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राजस्थान : संस्कृति बनाम सांस्कृतिक विरासत

ब्रजरतन जोशी
संस्कृति जन्म को जीवन में रूपान्तरित करती है। यह एक गत्मात्मक प्रक्रिया और मूल्य दृष्टि है। क्योंकि यह निरन्तर परिवर्तनशील है। अतः इसका सम्पूर्ण निरीक्षण, पर्यवेक्षण और मूल्यांकन संभव नहीं है। संस्कृति अपनी संरचना में एक विराट परिसर है। जिसका भूगोल घर के आँगन से अन्तरिक्ष तक पसरा है। दृश्यमान जगत के सभी उपादान यानी संगीत, कला, बौद्धिक कर्म, वैज्ञानिक आविष्कार आदि इसके सहचर और अंग है, पर प्रायः हम इसे संगीत, खानपान, आचार-व्यवहार, वेशभूषा तक सीमित करके देखते हैं। दरअसल ये सभी उपादान संस्कृति के दर्पण हैं। जिनमें संस्कृति स्वयं को प्रकट करती रहती है। यह भी तथ्य है कि मनुष्य संस्कृति से संस्कार अर्जितकर अधिक परिपक्व और विवेक सम्पन्न हुआ है, पर संस्कृति विज्ञानी सच्चिदानंद सिन्हा के हवाले से यह भी सामने आता है कि यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह जिन चीजों को सबसे कम समझता है, उन पर तीव्र प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करता है। संस्कृति चिन्तन भी इस तथ्य से अछूता नहीं है। हम अक्सर संस्कृति के प्रति अपने सीमित दृष्टिकोण के चलते यह भूल जाते हैं कि संस्कृति प्रकृति का ही परिष्कार है। अतः हमें अपनी संवेदना व व्यवहार के साथ जीवन के विविध आयामों में इसको प्रतिबिम्बित करना चाहिए। संस्कृति का स्थापत्य संगीत, नृत्य, अभिनय, चित्र, मूर्ति स्थापत्य और साहित्य सेठीक इसी तरह जुडा है जैसे संगीत से जुडे हैं सात मूल स्वर। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि समस्त सांस्कृतिक कलाएँ संस्कृति निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा है।
राजस्थान भारतवर्ष के उन राज्यों में अग्रणी है जिसके पास एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सम्पदा है। राजस्थानी संस्कृति की प्रकृति जीवन्तता और सौम्यता के मिश्रित रसायन से बनी है। निरन्तरता उसक ा आत्मबल व आधार है। साम्प्रदायिक सौहार्द्र इसका आभूषण है। बारह महीनों में से शायद ही कोई महीना हो, जब राजस्थान में कोई वार-त्यौहार न होता हो।
मेल-मगरियों (मगरिया - मेलों में होती गीतात्मक अभिव्यक्ति) के रस से रसी-पगी यह संस्कृति अपने स्थापत्य, बोलियों, लोक संगीत, लोकनाट्यों, धार्मिक आन्दोलनों, प्रदर्शनकारी कलाओं, त्यौहारों, वाद्यों, साहित्य, ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों, पशु मेलों और लोक देवताओं के कारण विश्वस्तर पर अपनी निरानी पहचान रखती है। यहाँ की भाषा और बोलिया, त्यौहार, स्थापत्य और संगीत सम्पदा ने इसके अखण्ड वैभव को अपने कलेवर में सहेज रखा है। लेकिन बावजूद इन अद्भुत उपलब्धियों के हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को सँभालने में पिछडे हैं? आप कह सकते हैं कि सब कुछ तो है, और देखा-समझा जा रहा है फिर यह सांस्कृतिक विरासत का प्रश्न कहाँ से उठ खडा हुआ? इसके उत्तर में हमें सबसे पहले तो यह समझना है कि यहाँ सांस्कृतिक विरासत से हमारा तात्पर्य क्या है? कोई भी समाज-संस्कृति अपनी ऐतिहासिक प्रक्रिया में अपने पूर्वजों से कुछ सीखता-जानता है। इस हस्तांतरण की प्रक्रिया में हम कुछ नया जोडते हैं, तो कुछ छूट भी जाता है। लेकिन संस्कृति हस्तांतरण की नैसर्गिक प्रक्रिया निरन्तर गतिमान रहती है। जो हमें अपने पूर्वजों से मिलता है। उसे हम सुरक्षित, संरक्षित और पोषित करते हैं। यानी वह स्थापत्य, संगीत, महल, किले धरोहरे, पाण्डुलिपियाँ, चित्र आदि। अब दिक्कत यह आती है कि हम संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत के बीच के सूक्ष्म अन्तर को भली-भाँति समझने में चूक कर जाते हैं। हम यह भी जानते हैं कि संस्कृति अपनी गत्यात्मकता से संगठनों, रचनाओं एवं विविधता को जन्म देती है, उन्हें विकसित करने के मूल अवसर देती है। यह प्रक्रिया निरन्तर प्रवाहमान रहती है, पर चूक होती है कि सांस्कृतिक विरासत एक गत्यात्मक प्रक्रिया नहीं है, जैसे संस्कृति है। विरासत को हमें सहेजना होता है, उसका संरक्षण और पोषण करना होता है, तभी वह चिरकाल तक हमारी सहचर होकर, हमारी दीक्षा के लिए प्रेरक वातावरण निर्माण में सहायक हो सकती है। बस, यही से एक विचलन आता है और हमें जिसे सहेजना है, उसके महत्त्व को हम विस्मृत कर बैठते हैं। ध्यान रहे किसी भी प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत उसकी विश्वास प्रणाली, सम्प्रेषण, संरचना, जीवन शैली और नैतिक पक्ष के साथ उसके लोक जीवन से जुडी है। प्रदेश का सांस्कृतिक चरित्र यहाँ एक ओर हमारे समय की राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था से जुडा होता है, वहीं दूसरी ओर नैतिक मूल्यों की स्थापना में आने वाली अडचनों का परिहार करते हुए उसके लिए राह आसान बनाने में उससे भी सहायता मिलती है। इसलिए किसी भी प्रदेश के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने सांस्कृतिक विरासत के प्रमुख आधारों की न केवल पहचान ही करें बल्कि उनके प्रति संवेदनशील होकर अपने जागरूक नागरिक विवेक का परिचय भी दे।
किसी भी श्रेष्ठ प्रबन्धन का एक पैमाना यह भी होता है कि वह अपनी सांस्कृति विरासत के प्रति कितना संवेदनशील और सजग है। राज्य का नैतिक दायित्व है कि वह अपने सांस्कृतिक धरोहरों को सहजे, उनके महत्त्व को जाने, समझे और उन्हें उचित संरक्षण व पोषाण प्रदान करने की व्यवस्था करे। उदाहरण के लिए हम सिंगापुर को ही लें। सिंगापुर के पास राजस्थान की तुलना में सांस्कृतिक चरित्र एवं सम्पन्नता पर्याप्त मात्रा नहीं है, पर फिर भी अपनी रणनीति और प्रबन्धन के साथ जागरूकता के चलते आज वहाँ का पर्यटन उनकी अर्थव्यवस्था की धुरी है। हमारी सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक धरोहरों और पर्यटन स्थल से बना इन्द्रधनुषी सौन्दर्य पर्याप्त समृद्धि और सम्पन्नता लिए है, पर हम उनसे पिछडे हैं। क्यों? इस विषय पर गम्भीर चिन्तन-मनन की आवश्यकता है। इतना ही नहीं भूटान जैसा छोटा-सा भू-भाग भी बौद्ध धर्म से सम्बद्ध पर्यटन में अपने को श्रेष्ठ साबित कर रहा है और हम है कि आज भी अपनी आन, बान और शान जैसी आत्ममुग्धता की चादर ओढे हैं। ऊपर जो उदाहरण हमने दिए क्या उनकी तुलना में हमारे पास सांस्कृतिक वैभव एवं सम्पदा की कमी है? नहीं, कोई कमी नहीं, तो फिर समस्या क्या है? दरअस्ल समस्या है सांस्कृतिक विरासत के प्रति सजग और संवेदनशील सोच एवं व्यवहार का अभाव। हम कह सकते हैं कि इसके मूल में भी हमारा सांस्कृतिक दर्शन साफ और स्पष्ट नहीं है। इसलिए भी हमारा सांस्कृतिक विरासत एवं संस्थाएँ प्राथमिकता में पिछडी हैं। हमारे हालात यह है कि न तो हमने अपनी सांस्कृतिक पहचान को संवेदनशील व्यवहार में ढाला है और न ही उसके प्रसार, पोषण हेतु कोई स्पष्ट दृष्टि और ठोस कार्य योजना हमारे पास है।
ऐसा नहीं है कि हमारे पास सांस्कृतिक विरासत या स्थलों की कमी है? बस हमारी प्राथमिकता में वे पिछडी हैं। अब प्रश्न उठता है कि इन्हें मुख्य धारा मंृ लाने के लिए क्या किया जाए? तो पहले तो यह समझें कि अपनी प्रादेशिक सांस्कृतिक विरासत को हम तीन मोटे आधारों पर देखें, समझे और जाने। एक स्थापत्य, दूसरा प्राकृतिक पर्यावरण तीसरा कलाकृतियाँ, पाण्डुलिपियाँ, चित्र आदि।
यहाँ फिर एक यक्ष प्रश्न हमारे सामने आता है कि आज उन्नत शैक्षिक विवेक एवं प्रसार के बाद भी व्यापक समाज में सांस्कृतिक उदासीनता के कारण क्या हैं? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि जो कुछ भी हम अपने पूर्वजों से सीखते हैं, परिर्वन एवं निरन्तरता के कारण उस ज्ञान में कुछ जुडता है और कुछ घटता है या छूट जाता है। संस्कृति हस्तांतरण की प्रक्रिया कोई रासायनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह तो इत्र की एक शीशी को दूसरी में डालने जैसा उद्यम है जिसमें कुछ न कुछ तो उड या कहें छूट ही जाता है। इत्र तो फिर भी द्रव्य है, पर संस्कृति तो ऐसा कोई द्रव्य भी नहीं। अतः वहाँ यह प्रक्रिया अत्यन्त धीमी और अपनी संरचना के अनुकूल चलती है। उसमें तात्कालिकता के लिए जगह नहीं है। याद रहे संस्कृति एक गत्यात्मक प्रक्रिया है जबकि सांस्कृतिक विरासत परिवर्तनशील नहीं है। ऐसी स्थिति में संस्कृति के परिसर में कईं-कईं सम्भावनाएँ, रचनाएँ और विविधताएँ जन्म लेती हैं। लेकिन दुर्भाग्य से हमारी शिक्षा पद्धति में सूचना, आँकडों और सतही ज्ञान पर जोर के चलते सांस्कृतिक विरासत पर पर्याप्त ध्यान जा ही नहीं पाता है। ऐसे में एक दुर्घटना यह भी होती है कि सांस्कृतिक विरासत को इतिहास का कम उपयोगी हिस्सा मानकर इसे उचित महत्त्व व स्थान नहीं दिया जाता। ऐसे में हमारे मनो-मस्तिष्क में इसे लेकर कोई स्नायविक हलचल तक नहीं होती। परिणामस्वरूप सुरक्षा, संरक्षण और पोषण के अभाव में संस्कृतिक विरासतें दिन-ब-दिन पिछडती जाती हैं।
प्रख्यात संस्कृति चिन्तक साइमन थेरले ने सांस्कृतिक चक्र को इसका उचित समाधान बताते हुए कहा कि पहले हमें यह समझना होगा कि हम अपने बीते हुए कल से आने वाले भविष्य को अधिक सम्पन्न बना सकते हैं। थेरले कहता है कि सांस्कृतिक चक्र के माध्यम से सबसे पहले तो हमें संस्कृति को मानना नहीं है, वरन् जानना और समझना है। दूसरे जब हम इसे जानेंगे, समझेंगे, तो इसको महत्त्व भी देंगे और दूसरे चरण में हम मूल्य प्रक्रिया और दृष्टि भी समझेंगे।-तीसरे चरण में महत्त्व स्वीकारबोध के बाद हमारे मन में इसके प्रति श्रद्धा पैदा होगी। सजगता और संवेदनशीलता का विस्तार होगा। चौथे और अन्तिम चरण में हम अपनी संवेदना और व्यवहार के विविध आयामों में इसे जोडने में कामयाब होंगे। इस तरह यह चिन्तन हमें जो हम है, उससे बेहतर मनुष्य भी बनाने में कामयाब होगा। यहीं से संस्कृति में नवाचार जन्मेगा और पर्यटन एवं अन्य रोजगार के साथ कुटीर उद्योगों को गति मिलेगी। यहीं हम गाँधी के स्वदेशी चिन्तन को, उसके मूल स्वरूप से जानकार उसकी पहचान और महत्त्व को समझ पाएँगे, जो हमारी अर्थवयवस्था दृढ आधार हो सकता है। पर क्या आज का राजस्थान इस पर पर्याप्त सोच-विचार कर रहा है? हमें इस पर केन्द्रित होकर अपने विचार-चिन्तन को दिशा देनी होगी।
उत्तर-आधुनिक परिस्थिति के प्रचण्ड आवेग तले सांस्कृतिक विरासत हस्तांतरण की प्रक्रिया के क्षरण में तेजी आ रही है जो कि समाज-संस्कृति के लिए शुभ संकेत नहीं है। यह तेजी हमें निरन्तर खाली कर रही है। हमसे कुछ न कुछ छूटता जा रहा है। क्या उस छूटते को पाना और संजोए रखना हमारा धर्म नहीं है? राजस्थान की पहचान एक स्वावलम्बी और स्वाभिमानी समाज की रही है। पर क्या आज हम उस स्वावलम्बी और स्वाभिमान को बरकरार रख पा रहे हैं? गौर करेंगे, तो पाएँगे कि धीरे-धीरे हमारी प्रादेशिक संस्कृति अपना तेज खो रही है। हम सरकारों एवं व्यवस्था पर केन्द्रित समाज में बदलते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप इस विडम्बना का ठीकरा हम राज्य और शासन के सिर फोडकर अपने दामन को बचा रहे हैं? क्या यह उचित है? शुरूआत हमेशा घर से ही होती है। हाँ, हम यह तो मानते हैं कि राजनीतिक पद्धतियों के स्वरूप से सांस्कृतिक विरासत पर फर्क पडता है, पर हमारी दैनिन्दन जीवनचर्या और सोच-व्यवहार के आयामों के सम्बन्ध में तो सीधी-सीधी जवाबदारी हमारी ही बनती है। हमारी जीवन शैली, मूल्य, दृष्टि और प्रक्रिया में सांस्कृतिक विरासत के प्रति संवेदनशीलता और सजगता नहीं है। यह शुभ संकेत नहीं है। याद रखिए सांस्कृतिक विरासत के लिए हमें कोई नई पहल खोज या नया रास्ता ईजाद नहीं करना और न ही कोई नई लिपि गढनी है।
उदाहरण के लिए हम अपने स्थापत्य संरचनाओं से ही शुरुआत कर सकते हैं। क्या आज हम भवन निर्माण करते समय या नगर नियोजन करते समय स्थानी भूगोल के साथ संवेदात्मक रिश्तों पर ध्यान देते हैं? क्या भूगोल का जीवन के साथ कोई सम्बन्ध है? अगर है, तो हम क्यों नहीं उस पर विचार करते हैं। गाँधीजी जिसे स्वदेशी कहते हैं, उसमें भी तो यह था, हमारी देशज प्रज्ञा का तो मूल ही यही था। अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी संस्कृति के मूल सत्त्व को पहचाने और उसे अपने संवेदनात्मक व्यवहार का हिस्सा बनाएँ। याद रहे यह संस्कृति ही है जो एक ऐसी दृष्टि देती है, जो न केवल हमारे विवेक को ही समर्थ बनताी है, साथ ही हमें अधिक व्यापक और वैश्विकता के भाव से भी संस्कृत करती है।

अगर आज का हमारा समाज खासकर राजस्थानी समाज अपने प्रदेश के सर्वतोमुखी उत्थान के लिए संकल्पित है, तो उसे इन मुद्दों पर गम्भीरतापूर्वक विचार ना चाहिए। तभी हम अपनी संस्कृति की प्रक्रिया से आर्थिक एवं नैतिक लाभ अर्जित कर पाने में पूरी तरह कामयाब होंगे।
आज जरूरत है अपनी दृष्टि में आए विकारों का परिमार्जन करने की। हमें अपनी देशज प्रज्ञा और पारम्परिक अनुभवी समाज की दृष्टि को उजली नजर से देखना, समझना होगा, तभी हम सही दिशा में आगे बढ पाएँगे। हमें अपने बनाए भटकावों एवं औपनिवेशिक जगंल से बाहर आकर मुक्त होने की राह पर तीव्र गति से आगे बढना है।
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इस अंक आज का राजस्थान के माध्यम से हमने राजस्थानी संस्कृति के विविध पक्षों पर समग्र होकर देखने-समझने की यत्किं चित को कोशिश की है। इस अंक में हमने राजस्थानी संस्कृति के गंभीर अध्येताओं और विद्वानों से आग्रह कर संस्कृति के अन्वेषण को एक व्यापक फलक पर देखने-समझने की कोशिश की है। जो कि इतिहास, पुरातत्त्व, सांस्कृतिक, संस्थाओं, ललित कलाओं, संगीत सम्पदा, साहित्य, रंगमंच, लोक और स्थापत्य से हमारा परिचय करवाती है। मैं सभी विद्वान लेखकों का आभारी हूँ कि उन्होंने अत्पल्प समय में मेरे आग्रह का मान रखते हुए अपना सर्वोत्त्कृष्ट देने की दृष्टि सम्पन्न कोशिश की। राजस्थान की संगीत सम्पदपर पर बहुत ही गंभीर प्रकृति का पंकज पाराशर का लिखा आलेख विशेष उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त इस अंक में राजस्थान के रचनाकारों की रचनात्मकता पर भी पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है।

इस अवसर मैं आभारी हूँ इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज, शिमला परिवार का और विशेष आभारी हूँ संस्थान के युवा, ऊर्जावान, उदात्त और सहयोगीवृत्ति के धनी श्री अखिलेश पाठक का जिनके निश्छल तकनीकी सहयोग और तत्परता के बिना इस अंक का अनुकूल समय पर आना अत्यन्त कठिन था।
इस अंक की एक विशेष उपलब्धि के रूप में हम दो बाल लेखकों के लेखन का श्रेष्ठ नमूना क्रमशः अलेख व समीक्षा कॉलम में प्रस्तुत कर रहे हैं। उत्तराखण्ड की रिया (जो कि कक्षा ग्यारह की छात्रा है) और निहार व्यास का दृष्टिपूर्ण लेख भी इस अंक की उपलब्धि कहे जाने योग्य है। इन बाल लेखकों की लेखनी का पराक्रम देखते ही बनता है।
आशा करता हूँ कि आपने होली पर्व खूब उल्लास और उमंग से मनाया होगा। पुनः याद दिलाता चलूँ कि कोविड अनुरूप व्यवहार में कोई असावधानी न बरतें। अपना खूब ख्याल रखें और अंक पर अपनी राय से अवश्य ही अवगत करावें।
इन्हीं शुभकामनाओं के साथ -
- ब्रजरतन जोशी