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मध्यकालीन राजस्थान इतिहास-लेखन और अलीगढ विश्वविद्यालय

बी. एल. भादानी
स्वतंत्रता के पश्चात राजस्थान इतिहास-लेखन में निरन्तर हो रही प्रगति आश्वस्त करने वाली है। शोधार्थी इतिहास-लेखन हेतु स्थापित परम्परागत साँचों के दायरों से बाहर निकल कर समाज अध्ययन के नए-नए आयामों एवं विषयों को अपने अध्ययन के केन्द्र में ला रहा है। पूर्व में इतिहास राजाओं-महाराजाओं के पारस्परिक संघर्षों, उनकी शौर्य-गाथाओं, उनके जनहितार्थ किए गए कार्यों, लीलाओं, विजयों एवं उनके स्वहितों आदि विषयों पर केन्द्रित होता था जो इतिहास-लेखन के प्रारम्भिक दौर की आवश्यकता थी। इसके साथ-साथ यह कालानुक्रम (chronology) ज्ञान एवं भविष्य की शोध का एक आवश्यक सोपान भी रहा है। इसके लिए इतिहास-जगत सदैव उन प्रबुद्ध इतिहासकारों का ऋणी रहेगा। इसके पश्चात इतिहास-लेखन एवं अध्ययन केन्द्र में समाज एवं उससे सम्बद्ध सम्पूर्ण आयाम सम्मिलित होने चले गए। समाज के बहुसंख्यक वर्ग एवं राज्य-शासकों के मध्य सम्बन्ध, उनकी प्रकृति, कृषि-सम्बन्ध, स्त्रियों के भू-अधिकार, कृषीय व्यापार, वाणिज्य-व्यापार, व्यापारिक समूह, भूमि अनुदान प्राप्त धार्मिक समूह, जागीरदार एवं जमीन्दार अध्ययन के केन्द्र में आ गए। इनके अतिरिक्त पूर्व-आधुनिक युग में ग्रामीण एवं जनसांख्यिकी, शहरीकरण और उसकी प्रत्रिज्या, बाजार एवं उनका स्तरीकरण, विज्ञान-तकनोलॉजी, वाटर हार्वेस्टिंग तकनीक, बाँधों एवं पुलों के निर्माण की विधि भी शोध के केन्द्र में आ गए। विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक समूहों की विचारधारा एवं उनकी मूल्य व्यवस्था का अध्ययन भी इतिहास-लेखन की धारा का अंग हो गया।
राजस्थान के प्रारम्भिक मध्यकाल, मध्यकाल एवं आधुनिक काल के पक्षों पर वस्तुनिष्ठ, वैज्ञानिक एवं अन्तःविषयक (inter-displinary) दृष्टिकोण से शोध अलीगढ, जवाहरलाल नेहरू, दिल्ली एवं देश के अन्य विश्वविद्यालयों में की जा रही है। इस आलेख में मात्र इतिहास विभाग, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय द्वारा राजस्थान इतिहास पर की जा रही शोधों को रेखांकित करने का प्रयास किया जा रहा है ताकि वहां की जा रही शोधों को उजागर किया जा सके और साथ ही इस क्षेत्र में अलीगढ की अग्रगामी भूमिका को उल्लेखित किया जा सके। इसका तात्पर्य दूसरे विश्वविद्यालयों में की जा रही शोधों के महत्त्व को कम आंकने का मकसद कत्तई नहीं है।
स्वतंत्रता के पश्चात इतिहास-लेखन के विकास को रेखांकित करने से पूर्व राजस्थान इतिहास को पहिचान देने वाले जेम्स टॉड एवं राज्यों के संरक्षण में लिखने वाले इतिहासज्ञों श्यामलदास, गौरीशंकर ओझा एवं विश्वेश्वरनाथ रेउ द्वारा लिखित इतिहास के बारे में संक्षेप में जानकारी अपेक्षित है। सर्वप्रथम इतिहास में राजस्थान शब्द के प्रयोग की शुरूआत कब और किसने की इसके लिए राजस्थानी साहित्य पर नजर डालना आवश्यक है। मध्यकालीन ख्यात, वात, डिंगल एवं लोक साहित्य में राजस्थांन, राजथांन एवं राजसथांन शब्द शासकों, जागीरदारों, ठिकानेदारों एवं भोमियों के मुख्यालयों अथवा उनके शासकीय मुख्य केन्द्रों के लिए उपयोग में लिया जाता था न कि आधुनिक राजस्थान प्रान्त के सन्दर्भ में। जेम्स टॉड 1818 से 1822 ई. के मध्य गवर्नर - जनरल ऑफ इण्डिया के पश्चिमी राजस्थान के राजनीतिक प्रतिनिधि की नियुक्ति के दौर को अपने निर्धारित कर्त्तव्यों के निर्वहन के अतिरिक्त उसने अपने अधीन क्षेत्र के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक जीवन को गहराई से समझने-परखने का प्रयास किया। उसने अपने इस काल को सृजनात्मक बनाने का निश्चय किया जिसमें उसे सफलता मिली। उसने राजपूत कुलों (clans), उनके द्वारा स्थापित राज्यों (राजथांन या राजसथांन) के स्वामियों (धणियों) का राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं उनकी नीतियों का इतिहास लिखा। इसी आधार पर उसने अपने ग्रन्थ के शीर्षक में राजस्थान शब्द का उपयोग किया न कि वर्तमान राजस्थान प्रान्त के सन्दर्भ में।1 लेकिन इस शब्द की ध्वनि आधुनिक राजस्थान के समतुल्य प्रतीत होती थी, इसलिए भ्रमवश आधुनिक इतिहासकारों ने सम्पूर्ण प्रान्त हेतु प्रथम बार राजस्थान शब्द के प्रयोग का श्रेय टॉड को दिया है। इसी बिन्दु की ओर जहूर खाँ मेहर ने अपनी प्रस्तावना में संकेत किया है।2
टॉड को इस बात का श्रेय जाता है कि उसने अपने इतिहास-लेखन हेतु समकालीन एवं परवर्तोकालीन मूल स्रोतों का न केवल संकलन किया, बल्कि उनका यथा स्थान उपयोग किया। स्थानीय भाषाओं एवं शास्त्रीय भाषाओं से वह अनभिज्ञ था इसलिए उसने विज्ञ विद्वानों से सम्पर्क स्थापित करके उन्हें अपना शिक्षक एवं सहयोगी बनाया। उसने संस्कृत, प्राकृत एवं प्राचीन राजस्थानी भाषा साहित्य एवं हस्तलिखित ग्रन्थों को पढने एवं उनका अध्ययन करने के लिए माँडलगढ के जैन यति ज्ञानचन्दजी को अपना गुरु बनाया। इनके अतिरिक्त संस्कृत पण्डितों, फारसी के ज्ञाताओं एवं डिंगल कवियों का भी इस सम्बन्ध में सहयोग प्राप्त किया। राजपूत रियासतों के विभिन्न क्षेत्रों की यात्राओं से प्राप्त सामग्री (कहावतों एवं जनश्रुतियों) को उसने साक्ष्यों का स्तर प्रदान किया एवं अपने ग्रन्थ लेखन में उपयोग किया। क्षेत्र के चारणों-भाटों एवं वृद्धजनों से बातचीत के द्वारा मौखिक जानकारियों का संकलन किया। प्राचीन देवालयों, महलों एवं अन्य प्रकार के स्मारकों के सर्वेक्षण के द्वारा साक्ष्य संग्रह किए। टॉड ने पुराणों से लेकर ऐतिहासिक काव्य ग्रन्थों, ख्यातों, शिलालेखों, ताम्रपत्रों, सिक्कों एवं लघुचित्रों का संकलन किया जिनको अपने इतिहास-लेखन में उपयोग किया जिससे साक्ष्यों के प्रति उसके दृष्टिकोण एवं तथ्यात्मकता से उसके लगाव की पुष्टि होती है।
टॉड ने राजपूत रियासतों के राजनैतिक इतिहास के साथ-साथ आर्थिक एवं राजस्व से सम्बन्धित आँकडों का संकलन किया। इसके अतिरिक्त, जागीरदारों, भोमियों एवं बसी-धारकों (अधीनस्थ कृषकों के स्वामी) एवं शासकों के साथ उनके सम्बन्धों की प्रकृति पर भी प्रकाश डाला है। राजपूत रियासतों एवं जागीरदारों के मध्य सम्बन्धों को लेकर पश्चातवर्तियों ने टॉड को कई रिप्रजेन्टेशन किए थे जिनमें राज्य पर उनकी साझेदारी का दावा किया गया था। उपरोक्त वर्गों के साथ-साथ उसने व्यापार-व्यापारियों, शहरी समुदायों, गोलों, दासों एवं जनजातियों - भील, गरासिया एवं मीणा जनजातियों के बारे में सामग्री के संकलन के द्वारा अपने ग्रन्थ को व्यापकता प्रदान करने का प्रयास किया।3
टॉड की मुख्य विशिष्टता मूल स्रोतों का संकलन एवं उनको अपने अध्ययन का आधार बनाना रहा है। मूल स्रोतों के साथ-साथ उसने पुरातात्विक सर्वेक्षणों को भी अपने अध्ययन का आधार बनाया जैसा कि उसने विशेषतः महाराणा प्रताप के जीवन संघर्षों के साक्ष्यों का अरावली पहाडियों में बिखरे होने का संकेत किया है। ब्रिटिश इतिहासकार ने भौगोलिक विवरणों एवं मानचित्रों के द्वारा अपने अध्ययन को पुख्ता आधार प्रदान किया।
ब्रिटिश इतिहासकार ने अपने ग्रन्थ लेखन द्वारा इतिहास लेखन की एक परम्परा की नींव रखी जिस लीक पर चलते हुवे भावी इतिहासकारों ने उस परम्परा के दायरे के विस्तार के साथ-साथ उसे पुख्ता आधार पर खडा करने का प्रयास किया। टॉड के ग्रन्थ के प्रकाशन के साथ ही राजपूत राज्यों के शासकों ने अपने राज्य के इतिहास लेखन हेतु इतिहास कार्यालय की स्थापना की एवं राज्य के उपलब्ध साक्ष्य इतिहासकारों को उपलब्ध करवाए। लगभग आधी शताब्दी के पश्चात (1886 ई.) कविराज श्यामलदास ने वीरविनोद (मेवाड का इतिहास) की रचना की। वैसे सर्वप्रथम उसने सम्पूर्ण विश्व के देशों के भूगोल को स्थान दिया। वैसे तो लेखक का मुख्य उद्देश्य मेवाड इतिहास लेखन था, लेकिन साथ ही राजस्थान की अन्य राजपूत रियासतों के राजनीतिक इतिहास को भी स्पर्श किया। लेखक की मुख्य विशेषता शिलालेखों, प्रशस्तियों, फारसी की प्रशस्तियों एवं मुगल शासकों द्वारा मेवाड के महाराणाओं के नाम जारी किए गए फरमानों की मूल प्रतियों को प्रकाशित करने की है। इस संग्रह में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज मुगल शहजादा औरंगजेब द्वारा मेवाड के महाराणा राजसिंह के नाम उसके हाथ के पंजे की छाप के साथ जारी निशान है जिसके माध्यम से वह उत्तराधिकार के युद्ध में महाराणा की सहायता चाहता है।4 एक शताब्दी के पश्चात (1938 ई.) गौरीशंकर हीराचन्द ने जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, डूँगरपुर, बांसवाडा एवं सिरोही राज्यों के इतिहासों के लेखनकार्य को सम्पन्न किया। हालाँकि यह कहा जा सकता है कि इतिहास-लेखन की उनकी योजना टॉड से प्रभावित थी, लेकिन उन्होंने स्थानीय स्रोतों का भरपूर उपयोग करके टॉड की परम्परा के दायरे को विस्तार दिया। उन्होंने स्थान-स्थान पर ब्रिटिश इतिहासकार से सहमति एवं असहमति प्रकट की। मारवाड के अन्य इतिहासकार विश्वेश्वरनाथ रेउ द्वारा लिखित मारवाड का इतिहास (दो भाग) भी 1938 ई. में इतिहास-जगत के सम्मुख आया। उपरोक्त तीनों इतिहासकारों द्वारा लिखित इतिहास राजकीय आदेश एवं संरक्षण में लिखे गए थे, इसलिए राज्यों की नीतियों से प्रभावित होना स्वाभाविक था जिस ओर डॉ. मयंक कुमार ने अपने आलेख में संकेत किया है।5 स्वतंत्रता-पूर्व के अधिकांश इतिहासज्ञों ने राजपूत कुलों एवं शासकों को केन्द्र में रखकर इतिहास लेखन किया जिसे टॉड इफेक्ट कह कर पुकारा जा सकता है।
ऊपर जो टॉड इफेक्ट की सूक्ति का उपयोग किया है उसका तात्पर्य नकारात्मक कतई नहीं है बल्कि यहाँ यह रेखांकित करने का प्रयास किया गया है कि अधिकांश विद्वानों ने अपने इतिहास-लेखन के मुख्य केन्द्र में राजपूत शासकों एवं कुलों को रखा, परन्तु इतिहास लेखन की प्रारम्भिक स्थिति हेतु यह आवश्यक भी था ताकि हम किसी भी क्षेत्र विशेष के राजनीतिक इतिहास एवं शासकीय कुलों (बसंदे) की संरचना के बारे में जान सकें। इस श्रेणी में डॉ. दशरथ शर्मा, डॉ. गोपीनाथ शर्मा, डॉ. मथुरालाल शर्मा एवं गणपत सिंह चीतलवाना के लेखन को ले सकते हैं। डॉ. शर्मा के ग्रन्थ अर्ली चौहान डाईनेस्टीज से चौहानों के राज्य प्रशासन के बारे में जानकारी प्राप्त होती है जबकि चीतलवाना का ग्रन्थ अग्निवंशियों का मूल इतिहास राजपूतों की उत्पत्ति पर केन्द्रित है।
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राजस्थान इतिहास-लेखन को एक नई दिशा देने का श्रेय अलीगढ स्कूल राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर एवं बाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली को दिया जा सकता है। इसके परिप्रेक्ष्य में 1963 ई. में प्रकाशित प्रोफेसर इरफान हबीब के ग्रन्थ The Agrarian System of Mughal India (1556-1707) की उल्लेखनीय भूमिका को कारण माना जा सकता है। इस ग्रन्थ में मुगलकालीन अर्थव्यवस्था, कृषि उत्पादन, जागीर व्यवस्था, जमीन्दारी व्यवस्था, ग्राम समुदाय, राजस्व व्यवस्था एवं कृषकों की भौतिक परिस्थितियों का विस्तार से विवेचन किया गया था। लेखक ने राज्य द्वारा अधिकतम राजस्व वसूली, जागीरदारों-जमीदारों, अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों के द्वारा वसूली उनके मध्य अन्तर्विरोधों एवं परिणामतः कृषक-विद्रोंहों को अपने ग्रन्थ में रेखांकित किया। जिस प्रकार मुगलकालीन अर्थव्यवस्था के विभिन्न पक्षों एवं उसके कार्यान्वयन पर विस्तार से इस ग्रन्थ में विवेचना की गई थी जिसने शोध की दिशा निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।6
1960-61 ई. के प्रारम्भ में प्रसिद्ध माक्र्सवादी इतिहासकार एवं गणितज्ञ प्रोफेसर डी. डी. कोशाम्बी का इतिहास विभाग में व्याख्यान था, तब उन्होंने जयपुर अभिलेखागार में संरक्षित अडसट्टा एवं अन्य प्रकार के दस्तावेजों का जिक्र किया और कहा कि इनमें संरक्षित आर्थिक आँकडे अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।7 इसके पश्चात विभाग के तत्कालीन शोधार्थी सत्यप्रकाश गुप्ता को राजस्थानी अडसट्टा पर शोध का विषय प्रदान किया गया एवं इन दस्तावेजों में उपलब्ध आँकडों की विवेचना करने हेतु विभाग में एक सांख्यिकीवेत्ता की नियुक्ति की गई। गुप्ता ने विभाग में नियुक्त सांख्यिकीवेत्ता शीरीं मूसवी के साथ सतरहवीं सदी के उत्तरार्द्ध एवं अठारहवीं के पूर्वार्द्ध के अडसट्टों में प्रात फसलों के मूल्य एवं राजस्व दरों के मध्य सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया।8 इसके पश्चात इन दस्तावेजों का सूक्ष्म स्तर (उतपबतव समअमस) पर अध्ययन का प्रयास 1966 ई. में दो आलेखों के रूप में हमारे सम्मुख प्रकाश में आया। जयपुर परगना रिकाड्र्स एवं उनमें प्राप्त गाँव स्तर के आर्थिक आँकडों का अध्ययन प्रथम बार इतिहास जगत के सम्मुख प्रस्तुत किया गया।9 इसी वर्ष के अन्त में आम्बेर के कृषि-उत्पादनों के पैटर्न एवं उसे प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचनात्मक व्याख्या की गई।10 आम्बेर दस्तावेजों पर केन्द्रित कई शोध आलेख उन्नीस सौ सत्तर के दशक में प्रकाश में आए जिन्होंने राजस्थान इतिहास-लेखन की एक दिशा निर्धारित करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।11 उन आलेखों ने शासक एवं राजनीतिक इतिहास केन्द्रित शोध की बनिस्बत कृषक वर्गों की आर्थिक स्थिति, ग्रामीण समाज में जागीरदारों एवं भोमियों (ज़मीदारों) की भूमिका के अध्ययन पर अधिक बल दिया जाने लगा। यहाँ स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि जब मैं यहाँ अलीगढ में हो रही शोध की दिशा निर्धारित करने वाली कर रहा हूँ तब इसका अर्थ तत्कालीन समय में राजस्थान या देश के किसी अन्य विश्वविद्यालय में हो रही शोध को नकारने का नहीं है बल्कि शोध की प्रकृति में आ रहे परिवर्तन को रेखांकित करने मात्र का है।
पूर्वी राजस्थान के अतिरिक्त पश्चिमी राजस्थान के मारवाड अंचल से सम्बन्धित मुंहता नैणसी द्वारा रचित मारवाड रा परगना री विगत एक प्रकार का ऐसा गजेटियर है जिसमें सात परगनों (जोधपुर, सोझत, जैतारण, फलोदी, मेडता, पोकरण एवं सिवाना) के सम्पूर्ण गाँवों का विवरण उपलब्ध है जिसमें निवासी जातियाँ के नाम, कृषि उत्पादन, हल-गणना, कुँओं-बावडियों की गणना एवं परगना मुख्यालयों में अंकित जातिवार घर-गणना आदि अंकित हैं। सतरहवीं सदी उत्तरार्द्ध में मारवाड की अर्थव्यवस्था पर प्रोफेसर इरफान हबीब के निर्देशन में 1975 ई. में भँवरलाल भादानी ने शोधकार्य प्रारम्भ किया। इसी वर्ष परगना मेडता की आर्थिक स्थितियों पर प्रथम शोध आलेख प्रकाश में आया। इस विषय पर शोध आलेख लिखने का उद्देश्य मुंहता नैणसी द्वारा मेडता के प्रत्येक गाँव के बारे में विस्तृत आंकडे उपलब्ध करवाना रहा था। इसमें जोती जाने वाली भूमि की बीघों में मात्रा, सिंचाई के साधनों की कुल संख्या, कृषि उत्पादन, राजस्व वसूली की दरें, ग्रामीण जातियाँ एवं उनके द्वारा निवासित गाँवों का प्रतिशत एवं 1663 ई. में मेडता शहर की घर-गणना आदि सम्मिलित है। नैणसी द्वारा संकलित मेडता शहर की जातिवार घर-गणना के आधार पर 1663 ई. में जनसंख्या के आँकडे प्राप्त किए गए एवं उसकी 1881 से 1961 ई. की जनसंख्या से तुलना के द्वारा यह प्रमाणित किया गया कि 1663 ई. के जनसंख्या के स्तर तक मेडता शहर की जनसंख्या उस आँकडे तक 1961 ई. तक भी नहीं पहुँच पाई। इस अध्ययन के आधार पर कईं महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले गए यथा 1663 ई. में पश्चातवर्ती शताब्दियों की तुलना में सिंचाई की उन्नत अवस्था थी। शहरी जनसंख्या, वस्त्र उद्योग पर निर्भर दस्तकारों एवं सिंचाई के साधनों में उन्नीसवीं सदी में गिरावट उल्लेखनीय निष्कर्ष था।12
सतरहवीं सदी उत्तरार्द्ध में मारवाड की ग्रामीण एवं शहरी जनसंख्या क्रमशः हल-गणना एवं घर-गणना के आधार पर ज्ञात की गई। ग्रामीण जनसंख्या ज्ञात करने हेतु 1663 ई. में उपलब्ध गाँवों की संख्या 1961 ई. के गाँवों के साथ तुलना के द्वारा यह निश्चित किया कि गाँवों की संख्या में स्थिरता रही उनमें कोई परिवर्तन नहीं आया। इसका तात्पर्य यह हुआ कि 1663 ई. से जनसंख्या में औसत वृद्धि प्रति गाँव में हुई न कि कुल गाँवों की बढोतरी के माध्यम से। इसके पश्चात 1930 की ग्रामीण जनसंख्या एवं हलों के मध्य उपलब्ध अनुपात को 1663 ई. के लिए सही मान कर (यह मानते हुए कि इस मध्य कृषि तकनोलोजी अपरिवर्तित रही) उस पर लागू करके ग्रामीण जनसंख्या ज्ञात की गई। इसी प्रकार घर-गणना के द्वारा शहरी जनसंख्या का अनुमान लगाया जिसकी तुलना 1891 ई. के साथ की गई। इस अध्ययन का निष्कर्ष यह रहा कि 1658-64 ई. की कुल जनसंख्या 1891 ई. की गणना की 80.73 से 82.85 प्रतिशत थी। इन आकडों के अनुसार इन्हीं वर्षों में शहरी जनसंख्या 14.45 से 14.82 प्रतिशत के मध्य थी जबकि 1891 ई. में यह 10.60 प्रतिशत थी। शहरी जनसंख्या में गिरावट उन्नीसवीं सदी की गिरती अर्थव्यवस्था की ओर संकेत करती है। राजस्थान विशेषतः मारवाड के सन्दर्भ में सतरहवीं सदी की जनसंख्या के अनुमान का यह प्रथम प्रयास था।13
राजस्थान के आर्थिक इतिहास लेखन में कृषक को केन्द्र में रखकर महत्त्वपूर्ण शोध कार्य किए गये। कृषक एक अखण्डित (monolith) समूह नहीं था बल्कि यह स्तरीकृत वर्ग था। किसान या करसा एक ऐसा शब्द था जो किसानों की सभी श्रेणियों हेतु उपयोग में लिया जाता था। कृषकों के मध्य स्तरीकरण दो स्तरों पर था - आर्थिक एवं जातीय समूह के स्तर पर। कुछ किसान ऐसे थे जिनके पास अपार कृषि संसाधन थे जिसके आधार पर वे बाजार के लिए फसलों का उत्पादन करते थे, जबकि दूसरी ओर सामान्य किसान थे जो अपने जीवन निर्वाह हेतु केवल खाद्य पदार्थ उगाते थे। इसके अतिरिक्त किसानों के मध्य उच्च जाति के किसान एवं निम्न (menial) जाति के कृषकों की जनसंख्या थी।14 एस. पी. गुप्ता15 एवं दिलबाग सिंह16 ने पूर्वी राजस्थान के सन्दर्भ में कृषकों के स्तरीकरण को रेखांकित किया है।
मारवाड में बसी अर्थात अर्ध-दास (semi-serfs) श्रेणी के कृषक भी थे जो भूस्वामियों के पूर्णतः अधीन थे। इस श्रेणी के कृषक मारवाड के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों के लिए साक्ष्य अब तक उपलब्ध नहीं हुवे हैं। टॉड ने बसी को गोला (फारसी, गुलाम, दास) एवं स्वतंत्र कृषक से भिन्न माना है।17 ग्रामीण समाज से सम्बद्ध एक अन्य बिन्दु को भी चरागाहों, पशु-उत्पादों एवं पशुओं की संख्या के अनुमान को भी अध्ययन में समाहित किया गया।
ग्रामीण समाज में कृषक वर्ग के अतिरिक्त ग्रामीण सेवकों एवं दस्तकारों को इतिहास अध्ययन के दायरे में लाया गया जो उस समाज के अविभाज्य अंग थे। इनमें मेहतर, कुंभार, मोची, ढेढ, चमार, भाँभी, सोनार, लुहार, सुथार एवं दर्जी आदि। इस वर्ग के लोग ग्रामीण समाज के लोगों को अपनी सेवाएं प्रदान करते थे जिसके बदले में उन्हें फसल कटने के समय अनाज के रूप में भुगतान किया जाता था। ये सम्बन्ध जजमानी व्यवस्था कहलाते थे जो ग्रामीण समाज के मध्य सामंजस्यपूर्ण सम्बन्धों के प्रतीक थे जिसे ब्रिटिश सरकार ने समाप्त करके ग्रामीण समाज के सम्बन्धों के ताने-बाने को समाप्त करने का कार्य किया। इनके अतिरिक्त शहरी दस्तकारों एवं श्रमिकों पर अध्ययन की ओर भी ध्यान दिया गया। सतहरवीं शती में वस्त्र उद्योग एवं चमडा उद्योग की उन्नीसवीं शती के साथ तुलनात्मक अध्ययन के द्वारा यह निष्कर्ष निकाला गया कि बाद के दौर में इन उद्योगों का पतन हो गया। इसका कारण इंग्लैण्ड के कारखानों में निर्मित मालों का भारत में आगमन था, इसलिए यहां शहरी उद्योगों के पतन का दौर आरम्भ हो गया जिसके परिणामस्वरूप शहरों का भी पतन हुवा। इसी बिन्दु पर आधुनिक भारत में स्वदेशी एवं बाद में स्वतंत्रता आन्दोलन विकसित हुआ।
ग्रामीण एवं शहरी अर्थव्यवस्था एवं समाज में व्यापारी वर्ग की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है जिसे इतिहास-लेखन में सम्मिलित किया गया। अनाज व्यापार से लेकर अन्य आर्थिक गतिविधियों में उनकी भूमिका को दस्तावेजों के आलोक में रेखांकित किया गया। इनके अतिरिक्त बाजार एवं बाजार-विन्यास (market mechanism)18 को अध्ययन का अंग बनाकर इतिहास-लेखन की सीमा का विस्तार किया गया।
आर्थिक एवं सामाजिक इतिहास-लेखन के अतिरिक्त, एस. इनायत अली जैदी ने 1605-59 के मध्य मुगल एवं राजपूतों के सम्बन्धों की प्रकृति पर शोधकार्य प्रारम्भ किया।19 मयंक कुमार ने अपने आलेख में उनकी शोध को रेखांकित करते हुवे लिखा है कि उन्होंने मुगलों के अधीन और राजस्थान के राज्यों में प्रशासनिक और सैन्य संस्थानों का तुलनात्मक विश्लेषण किया। उनके आपसी हितों पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने मुगल और राजपूत राज्यों के समन्वय, आपसी तालमेल, कभी-कभी प्रतिस्पर्धा की विवेचना करते हुए यह इंगित किया कि राजनीतिक ढाँचों में बहुत समानता देखी जा सकती है। इसको राज्यों में नितांत हिन्दू राजनीतिक प्रणाली और मुगलों के राज्य को इस्लामिक मानते हुए उनमें टकराव के रूप में चित्रित करने की प्रवृत्ति को ऐतिहासिक दृष्टि से गलत प्रमाणित किया।20 इसी प्रकार डॉ. सुनीता जैदी ने सूबा अजमेर के प्रशासन एवं उसके अन्तर्गत सरकारों एवं परगनों की व्यवस्था पर फारसी एवं राजस्थानी दस्तावेजों को अपने अध्ययन का आधार बनाया।21
अभिलेखीय एवं साहित्यिक स्रोतों के अतिरिक्त पुरातात्विक स्रोतों की दृष्टि से भी राजस्थान काफी सम्पन्न है भूतल के साथ-साथ भूमि की सतह पर असंख्य पुरातात्ति्वक साक्ष्य बिखरे पडे हैं। मध्यकालीन पुरातत्त्व के क्षेत्र में शोध प्रारम्भ करने का श्रेय भी ए. एम. यू. अलीगढ के इतिहास विभाग को जाता है। प्रोफेसर इक्तिदार आलम खां ने रवीन्द्र कुमार के साथ 1977 ई. मुगल हाई-वे पर स्थित मध्ययुगीन सरकारी एवं गैर-सरकारी भवनों के सर्वेक्षण का कार्य प्रारम्भ किया। इस सर्वेक्षण पर आधारित इक्तिदार आलम खान का प्रथम आलेख नील की कुंडियों पर प्रकाश में आया। राजस्थान के भरतपुर जिले में बयाना स्थित है, जहाँ नील की खेती होती थी एवं बाद में नील बनाई जाती थी जिसका व्यापक स्तर पर यूरोप एवं अन्य देशों में निर्यात होता था। यहां निर्मित नील की माँग अत्यधिक थी जिसके लिए यूरोपियन देशों के व्यापारियों का जमघट लगा रहता था। यहां पर नील की फसल कटने के पश्चात उसको तीन सोपानों पर निर्मित कुंडियों में भिगोया जाता था और बाद में इसको टुकडों में काट कर बेचा जाता था। नील निर्माण की इस देशज तकनोलोजी पर यह महत्त्वपूर्ण आलेख था।
रवीन्द्र कुमार का शोध का विषय भी पुरातात्ति्वक सर्वेक्षण से सम्बन्धित था। दोनों का संयुक्त आलेख 1986 ई. में आम्बेर-स्थित मानसागर बाँध पर प्रकाश में आया।22 मेवाड राजवंश के ईष्ट देवता एकलिंगजी देवालय के पृष्ठ भाग में सम्भवतः नौंवी-दसवीं सदी में निर्मित इन्द्र सरोवर नामक एक बाँध है जिसका निर्माण मन्दिर की सुरक्षा हेतु किया गया था लेकिन बाद में इससे सिंचाई हेतु नहर निकाली गई।23 विभाग के राजीव शर्मा एवं एस.ए.नदीम रेजावी ने जयगढ दुर्ग के वर्षा-जल संग्रह की तकनीक पर शोध आलेख लिखा जो 1993 ई. में प्रकाश में आया।24 इस आलेख में यह रेखांकित किया गया कि किस प्रकार पहाडी क्षेत्र में बरसने वाले वर्षा-जल को नहर के द्वारा एक विशाल टाँके में भविष्य की आवश्यकता हेतु संग्रह किया जाता था। एक पहाडी छोर से टांके तक लाने हेतु लम्बी नहर में बीच-बीच में जल को फिल्टर करने की व्यवस्था भी की गई थी जिससे कुंड में शुद्ध पानी एकत्रित हो सके।
पूर्व-आधुनिक काल में असंख्य बाँधों का निर्माण करवाया गया था जो सिंचाई हेतु उपयोगी थे। राजस्थान के अधिकांश भागों में आज भी वे अवस्थित हैं। पुरातत्त्वविदों के अध्ययन के लिए ये महत्त्वपूर्ण साक्ष्य मुहैया करवाते हैं। इसी प्रकार मध्यकाली मेवाड के ग्रेविटी बाँधों के इन्जिनियरिंग पक्ष पर रवीन्द्र कुमार का आलेख उल्लेखनीय था।25 मेवाड स्थित सभी बाँधों एवं जलाशयों का अध्ययन बी.एल.भादानी द्वारा किया गया जिसमें नौंवी से लेकर सतहरवीं शती तक बाँधों को सम्मिलित किया गया है। जिसमें उदयसागर, राजसमन्द एवं जयसमन्द मुख्य हैं। इन जलाशयों की निर्माण से सम्बन्धित तकनोलोजी, इनसे निकलने वाली नहरों एवं सिंचाई की विधि को रेखांकित किया गया है।26 इसी प्रकार जैसलमेर जैसे शुष्क प्रदेश में छोटे देशज बाँधों के निर्माण के द्वारा व्यापक स्तर पर सिंचाई की जाती थी जिन बाँधों को स्थानीय भाषा में खडीन कहा जाता है।27 इसी प्रकार जैसलमेर स्थित पालीवालों के गाँव कुलधरा पर नदीम अली रेजावी का उल्लेखनीय आलेख प्रकाश में आया जिसमें उन्होंने मध्यकालीन सेटलमेन्ट के अवशेषों के सामाजिक आर्थिक निहितार्थ को रेखांकित करने का प्रयास किया है।28 इसी प्रकार सर्वेक्षण पर आधारित रेगिस्तान के जल संचयन की पद्धतियों, शुष्क प्रदेश एवं न्यूनतम वार्षिक वर्षा के न्यूनतम अनुपात के पश्चात भी तालाबों एवं कुँओं से की जाने वाली सिंचाई की पद्धतियों पर अध्ययन किया गया जो राजस्थान के शुष्क प्रदेश में कृषि हेतु आवश्यक था। इस विषय पर केन्द्रित जिबराईल का ग्रन्थ अन्यन्त महत्त्वपूर्ण है।29 जिबराईल ने अपने इस ग्रन्थ में थार मरुस्थल के उन स्थानों के वर्षा एवं भूजल की हार्वेस्टिंग तकनीकों के बारे में लिखा है जहाँ पानी की अत्यधिक कमी है। वाटर हार्वेस्टिंग की विभिन्न तकनीकों से यहां के निवासियों द्वारा जल संग्रहण एवं संग्रहित जल को सिंचाई के उपयोग में लाने के प्रयास उनके अथाह ज्ञान को दर्शाते हैं। उन्होंने फलौदी, नागौर, बीकानेर, चुरू, छापर, द्रोणपुर एवं जैसलमेर क्षेत्रों को अपने अध्ययन में सम्मिलित किया है।
उपरोक्त कार्य के अतिरिक्त जिबराईल का अध्ययन अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी राजस्थान के शहरों की अर्थव्यवस्था एवं जनसंख्या पर है जिसमें उन्होंने जयपुर, चुरू (बीकानेर), कोटा, नागोर एवं शोखावाटी के शहरों पर मुख्यतः अपना अध्ययन केन्द्रित किया है। इस अध्ययन में उन्होंने शहरों के विकास के लिए विभिन्न कारणों को उत्तरदायी ठहराया है। शेखावाटी के शहरों के लिए कृषि उत्पादन जबकि सांगानेर के कस्बे के रूप में विस्तार के लिए टेक्सटाईल एवं केलिको-छपाई को कारण बताया है। दक्षिण राजस्थान में कोटा के सांगोद एवं मांगरोल कस्बों के दस्तकारों एवं निम्न जातियों की जनसंख्या का अध्ययन किया है एवं वस्त्र उद्योग में लगे कारीगरों की संख्या में पतन का निष्कर्ष निकाला है। इसी प्रकार बीकानेर के कस्बा चुरू एवं मारवाड के पाली और नागोर का अध्ययन किया है जिसमें उनके विकास में व्यापारिक मार्ग पर उनकी अवस्थिति को उत्तरदायी ठहराया है। इनके साथ ही टॉड द्वारा अंकित कुछ शहरों की जनसंख्या का विश्लेषण किया है।30
सुम्बुल हलीम खाँ का जयपुर के कारखानों पर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण शोधकार्य है। इसमें उन्होंने जयपुर के विभिन्न प्रकार के कारखानों एवं उनमें निर्मित होने वाली वस्तुओं को अपने अध्ययन का आधार बनाया है। इन कारखानों में मुख्य हैं: सूरतखाना, चित्रखाना, रंगखाना, पोथीखाना, सिलेहखाना, तोपखाना, पाल्कीखाना, शुतुरखाना एवं जीखाना आदि। पुस्तक प्रकाशन से पूर्व डॉ. खान ने आम्बेर के कारखानों पर कई शोध आलेख लिखे जिनके माध्यम से उन्होंने इनके सामाजिक एवं आर्थिक महत्त्व को उजागर किया।31 डॉ. खान ने आम्बेर के कारखाना दस्तावेजों के आधार पर इन कारखानों की कार्य प्रणाली एवं उत्पादन पर विस्तार से अध्ययन किया है। यह शोध मुगल साम्राज्य के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।32
उपरोक्त विषयों पर अध्ययन के अतिरिक्त कईं युवा शोधार्थी राजस्थान के विभिन्न आयामों पर शोधरत हैं जिनमें मुख्य हैं प्रो. मानवेन्द्र पुण्ढीर, डॉ. रश्मी उपाध्याय, डॉ. सय्यद सुम्बुल आरिफ एवं शब्बीर अहमद पुन्जू आदि मुख्य हैं। इस आलेख में राजस्थान इतिहास लेखन की विकास यात्रा में विशेषतः अलीगढ की भूमिका को रेखांकित करने का उद्देश्य यह रहा है कि सम्पूर्ण भारत में, राजस्थान के विश्वविद्यालयों को छोड कर यही एक मात्र विश्वविद्यालय है जहां राजस्थान केन्द्रित शोध की जा रही है। इससे भी उल्लेखनीय बात यह है कि लीक से हटकर कृषि सम्बन्धों, शहरों के विकास, जनसंख्या में घटाव-बढाव, व्यापारिक समूहों, दस्तकारी उद्योगों के विकास एवं उनमें आए परिवर्तनों आदि विषयों पर शोध की जा रही है।33

संदभःर्
1. James Tod, Annals and Antiquities of Rajasthan, London, 1829 and 1832.
2. जेम्स टॉड, का हिन्दी अनुवाद, राजस्थान का पुरातत्व एवं इतिहास, अनु. डॉ. ध*ुव भट्टाचार्य, में जहूर खाँ मेहर की प्रस्तावना, जोधपुर, 2015, पृ.1-6; जहूर खाँ मेहर ने उदाहरणों के साथ ‘राजसथांन’ शब्द के उपयोग के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला है।
3. टॉड के लेखन के बारे में विस्तृत अध्ययन हेतु दृष्टव्य, गिल्स टिलोस्टन द्वारा सम्पादित जेम्स टॉड्स राजस्थान - द हिस्टोरियन एण्ड हिज कलेक्शन्स, मुम्बई, 2007; इतिहासकार जेम्स टॉड - व्यक्तित्व एवं कृतित्व सम्पादक डॉ. हुकम सिंह भाटी, उदयपुर, 1992
4. श्यामलदास, वीरविनोद चार भाग, जोधपुर, चतुर्थ संस्करण, 2017
5. डॉ. मयंक कुमार, प्रारम्भिक आधुनिक राजस्थान सम्बन्धित इतिहास लेखनः एक सर्वेक्षण, जूनी ख्यात, वर्ष 10 अंक-2, जनवरी-जून 2021, पृ. 199-221
6. इरफान हबीब, द एग्रेरियन सिस्टम ऑफ इण्डिया (1556-1707), नई दिल्ली 1968 संशोधित संस्करण, 2019
7. सम्भवतः बात 1960 ई. की है जब प्रोफेसर डी. डी. कोशाम्बी अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में आए थे तब उन्होंने प्रोफेसर नुरूल हसन एवं प्रोफेसर सतीशचन्द्र से वार्तालाप के दौरान कहा कि राजस्थान राज्य अभिलेखागार, जयपुर में अडसट्टा नामक राजस्व दस्तावेज हैं जिनमें ग्राम-स्तर के राजस्व वसूली एवं कृषि-उत्पादनों के विस्तृत आँकडे हैं उन पर कार्य होना चाहिए। इस मशविरे पर प्रो. नुरूल हसन एवं प्रो. सतीशचन्द्र ने एस. पी. गुप्ता को अडसट्टा पर शोध करने हेतु पीएच. डी. में दाखिला दिया। इस प्रकार प्रथम बार अडसट्टों के आधार पर आम्बेर रियासत की कृषीय अवस्था पर शोध कार्य प्रारम्भ हुवा।
8. एस. पी. गुप्ता एवं शीरीं मूसवी, Weighted Price and Revenue - Rate Indices of Eastern Rajasthan (c. 1665 - 75) Indian Economic and Social History Review, XII, 1965.
9. सतीश चन्द्र एवं एस. पी. गुप्ता, Jaipur Pargana Records आई. ई. एस. एच. आर. वाल्यूम् VI नं. 3, सितम्बर, 1966
10. एस. न. हसन, के. एन. हसन एण्ड एस. पी. गुप्ता का आलेख, प्रोसिडिंग्स ऑफ इण्डियन हिस्ट्री कान्ग्रेस, 1966, पृ. 24-26
11. एस. पी. गुप्ता एवं शीरीं मूसवी, 'Bhoomi in the Territories of Amber (c. 1650 - 1750)*, पी. आई. एच. सी., जबलपुर, 1940; एस. पी. गुप्ता, 'Ijara System in Eastern Rajasthan (c. 1650-1750) मेडिवल इण्डिया - मिसलेनी, वाल्यूम-III, 1972; गुप्ता, 'The System of Rural Taxation in Eastern Rajasthan (1665 - 1750) पीआईएचसी, मुजफ्फरपुर, 1972; गुप्ता, 'A Note on Khasra' मेडिवल इण्डिया - ए मिसलेनी, वाल्यूम-ढ्ढङ्क, 1976; गुप्ता, 'Agrarian Information in Taqsim Documents from Eastern Rajasthan' राजस्थान हिस्ट्री कान्ग्रेस; गुप्ता, 'A Note of Palti from Jaipur Region राजस्थान हिस्ट्री कान्ग्रेस, 1982. इन आलेखों के अतिरिक्त आम्बेर दस्तावेजों पर आधारित अनेक आलेख प्रकाश में आए।
12. Bhanwar Bhadani, Economic Conditions in Pargana Merta (Rajasthan) c. 1658-63 A.D इण्डियन हिस्ट्री कान्ग्रेस, 1975.
13. B.L.Bhadani, Population of Marwar in the Middle of the Seventeenth Century, IESHR, Vol. XVI, Nov. pp. 415-27.
14. B.L.Bhadani, Peasants, Artisans and Entrepreaneurs - Economy of Marwar in the Seventeenth Century, Jaipur, 1999 pp-114-24.
15. S. P. Gupta, The Agrarian System of Eastern Rajasthan (c. 1650-1700), Delhi, 1986.
16. Dilbagh Singh, The State, landlords and Peasants, New Delhi, 1990.
17. James Tod, Annals and Antiquities of Rajasthan, I, p. 143.
18. B. L. Bhadani, Peasants, Artisans, op. cit., pp-298-310
19. S. Inayat Ali Zaidi, The Mughals and Rajputs (1605-59) विषय पर शोधकार्य है।
20. डॉ. मयंक कुमार, प्रारम्भिक आधुनिक राजस्थान सम्बन्धित इतिहास लेखनः एक सर्वेक्षण, जूनी ख्यात, जनवरी-जून 2021 पृ. 202. इसके अतिरिक्त, डॉ. जैदी के दो आलेख दृष्टव्य हैं; 'Rozindar Troopers under Sawai Jai Singh of Jaipur (A.D. 1700-1743)', Indian Historical Review, Vol. X, No. I, 2, July 1983 - January 1984, pp. 45-65; Ordinary Kachhwaha Troopers Serving the Mughal Empire : Composition and structure of the Contingents of the Kachhwaha Nobles, Studies in History Vol.-II, No.1, Jan.-June 1980.
21. डॉ. सुनीता जैदी का शोध विषय सूबा अजमेर का मुगल प्रशासन रहा है।
22. I. A. Khan and Ravindra Kumar, "The Mansagar Dam of Amber', in Ancient and Medieval Technologies in India, eds., Anirudh Ray and S. K. Bagchi, Sundeep Prakashan, New Delhi, 1986, pp. 25-40.
23. B. L. Bhadani, Indra Sarovar Dam : In service of the Royal Family Diety and the People, in the Ananda - Vana of Indian Art - Dr. Anand Krishna Felicitation Volume, Eds. Naval Krishna and Manu Krishna, New Delhi, 2004, pp. 299-310.
24. Rajiv Sharma and S. A. Nadeem Rezavi, Aspects of Hydraulic Engineering in Medieval Rajasthan : A case study of water System in Jaigarh Fort in Art and Culture, eds. Ahsan Jan Qaisar and Som Prakash Verma, Jaipur, 1993, pp. 129-33.
25. Ravindra Kumar, Structural Engineering of Gravity Dams in Medieval Mewar, Studies in Social and Economic Change in Western India Thirteenth to Twentieth Centuries, Baroda, 1997.
26. B. L. Bhadani, Water Harvesting, Conservation and Irrigation in Mewar, New Delhi, 2012.
27. B. L. Bhadani, Jaisalmer settlement Pattern, Dam Technology and Economy in the First Half of the Seventeenth Century', in Professor Agam Prasad Mathur Felicitation Volumn, Delhi, 1999 pp. 149-57.
28. S. Ali Nadeem Rezavi, Kuldhara in Jaisalmer State Social and Economic Implications of the Remains of Medieval Settlement, PIHC, Calcutta, 1995, pp. 312-38
29. Jibraril, Water Management System in the Desert Region of Rajasthan, New Delhi, 2018.
30. Jibraril, Economy and Demographic profile of Rajasthan, Eighteenth - Nineteenth Centuries, New Delhi, 2018.
31. Sumbul Haleem Khan, 'Karkhanas of a Mughal Noble : Evidence from the Amber/Jaipur Records; PIHC, Delhi 1992; 'Mughal Karkhanas at Amber : A study of Animal Stables and manufactories of Arms and Palanquins in the Eighteenth Centuries', Islamic Culture, Vol. LXXIU, No-4, 2000; 'Organization of Amber Atellier', PIHC 1993.
32. Sumbul Haleem khan, Arts and Craft workshops under the Mughals, Delhi, 2015.
33. राजस्थान के बाहर यही एक मात्र विश्वविद्यालय है जहां राजस्थान इतिहास हेतु शोध सहायक से लेकर प्रोफेसर के पद आरक्षित हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली ने शोध की गुणवत्ता के आधार पर ये पद स्वीकृत किए थे।

सम्पर्क - रांगडी चौक, बीकाने
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