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राजस्थान का रंगमंच और व्यावसायिकता

राघवेन्द्र रावत
दरअसल यह शाश्वत विषय है। आज से बीस साल पहले भी इस पर बात की जा रही थी, आज हम कर रहे हैं और आगे बीस साल बाद भी बात की जाएगी क्योंकि रंगमंच जिंदा रहेगा भले ही विकास की स्थिति में भिन्नता हो सकती है । यहाँ सवाल यह है कि क्यों बंगाली और मराठी रंगमंच की तरह राजस्थान का रंगमंच संपन्न नहीं हो पा रहा है ? यही सवाल किसी भी उत्तर भारतीय राज्य के लिए पूछा जा सकता है। अगर इस सवाल का जवाब ढूँढना है, तो भारतीय रंगमंच के, बरक्स राजस्थान के रंगमंच के विकास को समझना होगा। किन- किन पडावों से भारतीय रंगमंच गुजरा है उनकी पडताल करनी होगी एवं ऐतिहासिक संदर्भों को खंगालना होगा।
भारतीय रंगमंच में लोकनाट्य सदा से मौजूद रहा है, और संस्कृत नाटक हमारे यहाँ शास्त्रीय परंपरा के रूप में विकसित हुआ, लेकिन संस्कृत नाटकों के विकास की धारा मध्य काल में आते-आते रुक जाती है, लेकिन लोकनाट्य जीवित रहता है। उसके बाद पारसी थिएटर का युग आया। पारसी थिएटर भारत में कैसे आया, इसके बारे में बात कर ली जाए क्योंकि बंगाली और मराठी नाटक को तभी समझा जा सकता है।
मध्यकाल के मुगल शासकों की अभिरुचियाँ स्थापत्य कला, संगीत, शायरी, चित्रकला और नृत्य में थीं, लेकिन नाट्यकला में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। दूसरे मुगलों को युद्ध से ही फुर्सत नहीं मिलती थी। इस वजह से लोकनाट्य की धारा मंदिर, राजे- रजवाडों की ओर चली गई। वहाँ लोकनाट्य से जुडे कलाकारों, नृतकों और संगीतकारों को संरक्षण एवं आर्थिक मदद भी मिली। इस दौर के नाटकों में राजा- महाराजा और देवी देवताओं से जुडे कथानक चित्रित होते थे और यह नाटक मंदिरों, दरबारों और चौपालों में मंचित किए जाते थे।
भारतीय रंगमंच के विकास के ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में यह तथ्य भी महत्त्वपूर्ण है कि अठारहवीं सदी में अंग्रेजों के प्रभुत्व बढने के साथ मुगलों का असर कम होने लगा। आमतौर पर हर शख्स अपनी सांस्कृतिक विरासत के बीच रहना पसंद करता है उसी तरह भारत में रहने वाले अंग्रेज अपनी सांस्कृतिक विरासत के बीच रहना चाहते थे। अतः अपनी कला अभिरुचियों को संतुष्ट करने के लिए उन्होंने कई शेक्सपीरियन कम्पनियों को भारत बुला लिया। अंग्रेज बंगाल की संस्कृति पर भी अंग्रेजी असर डालना चाहते थे ,ताकि सांस्कृतिक गुलामी में भारतीय समाज को जकडा जा सके। इस कारण कई अंग्रेजी नाटकों के अनुवाद बांग्ला में हुए ,जैसे शेक्सपियर के जूलियस सीजर, हेमलेट और ओथेलो के मंचन बांग्ला भाषा में हुए। बांग्ला भाषियों में ये नाटक इतने लोकप्रिय हुए कि शनैः शनैः सभ्य और अभिजात्य बंगाली लोगों (एलीट क्लास ) के बीच, नाटक देखना जीवन का अंग बन गया। सबसे पहले जिस कम्पनी ने विक्टोरियन शैली के नाटक करने प्रारम्भ किए वह एक पारसी शख्स पेस्तनजी फ्रामजी की ओरिजिनल थिएटर कम्पनी थी, इस कारण यही कालान्तर में थिएटर पारसी थिएटर कहलाया। लोग टिकट लेकर नाटक देखते थे, यहीं से व्यावसायिक थिएटर की नींव पडी। भारत में भी सन 1753से लेकर 1853 तक कईं थिएटर प्ले हाउस, न्यू प्ले हाउस, ग्रांटरोड थिएटर, नेशनल थिएटर तथा कलकत्ता थिएटर आदि बम्बई- कलकत्ता में बने तथा कईं नाटक कंपनियाँ जैसे विक्टोरिया नाटक कम्पनी, अल्फ्रेड थी ऐट्रिकल कम्पनी आदि बनी जिससे प्रोसीनियम थिएटर की प्रस्तुतियाँ की जाने लगीं। इन नाटकों को देखने तब तक सामान्य और निम्नवर्ग के लोग नहीं जा सकते थे। अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध राजनीतिक आन्दोलन प्रारम्भ हो चुका था। धीरे- धीरे भारतीय समाज में औपनिवेशिक दवाब के विरुद्ध सांस्कृतिक निजता की चेतना जाग्रत होने लगी।
सांगली महाराज पटवर्धन के यहाँ विष्णुदास भावे काम करते थे, जिन्हें कन्नड भाषा, तमाशा, नाट्य कला, गायन, नृत्य और मूर्तिकला में महारथ हासिल थी। सन 1843 में सांगली महाराज के दरबार में कर्नाटक की एक मण्डली यक्षगान प्रस्तुति से महाराजा सांगली बहुत खुश होते हैं और विष्णुदास भावे को इसी तरह की प्रस्तुति तैयार करने के लिए कहते हैं, तब भावे कालिदास के शाकुंतल पर सीता स्वयंवर नाम का आख्यान लिखते हैं। इस तरह पहला मराठी नाटक सीता स्वयंवर 1843 में खेला गया। कोंकण में दशावतार की परम्परा थी, भावे राम के दशावतार तैयार करते हैं। लेकिन जैसे ही सांगली महाराज की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारियों द्वारा उन्हें वजीफा देना बन्द कर दिया जाता है, मजबूरन उन्हें सांगली दरबार छोड कर बम्बई जाना पडता है। लेकिन बम्बई जाने से पहले उन्होंने यह नाटक आस-पास के इलाके में किए, जहाँ से घूमंतू (टूरिंग थिएटर) का आगाज हुआ। कथानक की दृष्टि से इनमें नरसिम्हा और हरिश्चन्द्र नाटक ज्यादातर खेले जाते थे भावे के नाटक में एक सामूहिकता का भाव था। उन्होंने जो दशावतार आख्यान तैयार किए थे, उनके वे ग्रान्ट रोड थिएटर बम्बई में पाँच सफल शो करते हैं। सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शो के टिकट 1800 रुपये के बिके।
1860 में भारत में पहली बार रूसी नाटककार हैरासिम लेबडेफ और गोलक दास ने मिल कर दो अंग्रेजी हास्य नाटक डिस्गाइज तथा लव इज द बेस्ट डॉक्टर का अनुवाद बांग्ला भाषा में किया, जो कलकत्ता में मंचित हुए। इन दोनों नाटकों के प्रदर्शन टिकट बिक्री के जरिये हुए। यहाँ हमें यह सांस्कृतिक बदलाव देखने को मिलता है कि इन नाटकों को समाज के सभी वर्गों के दर्शक देख सकते थे। जबकि इससे पहले अंग्रेजी नाटकों के शो में सामान्य भारतीय दर्शक प्रतिबंधित थे।
भारतीय आधुनिक रंगमंच की शुरुआत माइकल मधुसूदन दत्त के नाटक समिष्ठा से मानी जाती है। माइकल मधुसूदन मूलतः कुलीन बंगाली परिवार से थे, लेकिन क्रिश्चियन धर्म अपना लेने के कारण उन्हें समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। माइकल मधुसूदन दत्त समिष्ठा नाटक के माध्यम से समाज में व्याप्त पाखण्ड और रूढिवादिता पर प्रहार करते हैं जिसकी एक सामाजिक अर्थवत्ता बनती है। यदपि माइकल मधुसूदन दत्त से पहले 1852 -1872 के बीच 157 नाटक बांग्ला में लिखे गए तथा कलकत्ता शहर में थिएटरों के अतिरिक्त बेलगछिया (1858),पाथुरिया घाट (1859),जोडासानको (1865) और शोभा बाजार देवबाडी आदि स्थायी थिएटर बन चुके थे।
सन1860 में बंगाल के दीन बन्धु मित्र ने एक नाटक नील दर्पण लिखा। यह नाटक भारतीय किसानों द्वारा नील के उत्पादन और उससे कथानक को केंद्र में रख तैयार किया था। इस नाटक को पहला प्रतिरोध का नाटक और यहीं से राजनीतिक रंगमंच का प्रस्थान बिन्दु माना जाता है।इसका पहला मंचन 1872 में कलकत्ता के नेशनल थिएटर में हुआ और यह भी टिकट शो था। 1872 से 1876 तक इस नाटक की प्रस्तुतियाँ देश के विभिन्न भागों में होती रहीं, लेकिन जब 1876 में लखनऊ में इस नाटक के प्रदर्शन को कुछ अंग्रेज अफसर भी देख रहे थे। उन्हें अंग्रेज अफसर को थप्पड मारने वाले प्रसंग नागवार गुजरा। उन्होंने चलते हुए नाटक की प्रस्तुति बीच में ही रुकवा दी। आधुनिक भारतीय रंगमंच के इतिहास में पहली बार ऐसा होता है कि चलते हुए नाटक को रोका गया। इसे नील फेनोमेनन (neel phenomenon ) के नाम से भी जाना जाता है। किसानों द्वारा नील की खेती करने से मना करके अंग्रेजों के नील अधिनियम के विरुद्ध अहिंसक आन्दोलन खडा किया। यहाँ आकर नाटक की सार्थक भूमिका बनती है। 19 फरवरी 1876 को ड्रामेटिक परफॉरमेंस एक्ट अंग्रेज सरकार द्वारा लाया जाता है जिससे प्रतिरोधात्मक नाटकों का सिलसिला रुक जाता है और नाटक फिर एक बार इतिहास और मिथक की ओर मुड जाता है।
उसके बाद अर्देंदु मुस्तफी, गिरीशचंद्र बोस और शिशिर भादुडी के नाटक हमारे सामने आते हैं। गिरीश चंद्र बोस के समय बंकिमचंद्र चटर्जी के उपन्यासों के नाट्य रूपांतरणों ने बांग्ला रंगमंच को जीवंत बनाए रखा। शिशिर ने नाटक में फोर्थ वाल कांसेप्ट को भी तोडा । यद्यपि अब यह नई बात नहीं रह गई है ,1998 में ओमशिवपुरी नाट्य समारोह, जोधपुर में रंगीली भागमती नाटक के हिजडे बने कई पात्र अचानक दर्शकों के बीच हाल से उठ कर स्टेज पर आते थे जबरदस्त रोमांचकारी दृश्य पैदा होता था। शिशिर ने लाइट्स के मध्यम से गहराई का एहसास पैदा करने का प्रयास किया।
हम देखते हैं कि जहाँ व्यापारिक केंद्र विकसित हुए वहाँ रंगमंच का आधारभूत ढाँचा भी खडा हुआ, नाटक को दर्शक मिले और आर्थिक संबल भी मिला। उत्तर भारत को अंग्रेज अशांत क्षेत्र मानते थे, राजे- रजवाडों का अंग्रेज सेनाओं से टकराव, आपस में टकराव ,यह चलता रहता था, इसलिए यहाँ के शासकों को युद्ध से ही फुर्सत नहीं मिलती थी, तब नाटक की सुध कौन लेता? इसीलिए यहाँ आधारभूत ढाँचा बीसवीं सदी के सातवें दशक में खडा होना शुरू हुआ। जैसा पहले चुका हूँ कि दो सौ साल की समृद्ध परम्परा रंगमंच की बंगाल में रही है और वहाँ आधारभूत ढाँचा न केवल पारसी थिएटर कम्पनियों के लिए शहर में ही विकसित हुआ, बल्कि छोटी जगहों पर भी खडा हुआ। लेकिन फिर भी उत्तर भारत में पारसी थिएटर और लोकनाट्य निरंतर चलता रहा।
बीसवीं सदी के प्रारम्भ में बंगाल में नवजागरण के समय भारतेंदु और टैगोर दोनों ही अपने नाटकों और निबन्धों के माध्यम से नाट्य शास्त्रीय परम्परों को पुनः स्थापित करने में लगे थे। 1881से लेकर बीसवीं शताब्दी के दूसरे तीसरे दशक तक रवीन्द्रनाथ टैगोर के नाटक बंगाल के रंगमंच और बंगाल से बाहर छाये रहे। उत्तर भारत में विवेकानन्द और दयानन्द सरस्वती के सुधार आन्दोलनों का असर बहुत बाद में दिखाई दिया।
जैसे-जैसे औपनिवेशिक काल में औद्योगिक विकास होता गया मध्यवर्ग का उदय हुआ। जिसके पास ऊँचाइयाँ छूने के सपने थे, तो असफलता से नीचे जाने का डर भी था। धार्मिक नगरों के रूप में बनारस, उज्जैन हरिद्वार आदि विकसित हुए वहीं औद्योगिक नगरों के रूप में बम्बई, कलकत्ता, मद्रास. भिलाई और जमशेदपुर जैसे नगर विकसित होते गए। इन नगरों में गाँव से मजदूर जीविकोपार्जन की तलाश में विस्थापित हुए। वहाँ उनके लिए जीविका के साथ साथ अपनी संस्कृति, बोली और घर की तलाश एक अहम् मुद्दा बन कर उभर रही थी। इसीलिए बाद के नाटकों में आम आदमी नायक रूप में प्रकट होता है। घर और व्यक्ति की अस्मिता के प्रश्न केंद्र में आ गए।
भारतेन्दु से पहले सम्पूर्ण भारत में विभिन्न शास्त्रीय और रामलीला और नौटंकी जैसे अर्धशास्त्रीय नाट्य रूप सामान्य ग्रामीण जन मानस की आस्था और धार्मिक मान्यताओं के दम पर फल-फूल रहे थे। हरेक लोक नाट्य की प्रकृति अपने स्थानीय लोकतत्त्व को लिए हुए और एक-दूसरे से अपनी निजता को कायम रखते हुए पारम्परिक रूप में अत्यन्त जीवन्त है।
इस तरह हम देखते हैं कि मराठी समाज में रंगमंच के प्रति लगाव सौ साल पहले पैदा हो गया था जो आने वाली पीढियों में संस्कारित हुआ। इसीलिए पूना में आज भी तमाशा नियमित रूप से व्यावसायिक ढंग से होता है। मराठी रंगमंच का दर्शक अन्य जरूरी कामों की तरह नाटक देखने के लिए भी एक निश्चित राशि बचा कर रखता है। आज उत्तर भारत के लोगों में इसी सांस्कृतिक जरूरत के बोध को जागृत करने की आवश्यकता है। प्रसिद्ध नाटककार हबीब तनवीर ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था -अगर हिंदी थिएटर को जीवन्त बनाना है तो पश्चिम के नियमों और मिसालों से काम नहीं चलेगा। खुद अपने घर में देखना होगा कि हमारे भण्डार में क्या पडा है? हमारी अपनी शास्त्रीय नाट्य परम्परा और लोक नाट्य की परम्परा की ओर देखना होगा। ब्रेख्त का सिद्धान्त तो हमारी लोक नाट्य परम्परा में पहले से है और हम पश्चिम की ओर देख कर उसकी नकल करने में लगे।
आजादी से पहले जब भारतीय रंगमंच राजाश्रय और देवालयों पर निर्भर था, तब राजस्थान में भी कमोबेश यही परिदृश्य था। महाराजा रामसिंह द्वितीय द्वारा जयपुर में 1878 में रामप्रकाश थिएटर का निर्माण कराया गया। उन्होंने प्रदर्शनकारी कलाओं के संरक्षण के लिए गुणीजन खाने का निर्माण भी कराया, जहाँ इन कलाओं से संबधित कलाकारों के परिवार रहते थे उन्हें आर्थिक सहायता दी जाती थी। तमाशा के कलाकार पण्डित बंशीधर भट्ट का परिवार राज्य में तमाशा नाट्य शैली के विकास के लिए लाया गया, उनके वंशज गोपी जी भट्ट व वासुदेव भट्ट और उनके पुत्र दिलीप भट्ट तमाशा की परम्परा को आगे बढा रहे हैं। 1875-81 के बीच बीकानेर में बीकानेर थिएट्रिकल कम्पनी, जोधपुर में राजपूताना मालवा थिएट्रिकल कम्पनी, जोधपुर और धोलपुर में राना निहाल सिंह लोकेन्द्रके संरक्षण में इम्पीरियल थिएटर कम्पनी आदि की स्थापना होती है।
1934 के आस पास बीकानेर में शम्भूदयाल सक्सेना द्वारा पोरोणिक प्रसंगों को आधार बना कर पारसी शैली में रम्मत खयाल, तमाशा आदि लोकनाट्यों के प्रयोग के साथ पंपापथ, सीताहरण, प्रहरी, आतिथ्य आदि कई नाटक लिखे और वे मंचित हुए। जयपुर और अलवर में महबूब हसन ने पारसी शैली के आगा हश्र कश्मीरी के लिखे कई नाटकों का मंचन व्यावसायिक रूप में किया।
लोक में नाटक जिन्दा था, लेकिन शहरी दर्शकों के मनोरंजन के लिए कोई रंगमंच की परम्परा दिखाई नहीं दे रही थी, दूसरी ओर अंग्रेजी रंगमंच की प्रतिक्रिया में पारसी थिएटर के रूप में व्यावसायिक रंगमंच जन्म ले रहा था। पूरे भारत वर्ष के गाँव-गाँव जाकर ये पारसी नाटक कम्पनियाँ नाट्य प्रदर्शन करती थीं। पारसी थिएटर में भले पाश्चात्य शैली हो, लेकिन भारतीय स्वभाव और भारतीय परिवेश के कारण भारतीय रंगमंच पर प्रभावशाली उपस्थिति उसकी रही है। इस सब के बावजूद पारसी थिएटर को उपेक्षा का भाव झेलना पडा। कहते हैं अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक पर आधारित नाट्य प्रस्तुति में कमर मटकाते दुष्यन्त को देख कर स्वयं भारतेन्दु और कई नाटककार रंगशाला छोड कर चले गए थे। गिरीश रस्तोगी कहती हैं कि स्वयं भारतेन्दु और प्रसाद भी पारसी रंगमंच के प्रभाव से बच नहीं पाए। दोनों की अभिनय शैली, रंग शैली ,गीत संगीत, पात्रों के प्रवेश-प्रस्थान में उसके प्रभाव देखे जा सकते हैं। चूँकि उत्तर भारत में यही नाट्यशैलियाँ प्रचलित थीं। अतः इस उपेक्षा भाव ने रंगमंच को उत्तर भारत में बहुत प्रभावित किया।
देवेन्द्रराज अंकुर लिखते हैं कि -आज रंगकर्मी एक ओर आर्थिक संघर्ष से जूझते नजर आते हैं, तो दूसरी ओर दर्शकों की कमी भी अखरती है, ऐसे में पारसी थिएटर को देखा जाए, तो न तो कभी दर्शकों की कमी रहती थी न ही आर्थिक अभाव होता था, ऐसे में पारसी थिएटर के मॉडल को भारतीय रंगमंच की परम्परा के रूप में विकसित करने पर विचार किये जाने की जरूरत है।
जैसा मैंने पहले कहा भारतेन्दुकालीन युग से हिंदी रंगमंच का आधुनिक काल माना जाता है, जहाँ से हमें वैज्ञानिक चेतना का प्रादुर्भाव दिखाई पडता है, लेकिन प्रकारान्तर से यहीं से अव्यावसायिक रंगमंच की शुरुआत भी मानी जाती है
1931 में सिनेमा के आने के बाद तकनीक की दृष्टि से तो भारतीय रंगमंच को समृद्ध हुआ, लेकिन एक बडा नुकसान यह हुआ कि पारसी थिएटर के कलाकार, संगीतकार और वादक फिल्मों में जाने लगे। वहाँ उनकी डिमाण्ड इसलिए भी ज्यादा हुई क्योंकि वे अभिनय और गायन दोनों कर लेते थे। परिणामतः पारसी थिएटर कमजोर होने लगा, लेकिन खत्म नहीं हुआ, बल्कि बहुतेरी जगहों पर आज भी जिन्दा है उनमें से एक उदाहरण अलवर के भरथरी नाट्य मंचन का लिया जा सकता है। कहते हैं कि 1932 में न्यू अल्फ्रेड थिएटर कम्पनी ने भी जयपुर में कई व्यावसायिक नाट्य मंचन किए राजस्थान के माणिकलाल डाँगी तथा कन्हैयालाल पारसी थिएटर के विख्यात रंगकर्मी रहे। 1938-48 के बीच कन्हैया लाल पँवार ने अनेक नाटक मंचित किए जिनमें रामू चनणा, ढोला मारू तथा चुनरी, सीता वनवास और कृष्ण सुदामा सहित कई नाटकों के व्यावसायिक मंचन में भाग लिया।
जब बंगाल में एक ओर अकाल पडता है, तो दूसरी ओर स्वतंत्रता आन्दोलन तेज हो रहा होता है तब 1943 में देश भर के प्रबुद्ध रंगकर्मी एकत्र होकर सांस्कृतिक आन्दोलन के रूप में इप्टा का गठन करते हैं। भारतीय रंगमंच के इतिहास में यह एक महत्त्वपूर्ण घटना थी जिसने नाटक और रंग कला की सामाजिकता को पुनस्र्थापित किया। हबीब तनवीर कहते हैं कि इस आन्दोलन ने पूरे देश में जो फिजां तैयार की उससे एक नई जागृति पैदा हुई। लोग महसूस करने लगे कि लोक -शैलियाँ और कलाकारों को भी शहरी थिएटर में जगह मिलनी चाहिए क्योंकि तभी किसी किस्म के परिवर्तन की सम्भावना पैदा हो सकेगी। उक्त घटनाओं से रंगमंच की सार्थक एवं नई धारा विकसित होती हमें दिखाई देती है। उस जमाने में थिएटर लोगों की एक सांस्कृतिक जरूरत थी, यहाँ तक कि जिन शहरों में थिएटर नहीं थे वहाँ टेंट लगा कर कंपनियां नाटक दिखाती थी।
आज अगर रंगमंच सांस्कृतिक जरूरत नहीं रहा, तो उसका बडा कारण यह है कि हिन्दी में या कहूँ उत्तर भारत के रंगमंच में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे दर्शक रंगमंच की ओर आकर्षित हो, उस पर काम करने की जरूरत है। रही सही कसर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया और मोबाइल क्रांति ने मनुष्य को रंगमंच ही नहीं, वरन समाज से अलग-थलग करके कर दी है। वह सोशल मीडिया पर रह कर अनसोसिअल हो गया है। इस जडता को तोडना जरुरी है और यह काम अच्छा रंगमंच ही कर सकता है।
शहरों में 1944 में पृथ्वी थिएटर जन्म लेता है। पृथ्वी थिएटर ने सिनेमा की प्रतिस्पर्धा में नई शैली के व्यावसायिक नाटक मंचित करके हिन्दी रंगमंच को पुनस्र्थापित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। पिछले कई साल से मकरंद नाट्य प्रस्तुतियाँ लेकर जयरंगम में आते रहे हैं जिसमें लोक नाट्य और आधुनिकता का समन्वय भी कई बार हमें दिखता है। कह सकते हें कि जयरंगम के जरिये राजस्थान में पेशेवर थिएटर पुनः जीवित हुआ।
1959 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्थापना हुई, लेकिन इसकी सही भूमिका अब्राहम अलकाजी के विद्यालय के निदेशक बनने के बाद प्रकाश में आई। भले ही उन पर अँगेरेजी दां होने के आरोप लगे हों, लेकिन अलकाजी ने पंद्रह वर्ष के कार्यकाल में अंग्रेजी नाटकों के साथ साथ भारतीय शास्त्रीय परम्परा और आधुनिक हिंदी नाट्य परम्परा को विकसित करने में अभूतपूर्व योगदान दिया। रंगमंच को नयी दिशा देने के लिए प्रयोगधर्मिता को बढावा दिया, लेकिन व्यावसायिक रंगमंच का कोई ब्लू प्रिंट उन्होंने नहीं दिया। एन.एस.डी में ज्यादातर छात्र उत्तर भारत से ही आते थे।
पाँचवें दशक तक राजस्थान में कोई रंगमंचीय गतिविधि दिखाई पडती, लेकिन शुरुआत में छठे दशक में रणवीर सिंहजी के निर्देशन में अंग्रेजी नाटक द मन इन द बालर्स हेट, उपेन्द्रनाथ अश्क द्वारा लिखित अंजो दीदी तथा हजरात आवारा द्वारा लिखित नाटक पुराने साहब का नया नौकर उन्हीं के मंचित हुए जिसमें डी.एन. शैली, पिंचू कपूर, सत्यानन्द, कुशी सरीन आदि भाग लेते हैं। 1954 में आधुनिक नाटक की शुरुआत जगदीश प्रसाद माथुर द्वारा लिखित कोणार्क और नेफा लद्दाख हमारा था नाटकों से होती है जिसमें सरताज माथुर रंगमंच से जुडते हैं।
1957 में राजस्थान संगीत नाटक अकादमी की स्थापना होती है। राजस्थान संगीत अकादमी की स्थापना से राजस्थान के रंगमंच के विकास में तेजी आती है और एक वातावरण की निर्मिति आरंभ होती है। 1965 से नियमित रूप से अकादमी नियमित रूप से नाट्य समारोहों का आयोजन कराती है और 1969 से प्रदेश के विभिन्न शहरों में नाट्य शिविरों का आयोजन भी अकादमी कराती है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि रंगमंच का विकास तो इनकी चिंता के केंद्र में रहा, लेकिन रंगकर्मियों के भविष्य के बारे में कोई दीर्घकालीन योजना आज तक नहीं बनाई गई, अतः रोजगार की अनिश्चितता ने रंगकर्मियों को रंगमंच से पलायन के लिए विवश किया।
देश भर में रवीन्द्र प्रेक्षागृह बनने लगे, इसी कडी में जयपुर में रवीन्द्र मंच बना। आठवें से नवें दशक तक का समय जयपुर थिएटर का स्वर्णिम युग था। तब टिकट खरीद कर लोग नाटक देखने आते थे। जोधपुर के नाट्य प्रेमी जयपुर नाटक देखने आते थे। तब रवीन्द्र मंच ही एक मात्र थिएटर हॉल था।
मोहन महर्षि 1965 में एन.एस .डी से पास होकर जयपुर आ गए। यहाँ उन्होंने पहला नाटक तत्कालीन संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष सर्वदानन्द द्वारा लिखित नाटक भूमिजा निर्देशित किया, जिसमें रमा पाण्डेय और मीनाक्षी ठाकुर ने प्रमुख भूमिकाएँ अभिनीत कीं। मोहन महर्षि ने पहली बार आधुनिक नाटक में बडे सेट का निर्माण किया। यह प्रोफेशेनल थिएटर के रूप में पहली प्रस्तुति जयपुर रंगमंच पर हुई जिसमें नाटक में भाग लेने कलाकारों को भुगतान किया गया। यहाँ तक कि मीनाक्षी की तो प्रति नाटक सौ रुपये फीस भी तय हो गई। कहने का तात्पर्य यह कि 1955-1970 के बीच मोहन महर्षि, ओम शिवपुरी और रणवीर सिंह के निर्देशन में आधुनिक नाटक शुरू हुए और एक नई पीढी भानु भारती ,सरताज माथुर ,इला अरुण ,डी एन शैली, एम् एम् भल्ला, मणि मधुकर, लक्ष्मीकान्त जोशी (जोधपुर), नरेंद्रमोहन (जोधपुर) तथा मीनाक्षी के रूप में तैयार हुई। उसके बाद प्रो .एम् .एम् . भल्ला के निर्देशन में शेक्सपियर के दो अंग्रेजी नाटकों का निर्देशन किया। हमीदुल्ला के नाटक एक और युद्ध और उलझी आकृतियाँ के भी मंचन हुए। मिस्टर ग्लाड नाटक का भी मंचन हुआ।
राजस्थानी नाटकों की शुरुआत 1973 में एस.एन. भटनागर द्वारा लिखित नाटक जेठ बहुली से हुई थी, जिसे सरताज नारायण माथुर ने निर्देशित किया था। 1978 में अर्जुनदेव चारण ने राजस्थानी भाषा में दो आधुनिक नाटक गवाही तथा मुक्तिगाथा लिखे। आठवें से नवें दशक तक का समय जयपुर थिएटर का स्वर्णिम युग था। तब टिकट खरीद कर लोग नाटक देखने आते थे। जोधपुर के नाट्य प्रेमी जयपुर नाटक देखने आते थे। तब रवीन्द्र मंच ही एक मात्र थिएटर हॉल था।
भानु भारती ने 1976 में राजस्थान विश्वविद्यालय में ड्रामा विभाग की स्थापना जिससे राजस्थान में आधुनिक नाटक के विकास में महत्त्वपूर्ण काम हुआ। 1976 में भानु भारती ने मोहन राकेश का नाटक आषाढ का एक दिन महारानी कॉलेज के सभागार में तैयार किया और फिर उसका मंचन रवीन्द्र मंच पर किया गया। 1969 से लेकर बाद में जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर, अलवर, कोटा तथा भरतपुर में बहुत-सी रंगमंचीय गतिविधियाँ हुई जिसमें नाट्य वर्कशॉप और मंचन है और आठवें दशक में बीकानेर के रंगमंच से एक समय नंदकिशोर आचार्य, निरमोही व्यास, ओम थानवी, वागीश कुमार सिंह, आनंद जोशी, कैलाश भारद्वाज, ओम सोनी, अशोक जोशी और इकबाल हुसैन जैसे महत्त्वपूर्ण नाम जुडे रहे हैं जिन्होंने कई नाट्य मंचन किए। वागीश कुमार के निर्देशन में वैटिंग फॉर गोदो तथा जुलूस नाटक मंचित किए गए।
जोधपुर रंगमंच पर बतौर अभिनेता दलपत परिहार का नाम उभरा। 1982-83 में दलपत परिहार ने पहला नाटक परतें निर्देशित किया। बाद में उन्होंने उदयपुर में रिजवान जहीर उस्मान के साथ मिल नाटक किए। दलपत परिहार ने शेक्स्पीयर के नाटक जूलियस सीजर का निर्देशन किया। कयूम अली बोहरा और मंगल सक्सेना से ही उदयपुर के आधुनिक रंगमंच की शुरुआत हुई। अर्जुनदेव चरण ने खडिया का घेरा और थैंक यू मिस्टर गलाड आदि नाटकों का भी निर्देशन किया।
नवें दशक में निर्देशक के रूप में एस वासुदेव, वासुदेव भट्ट, सरताज माथुर, साबिर खान, रिजवान जहीर, अशोक राही, रवि चतुर्वेदी, अर्जुनदेव चारण, लईक हुसैन, दलपत परिहार, शिवराम, दिनेश प्रधान, मदन मोहन माथुर, सुदेश व्यास, सौरभ श्रीवास्तव, नरेन्द्र अरोरा आदि हमारे सामने आते हैं।
पिछले दो दशकों में सैकडों नाटक राजस्थान में मंचित हुए हैं, लेकिन व्यावसायिकता की कसौटी पर उनमें से बहुत कम खरे उतरे हैं, और जो सफल हुए हैं उनमें अँधेर नगरी, दुलारीबाई, बकरी, अन्धा युग, कोर्ट मार्शल, आला अफसर, जिन लाहौर नहीं देख्या, आधे अधूरे, रंगीली भागमती, हत्यारे और महाभोज आदि हैं। इनमें अन्धायुग, बकरी, दुलारी बाई, महाभोज लोक नाट्य की ताकत से सशक्त बने हैं।
साठोत्तर राजस्थान नाट्यलेखन के परिपेक्ष्य में जो नाम उभरते हैं उनमें नन्दकिशोर आचार्य, स्वयं प्रकाश, हमीदुल्ला, मणि मधुकर, भानु भारती, रणवीर सिंह, रिजवान जाहिर उस्मान, शिवराम, सरताज माथुर, ताराप्रकाश जोशी, अशोक राही और अर्जुनदेव चारण प्रमुख हैं। नन्द किशोर आचार्य, भानु भारती, हमीदुल्ला, रणवीर सिंह और मणि मधुकर के नाटक देश के अन्य भागों में भी मंचित हुए। हमीदुल्ला के नाटक एक और युद्ध, दरिन्दे, उलझी आकृतियाँ और ख्याल भारमली बहुत खेले गए। वे सामाजिक विसंगतियों, भ्रष्ट नौकरशा-ही,आर्थिक संकट, दिशाहीन युवा पीढी और शोषण के विभिन्न रूपं को प्रतीकात्मक ढँग से व्यक्त करते हैं। ख्याल भारमली में ख्याल शैली का प्रयोग करते हैं। स्वयं प्रकाश का नाटक फिनिक्स भी चर्चित रहा।
नन्दकिशोर आचार्य के नाटक भी देहांतर, गुलाम बादशाह, हस्तिनापुर आदि इतिहास और पुराण प्रसिद्ध पात्रों की, नायकों की मानवीय दुर्बलताओं,आधुनिक युग के अंतर्विरोधों को भाषा और शिल्प के नुकीलेपन के साथ प्रस्तुत करते हैं। वाकई अगर इन नाटकों में भाषा और अंतर्वस्तु का नाटकीय इस्तेमाल है, तो फिर ये मंचित क्यों नहीं हो रहे? यह एक बडा सवाल है।
आठवें दशक में सर्वेश्वर और मणि मधुकर जैसे नाटककारों ने यह महसूस किया कि पश्चिमी दुनिया के रूपवादी शिल्प, आधुनिकता बोध, महानगरीय जीवन, बौद्धिकता और एलीट वर्ग की विशिष्टता में अभिजात्य सौदर्य में सीमित रह कर रंगमंच जनचेतना से कट रहा है। तब सर्वेश्वर का बृहद जन समूह के लिए दृष्टि लेकर बकरी‘ नाटक आया जिसमें लोकनाट्य का मुक्त सौदर्य था। राजस्थानी लोकनाट्य रूपों को लेकर मणि मधुकर ने रसगंधर्व, दुलारी बाई, इकतारे की आँख आदि नाटकों से नया विधान और गत्यात्मकता दी। रसगंधर्व एवं दुलारीबाई नाटक देश के सामाजिक-राजनीतिक विशेषकर राजनीतिक सन्दर्भों को लेकर चलने वाले, व्यवस्था, विसंगतियों में आम आदमी की जिन्दगी, व्यंग्य और विद्रोह की छटपटाहट के नाटक सिद्ध हुए ।
सातवें दशक में नुक्कड नाटक की विधा का प्रयोग व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध या किसी मुद्दे विशेष पर जनमत को सचेत करने और साम्प्रदायिक दंगों के विरुद्ध बहुत सराहनीय भूमिका रही है। राजस्थान में बीसवीं सदी के अंतिम दशक और इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ तक नुक्कड नाटक और लघु नाटकों के माध्यम से शिवराम, रिजवान जहीर उस्मान तथा साबिर खान ने परिवर्तनकामी चेतना को अपने साहित्य व नाटकों के जरिये व्यापक जन तक ले जाने का बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य किया। आज नुक्कड नाटक महज सरकारी प्रचार का माध्यम बन कर रह गया है, जो विचारणीय बिन्दु है।
एक बात और ध्यान देने की है कि बंगाल में नाटक बंगाली में लिखे जाते हैं और बंगाली कलाकार ही रंगमंच में भाग लेते हैं, और बंगाली ही दर्शक हैं तथा यही स्थिति मराठी और दक्षिण के रंगमंच की है। हिन्दी रंगमंच के साथ ऐसा नहीं है। नाटक बोले जाने शब्द की विधा है अर्थात् वह सृजनात्मक भाषा जो दर्शक को अपनी बात सम्प्रेषित कर सके। अगर नाटक में लोक नाट्य शैली के नृत्य और गीत की प्रभावी प्रस्तुति हो, तो कथानक के सम्प्रेषण में भाषा कहीं अवरोध उत्पन्न नहीं करती।
बंगाल में विजेन भट्टाचार्य, शंभू मित्र, ऋत्विक घटक, ब्रात्य बासु, बादल सरकार, रुद्र प्रसाद और सलिल चौधरी ने बंगाली रंगमंच को बहुत कुछ दिया। वहाँ उपन्यास और कहानियों के मंचन बंकिम और टैगोर के समय में शुरू हो गए, जबकि राजस्थान में रांगेय राघव और स्वयंप्रकाश के अतिरिक्त उन ऊँचाइयों के आस पास का कोई नाटककार या उपन्यासकार नहीं हुआ, और जो हुए, उनको भी हमने उचित सम्मान नहीं दिया। अन्यथा क्या कारण है कि राजस्थान में छहवें दशक में व्यावसायिक थिएटर की शुरुआत होने के बाद भी आज तक रंगमंच लोगों की सांस्कृतिक जरूरत नहीं बन सका। इसमें लोकनाट्य शैली और पारसी थिएटर से अलगाव तथा आधुनिक नाटकों में पश्चिम का अन्धानुकरण भी जिम्मेदार है। यानी जनता से जुडी नाट्य शैलियों के बजाय रसहीन ऊबाऊ आधुनिक नाटकों का चयन कर उनकी प्रस्तुति की। हमें अपनी जडें तलाशनी होंगी।
जहाँ तक मराठी रंगमंच का सवाल है वह भी आजादी से पहले से सक्रिय था और आम आदमी के जीवन का अंग बन चुका था भले ही हास्य नाटकों का बोलबाला रहा हो। विष्णुदास भावे के बाद आने वाले दशकों में झाँसीच्या रणछी नायक, सवाई माधवरावंच मृत्यु, अफजलखानच्या मृत्यु और मल्हारव महाराज जैसे उल्लेखनीय नाटक मंचित किए गए। 1880 में अन्नासाहेब किर्लोस्कर द्वारा रंगमंच में किर्लोस्कर नाट्य मण्डली के जरिये मराठी थिएटर में व्यावसायिक प्रदर्शनियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया और बाद में कईं नाटक कम्पनियों का गठन हुआ। मराठी रंगमंच में कोल्हाटकर, कृष्णजी प्रभाकर खादिलकर, गोविंद बल्लाल देवल, राम गणेश गडकरी और अन्नासाहेब किर्लोस्कर जिन्होंने उत्कृष्ट संगीत के साथ लगभग आधी सदी तक मराठी रंगमंच को संगीत नाटक से समृद्ध किया। इस शैली के मराठी रंगमंच के युग के दौरान महान गायक-अभिनेताओं जैसे बाल गंधर्व, केशवराव भोले,भाऊराव कोल्हाटकर, पुरषोत्तम एल देशपाण्डे और दीनानाथ मंगेशकर से समृद्ध हुआ। पुरषोत्तम एल देशपाण्डे, विजय तेन्दुलकर,सरी राम लागू और मोहन अगाशे का भी मराठी रंगमंच को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।
प्रयोगशीलता में ज्यादा सचेत न रहना भी रंगमंच के विकास में बाधक रहा है। विजेदान देथा की फितरती चोर ने हबीब तनवीर को विश्व प्रसिद्द नाट्यकृति दे दी। हबीब तनवीर के चरण दास चोर नाटक में प्रयुक्त लोक गीत-संगीत, नृत्य, संश्लिष्ट क्रियाएँ, जिन्हें लोक कलाकार ही संपन्न करते हैं। हम जब उसी कृति का नाट्य रूपांतरण बृज भाषा या राजस्थानी में करते हैं, तो वह फूहड प्रस्तुति बन कर रह जाती है। प्रभाकर श्रोत्रिय के नाटक सांच कहूँ, तो एक हजार साल पहले राजस्थानी में लिखित काव्य बीसलदेव रासो‘(नरपति नाल्ह ) को बनाया है जिसमें राजस्थानी रासो कथा और राजस्थानी लोककथा के साथ-साथ मौलिकता की भी अनुभूति भी होती है। समकालीन परिपेक्ष्य में नारी अस्मिता,नारी की मुक्ति का सशक्त नाटक बन कर उभरता है, और हम उसका उपयोग तक नहीं कर पाते।
उल्लेखनीय है कि उत्तर भारत में लगने वाले देशज मेलों की नौटंकी लोकनाट्य को अनुप्राणित करने में अहम् भूमिका रही है। छोटे शहरों में भरने वाले मेलों में नौटंकी प्रदर्शन मण्डलियाँ टेन्ट लगा कर कर एक एक महीने तक करती थीं, यहाँ तक कि मेला खत्म हो जाने के बाद भी नौटंकी कई दिनों तक चलती रहती थीं। गाँव का किसान, विस्थापित मजदूर सभी वहाँ अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुडा और प्रफुल्लित महसूस करता था। वर्तमान समय में जब मेले ही भीड को तरस गए हों ऐसे में नौटंकी की व्यावसायिकता भी प्रभावित हुई है।
जहाँ तक महाराष्ट्र और बंगाल का रंगमंच जनता से जुडा हुआ है, हमें भी जनता से जुडने के तरीके खोजने चाहिए। कस्बों में, देहात में नाटक को लोकनाट्यों के प्रयोग के साथ ले जाना होगा। स्वयं महाकवि तुलसीदास ने रामलीला की मण्डलियाँ बना कर घूमा करते थे। नाट्य महोत्सव से भले दर्शक आ रहे हैं, टिकट भी बिक जाते हैं, लेकिन इसके पीछे की अवधारणा अगर सिर्फ सरकार या अकादमी से अनुदान लेना भर है, तो रंगमंच कभी भी व्यावसायिक नहीं हो सकता। हमें जन अभिरुचि को पहचानना होगा, उससे परिवेश की निर्मिती के बाद ही रंगमंच लोगों की सांस्कृतिक जरूरत बन पाएगा। कुल मिला कर कहना है कि रंगकर्मियों को और सरकारी संस्थाओं को अपनी भूमिकाएँ व्यावसायिक रंगमंच को विकसित करने की दिशा में तय करनी होंगी, तभी नाटक उत्तर भारतीय समाज की सांस्कृतिक जरूरत बन पाएगा और राजस्थान का रंगमंच संपन्न हो सकेगा।

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