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राजस्थान की समकालीन कविता : कुछ नोट्स

राजाराम भादू
इस लेख में हम राजस्थान की समकालीन हिन्दी कविता पर विचार कर रहे हैं। स्पष्टतः इस शीर्षक में दो पद हैं- एक समकालीन कविता और दूसरा राजस्थान। यानी हमारा फोकस राजस्थान के कवियों द्वारा हिन्दी में रची जा रही समकालीन कविता पर ही केन्द्रित है।
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हम जिसे हिन्दी कविता कहते हैं, वह सामान्य अर्थ में तो मूलतः हिन्दी में रची गयी कविता है, भले ही यह दुनिया के किसी भी भू-भाग में रहकर लिखी गयी हो। फिर क्यों हम राजस्थान की कविता पर ही बात कर रहे हैं? हमारे प्रदेश के वरिष्ठ कवि नन्द बाबू (नन्द चतुर्वेदी) अकसर कहा करते थे कि हमें राजस्थान की कविता पर खास तौर से बात करनी चाहिए। हम देश भर की कविता पर चर्चा करते हैं, लेकिन हमारी कविता पर कहीं कोई बात नहीं करता। वे बडे क्षोभ से राजस्थान की कविता की व्यापक परिप्रेक्ष्य में उपेक्षा का जिक्र करते थे। मध्यप्रदेश का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वे कहते थे कि हमें भी अपने कवियों को उसी तरह प्रोजेक्ट करना चाहिए। अपने स्तर पर वे पूरे जीवन यह प्रयास करते भी रहे। हरीश भादानी की कवि के रूप में अच्छी खासी प्रतिष्ठा थी, लेकिन तब भी उन पर सलीके से लिखा एक लेख भी सामने नहीं आया था। नन्द बाबू ने साहित्य अकादमी के मोनोग्राफ के रूप में उन पर विस्तार से लिखा और यही उनकी कविता को समझने- विवेचित करने के लिए आगे एक प्रस्थान-बिन्दु साबित हुआ।
आज भी यह एक तथ्य है कि अन्य हिन्दीभाषी राज्यों की तुलना में मुख्यधारा में राजस्थान की कविता उपेक्षित है। जबकि गुणात्मक रूप से इधर यहाँ के कवियों ने नयी उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। इससे एक प्रश्न जुडा है कि यहाँ इस पर बात करने से कविता का कैसे भला होगा! प्रत्युत्तर यही हो सकता है कि हम कम से कम अपनी कविता की शक्ति और संभावना को तो रेखांकित करें, जो अन्यथा अलक्षित है।
इसके सामान्य कारण भी हो सकते हैं। राजस्थान देश के हिन्दी प्रदेशों में शामिल है और अनेक मामलों में यहाँ की स्थितियाँ भी हिन्दी की मुख्यधारा से विच्छिन्न नही हैं। यहाँ हिन्दी में साहित्य सर्जना का आरम्भ इसके भाषिक विकास के साथ ही हो गया था जो कि स्वाभाविक था। भारतीय स्वातन्त्र्य संघर्ष से हिन्दी के उभार और विकास का सम्बन्ध ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है। राजस्थान में भी हिन्दी और नागरी का प्रचार-प्रसार करने वाली सार्वजनिक संस्थाएँ और संगठन रहे हैं और इनमें से कई अपने पुरातन रूप में अभी भी विद्यमान हैं। प्रदेश में हिन्दी को प्रोत्साहन देने में आर्य समाज जैसे सुधार आन्दोलनों की महती भूमिका रही है। यहाँ ब्रिटिश सत्ता के साथ देशी रियासतों के विरुद्ध भी प्रजामण्डल के बैनर तले लम्बे आन्दोलन चले और उन्होंने भी हिन्दी को बढावा दिया। कई रियासतें, जो स्वतन्त्रता आन्दोलन को प्रत्यक्ष- परोक्ष समर्थन देती थीं, उन्होंने हिन्दी को अपनी शासकीय भाषा का दर्जा दिया। प्रदेश में शिक्षा को बढावा देने में मारवाडी सेठों का बडा योगदान रहा और इस शिक्षा ने नयी पीढी को हिन्दी के संस्कार दिए। भाषा की विकास प्रक्रिया के साथ ही साहित्य सृजन आरम्भ हुआ और इसमें भी गुणात्मक परिष्कार आता गया। इसके विधिवत् अकादमिक अध्ययन उपलब्ध हैं, इसलिए हम यहाँ इसके और अधिक विस्तार में नहीं जा रहे।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में जिस वीरगाथा काल का उल्लेख किया है, उसके अधिकतर साहित्यकार राजस्थान से हैं। वे अधिकांशतः पद्य में वर्णित आख्यान और इतिवृत्त हैं।
चूँकि राजस्थान कोई पृथक प्रायद्वीप नहीं है, तो यहाँ के एक सामान्य नागरिक का विश्व-बोध देश के किसी अन्य प्रदेश के नागरिक से बहुत भिन्न नहीं है। राष्ट्र-बोध के मामले में भी यही बात कही जा सकती है। और इसका प्रमाण लोकतान्त्रिक निर्वाचन की लहरों में राजस्थान से मिलने वाले रुझान हैं, जिनमें वह देश की चेतना के साथ शामिल होता है। बाकी मामलों में राजस्थान उत्तर भारत की सामाजिक-आर्थिक तथा सांस्कृतिक धारा का स्वाभाविक हिस्सा है। हिन्दी के मामले में भी यही बात लागू होती है।
तथापि भू-सांस्कृतिकी की अपनी अहमियत है और व्यक्ति की मानसिक बनावट को यह अपनी तरह से प्रभावित करती है।
एक रचनाकार की अन्तर्दृष्टि और संवेदना की निर्मिति में स्थानीय कारकों की निर्णायक भूमिका होती है और यह परिपार्श्व उसकी सर्जना में भी प्रतिबिम्बित होता है। दुनिया भर में कलाओं के मूल्यांकन प्रमाणित करते हैं कि अपनी जडों से गहरा जुडा सर्जक अपेक्षाकृत उत्कृष्ट कला तक पहुँचता है। इस मायने में राजस्थान की सृजनशीलता का किंचित् भिन्न और विशिष्ट चरित्र हो सकता है और स्वाभाविक ही वह यहाँ प्रतिबिम्बित होगा।
बहरहाल, उत्तर भारत में स्वातन्त्र्य संघर्ष के दौरान के विकसित होते हिन्दी साहित्य की प्रक्रिया में राजस्थान का अपना अवदान है। उससे पहले यहाँ भी ब्रज, ढूँढाडी, हाडौती, मेवाडी और मारवाडी जैसी लोक-भाषाएँ थीं और अभी भी हैं। इनमें भी सृजन होता रहा है। हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने पिंगल और डिंगल के भाषा रूपों का हिन्दी की निर्मिति के सन्दर्भ में जो विवेचन किया है, उससे हम परिचित हैं। हिन्दी के भाषाई आन्दोलन में राजस्थान ने महत्त्वपूर्ण शिरकत की, और जैसा कि उल्लेख किया गया, इसके प्रमाण में आप यहाँ के शहर-कस्बों में नागरी प्रचारिणी, राष्ट्रभाषा अथवा हिन्दी भाषा की संस्थाएँ-समितियाँ देख सकते हैं।
राजस्थान सामन्तवाद का गढ था। स्वातन्त्र्य-संघर्ष में यहाँ ब्रिटिश सत्ता के साथ-साथ सामन्तवाद को भी चुनौती दी गई थी। उत्तर भारत में संघर्षरत जमातों का यह सामान्य चरित्र था कि उसमें राजनीतिक लोगों के साथ समाज सुधारक, लेखक और पत्रकार भी शामिल थे। ऐसे में राजस्थान के कवियों ने प्रतिरोध की चेतना को अपनी कविताओं के माध्यम से हजारों लोगों तक पहुँचाया और जन-आन्दोलन को व्यापक बनाने में ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह किया। साथ ही, कविता की ऐसी धारा की सृष्टि की, जो आज तक हमारे कवियों के अंतःस्थल में प्रवहमान है और प्रतिरोध की चेतना को आगे बढा रही है।
राजस्थान में कविता के जन-सम्बोधन की परम्परा स्वातन्त्र्य-संघर्ष से विकसित हुई, जो अभी तक जन-आन्दोलनों के सभा-मंचों पर देखी जा सकती है। यह परम्परा कवि-सम्मेलनों से अपनी प्रकृति में काफी भिन्न और उद्वेलनकारी रही है।
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हिन्दी की आधुनिक कविता में नयी कविता, प्रयोगवाद और अकविता जैसी प्रवृत्तियाँ, उनके प्रभाव और इनके पीछे रही चिन्तन-सरणियाँ इस प्रदेश के कवियों को भी आवृत्त किये रही। उस दौर में प्रदेश से निकलने वाली पत्रिकाएँ इसकी ठोस गवाही देती हैं। हमारे यहाँ ऐसे कवि रहे हैं जिन्होंने उस दौर से लिखना शुरू किया। तदनन्तर नयी कविता- प्रयोगवाद-अकविता जैसे काव्य- आन्दोलनों को अस्तित्ववाद से जोडकर देखा गया और उसका तीव्र प्रतिकार भी हुआ। प्रगतिशील-जनवादी कविता ने सृजन की मुख्यधारा में जगह बनानी शुरू की। कविता परिदृश्य और काव्य-आन्दोलनों के क्रम में देखने की कोशिश करें तो राजस्थान में समकाल ही सबसे दीर्घ विस्तार वाला काल है जिसमें कई कवि-पीढियाँ एक साथ सक्रिय हैं। इसके बावजूद राजस्थान के भीतर और बाहर यह आम शिकायत है कि इस अंचल की हिन्दी कविता की कोई व्यापक दृश्यता अथवा छाप नहीं है।
यहाँ हमें समकालीनता पर थोडा ठहर कर विचार करना होगा। आखिर समकालीन अथवा समकालीनता के मायने क्या है? इसका एक मतलब तो कवि, कविता और सृजन की सापेक्षता से सम्बद्ध है जिसमें ये तीनों घटक एक काल विशेष में अन्तर्क्रियाशील हैं। दूसरे शब्दों में कवि का वर्तमान ही उसका समकाल है। तब प्रश्न उठता है कि समय के किसी खास सन्दर्भ में कईं बार कोई पुराना कवि या उसकी कुछ कविताएँ एकाएक याद आने लगती हैं। इस परिघटना को क्या कहा जाएगा? इसके विपरीत स्थिति भी होती है। कई कवि वर्तमान से मुँह फेर कर पुराने ढर्रे पर ही चलते रहते हैं। क्या इन्हें भी समकालीन कहना चाहिए? वर्तमान में कई शक्तियाँ एक साथ सक्रिय रहती हैं और इनके अपने अभिप्रेत होते हैं। तो यथार्थ के प्रति रचनाकार का रुख भी एक प्रमुख कारक के रूप में सामने आता है। कुल मिलाकर समकालीनता प्रायः अस्पष्ट और बहसतलब ही रही है। इस प्रसंग में अंग्रेजी कवि- समालोचक डब्ल्यू.एच. ऑडेन का कथन याद आता है जिसमें वे कहते हैं कि कुछ ऐसे कवि भी हमारे समकालीन होते हैं जो अब नहीं हैं। और ऐसे भी कवि होते हैं, लिख रहे होते हैं, फिर भी समकालीन नहीं होते।
राजस्थान की आधुनिक कविता को उच्च शिक्षा में कैसे पढाया जाता है, उसकी मुझे जानकारी नहीं है। लेकिन जितना मैंने पढा है, उसके अनुसार यहाँ राष्ट्रवादी काव्यधारा के बाद लगभग सीधे ही समकालीन कविता है। हिन्दी की आधुनिक कविता में राष्ट्रवादी धारा, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नयी कविता और अकविता जैसी काव्य-प्रवृत्तियों रही हैं जिनकी अपनी विशिष्ट अभिलाक्षणिकताएँ हैं। अकविता के कुछ पीढियों -भूखी पीढी, क्रुद्ध पीढी वगैरह में अपघटित होने के बाद यह दौर करीबन समाप्त हो जाता है। इसके बाद से, अर्थात् कमोबेश आठवें दशक से समकालीन नामकरण शुरू होता है, जो करीबन पाँच दशक से लिखी जा रही कविता के लिए प्रयुक्त होता रहा है।
हमारे यहाँ शुरुआती दौर में ही कवियों की जो कतार है उसमें गणेशीलाल व्यास उस्ताद से लेकर मनुज देपावत तक कहीं किसी कवि पर छायावाद का कोई प्रभाव परिलक्षित नहीं होता। दूसरे, हिन्दी की आरम्भिक पीढी में माने जाने वाले ये सभी कवि अपनी-अपनी लोक- भाषाओं में भी सृजनरत थे। इसके एक बडे उदाहरण के रूप में हम कन्हैयालाल सेठिया को देख सकते हैं। उनकी कविता यात्रा राष्ट्रवादी धारा से चलकर यथार्थवाद पर खत्म हो जाती है। वे छायावाद से करीबन बेअसर हैं और नयी कविता के प्रति संशयशील हैं। आखिर में वे हिन्दी से राजस्थानी की तरफ मुड जाते हैं।
जाहिर है कि आधुनिक कविता की विभिन्न धाराओं और प्रवृत्तियाँ को हिन्दी कविता में चीन्हने के लिए गम्भीर शोध की आवश्यकता है।
यह हमारी भी दुविधा थी कि उन कवियों का क्या करें जो अब दुनिया में नहीं हैं और इनमें कई असमय गुजरे युवा कवि भी शामिल हैं। हमने ऑडेन की अवधारणा को ही आधार बनाया है। हम उन कवियों की जरूर बात करेंगे जिनकी कविता हमारी स्मृति का हिस्सा बन गई है। सृजन इसी तरह तो व्यक्ति का अतिक्रमण कर अपनी स्वतंत्र इयत्ता बना लेता है। हम प्रसंगवश उन कवियों पर भी बात कर रहे हैं जो भले ही अब यहाँ नहीं रहते अथवा अब यहीं के होकर रह रहे हैं।
समकालीन कविता धारा के आरम्भ को यदि सातवें दशक से माना जाए, तो यह पाँच दशक के विराट् काल में विस्तारित है। इसके अलग-अलग दशकों पर फोकस करके बात की गई है। कईं पत्रिकाओं ने आठवें, नवें दशक और नयी शताब्दी के पहले दशक की कविता पर विशेषांक निकाले हैं। राजस्थान में भी इस काल-खण्ड में कवियों के छह समूह उभर कर आए हैं, इस तरह लग सकता है कि जैसे हर दशक में एक समूह आया। वैसे माना भी जाता है कि कविता में हर दस बाद नये कवियों की खेप आ जाती है। यहाँ प्रस्तुत समूह एक समय विशेष में उनकी सामूहिक पहचान के आधार पर बने हैं, तथापि सरल रैखिक नहीं हैं। हम इन्हें पीढी नहीं कह रहे ताकि किसी को पुरानी नहीं कहा जाया जा सके। समकालीन में कौन पुराना होता है? राजस्थान की समकालीन कविता को यह एक काल-क्रमिक तरतीब देने का प्रस्ताव है जिसमें सुधार की भरपूर गुंजाइश है।
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नन्द चतुर्वेदी ने लिखने की शुरुआत ब्रज भाषा की छन्दबद्ध रचनाओं से की थी जो उनके आखिरी दिनों में प्रकाशित होकर सामने भी आयी। लेकिन उनका पहला ही संकलन यह समय मामूली नहीं पूरी तरह से समकालीन प्रतीत होता है। यानी कि वहाँ नयी कविता अथवा अकविता की कोई छाया नहीं है। उनकी नजदीकी प्रगतिशील आन्दोलन से रही किन्तु लोहिया प्रणीत समाजवाद के प्रति उनकी निष्ठा असन्दिग्ध थी। कविता को वे राजनीतिक विचार की तुलना में कहीं गहरी विधा मानते थे। इस सन्दर्भ में वे लोकतान्त्रिक दृष्टिकोण के प्रबल पक्षधर थे। उनके द्वारा सम्पादित बिन्दु भी एक खुला मंच रही और उसका सन्दर्भ पूरी तरह समकालीन है। हालाँकि नन्द बाबू की कविता में बेबाकी से राजनीतिक पक्ष भी प्रस्तुत किया गया है। अपनी कविता, गद्य और चिन्तन के जरिये नन्द बाबू राजस्थान के कवियों के लिए रोल मॉडल बने रहे।
हरीश भादानी की ख्याति उनके गीतों से है। आरम्भिक दिनों में वे भी समाजवादी विचारधारा से प्रभावित रहे, किन्तु नन्द बाबू से भिन्न वे एम एन.राय के विचारों से प्रभावित थे। उनकी पत्रिका वातायन भी तमाम तरह की बहसों और रचनाशीलता के लिए खुला मंच थी। नयी कविता के समानान्तर छन्द में लिखने वाले कवियों के एक समूह ने नवगीत आन्दोलन चलाया था। उन्होंने गीति-काव्य में कई अनूठे प्रयोग किए। हरीशजी के गीत भी अनूठे हैं, लेकिन उनका नवगीत से क्या सम्बन्ध है,यह शोध का विषय है। बहरहाल, हरीशजी ने मुक्तछन्द में भी लिखा, यहाँ तक कि नष्टो-मोह जैसी लम्बी कविता लिखी। वे आपातकाल के बाद अस्तित्व में आए जनवादी लेखक संघ की स्थापना से जुडे और अन्त तक उसमें सक्रिय रहे। उन्होंने राजस्थान के पहले जनकवि के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित की।
यह आश्चर्यजनक लग सकता है कि एक ही व्यक्ति के विचार से प्रभावित एक ही जगह के दो रचनाकारों की कला-दृष्टि ही भिन्न नहीं होती, रचना शैली भी सर्वथा जुदा हो सकती है। नन्दकिशोर आचार्य भी एन.एन.राय से प्रभावित रहे और वे न केवल बीकानेर के ही हैं, बल्कि हरीश भादानी के अन्तरंग मित्रों में रहे हैं। वैचारिक भिन्नता के बावजूद मैत्री और संवाद रखने वाले ये विरल उदाहरणों में एक है। नन्दकिशोर आचार्य अज्ञेय सम्पादित चौथा सप्तक के कवियों में शामिल थे, इस तरह उन्हें बाकायदा नयी कविता से शुरुआत करने वाला कवि माना जा सकता है। आचार्य की कविता के तल में एक तरह की दार्शनिकता का प्रवाह रहता है। शनैः शनैः उनकी नाटककार और चिन्तक की छवि ने उनके कवि को आच्छादित कर लिया है। उनकी कविता यहाँ की कविता में एक अलग तरह का प्रस्थान है जिसे रेखांकित किया जाना है।
विजेन्द्र ने सचेत रूप से अकविता के प्रतिकार से आरम्भ किया। उन्होने आचार्य शुक्ल की लोक की अवधारणा का अर्थ-विस्तार किया है। यही नहीं, अपनी कविता के साथ वे अपना सौन्दर्यशास्त्र भी खडा करते गये हैं। इसे उन्होंने बारम्बार अपनी पत्रिका ओर के सम्पादकीय व अन्य लेखों तथा डायरी के माध्यम से प्रस्तुत किया है। समकालीनता के सन्दर्भ में उनकी कईं धारणाएँ पुरातन लग सकती हैं, लेकिन इन पर वे पूर्वग्रह की हद तक दृढ हैं।
ऋतुराज ने कविता के अतिरिक्त शायद ही कुछ लिखा है। उनकी चीन डायरी जैसे कुछ अपवाद को छोडकर वे कविता पर ही एकाग्र रहे हैं। वे अपनी कविता को लेकर अकसर मौन रहते हैं। बकौल सव्यसाची, उनके पहले संकलन मरणधर्मा तथा अन्य कविताएँ पर अकविता का कुछ असर था जिससे मुक्त होकर उन्होंने अपनी कहन शैली विकसित की। समकालीनता के इस दीर्घकालिक दौर में उनकी सक्रिय उपस्थिति सदैव लक्षित की गयी। जुगमन्दिर तायल एक दृष्टिवान प्रगतिशील कवि के रूप में उभरे थे, लेकिन कालान्तर में वे स्वयं अपनी कविता के प्रति उदासीन हो गये। ताराप्रकाश जोशी ने प्रगतिशील चेतना से अनुप्राणित गीत रचे, किन्तु उनका आग्रह सदैव गीत-विधा के प्रति ही बना रहा।
राजस्थान के ये ऐसे कवि हैं जिनकी सृजन-यात्रा नयी कविता के दौर से वर्तमान समकाल तक विस्तीर्ण रही है। इनमें से हमारे बीच हरीश भादानी और नन्द चतुर्वेदी नहीं रहे जिन्होंने प्रदेश की कविता को विस्तृत हिंदी पटल पर पहचान दिलाई।
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आगे हमने कवियों को युग्मों में प्रस्तुत किया है। बेशक इनकी कालिकता में व्यतिक्रम हो सकता है, लेकिन इनकी समय विशेष में उभरी सामूहिक पहचान को आधार बनाया गया है। हालाँकि मणि मधुकर इस प्रयुक्ति को एक बडी चुनौती देते हैं। उन्होंने अकविता के दौर से लेखन आरम्भ किया और उत्तर-धूमिल दौर में खण्ड-खण्ड पाखण्ड पर्व और घास का घराना से अपनी विखण्डनात्मक और विद्रोही दिखती कविता से खास पहचान बनाई। अपने समय की कहानी, कविता, और नाटक जैसी विधाओं में एक साथ लेखन किया, लेकिन जल्दी ही विलुप्त हो गए। मुझे लगता है कि उन्हें इस सन्दर्भ में भी देखना चाहिए कि सृजन में प्रभावी विचारणाएँ देशज प्रसंगों को कहाँ तक छूती हैं। उनके बाद की एक छोटी पंक्ति ने शायद उनके अनुभव से सीखा। इन कवियों में हेमन्त शेष, नन्द भारद्वाज, कृष्ण कल्पित, गोविन्द माथुर का उल्लेख किया जा सकता है।
हेमन्त शेष की शुरुआत ही जिस तरह से तमाम पूर्ववर्ती काव्य- आन्दोलनों से लगभग निरपेक्ष है, वह चकित करता है। उनकी कविता बिम्बधर्मी और मन्द स्वरों में सम्बोधित करने वाली है। वे हिन्दी के उन कवियों में शामिल हैं जिन्हें प्रकाश जैन की यशस्वी पत्रिका लहर ने प्रस्तुत किया। नन्द भारद्वाज काफी तैयारी के बाद कविता में उतरे। तब तक प्रगतिशील कविता की दूसरी परम्परा के रूप में मुक्तिबोध की कविता और सौन्दर्यशास्त्र का अवगाहन शुरू हो चुका था। क्यों पत्रिका के अंक इसके गवाह हैं जिससे मोहन श्रोत्रिय और स्वयप्रकाश के साथ नन्दजी भी जुडे थे। उनकी आरम्भिक कविता पर मुक्तिबोध का प्रभाव लक्षित किया जा सकता है। गोविन्द माथुर ने उत्तर अकविता के समय चालू मुहावरे की कविता से अपनी शुरुआत की थी। हेमन्त शेष और नन्द भारद्वाज के कवि-कर्म में जहाँ सातत्य और संगति है, वहीं गोविन्द माथुर का लेखन शुरुआत के बाद एक लम्बे समय तक स्थगित रहा। उन्होंने प्रगतिशील- जनवादी आन्दोलन के उत्तरवर्ती दौर में फिर से लिखना शुरू किया जो अनवरत रूप से जारी है। उनकी कविता का परिपार्श्व पुराना जयपुर शहर है, जहाँ की स्मृतियाँ उनकी अधिकांश कविताओं पर तारी हैं। उनके वैचारिक सरोकारों ने उन्हे ये सामर्थ्य प्रदान किया है कि वे नास्टेल्जिया को ही अपनी ताकत बना सके हैं। अनुभवों के सीमांत के बावजूद उनकी कविताएँ जरूरी सवालों की ओर ध्यान आकृष्ट करने में सफल रहती हैं। कृष्ण कल्पित ने अपने मशहूर गीतों से शुरुआत की और फिर काव्य-सृजन में जोखिम भरे उल्लेखनीय प्रयोग किए। कल्पित की कविता अपने अंदाजे बयां से ज्वलन्त मुद्दे और सूफियाना चिन्ताओं के साथ पाठक को सहयात्री बना लेती है। वे कविता में देश-काल का बार-बार अतिक्रमण कर हमें मनुष्यत्व के उदात्त मूल्यों से रूबरू कराने का जतन करते हैं। कल्पित ने अपनी कविता में अभिव्यक्ति का नितान्त नया मुहावरा प्रस्तुत किया है।

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बीसवीं शताब्दी के आखिरी दशक में समर्थ कवियों की एक बहुरंगी बृहद् टोली उभरकर आयी। इनमें सवाई सिंह शेखावत, हरीश करमचंदाणी, संजीव मिश्र, विनोद पदरज, अजन्ता देव, कैलाश मनहर, अम्बिका दत्त, अंजू ढड्ढा मिश्र, अनिल गंगल, प्रीता भार्गव, शैलेन्द्र चौहान जैसे नाम हैं। इनमें अनिल चौरसिया, देवदीप, अनिल लोढा, राम भाई, कुमार अहस्कर, सीमंतिनी, शिव योगी को और जोडा जा सकता है। सवाईसिंह शेखावत ने अनेक कविताएँ अलग श्ाँृखलाओं में लिखी हैं। इनमें घर-गिरस्त, चिट्ठी श्रृंखला से लेकर एक स्वतन्त्र संकलन के रूप में प्रकाशित मृतक श्रृंखला सहित और भी कुछ श्रृंखलाबद्ध कविताएँ हैं। ये तीव्र आवेग और अन्तर्वस्तु की सघनता के कारण गहरा प्रभाव छोडती हैं। उनकी स्वतन्त्र कविताओं में भी कई महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने चुनिन्दा कविताओं के अन्तर्पाठ के जरिये समीक्षा के क्षेत्र में प्रवेश किया। लेकिन जल्दी ही फेसबुक जैसे माध्यम पर त्वरित सराहना में फँसकर सरलीकरणों में उलझ गए। इससे इनकी कविता का प्रभावित होना भी स्वाभाविक था। संजीव मिश्र एक संजीदा कवि थे जो कविता के शिल्प को लेकर बहुत आग्रहशील थे। यद्यपि उन्हें अपने को कलावादी कहे जाने पर कोई गुरेज नहीं था, किन्तु वे महज कला-निर्भर कवि नहीं थे। उनकी कविता में संकेतों से गहरे अर्थ की ओर यात्रा होती है और वहाँ मनुष्य और प्रकृति के साहचर्य को लेकर मूल्यवान निष्पत्तियाँ हैं। उनका जाना हमारी कविता की बडी क्षति है। हरीश करमचंदानी की कविता मूलतः वक्तव्य प्रधान है। अपनी साफ राजनीतिक प्रतिबद्धता और संवेदना से वे सामान्य बयान को भी कविता में बदल देते हैं। उनमें व्यापक समाज की साझी विरासत के प्रति सम्मान भाव है। बच्चों पर लिखी उनकी कविताओं से उन्हें बेहतर समझा जा सकता है।
विनोद पदरज इस समय हमारे प्रदेश की कविता की अहम पहचान हो सकते हैं। वे सामान्य जीवन के भाव-लोक में उतर कर मर्मान्तक चित्रण करते हैं। एक बार फिर से उन्होंने करुणा की शक्ति को कविता के केन्द्र में ला दिया है। अम्बिकादत्त ने अपनी कविता में शिल्प और अन्तर्वस्तु दोनों के स्तर पर उल्लेखनीय विकास किया है। एक प्रछन्न किस्म का व्यंग्य उनकी कविता से पाठकीय साझेदारी को और पुख्ता कर देता है। अंजू ढड्ढा मिश्र की कविताएँ स्त्री मन की सूक्ष्म अनुभूतियों और द्वन्द्वों को संयत स्वर में उठाती हैं। दूसरी ओर अजंता देव की कविताएँ बहिर्मुखी, आक्रामक और गम्भीर अर्थ में राजनीतिक रही हैं। सीमंतिनी ने बेहतर किन्तु कम लिखा है। प्रीता भार्गव की ज्यादा चर्चा उनकी जेल के जीवन पर लिखी कविताओं की हुई है। जबकि दूसरी कविताओं में भी उन्होंने सामान्य स्त्री के सवालों को सशक्त अभिव्यक्ति दी है।
अनिल गंगल जनवादी कविता आन्दोलन से उभरे कवि हैं। उनकी कविता का पहला चरण बहुत प्रभावी रहा। वे देश भर की प्रमुख पत्रिकाओं में छपे हैं। किन्तु खुद को दोहराते हुए आगे के चरण में वे शिथिल होते गये। कविता की निरन्तरता के खास मायने हैं। इसमें लगातार आत्म- संधान और रचनात्मक उत्कर्ष अपेक्षित है। शैलेन्द्र चौहान ने लम्बा समय राजस्थान में गुजारने के बाद यहीं रहना तय किया है। उनकी कविताएँ भी देश की प्रमुख पत्रिकाओं में छपी हैं। उनके संकलनों पर औपचारिक समीक्षाएँ आयी हैं। किन्तु उनकी कविता अपनी कोई खास छाप नहीं छोड पायी है। इसका मतलब है कि आपकी कविता का सिर्फ व्यापक प्रसार ही काफी नहीं है। कविता की आन्तरिक शक्ति बढनियादी आधार है। इनमें से भी हर कवि की अपनी अलहदा अभिव्यक्ति शैली रही है।
कैलाश मनहर का काव्यात्मक विकास किसी किस्से-कहानी की तरह है। उनका पहला कविता संकलन एक तरह से गुमनाम रह गया था। उनके संकलन सूखी नदी की ओर लोगों का ध्यान गया जो एक लम्बी कविता श्रृंखला है। उसके बाद उनकी कविता ने उत्तरोत्तर विकास किया। इधर एक नया ही जनकवि कैलाश मनहर अवतरित हुआ है, जीवन और कविता में लगभग दुस्साहसी। हरीश भादानी के बाद वे ऐसे दूसरे कवि हैं जिसे लोगों ने ही यह दर्जा दिया है। लेकिन यहाँ कुछ ऐसे लोग भी याद आ रहे हैं जो नेपथ्य में जाने के बाद नहीं लौटे। कुमार अहस्कर मेधावी कवि थे। अपनी मुश्किलों के चलते वे कविता से विरत हो गये। बाद में उन्होंने कुछ-कुछ अगंभीरता से कहानियाँ लिखीं, फिर यह दुनिया छोडने तक इधर नहीं लौटे। अनिल लोढा की कवि के रूप में ठीक-ठाक शुरुआत थी, पत्रकारिता में जाने के बाद उन्होंने कविता से किनारा कर लिया। लेकिन अनिल चौरसिया ने ऐसा क्यों किया, यह अनुमान करना कठिन है। देवदीप राजस्थान में थे तो अच्छे कवियों में शुमार थे। कलकत्ता जैसे सुसंस्कृत शहर में भी उनकी कविता मुरझा गयी। राम भाई बहुत संभावना जगाने वाला कवि था। जिन्होंने उसकी एक गुरिल्ले का प्रेमपत्र कविता सुनी है, वे उसे भूले नहीं होंगे, अलबत्ता राम भाई को भूल गये हों। राम भाई खुद भी कुछ नहीं भूले हैं। कई बार खुद कवि के लिए जवाब देना मुश्किल होता है, कविता के अपने रहस्य हैं।
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प्रेमचंद गाँधी ने शताब्दी के संक्रमण में अपनी पहचान बनाई। खुद उनकी कविता में बहुत तरह के प्रयोग और ध्वनियाँ हैं। उन्होंने अनेक प्रेम कविताएँ लिखी हैं जो निजता , सम्बन्धों के समीकरण और भावनाओं के कोहराम को व्यंजित करती हैं। मायामृग का पहला संकलन उनके ही बोधि प्रकाशन से आया था जिसे संकोचवश उन्होंने ठीक से प्रसारित नहीं किया। आज भी वे कविताएँ लिख रहे हैं, लेकिन उनका कवि-व्यक्तित्व प्रकाशन के नेपथ्य में है। अनिरुद्ध उमट अपनी ही तरह की कविताएँ लिखते रहे हैं। भाषा के प्रति अनिरुद्ध का आग्रह बहुत प्रबल है जिसे कविता में वे स्वतन्त्रत्ता प्रदान करना चाहते हैं। उनकी कविता से साक्षात्कार में आपको अलग तरह की संलग्नता चाहिए, होगी लेकिन यह आपको निराश भी नहीं करेगी। गिरिराज किराडू राजस्थान से भारतभूषण पाने वाले अकेले कवि हैं। कुछ साल पहले विष्णु खरे ने भारतभूषण पुरस्कार पाये कवियों की टोह लेने को लेकर कुछ कहा था। गिरिराज की टोह लेने की जरूरत है। अमित कल्ला ने सौंदर्यशास्त्र में उच्च शिक्षा ली है। उनके पहले संकलन को साहित्य अकादमी ने अपनी युवा प्रतिभा प्रोत्साहन योजना में चयनित- प्रकाशित किया था। अभी वे पेन्टिग के साथ कविता की जुगलबंदी में पूर्णकालिक संलग्न हैं और उल्लेखनीय सृजन कर रहे हैं। पीयूष दइया राजस्थान से ही हैं, लेकिन रचना संसार में प्रवेश के बाद से ही वे बाहर रह रहे हैं। वे विभिन्न कला रूपों पर बडे समर्पित भाव से सुनियोजित काम करते हैं। ऐसी ही गम्भीरता उनकी कविता के प्रति है। अनिरुद्ध द्वारा जारी सूचना के अनुसार उनका हाल ही में नया संकलन आया है। विनोद विटठल की कविताओं ने भी आश्वस्त किया था। शायद कॅरियर के संघर्ष में उनकी कविता भी पीछे रह गई। वे भी राज्य से कहीं बाहर हैं।
हरिराम मीणा आज साहित्य में एक बडा नाम है। वे समकालीन साहित्य के आदिवासी विमर्श के प्रमुख सिद्धान्तकारों में शुमार हैं। उन्होंने अपनी रचना-यात्रा कविता से ही शुरू की थी। उनकी कविता में सुदूर देशज जीवन की धूप-ताप और संघर्ष स्वतःस्फूर्त रूप से अभिव्यक्त हुआ है। बाद में वे वैचारिक लेखन और उपन्यास की ओर प्रवृत्त हुए। यह काल-क्रम की विवशता है कि उनका उल्लेख इस जगह किया जा रहा है। उन्होंने कम समय में लम्बी यात्रा तय की है। पद्मजा शर्मा ने भी मद्धिम गति से शुरुआत की। रचनाकारों के साक्षात्कार, समीक्षाएँ, लेख, डायरी और उसके साथ कविताएँ- इसी के समानान्तर एक लेखक बनने की तैयारी यानी अध्ययन और चिन्तन- इसी का नतीजा है कि लेखन में पद्मजा की खास पहचान है। इन्दुशेखर तत्पुरुष ने संकोच के साथ इस दुनिया में हस्तक्षेप किया। एक अन्तराल के बाद आये संकलन में उनके कवि का आत्मविश्वास जाहिर हुआ है। पत्रकार त्रिभुवन की भी ऐसी ही कहानी है। उनकी पहले संकलन की कविताएँ समकालीनता की पूर्ण संगति में हैं इनका दूसरा संकलन दलित विमर्श को ही नये आयाम नहीं देता, बल्कि कविता के वितान में भी उद्वेलनकारी है। राघवेन्द रावत के कविता लेखन में न तो वैसी निरन्तरता है और न ही सन्नद्धता, यद्यपि उनकी प्रतिबद्धता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस सब की स्वाभाविक प्रतिच्छाया उनकी कविता पर भी है। ओमेन्द्र की कहानी भी ऐसी ही है। उनके दूसरे कविता संकलन का इंतजार है।
आनन्द संगीत तीव्र संवेदना के कवि थे। उनकी कविता और कहानियों में आकर्षक प्रयोग-धर्मिता है। आनन्द ने बहुत कम लिखा और जल्दी ही हमें छोडकर चले गये, लेकिन उनकी रचनाओं ने पूरे हिन्दी जगत् का ध्यान आकर्षित किया। आलोक शर्मा और आनन्द विद्यार्थी अच्छी कविताएँ लिख रहे थे और बेहतर तरीके से प्रकाशित भी हुए। फिर पता नहीं क्यों कविता से दूर चले गये। असल में, कविता का ताल्लुक व्यक्ति के आभ्यन्तर और उसकी भाव-दशा से बहुत गहरा है। कविता से जुडने के कारण जिस तरह प्रायः अपरिभाषित रह जाते हैं, उसकी तुलना में कविता से विरत होने के कारण कहीं अधिक रहस्यमय हैं।
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प्रभात और देवयानी की साथी पीढी एक रचनात्मक प्रस्थान बिन्दु लेकर आयी। प्रभात तो आज राजस्थान ही नहीं समकालीन कविता के अधुनातन प्रतिनिधि कवियों में एक हैं। प्रभात का पहला संकलन भी साहित्य अकादमी से आया और इसका परिदृश्य में प्रीतिकर स्वागत हुआ। इससे पहले प्रभात की कविताएँ हिन्दी की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छप चुकी थी और दिग्गज सम्पादकों के आलोचनात्मक निकष को पार कर चुकी थी। इसका एक सुखद प्रतिफल यह हुआ कि प्रभात की कविता ने एक बडा पाठकवर्ग बनाया है। उनकी कविता के धूसर दृश्य, जूझते चरित्र और आर्त-स्वर आपका आसानी से साथ नहीं छोडते। मनोज ने प्रभात के साथ ही लिखना शुरू किया था। उसकी कविता में अभिनव व्यंजना और दमक है। नौकरशाही में उसकी सृजनशीलता नेपथ्य में चली गई होगी, लेकिन एक संकलन भर कविताएँ तो वह लिख ही चुका था। उस संकलन को प्रकाशित होना चाहिए, तब शायद वह भी कविता की ओर लौट सके। देवयानी इसी समूह से है लेकिन अपनी असहमतियों और कन्विक्शन के साथ। उसकी कविता में एक संयत प्रश्नाकुलता के साथ उत्पीडितों के पक्ष में सघन संवेदना सदैव मौजूद होती है। प्रमोद ने एक बार तो तभी शुरूआत की थी। किन्तु एक लम्बे अन्तराल और बाहरी-भीतरी तैयारी के बाद प्रमोद जिस तरह की कविता के साथ सामने आए हैं, वह विवेचन के लिए भी नयी तैयारी माँगती है। इसी समय राजस्थान के धुर सीमान्त पर सुभाष सिंगाठिया और डिम्पल सहर कविता परिदृश्य में सामने आए, लेकिन हमने अपनी मुख्यधारा में उन्हें ठीक से शामिल नहीं किया। उन्हें पढने-सुनने और समझने की जरूरत है।
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जिन्हें साहित्य की पत्र-पत्रिकाओं में आते हुए लोग कहा जाता है, अब उन पर आते हैं। यहाँ साफ कर दें कि हमारा रवैया उन पत्रिकाओं जैसा नहीं है जो चंद पृष्ठ नये लोगों को कृपापूर्वक दे देते हैं। इन पंक्तियों के लेखक ने अपने सम्पादन में निकलने वाली पत्रिका मीमांसा में प्रायः नये रचनाकारों को ही अहमियत दी है। यहाँ इनका उल्लेख इसलिए संक्षिप्त है कि हम इनकी कविता को ज्यादा पढ नहीं पाये हैं। सतीश छिम्पा, मदनमोहन लडा और ओम नागर तो एक प्रकार से परिदृश्य में आ ही गए हैं। सतीश छिम्पा की प्रेम कविताओं में नयी तरह की संवेगात्मक परिघटना से साक्षात्कार होता है। मदनमोहन लडा की विस्थापन से जुडी आरम्भिक कविताओं ने ही ध्यान खींच लिया था। ओम नागर की कविता में उस यथार्थ ने फिर से अपनी वाजिब जगह पायी है जिसे उससे वंचित कर दिया गया था।
राजेश कमाल कथा और कविता दोनों में रचनारत हैं। सूर्यप्रकाश जीनगर का हाल ही में नया कविता संकलन आया है। राहुल बोयल और नरेश गुर्जर के भी पहले संकलन आये हैं।अशुल शर्मा को छत्तीसगढ की पत्रिका संकेत (सं. अनवर सुहैल) ने विशेष कवि के रूप में प्रस्तुत किया था। विजय राही ने उर्दू शायरी में पहचान बनाने के बाद बडी तैयारी से हिन्दी कविता में प्रवेश किया है। समकालीन कविता के आते हुए लोगों में कुछ और नाम हैं- रेवन्तदान चारण, अमिताभ चौधरी, हेमन्त परिहार, प्रियंका भारद्वाज, मानस ग्रेवाल, दशरथ सोलंकी, संदीप निर्भय और राजेंद्र देथा- जिनसे उम्मीद है।
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राजस्थान के कवियों के अवमूल्यन के कारणों की टोह लें तो एक कारण तो आलोचना का अभाव है। कवियों के मूल्यांकन के प्रति कोई उत्सुक और प्रतिबद्ध नजर नहीं आता। बाहर तो लोग आपको तब जानेंगे जब घर वाले आपकी विशिष्टताओं को रेखांकित करें। डॉ. विश्वम्भर नाथ उपाध्याय, डॉ. नवलकिशोर, डॉ. राघव प्रकाश जैसे आलोचक पहले रहे हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि यहाँ कविता और आलोचना का रचनात्मक संवाद नहीं रहा।
बाद में डॉ. जीवन सिंह और इन पंक्तियों के लेखक ने अपने समकालीन कवियों पर कुछ काम किया, लेकिन यह भी किसी कवि को तरतीब से प्रोजेक्ट करने के लिए काफी नहीं था। विडम्बना यह है कि हाल के करीब दो दशकों में कविता पर विमर्श क्षरित होता गया है। इन दशकों में कवियों की कई पीढियाँ एक साथ सक्रिय हैं किन्तु उनकी सर्जना पर आलोचनात्मक चिन्तन का अभाव रहा है। इस सन्दर्भ में एक अनुभव यहाँ साझा करना चाहता हूँ। बिहार से निकलने वाली प्रतिष्ठित पत्रिका जनपथ के दो अंकों का मैं ने अतिथि सम्पादन किया। ये क्रमश राजस्थान के कथा और कविता सृजन पर केन्द्रित थे जो मेरे आग्रह पर अनंतकुमार सिंह ने बडे मनोयोग से प्रकाशित किए। इनके लिए यहाँ के कथाकारों पर लिखने को तो फिर भी कुछ लोग तैयार हो गए, लेकिन कवियों पर कुल मिलाकर निराशा ही हाथ लगी। किसी तरह पूर्व प्रकाशित समीक्षा-लेखों अथवा ब्लर्व पर लिखी टिप्पणियों से ही काम चलाना पडा। वैसे यह कमोबेश सम्पूर्ण हिन्दी जगत् की समस्या है, किन्तु राजस्थान में स्थिति कुछ ज्यादा ही चिन्ताजनक है।
स्वयं कवि भी अपनी पुस्तकों के लोकार्पण जैसे अनुष्ठानों के प्रति ही अनुरक्त रहते हैं। वे कविताओं पर सामान्यतः किसी गम्भीर विमर्श को आमन्त्रित नहीं करते। इनमें से ज्यादातर कवियों का पाठकीय आधार भी कमजोर है। अब लेखक संगठन उतने सक्रिय नहीं हैं और अकादमी जैसी संस्थाओं की गतिविधियाँ भी ठण्डी पड गई हैं। ऐसे में प्रकाशन ही पाठकों तक पहुँचने के एक मात्र माध्यम हैं। हम देखते हैं कि हिन्दी पत्रिकाओं में राजस्थान के कवियों की उपस्थिति बहुत कम है। लघु पत्रिकाओं तक भी उनकी पहुँच नहीं बन पायी, जिसके चलते वे मुख्यधारा में अपनी दृश्यता नहीं बना पाये। उनकी कविताएँ विमर्श के भी अकसर बाहर रह गई हैं और उनका व्यापक पाठकवर्ग नहीं बन सका है। जबकि इन पंक्तियों के लेखक की विनम्र राय है कि यहाँ कम से कम आधा दर्जन ऐसे कवि हैं जिन्हें हिन्दी की समकालीन कविता के उत्कृष्ट कवियों में गिना जा सकता है। इसी के साथ यह भी कहना होगा कि यहाँ उल्लिखित अधिकांश कवियों पर स्वतन्त्र लेखों की दरकार है । हमारी सीमाओं के चलते हम उनकी कविता पर ज्यादा चर्चा नहीं कर पाये हैं।
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