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विमर्श का प्रतिपक्ष

नरेश गोस्वामी
नारीवाद हमारे समय की एक ऐसी अवधारणा है जिसे सार्वजनिक जीवन पर काबिज नये-पुराने अभिजनों तथा स्वार्थ-समूहों के गठजोड ने विवादास्पद बना कर रख दिया है। तथाकथित मुख्यधारा का समाज और उसकी विभिन्न संस्थाएँ नारीवाद के विचार को अक्सर एक ऐसे नकारात्मक व विघ्नकारी रूप में पेश करती रही हैं कि उसका नाम लेते ही *यादातर चेहरे या तो उपहास की मुद्रा में आ जाते हैं या पूर्वग्रहों के कारण तमतमा उठते हैं।
सामूहिक मानस के ऐसे माहौल में राजनीतिक सिद्धांतकार और चिंतक निवेदिता मेनन की मूल पुस्तक सीइंग लाइक अ फेमिनिस्ट का सद्य प्रकाशित अनुवाद नारीवादी निगाह से इन दुराग्रहों को जाँचने-परखने और उनसे जिरह करने का न्यौता देती है। यह किताब नारीवाद के किसी मानक संस्करण की खोज नहीं करती, बल्कि उसके मौजूदा सिद्धांतों और व्यवहार के सूत्रों तथा ज्ञान व राजनीति के व्यापक क्षेत्र में सक्रिय नारीवादी विद्वानों से संवाद करते हुए आगे बढती है। लेखिका ने खुद भी आगाह किया है इसे नारीवाद का आधिकारिक दृष्टिकोण नहीं माना जाना चाहिए। इसकी वजह शायद यह है कि वे नारीवाद को एक स्थिर व अंतिम रूप से परिभाषित वैचारिक श्रेणी के बजाय एक खुली दृष्टि के रूपमें प्रस्तुत करती है। लिहाजा उनके विश्लेषण में नारीवाद पूर्व-सिद्ध सिद्धांत के बजाय समाज और राजनीति की व्यक्त-अव्यक्त संरचनाओं से उभरता है।
वैसे, इसे पूर्वाग्रह कहें या कुछ और, लेकिन औसत सच्चाई यह है कि रोजमर्रा की बातचीत में नारीवाद को महिलाओं की सोच और समस्याओं की प्रतिनिधि विचारधारा के तौर पर पेश किया जाता है। इसलिए लेखिका ने यह स्पष्ट करके कि नारीवाद का सरोकार केवल महिलाओं से नहीं है, एक लम्बित काम को पूरा किया है। मसलन, नारीवाद को देखने का उनका नजरिया कई अस्मिताओं और सरोकारों तक जाता है -
नारीवाद वस्तुतः स्त्रियों तक सीमित सीमित न होकर इस स्वीकारोक्ति का नाम है कि जेण्डर के आधुनिक विमर्शों में मनुष्य जाति को किस तरह पुरुष और स्त्री के खाँचे में बदल दिया जाता है। ... नारीवाद केवल जेण्डर से सरोकार नहीं रखता, बल्कि उसका वास्ता इस समझ से भी है कि वर्ग (घरेलू नौकरों के मामले में), जाति तथा समलैंगिक राजनीति (समलैंगिक पुरुषों, हिजडों तथा उभयलिंगी अस्मिताओं के मामले में) का तथ्य जेण्डर के विचार को किस तरह जटिल बना देता है। दूसरे शब्दों में, नारीवाद हमसे यह समझने का आग्रह करता है कि स्त्री कोई स्थिर या समरूपी श्रेणी नहीं होती। जेण्डर का अन्य अस्मिताओं के साथ यह फसाँव वैश्विक स्तर पर अलग-अलग रूपों में प्रकट होता है।
नारीवाद के इस परिप्रेक्ष्य में लेखिका जेंडर के इर्द-गिर्द खडी पदानक्रमीय व्यवस्था के साथ यह भी दर्ज करती हैं कि पुरुष और स्त्री को दो अलग-अलग सच्चाइयों के साथ जीना होता है। लेकिन उनका यह विश्लेषण अस्मिता को स्थिर और अटल स्थिति मान कर नहीं चलता।
इसलिए नारीवादी होने से लेखिका का एक अभिप्राय प्रभुत्वशाली सत्ता के मुकाबले शक्तिहीन होने से भी है। यही वजह है कि उनका नारीवाद केवल महिलाओं के राजनीतिक रवैये या उनकी जीवन-शैली तक सीमित न होकर ऐसे सवालों पर विचार करता है कि पुरुष और स्त्री जैसी पहचानों का निर्माण किस तरह किया जाता है और अंततः इन पहचानों को पितृसत्ता के सामयिक और स्थानिक तंत्रों में किस तरह फिट किया जाता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो नारीवाद की आँख से देखने पर पता चलता है कि जिस दुनिया को हम समतल और सरल मान कर चलते हैं, उसके नीचे अनेकानेक गुत्थियाँ और जटिलताएँ मौजूद रहती हैं। यानी हम जाने या न जाने, लेकिन समाज की आमफहम क्रियाओं और गतिविधियों के पीछे कर्मकाण्डों का एक व्यापक तंत्र सक्रिय रहता है। सांस्कृतिक पुनरुत्पादन का यह तंत्र अपनी प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रक्रियाओं के जरिये इस काम में लगा रहता है कि समाज की मूल्य-मान्यताएँ, रीति-रिवाज तथा व्यक्ति को नियंत्रित-अनुशासित करने की चेष्टाएँ सहज और प्राकृतिक नजर आए।
लेखिका ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विमर्शों तथा वस्तुपरक अध्ययनों के उदाहरण देते हुए बताती हैं कि देह को केवल पुरुष या केवल स्त्री के रूप में देखना यूरोपीय आधुनिकता की देन है। गौरतलब है कि सोलहवीं सदी के दौरान यूरोप में उभरी यह आधुनिकता उपनिवेशवाद के जरिये अफ्रीका व एशियाई देशों में एक सार्वभौम धारणा बनती गयी है। मसलन, अफ्रीका के योरूबा तथा इगबो जैसे समुदायों की संस्कृति में जेंडर की श्रेणी खास महत्त्व नहीं रखती थी। इन समुदायों में व्यक्ति की सामाजिक हैसियत जेंडर के बजाय वरिष्ठता के आधार पर तय होती थी और यह वरिष्ठता विभिन्न संदर्भों पर निर्भर करती थी। उदाहरण के लिए इगबो समुदाय में लडकियाँ बेटों की तरह व्यवहार कर सकती थीं और संपन्न स्त्रियाँ अपने लिए पत्नियों का प्रबंध कर सकती थीं। इस संबंध में हमारा अपना भक्ति आंदोलन भी एक ऐसा दृष्टांत प्रस्तुत करता है जिसमें भक्त कवि देह की प्रदत्त लैंगिकता को प्रश्नांकित करते दिखाई देते हैं। मसलन, दसवीं सदी के एक शिव-भक्त कवि देवेरा दसिमैय्या केवल पुरुष या केवल स्त्री के विभाजन से परे जाकर यह कहते हैं-
अगर उन्हें उन्नत वक्ष और
लम्बे बाल आते दिखते हैं
तो उसे वे औरत कहते हैं
जब उन्हें दाढी और मूँछें दिखाई देती हैं तो
वे उसे मर्द कहने लगते हैं
लेकिन इन दोनों के बीच में जो आत्म मँडराता है
वह न मर्द होता है, न औरत ।
संक्षेप में कहें, तो संस्कृतियों की छानबीन करते हुए लेखिका का इस निष्कर्ष पर पहुँचना गहराई से आश्वस्त करता है कि स्त्री-पुरुष का यह द्विभाजन प्राकृतिक तथ्य नहीं बल्कि आधुनिकता की गढंत है।
देह, परिवार, कामना, यौन हिंसा, नारीवादी और महिलाएँ तथा पीडित या एजेन्ट नामक छह अध्यायों में विन्यस्त यह किताब एक तरह से नारीवाद के इसी बुनियादी परिप्रेक्ष्य का विस्तार करते हुए सामान्य-बोध के नाम पर रूढ हो चुके पूर्वाग्रहों तथा संस्कृति, जीवन-शैली व सामाजिक व्यवहार/मान्यताओं के पीछे अनुकूलन (कंडीशनिंग) के विराट, लेकिन अदृश्य शक्ति-केंद्रों की शिनाख्त करती है। उदाहरण के लिए, परिवार को हम एक ऐसे समूह के तौर पर देखते हैं अच्छे-बुरे समय में एक-दूसरे के साथ खडा रहता है। लेकिन जैसे ही हम इस धारणा के अंतर्निहित तत्त्वों का विश्लेषण करने चलते हैं तो पता चलता है कि समाज और कानून की नजर में तो परिवार केवल पितृसत्तात्मक और विषमलिंगी ही हो सकता है। और यह भी कि परिवार की इस संस्था पर मौलिक अधिकारों जैसी कोई व्यवस्था लागू नहीं होती।
इसी तरह, मनुष्य देह की औसत समझ इस बात पर जोर देती है कि प्रत्येक देह पुल्लिंग या स्त्रीलिंग होती है। लेकिन इस वर्गीकरण की गहराई में उतरें तो साफ हो जाता है कि इसमें उन लोगों के लिए कोई जगह नहीं हैं जो इस वर्गीकरण की शर्त को पूरा नहीं कर पाते। देह की यह वर्चस्वी धारणा ऐसे लोगों को बीमार या असामान्य घोषित कर देती है। इसका प्रभाव यहाँ तक जाता है कि सामाजिक रूढियों का पालन न करने वाली देह को अनुशासन के नियम-कायदों के अलावा हाशिये पर सिमटते जाने की पीडा भी सहन करनी होती है। समलैंगिक पुरुष, स्त्रियों की तरह व्यहार करने वाले तथा वृद्ध व्यक्ति आदि, इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं। स्त्रियोचित व्यवहार करने वाले पुरुषों को आते-जाते अक्सर उपहास और शारीरिक हिंसा का सामना करना पडता है। दक्षिण एशिया के संदर्भ में देखा जाए, तो यहाँ घरेलू नौकरों का पुरुषत्व घर के अन्य पुरुषयों की तुलना में अधीनस्थ रहता है। इसकी वजह यह है कि उन्हें वैसा काम करना पडता है जिसे स्त्रियों का क्षेत्र माना जाता है। अपनी मालकिनों के संबंध में उनका पुरुषत्व अक्सर अप्रासंगिक रहता है।
लेखिका का मानना है कि हम इन पहचानों के साथ जीते हुए या तो उनकी महत्ता और मूल्यों को पुष्ट करते जाते हैं अथवा खारिज करते हुए अन्य पहचानों की खोज में जुटे रहते हैं। नारीवाद इस दूसरी स्थिति का द्योतक है। वह बताता है कि यह देह हमारा कारागार नहीं है कि इस देह को समझने और अनुभव करने के तौर-तरीकों का एक लम्बा इतिहास है।
अधिकांश लोग इस तथ्य से परिचित हैं कि यौन-कामना केवल स्त्री और पुरुष के संबंधों तक सीमित नहीं है। लेकिन निषेध का सामाजिक प्रशिक्षण हमें इस सत्य को स्वीकार नहीं करने देता। लेखिका का मानना है कि यौनिकता को पूरी तरह विषमलिंगी बना देना एक तरह का विपर्यय है जिससे समलैंगिकता को पाप और अपराध मानने का नजरिया पैदा होता है। इस संबंध में उनका यह प्रति-प्रश्न गम्भीर बहस की माँग करता है कि अगर समलैंगिकता का आकर्षण बिना बुलाए भीतर आ बैठे और उसे दण्ड के द्वारा बाहर निकालने की कोशिश की जाए तो ऐसे में यौनिकता के तथाकथित प्राकृतिक रूप के नाम पर क्या रह जाता है अतः हम जिस विषम-लैंगिकता को सामान्य समझते हैं, वह असल में एक ऐसी निर्मिति है जिसे कायम रखने के लिए कईं प्रकार के सांस्कृतिक, चिकित्सकीय और आर्थिक नियंत्रण काम में लगे रहते हैं। अगर हम यह समझने की कोशिाश करें कि वर्ग जाति तथा जेण्डर के पदानुक्रम के पीछे नियंत्रण की यही बहुमुखी व्यवस्था सक्रिय रहती है, तो फिर यह स्वीकार करना पडेगा कि हमारे भीतर यौनिकता के अलग-अलग रूप या उनके बीज पडे रहते हैं।
यौन हिंसा के विभिन्न रूपों तथा उनसे संबंधित कानूनी प्रावधानों पर विस्तृत चर्चा के क्रम में निवेदिता सोदाहरण बताती हैं कि न्याय का समूचा तंत्र किस तरह पितृसत्तावादी नजरिया से आक्रांत रहता है। मसलन, उनके अनुसार पितृसत्ता की शक्तियों को बलात्कार इसलिए बुरा लगता है क्योंकि इससे परिवार की प्रतिष्ठा पर आँच आती है। यह सोच बलात्कार को मृत्यु से भी भयावह मान कर चलती है। ऐसे में होता यह है कि बलात्कार के बाद पीडित स्त्री का सामान्य जीवन तितर-बितर हो जाता है। पितृसत्ता के पास बलात्कार से बचने का एकमात्र उपाय यह है कि महिलाएँ उसके द्वारा तय की गयी लक्ष्मण-रेखा से बाहर जाने की हिमाकत न करके घर-परिवार की चारदीवारी में रहें।
बलात्कार के प्रति पितृसत्ता का यह नजरिया इतना प्रबल है बहुत-से मामलों में अदालतें बलात्कारी व्यक्ति तथा पीडित महिला का विवाह कराने की पैरवी करने लगती हैं। जाहिर है कि यह सोच न्याय के विचार का एक भीषण उल्लंघन है क्योंकि पीडित स्त्री का पति बनते ही बलात्कारी व्यक्ति के यौन-कृत्य पर वैधता की मुहर लग जाती है।
निवेदिता कहती हैं कि इसके उलट, नारीवादियों की निगाह में बलात्कार की जघन्यता यह है कि वह स्त्री की स्वायत्तता और दैहिक अखण्डता का अतिक्रमण करता है। दूसरे, नारीवादी इस विचार से सहमत नहीं है कि बलात्कार के बाद स्त्री का जीवन मौत से भी भयावह हो जाता है। लिहाजा यौन-प्रताडना और यौन-हमले को लेकर उनका रवैया यह है कि पीडित पर दोष लगाना बंद होना चाहिए। इस प्रकार, नारीवादियों की नजर में बलात्कार से पीडित की नहीं, बल्कि बलात्कारी की इ*जत को बट्टा लगता है।
इसीलिए, यौन हमले के संबंध में नारीवादियों की यह माँग रही है कि बलात्कार की परिभाषा को विस्तृत करने के साथ इसमें दो संशोधन और किए जाने चाहिए- पहला यह कि कानून की शब्दावली से बलात्कार नामक शब्द हटा कर उसकी जगह यौन आपराधिक आचरण जैसे शब्द का प्रयोग किया जाए; दूसरे, कानून में सजा का प्रावधान यौन हमले के अलग-अलग स्तरों तथा इन हमलों की गंभीरता के अनुरूप होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि दुनिया के कईं देशों कनाडा, आस्ट्रेलिया तथा अमेरिका के कुछ राज्यों में ऐसी ही व्यवस्था है जिसमें अभियुक्त को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि अगर उसने थोडा कम गंभीर किस्म का यौन अपराध किया है, तो वह अपना अपराध स्वीकार कर ले। वहाँ ऐसे अभियुक्तों को यह एहसास कराया जाता है कि अगर वे स्वयं को निरपराध सिद्ध करने के बजाय दोषी मान लेंगे, तो उन्हें कम कडी सजा मिलेगी। इससे न्यायाधीश भी किसी व्यक्ति को बलात्कार का दोषी सिद्ध करने के बजाए उसे तीसरे दर्जे के अपराधिक यौन आचरण के अंतर्गत दण्डित कर सकेंगे। लेकिन आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2013 में इससे कोई प्रेरणा नहीं ली गई।
क्या नारीवाद एक इकहरी और निर्विवाद संरचना है वह जाति और धर्म की भिन्नताओं को कैसे संबोधित करता है नारीवाद की वैचारिकी से संबंधित ऐसे सवालों का जवाब किताब के पाँचवे अध्याय- नारीवाद और महिलाएँ में मिलता है। लेखिका बताती हैं कि नारीवाद एकरूपता में यकीन नहीं करता। एक आंदोलन के तौर पर नारीवाद राष्ट्र और धार्मिक समुदायों को समरूपी इकाई नहीं मानता क्योंकि उसकी दृष्टि में प्रत्येक धार्मिक समुदाय की भीतरी बनावट विषमतापूर्ण होती है। और हम जिन पहचानों को हिंदू, मुस्लिम और ईसाई कहकर इंगित करते हैं, उनमें क्षेत्र तथा समुदाय के स्तर पर व्यापक भिन्नताएँ पायी जाती हैं। इनमें कुछ प्रथाएँ अन्य प्रथाओं की तुलना में बेहतर हो सकती हैं, परन्तु उनमें एकरूपता पैदा करने की कोशिश को जेण्डरगत अन्याय का समाधान नहीं माना जा सकता। इसलिए समकालीन नारीवादी आंदोलन जेण्डर-संवेदी कानूनों पर *यादा जोर देता है।
इस चर्चा में मुख्यधारा के नारीवाद तथा दलित नारीवाद के तनावपूर्ण संबंधों पर भी विचार किया गया है। जिससे साफ पता चलता है कि नारीवादी राजनीति में कई प्रकार की सत्ता-संरचनाएँ सक्रिय हैं। इसलिए इस राजनीति का मुहावरा अलग-अलग बिंदुओं की अंतत्रि*या से उभरता है। मसलन, दलित नारीवादी मुख्यधारा के नारीवाद को विशेषाधिकारों से लैस, दबंग जातियों और उच्च वर्ग की शहराती महिलाओं का आंदोलन समझती हैं। लेकिन लेखिका इस तनाव को नकारात्मक भाव से नहीं देखती। उनके अनुसार आज की नारीवादी बौद्धिकता और राजनीति जाति के बहिष्कार की विरासत से जूझ रही है। ऐसे में दलित और सवर्ण नारीवादियों का यह संवाद उन्हें सकारात्मक दिशा में जाता दिखता है।
नारीवाद तथा महिलाओं की इस चर्चा में यह देखना महत्वपूर्ण है कि लेखिका स्त्री को नारीवादी राजनीति का स्पष्ट विषय या कोई प्राकृतिक व प्रत्यक्ष अस्मिता नहीं मानती। उनकी दृष्टि में नारीवादी राजनीति का अभिप्रेत राजनीति के व्यवहार से पैदा होता है। इस अर्थ में असल चीज वह राजनीतिक चुनौती है जिससे मुकाबला करने वाले लोग कभी दलित, कभी मुसलमान और कभी स्त्रियों की संज्ञा से ज्ञापित किए जाते हैं। ऐसे में, नारीवाद की सफलता इस बात में निहित है कि वह लोगों को उनके अलग-अलग संदर्भों में नारीवादी होने के लिए कैसे प्रेरित कर सकता है।
किताब का आखिरी अध्याय- पीडित या एजेंट जेण्डरकृत सम्बन्धों को सत्ता की संरचनाओं के बरक्स रखकर देखता है। यौन-कर्म, बार-नृत्य तथा कोख के व्यावसायिक इस्तेमाल के अलावा पोर्नोग्राफी तथा गर्भपात जैसे मुद्दों के इर्दगिर्द केंद्रित इस अध्याय को नारीवाद की व्यावहारिक बहसों का आईना माना जा सकता है। इन मसलों पर बहुत-से लोगों को लेखिका का नजरिया परंपराभंजक लग सकता है। लेकिन अगर अपने पूर्वाग्रहों के बजाय उनके विश्लेषण में वर्णित परिस्थितियों और साक्ष्यों पर ध्यान दिया जाए, तो सहमति-असहमति का यह प्रश्न सरलीकरण का शिकार नजर आता है । मसलन, लेखिका का कहना है कि यौन-कर्म करने वाली महिलाओं के हालात समझने के लिए चुनाव बनाम मजबूरी का मॉडल नाकाफी हो चुका है। इस सम्बन्ध में उन्होंने यौनकर्मियों के अखिल भारतीय सर्वेक्षण के उस निष्कर्ष को उद्धृत किया है जिससे पता चलता है कि सर्वेक्षण में शामिल 71 प्रतिशत महिलाएँ यौन कर्म के इस व्यवसाय में अपनी मर्जी से दाखिल हुई थीं। गौरतलब है कि इस सर्वेक्षण में चौदह राज्यों तथा एक संघशासित प्रदेश की तीन हजार महिलाओं से बात की गयी थी। लेखिका के मुताबिक इस सर्वेक्षण का सबसे अहम बिन्दू यह है कि श्रम के बाजार में चुनाव करने की संभावनाएँ बेहद सीमित हैं। घरेलू श्रम और फैक्ट्रियों में काम की स्थितियाँ बेहद शोचनीय और शोषणपूर्ण होने के बावजूद लोगबाग, खासतौर पर महिलाओं को ऐसे काम इसलिए करने पडते हैं क्योंकि उनके पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं होता। लेकिन यह सब देखकर हम ऐसे तमाम कामों को बन्द कर देने बजाय इस बात पर जोर देते हैं कि काम करने की स्थितियाँ गरिमापूर्ण होनी चाहिए तथा लोगों को नियमानुसार वेतन मिलना चाहिए आदि। इस तरह, लेखिका इस नतीजे पर पहुँचती हैं कि पूँजीवाद में यौन-कर्म करने का चुनाव किसी भी दूसरे काम की तरह होता है- व न उससे *यादा विवशतापूर्ण होता है, न कम। इसलिए अगर यौन-कर्म को अपराध के दायरे से बाहर निकाल दिया जाए, तो उसका अच्छा परिणाम यह होगा कि इस पेशे में बलात्कार और शारीरिक हिंसा का सामना करने वाली महिलाएँ बलात्कार से पीडित किसी भी अन्य महिला या किसी भी जेण्डर के व्यक्ति की तरह कानूनी उपायों की सहायता ले सकेंगी।
बहरहाल, प्रदत्त और स्थापित मान्यताओं का प्रत्याख्यान करती और हाशिये के वृत्तांतों को चुनकर मुख्यधारा के विमर्शों का प्रतिपक्ष गढती इस किताब को आद्योपांत पढा जाना चाहिए क्योंकि इसकी विषयवस्तु के सूत्र कुछ इस तरह अंतर्ग*थित हैं कि किसी एक को अधूरा छोडने पर दूसरे सूत्र का सिरा हाथ नहीं आता। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि खुद लेखिका निवेदिता मेनन भी नारीवाद की व्याख्या एकरेखीय ढंग से नहीं करती।

पुस्तक : नारीवादी निगाह से
(सीइंग लाइक अ फेमिनिस्ट का
हिंदी अनुवाद)
लेखिका : निवेदिता मेनन
अनुवाद : नरेश गोस्वामी
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष 2021
मूल्य : 299/-

सम्पर्क - 29, सीएसडीएस, राजपुर रोड,
सिविल लाइंस, नयी दिल्ली- ११००५३