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हिन्दुस्तानी संगीत के राजस्थानी रंग

पंकज पराशर
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार, बंगाल और राजस्थान का अप्रतिम योगदान है, लेकिन अनेक बार संगीत के इतिहास की चर्चा के दौरान राजस्थान के बारे में उतनी बातें निकलकर सामने नहीं आती हैं, जितनी की आनी चाहिए। असल में राजस्थानी संगीत के नाम पर केसरिया बालम, आओ नी पधारो म्हंारे देस नामक मांड और कुछ लोकनृत्य और संगीत को ही बार-बार पेश किया जाता है। जिसकी वजह से ऐसी छवि बनती चली गई कि राजस्थान में नृत्य और संगीत के नाम पर यही है। जबकि हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में जयपुर-अतरौली घराना प्रसिद्ध घरानों में से एक है, जिसे जयपुर घराना और अल्लादिया खाँ घराना दोनों नामों से जाना जाता है। मोहम्मद अली खाँ इस घराने के प्रवर्तक माने जाते हैं, जिनके बेटे मशहूर गायक आशिक अली खाँ थे। बाद में इस घराने का विस्तार चूँकि उस्ताद अल्लादियाँ खाँ ने काफी दूर तक किया, सो उस्ताद अल्लादिया खाँ साहब इस घराने के संस्थापक कहे जाने लगे। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के कौन ऐसे रसिक होंगे जो जयपुर-अतरौली घराने के सुप्रसिद्ध गायक पण्डित मल्लिकार्जुन मंसूर, पण्डिता केसरबाई केरकर, विदुषी किशोरी अमोनकर, श्रुति सदोलीकर,पद्मा तलवलकर और अश्विनी भिडे के नामों से अपरिचित हों! जयपुर-अतरौली घराने के इन गायक-गायिकाओं का जन्मस्थान भले राजस्थान न हो, लेकिन जयपुर-अतरौली घराने की गायकी की जो विशेषताएँ हैं, उनके साथ इन गुलुकारों को सुनते हुए क्या बार-बार जयपुर घराने और उसकी विशेषताओं का जिक्र नहीं होता? कहना न होगा कि जयपुर-अतरौली घराने के गायन की शिनाख्त इन्हीं कुछ चीजों से की जा सकती है, जिनमें गीत की बंदिश का छोटी होना, खुली आवाज में गाना, आवाज बनाने का निराला ढँग और वऋ तान सुनते ही उस्ताद अल्लादिया खाँ, मंजी खाँ और भुर्जी खाँ के गायन की विशेषताओं से कद्रदान रूबरू हो जाते हैं।
तत्कालीन राजपूताना के उनियारा में पैदा हुए उस्ताद अल्लादिया खाँ ने देश-विदेश में सूबे के टोंक का नाम रोशन किया। खाँ साहब अल्लादिया के मुताल्लिक कहा जाता है कि नेपाल नरेश चाहते थे कि वह उनके दरबार की शोभा बनें, लेकिन खाँ साहब ने नेपाल में रहना/बसना स्वीकार नहीं किया और बंबई प्रेसीडेंसी के कोल्हापुर को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। जहाँ कि उनको संगीत सम्राट के एजाज से नवाजा गया। अल्लादिया खाँ को नट-कामोद, भूप-नट , कौंसी-कणाद, सम्पूर्ण मालकौंस, बसंती-केदार, शुद्ध-नट, मालवी, सवानी कल्याण, धवलाश्री - जैसे कई जटिल रागों के निर्माण और पुनरुत्थान के लिए याद किया जाता है। इनमें से कई राग उत्तरी राजस्थान की हवेलियों में गाए जाते थे। उनके द्वारा पुनर्जीवित किए गए रागों में से एक राग बसन्ती कणाद था। कई हवेली संगीत ध्रुपदों में से कुछ जिन्हें उन्होंने बंदिशों में बनाया था, वे प्रसिद्ध राग नायकी कणाद बंदिश मेरो पिया रसिया और बिहगडा बंदिश ऐ प्यारी पग होल थे। निराशा करने वाली बात यह है कि अल्लादिया खाँ साहब ने अपनी आवाज रिकॉर्ड करने की अनुमति नहीं दी थी। 10 अगस्त, 1855 को जिस उनियारा में अल्लादिया खाँ पैदा हुए थे, उस जमाने में उनियारा में फतहसिंह का शासन था। उनके दरबार में उस्ताद अल्लादिया खाँ के वालिद ख्वाजा अहमद खाँ मुलाजिम थे। अल्लादिया खाँ का पूरा नाम गुलाम अहमद खाँ था, लेकिन उनको सब अल्लादिया के नाम से पुकारा करते थे। राजस्थानी संगीत के जानकार देवीलाल सामर ने उनके बारे में लिखा था कि अल्लादिया खाँ साहब ने पार्थिव जन्म ही राजस्थान में नहीं लिया, बल्कि जिस प्राणवान संगीत शैली से उन्होंने भारत की संगीत परम्परा को नवीन मोड दिया, उसकी सम्पूर्ण शिक्षण-प्रशिक्षण की भूमि राजस्थान ही थी। प्रसंगवश यह बताते चलें कि उस्ताद अल्लादिया खाँ की 125 वीं जयन्ती जब मनायी गयी थी, तो संगीत नाटक अकादमी द्वारा जयपुर में आयोजित उस ऐतिहासिक समारोह में राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर और कद्दावर नेता मोहनलाल सुखाडिया मौजूद थे। लेकिन ऐसा लगता है जैसे उसके बाद उनकी सरजमीं राजस्थान के लोगों ने ही उस्ताद अल्लादिया खाँ को भुला दिया हो!
संगीत के बहाने जब जयपुर घराने की बात चल रही है, तो प्रसंगवश आफ साथ यह भी साझा करते चलें कि जयपुर घराने का एक पहलू कथक नृत्य की राजस्थानी परम्परा से भी जुडता है। राजस्थान में कथक के नर्तक ज्यादातर हिन्दू राजाओं के दरबारों से सम्बद्ध रहे। इसके कारण जहाँ एक ओर कथक नृत्य की बहुत-सी प्राचीन परम्पराएँ इस घराने में अभी भी सुरक्षित हैं, वहीं दूसरी ओर अपने संरक्षणदाताओं की रुचि के अनुसार इनके नृत्य में जोश व तेजी की अधिकता दिखाई पडती है। पखावज की मुश्किल तालों, जैसे- धमार, चौताल, रूद्र, अष्टमंगल, ब्रह्मा, लक्ष्मी, गणेश इत्यादि पर बहुत आसानी से नृत्य कर लेते हैं। जयपुर घराने में नृत्य के दौरान पाँव की तैयारी, अंग संचालन व नृत्य की गति पर विशेष ध्यान दिया जाता है। जयपुर घराने को शीर्ष पर पहुँचाने में पद्मश्री से सम्मानित नृत्याँगना उमा शर्मा, प्रेरणा श्रीमाली, पद्मश्री शोभना नारायण, राजेन्द्र गंगानी और जगदीश गंगानी के योगदान को भुलाया नहीं किया जा सकता। आमतौर पर राजस्थान के संगीत के नाम पर जिन लोक गायनों को पेश किया जाता है, उन लोकसंगीत का विकास भी शास्त्रीय संगीत की तरह ही राग-रागिनियों पर आधारित हैं, जो राजस्थान के लोकसंगीत को बाकी सूबे के लोकसंगीत से विशिष्ट और अलग पहचान दिलाता है। मसलन जो माँड गायिकी राजस्थान और इसके बाहर भी आज बेहद लोकप्रिय है, उसके उत्स के बारे में कहा जाता है कि वह दसवीं शताब्दी में जैसलमेर में पैदा हुई, जो दरअसल एक श्रृंगार रसात्मक राग है। माँड के तौर पर जो अनेक शैलियाँ प्रचलित हैं, उनमें जैसलमेरी मांड, बीकानेरी माँड और जोधपुरी माँड का नाम लिया जाता है और इसके गायन में जिन दो गायिकाओं को अपार लोकप्रियता हासिल हुई, उनमें बीकानेर की अल्लाहजिलाई बाई और गवरी देवी का नाम प्रमुख है।
पश्चिमी राजस्थान में जो मांगणियार गायिकी प्रचलित है, वह दरअसल मरुस्थलीय सीमावर्ती क्षेत्रों बीकानेर, बाडमेर, जैसलमेर आदि में मांगणियार जाति के लोगों द्वारा अपने यजमानों के यहाँ माँगलिक अवसरों पर गायी जाने वाली एक विशिष्ट लोक गायन शैली है, जिसमें मुख्यतः छह राग एवं छत्तीस रागनियाँ होती हैं। गायन के दौरान इसमें कमायचा और खडताल नामक वाद्ययंत्र का इस्तेमाल किया जाता है। इसके गायन में गफूर खाँ, साकर खाँ और सद्दीक खाँ को बेहद लोकप्रियता मिली। इसी से मिलती-जुलती एक और लोकगायन है, लंगा गायिकी। इसमें मांगणियार की तरह लंगा जाति के लोगों द्वारा माँगलिक अवसरों पर गायी जाने वाली एक विशिष्ट गायन शैली है, जिसमें सारंगी तथा कमायचा को प्रमुख वाद्ययन्त्र के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इस शैली के गायन में फूसे खाँ, करीम ने खूब नाम कमाया। वहीं एक और गायन शैली का जिक्र करना भी यहाँ गैर-मुनासिब न होगा, जिसे तालबंदी-गायिकी कहते हैं। यह दरअसल पूर्वी राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर, करौली इलाके में गायी जाती है, जिसके गायन में प्राचीन कवियों की पदावलियों को गाया जाता है और गायन के दौरान सारंगी, हारमोनियम, ढोलक और तबला का इस्तेमाल किया जाता है।
मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक मियाँ तानसेन के चार पुत्र और दो पुत्रियाँ थी और अजमेर दरगाह बाजार स्थित एक मस्जिद में शिलालेख पर फारसी भाषा में आज भी इसका प्रमाण मिलता है। ध्रुपद की चार वाणियाँ हैं-डागर, खंडारी, नोहारी, गोरारी या गौरहारी। सन् 1394 में नागौर के गोरा नामक चौहान जो रणथंभौर की सेना का सामंत था, उन्हें हाथी-सिरोपाव देकर राव चूडा ने अपना गायक बनाया था। गौरा की संतान ही गौरारी कहलाती है। आज भी राजस्थान में गोरेर वंश के लोग सवाई माधोपुर तथा बूँदी क्षेत्र में काफी संख्या में हैं। सवाई माधोपुर की राजधानी रणथंभौर थी और इतिहास में यह एक पुराना एवं वैभवशाली नगर रहा है। जिससे ध्रुवपद की खंडारी वाणी मानी जाती है। सवाई माधोपुर का क्षेत्र जहाँ एक ओर मध्यप्रदेश की सीमा ग्वालियर के काफी निकट है, वहीं दूसरी ओर आगरा से भी बहुत दूर नहीं है। डागुर वाणी के प्रवर्तक डांग क्षेत्र के ब्रजेश चंद्र को माना जाता है और यह डांग क्षेत्र वास्तव में राजस्थान के वर्तमान सवाई माधोपुर जिला अंतर्गत हिंडौन करौली का क्षेत्र है। यह अंचल भी उत्तर प्रदेश के आगरा शहर के निकट है। डांग का मतलब होता है घना जंगल और वन्य पशुओं के निवास का क्षेत्र। स्थानीय लोगों की बोली चूँकि डांगरी नाम से प्रसिद्ध रही है, सो डांग, डांगरी आदि शब्दों से ही डागर शब्द का प्रचलन हुआ। तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास दरअसल भरतपुर इसी गाँव के निवासी थे। वर्तमान में राजस्थान के राजवंश के ध्रुवपद गायक अपना सम्बन्ध स्वामी हरिदास की वंश परम्परा से ही मानते हैं। बाद में इस वर्ग के लोगों ने किन्हीं विवशताओं के कारण इस्लाम धर्म स्वीकार किया था। कहना न होगा कि डागर घराना वस्तुतः राजस्थान में ही विकसित हुआ और आज भी इस शैली के गायक राजस्थान के डागर परिवार के ही हैं।
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में जिसे मेवाती घराना कहते हैं, उसका दूसरा नाम जयपुर-मेवाती घराना भी है। यह हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का एक अहम घराना रहा है, जिसकी नींव उस्ताद घग्गे नाजिर खाँ और उनके बडे भाई उस्ताद वाहिद खाँ ने रखी थी। दोनों उस्ताद अलग-अलग चीजों पर पकड रखते थे। छोटे उस्ताद जहाँ गायन के महारथी थे, तो बडे भाई वीणा-वादन करते थे। उन्नीसवीं सदी में सूबा हरियाणा के मेवात इलाके से इसकी शुरुआत हुई, जिस वजह से इसे मेवाती घराना कहते हैं। यहाँ इस प्रसंग में हिन्दी लोकवृत्त में फैले इस भ्रम को भी दूर करते चलें कि मेवाती घराने का राजस्थान के मेवाड अंचल से किसी तरह का कोई सम्बन्ध नहीं है। कुछ व्यक्तिगत और कुछ पेशेवर कारणों से मेवाती घराने के कलाकार भोपाल में बस गए, जबकि कुछ जयपुर चले गए। यही वजह है कि मेवात घराने के लोग देश के अनेक क्षेत्रों में पाये जाते हैं। जयपुर-मेवाती घराने को सबसे ज्यादा प्रसिद्धि पण्डित जसराज के जुडने के बाद मिली। उनके अलावा मोतीराम, मणिराम व संजीव अभ्यंकर ने इस घराने के नाम को बहुत रौशन किया है। पण्डित जसराज और मणिराम ने इस घराने को शुद्ध वाणी, शुद्ध मुद्रा यानी एक्सप्रेशन और शुद्ध सुर से जुडा हुआ कहा। मणिराम पंडित जसराज के बडे भाई और उनके गुरु भी थे। पंडित जसराज ने अपने घराने की शुद्धता को कायम रखते हुए कई प्रयोग भी किये-जैसे उन्होंने खयाल गायन में कुछ लचीलेपन के साथ ठुमरी, हल्की शैलियों के तत्वों को जोडा। साथ ही उन्होंने जुलगबंदी का एक नया रूप बनाया, जिसे जसरंगी कहते हैं। इसमें एक महिला और पुरुष गायक होते हैं, जो एक साथ ही अलग-अलग राग गाते होते हैं। उन्हें कई प्रकार के दुर्लभ रागों को प्रस्तुत करने के लिए भी जाना जाता है। साथ ही साथ इसी घराने के तहत अर्ध-शास्त्रीय शैली भी तैयार की गई। इनमें से एक है हवेली संगीत, जिसके तहत मंदिरों में अर्ध-शास्त्रीय गायन और वादन किया जाता है।
राजस्थान के झुंझुनूं जिले के लूणा गाँव में अजीम खाँ मिरासी के घर 18, जुलाई 1927 को जन्मे मशहूर गजल गायक मेहदी हसन का नाम आज भले पाकिस्तान के गायक के रूप में हो, लेकिन उनके खानदान की जड राजस्थान की रेतीली जमीन में है। सन् 1947 में भारत-पाकिस्तान के बँटवारे के समय पाकिस्तान जाने से पहले उनके बचपन के 20 साल लूणा में ही बीते थे। दिलचस्प बात यह है कि इतने बरस बीत जाने के बाद आज भी मेहदी हसन के परिवार में लोग शेखावाटी की मारवाडी बोली में ही बात करते हैं। शेखावाटी अंचल की मिट्टी से उनका कितना अधिक जुडाव था, यह कई अवसरों पर दिखा। मेहदी हसन साहब के दादा इमाम खाँ अपने दौर के बडे कलाकार माने जाते थे, जो उस समय मंडावा व लखनऊ के राजदरबार में ध्रुपद गाते थे। उनके पिता अजीम खाँ भी अच्छे कलाकार थे। साल 1978 की बात है। मेहदी हसन भारत आए थे, तो एक कार्यऋम के लिए सरकारी मेहमान बनकर जयपुर आए। उनकी इच्छा पर राजस्थान सरकार के हाकिम उन्हें उनके पैतृक गाँव लूणा लेकर गए। लूणा में सडक के किनारे एक टीले पर छोटा-सा मंदिर बना था, जहाँ वे रेत में लोट-पोट होने लगे। अपनी जन्मभूमि से मिलन का ऐसा नजारा देखने वाले लोग भाव-विभोर हो उठे। ऐसा लग रहा था जैसे मेहदी हसन अपनी माँ की गोद में लिपटकर रो रहे हों। जब लूणा की धूल में लोटकर खडे हुए तो उन्होंने बताया कि बचपन में वह वहां बैठकर भजन गाते थे।
साल 1993 में मेहदी साहब एक बार फिर लूणा आए, मगर इस बार अकेले नहीं बल्कि पूरे परिवार सहित आए। आकर लूणा में बने अपने दादा इमाम खाँ और माँ अकमजान की मजार की मरम्मत करवायी और पूरे गाँव में लड्डू बँटवाए थे। सन् 1947 में हुए विभाजन के बाद जब मेहदी हसन पाकिस्तान चले गए, तो वहाँ भी अपना गायन जारी तो रखा, लेकिन एक बडी परम्परा को भंग करके। दरअसल उनके दादा और पिता ध्रुपद गाते थे, जिसे छोडकर मेहदी साहब ने गजल गाना शुरू कर दिया। ऐसा करने वाले अपने खानदान के वह शायद पहले गायक थे, जिन्होंने ध्रुपद छोडकर गजल गाना शुरू किया था। गज़ल गाना उन्होंने शुरू जरूर किया था, लेकिन ध्रुपद, ठुमरी और दादरा भी वह बडी खूबी के साथ गाते थे। इसी वजह से लता मंगेशकर कहा करती है कि मेहदी हसन के गले में तो स्वयं भगवान बसते हैं। पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है जैसे मध्यम शुरू में ठहर-ठहर कर धीमे-धीमे गजल गाने वाले मेहदी हसन केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देश जैसे राजस्थान की सुप्रसिद्व मांड को भी उतनी ही शिद्दत के साथ गाया है। राजस्थानी जुबान पर भी उर्दू जुबान जैसी उनकी पकड थी। जून 2012 में मेहदी साहब इस दुनिया से रुखसत कर गए और वक्त के साथ-साथ उनके संगी-साथी भी अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन लूणा की रेतीली धरती में आज भी उनकी महक महसूस की जा सकती है।
दुनियाभर में मशहूर हुए सिंगर रेशमा का जन्म 1947 में राजस्थान के चूरू जिले की रतनगढ तहसील के लोहा गाँव में हुआ था। उनका तआल्लुक एक बंजारा परिवार से था। हिन्दुस्तान के बँटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान में जाकर बस गया। उनके घर के लोग बीकानेर से ऊँट ले जाकर दूसरे शहरों में बेचते थे और उन्हीं पैसों से वापसी में गाय-बकरियाँ लाकर घर के पास बेचा करते थे। रेशमा अनपढ थी और बेतकल्लुफ अंदाज में बोलती थीं। रेशमा एकदम निरक्षर थी और मजेदार बात यह कि शास्त्रीय संगीत की भी कोई शिक्षा उन्हें नहीं मिली थी, इसके बावजूद रेशमा ने कई मशहूर गाने गाए। शुरुआती दिनों में रेडियो पाकिस्तान के लिए गाने वाली रेशमा के मशहूर गाने हैं, दमादम मस्त कलंदर, हाय ओ रब्बा, नहियो लाग्दा दिल मेरा, सुन चरखे दी मिठी मिठी कूक वगैरह। रेशमा को सुनते हुए राजस्थान के रेगिस्तान की खुरदराहट और बंजारों की रगों में दौडती मस्ती पूरी शिद्दत से महसूस होती थी। ज्यादातर भारतीयों के लिए रेशमा से परिचय का अर्थ है फिल्म हीरो के गीत, चार दिनां दा प्यार हो रब्बा बडी लम्बी जुदाई, लेकिन रेशमा ने जब-जब और जो भी गाया वह पूरे दिल से गाया। यह बख्शीश लोक से सींचे जाने पर ही मिलती है कि मंद्र सप्तक से लेकर तार सप्तक तक रेशमा की आवाज में कहीं कोई टूटन नहीं आती। हाय ओ रब्बा नइयो लगदा दिल मेरा।। जैसा गीत गाकर वह हमारे अंदर छिपी हुई शाश्वत उदासी को धीरे-धीरे जगाते हुए एक मँजे हुए मनोवैज्ञानिक की तरह बाहर ले आती हैं। पाकिस्तान के ही मशहूर गायक रहे और मेहदी हसन के शिष्य परवेज मेहदी के साथ गाया उनका गाना, गोरिए, मैं जाणा परदेस। में किस तरह रेशमा की सुरीली हूक परवेज की हरकतों औरU मुर्कियों´ पर भारी पडी थी।
उर्दू और पंजाबी के मिश्रण में बात करते हुए रेशमा ने इस तथ्य को कभी नहीं छिपाया कि वह पढी-लिखी नहीं हैं और भाषा पर उनका कोई अधिकार नहीं है। रेशमा ने उन अदाओं को भी सीखने से हरदम गुरेज किया, जो नए लोग तभी सीख लेते हैं जब वे संगीत की स्वरमाला से परिचित ही हो रहे होते हैं। वह इतनी सादादिल और सादगीपसंद थीं कि गाना रिकॉर्ड करवाने के लिए स्टूडियो जाने से उन्हें घबराहट होती थी। इसलिए चर्चित गीत लम्बी जुदाई रेशमाजी के अनुरोध पर अभिनेता दिलीप कुमार के घर पर रिकॉर्ड हुआ था। यह कहना हालाँकि बहुत रवायती होगा, लेकिन सच यही है कि सांस्कृतिक संदर्भों में रेशमा भारत और पाकिस्तान के बीच एक पुल की तरह थीं। उन्हें जब भी मौका मिला तो वह राजस्थान आती रहीं और सुरों को अपनी सरजमीं पर न्योछावर करती रहीं। साल 2000 में जब राजस्थान सरकार ने उन्हें न्योता भेजा तो वह खिंची चली आईं। जयपुर में खुले आसमान के नीचे अपना पसंदीदा केसरिया बालम पधारो म्हारे देश और लम्बी जुदाई सुनाकर लोगों को सम्मोहित कर दिया था। मजेदार यह है कि जब रेशमा को राजस्थान सरकार की ओर से दावत भेजी गयी, तो वह कनाडा जाने वाली थीं और उन्हें कनाडा का वीजा मिल चुका था। लेकिन जब उन्हें राजस्थान की अपनी माटी का वास्ता दिया गया, तो रेशमा भावुक हो गईं और कहा, अगर माटी बुलावे, तो बताओ फेर मैं किया रुक सकू हूँ? यह एक ऐसा यादगार लम्हा था जब राजस्थान की माटी में पैदा पण्डित जसराज, जगजीत सिंह, मेहदी हसन और रेशमा जयपुर में जमा हुए थे और रातभर लोग संगीत में डूबते-उतराते रहे थे!
राजस्थान के शहर बीकानेर में 01 फरवरी, सन् 1902 में पैदा हुई अल्लाहजिलाई बाई का गाया गीत केसरिया बालम आवो नी पधारो म्हारे देस की मिठास का ऐसा असर होता है कि राजस्थान के रेगिस्तान की सूखी धरती की तरफ लाखों-हजारों देशी-विदेशी मेहमान खिंचे चले आते हैं। उस दौर की गायिकाएँ अपने नाम के साथ आम तौर पर बाई, बेगम और जान लगाती थीं, हालाँकि बाद में कुछ गायिकाओं ने अपने नाम के साथ देवी और दासी भी लगाया। मसलन आनंदी देवी, अन्नपूर्णा देवी और बेदाना दासी, गिरिबाला दासी, वगैरह-वगैरह। उन दिनों आर्ट को सियासी चश्मे से नहीं देखा जाता था, मौसिकी को खुदा की इबादत यानी संगीत को ईश्वर की आराधना समझा जाता था। उस जमाने के जो मुस्लिम सिंगर्स थे, वे शिव से लेकर कृष्ण तक की प्रशंसा में अपने गाने से खिराजे-अकीदमत पेश करते थे। तमाम गुलुकार सभी त्योहारों को अपना समझ कर मनाते थे। हिन्दुस्तान की मिली-जुली गंगा-जमनी तहजीब का अंदाजा इस चीज से भी लगा सकते हैं कि सन् 1952 में बनी फिल्म बैजू-बावरा के मशहूर गीतों में से एक ओ दुनिया के रखवाले सुन दर्द भरे मेरे नाले जिसे गाया है पंजाब के जिला अमृतसर के गाँव कोटला सुल्तान सिंह के रहने वाले गुलुकार मोहम्मद रफी साहब ने, इस गीत को लिखा मशरिकी यूपी के जिला बदायूँ के नगमानिगार शकील बदायूँनी ने और इसके संगीतकार थे अपनी खास तहजीब के लिए मशहूर शहर लखनऊ के नौशाद। इस बेहतरीन भक्तिपरक गीत को रचने वालों में से किसी का भी तआल्लुक हिन्दू धर्म से नहीं था।
अल्लाह जिलाई बाई सन् 1902 के जिस दौर में पैदा हुई, उस दौर को समझने के लिए आपको उस दौर के बीकानेर को देखना होगा। तो चलिए हम आपको लिए चलते हैं सन् 1902 के रेगिस्तानी शहर बीकानेर की गलियों में, जिसमें चिलचिलाती धूप में कहीं दूर-दूर तक कोई छायादार पेड तक नहीं हैं। ज्यादातर खेजडियाँ हैं, जो इस रेगिस्तानी इलाके में ऐसे ही उग आती हैं या फिर काँटे वाले कीकर हैं। बहुत कडवा। जो छाया और गोंद देता है। कहीं-कहीं पीपल और नीम के कुछ दरख्त हैं। लालगढ पैलेस, जहाँ 21 साल के युवा महाराजा गंगा सिंह रहते थे। राजमहल में चारों तरफ रंग-बिरंगे फूल खिले रहते थे। ऐशो-आराम की बहुत सारी चीजें करीने से रखी रहती थी। जहाँ चारों तरफ रेगिस्तान की हवा में उडने वाली धूल की मानिंद अक्सर खामोशी और सन्नाटा रहता था। ये सन्नाटे तब अपनी जगह से बेदखल होते, जब महल में खुशी के मौके आते या मौसीकी की महफिल आरास्ता होती। लालगढ महल से एकदम नाक की सीध में जाएँ, तो तकरीबन तीन किलोमीटर दूर जूनागढ किले के पास एक किलकारी वजूद में आई थी, वह अल्लाह की बच्ची थी, अल्लाह जिलाई बाई। उनके वालिद गरीबी और मुफलिसी में जी रहे थे। बच्ची अल्लाह जिलाई जब बहुत छोटी थी, तभी उसके अब्बू नबी मियाँ अल्लाह को प्यारे हो गए। मां हज्जन अलीमन पर्दानशीं थीं। उन्होंने बच्ची का मुँह देखकर अपने दिल को पत्थर बना लिया। मियाँ के गुजर जाने का सोग मनाती रहतीं, तो बेटी से भी हाथ धो बैठतीं। अल्लाह जिलाई की फूफी ने भाई की निशानी को पाला-पोसा। माँसाथ ही रहती थीं। घर के पास में ही मेन मार्केट की चौडी-सी सडक थी, जहाँ इधर-ऊधर घूमती बकरियाँ, पानी ढोते ऊँट, कपडे बेचते बाँठिया, बर्तन बनाते ठठेरे, परचून-नमकीन-सब्जी और दूसरे सामान बेचने वाले बसे हुए थे। यहीं कठोर, पथरीली, धूप से तपती, सादी, सरल जमीन पर पैदा हुई थी अल्लाह जिलाई।
अल्लाह जिलाई बाई की शख्सियत भी बहुत जोरदार थी। ऐसा कि किसी को अन्दाजा भी नहीं होगा। यह जान कर आपको हैरत होगी कि इतनी सादगी, मीठेपन, शर्म-ओ-हया, नजाकत, सुरीलेपन से गाने वाली अल्लाह जिलाई बाई असल में बडी दबंग किस्म की महिला थीं। वे एकदम मर्दों की तरह बात करती थीं और उसी तरह लोगों को डाँटती थीं। पूरे कमांडिंग अंदाज में। यही नहीं, वे गालियाँ बहुत देती थीं और वो भी एकदम मर्दों की तरह। कहती थीं, मजाल है किसी की जो मेरे सामने आ जाए। वे जर्दा और पान खाने की बहुत शौकीन थीं। खुशबूओं की भी उतनी ही बडी शौकीन। हैमलिन स्नो परफ्यूम लगाया करती थीं। रूई में इत्र लगाकर कान पर मलती थीं। अल्लाह जिलाई की मौसीकी का सफर दरअसल गुणीजनखाना से शुरू हुई थी। ये वो तालीमखाना था जो महाराज गंगा सिंह ने बीकानेर में उस दौर में शुरू करवाया। ये बीकानेर के तेलीवाडा में था। यहां मौसीकी की तालीम दी जाती थी। हुसैन बख्श नाम के उस्ताद थे। वे जरा लंगडा कर चलते थे। उन्हें गुणीजनखाना में बच्चों को तालीम देने के लिए नौकरी पर रखा गया था। अल्लाह जिलाई का मकान तेलीवाडा में ही था, दाऊजी मन्दिर के पास। उनकी उम्र उश वक्त तकरीबन 10-12 साल रही होगी। गली में बच्चे खेलते थे। खेलते-खेलते वे भी मारवाडी लोकगीत गुनगुनाती रहती थीं। उन्हें हुसैन बख्श ने सुन लिया और गुणीजनखाने अपने साथ ले गए और उन्हें गाना सिखाने लगे। कुछ लोग यह भी अन्दाजा लगा लेते हैं कि बाईजी के उस्ताद पाकिस्तान वाले हुसैन बख्श थे, जबकि हुसैन बख्श साहब का तआल्लुक बीकानेर से था। लोगों के बीच यह किस्सा भी है कि उन्होंने बीकानेर के अच्छन महाराज से संगीत की बारीकियाँ सीखी थीं। असलियत यह नहीं है। अच्छन महाराज दरअसल उनके समकालीन थे। बिला शक वे बहुत उम्दा गायक थे। जब बाईजी जोधपुर, उदयपुर और दूसरी जगहों पर कॉन्सर्ट में जाया करती थीं, तो अच्छन महाराज से मुलाकात हो जाती थी। मौसीकी को लेकर गुफ्तगू हो जाती थीं, बेतकल्लुफ तरीके से गाना-बजाना हो जाता था। अच्छन महाराज क्लासिकल ही गाते थे, वहीं बाईजी गज़ल, ठुमरी, ख्याल और मुख्य रूप से मांड गाती थीं। तो यहाँ यह बात साफ हो गई कि अल्लाह जिलाई बाई ने तालीम सिर्फ हुसैन बख्श साहब से ली थी। अच्छन महाराज या किसी और से नहीं।
गुणीजनखाने में अल्लाह जिलाई को डांस में भी रुचि हो गई। बच्ची थीं, तो डांस भी करने लगीं। लेकिन उस्ताद ने कहा कि नहीं, आपको सिर्फ गाना है। डांस छुडवा कर उन्हें सिर्फ गायकी तक महूदद कर दिया गया। तकरीबन बारह बरस की उम्र में वे गाने लगी थीं। महाराजा गंगा सिंह के दरबार में वे इसी उम्र से गाने लगी थीं। वे ऑल इंडिया रेडियो की ए-लिस्ट आर्टिस्ट में शुमार हुईं। सब जगह परफॉर्म करने लगीं। ऑल इंडिया रेडियो के जरिये सुनने के बाद मद्रास, कलकत्ता, बॉम्बे में बसे मारवाडी समाज के लोग उन्हें आयोजनों में बुलाने लगे। देश के ज्यादातर सूबों में उनके प्रोग्राम हुए। ये 1987 की बात है जब लंदन में बीबीसी के कार्यक्रम में उन्हें बुलाया गया। क्वीन एलिजाबेथ हॉल में उनका प्रोग्राम था। अल्लाह जिलाई बाई की आवाज इतनी बुलंद थी, फ्रीक्वेंसी ऐसी थी कि टेक्निकल स्टाफ ने कहा आपको माइक की जरूरत नहीं है। आप गाएँगी तो यूँ ही आवाज गूँजेगी। एलिजाबेथ हॉल में उनका गायन बेहद कामयाब रहा। वे गा रही थीं तो साथ में सभी जबान में तरजुमा करके लोगों को बताया गया। सेंट्रल लंडन की जिस होटेल, ह्यूस्टन में वे ठहरी हुईं थी वहाँ कई जर्नलिस्ट पहुँचे थे। उनमें से कुछ ऐसे थे जो रोने लगे। लोगों ने पूछा कि आप लोग क्यों रो रहे हैं तो वे बोले, उनकी आवाज में ऐसा दर्द, लोच और राग है कि हमारे दिल को छूता है।
सन् 1972 में बनी फिल्म पाकीजा के म्यूजिक डायरेक्टर गुलाम मोहम्मद भी बीकानेर के थे। शहर बीकानेर के पास गजनेर नाम का गाँव है, जहाँ गजनेर पैलेस बना है, उसके करीब ही नाल नाम का छोटा-सा गाँव है। गुलाम मोहम्मद वहाँ के रहने वाले थे। जब वे अल्लाह जिलाई बाई से मिलने आते, तो वे घर के ऊपर बने झरोखे से ही कहतीं, कुण है यानी कौन है।। तो वे कहते थे, मैं हूँ गुलामियो यानी मैं हूँ गुलाम। उन्होंने बहुत कोशिश की कि पाकीजा का गाना ठाडे रहियो ओ बाँके यार... उनसे गवाएँ। जिसे बाद में लता मंगेशकर ने गाया। लेकिन बाई जी ने मना कर दिया कि वे फिल्मों में नहीं गाएँगी। उनका मानना था कि फिल्मों में गाना अच्छी बात नहीं। हालाँकि जब वे बम्बई जातीं, तो लता मंगेशकर से उनकी मुलाकात होती थी। गुलजार की 1991 में बनी फिल्म लेकिन में लता जी ने केसरिया बालम पधारो म्हारे देस मांड गाई थी। जब उन्हें ये गाना पेश हुआ तो उन्होंने बम्बई से अल्लाह जिलाई बाई को फोन किया कि मुझे केसरिया बालम ऑफर हुआ है और ये गाना तो आप ही गा सकती हैं, अगर आप इजाजत दें तो मैं ये गाना गाऊँ, तो बाईजी ने कहा, नहीं जी, आप जरूर गाएँ। ये लताजी की विनम्रता थी, एक गायिका का दूसरी गायिका का दिली एहतराम।
संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने 1982 में उन्हें पद्मश्री सम्मान दिया था। उनके खानदान में दो नाती, तीन नातिन हुए। उनके बच्चे और बहुएँ भी हैं। उनके घर की नई पीढी में कोई संगीत तो नहीं सीखता, लेकिन अपनी परदादी के मुताल्लिक बताने पर वे फख्र महसूस करते हैं। मांड कोकिला अल्लाह जिलाई बाई की मौसकी की जो विरासत हमें सौंप कर गई हैं, उसे न सिर्फ सँभाल कर रखना चाहिए, बल्कि आगे भी बढाना चाहिए। एक फरवरी 1902 को पैदा हुई अल्लाह जिलाई बाई तीन नवंबर 1992 को नब्बे बरस की उम्र में दुनिया से रूखसत हुई। इस दौरान उन्होंने न जाने कितने उतार-चढाव देखे, लेकिन संगीत का दामन हमेशा थामे रखा। बाई जी तो अब हमारे बीच मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज पधारो म्हारे देश दुनिया को हमेशा राजस्थान आने का दावत देती रहेगी।
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सम्पर्क - हिंदी विभाग,
अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय,
अलीगढ-202002 (उत्तर प्रदेश)