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संचार के नए माध्यम और राजस्थान का हिन्दी लेखन

दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
सन् 2005 में प्रकाशित और बाद में बहुत चर्चा में रही अपनी किताब द वर्ल्ड इज फ्लैट : अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ द ट्वंटी फर्स्ट सेंचुरी में थॉमस एल। फ्रीडमैन ने दुनिया की शक्ल बदलने वाले तीन नवाचारों की चर्चा की है- 1. पर्सनल कंप्यूटर, जिसने हमें डिजिटल कण्टेण्ट का सर्जक बनाया, 2. इण्टरनेट और वर्ल्ड वाइड वेब (222) जिसने हमें यह सुविधा दी कि हम अपनी विषयवस्तु को पूरी दुनिया में निःशुल्क कहीं भी ले जा सकते हैं, और 3. नब्बे के दशक में हुई सॉफ्टवेयर क्रांति जिसने सारे कम्प्यूटरों को एक-रूप किया। फ्रीडमैन की इस किताब के आने के बाद दुनिया में बदलाव की गति बहुत ज्यादा तेज रही है, और इसी तेज गति के कारण अब कंप्यूटर और इण्टरनेट हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं। लम्बे समय तक यह माना जाता रहा कि कंप्यूटर का प्रयोग करने और उस पर काम करने के लिए अंग्रेजी आना जरूरी है, और एक हद तक यह बात सही भी थी। लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता यह बाधा भी दूर हो गई और आज स्थिति यह है कि कंप्यूटर पर हिन्दी में भी सब कुछ किया जा सकता है। इस स्थिति को लाने में विभिन्न कंप्यूटर सॉफ्ट्वेयर कम्पनियों की बहुत बडी भूमिका तो है ही, यूनीकोड को भी कम श्रेय नहीं दिया जाना चाहिए। इनके कारण काम करना बहुत सुगम हो गया है। यूनीकोड ने भाषा की दीवारें जैसे पूरी तरह ध्वस्त कर दी हैं। बिना सम्बद्ध भाषा का फॉण्ट इन्स्टाल किए किसी भी कंप्यूटर पर (बशर्ते वह बहुत पुराना और धीमा न हो) किसी भी भाषा की सामग्री देखी-पढी या लिखी-भेजी जा सकती है। निश्चय ही यह बात हिन्दी के लिए एक वरदान है। और हिन्दी जगत् ने इसका लाभ भी भरपूर उठाया है।
हिन्दी की दुनिया में बहुत लम्बे समय तक नई तकनीक को लेकर दुविधा का भाव रहा है। दुविधा पूरी तरह तो अब भी दूर नहीं हुई है, लेकिन निश्चय ही इसमें बहुत कमी आई है और नई तकनीक की स्वीकार्यता खूब बढी है। न केवल युवा और युवतर लोग इस तकनीक को अपना चुके हैं, वयोवृद्ध लोग भी अब इससे अपनी दूरी कम करने में जुटे हैं। बेशक नई तकनीक को लेकर अब अन्य अनेक प्रकार की शंकाएँ-आशंकाएँ सामने आ रही हैं और उन पर गम्भीर विमर्श भी जारी है, लेकिन वह अलग मुद्दा है। मूल बात तो यहाँ यह है कि हमारे हिन्दी समाज ने इस तकनीक को अब बहुत अच्छी तरह अपना बना लिया है। यह कहते हुए मुझे अनायास ही इस शताब्दी के पहले दशक के वे दिन याद आते हैं जब मैंने जयपुर से अपनी एक मित्र अंजली सहाय के साथ मिलकर एक बेब पत्रिका - इंद्रधनुष इण्डिया शुरू की थी। मैं इस पत्रिका के लिए जब अपने लेखक मित्रों से रचनात्मक सहयोग माँगता था, तो उनमें से बहुत ही कम मित्र उत्साहित होते थे। उस समय जिन लोगों ने मुझे सहयोग दिया वह सहयोग उनसे मेरे आत्मीय रिश्तों के कारण ही मिल सका था। अधिकांश साथी हस्तलिखित या टंकित रचनाएँ देते और हम उन्हें फिर से टाइप करवा के अपनी पत्रिका में प्रकाशित करते। यह काम खासा असुविधाजनक और श्रमसाध्य था, लेकिन हमने किया। जब मैं अपने किसी मित्र को यह सूचना देता कि इंद्रधनुष इण्डिया में उनकी रचना प्रकाशित हो गई है तो उनमें से करीब-करीब सभी का आग्रह यह होता कि मैं उनकी प्रकाशित रचना का प्रिण्ट-आउट उन्हें भेजूँ, और मैंने ऐसा किया भी। बहुत कम रचनाकार साथी थे जो खुद कंप्यूटर खोलकर पत्रिका में अपनी रचना देखने के लिए प्रेरित या उत्साहित होते। हमने कोई छह सात बरस इस पत्रिका को चलाया, और आज इस बात पर गर्व भी होता है कि हमारी यह पत्रिका राजस्थान से निकलने वाली पहली ई पत्रिका थी। बाद में कुछ व्यावहारिक दिक्कतों के कारण इसका प्रकाशन अवरुद्ध हुआ। जब वे दिक्कतें दूर हुईं तब तक हिन्दी में इतनी ज्यादा वेब पत्रिकाएँ आ चुकी थीं कि एक और पत्रिका निकालना हमें गैर जरूरी लगा।
आज जब पीछे मुड कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि राजस्थान में भी हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स का चलन खूब बढा है और इस क्षेत्र में काफी काम हुआ है। वृहत्तर हिन्दी क्षेत्र में तो बहुत ज्यादा काम हुआ ही है और हर रोज उसमें नई चीजें जुड रही हैं। मेरी इंद्रधनुष इण्डिया के अलावा मुझे सबसे पहले नाम याद आता है हिन्दी नेस्ट का। इसका संचालन मनीषा कुलश्रेष्ठ करती हैं। यह हिन्दी के शुरुआती ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स में से है, हालाँकि तब मनीषा जी राजस्थान से बाहर रहती थीं। हिन्दी नेस्ट ने इण्टरनेट पर हिन्दी को विस्तार देने में बहुत बडी भूमिका अदा की है। खुशी की बात यह है कि अब राजस्थान लौट आने के बाद मनीषाजी ने इस प्लेटफॉर्म को एक नया आकार और नई पहचान दी है। हिन्दी नेस्ट के अलावा, आश्चर्य की बात है कि चित्तौडगढ जैसी बहुत छोटी जगह से एक उत्साही युवा माणक सोनी ने बहुत लम्बे समय तक अपनी माटी नाम से एक वेब पत्रिका निकाली और इसमें विविध प्रकार की सामग्री प्रकाशित की। बाद के दिनों में जयपुर से कथाकार रमेश खत्री ने साहित्य दर्शन नाम से काफी समय तक वेब पत्रिका निकाली। इधर हमारी बहुत सारी पत्रिकाएँ विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इनमें से अग्रणी है राजस्थान मूल के युवा आलोचक पल्लव संपादित बनास जन, जिसके करीब-करीब सारे अंक नॉट नल पर उपलब्ध हैं। मुझे आश्चर्य और क्षोभ इस बात का है कि हमारे यहाँ की पत्रिकाओं के अधिकांश सम्पादक अपनी पत्रिकाओं को ऑनलाइन सुलभ कराने के मामले में उदासीन, बल्कि इसके लिए अनिच्छुक हैं। मेरा तो मानना है कि अगर कोई पत्रिका आपने भौतिक रूप के साथ-साथ ऑनलाइन भी उपलब्ध होती है तो उसका प्रसार बढता ही है। इस मामले में मैं मधुमती की विशेष रूप से सराहना करना चाहता हूँ जिसका हर अंक ही नहीं हर कॉलम तक राजस्थान साहित्य अकादमी की वेबसाइट पर उपलब्ध रहता है और दुनिया भर में कहीं से कोई भी उसे पढ-डाऊनलोड कर सकता है। मैं यह सपना देखता हूँ कि हमारे प्रान्त से जितनी भी सहित्यिक पत्रिकाएँ निकल रही हैं, वे ऑनलाइन भी उपलब्ध हों।
यह लेख तैयार करने के सिलसिले में, बिना इस बात का विस्तृत उल्लेख किए जब फेसबुक पर एक पोस्ट लगा कर यह जानने का प्रयास किया कि साहित्यिक दुनिया के हमारे कौन-कौन साथी इण्टरनेट के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय हैं, तो मुझे इतने ज्यादा उत्तर मिले कि मैं स्वयं चकित रह गया। मैं यह भी जानता हूँ कि जितने साथियों के बारे में मुझे सूचना मिली उनसे बहुत अधिक इस आभासी दुनिया में सक्रिय हैं। लेकिन इसी के साथ यह भी सही है कि अधिकांश साथियों की सक्रियता फेसबुक पर अपनी रचनाएँ पोस्ट करने या बहुत हुआ तो औरों की रचनाओं पर अपनी प्रतिक्रियाएँ देने तक सीमित है। जब हम इससे आगे की स्थिति की पडताल करते हैं, तो पाते हैं कि इण्टरनेट के अन्य प्लेटफॉर्म्स पर हमारी सक्रियता बहुत ज्यादा नहीं है। इनमें से बहुत थोडे ही हैं जो अन्यत्र भी खूब सक्रिय हैं। और यह बात तब है जब हिन्दी में इण्टरनेट के तीन बडे पुरोधा राजस्थान से ही हैं। यशवंत व्यास और पवन झा उस समय से इण्टरनेट पर सक्रिय हैं जब हम में से अधिकांश के लिए यह दुनिया अनजानी थी। इन्हीं के साथ एक और नाम लेना जरूरी है। वे हैं बालेंदु शर्मा दाधीच। इन्होंने हालाँकि साहित्यिक काम बहुत कम किया है, कंप्यूटर और इंटरनेट पर हिन्दी को सक्षम करने में इनकी भूमिका बहुत बडी है और अब भी ये इसी काम में जी-जान से जुटे हैं। हाल के वर्षों में गिरिराज किराडू ने भी हिन्दी साहित्य को विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर, विशेष रूप से स्टोरी टेल के माध्यम से, लाने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इनके साथ-साथ पीयूष दइया के अवदान को भी स्मरण किया जाना जरूरी है जो हिन्दी साहित्य को समग्र हिन्दवी पर लाने में बडी भूमिका में थे। इधर राजस्थान मूल के प्रवासी साहित्यसेवी अनूप भार्गव एक बडी और महत्त्वाकाँक्षी परियोजना का संचालन कर रहे हैं। इस योजना का नाम है हिन्दी से प्यार है। अभी इस योजना के तहत साहित्यकार तिथिवार नाम से एक परियोजना चल रही है जिसमें हर रोज उस दिन जिस साहित्यकार का जन्मदिन होता है उस पर एक सुविचारित आलेख पोस्ट किया जाता है। मेरे यह लेख लिखने तक इस योजना में लगभग एक सौ लेख पोस्ट किए जा चुके हैं। अनूप भार्गवजी अब इसी योजना के तहत दूसरा उपक्रम शुरू करने की तैयारी में हैं जिसका शीर्षक है सौ कालजयी पुस्तकें। इस उपक्रम में हिन्दी की सार्वकालिक एक सौ कालजयी कृतियों का चयन कर उनमें से हरेक पर लगभग पन्द्रह मिनिट की अवधि के वीडियो तैयार करके साझा किए जाएँगे। खास बात यह है कि हिन्दी से प्यार है की यह सारी योजना पूर्णतः अव्यावसायिक आधार पर संचालित की जा रही है और दुनिया भर में फैले हिन्दी साहित्य-प्रेमी इसमें सहयोग कर रहे हैं।
राजस्थान के हमारे बहुत सारे मित्रों ने अपने यू ट्यूब चैनल चला रखे हैं जिन पर वे लगातार नई सामग्री अपलोड करके हम तक पहुँचाते रहते हैं। व्यंग्यकार संपत सरल, व्यंग्यकार अनुराग वाजपेयी, गीतकार बनज कुमार बनज, कहानीकार योगेश कानवा के यू ट्यूब चैनल खूब देखे जाते हैं। हिमांशु पण्ड्या के विद्यार्थियों के लिए दिए हुए लेक्चर्स गैर विद्यार्थियों में भी बहुत लोकप्रिय हैं। राजस्थान के कॉलेज शिक्षा विभाग ने एक अलग मंच बनाकर अपने प्राध्यापकों के जो लेक्चर्स अपलोड किए हैं उनमें साहित्य विषयक लेक्चर खूब हैं। मेरा भी एक यू ट्यूब चैनल है। हाल में बोधि स्टूडियो के बैनर तले कुछ किस्से कुछ कहानियाँ नाम से एक आकर्षक कार्यक्रम शुरू किया गया है। व्यंग्यकार संपत सरल ने अपने व्यंग्य और गीतकार दिनेश सिंदल ने अपनी कविताओं के पाठ की सीडी भी निकाल रखी है। कभी लोक कला मर्मज्ञ विजय वर्माजी ने भी अपने लिखे गीतों की एक सीडी निकाली थी। निश्चय ही इसी तरह के काम अन्य कई मित्रों ने भी किए होंगे। इधर नई तकनीक के रूप में ऑडियो बुक्स का चलन बढ रहा है और हमारे कई युवा रचनाकार इस क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। इरा टाक की ऑडियो बुक्स बहुत लोकप्रिय हुई हैं। इरा टाक एक साथ कईं प्लेट्फॉर्म्स पर सक्रिय हैं। उनकी रचनाओं की ई बुक्स भी खूब पढी गई हैं। मातृ भारती डॉट कॉम और प्रतिलिपि डॉट कॉम पर हमारे प्रान्त के बहुत सारे कथाकारों की रचनाएँ नियमित रूप से अपलोड होती हैं और खूब पढी जाती हैं। इस सन्दर्भ में बहुत रोचक और सराहनीय बात यह है कि युवा कथाकारों के साथ-साथ यशवंत कोठारी और एस भाग्यम शर्मा जैसे बडी उम्र वाले कथाकार भी इन माध्यमों का जमकर उपयोग कर रहे हैं। नॉट नल, स्टोरी टेल, बिंज हिन्दी, रेख्ता और हिन्दवी पर हमारे प्रान्त के अनेक रचनाकारों का सृजन अपनी उपस्थिति अंकित करवा चुका है और ऐसे रचनाकारों की संख्या निरन्तर बढती जा रही है। हमारी नई पीढी के अनेक रचनाकार इन विभिन्न प्लेटफॉर्म्स का सूझबूझ पूर्ण प्रयोग कर अपने लेखन को बडे पाठकवर्ग तक पहुँचाने की दिशा में भी सक्रिय हैं। इनमें कथाकार नवीन चौधरी का नाम मैं खास तौर पर लेना चाहता हूँ। वे इन माध्यमों का बहुत सर्जनात्मक उपयोग अपनी पुस्तकों के प्रचार-प्रसार के लिए भी करते हैं।
अशोक आत्रेय और हेमंत शेष जैसे रचनाकार शब्दों के अलावा रंगों और रेखाओं के साथ इन माध्यमों को उत्साहपूर्वक बरत और समृद्ध कर रहे हैं। प्रान्त के कईं रचनाकारों ने अपनी वेबसाइट्स भी बनवा रखी है जहाँ वे नियमित रूप से अपने बारे में जानकारियाँ और अपने सृजन की बानगियाँ साझा करते हैं। जयपुर की एक कम्पनी मार्क माय बुक इस दिशा में बहुत बढिया काम कर रही है। राजस्थान साहित्य अकादमी की अपनी वेबसाइट है और इसी तरह प्रभा खेतान फाउण्डेशन की विभिन्न परियोजनाओं की न केवल वेबसाइट्स हैं, वे इंस्टाग्राम, फेसबुक, ट्विटर, वॉट्सएप आदि पर भी अपनी गतिविधियों की सूचनाएँ नियमित रूप से देते हैं। राजस्थान मूल की किन्तु अब केरल में रह रहीं रति सक्सेना कविता केन्द्रित अपनी संस्था कृत्या के कारण पूरी दुनिया में जानी जाती हैं और उनकी ऑनलाइन उपस्थिति प्रशंसनीय है।
प्रान्त की कई संस्थाओं ने कोरोना महामारी के समय में, जब हमारा घरों से बाहर निकलना बहुत सीमित हो गया था, वेबिनार्स के माध्यम से साहित्यिक सत्रि*यता बनाए रखी। राजस्थान साहित्य अकादमी, राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ, जवाहर कला केन्द्र जैसी सार्वजनिक संस्थाओं के साथ-साथ अनेक सीमित साधनों वाली संस्थाओं ने भी इस विकट समय में साहित्यिक आयोजनों के ऋम को बनाए रखा। राजस्थान के ही एक निजी यू ट्यूब चैनल क्रेडेण्ट टीवी ने डियर साहित्यकार नाम से एक साप्ताहिक श्रृंखला चला रखी है जिसमें हर सप्ताह किसी साहित्यकार से संवाद किया जाता है। इसी चैनल ने हाल में डियर साहित्यकार सम्मेलन का आयोजन कर एक नई पहल की है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि राजस्थान की राजधानी में होने वाला दुनिया का सबसे बडा निःशुल्क साहित्य उत्सव जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल भी कोरोना के कारण आभासी अवतार में आने को विवश हुआ है। इस बार यह आयोजन वास्तविक और आभासी दोनों रूपों में होगा।
गौर तलब बात यह है कि आरम्भिक हिचकिचाहट के बाद अब हिन्दी समुदाय ने कंप्यूटर और इण्टरनेट को अपना लिया है और इसका बहुत अच्छी तरह से उपयोग किया जा रहा है। कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करना आसान हो जाने से और तकनीक के विकास से यह काम और ज्यादा तेज हो गया है। इधर आने वाले नए कंप्यूटर्स में बोलकर लिखने की सुविधा मिल जाने से ऐसे लोग भी इनका इस्तेमाल करने लगे हैं जिन्हें टाइप करने में असुविधा होती थी। यह सुविधा न केवल लैप टॉप वगैरह में सुलभ हो गई है, मोबाइल फोन तक में आ गई है। मोबाइल फोन और उसके बडे भाई टैबलेट ने कहीं से भी अपना काम करना सम्भव बना दिया है और इस सुविधा का लाभ उठाते हुए हमारे कई लेखक मित्रों ने अपनी पूरी की पूरी किताब ही इन उपकरणों पर लिख डाली है। तकनीक और विशेष रूप से सोशल मीडिया पर उसके उपयोग ने साहित्यिक वातावरण बनाने में भी बहुत बडी भूमिका निबाही है। यह आकस्मिक नहीं है कि कुछ बरस पहले राजस्थान निवासी सुपरिचित कथाकार लक्ष्मी शर्मा ने सोशल मीडिया पर आई कविताओं का एक संकलन स्त्री होकर सवाल करती है तैयार किया था। इस संकलन में अधिकांश रचनाकार ऐसी थीं जिन्होंने सोशल मीडिया पर ही लिखना शुरू किया था। उनमें से कई अब साहित्य की दुनिया में अपनी जगह बना चुकी हैं। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स ने एक पूरी पीढी को लेखन की तरफ उन्मुख किया है, यह बात विशेष रूप से रेखांकनीय है। इनमें से ज्यादातर प्लेटफॉर्म्स पर कोई सम्पादन-चयन व्यवस्था नहीं है, इसलिए अभिव्यक्ति में प्रयोग भी खूब होते हैं और बहुत बार अपरिपक्व रचनाएँ भी सामने आ जाती हैं। लेकिन यह सब विकास की प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है। इस बात से दुखी नहीं होना चाहिए।
मुझे यह देखकर बहुत खुशी होती है कि अब पुरानी और नई पीढी एक साथ विभिन्न प्लेटफर्म्स पर एक साथ सक्रिय हैं। उनमें परस्पर संवाद भी होता है, और स्वाभाविक है कि विवाद भी होता है। इन प्लेटफॉर्म्स पर जो प्रकाशित हो रहा है उसकी एक सीमा यह है कि रचनाकारों का बहुलाँश लाइक्स को जरूरत से ज्यादा अहमियत देने लग जाता है और बहुत बार लाइक्स की बडी संख्या को देखकर आत्ममुग्धता का शिकार भी हो जाता है। लाइक्स का मिलना रचना की गुणवत्ता से अधिक रचनाकार की सामाजिकता का परिणाम होता है, लेकिन रचनाकारों का एक वर्ग इस बात को समझने को तैयार नहीं है। यह गलतफहमी खुद उनके विकास के लिए हानिकारक है। एक और प्रवृत्ति इन प्लेटफॉर्म्स पर देखने को मिलती है, हालाँकि सौभाग्य से यह बहुत अधिक व्यापक नहीं है। प्रवृत्ति यह कि कुछ अत्यधिक उत्साही लोग दूसरों की रचना को कॉपी पेस्ट कर यह भ्रम पैदा करने लग गए हैं कि यह उन्हीं की रचना है। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म की एक बहुत बडी सीमा यह है कि यह त्वरित माध्यम है, और यहाँ ठहरकर, सोच-समझकर प्रतिक्रिया देने की प्रवृत्ति बहुत सीमित है। यहाँ तो आपकी रचना सामने आते ही तुरंत उस पर सराहना भरी प्रतिक्रियाएँ आने लगती हैं। बहुत सारी प्रतिक्रियाएँ तो शायद पढे बिना ही दे दी जाती हैं। रचना को पढकर उस पर सुविचारित प्रतित्रिज्या देने का चलन इन माध्यमों पर बहुत कम है, और यह बात रचनाकार के हित में नहीं जाती है।
कुल मिलाकर सूचना प्रौद्योगिकी के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर राजस्थान के साहित्यकार आज अधिक सक्रिय हैं और इनकी सक्रियता निरन्तर बढती जा रही है। यह शुभ संकेत है। जैसे-जैसे तकनीक विकास के नए क्षितिजों की तरफ बढ रही है वैसे-वैसे इस बढी हुई सक्रियता का लाभ सर्जनात्मकता को मिल रहा है। न केवल रचनाकारों की सर्जनात्मकता इससे लाभान्वित हो रही है, उनकी सर्जनात्मकता के गुणग्राहक भी बढ रहे हैं और इस तरह एक ऐसा माहौल तैयार होता जा रहा है जो साहित्यिक गतिविधियों के पल्लवन के लिए बहुत अनुकूल और उत्प्रेरक साबित होने वाला है।
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सम्पर्क - ई-2/211, चित्रकूट,
वैशाली नगर के पास, जयपुर-302 021
ई मेल : dpagrawalwy@gmail.com
मोबाइल : 90790 62290
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