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राजस्थान का पुरातत्वः उपलब्घियाँ और चुनौतियाँ

जीवन सिंह खरकवाल
अरावली की पहाडियाँ, जो दिल्ली से अम्बाजी (गुजरात) तक फैली हैं, राजस्थान को भौगोलिक रूप से दो भागों में बाँटती हैं पूर्वी तथा पश्चिम। पश्चिमी भाग रेतीला है जो थार के मरूस्थल या मारवाड के नाम से जाना जाता है जिसमें एक मुख्य बरसाती नदी लूणी है, दक्षिण पूर्वी भाग पूर्णतया अरावली की पहाडियों तथा उपत्यकाओं से बना है जिसे मेवाड कहा जाता है। इसमें बेडच तथा बनास जैसी प्रमुख नदियाँ हैं, जिनकी उपत्यकाओं में अनेक काँस्ययुगीन, ऐतिहासिक तथा मध्ययुगीन बस्तियों के प्रमाण हैं। दक्षिण में बागड, गोडवाड, तथा सिरोही के भाग में माही, सोम तथा पश्चिमी बनास जैसी प्रमुख नदियाँ है, उत्तर में स्थित शेखावटी, तोरावटी व ढूँढाड के क्षेत्र अपेक्षाकृत समतल है तथा अधिक उपजाऊ है इन क्षेत्रों में कांसावती साहिबी, काँटली जैसी नदियाँ बहती हैं। इस अर्ध शुष्क एवं शुष्क जलवायु वाले भू-भाग का निर्माण विश्व के प्राचीनतम चट्टानों नाइसिक ग्रेनाइट से हुआ है तथा ऊपरी परतें दिल्ली समूह की तथा अरावली समूह की चट्टानों से बना है, जिनमें अधिकांशतया खनिजों यथा ताँबा, लोहा, सीसा, जस्ता, चांदी, सोना आदि का जमाव है। अरावली के पूर्वी भाग में निम्बाहेडा, चिश्रौडगढ, कोटा, बूँदी, भरतपुर आदि क्षेत्रों में जो विन्ध्या के पहाड अरावली से मिलते हैं उनमें व उनकी तलहटी में सैकडों की संख्या में पाषाणयुगीन तथा इत्तर संस्कृतियों के प्रमाण हैं। इस अर्ध शुष्क जलवायु वाले भू-भाग में खेजडा, बबूल, रूँजडा, पलास, ढोक, सालर, खैर, दानसुर, नीम, खजूर, पीपल आदि के वृक्ष सामान्यतया होते हैं।
उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी में राजस्थान के प्राचीन स्थलों की शोध-खोज में कैप्टन वर्ट, ब्रूक, एलेक्जेण्डर कनिंघम टी. एच. हैण्डले, ला टोची, दयाराम साहनी, ओरेल स्टाइन, अमलानन्द घोष, के. एम. पुरी, हंसमुख धीरजलाल संकालिया, जी. सी. महापात्रा, विष्णुधर वाकणकर, डी. आर. भण्डारकर, गुरदीप सिंह, विरेन्द्रनाथ मिश्र, धर्मपाल अग्रवाल, रत्ननन्द अग्रवाल के. डी. एम. हेंगडे, अक्षय कीर्ति व्यास आदि ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
पाषाण काल
पिछली शताब्दी के पचास व साठ के दशकों में संकालिका, महापात्रा तथा वीरेन्द्रनाथ मिश्र ने क्रमशः नाथद्वारा, नागौर, लूनी तथा बेडच में पाषाणकालीन औजारों की खोज की, तत्पश्चात् मिश्र ने बेडच की उपत्यकाओं में पाषाणकालीन स्थलों का विस्तृत अध्ययन सन् 1967 में प्रकाशित किया। मिश्र इस कार्य को अगले दो दशकों तक नागौर, पाली, जोधपुर में कईं स्थलों से पाषाणकालीन मानव के प्रमाण खोजे। पिछले कुछ वर्षों में उत्तरी राजस्थान में सीकर, झुन्झुनूं व जयपुर जिलों से मुरारीलाल शर्मा व मदन मीणा ने कोटा-बूँदी में ओम प्रकाश शर्मा (कुक्की), पश्चिमी राजस्थान में पोखरण के निकट नेरान नदी की उपत्यका में रवि देवडा ने विशाल मात्रा में प्रारम्भिक एवं मध्य पाषाण कालीन स्थलों की खोज की है। ये प्रारम्भिक स्थल कम से कम 15 लाख से 2 लाख वर्ष प्राचीन हैं। इसके अतिरिक्त हाल में पूर्वी राजस्थान में बूँदी, बस्सी, चित्तौडगढ में विन्ध्या की पहाडियों की तलहटी में बडी संख्या में पाषाणकालीन औजार अपने मूल जगहों पर खोजे गए हैं। इस नवीन खोज में डॉ. चिन्तन ठाकर तथा सुश्री स्वाति वर्मा का महत्वपूर्ण योगदान हैं।
अतः ये स्पष्ट हुआ कि पाषाणकाल की शुरुआत में चित्तौड, भीलवाडा, कोटा, बूँदी, शेखावटी, पोखरण आदि में मनुष्य निवास कर रहे थे।
उपरोक्त में से ही कुछ स्थलों पर पाषाणकाल के दूसरे चरण के अवशेष भी खोजे गए हैं। डिडवाना वीरेन्द्रनाथ मिश्र तथा उनके संधियों ने इस चरण की तिथि 1,94,000 वर्ष प्राचीन स्थापित की है। डिडवाना, सांभर आदि स्थलों पर स्थित खारे पानी की झीलों में प्राचीन परागकणों द्वारा जलवायु तथा भू-पारिस्थितिकी का अध्ययन करके गुरदीप सिंह, डी.पी. अग्रवाल आदि इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि लगभग 26,000 से 13000 वर्ष पूर्व थार का मरुस्थल में अत्यन्त सूखा था तथा आँधियाँ चल रही थी, इस दौरान अरावली के क्षेत्रों में बसासतों के अवशेष प्राप्त नहीं हुए हैं।
भू-पारिस्थितिकी तथा पुराजलवायु के अध्ययनों से स्पष्ट हुआ कि होलोसीन चरण (10,000 वर्ष पूर्व) की शुरुआत से लगभग 6500 वर्ष पूर्व तक अच्छी वर्षा थी। इस दौरान सम्पूर्ण राजस्थान में अनेक मेसोलिथिक संस्कृति के स्थल यथा तिलवाडा, बागौर आदि खोजे गये हैं। वीरेन्द्रनाथ मिश्र के बागौर (भीलवाडा) उत्खनन से यह स्पष्ट हुआ कि यहाँ पाषाणकाल के अन्तिम चरण के लोग (लगभग 5000 वर्ष पूर्व) कुत्ता पालने लगे थे। अपने साथियों के मरने पर उन्हें शवागार बनाकर उनका अन्तिम संस्कार कर रहे थे, इसके अतिरिक्त वे मिट्टी के बर्तनों व ताँबे से भी परिचित हो चुके थे।
राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों जैसे अलवर, बदी, बैराठ, पिण्डवाडा, मोडी, धारेश्वर आदि में सैकडो की संख्या में शैल चित्र खोजे गए हैं। सबसे अधिक शैल चित्र बदी व भीलवाडा के बीच में पाये गए हैं जिनमें से अधिकाश की खोज ओमप्रकाश शर्मा कुकी ने की। शैल चित्रों मे आखेट, नृत्य तथा अनेक प्रकार के पशु-पक्षी हैं।
कांस्य युग
यद्यपि देश के कुछ अन्य भागों की भाँति राजस्थान में नवपाषाणयुगीन औजार अब तक नहीं खोजे जा सके हैं, परन्तु खेती, पशुपालन व मिट्टी के बर्तनों क निर्माण की शुरुआत का श्रेय काँस्य युगीन संस्कृतियों यथा आहड, गणेश्वर तथा प्राग/प्रारम्भिक हडप्पा कालीन संस्कृतियों को जाता है।
आहाड संस्कृति (3500-1700 ई. पू.)
आहड संस्कृति की खोज का कार्य 1952 में प्रारम्भ हुआ जिसमें अक्षय कीर्ति व्यास तथा रत्न चन्द्र अग्रवाल ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, परन्तु इसकी पहचान 1961 में हुई जब हंसमुख धीरज लाल संकालिया ने राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग के साथ मिलकर उदयपुर शहर में स्थित आहड का विस्तृत उत्खनन किया इस संस्कृति का विस्तार उत्तर में बूँदी, पूर्व में चित्तौडगढ, दक्षिण में डूँगरपुर तक है तथा अब तक 130 बस्तियों की पहचान हो चुकी है। सबसे बडी बस्ती गिलुण्ड में है तथा गिलुण्ड समेत आधे दर्जन स्थलों यथा बालाथल, महाराज की खेडी ओजियाना, छत्रीखेडा तथा आहड में उत्खनन हो चुका है। आहड संस्कृति विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-
1. यह एक ग्रामीण संस्कृति थी, रेडियो कार्बन तिथियों के आधार पर इसका समय ई. पू. 3500 से 1500 ई. पू. अर्थात् वर्तमान से 5500 से 3500 वर्ष प्राचीन है।
2. लोग पक्के मकानों में रहते थे, जिनके आधार अर्थतराशे व अनगढ पत्थरों से बने थे। मकानों के फर्श लीपे हुए होते थे, अनाज संग्रहण की गोल कोठियाँ बनाते थे।
3. लोग ईंट बनाना जानते थे, अनेक मकानों में ईंटों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं, कुछ मकानों की दीवारें मात्र मिट्टी की ही पायी गयीं।
4. कुछ बस्तियों जैसे बालाथल, गिलुण्ड में विशाल परकोटे / सुरक्षा दीवारें बनाई गयी, जो हडप्पा सभ्यता के नगरों के समकालीन तथा समतुल्य हैं। मेवाड के लोग हडप्पा की तरह विकसित हो रहे थे। अतः ये अद्वितीय प्रमाण है।
5. समाज में मुखिया व किसानों के अतिरिक्त अनेक प्रकार के काश्तकार थे यथाः धातुकर्मी, प्रस्तर औजार निर्माता, अर्धकीमती मणके बनाने वाले लोग, व्यापारी आदि।
6. आहड संस्कृति के लोग अत्यन्त विशिष्ट मृदभाण परम्पराः सफेद रंग से चित्रित काले व लाल बर्तनों से पहचाने जाते हैं।
7. इनका व्यापारिक / सांस्कृतिक सम्पर्क मध्य प्रदेश, गुजरात तथा उश्ररी राजस्थान के क्षेत्रों तक था।
बालाथल चार हजार तीन सौ वर्ष प्राचीन कास्य युगीन परकोटा
गणेश्वर संस्कृति
इस संस्कृति की पहचान पिछली शताब्दी में सत्तर के दशक में रत्नचन्द अग्रवाल ने की। गणेश्वर सीकर जिले में नीम का थाना तहसील में स्थित है। इस ग्रामीण संस्कृति के अब तक 125 स्थलों की पहचान की गयी है तथा गणेश्वर, जोधपुर व सुनारी नामक स्थलों का उत्खनन किया गया है। इसके सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण तथा निम्न प्रकार है-
1. इस ग्रामीण संस्कृति के स्थलों पर लोग कच्चे मिट्टी के मकानों में रह रहे थे।
2. इस संस्कृति की पहचान विशिष्ट प्रकार के मृदभाण्डों से होती है।
3. गणेश्वर संस्कृति के स्थलों से 5000 से अधिक तांबे/कांसे के तीर, कुल्हाडियाँ आदि खोजी गयी हैं तथा अनेक धातु प्रगलन स्थल भी खोजे गये हैं।
4. गणेश्वर जैसे ताँबे के तीर हडप्पा सभ्यता के अनेक स्थलों से प्राप्त हुए हैं। अब रासायनिक परीक्षणों से भी सिद्व हो चुका है कि इनका स्त्रोत खेतडी की प्राचीन खानें हैं।
5. पुरातात्विक अध्ययनों व वैज्ञानिक रासायनिक परीक्षणों से अब यह ज्ञात हो चुका है कि अरावली के कांस्ययुगीन ग्रामीण हडप्पा सभ्यता के नगरों में तांबों/कांसा निर्यात कर रहे थे।
हडप्पा सभ्यता (2600 स 1700 ई.पू.)
1. उत्तरी राजस्थान में घग्घर नदी से घाटी में गंगानगर तथा हनुमानगढ जिले में 98 हडप्पा सभ्यता के स्थलों की पहचान हो चुकी है, जिनमें से कालीबंगा, तरखानवाला ढेरा, 43 जी. वी., बिन्जोर, बरोर आदि का उत्खनन हुआ है। विस्तृत सर्वेक्षण व उत्खनन से स्पष्ट हुआ है कि प्राग / प्रारम्भिक हडप्पा सभ्यता के स्थलों / गांवों की संख्या सबसे अधिक थी जबकि उत्तर हडप्पा के स्थल अत्यधिक न्यून हैं। कालीबंगा जैसे विशाल शहर में गढी तथा निचले नगर के अवशेष प्राप्त हुए। घंग्गर नदी के किनारे बसे कालीबंगा में प्राग्हडप्पा संसकृति के लोग किले में रहते थे। नगर के दक्षिण-पश्चिम में कुछ दूरी पर शवागार पाए गए। शहरीकरण के दौरान हडप्पा वासियों ने इसी किले को चौडा व उॅचा किया। सबके लिये शवागार नहीं बनाये गये, अतः सम्भव है कि कुछ लोग मृतकों को जलाते होंगे। अर्थात अलग-अलग परम्पराओं के लोग साथ-साथ रह रहे थे। देवदार के ताबूत बनाकर भी शव दफनाये गये। निचले नगर के पूर्व से एक जुता हुए खेत के प्रमाण प्राप्त हुए। विशिष्ट मृदभाण्डों के अतिरिक्त लिपि के अनेक प्रमाण प्राप्त हुए।
अतः 5000 वर्ष पूर्व इन कास्ययुगीन संस्कृतियों ने राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में खेती, पशुपालन, व्यापार व कास्तकारी प्रारम्भ की।
2. लौह युग (1500 से 400 ई. पू.)
लौह युग के प्रमाण उत्तर तथा उत्तर पूर्वी राजस्थान के भागों से खोजे गए हैं। यहॉ अनेक स्थलों पर चित्रित धूसर मृदभाण्ड संस्कृति के (3000 से 2400 वर्ष प्राचीन) अवशेष खोजे गए हैं। उनके कुछ स्थल जैसे नोह, सुनारी, जोधपुर, बैराठ आदि का उत्खनन किया गया है। इस संस्कृति के लोग लौहे से परिचित थे। मिट्टी के कच्चे मकानों में रहते थे। राखिया रंग की थाली व लौटे जैसे मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे, जिनमें कभी-कभी काले रंग के चित्र बने होते थे, यह प्रमाण दक्षिणी राजस्थान में नहीं हैं।
ऐतिहासिक काल (600 ई. पू. से 600 ई.)
ऐतिहासिक काल के स्थल बडी संख्या में खोज गये है। रंगमहल, बैराठ, नगरी, कल्याणपुर आदि महत्त्वपूर्ण बस्तियाँ थी। बैराठ में अशोक का एक अभिलेख है इसके अतिरिक्त एक स्तूप के अवशेष भी है। उत्तरी राजस्थान में घग्गर नदी की घाटी में बडी संख्या में रंगमहल संस्कृति के स्थल खोजे गए हैं। पूर्वी राजस्थान में कुछ बौद्ध गुफाओं के अवशेष भी है। चित्तौडगढ के निकट नगरी में प्रथम-शताब्दी ई.पू. के शिवि जनपद के सिक्के प्राप्त हुए, जबकि उत्तर में टोंक जिले में बडी संख्या में गुप्तकालीन सिक्कों की खोज हुई है। यह अत्यन्त रोचक है कि दक्षिणी पूर्वी राजस्थान में स्थित अधिकांश आहाड सस्कृति के स्थलों के उपर ऐतिहासिक काल में भी बस्तियाँ प्राप्त हुई है उदाहरणार्थः आहड, बालाथल, गिलुण्ड, महाराज की खेण्डी, छत्रीखेडा आदि। उपर के निकट गोगुन्दा तथा आबुरोड के निकट चन्द्रावती में उश्रर ऐतिहासिक (600 से 1200 ईस्वी) के बीच बसासतों के प्रमाण मिले हैं। इस सम्पूर्ण ऐतिहासिक व उत्तर ऐतिहासिक काल के दौरान अगूचा(भीलवाडा), दरीबा तथा जावर में धातु खनन व प्रगलन कार्य चल रहा था।
मध्यकाल (12 वीं से 18 वीं शताब्दी)
ऐतिहासिक काल की भांति मध्यकालीन स्थलों को लगभग सम्पूर्ण राजस्थान में पहचान की गयी है। आबू रोड के निकट चन्द्रावती नामक विशाल नगर परमार राजाओं की राजधानी थी जिसके व्यापक उत्खनन से 3 किलों, बस्ती में तीन चरणों तथा वाछ टावरों की खोज की गयी है। पाली जिले में नाडोल नामक विशाल बस्ती थी जहां उत्खनन किया जा रहा है। यह चौहान राजाओं की नगरी थी। इसी तरह जयपुर के निकट रेड, साँभर की विशाल बस्तियों का भी उत्खनन किया गया है, जिनमें भवनों के अतिरिक्त बडी मात्रा में सिक्के भी प्राप्त हुए है।
किले बनाने का इतिहास राजस्थान में 5000 वर्ष प्राचीन है जैसा कि उत्तरी राजस्थान में कालीबंगा में प्राप्त है। इसी के समकालीन आहाड संसकृति के किले भी है। इन सभी में चौकोर बुर्ज बनाए गए। ऐतिहासिक काल में मात्र नगरी से ऐसी सूचना है, परन्तु मध्यकालीन नगरों में मात्र चन्द्रावती ऐसा नगर था जहॉ तीन किले थे। मेवाड की राजधानी को उदयपुर में स्थापित करने के पश्चात त्रिस्तरीय सुरक्षा दीवार तथा प्रवेश द्वारों के लिए गढियों का निर्माण किया गया। यह स्थापत्य का अत्यन्त रोचक उदाहरण है। अब कुछ महत्वपूर्ण किले यथा- जैसलमेर, चित्तौडगढ, रणथम्भोर, आमेर, कुम्भलगढ के साथ भरतपुर की कैलादेव पक्षी उद्यान अब विश्व धरोहर में सम्मिलित हो चुके हैं।
यद्यपि मृणमूर्तियॉ राजस्थान में 5000 वर्ष पहले से प्राप्त होती हैं, परन्तु मूर्तिकला का विकास ऐतिहासिक काल में प्रारम्भ होता है। जिसमें शैव, वैष्णव, शाक्त, जैन, बौद्ध सम्प्रदायों की प्रतिभा प्राप्त होती है। राज्य पुरातत्व विभाग के अनेक संग्रहालयों जैसे बीकानेर, कोटा, डूंगरपुर आदि में इन्हें देखा जा सकता है। जहाँ तक मन्दिर स्थापत्य का प्रश्न है। ओसियां, देलवाडा, रणकपूर, जगत के उदाहरण अद्वितीय हैं। मंदिरों की माठ-गुर्जर व प्रतिहार शैली का उद्भव राजस्थान में ही सम्भवतः 7-8वीं शताब्दी में हुआ, इसके दर्शन पश्चिमी भारत के अनेक भागों में दर्शनीय है। ओसियां तथा किराडू इसके प्रमुख स्थल हैं।
जल संरचनाएँ
जल संरचनाओं के प्रमाण पूर्व मध्यकाल में ही प्राप्त होने लगते हैं। उदाहरणार्थ नाडोल में राजस्थान की अत्यन्त प्राचीन बावडी के अवशेष हैं, इसके अतिरिक्त कुण्ड, तालाब व बांध मुख्य रूप से प्राचीन शासकों द्वारा सम्पूर्ण प्रदेश में बनाये गये। पश्चिमी राजस्थान में पारस्परिक जल संग्रहण, टाँका व जोहड में जल संरक्षण का ज्ञान महत्वपूर्ण है। मेवाड में बेडच में जगह-जगह बांध बनाकर वर्षा के जल के एक-एक बूंद को एकत्र करने की योजना अद्वितीय है, बाधों की ये विशेषता है कि उन्हें अन्दर की और से सीढियों बनाकर छिछला बनाया गया ताकि जल के संकेन्द्रीय बल से बांध की दीवार ना टूटे। बाधों की दीवारों में पत्थरों को जोडने हेतु लोहे के कब्जे भी लगाये गये जिससे बॉध को मजबूती प्रदान की जा सके। अरावली के पानी के ये विशाल बॉध व बावडियॉ अभियान्त्रिकी तथा प्रबन्धन के बेजोड उदाहरण हैं। जमीन में नीचे चट्टानों में जल की खोज भी भारतीयों की देन है, अरावली में इस ज्ञान का भरपूर उपयोग हुआ है। इसी कारण निश्चित जगहों पर ही बावडियां व कुऍ बनाये गये।

धातु
अरावली की पहाडियों में अनेक प्रकार की धातुओं के खनिज है यथा उश्रर में तांबा, मध्य में सीसा व दक्षिण में जस्ता, लोहा व तांबॉ। इन पहाडियों से पिछले 5000 वर्षों से धातुओं का खनन व प्रगलन हो रहा है।
यहाँ की कांस्ययुगीन संस्कृतियों ने पडोस के हडप्पा सभ्यता की बस्तियों को तांबा दिया, प्राचीन मंदिरों, बांधों तथा स्मारकों में जो लोहा लगा है वो अभी भी ठीक से काम हो रहा है। अर्थात् अरावली के प्राचीन लौह कर्मियों ने ऐसा लोहा बनाया जिसकी उम्र सैकडों वर्ष है।
उदयपुर के निकट जावर में 12वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी तक औद्योगिक स्तर पर शुद्व जस्ता बनाया गया। यहाँ सन् 1982 में अनेक जस्ता प्रगलन मिट्टियों की खोज की गयी। ये विशिष्ट भट्टिया दो मंजिला थी विश्व में सबसे पहले इसी स्थल पर शुद्ध जस्ते का निर्माण हुआ। भारत से 300 वर्ष बाद 16वीं शताब्दी में चीन में जस्ता बनना प्रारम्भ हुआ तथा तुलेनाग (भारतीय शब्द) नाम से उन्होंने यूरोप में बेचा। वर्ष 1736 तक यूरोप में लोग जस्ता नहीं जानते थे। पहले जस्ता जावर से यूरोप गया तथा बाद में चीन का इस तरह जस्ता प्रगलन का ये ज्ञान भारत से दुनियां भर में फैला ये भारत की देन है।

जावर जस्ते की 800 वर्ष प्राचीन जस्ते की भट्टिया
समस्याएँ / चुनौतियाँ
1 पाषणकालीन मानव के विकाश के चार चरण स्पष्ट रूप से देश के अनेक भागों में पहचाने गये हैं परन्तु राजस्थान में तृतीय चरण जो लगभग 45000 वर्ष से 10000 वर्ष के बीच था, अरावली के क्षेत्रों में धुंधला है, हमें ज्ञात नहीं है कि मनुष्य इस बीच में कहॉ गये।
2 देश के अधिकांश भागों में कृषि, पशुपालन व मिट्टी के बर्तनों की शुरूआत नवाष्ययुगीन संस्कृतियों ने की, परन्तु राजस्थान में इस संस्कृति के औजार या स्थल अब तक प्राप्त नहीं हो पाए हैं।
3 कांस्य युगीन संस्कृतियों (हडप्पा, गणेश्वर व आहाड) संस्कृतियों के उजडने के पश्चात लोग कहॉ गये ज्ञात नहीं है, उन्ही स्थलों पर लगभग 1000 वर्ष पश्चात पुनः बस्तियाँ क्यों बसी, लोग कहॉ से आये ज्ञात नहीं है।
4 उत्तरी तथा उत्तरी पूर्वी राजस्थान की तरह लौह युगीन संस्कृतियों का प्रसार दक्षिणी राजस्थान में क्यों नहीं हुआ? अज्ञात है
5 द्वितीय शहरीकरण के दौरान सम्पूर्ण अरावली क्षेत्र का चित्र अभी स्पष्ट नहीं है, क्या उत्तरी राजस्थान की तरह दक्षिणी भी अशोक के राज्य में था ?
6 ऐतिहासिक व मध्यकाल के बीच शक्ति केन्द्रो का इतिहास धुँधला है।
7 राजस्थान में आज पुरातात्विक स्थलों को बचाना सबसे बडी चुनौती है, चूँकि जब से जे. सी. बी. का प्रयोग प्रारम्भ हुआ है बडे पुरातात्विक स्थल भी तेजी से नष्ट किए जा रहे है। अतः उनको बचाना चुनौती है।
8 विश्वविद्यालय / कॉलेज में स्वतंत्र विषय के रूप में पुरातत्व नहीं पढाए जाने के कारण स्थलों की जानकारी समझ नहीं हो पा रही है।
9 अरावली का देश के इतिहास में सर्वाधिक महत्व धातु विज्ञान जस्ता, तॉबा, लोहा आदि का है परन्तु यह सबसे अधिक अछूता विषय है।
उपसंहार
अरावली को इस धरा पर मानव का इतिहास लगभग 15 लाख वर्ष प्राचीन है, यहॉ मानव विकाश के लगभग सभी सोपानों के दर्शन होते हैं। इन सभी सोपानों को यहाँ के सभी पाठ्यक्रमों में सम्मिलित किए जाने की आवश्यकता है। इस धरा पर लगभग 5000 वर्ष पहले गाँव बसने प्रारम्भ हो चुके थे अतः राजस्थान का इतिहास भी इतना ही प्राचीन है। हमें मात्र कडियाँ जोडनी है। खेतडी का काँस्ययुगीन धातु उधोग, जावर का जस्ता उधोग, चिश्रौड का कीर्ति व विजय स्तम्भ, मारू गुर्जर देवालय शैली इस धरा के पारम्भिक कास्तकार भाट/ख्यात परम्परा अद्वितीय है। अफ्रीका के ज्वार, बाजरा, पश्चिमी एशिया के गेह, दक्षिणी अमेरिका के मक्का-मिर्ची के यहाँ पहुँचने से पूर्व यहाँ खेतो की विशिष्ट परम्परायें विकसित हो चूकीं थी। ऐसा प्रतीत होता है की तारणा-तेरस में खाए जाने वाले 13 अनाजों की परम्परा का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। देश का इतिहास अरावली के पुरखों के ज्ञान/परम्पराओं से समृद्व होता हैं। े
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सम्पर्क - साहित्य संस्थान
ज.रा.ना.राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर