fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

संवाद निरन्तर

राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती :
साठ वर्षों की साहित्य सेवा

राजस्थान मेरे पूर्वजों की जन्मभूमि और कर्मभूमि है, राजस्थान की संस्कृति मेरे परिवार की संस्कार भूमि है और राजस्थान मेरे देश की शौर्यता, वीरता, बलिदान, भक्ति तथा जीवन के संघर्ष की भूमि है। राजस्थान के मण्डावा से मेरे दादाश्री सेठ बद्रीदास गोयनका बुलन्दशहर में आकर स्थापित हो गए और कुछ रामनाथ गोयनका दक्षिण भारत में तथा कुछ कोलकाता, पूर्वोत्तर प्रान्तों तथा कुछ मुम्बई आदि नगरों में जाकर व्यापार को अपना कर्म-क्षेत्र बनाया और बडी बडी उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। राजस्थान के गोयनका वंश ने देश के अनेक स्थानों पर जाकर अपना तथा उस क्षेत्र का विकास किया और आज हम उनमें से जयदयाल गोयन्दका, रामनाथ गोयनका, सुभाष चंद्रा, सज्जन गोयनका, हर्ष गोयनका आदि को उनकी उपलब्धियों के कारण जानते हैं और कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जिनके कृतित्व से मैं अपरिचित हूँ। शिक्षा तथा साहित्य के क्षेत्र में संभवतः मैं अकेला गोयनका हूँ जो इन दो क्षेत्रों में राजस्थान के गोयनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। मैं मधुमती के संदर्भ में इन बातों का उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ जिससे मैं इस महत्त्वपूर्ण पत्रिका के साथ अपने संबंधों तथा उसके साहित्यिक योगदान के बारे में कुछ अपने अनुभव प्रकट कर सकूँ। मधुमती राजस्थान की पत्रिका होने के कारण मेरा उससे लगाव और आत्मीयता होना स्वाभाविक ही है। मैं जब दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी का शिक्षक हो गया तो 1970-72 के आसपास मधुमती का पाठक हो गया और मेरी पहली रचना इसके मार्च,1980 के अंक में प्रकाशित हुई जो जैनेंद्र कुमार के उपन्यास त्यागपत्र पर उनसे लिया गया इंटरव्यू था। इसमें उपन्यास की नायिका मृणाल के जैनेंद्र के जीवन से खोज की गई थी और उस समय प्रेमचन्द पर मेरी खोजी प्रवृत्ति का ही असर था।
मधुमती के साथ यह मेरे साहित्यिक सम्बन्ध की शुरूआत थी और वह आज तक ब्रजरतन जोशी के संपादक बनने तक पूर्ववत् चलती आ रही है।
मधुमती के अभी तक 60 वर्ष की जीवन यात्रा में 29 संपादक हुए हैं और अधिकांश एक या दो वर्ष के कार्यकाल से अधिक नहीं रह पाते, लेकिन डा. प्रकाश आतुर ही ऐसे संपादक थे जो लगभग छः वर्ष (1983 से 1989) तक रहे। मधुमती के आरंभकर्ता डा. मोतीलाल मेनारिया तथा जनार्दनराय नागर थे और नागर से मेरा पत्र व्यवहार भी हुआ। इसका पहला अंक अप्रैल,1960 में इनके संपादकत्व में निकला और संपादकीय नीति में सत्य,शिव,सुंदर को केंद में रखकर घोषित किया कि साहित्य चेतन मन की सच्चिदानंदमय अनुभूति है और मधुमती क्षेत्रीय प्रतिभाओं तथा नवोदित लेखकों को प्रोत्साहित करके राजस्थान की एक अखण्ड ज्योति को उत्पन्न करेगी और हिंदी में श्रेष्ठ पत्रिका के अभाव को दूर करेगी। इस संपादकीय वक्तव्य से स्पष्ट था कि पत्रिका भारतीय चित्त और चिंतन तथा भारतीय काव्य सौंदर्य के परंपरागत प्रतिमानों को आधार बनाकर राजस्थान के लेखकों को प्रोत्साहित तथा प्रतिष्ठित करने का संकल्प लेकर चल रही है और मेरे विचार में यह नीति सर्वथा उपयुक्त और उचित थी। स्वतंत्रता के बाद जो लेखकों की नई पीढी आ रही थी तथा जो भविष्य में आनी थी, उनके लिए वैचारिक तथा संवेदनात्मक लेखन का पथ प्रदर्शन कर दिया था, जो मेरे विचार में इस रूप में किसी भी अन्य हिंदी पत्रिका ने नहीं किया था। यह राजस्थान के इतिहास, संस्कृति तथा कला-द्दष्टि का ही सुखद संकल्प था कि अपने प्रदेश के हिंदी लेखकों की नई पीढियों को भारतीय चेतना से जोडा जाए, उन्हें एक उत्तम साहित्य मंच दिया जाए, और राजस्थान के लोकमानस को समृद्ध किया जाए। इस प्रकार मधुमती प्रदेश के लेखकों को मंच देने के लिए शुरू की गई थी, लेकिन इसे क्षेत्रीय से राष्ट्रीय बनाने का काम डा. प्रकाश आतुर ने किया और उन्होंने अपने छर् वर्ष के कार्यकाल में मधुमती को राष्ट्रीय ही नहीं साहित्य की एक आवश्यक तथा संपूर्ण पत्रिका बना दिया और उनके बाद आने वाले पूनम दईया, हेतु भारद्वाज, दयाकृष्ण विजयवर्गीय, राधेश्याम शर्मा, इंदुशेखर तत्पुरुष और अब डा. ब्रजरत्न जोशी आदि संपादकों ने इसे राष्ट्रीय पत्रिका के रूप में बनाए रखने का पूरा प्रयास किया है, परंतु अब इसे हिंदी विश्व की पत्रिका बनाने की आवश्यकता। है। मधुमती साठ वर्ष की हो गई है और अभी तक इसकी 1100 प्रतियां ही छपती हैं। मधुमती राष्ट्रीय पत्रिका है और वह देश के कोने-कोने में जानी और पढी जानी चाहिए और इसके लिए विशेष प्रयास की आवश्यकता है। इसके लिए विभिन्न प्रांतों की हिंदी अकादमियों से सम्पर्क करना, लेखकों को पत्रिका नियमित भेजना तथा देश के अन्य क्षेत्रों के लेखकों से सम्पर्क-सहयोग बनाना बहुत जरूरी है।
मधुमती के वर्तमान संपादक ब्रजरत्न जोशी ने 2019 से कार्यभार ग्रहण किया है और वे बिना किसी राजनीतिक प्रतिबद्धता के इसका संपादन कर रहे हैं और इसके लिए मैं उन्हें बधाई देता हूँ। उन्होंने मधुमती में क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय लेखकों को प्रकाशित करने में पूर्ववत् संतुलन बनाकर रखा है जो स्वागत करते योग्य है। डॉ. जोशी ने मुझसे सम्पर्क किया और मैं समझता हूँ कि अन्यों से भी किया होगा। एक संपादक के लिए अपने वरिष्ठ लेखकों से सम्पर्क करना यह निजी संस्कार पर निर्भर करता है और इस पर भी कि उसके लिए साहित्य और उसकी प्रतिष्ठा एवं गरिमा का क्या महत्व है। उन्होंने अब तक कईं लेखकों पर विशेषांक निकाले हैं, जिनमें मुकुन्द लाठ,कृष्ण बलदेव वैद, रेणु, कपिला वात्स्यायन, गाँधी, मन्नू भण्डारी, यशदेव शल्य आदि का उल्लेख करना चाहूँगा। ये लेखक राष्ट्रीय लेखक हैं और इनकी प्रतिष्ठा है और इनका बडा योगदान हैं। ये किसी पार्टी के नहीं, मानवीय संवेदना तथा कलात्मक सौंदर्य के लेखक हैं और मधुमती उन्हें याद करके अपने साहित्य धर्म का पालन कर रही है। इनमें कुछ लेखक ऐसे हैं जिन पर मैंने केवल मधुमती के ही विशेषांक देखे हैं और इसके लिए इसके संपादक साधुवाद के पात्र हैं।
अंत में, मैं कुछ सुझाव देना चाहूँगा जो राजस्थान के लेखकों तथा मधुमती के व्यापक विस्तार तथा प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक हैं। मधुमती का इतिहास 60 वर्ष का है तो तत्काल मधुमती में प्रकाशित रचनाओं के कविता, कहानी तथा निबंध तीन संचयन प्रकाशित होने चाहिए, मधुमती की रचनाओं का एक इंडेक्स तैयार करना चाहिए जिसमें उसके सभी बीस स्तंभों के प्रकाशित रचनाओं का कालक्रमानुसार विवरण होना चाहिए और इस इंडेक्स को प्रमुख पुस्तकालयों में भेजा जाना चाहिए जिससे मधुमती के साहित्यिक योगदान पर शोधकार्य हो सके। राजस्थान साहित्य अकादमी को दिल्ली की सरकारी साहित्य अकादमी से मिलकर दिल्ली में एक संयुक्त कार्यऋम करना चाहिए और अपने प्रदेश के लेखकों को राजधानी के लेखकों तथा संपादकों से मिलवाना चाहिए। मधुमती को राजस्थान के हिंदी लेखकों की श्रेष्ठ रचनाओं के वार्षिक संचयन निकालने चाहिए। इससे वे राजस्थान की सीमा से बाहर भी प्रतिष्ठित और लोकप्रिय हो सकते हैं। मेरे विचार में संपादक की कार्यावधि एक-दो साल तक सीमित नहीं होनी चाहिए, उसे कुछ लंबा समय मिलना चाहिए, अन्यथा संपादक को प्रकाश आतुर जैसी तथा सरस्वती संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी तथा धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती जैसी प्रतिष्ठा नहीं मिल पाती और पत्रिका का भी कोई विशिष्ट चरित्र नहीं बन पाता। लोकतंत्र में सरकार बदलती है, तो साहित्य अकादमी के अध्यक्ष तथा पत्रिका संपादक भी बदल जाते हैं, और इसके परिणामस्वरूप संपादक कईं बार एक-दो साल से ज्यादा रह नहीं पाते। यह हमारे लोकतंत्र की विवशता है और इसे बदलना मुश्किल ही है। इसके बावजूद मधुमती की 60 वर्ष की यात्रा में चाहे कुछ अवरोध आए हों, पर वह मंथर गति से चलती रही है और काफी मात्रा में विवादों से दूर रही है।
मेरे विचार में मधुमती हिंदी की एक संपूर्ण पत्रिका है, उसके बीस स्तंभ तथा क्षेत्र के साथ अन्य प्रदेशों के लेखकों का संगम करके चलने में वह हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं में अपना विशिष्ट स्थान रखती है और मुझे विश्वास है, चाहे कोई भी सरकार हो, मधुमती- सरकार के लिए नहीं, साहित्य के लिए ही समर्पित बनी रहेगी और अपने मूल लक्ष्य- सत्य,शिव और सुंदर की भारतीय चेतना और भारतीय मनोभाव के साथ सबको साथ लेकर साहित्य की सेवा करती रहेगी। मैं इसके वर्तमान संपादक डॉ. ब्रजरत्न जोशी से आशा करता हूँ कि वे मधुमती को राष्ट्रीय पत्रिका के साथ उसे वैश्विक रूप देने पर विचार करेंगे और हिंदी के प्रवासी साहित्य पर विशेषांक निकालकर प्रवासी लेखकों को अपने साहित्य-परिवार का अंग बनाएँगे। मधुमती का यह वैश्विक रूप एक बडी उपलब्धि होगा और वह राजस्थान से राष्ट्रीय और अब अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के रूप में हिंदी विश्व की पत्रिका बनकर राजस्थान का माथा ऊँ चा करेगी। मेरी शुभकामनाएँ मधुमती तथा उसके संपादक डा. ब्रजरत्न जोशी के साथ हैं।
-कमलकिशोर गोयनका
पूर्व प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय पूर्व उपाध्यक्ष,
केंद्रीय हिंदी शिक्षण मण्डल, आगरा,
भारत सरकार, ए-98, अशोक विहार,
फेज प्रथम-दिल्ली-110052
मोबाइल : 09811052469
ईमेल : kkgoyanka@gmail.com

* लेखक प्रेमचन्द साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान हैं और लेखन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में सुख्यात हैं।