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राजस्थान के प्रमुख लोक-कलाविद्

जीवन सिंह
यह तथ्य है कि लोक संस्कृति और लोक कलाओं की दृष्टि से राजस्थान की पहचान देश की अन्य लोकसंस्कृतियों के सम्मुख अलग और विशिष्ट रही है , व्यापकता और विविधता की दृष्टि से भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं रही है । यहाँ के लोक साहित्य के पूर्व मौखिक तौर पर रचे हुए आदिम साहित्य और उनकी संस्कृतियों की लम्बी अवधि के गुजरने के बाद खासतौर से मध्यकाल में जब पशुपालन के साथ कृषि-उत्पादन का विस्तार और एक नयी लोक-सभ्यता का विकास हुआ और उसमें विविधता आयी तथा उसके साथ कृषि-व्यापार का फैलाव हुआ, तब उससे जुडे हुए वर्गों और लोक-समुदायों ने अपने भावात्मक एवं रागात्मक जीवन की सामूहिक अभिव्यक्ति के लिए जो मार्ग चुना, उससे उस लोकजीवन से जुडे हुए साहित्य का न केवल निर्माण हुआ वरन् उसी से अनेक तरह की लोक कलाओं जैसे लोक गीत, लोक गाथा, लोक संगीत, लोक चित्रकला, लोक नाटक, लोक नृत्य आदि की अनेक सामूहिक भंगिमाओं की उत्पत्ति और विकास भी हुआ। समाज में धीरे-धीरे वर्ग-विभाजन की प्रक्रिया आरम्भ हो जाने के बाद ये लोककला रूप एक तरह के शुरुआती वर्ग-साहित्य के रूप में सामने आया जो तत्कालीन शिष्ट और शास्त्रबद्ध वर्गों के समानान्तर सामान्य श्रम लोक में विकसित होने और अपनी मौखिक उपस्थिति के कारण तत्कालीन शिष्ट और अभिजन वर्ग के शास्त्रीय साहित्य के समानान्तर लोक साहित्य कहलाता है । इस साहित्य की खास बात यह रही है कि इसके निर्माण में शास्त्रीय साहित्य की अपेक्षा लोक श्रम की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है जिससे इसमें साधारणता और सहजता जैसे मूल्य अभिव्यक्त होते रहे। जैसे साधारणता और सामूहिकता, सामान्य लोकजीवन की सबसे बडी शक्ति होती है और उसकी मानवीयता का आधार भी, वैसे ही उसके द्वारा कथित और प्रचलित उसका लोक साहित्य भी। जैसाकि हम जानते हैं कि लोक रचना की प्रकृति सामूहिक होती है। औपचारिक शिक्षा का अभाव होने के कारण लोक द्वारा निर्मित साहित्य मौखिक और वाचिक स्तरों पर ही चलता रहा है जो किसी तरह की शास्त्रीय रूढियों और बन्धनों से अपनी सामाजिक परिस्थितियों की वजह से दूर रहता है और जिसका मुख्य आधार व्यक्ति और समाजों के पारम्परिक सामूहिक जीवनानुभव होते हैं, इसलिए उनमें सभ्यतागत विकास की जटिल वैचारिकता अधिक न होने से पारम्परिक भावों और विचारों का पिष्टपेषण ही ज्यादा होता है, किन्तु उसमें सामूहिक अनुभूतियों की जैसी स्वाभाविकता और सहजता होती है वैसी शिष्ट और शास्त्रबद्ध साहित्य में कभी-कभी कबीर, जायसी, तुलसी और मीरां जैसे महान रचनाकारों में ही देखने को मिलती है। इनमें भी कबीर, जायसी और मीरां जैसे रचनाकार शास्त्र से दूर रहकर अपेक्षाकृत अधिक साधारण और सहज सत्यबोध वाले साहित्य की रचना करते हैं जो लोक भावनाओं के अधिक समीप होता है। इनके साहित्य में लोकानुभवों का ताप और ऊर्जा निखरकर सामने आते हैं। लोक साहित्य अपने समय के भीतर से निर्मित होने वाले उन मिथकों, कथानक रूढियों और धारणाओं को भी खूब काम में लेता है जो वैज्ञानिकता से ज्यादा अनुभव के तापों से गुजरकर आती हैं । लोक की कला विचारों से कम, भावों और अनुभूतियों के रथ पर सवार होकर आगे बढती हैं। आज हम सभ्यता के विकास के जिस दौर में आ पहुँचे हैं उस दौर में आकर लोक साहित्य और कलाओं की रचना-प्रक्रिया लगभग अवरुद्ध- सी हो गयी है। इसकी एक प्रमुख वजह हमारे जीवन से सामूहिकता, साधारणता और सहजता का छीजते जाना भी है। कहना न होगा कि लोक साहित्य साधारणता और सहजता के आम्र वनों की छाया के बिना नहीं फल फूल पाता। यद्यपि हमारे जैसे देशों में खेती-किसानी का आधार आज भी व्यापक स्तरों पर बचा रह जाने और पूँजी की नयी सभ्यता से किंचित् दूर रहने के कारण लोक साहित्य और लोक कलाओं के कुछ आंशिक रूप जहाँ तहाँ बचे रह गए हैं जिन्हें नये जमाने के उत्पादन-सम्बन्धों के बीच अन्तिम साँस लेते हुए देखा जा सकता है।
इस लोक सम्पदा को बचाने, फैलाने, संरक्षित करने और इसका रख-रखाव एवं इसकी महत्त्व विवेचना करने में पिछली सदी में ही राजस्थान में कुछ ऐसे विशिष्ट कला-व्यक्तित्व पैदा हुए जिनकी गति लोक और शास्त्र, जन और अभिजन, लिखित और वाचिक, अनुभव और विचार, व्यक्ति और समूह, देश और विश्व जैसे उभय स्तरों पर रही है। इन लोगों की खासियत यह रही है कि ये जितना शास्त्र को जानते और मानते थे उससे ज्यादा लोक और उससे सम्बद्ध जीवन और उसकी परम्पराओं और उनकी सामूहिक ऊर्जा को जानते थे। जो जानते मानते थे कि हमारी इन लोक-कलाओं की भूमिका केवल लोक रंजनकारी ही नहीं रही है वरन् लोक रक्षणकारी भी रही है । जिन्होंने लोक के बीच रहकर उनकी रचना-प्रक्रिया को न केवल जाना बल्कि उसका विवेचन, संग्रहण और संरक्षण कर उसका महत्त्व प्रतिपादन भी किया। राजस्थान के विभिन्न अंचलों में प्रचलित लोक साहित्य और लोक कलाओं के प्रति पूरी तरह से अपना जीवन समर्पित कर देने वाले लोग यद्यपि उँगलियों पर गिने जा सकते हैं इनमें चार-पाँच उल्लेखनीय नाम मुझे याद आ रहे हैं जिन्होंने राजस्थान की लोक विद्या और कला को समग्रता में जिया और इस जीवन-क्षेत्र में मन से त्याग भावना से काम किया, इनमें उदयपुर मेवाड से श्री देवीलाल सामर का नाम सबसे अग्रणी रहा है और उनके साथ और बाद में उदयपुर से ही डॉ. महेंद्र भानावत, जोधपुर मारवाड से श्री कोमल कोठारी और श्री विजयदान देथा तथा जयपुर ढूँढाड से प्रशासनिक अधिकारी रहे श्री विजय वर्मा के नाम लिए जा सकते हैं। इन सभी ने इस दिशा में व्यक्ति की तरह से तो काम किया ही, इससे ज्यादा ये लोक संस्था और स्कूल के रूप में बदले व्यक्तित्व के रूप में दिखाई देते हैं। महत्त्व की बात यह है कि आज भी इनका काम अप्रासंगिक नहीं हुआ है। सच तो यह है कि देश की सामान्य जनता के सामूहिक मनोविज्ञान को समझने और जन-सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास को जानने की दृष्टि से इनके द्वारा किया गया काम आज भी बडे काम का और महत्त्व का है। इनमें देवीलाल सामर जैसे महान् लोकविद् अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ विचारक विद्वान् सबसे अग्रणी हैं जिन्होंने इस कला के सिद्धान्तों को ही नहीं, बल्कि इसके व्यवहार क्षेत्र में भी डूबकर काम किया। इस कला को अपने समय की शिखर कला के रूप में स्थापित किया । इन्होंने राजस्थान के कठपुतली जैसे लोक नाट्य को जमीनी स्तर से ऊपर उठाकर विश्व स्तर पर उसका प्रदर्शन करते हुए दुनिया में भारत की लोक कला का लोहा मनवाया। भारत के विभिन्न प्रदेशों के पास लोक कला का अकूत खजाना मौजूद है, यह सामर जैसे लोक व्यक्तित्वों की सजग सक्रियता से हुआ। सच तो यह है कि लोक कलाओं की समझ, नजरीये और व्यवहार में देवीलाल सामरजी की किसी से कोई बराबरी नहीं है। वे अपनी इस कला में जितने डूबे हुए थे, उतना शायद ही राजस्थान में कोई दूसरा व्यक्तित्व रहा है। इस मामले में वे सबसे अलग और विशिष्ट कहे जा सकते हैं जिन्होंने न केवल लोकजीवन के क्षेत्र की विचार साधना की वरन् उसकी कर्म साधना भी। इस वजह से लोक कला की ऊर्जा और असर को उन्होंने जितना जाना और व्यक्त किया है, उतना शायद ही किसी और ने। लोक कला की बारीकियों और उसके निजत्व की जैसी विवेचना उनके कृतित्व में मिलती है वैसी शायद ही राजस्थान में किसी अन्य के पास हो। इसकी वजह रही है कि उन्होंने लोक कला को अपने जीवन को जीने के तरीके में बदल लिया था, तभी वे इस दुनिया में मील के पत्थर जैसा काम कर पाए। उनकी एक खास बात यह थी कि कला के मामले में उन्होंने कभी स्थानीय प्रादेशिक संकीर्णता को अपने पास नहीं फटकने दिया। उनका नजरिया स्थानीयता से लगाकर वैश्विक रहा। उन्होंने लोक कला की व्यावहारिक दुनिया में रहते हुए न केवल अपनी कला को विकसित किया वरन् अपने अनुभवों से उसे नए आयाम भी प्रदान किए। उसको उन्होंने जहाँ प्रदर्शन के स्तर पर उसे एक रूपाकार में बदला वहीं उसका लिखित विवेचन-विश्लेषण करते हुए अन्य लोक कलाओं और कलाकारों के लिए इस दुनिया का मार्ग सुगम किया। उनकी सबसे बडी बात है लोक कलाओं की भूमि का विस्तार एवं विकास। वे उदयपुर के विद्या भवन की अपनी एक अच्छी-भली शिक्षक की नौकरी को छोडकर लोक कलाओं की एक उपेक्षित, लेकिन अपने मन की दुनिया में आये जिसे कोई अपवाद स्वरूप ही कर पाता है। इसमें लोक कलाओं के लिए उनका त्याग एक उदाहरण की तरह है । लेकिन ऐसे व्यक्तित्व जो करते हैं वह सबसे अनूठा और अलग होता है और ऐसे कला-व्यक्तित्व ही कला-समाजों के सच्चे कीर्ति-स्तम्भ और आकाश-दीप होते हैं जो भविष्य को भी रास्ता दिखाने का काम करते रहते हैं। उनके जैसा बहुआयामी व्यक्तित्व विरल होता है। वे केवल उदयपुर मेवाड तक ही सीमित नहीं रहे वरन् उन्होंने पूरे राजस्थान और देश की लोक कलाओं की जमीन को समझने का काम कर उसकी सामान्य प्रवृत्तियों का उद्घाटन भी किया। उन्हीं की बदौलत राजस्थान के लगभग सभी अंचलों में अपने-अपने लोकांचलों की लोक कलाओं के प्रति महत्त्व-भाव पैदा हुआ अन्यथा प्रदेश का शिक्षित मध्य वर्ग अपनी इन सामाजिक सामुदायिक लोक कलाओं के प्रति एक तरह का हिकारत और गँवारू होने का भाव ही ज्यादा रखता रहा है। आज भी वह बहुत अधिक कम नहीं हुआ है। उसके विशिष्टता-बोध का अहंकार उसके जीवन को राहु की तरह ग्रसे रहता है ऐसे वातावरण में एक शिक्षित मध्य वर्ग के व्यक्ति का लोक कलाओं के क्षेत्र में पूरी तरह से डूबकर काम करना कोई सामान्य बात नहीं है। आज की पूँजी और बाजार केन्द्रित सभ्यता और शिक्षा दोनों ही इन क्षेत्रों में जिस तरह का अलगाव अपने बुनियादी सामाजिक जीवन के प्रति रखती हैं वैसा इससे पहले इतना नहीं था। कहने की जरूरत नहीं कि आधुनिक शिक्षा ने समाज में बहुध्रुवीय समाजों का निर्माण किया है जो आज और कई वर्गों में विभाजित होकर ज्यादा पेचीदा हो चुका है। मैं अपनी ही बात बतलाऊँ कि मैंने स्वयं 1961 में राजस्थान विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. करते हुए सामरजी के राजस्थान के अलीबख्शी ख्यालों से सम्बन्धित एक आलेख को पढकर अलवर के राठ अंचल के अली बख्शी ख्यालों का संकलन और इन पर काम करने का निश्चय किया था और उनकी तथा मेरे शिक्षक लोक कलाविद् और लोकानुरागी प्रोफेसर जी. एस. सत्येन्द्र की प्रेरणा से लोक साहित्य के प्रति मेरे मन में सम्मान और अनुराग एक साथ पैदा हुए। जिसका परिणाम हुआ कि मैं आज तक अपने मेवात और ब्रज अँचलों की लोक कलाओं के प्रति न केवल वैचारिक राग रखता हूँ वरन् इनकी व्यावहारिक दुनिया में भी हिस्सेदारी करने में मुझे कोई संकोच नहीं होता, जैसा कि आमतौर पर मध्यवर्गीय शिक्षित वर्ग में देखने को मिलता है। इसी के फलस्वरूप मैंने अपने गाँव की डेढ सौ वर्षों से चली आ रही रामलीला में लगभग पैंतीस साल तक (1975 से 2011 तक ) अपनी नौकरी करते हुए रावण जैसे प्रतिनायक किरदार की भूमिका अदा की । अभी दो साल पहले अपने रामलीला सम्बन्धी अनुभवों पर लोक में राम और जुरहरा की रामलीला शीर्षक से एक पुस्तक लिखी जिसका प्रकाशन गाँव के लोगों ने ही कराया। इससे पहले अलीबख्शी ख्यालों का लोकरंग शीर्षक से भी एक पुस्तक प्रकाशित कराई जिसे अलवर के राठ अंचल के पेहल-मुण्डावर के लोक कला रसिकों ने हाथोंहाथ लिया। कहने का तात्पर्य यह है कि इस सबके पीछे देवीलाल सामर जैसे लोकरत्नों की भूमिका रही है। यदि देवीलाल सामर जैसे कला-व्यक्तित्व और उनके लोक कला लेखन की प्रेरणा नहीं होती तो मैं भी अन्य मध्यवर्गीय शिक्षितों की तरह अपनी इन सामुदायिक लोक कलाओं के प्रति एक अलगाव और अजनबीपन का भाव ही रखता।
सामरजी ने लोक कलाओं के संरक्षण और संवर्धन का महत्त्वपूर्ण और भविष्यदर्शी काम भी किया, जो आज भी मील का पत्थर बना हुआ है और इसके लिए उदयपुर में ही भारतीय लोक कला मण्डल की जो स्थापना उन्होंने 1952 में कराई, वह किसी भी यूनिवर्सिटी से कम नहीं। हमारा दुर्भाग्य है कि वह आज तक लोक कला विश्वविद्यालय का रूप नहीं ले सका, जिसमें राजस्थान में प्रचलित सभी तरह की लोक कलाओं, लोक रूपों का अध्ययन किया जाता और राजस्थान से भाईचारे की एक बहुआयामी सांस्कृतिक दुनिया का सन्देश भी जाता। राजस्थान में ऐसे लोक संस्थान की इकाई हर अंचल- मारवाड, मेवात, ढूँढाड, शेखावाटी, वागड, हाडौती, ब्रज आदि में होनी चाहिए थी लेकिन लोक साहित्य और लोक कलाओं के प्रति जैसा उपेक्षा भाव सत्ता और नव धनाढ्य वर्ग में रहा है वह जगजाहिर है। 1932 से 1951 तक बीस वर्षों तक सामरजी ने उदयपुर के विद्या भवन में एक सांस्कृतिक शिक्षक के रूप में पूरी निष्ठा से अपना दायित्व निर्वहन किया। बाद में जब उनको लगा कि यहाँ रहते हुए उनका सपना पूरा नहीं हो सकता तो उन्होंने अपने लोक कला मण्डल की नयी राह का निर्माण कर एक अनूठा मानदण्ड प्रदेश और देश के सामने प्रस्तुत किया। उनके लोक व्यक्तित्व के कई आयाम हैं, किन्तु यहाँ उनके बारे में विस्तार से लिखने का न तो अवकाश है और न ही यहाँ उसके लिए स्थान है। इस सन्दर्भ में खुशी की बात यह है कि संगीत नाटक अकादमी, नयी दिल्ली ने 2020 में दो साल पहले ही उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर जोधपुर के डॉ. मोहनकृष्ण बोहरा द्वारा लिखित लोक के प्रथम शास्त्र-प्रणेता देवीलाल सामर शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित की है। देवीलाल सामर के ही सहयोगी- साथी डॉ. महेंद्र भानावत ने इस दिशा में उनके साथ और उनके न रहने के बाद खूब काम किया और एक निश्चित अवधि के लिए भारतीय लोक कला मण्डल उदयपुर के रचनात्मक दायित्व को सम्भालते हुए लोक कलाओं की कई दिशाओं में काम किया। डॉ.भानावत ने उदयपुर, डूँगरपुर और बाँसवाडा के भील सरीखे आदिम समुदाय की कला गवरी नाट्य के उद्भव और विकास पर महत्त्वपूर्ण काम कर भारतीय लोक कला मण्डल से 1970 में प्रकाशित कराया, जिसकी विस्तृत भूमिका देवीलाल सामरजी ने लिखी है। इसी तरह भानावतजी ने राजस्थान के तुर्रा कलंगी ख्यालों पर काम किया। जिनके बारे में 1968 में एक पुस्तिका लिखकर डॉ. भानावत ने भारतीय लोक कला मण्डल से प्रकाशित कराई। लोक कला की दुनिया में काम करते हुए उन्होंने राजस्थान के विविध लोक कला रूपों पर काम किया और उनका पुस्तकों के रूप में प्रकाशन का काम कर न केवल इस काम का संरक्षण किया वरन् उसकी महत्त्व-विवेचना भी की । उनके लोक कला से सम्बन्धित पचास से भी ज्यादा प्रकाशित ग्रन्थ इसके प्रमाण हैं। सन् 1978 की बात है तब मैं बूँदी कालेज में पदस्थ था , उस समय क्वार का महीना था जो देश में रामलीलाओं का मौसम होता है इस वजह से डॉ.भानावत का लोकानुरागी मन चुप न रह सका। बातचीत होते होते रामलीला तक जा पहुँची, तब उन्होंने इस बारे में मेरा एक इंटरव्यू ही ले डाला और उसका अभिलेखीकरण करके तत्कालीन साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छपने के लिए भेज दिया जो वहाँ प्रकाशित भी हुआ, जिसे उन्होंने 2002 में प्रकाशित अपनी लोक कलाओं से सम्बन्धित एक संकलन ग्रन्थ-लोक कलाओं का आजादीकरण में शामिल करने योग्य समझा। इस पुस्तक से जाहिर होता है कि डॉ. भानावत की लोक भावना जहाँ भी जो उनको मिला है, उसे बचाने की कोशिश उन्होंने की है ।
लोक कला के क्षेत्र में एक बहुत बडा और प्रतिष्ठित नाम जोधपुर मारवाड के लोक कलाविद् श्री कोमल कोठारी का रहा है जिनके काम की प्रकृति कुछ दूसरी तरह की रही है ।
कोठारीजी ने लोक कलाओं के सभी रूपों के प्रति पूरी निष्ठा रखते हुए भी लोक संगीत के सभी स्तरों पर डूबकर काम किया। लोक संगीत में भी पश्चिमी राजस्थान का खासतौर से जैसलमेर का अंचल उनकी लोक-साधना का केन्द्र रहा। उनका जन्म जोधपुर में हुआ लेकिन शिक्षा-दीक्षा के लिए वे उदयपुर भी गए । उनकी खासियत है कि वे लोक संगीत की गहराइयों में जितने गए हैं, उतना बहुत कम लोग जा पाते हैं। लोक संगीत के विभिन्न वाद्यों तथा गायन कला दोनों के आन्तरिक कला-रहस्यों का उद्घाटन करने का महत्त्वपूर्ण काम कोमलजी ने किया। आज हालत ये है कि उस काम को कोई आगे ले जाने वाला नहीं है। उनकी खास बात यह है कि जिसे स्वयं गायक कलाकार भी नहीं समझते थे, उसे उन्होंने समझकर लोक कलाकारों को बतलाया जिससे कि लोक कला का छिपा हुआ वैशिष्ट्य सामने आ सके। मैंने जोधपुर स्थित उनके लोक वाद्य संग्रहालय को देखा है । ऐसा काम करने वाला फिलहाल राजस्थान में अब कोई दूसरा नहीं है। उन्होंने लोक कलाओं को स्थानीय अर्थ में तो समझा ही साथ ही उसकी संभावनाओं को विश्व सन्दर्भ में समझने की कोशिश की। वे मारवाड के लंगा और माँगनियार कलाकारों द्वारा गाये जाने वाले विशेष लोक संगीत की पहचान कर उसे विदेशों में ले जाकर भारत की लोक कला का लोहा मनवाया। उनकी जोडी लोक कथाओं के संकलन कर्ता और उनके पुनर्रचनाकार विजयदान देथा के साथ इतनी गहरी रही कि दोनों ने मिलकर देथाजी के गाँव बोरुन्दा में 1960 में लोक कलाओं के लिए रूपायन के नाम से एक संस्थान बनाया और प्रेरणा के नाम से पत्रिका निकाली। देश को आजादी मिलने के बाद छठे दशक से ही इन दोनों ने लोक कला की दुनिया में काम करना शुरू किया और उसे शिखर पर पहुँचाया। कोमलजी ने लोक कलाओं, खासकर लोक वाद्यों के संरक्षण का जो महत्त्वपूर्ण एवं विश्वस्तरीय काम किया है, वह राजस्थान जैसे प्रदेश की महिमा का संरक्षण भी है। कोमल दा तो दरअसल स्वयं एक विश्वविद्यालय की तरह हैं। लोक संगीत के लोक सुरों के प्रति जैसी गहरी अन्तर्दृष्टि उनके पास थी, वह आज कहीं खोजे नहीं नजर आती। कोमल कोठारी से प्रसिद्ध कहानीकार-कवि उदय प्रकाश की लोक कलाओं से सम्बन्धित एक बातचीत में उदय प्रकाशजी ने जब इस बारे में एक सवाल किया तो कोमल जी ने उत्तर देते हुए जो बतलाया, उसे उन जैसा अप्रतिम लोक कला में निष्णात व्यक्तित्व ही बतला सकता था। हीरे की परख जोहरी ही कर सकता है इसी तरह लोक कलाओं के पारखी जोहरी की तरह थे कोमल कोठारी। उनकी गहराई देखने का सबूत है उनके कथन का यह अंश फोकलोर या लोकाख्यान के अन्दर कोई भी विषय ऐसा नहीं है जिसका स्वरूप अखिल भारतीय न हो, या अखिल विश्व का न हो। चाहे वह संगीत हो, चाहे कथा हो, चाहे महाकाव्य (एपिक) हो, या और कुछ हो मैं यहाँ राजस्थान के एपिक देखता हूँ, कर्नाटक के एपिक देखता हूँ, मणिपुर के एपिक देखता हूँ, बिहार बंगाल के एपिक देखता हूँ, तो मुझको अखिल भारतीय सांस्कृतिक एकता का एक बोध-सा होता है, लेकिन जब हम कला या संस्कृति के अन्य क्लासिक फॉर्म्स ( शास्त्रीय प्रारूपों ) की ओर देखते हैं तो उनमें हमें डिविजन.... कई तरह की उनकी अलग विशिष्टताएँ और विभेद नजर आते हैं। अलग-अलग स्थानिक्ताओं, धर्मों और सम्प्रदायों से जुडी कला के जो क्लासिक फॉर्म्स हैं उनमें यह विभेद ज्यादा दिखाई देता है लेकिन फोक्लोर्स के साथ यह बात नहीं है । राजस्थान की औरतें गाती हैं तो वही चार सुर और बंगाल की औरतें गाती हैं तो भी वही चार सुर । इसके अन्दर टेक्स्ट कोई मायने नहीं रखता । यह पता चलता है कि इन चार या पाँच सुरों के बीच जो चीज आ रही है उसके भीतर मन्द्र सप्तक पडा है। (लोक सम्पादक- पीयूष दईया, सन् 2002, पृष्ठ 469-470 प्रकाशक : भारतीय लोक कला मण्डल, उदयपुर ) इस जोडी का दूसरा महत्त्वपूर्ण और प्रतिष्ठित नाम है विजयदान देथा, जिन्हें लोग आदर और प्यार से बिज्जी कहते रहे। उनका सबसे अधिक उल्लेखनीय और ऐतिहासिक काम है-बातां री फुलवाडी के चौदह खण्ड जिनमें राजस्थानी लोक कथाओं का गुणाढ्य के बृहत् कथासरित सागर की तरह लोककथा सरितसागर लहरा रहा है। कहना न होगा कि ऐसा काम आज यूनिवर्सिटियों के वश की बात भी नहीं है। साथ ही लोक लोरियों के कोश का निर्माण भी उनके इस काम को बहुआयामी बनाता है। उन्होंने राजस्थानी कहावतों के सम्पादन का काम कर राजस्थानी लोक की रचनात्मक शक्ति को उद्घाटित किया है।
राजस्थान केडर में प्रशासनिक अधिकारी रहे विजय वर्मा ने भी अपनी सारी व्यस्तताओं के बीच अपनी रुचि के कार्य इस लोक सम्पदा को संवारने-सहेजने में बिताया है। वे भी राजस्थान के ऐसे लोक रत्नों की परम्परा में एक हैं। उनका काम भी विविध और बहुआय्मी रहा है। लोक कलाओं के बारे में वर्माजी की साफ समझ रही है कि कला कभी एकरेखीय और एक स्तरीय नहीं होती। लोक कला के भी अनेक स्तर होते हैं और उन स्तरों को समझे बिना हम यह नहीं बता सकते कि आगे इन्हें किस प्रकार चलाएँगे या इनकी कैसे रक्षा करेंगे। (संवाद-प्रतिसंवादः हेतु भारद्वाज, पँचशील प्रकाशन, जयपुर, 2021, पृष्ठ 55) संगीत को शास्त्रीय स्तरों और लोक स्तरों पर समझने वाले वर्माजी लोक संगीत की यात्रा की विभिन्न मंजिलों को पकडते हुए यह बतलाते हैं कि लोक संगीत एक ही तरह का नहीं है। सच तो यह है कि उसके भीतर काम करने वाले मोटे- मोटे चार वर्ग हैं जिनमें दो गैर पेशेवर यानी लोक परम्परा से हैं और दो पेशेवर हैं जिन्होंने लोक कला का विकास एक पेशे की तरह से किया है। वर्माजी ने भी लोककलाओं को समझते हुए स-ंरक्षित करने का महत्त्वपूर्ण काम किया है जिससे वे एक व्यक्ति के साथ संस्था जैसे हो गए हैं ।

सम्पर्क - 1/14 अरावली विहार,
काला कुआँ,
अलवर 301002 राजस्थान।
मो. 9785010072