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राजस्थान की सांस्कृतिक संस्थाएँ

श्याम महर्षि
राजस्थान की संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं पर दृष्टि डालें, उससे पूर्व हम राजस्थान के समाज विकास का पर्यावलोकन करें, जिससे संस्कृति का सामाजिक स्वरुप व परम्परा को जाना जा सके। पश्चात्य विद्वानों संस्कृति को केवल गाना-बजाना तथा मनोरंजन तक सीमित माना जब कि राजस्थान की संस्कृति का अर्थ समाज के पूरे परिवेश में उमंग-उत्साह जिन्दगी में जन्म से लेकर मरण तक विभिन्न परम्पराओं का निर्वहन माना गया है।
राजस्थान की लोक कलाएँ भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में अपनी परम्परागत अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध रही है। पूरे विश्व में राजस्थान अपने विविधता पूर्ण भाषा, रीति-रिवाज, कला शैलियों के लिए अपनी अलग पहचान रखती है।
राजस्थान समाज में भोजन की विधि में अत्यन्त पवित्रता, शुद्धता और संयम का बडा महत्त्व रहा है। भोजन से पूर्व स्थान अथवा हाथ-मुँह व पैर धोना आवश्यक था।
होली-दीपावली-तीज गणगौर, दशहरा तथा अक्षय तृतीया के त्योहारों को स्त्री-पुरुष बडे उत्साह से मनाते थे। इसी भाँति राजस्थान की वेश-भूषा का सांस्कृतिक पक्ष इतना प्रबल है कि शताब्दियाँ गुजर जाने के पश्चात भी अपनी विशेषताओं के लिए जाना जाता है।
1. रूपायन संस्थान, बोरूंदा -
जोधपुर जिले के बोरूँदा गाँव में स्थित इस संस्था की स्थापना ख्यातनाम लेखक विजयदान देथा (बिज्जी) ने की थी। राजस्थान की प्राचीन लोक कथाओं के क्षेत्र में इस संस्था ने उल्लेखनीय कार्य किया है। बांता री फुलवाडी के नाम से लोक कथाओं का प्रकाशन भी किया।
शुरूआत में वाणी पत्रिका का प्रकाशन भी किया। संस्था द्वारा संस्कृति पर अनेक राष्ट्रीय स्तर की सेमिनार का आयोजन भी किए गए हैं। राजस्थान की लोक संस्कृति से सम्बन्धित सामाजिक संग्रहालय का भाी संचालन किया गया था। वर्तमान में यह संस्था बोरूंदा में बन्द हो चुकी है। अब संस्था जोधपुर में कोमल कोठारी के पुत्र के संरक्षण में कार्यरत है।
2. राजस्थान संस्कृति परिषद्- जयपुर -
रानी लक्ष्मीकुमारी चूण्डावत द्वारा इस का संचालन वर्षों तक होता रहा। संस्था ने राजस्थानी भाषा व संस्कृति के उत्थान के लिए लोकगीत-लोक कथाओं का संकलन-प्रकाशन का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। चूण्डावत के निधन के पश्चात यह संस्था सक्रिय नहीं रही।
3. राजस्थानी भाषा प्रचार सभा, जयपुर - रावत सारस्वत द्वारा स्थापित इस संस्था के माध्यम से भाषा साहित्य एवं संस्कृति क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। संवत 2010 से मरुवाणी पत्रिका का प्रकाशन होता था। पत्रिका राजस्थान की संस्कृति आदि परम्परा क्षेत्र में प्रचार-प्रसार का कार्य हुआ।
4. भारतीय लोक कथा मण्डल, उदयपुर-
यह संस्था राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर को संजोये हुए है। राजस्थान के लोक संगीत के पक्ष को लेकर विवेचनात्मक कथा विश्लेषाणात्मक कार्य किया है, जो राजस्थान ही नहीं बल्कि भारतवर्ष में अग्रणी संस्था है। इसमें लोक कला सम्बन्धित खोज व अध्ययन पूर्ण सामग्री पर्याप्त रूप में निद्यमान है। संस्था ने राजस्थान के संगीत, लोकोत्सव, लोकनृत्य, लोक नाट्य, राजस्थानी की लोकानुरंजन तथा लोक कला क्षेत्र में शोध, सर्वोक्षण संग्रहालय एवं लोक जीवन की .... लोक गीतों का स्वर, सौन्दर्य आदि प्रमुख थी। लोक कला नाम की पत्रिका का प्रकाशन भी हुआ है।
5. राष्ट्र भाषा हिन्दी प्रचार समिति, श्रीडूँगरगढ
1961 में स्थापित यह संस्था राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति क्षेत्र मंम उल्लेखनीय कार्य किया है। संस्था गत 30 वर्षों से राजस्थानी जन चेतना व संस्कृति क्षेत्र में प्रमुख पत्रिका राजस्थली तिमाही का प्रकाशन तथा राजस्थान के इतिहास एवं संस्कृति को केन्द्र में रखते हुए गत 20 वर्षों से जूनी ख्यात शोध पत्रिका का प्रकाशन कर रही है। संस्था का अपना भवन है जिसमें 15000 पुस्तकों का संग्रह है। अभिलेख-रूक्के-परवाने व पुरातत्त्व सामग्री उपलब्ध है।
6. वीणा कला अकादमी संस्थान, जयपुर
के.सी. मालू द्वारा स्थापित इस संस्था की सह संस्था वीणा प्रकाशन, जयपुर द्वारा गत 15 वर्षों से स्वर सरिता नाम से कला-संस्कृति की मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया जा रहा है। पत्रिका के माध्यम से राजस्थान की सांस्कृतिक परम्परा सम्बन्धी स्तरीय-सामग्री का प्रकाशन होता है।
7. महाराणा मेवाड फाउण्डेशन, उदयपुर
संस्था मेवाड राज घराने द्वारा संचालित है। प्रतिवर्ष शिक्षा-साहित्य-संस्कृति व इतिहास क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवा पर पुरस्कार प्रदान करता है तथा राजस्थान से सम्बन्धित साहित्य का प्रकाशन भी किया जाता है।
8. लोक संस्कृति शोध संस्थान, चूरू
यह संस्था चूरू क्षेत्र की लोक संस्कृति व इतिहास विषय में उल्लेखनीय कार्य कर रही है। अब तक संस्थान ने मरूश्री साहित्य-संस्कृति व इतिहास पर केन्द्रित शोध पत्रिका का भी प्रकाशन किया है। संस्था में चूरू व शेखावाटी क्षेत्र की पुरातत्त्व सामग्री का संग्रहालय है। वहाँ व्यापारिक-व्यवसायिक व इतिहास सम्बन्धित अभिलेखागार भी है।-
9. साहित्य संस्थान (राजस्थान विद्यापीठ), उदयपुर
जनार्दन राय नागर द्वारा स्थापित यह संस्था 1941 ई स्थापित की गई थी। इसका कार्य क्षेत्र बागड-मेवाड व हाडौती प्रदेश रहा है। संस्थान साहित्य, संस्कृति व इतिहास पुरातत्त्व व कला क्षेत्र में शोध सामग्री संकलन, सम्पादन आदि लेखन का कार्य कर रही है। 1948 ई. से शोध पत्रिका का प्रकाशन भी किया जा रहा है। विभिन्न विषयों में सेमिनार-सम्पोजियम आदि का आयोजन भी होता रहा है। वर्तमान में स्थान जे.नागर विश्वविद्यालय, डीम्ड विश्वविद्यालय के अन्तर्गत संचालित है।
राजस्थान में संस्कृति के प्रचार-प्रसार व शोध कार्य अधिकांशतः साहित्यिक संस्थाएँ ही करती है। केवल संस्कृति सम्बन्धी कार्य करने वाली गैर-सरकारी संस्थाएँ नगण्य है। राजस्थान में संस्कृति क्षेत्र में कार्यरत स्वायतशाली व सरकारी संस्थान अवश्य सक्रिय है। कुछ प्रमुख संस्थानों का विवरण इस भाँति है -


राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर।
अकादमी राजस्थान सरकार की स्वायत् संस्थान के रूप में स्थापित है। भाषा-साहित्य एवं संस्कृति क्षेत्र में कार्यरत है। पुरस्कार-सम्मान, साहित्यकार एवं संस्कृति कर्मी को प्रोत्साहन दिया जाता है। जागती जोत पत्रिका का प्रकाशन भी किया जाता है।
राजस्थान संगीत-नाटक अकादमी, जोधपुर
राजस्थान सरकार की यह उपक्रम राजस्थान की संस्कृति को प्रोत्साहन हेतु राजस्थान का संगीत-नाटक-ख्याल-रम्मत परम्परागत गायन-वादन के क्षेत्र में उल्लेखित कार्य करने वाले संगीतकारों को प्रतिवर्ष पुरस्कार प्रदान किया जाता है। अकादमी की ओर से पत्रिका रंगयोग का प्रकाशन भी किया जाता है।
पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर
राजस्थान साहित्य गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा प्रदेशों की संस्कृति के संरक्षण के कार्य करनेवाली भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संचालित है।
जहवार कला केन्द्र, जयपुर
राजस्थान सरकार द्वारा संचालित यह संस्थान राजस्था का प्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र है जो लोककला, लोक साहित्य व राजस्थान की विभिन्न सांस्कृतिक परम्परा से सम्बन्धी प्रदर्शनी व प्रस्तुतियों का कार्य करता है। संस्थान में लोक सम्बन्धित विशाल पुस्तकालय व संग्रहालय है।
रवीन्द्र मंच, जयपुर
राज्य के संस्कृति विभाग द्वारा संचालित यह मंच जयपुर का प्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र है जिसमें समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहते हैं।
राजस्थान धरोहर, संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण, जयपुर
राजस्थान सरकार का यह उपक्रम राजस्थान की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का कार्य करता है।
राजस्थान कत्थक केन्द्र, जयपुर
राज्य सरकार द्वारा संचालित इस केन्द्र में राजस्थान में परम्परागत नृत्य व आधुनिक नृत्य की शिक्षा दी जाती है।
राजस्थान संगीत केन्द्र
राज्य सरकार द्वारा संगीत कला के अध्ययनार्थ यह संस्थान संगीत विद्यालय के रूप मं संचालित है।
राजस्थान में गैर-सरकारी क्षेत्र में सांस्कृतिक संस्थाओं की स्थापना स्वतन्त्र रूप में न होने का कारण सरकार में स्वतन्त्र संस्कृति विभाग का न होना। 1982 में राज्य सरकार ने संस्कृति मंत्री व संस्कृति विभाग की स्थापना की। विभाग का पर्याप्त बजट न होने व सांस्कृतिक संस्थाएँ स्थापित न हो पाई।
लेकिन बावजूद राजस्थान की आम-आवाम ने अपनी अनूठी समर्पण शक्ति और स्वाभिमान के कारण अपने सांस्कृतिक विकास को गति देने में कोई कोरकसर नहीं छोडी। ऊपर वर्णित सीभी संस्थाओं ने अपने-अपने क्षेत्र में लोक संस्कृति, पुस्तक संस्कृति और साहित्य प्रसार-प्रसार के लिए उल्लेखनीय कार्य कर राजस्थान के सांस्कृतिक वातावरण को जीवन्त बनाए रखा।
राजस्थान देश का सबसे बडा प्रान्त है। प्रान्त के विभिन्न अँचलों की अलग-अलग रीति रिवाज व परम्पराएँ है। राज्य का संस्कृति विभाग इस विषय में कोई कार्य योजनएँ बनाएँ और प्रत्येक जिले में सांस्कृतिक केन्द्र स्थापित करें।
सम्पर्क - राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति,
श्री डूँगरगढ, ३३१८०३, मो. 94144-16274