बहुत से क्षेत्रों में आदिवासी संस्कृति की विरलता है पर धीरे-धीरे शहरीकरण से वह अतीत हम से दूर हो रहा है। बाँसवाडा के कुछ क्षेत्रों में आज भी सामवेद की ऋचाओं का सस्वर पाठ करने वाले आदिवासी हैं, बहुत सी ऐसी वैदिक परम्पराएँ आदिवासियों में जीवन्त हैं, जो अन्यत्र कहीं नहीं है पर दुर्भाग्य है कि उनके जीवन्त प्रदर्शन का कहीं कोई जतन नहीं है। क्या ही अच्छा हो, राजस्थान में एक ऐसा आदिवासी संग्रहालय बने जिसमें हमारा अतीत हमसे संवाद करे। वहाँ आदिवासी कलाओं, परम्पराओं और संस्कृति पर निरन्तर विमर्श भी हो।
संस्कृति असल में मूल्यों की स्रष्टा और संपोषक है। कला संग्रहालयों के साधनों और सुविधाओं का विकास तो एक बात है, परन्तु इससे भी बडी जरूरत यह है कि कलाएँ अभिजात या फिर सीमित वर्ग तक की पहुँच के साथ तमाम जनता तक पहुँचे। इस दृष्टि से राजस्थान में स्वस्थ और दीर्घकालीन नीति बनाई जानी जरूरी है।
हमारे यहाँ बनी अकादमियाँ वर्षों से वार्षिक और दूसरे आयोजन करती आ रही हैं। पर पिछले कुछ वर्षों का इतिहास देखेंगे, तो इनमें जनभागीदारी के साथ उत्साह, उमंग नदारद मिलेगा। साहित्य उत्सव में साहित्यकार, कला मेले में कलाकार, संगीत आयोजन में संगीत से जुडे लोगों के अलावा आमजन कितने एकत्र होते हैं, इस पर विचार करने की जरूरत है। कहने को जयपुर में एशिया का सबसे बडा प्रचारित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल भी निजी स्तर पर सरकारों के सहयोग से वर्ष 2006 से होता आ रहा है। आरम्भ के कुछ वर्ष यह फेस्टिवल साहित्य की संवेदना से लबरेज था भी, परन्तु शनैःशनैः अब यह बाजार और व्यावसायिकता से ग्रसित होता पश्चिम की भौंडी नकल और फिल्मी हस्तियों को एकत्र कर युवा पीढी को भरमाने का एक जरिया भर रह गया है। मुझे लगता है, कला या साहित्य से जुडा कोई भी मेला-उत्सव वही सार्थक है जिसमें भारतीय संस्कृति और हमारी अपनापे की संस्कृति का समावेश हो। वहाँ औपचारिकताओं की भरमार नहीं हो। वही जिसमें एकरसता नहीं हो और वही जिससे कला-संस्कृति जीवन्त रहे। आनंदकुमार स्वामी स्थापित करते हैं, नवीनता नवीन बनाने में नहीं, नवीन होने में है। उनके इस कहे के आलोक में विचारें, हम सांस्कृतिक आयोजनों से नवीन कितने होते हैं!
राजस्थान विविधताओं की धरा है और सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से अत्यधिक सम्पन्न भी हैं, परन्तु यह विडम्बना ही है कि धरोहर संरक्षण के प्रति बहुत से स्तरों पर जो सजगता नजर आनी चाहिए, वह भी हमारे यहाँ लुप्तप्रायः है। पुरामहत्त्व के स्थलों और वहाँ की सांस्कृतिक सम्पत्ति के संरक्षण का कार्य बहुत से स्तरों पर निरन्तर किया भी जा रहा है, परन्तु अभी भी बहुत से ऐसे अल्पज्ञात स्थल हैं जिनका ऐतिहासिक, पौराणिक, पुरातात्त्विक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व तो है परन्तु वे सामाजिक चेतना की दृष्टि से उपेक्षित प्रायः हैं। बीकानेर को ही लें। स्थापत्य और शिल्प की दृष्टि से एक से बढकर एक हवेलियाँ यहाँ है, परन्तु पर्यटन मानचित्र में इसकी यह पहचान नहीं है। क्यों? इसलिए कि स्थानों को किसी बँधी-बँधाई छवि से मुक्त करते नवीन आकर्षण म उन्हें पेश करने के जतन नहीं हो रहे है। स्थान विशेष की संस्कृति कैसे बरसों-बरस अपनी निरंतरता बनाए रखती है, कैसे वह संस्कारित होती है और कैसे उसमें कलाओं की अनुगूँज को सुना जा सकता है, इसे छायाचित्र कला के जरिये गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। इसलिए यह भी जरूरी है कि छायांकन कला के महत्त्व को पर्यटन की दृष्टि से परोटते हुए राजस्थान के अल्पज्ञात स्थानों, वहाँ की विरासत की पहचान करते हुए उन्हें प्रसारित करने के सुव्यवस्थित प्रयास किए जाएँ। आखिर कब तक लोग उसी राजस्थान को देखते रहेंगे जो हम अब तक दिखाते आ रहे हैं।
सोचें, राजस्थान वह प्रदेश है जिसके बारे में कर्नल टॉड ने कभी कहा था-राजस्थान की तुलना में यूनान के ऐपो का सौन्दर्य भी हल्का हो जाता है। इस परिप्रेक्ष्य में राज्य की समृद्ध पर्यटन विरासत के अनछूए पहलुओं और वैविध्यत्ता का प्रभावी प्रसार किए जाने की जरूरत है। इतने वैविध्यपूर्ण ऐतिहासिक, पुरातात्विक, वास्तुसम्पन्न और सांस्कृतिक दृष्टि से भरे-पूरे स्थान यहाँ मौजूद हैं कि उनमें सनातन भारत की खोज की जा सकती है। मेरे एक मित्र हैं, राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अजयसिंह राठौड। संवेदनशील छायाकार और घुम्मकड। देशाटन का कोई अवसर नहीं चूकते। उनके पास अपने कैमरे से लिए राजस्थान के अनछूए स्थलों के छायाचित्रों और उनके साथ के अनुभवों का नायाब खजाना है। पर्यटन विकास की बडी जरूरत आज यही है कि अनछूए स्थलों के साथ ही संस्कृति से जुडे सरोकारों की दीठ से उनका विपणन किया जाए। राजस्थान में कांकवाडी दुर्ग, सिंहगढ, मांडलगढ, सिवाना, बयाना के किलों, झालावाड की बौद्ध गुफाएँ, खजुराहो की मानिंद बने नीलकण्ठ मंदिर और वहाँ की पुरासम्पदा, जालौर की परमारकालीन वास्तु समृद्ध संस्कृत पाठशाला, धौलपुर, बाँसवाडा के मंदिर शिल्प और प्राकृतिक परिवेश आदि पर भी आम पर्यटक कहाँ पहुँच पाता है! पर्यटकीय दीठ से ऐसे और भी बहुत से अनएक्सप्लोर स्थलों पर विचारा जाए तो बहुत कुछ पर्यटन का नया राजस्थान उभरकर सामने आएगा। पर इसके लिए सांस्कृतिक सोच से कार्य करने की भी जरूरत है। मेरी चिन्ता यह भी है कि हम पर्यटन विकास का नारा तो देते हैं, परन्तु सांस्कृतिक दृष्टि से पर्यटन को सम्पन्न करने का काम नहीं के बराबर कर रहे हैं। इसीलिए बहुत से अल्पज्ञात स्थानों के इतिहास, वहाँ की संस्कृति से हम निरन्तर महरूम भी हो रहे हैं।
विचार करें, स्वतन्त्रता से कुछ समय पहले ही यहाँ के राजाओं ने पर्यटन को एक आर्थिक साधन के रूप में अपनाते हुए अपने किले महलों के द्वार विदेशी पर्यटकों के लिए खोलने प्रारम्भ कर दिए थे। पर आजादी के बाद किले-महलों की सार सम्भाल के भी टोटे हो गए। यह तो भला हो तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत का जिन्होंने हैरिटेज होटल का विचार दिया। इसी से किले महलों की धरोहर बच पाई और पर्यटन संस्कृति से इसका फिर से जुडाव हुआ। पर इस समय जो सबसे बडी जरूरत है वह यह है कि हमारी समृद्ध कलाओं, नृत्य, नाट्य, चित्रकला आदि के साथ ही ऐसे स्थल जो अभी पर्यटन मानचित्र पर अनदेखी के कारण नहीं आए हैं, उनके जरिये विकास के एक उपकरण के रूप में पर्यटन को अपनाया जाए।
पर जरूरत इस बात की भी है कि संस्कृति के लिए कार्य हो पर उसमें सरकारीकरण या किसी विशेष विचारधारा की दखल नहीं हो। केवल और केवल संस्कृति से जुडा विचार हो। शास्त्रीयता हो, परन्तु उसमें लोक के बीज भी हों। सभी जन उसमें अपने लिए स्पेस देखते अपनी भागीदारी स्वयं तय करें। सरकार का काम प्रोत्साहन देना भर हो। इसी से व्यापक रूप में हम राजस्थान और यहाँ की संस्कृति से जुडे सरोकारों से सराबोर हो सकेंगे। यह बात याद रखने की है कि संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में कोई आरक्षण नहीं है। यहाँ कोई है, रह रहा है या भविष्य में भी रहेगा तो केवल और केवल अपने बूते। कोई यहाँ अपनी पीठ आप ठोकता भी है तो उसे स्वयं के अधिकारों की लडाई चाहकर भी बना नहीं सकता। आखिर, यही तो है सच्चा लोकतन्त्र! इस लोकतन्त्र को मजबूत करते राजस्थान के विकास पर विचारेंगे, तो बहुत कुछ महत्त्वपूर्ण हम कर पाएँगे। यही आज की आवश्यकता भी है।
सम्पर्क - शंकर विहार-ई, 28-ए, सिद्धार्थ नगर,
जयपुर - 302017 (राजस्थान)