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भारतीय दार्शनिक परम्परा और राजस्थान

कमलनयन
राजस्थान में साहित्य, धर्म और भक्ति की परम्पराएँ तो पुरानी हैं और उनके होने के साक्ष्य भी उपलब्ध होते हैं। किन्तु दर्शन सम्प्रदायों की उपस्थिति के विषय में जानकारी नगण्य है। यहाँ मध्यकाल से रजवाडों में साहित्य, विविध कलाओं, व्याकरण आदि क्षेत्रों में ग्रन्थ लिखे जाते रहे और विज्ञान (विशेष रूप से खगोल विद्या) और ज्योतिष के क्षेत्र में भी कुछ विचार होता रहा आया है। किन्तु इन पर किसी प्रकार का अथवा किसी दर्शन परम्परा में चिन्तन हुआ हो इस सम्बन्ध में जानकारी नहीं मिलती। राजस्थान के इतिहास की पुस्तकों में भी दर्शन के क्षेत्र में हुए विकास का उल्लेख नहीं मिलता। जो कुछ भी पता चलता है उसके आधार पर यहाँ हुए दार्शनिक विचार को आँक पाना संभव नहीं है। राजस्थान में साहित्य की परम्परा मध्यकाल से ही बहुत समृद्ध रही है साहित्य की अनेक धाराएँ यहाँ सदियों से प्रवहमान रहीं हैं - जैन साहित्य, प्रेम काव्य, चारण काव्य (ऐतिहासिक एवं धार्मिक), आख्यान, सन्त काव्य (इसके अन्तर्गत विभिन्न सम्प्रदायों के संस्थापकों और उनके अनुयायियों द्वारा रचित और सम्प्रदायेतर कवियों द्वारा रचित काव्य) और लोक काव्य। किन्तु साहित्य पर विचार अथवा काव्यशास्त्रीय विचार भी नगण्यप्रायः है। यही स्थिति विभिन्न शिल्प-क्षेत्रों की है। स्थापत्य, भास्कर्य और चित्र कलाओं की उत्कृष्ट एवं सुदीर्घ परम्पराएँ मिलती हैं, किन्तु शिल्पशास्त्रीय विचार नहीं मिलता। यही स्थिति संगीत, नृत्य और रंगमंच आदि कलाओं के क्षेत्र की है।
राजस्थान में अनेक धार्मिक और भक्ति-सम्प्रदाय - वैष्णव, शैव, शाक्त व निर्गुण- और उनके अन्तर्गत उपसम्प्रदाय- रामस्नेही, निरंजनी, पाशुपत, नाथ, कबीरपंथी, दादूपंथी आदि भी हैं। किन्तु धर्म-दर्शन अथवा धर्म पर चिन्तन अत्यल्प है। कुछ व्याख्यात्मक ग्रन्थ अवश्य मिल जाते हैं। यहाँ भक्ति की सन्त परम्परा तो अस्तित्वमान है, किन्तु आचार्य परम्परा यहाँ पल्लवित नहीं हुई। वस्तुस्थिति यह है कि मानव कर्म अथवा पुरुषार्थ के सभी क्षेत्र भारतीय शास्त्रीय विचार और दर्शन की परम्पराओं से अनुप्राणित रहे। किन्तु न तो इन परम्पराओं के भीतर और न ही इनसे स्वतन्त्र विचार की परम्पराएँ विकसित नहीं हुईं। राजस्थान में दर्शन के अध्ययन-अध्यापन के विषय में साक्ष्यों की अनुपलब्धता इस तथ्य को प्रमाणित करती है।
19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आकर, राजस्थान में अंग्रेजी प्रभुत्व की स्थापना के बाद संस्कृत साहित्य और व्याकरण आदि के साथ दर्शनशास्त्र भी पढाया जाने लगा। इस प्रकार, इस समय राजस्थान में दर्शनशास्त्रीय अध्ययन-अध्यापन विधिवत् आरम्भ होता है। इसका एक उदाहरण जयपुर में स्थापित महाराजा संस्कृत कॉलेज है। यह 1844 में जयपुर नरेश सवाई रामसिंह द्वारा स्थापित किया गया था, जहाँ न्याय दर्शन के प्रोफेसर का पद होता था। 19वीं शताब्दी में जयपुर यहाँ के शासकों के संरक्षण में विभिन्न कलाओं और विचार के एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में स्थापित हुआ। विभिन्न विधाओं के बहुत से विद्वानों ने इसे अपनी कर्मभूमि बनाया। इनमें विभिन्न दर्शनों से सम्बद्ध प्रमुख विद्वान विचारकों के विषय में चर्चा करूँगा। ऐसे विद्वानों में पण्डित मधुसूदन ओझा एवं पण्डित मोतीलाल शास्त्री का नाम सबसे पहले आता है।
पण्डित मधुसूदन ओझा एवं पण्डित मोतीलाल शास्त्री वैदिक अध्येता एवं विद्वान थे। वैदिक विज्ञान पर इन्होंने बहुत काम किया। 20वीं सदी के आरम्भ में, 1902 में, ओझा सवाई माधोसिंह के साथ किंग एडवर्ड सप्तम् के राज्याभिषेक के अवसर पर लन्दन गए थे, वहाँ उन्होंने वैदिक-विज्ञान और दर्शन पर व्याख्यान दिया था। वहाँ पर भारतविद् उनके वैदिक ज्ञान और वेद-वैज्ञानिक स्थापनाओं से बहुत प्रभावित हुए। उनका वैदिक-दर्शन एवं वैदिक-विज्ञान विषयों में विशिष्ट योगदान सर्वस्वीकृत है। ब्रह्मविज्ञान और ब्रह्मविद्या रहस्यम् वैदिक-विज्ञान के विशिष्ट ग्रन्थ माने जाते हैं। पण्डित मोतीलाल शास्त्री के आत्मविज्ञानोपनिषद्, आत्मगति विज्ञानोपनिषद् और अथर्ववेदीय प्रश्नोपनिषद् आदि उनके कुछ प्रमुख ग्रन्थ हैं।
जैसाकि हमने पीछे कहा महाराजा संस्कृत महाविद्यालय में न्याय के प्रोफेसर का पद भी सृजित किया गया था। आज भी है। इस पद को जिन न्यायशास्त्रियों ने सुशोभित किया उनमें पण्डित गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी, पण्डित कन्हैयालाल न्यायाचार्य एवं पण्डित नन्दकिशोर न्यायाचार्य विशिष्ट विभूतियाँ हैं। पण्डित गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी व्याकरण और न्याय-वैशेषिक के पण्डित थे। उनके बाद इस पद पर पण्डित कन्हैयालाल न्यायाचार्य एवं पण्डित नंदकिशोर न्यायाचार्य, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे। ये व्याकरण और न्यायशास्त्र के उल्लेखनीय विद्वानों में गिने जाते थे। इन सभी आचार्यों का कार्यकाल 20वीं शताब्दी के तीसरे, चौथे और पाँचवे दशकों में रहा। तदुपरान्त राजस्थान विश्वविद्यालय के स्थापित हो जाने के बाद दर्शन शास्त्र के अध्ययन-अध्यापन का केंद्र यहाँ का दर्शन विभाग बन गया। महामहोपाध्याय मधुसूदन ओझा एवं अन्य उपर्युक्त विद्वानों के कर्तृत्व से संस्कृत कॉलेज को राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई।
यह संयोग ही कहा जाएगा कि न्याय-वैशेषिक की दर्शन-परम्परा तो विभिन्न शिक्षण संस्थानों में अक्षुण्ण रही, किन्तु वेदान्त-दृष्टि, जिसे भारतीय संस्कृति का उत्स कहा जाता है, उसकी दर्शन-परम्परा भक्ति की ओर मुड गई। मध्यकाल में वेदान्त के बहुत से सम्प्रदाय- विशिष्टाद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, शुद्धाद्वैत, अचिन्त्य भेदाभेद - मुक्ति के मार्ग के रूप में निर्गुण और सगुण भक्ति परम्पराओं का आधार बने। राजस्थान में नाथद्वारा, जो पुष्टिमार्गी भक्ति सम्प्रदाय की पीठ है, वहाँ विद्या विभाग नामक संस्था ने पुष्टिमार्गी वेदान्त दर्शन, शुद्धाद्वैत पर अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित किए हैं। विद्या विभाग के 1930 से 1943 तक अध्यक्ष रहे देवर्षि रमानाथ शास्त्री (1878-1943) का, जो मेवाड के महाराणा और तिलकायत श्री गोवर्धनलालजी के निमन्त्रण पर मुम्बई से नाथद्वारा गए थे, शुद्धाद्वैत दर्शन परम्परा को बढाने में महत्त्वपूर्ण योगदान है। वे शुद्धाद्वैत और पुष्टिमार्ग के महान व्याख्याकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने वल्लभाचार्य प्रणीत और शुद्धाद्वैत के अनेक अन्य महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों पर टीकाएँ एवं प्रबन्ध लिखे और अपने सम्प्रदाय के ज्ञान को विस्तार दिया। 18वीं शताब्दी में आन्ध्रप्रदेश से आकर जयपुर में बसे संस्कृत के विद्वानों के परिवार में देवर्षि रमानाथ का जन्म हुआ था। इनका परिवार अपने पूर्वज कविकलानिधि देवर्षि श्रीकृष्ण भट्ट के साथ सवाई जयसिंह द्वितीय के आह्वान पर जयपुर आया था। रमानाथ महाराजा संस्कृत कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त पहले काशी और फिर वहाँ से मुम्बई चले गये और वहाँ से 1930 में नाथद्वारा आये और 1943 में मृत्युपर्यन्त अथक कार्य करते रहे। विद्या विभाग आज भी सक्रिय है।
राजस्थान में दर्शनशास्त्र के अध्ययन-अध्यापन के तीन महत्त्वपूर्ण केन्द्र यहाँ के तीन पुराने महाविद्यालय हैं - गवर्नमेंट कॉलेज अजमेर, जिसका नया नाम है सम्राट् पृथ्वीराज चौहान गवर्नमेंट कॉलेज, डूँगर कॉलेज बीकानेर और महारानी श्रीजया गवर्नमेंट कॉलेज भरतपुर। ये तीनों कॉलेज आजादी से पूर्व स्थापित हुए थे। दर्शन यहाँ पढा-पढाया जाता है। अभी कुछ समय पहले तक महाविद्यालय अध्ययन-अध्यापन के केन्द्र ही माने जाते थे। रिसर्च और लेखन का कार्य विश्वविद्यालयी अध्यापकों के लिए निर्धारित था। हालाँकि महाविद्यालयों में कुछ अध्यापक रिसर्च और लेखन करते रहे हैं। किन्तु ऐसा अपवादस्वरूप ही हुआ है। इन अपवादों में महारानी श्रीजया महाविद्यालय के दो नाम सामने आते हैं - डॉ. रामानंद तिवारी (1919-1989) और डा. राजवीर सिंह शेखावत। डॉ. रामानंद तिवारी लगभग 45 वर्ष पूर्व सेवानिवृत्त हो गए थे और डॉ. शेखावत अभी कार्यरत हैं।
डॉ. तिवारी 1960 और 1970 के दशकों में महारानी श्रीजया महाविद्यालय में कार्यरत रहे। उनके विचार के क्षेत्र भारतीय दर्शन, संस्कृति और साहित्य थे। उनका कर्तृत्त्व इन तीनों क्षेत्रों में विस्तीर्ण है। सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्, हमारी जीवन्त संस्कृति, महाभारत में धर्म, सैक्यूलर सोशल एण्ड एथिकल वैल्यूज इन दी उपनिषद््, स्पिरिच्युएलिस्टिक फिलॉसफी, फिलॉसफी ऑफ नॉलेज एण्ड एक्शन, अभिनव रसमीमांसा, सांस्कृतिक भाषा विज्ञान आदि उनकी दार्शनिक कृतियाँ हैं। हालाँकि वे साहित्य के क्षेत्र में अपने सर्जनात्मक योगदान के लिए अधिक जाने जाते हैं, किन्तु उनका साहित्य के क्षेत्र में दार्शनिक विमर्श भी बहुत गहरा है। महाभारत में धर्म और सैक्यूलर सोशल एण्ड एथिकल वैल्यूज इन दी उपनिषद्् के माध्यम से उन्होंने भारतीय नैतिक-दर्शन में महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है।
डॉ. राजवीर सिंह शेखावत का लेखन मुख्यतः जैन और न्याय दर्शन पर केन्द्रित है। किन्तु वे इन दार्शनिक सम्प्रदायों से बँधे नहीं हैं, स्वतन्त्र हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि उन्होंने इन परम्पराओं के भीतर स्वतन्त्र विचार भी किया है। उनकी प्रमुख कृतियाँ जैन दार्शनिक अवधारणाएँ : अनुचिन्तन, दार्शनिक विमर्श, न्याय-दर्शन में व्याप्ति की अवधारणा, मानवीय रूपान्तरण के सूत्र, तत्त्वमीमांसा : आरम्भ और अन्त और भारतीय तर्कशास्त्र में अनुमान की तीन परम्पराएँ हैं। इनके अतिरिक्त डॉ. शेखावत ने अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों का सम्पादन भी किया है। इनमें एक भारतीय नीतिमीमांसा भारतीय नैतिक-चिन्तन पर केन्द्रित है। भारतीय परम्परा में दार्शनिकों द्वारा नैतिकता पर विचार कम ही हुआ है। ऐसे में इस ग्रन्थ की महत्ता बहुत बढ जाती है। अखिल भारतीय दर्शन परिषद् द्वारा उनके दर्शन के क्षेत्र में अवदान के लिए उन्हें सो.रा.ता. दर्शन पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
यद्यपि विश्वविद्यालयों की स्थापना का क्रम अंग्रेजी राज में ही आरम्भ हो गया था। देश में पहले विश्वविद्यालय मुम्बई, मद्रास और कोलकाता में 1857 में स्थापित हुए थे। राजस्थान का पहला विश्वविद्यालय- राजपूताना विश्वविद्यालय, जो बाद में राजस्थान विश्वविद्यालय कहलाया - 8 जनवरी 1947 में स्थापित हुआ। कालान्तर में 1962 में जोधपुर विश्वविद्यालय और 1964 में उदयपुर विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई। इन सभी विश्वविद्यालयों में दर्शनशास्त्र विभागों की भी स्थापना हुई। इन विभागों में समय-समय पर बडे दार्शनिकों और विचारकों ने सुशोभित किया।
पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध में राजस्थान विश्वविद्यालय का दर्शन विभाग प्रो. दयाकृष्ण, प्रो. विश्वम्भर पाहि, डॉ. राजेंद्रस्वरूप भटनागर और डॉ. के. एल. शर्मा जैसे दार्शनिकों और दार्शनिक-विचारकों की कर्मस्थली रहा। यहाँ इन विभूतियों पर और इनके योगदान पर संक्षेप में चर्चा करेंगे।
राजस्थान विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के प्रोफेसरों में सबसे बडा नाम प्रो. दयाकृष्ण (1924-2007) का है। उनके कर्तृत्त्व से यहाँ के दर्शन विभाग को राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई। दयाकृष्ण का हस्तक्षेप दर्शनशास्त्र तक सीमित नहीं था, वे एक बहुआयामी दृष्टि के धनी थे। उन्होंने अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र के साथ-साथ इण्डोलॉजी पर भी दार्शनिक विचार किया। उनकी द नेचर ऑफ फिलॉसफी (1956), द आर्ट ऑफ द कोन्सेप्च्युअल (1989) ऐसी कृतियाँ हैं जो उनकी मूल दार्शनिक प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति हैं। उनके लिए दर्शन वास्तव में विमर्शात्मक चेतना के धरातल पर जीवन और जगत् की सम्प्रत्यात्मक समझ (कॉन्सेप्च्युअल अंडस्टैन्डिंग) के लिए बुद्धि के द्वारा स्वयं से किया गया संघर्ष है।
सोशल फिलॉसफी पास्ट एण्ड फ्यूचर, पुलिटिकल डिवेलपमैंट- अ क्रिटिकल परस्पैक्टिव, और डिवैलपमैंट डिबेट : फरीड डब्ल्यू रीग्स एण्ड दयाकृष्ण आदि में उन्होंने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दार्शनिक विचार प्रतिपादित किया है। किन्तु महत्त्व की बात यह है कि दयाकृष्ण ने अपनी न्यू पर्स्पैक्टिव इन इण्डियन फिलॉसफी, भारतीय दर्शन : एक नई दृष्टि और डिवेलपमेन्ट ऑफ इण्डियन फिलॉसफी फ्रॉम 18थ सेंच्युरी ऑनवर्ड में भारतीय दर्शन के बहुलतावादी वैचारिक वैभव को बडे विस्तार से उद्घाटित किया है।
हमारे विश्वविद्यालयों में अब भी पश्चिम का ही राज है। इस कारण हम हमारे सांस्कृतिक अस्तित्त्व की आधार अपनी ज्ञान-परम्पराओं से, हमारी सांस्कृतिक मनीषा को विस्मृत किए हुए हैं। दयाकृष्ण का अध्यवसाय हमारी विस्मृति को मिटाकर भारतीय दार्शनिक परम्परा को पुनर्गठित करने हेतु एक भाष्यधर्मी अभियान का आह्वान है- उन्होंने इस भाष्यधर्मी अभियान की यथासम्भव एक रूपरेखा प्रस्तुत की है ताकि भारतीय बौद्धिक परम्पराओं के बहुलवादी स्वरूप को उसकी समग्रता में न केवल उद्घाटित किया जा सके बल्कि वर्तमान के आलोक में उसका वैश्विक औचित्य प्रमाणित भी हो सके। उनके इस दार्शनिक अभियान को... वैकल्पिकता के तर्कशास्त्र पर आधारित बहुलवादी समग्रता का दर्शन कहा जा सकता है।
राज. विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग की दूसरी बडी विभूति प्रो. विश्वम्भर पाहि (1936-2020) हैं। वे देश के न्याय-वैशेषिक परम्परा के बडे दार्शनिकों में एक हैं। उन्होंने अपने वैशेषिक पदार्थव्यवस्था का पद्धतिमूलक विमर्श के माध्यम से न केवल इस परम्परा को आगे बढाया बल्कि इस दर्शन परम्परा के आधारभूत ज्ञानमीमांसीय, सत्तामीमांसीय और मूल्यात्मक सिद्धान्तों को अभिनिर्धारित कर उन्हें ठोस रूप में प्रस्तुत किया तथा परम्परा की पुनर्रचना और जहाँ आवश्यक हुआ वहाँ इसके विकास-मार्ग में बाधक तत्त्वों का निवारण करते हुए इसे इसकी बहुमुखीनता को आगे बढाने का अतुलनीय उद्यम किया। उन्होंने न्याय-वैशेषिक दर्शन की आत्मा विषयक अवधारणा की समीक्षा करते हुए उसे भारतीय परम्परा की पुरुषार्थमीमांसीय मान्यताओं- सर्वस्वीकृत कर्मवाद, संसारवाद और ज्ञानमोक्षवाद- के व्यापक परिप्रेक्ष्य में उपस्थापित किया। विश्वम्भर पाहि का दार्शनिक अवदान विषय पर भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् के तत्त्वाधान में राज. विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग द्वारा 2016 में गोष्ठी आयोजित की गई थी। इस गोष्ठी के माध्यम से देश भर से आये कतिपय विद्वानों द्वारा भारतीय दर्शन में पाहि के अवदान को रेखांकित किया गया। उन्हें अनेक संस्थाओं ने- आचार्य शंकर पुरस्कार (उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान), आचार्य नवलकिशोर कांकर पुरस्कार (राजस्थान संस्कृत अकादमी), गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी दर्शन सम्मान, मीमांसा केसरी सम्मान (वैदिक संस्कृति प्रचारक संघ, जयपुर), श्रीविद्यासाधक सम्मान (श्रीविद्या साधना पीठ, काशी), हरितऋषि सम्मान (महाराणा मेवाड फाउण्डेशन) एवं लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड (भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली) - सम्मानित किया।
प्रोफेसर राजेन्द्रस्वरूप भटनागर परम्परा-स्वतन्त्र दार्शनिक थे। हालाँकि उन्होंने आधुनिक पाश्चात्य चिंतन, बर्कले-दर्शन आदि जैसे ग्रंथों की रचना भी की थी। किन्तु ये तीनों उनकी लेखन यात्रा की आरम्भिक रचनाएँ हैं। बाद में उन्होंने आस्पेक्ट ऑफ लाईफ; सत्, अस्तित्त्व तथा मूल्य; नीति; भाषा, समाज और संस्कृति आदि के माध्यम से अपना दार्शनिक विचार प्रस्तुत किया। उनके अनुसार किसी भी दार्शनिक सिद्धान्त की निर्विवाद स्थापना असम्भव है और परिणामतः उस पर आधारित कोई निष्कर्ष सम्भव नहीं है। दर्शन का कार्य समग्रात्मक दृष्टि से समीक्षा करने तक सीमित होना चाहिये। उनका मत था कि सभी दार्शनिक उत्तर वैकल्पिक होते हैं, अन्तिम नहीं। यद्यपि वे किसी मतवाद के समर्थक नहीं थे, किन्तु ज्ञान की अनुभववादी पद्धति (इंद्रिय प्रत्यक्ष पर आधारित) के समर्थक थे। अतः किसी अतिक्रामी (ट्रान्सेन्डेंटल) सत्ता के होने की संभावना को अस्वीकार करते थे। उनकी समस्त नीति-मीमांसा आध्यात्मिक पूर्वमान्यताओं पर आधारित न होकर इहलौकिकता तक सीमित थी।
डॉ. के. एल. शर्मा दर्शन के अध्ययन-अध्यापन व लेखन तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने जीवन के सुखी नियोजन में दर्शन का उपयोग उसकी प्रयोगधर्मी संभावनाओं में देखा। इसलिए उन्होंने अपने पूर्व शिष्यों डॉ. राजकुमार, डॉ. दीपक श्रीवास्तव और डॉ. राजवीर सिंह शेखावत को, जो विभिन्न राजकीय महाविद्यालयों में दर्शनशास्त्र के सह-आचार्य हैं, साथ लेकर फिलॉसोफिकल प्रैक्सिस, काऊंसलिंग एण्ड स्पिरिच्युअल हीलिंग सोसाइटी का सन् 2000 में गठन किया। उनका यह उपक्रम इस मान्यता पर आधारित है कि यह दर्शन का दायित्व है कि वह मनुष्य की रहनी और करनी में उसका पथ-प्रदर्शक बने। यह सोसाइटी प्रतिवर्ष राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन करती है, इसके सदस्य जरूरतमंदों को काऊंसलिंग प्रदान करते हैं। यही नहीं सोसाइटी ने तकनीकी एवं मूल्य (2014, सं. राजवीर सिंह शेखावत), नैतिक निष्ठाएँ, उत्तरदायित्त्व और मानवीय सम्बन्ध (2016, सं. राजकुमार), विचार, सिद्धान्त और व्यवहार (2017, सं. राजवीर सिंह शेखावत), फिलॉसफी इन प्रैक्टिस : मेकिंग सेन्स ऑफ ह्यूमन एग्जिस्टैन्स (2018, सं. दीपक श्रीवास्तव) फ्रॉम फ्रेजी टू ट्रैन्क्वीलिटी : नैगेटिव इमोशंस एण्ड फिलॉसॉफिकल काऊंसलिंग (2020, सं. राजवीर सिंह शेखावत) और पुस्तकों का प्रकाशन किया। इनके अतिरिक्त सोसाईटी द्वारा डा. के. एल. शर्मा की मानवीय यथार्थ के स्वर (दैनंदिन समस्याओं के समाधान में सनातन प्रज्ञा का अनुप्रयोग) एवं परिधि के परे (दार्शनिक प्रबोधन की निर्देशिका) नामक पुस्तकों का भी प्रकाशन किया है। फिलॉसोफिकल प्रैक्सिस, काऊंसलिंग एण्ड स्पिरिच्युअल हीलिंग सोसाइटी देश में अपने प्रकार की पहली और विश्व की 18वीं ऐसी सोसाइटी है।
डॉ. के. एल. शर्मा के दार्शनिक-विमर्श के विस्तार के लिए किए गए उपक्रमों का उल्लेख आवश्यक है। उन्होंने भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् के तत्त्वावधान में भारत के छह दार्शनिकों के कर्तृत्व पर राष्ट्रीय सेमिनारों का आयोजन किया। इनमें से दो- दयाकृष्ण और यशदेव शल्य- राजस्थान के हैं। इन दार्शनिकों की कृतियों पर हुए विचार-विमर्श को फिलॉसफी ऑफ दयाकृष्ण और यशदेव शल्य का दर्शन नामक ग्रन्थों में सम्पादित कर प्रकाशित किया। ये दोनों ग्रन्थ इन दार्शनिकों पर हुए विमर्श पर महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। इन सेमिनारों की विशिष्टता यह थी कि उक्त दोनों दार्शनिक इन सेमिनारों में उपस्थित रहे।
राज. विश्वविद्यालय के ही, किन्तु दर्शन विभाग के नहीं अपितु इतिहास एवं संस्कृति विभाग के दो दार्शनिकों - प्रोफेसर गोविन्दचन्द्र पाण्डे और डॉ. मुकुंद लाठ- के इतिहास एवं संस्कृति-दर्शन के क्षेत्र में अवदान के बिना राजस्थान के राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अवदान पर चर्चा अधूरी रहेगी।
गोविन्दचन्द्र पाण्डे (1923-2011) देश के अग्रणी इतिहासकार तो थे ही, साथ ही उनका दार्शनिक अनुसंधान और गवेषणा एक गहरे और विदग्ध संस्कृति-दर्शन और इतिहास-दर्शन में प्रतिफलित हुई। बौद्धधर्म और भारतीय संस्कृति पर उनकी रचनाएँ - बौद्धधर्म के विकास का इतिहास, फाउण्डेशंस इण्डियन कल्चर आदि - उनके इतिहास और संस्कृति विषयक दर्शन पर आधारित इतिहास ग्रन्थ कहे जा सकते हैं। भक्तिदर्शन विमर्श, सौन्दर्यदर्शन विमर्शः और एकं सद् विप्रा बहुदा वदन्ति (संस्कृत में) उनके भक्ति, सौन्दर्य और सत् विषयक तीन दार्शनिक विमर्श हैं। मूल्य-मीमांसा उनकी नैतिक-दर्शन विषयक सुविश्रुत कृति है। इसके अतिरिक्त उन्होंने सता और ज्ञान विषयों पर उन्मीलन नामक दार्शनिक जर्नल में प्रकाशित सात सुदीर्घ लेखों में अपना स्वतन्त्र दार्शनिक चिन्तन किया है। द मीनिंग एण्ड प्रॉसेस ऑफ कल्चर, कॉन्शसनैस वैल्यू कल्चर, भारतीय संस्कृति के मूलाधार आदि अपनी कृतियों में अपने इतिहास एवं संस्कृति-दर्शन का प्रतिपादन किया। वे संस्कृति को जैविक से लेकर आध्यात्मिक मूल्यों की निःश्रेणी और इतिहास को इन मूल्यों के चरितार्थन की परम्परा के रूप में परिभाषित और व्याख्यायित करते हैं। उनका इतिहास एवं संस्कृति-दर्शन वेदान्त की अद्वैत परम्परा में प्रतिष्ठ है। प्रो. पाण्डे को भारत सरकार ने पद्मश्री और विभिन्न राष्ट्रीय संस्थाओं ने शंकर पुरस्कार (बिडला फाऊण्डेशन), सरस्वती सम्मान (बिडला फाउण्डेशन), मूर्तिदेवी पुरस्कार (भारतीय ज्ञानपीठ), श्रीवाणी न्यास-अलंकरण, मंगलाप्रसाद पारितोषिक (राष्ट्रभाषा प्रचार समिति), विश्वभारती सम्मान (उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान), कबीर सम्मान (मध्य प्रदेश सरकार) से सम्मानित किया है।
मुकुंद लाठ (1937-2020) भारत की विभिन्न सांस्कृतिक परम्पराओं - साहित्य की, विभिन्न कलाओं में विचार की - में हुए विचार के इतिहासकार और संस्कृति दार्शनिक हैं। उनकी संगीत एवं चिन्तन तथा संगीत और संस्कृति, भावन आदि में साहित्य और विभिन्न कलाओं पर उनके विस्तृत लेख, उन्हें इतिहास एवं संस्कृति-दार्शनिक के रूप में स्थापित करती हैं। यही नहीं उन्होंने धर्मसंकट, कर्मचेतना के आयाम और क्या हैं? क्या नहीं हैं? जैसी दार्शनिक कृतियों के माध्यम से भारत की दर्शन परम्परा में भी महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप किए हैं। उनकी क्या है? क्या नहीं है? संवाद शैली में लिखी गई ऐसी कृति है जिसमें संवाद अस्तित्व विषयक गहरे दार्शनिक विमर्श का रूप ले लेता है। इसे दार्शनिक यशदेव शल्य ने दर्शन के क्षेत्र में एक अनन्यसाधारण योगदान कहा है।
धर्मसंकट, कर्मचेतना के आयाम, इन दोनों कृतियों में मनुष्य के कर्म, कर्म के औचित्य, धर्म की मर्यादाओं के भीतर उत्पन्न होने वाले संकट अथवा मॉरल डिलेमा पर गहरा एवं विस्तृत दार्शनिक विमर्श हुआ है। भारतीय दर्शनों की परम्पराओं में और उनसे इतर भी नैतिकतापरक दार्शनिक चिन्तन नगण्यप्रायः है। जो चिन्तन धर्मशास्त्रों की परम्परा में कर्म पर हुआ है वह विधि-निषेध परक है। मुकुंद लाठ को भारत सरकार ने पद्मश्री और विभिन्न राष्ट्रीय संस्थाओं ने शंकर पुरस्कार (बिडला फाउण्डेशन), मूर्तिदेवी पुरस्कार (भारतीय ज्ञानपीठ), मंगलाप्रसाद पारितोषिक (राष्ट्रभाषा प्रचार समिति) से सम्मानित किया है। यही नहीं वे दार्शनिक यशदेव शल्य के साथ बरसों उन्मीलन नामक प्रतिष्ठित पत्रिका के सम्पादक रहे।
यशदेव शल्य (1928-2021) विश्वविद्यालयी शिक्षातन्त्र के बाहर एक ऐसा व्यक्तित्त्व हैं जिनके माध्यम से आधुनिक काल में भारतीय दार्शनिक प्रज्ञा में अभूतपूर्व उन्मेष घटित हुआ। वे ऐसे भारतीय दार्शनिक हैं जिनका दर्शन पूर्णतः भारतीय दर्शन-परम्परा में प्रतिष्ठ और वेदान्त गोत्र का दर्शन है। उनका दर्शन वेदान्त का चिदद्वैती (चेतना मूलक) प्रस्थान कहा जा सकता है, उन्होंने सृष्टि को चित् के आत्म-सृजन के रूप में देखा है। उन्होंने अपने दर्शन का प्रतिपादन सत्ताविषयक अन्वीक्षा, चिद्विमर्श, मूल्यतत्त्व मीमांसा और चित् की आत्मगवेषणा नामक कृतियों में किया। उनकी यह सर्वतोन्मुखी दृष्टि उनके तत्त्वमीमांसीय, ज्ञानमीमांसीय और मूल्यमीमांसीय प्रतिपादनों में ही नहीं, बल्कि संस्कृतिः मानव कर्तृत्व की व्याख्या, समाज-दार्शनिक परिशीलन, तत्त्व-चिंतन, काव्य-विमर्श के माध्यम से उनके इतिहास-दर्शन, संस्कृति-दर्शन, समाज-दर्शन एवं साहित्य अथवा काव्य-दर्शन में भी अभिव्यक्त हुई है। वेदान्त के प्राचीन दार्शनिकों ने समाज, संस्कृति, राजनीति, इतिहास जैसे विषयों पर विचार नहीं किया था। इस कारण यह सामान्य धारणा रही है कि भारतीय दार्शनिक दृष्टि जगत् को माया मानने वाली परलोकोन्मुखी दृष्टि थी इसलिए यहाँ के दार्शनिकों ने उक्त विषयों पर विचार नहीं किया। वास्तव में तो यह माया अथवा मिथ्या अवधारणाओं की भ्रान्त समझ के कारण है। इसके विस्तार में यहाँ जाना अभीष्ट नहीं है। यशदेव शल्य ने वेदान्त-दृष्टि में प्रतिष्ठ समाज, संस्कृति और इतिहास दर्शनों का प्रतिपादन किया है। उनके कतृत्व की विशिष्टता यह है कि उनकी दृष्टि एवं विचार की कोटियाँ भारतीय हैं। हमारे प्रबुद्ध वर्गों पर पश्चिम का प्रभाव इस कदर हावी है कि हम स्वयं को, अपनी ज्ञान की, विचार की, सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं आदि को पश्चिम से उधार पाई दृष्टि से देखते, मूल्यांकित करते रहे हैं। यशदेव शल्य, गोविन्दचन्द्र पाण्डे और मुकुंद लाठ सरीखे दार्शनिक इसके अपवाद हैं। इस आधुनिक समय में भारत में अन्यत्र ऐसे व्यक्तित्व दुर्लभ ही हैं।
विभिन्न राष्ट्रीय संस्थाओं ने यशदेव शल्य को उनके अवदान के लिए भगवानदास पुरस्कार (उत्तर प्रदेश सरकार), शंकर पुरस्कार (बिडला फाऊण्डेशन), मूर्तिदेवी पुरस्कार (भारतीय ज्ञानपीठ), मंगलाप्रसाद पारितोषिक (राष्ट्रभाषा प्रचार समिति), नरेश मेहता हिन्दी वाङ्मय (मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति) पुरस्कार, स्वामी प्रवणानन्द दर्शन पुरस्कार व लाइफ टाईम अचीवमेंट अवार्ड (अखिल भारतीय दर्शन परिषद्) तथा लाइफ टाईम अचीवमेंट अवार्ड (भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्) से सम्मानित किया है।
उदयपुर विश्वविद्यालय को प्रो. कमल चंद सोगानी ने अन्तरराष्ट्रीय ख्याति दिलाई। उनके चिन्तन का क्षेत्र जैन दर्शन और जैन साहित्य रहा है और उन्होंने राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय जर्नल्स में लगभग 40 लेख और हिन्दी और अंग्रेजी में 47 पुस्तकों का प्रणयन किया है। इनमें एथिकल डॉक्ट्रिन्स इन जैनिज्म, महावीर एण्ड हिज फिलॉसफी ऑफ लाइफ, राईट ऐंड द गुड इन जैन एथिक्स, प्रौढ प्राकृत अपभ्रंश रचना सौरभ (2 भाग), जैनधर्म की आध्यात्मिक अवधारणाएँ आदि कुछ महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं।
जोधपुर विश्वविद्यालय से प्रो. पी. टी. राजू (1904-1992) सरीखे विद्वान सम्बद्ध रहे। वे जोधपुर जसवंत कॉलेज में प्रोफेसर होकर आए थे। वे भारतीय दर्शन परम्पराओं के बडे व्याख्याकार-दार्शनिकों में गिने जाते हैं। उनके कुछ प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं आइडियेलिस्टिक थॉट ऑफ इण्डिया, इंट्रोडक्शन टू कॉम्पैरेटिव फिलॉसोफी, द फिलॉसफीकल ट्रैडिशन्स ऑफ इण्डिया, स्ट्रक्चरल डैप्थ्स ऑफ इण्डियन थॉट। बाद में वे 1950 से 1960 तक दर्शन विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय में भी कार्यरत रहे।
इस प्रकार राजस्थान देश में बडे दार्शनिकों की कर्मभूमि रही है। इनके सर्जनात्मक योगदान से देश में दर्शन की, विचार की, आधुनिक परम्परा समृद्ध हुई है।
सन्दर्भ
1. पिछले लगभग दो दशकों, यू. जी. सी. की सेवा शर्तों के लागू हो जाने के बाद से विशेष रूप से कुछ प्रकाशित करते रहते हैं।
2. अम्बिकादत्त शर्मा, भारतीय दर्शन और उसका स्वातन्त्र्योतर युग, उन्मीलन, वर्ष 27, अंक 2, जुलाई, 2013, पृ 41
3. वही, पृ 42
4. वही, पृ 45
5. राजेन्द्रप्रसाद शर्मा व अनुभव वार्ष्णेय, आचार्य विश्वम्भर पाहि के दार्शनिक विचारों की समीक्षा, दर्शन विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर, 2018, में अम्बिकादत्त शर्मा का लेख, पृ 144
इस आलेख के लेखन में आदरणीय देवर्षि कलानाथ शास्त्री, डॉ.के.एल. शर्मा, डॉ. शिवजी जोशी, डॉ. कृष्णचन्द्र गोस्वामी, डा. राजवीर सिंह शेखावत और डॉ. मनीष सिनसिनवार से मिली विभिन्न जानकारियाँ के लिए लेखक उनके प्रति आभारी है।

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