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झाड- झाड बैरी

ज्ञानचंद बागडी
ये लो दूध का गिलास पी लो। यूँ कब तक माथा पकडे बैठे रहोगे? सुबह से कुछ नही खाया। आफ देखा - देखी बेटी और भूरा ने भी कुछ नहीं खाया है। महावीर की पत्नी सरवण ने अपने पति से कहा।
हम बर्बाद हो गए नाथी की माँ। रामजी ने हमारे साथ बहुत बुरी करी।
अण्डे के बारबार ओले। जिंदगी में ऐसे ओले कभी नहीं देखे। पहले आँधी और ऊपर से तूफान और ओले। कुछ भी नहीं बचा । खेतों को देखकर मुझे तो चक्कर आ गया। चारों तरफ बस बर्फ की चादर बिछी थी।
किसान का तो झाड- झाड बैरी होता है जी। क्या करें, जब तक फसल निकलकर घरों में नहीं पहुँचती, हमारी तो साँसें अटकी ही रहती हैं। सरवण भी पति का ढाँढस तो बँधा रही है, लेकिन भीतर से उसका भी कलेजा फट रहा है।
तुम तो अच्छी तरह जानती हो नाथी की माँ कि अपने इस राजस्थान और हरियाणा से लगे राठ क्षेत्र में पच्चीस वर्ष पहले तक दो चीजें बहुत आम थी। एक तो भारी बरसात और दूसरा निश्चित समय पर प्रतिदिन काली- पीली आँधी का आना। बरसात में कभी-कभी सात- आठ दिन तक सूरज नहीं दिखता था। झड (धीमी बारिश) कई दिनों तक रूकती ही नहीं थी। इन दिनों घर की छत टपकती, तो घर के सभी छोटे - बडे बर्तन टपकों के नीचे काम आ जाते थे। अगर किसी निश्चित दिन बारिश शुरू होती थी, तो लोग अनुमान लगा लेते थे कि अब यह बरसात कितने दिन तक चलेगी।
गाँव में महावीर यादव का परिवार अपने खेतों की ढाणी में बसा हुआ था। वैसे तो महावीर ईश्वरीय शक्ति में विश्वास रखता था, लेकिन तूफान और ओले आने की स्थिति में उसकी धार्मिकता कई गुना बढ जाती थी। इस समय वह कितने ही देवी- देवताओं का फसल बचाने के लिए प्रसाद बोलता कि उसे खुद ही याद नहीं रहता था। किसान के लिए तो उसकी फसल ही उसका सब कुछ होता है। महावीर प्राकृतिक संकेतों से ही मौसम का मिजाज समझ जाता था। बादल किधर से चढा है, चिडिया मिट्टी में नहा रही है या चिडिया अपने अण्डों को सुरक्षित जगह ले जा रही हैं। मसालों में सीलन आ रही है, तो समझो बारिश आने वाली है।
बिल्कुल सही कहा नाथी के बापू। आज पता नहीं कितने बरसों बाद वैसी आँधी और तूफान देखा है। गर्मी में उन दिनों नियमित रूप से प्रतिदिन एक ही समय पर काली - पीली आँधी भी आती थी। भभूलिया ( रेत का बवण्डर) आसमान तक जाता था। अधिकांश कच्चे मकान होते थे, तो लोग छप्परों से चिपक जाते थे और उन्हें उडने से रोकते थे। गाँव में फिर भी कई छप्पर हवा में उड जाते थे। आँधी इतनी तेज होती थी कि कुछ भी दिखाई नहीं देता था। आँधी नियमित समय पर आती और सभी चिल्लाने लगते की आँधी आ गई । लोग अपने कपडे - लत्ते उठाने लगते। आँधी के कारण इन दिनों घास- फूस के घरों में आग लगना आम बात थी। कैसे गाँव वाले चिल्लाते थे कि फलां के घर में आग लग गई और सारे गाँव वाले पानी की बाल्टी लेकर उधर भागते।
महावीर की ढाणी में कुल मिलाकर आठ प्राणी रहते हैं, जिनमें से सात प्राणी स्थाई रूप से रहते हैं तथा महावीर का लडका महेंद्र गाँव की तहसील बहरोड में पढ रहा है। कला संकाय से स्नातक करते समय वह वहीं छात्रावास में रहता है तथा गाँव आता-जाता रहता है। अन्य सदस्यों में महावीर की पत्नी सरवण तथा उसकी बेटी नाथी दोनों महावीर के साथ खेतों में कडी मेहनत करते हैं। परिवार के चार और महत्त्वपूर्ण सदस्य हैं जिनमें दो बैल एक का नाम भोला तथा दूसरा चितकबरा, एक भैंस जिसका नाम नानी है और एक देसी नस्ल का कुत्ता भूरा है। महावीर की बडी बेटी माया का तीन वर्ष पहले विवाह हो चुका है।
महावीर ने ढाणी में अपने दो पक्के मकान बना रखे हैं जिसमें एक में स्थाई रूप से अनाज या भूसा भरा रहता है तथा दूसरे में घर के अन्य सामान के अलावा उनकी बेटी सोती है । दो बडे- बडे छप्पर है जिनमें से एक में महावीर और उसकी पत्नी सोते हैं तथा दूसरे बडे छप्पर में उनके दोनों बैल और भैंस नानी की रहने की व्यवस्था है । किसी मेहमान आने की स्थिति में महावीर की पत्नी अपनी बेटी के पास सो जाती है तथा महावीर मेहमानों के साथ अपने छप्पर में। छप्पर इतना बडा है कि जिसमें आसनी से सात-आठ चारपाइयाँ बिछा सकते हैं। आँगन में बहुत भारी शीशम का पेड है जिसे घर का सबसे बडा कमरा कह सकते हैं क्योंकि इसके नीचे दस खाट बिछ सकती हैं तथा साथ में पशुओं को भी बाँधा जा सकता है। यह पेड इंसानों और पशुओं के साथ सैकडों परिंदों का भी आसरा है। पेड के साथ ही पानी की बडी-सी टंकी बनी है जिसमें टोंटी लगी है। ढाणी के पास पहाड की तलहटी में बसे निम्न जाति के चमार और बावरिया भी पानी यहीं से भरते हैं। टंकी के पास ही पशुओं के पानी पीने के लिए खेळ बनी है। बगल में एक नहानघर बना हुआ है।
महावीर की ढाणी को एक बरसाती नाला उसे गाँव से अलग करता है। नाले के इधर महावीर के खेत हैं जिनकी रखवाली के लिए परिवार का सहयोगी उनका कुत्ता भूरा है। भूरा और महावीर के परिवार का पता नहीं कैसे रिश्ता बना। अचानक भूरा एक दिन महावीर की ढाणी में आ गया और उसके बाद इस परिवार का अभिन्न हिस्सा बन गया। भूरा आया था तब छोटा-सा पिल्ला था। सरवण ने उस दिन उसे दूध का कटोरा पिलाया था और आजतक उसकी वही आदत बनी हुई है। नाथी के साथ सारे दिन खेतों में हाण्डता है, खेलता है, लेकिन दूध सरवण के हाथ से ही पिएगा। भूरा देसी नस्ल का एक साधारण कुत्ता है, लेकिन उसकी बहादुरी असाधारण है। गाँव के आठ - दस कुत्ते मिलकर भी उस पर हमला करें, तो भूरा सबसे अकेले निपट लेता है । भूरा का आसपास के दस गाँवों तक इतना आतंक है कि ढाणी में आने वाले किसी भी बाहरी व्यक्ति को नाले के दूसरे छोर से ही महावीर को आवाज लगानी पडती है । भूरा पाँच - छह लोगों कि पिंडलियाँ काट चुका है, इसलिए ढाणी में आने वालों को सँभल कर ही आना होता है।
महावीर के खेत दो जगह हैं, एक तो ढाणी और कुएं के पास तथा दूसरे खेत पहाड की तलहटी के नीचे। भूरा बिना कहे महावीर की हर बात समझता है। सुबह भैंस और बैलों को अपने आप ही खेतों तक ठेलता हुआ ले जाता है तथा कुएँ से लेकर पहाड की तलहटी वाले खेतों की बाघ की तरह चलता हुआ रखवाली करता है। भूरा के किसी पर भौंकने पर महावीर तुरन्त समझ जाता है कि भूरा किसी इंसान पर भौंक रहा है अथवा जानवर पर। भूरा के होते हुए किसी की मजाल नहीं जो महावीर के खेतों में कोई नुकसान कर दे। महावीर और भूरा बाप- बेटे की तरह आपस में बातें करते हैं। दोनों इशारों में ही एक-दूसरे की बात समझ जाते हैं। जब दोनों पहाड की तलहटी के पास पहरा देते हैं, तो रात में पहले महावीर ढाणी में खाना खाने जाता हैं और भूरे का खाना लेकर आता है। खाना खाकर महावीर खेत पर बनी मचान पर अपनी लाठी और बैटरी के साथ सोता है और भूरा चौकीदार की भूमिका में आ जाता है। एक दिन महावीर को खेतों में कोई काम था, तो उसने भूरा से कहा कि भूरा जा तू खाना खा आ मुझे थोडा वक्त लगेगा। महावीर के कहे अनुसार भूरा खाना खाने ढाणी में चला गया। भूरा को देखते ही महावीर की पत्नी सरवण भूरा पर चिल्लाई कि तू कहाँ से आ गया। नाथी का बाप कहाँ है ? भाग यहाँ से। भूरा नाराज होकर वापस खेत पर पहुँच गया। उसके बाद महावीर ढाणी में खाना खाने आया। उसके खाना खाने के बाद उसकी पत्नी ने भूरे के लिए खाना बाँध कर दिया, तो महावीर ने कहा कि भूरा को तो मैंने खाना खाने भेज दिया था।
नाथी के बापू, भूरा को तो मैंने डाँट दिया था कि तू पहले यहाँ कैसा आ गया।
तो नाथी की माँ अब भूरा मेरे कहने से खाना नहीं खाएगा। अब तो तुझे ही उसे खाना खिलाना पडेगा।
सरवण ने भूरा को माँ की तरह पाला था, तो वह अच्छी तरह जानती थी कि रूठे हुए भूरा को कैसे मनाना है। उसने भूरा के लिए दूध लिया और उसका खाना लेकर अपने पति के साथ भूरा को खाना खिलाने अपने खेतों में गई। जब भूरा को खाना दिया गया, तो भूरा ने खाने की तरफ देखा तक नहीं। उसके बाद सरवण ने अपना माँ का ममत्व दिखाते हुए उसको दुलारा....आ जा मेरे बेटे दूध पी ले। उसके बाद भूरा भी माँ की ममता की अनदेखी कैसे कर सकता था और उसने चुपचाप दूध भी पी लिया और खाना भी खा लिया।
महावीर की ढाणी में उसकी भैंस नानी सारे गाँव में सबसे अच्छी नस्ल की भैंस है जिसे सरवण की माँ ने अपनी बेटी को सलूनो (रक्षाबंधन) पर पोहन्ची (राखी) बँधाई में अपनी सबसे अच्छी नस्ल की एक पडिया के रूप में उसे भेंट में दी थी, जो अब भैंस बन चुकी है। इस भैंस का विचित्र नाम होने का कारण महावीर और सरवण की बेटी नाथी है जिसने नानी से मिली, इस भेंट के कारण उसका नाम ही नानी रख दिया।
नानी मुर्रा नस्ल की पालतू भैंस है जो दूध उत्पादन के लिए पाली जाती है। हरियाणा में इसे काला सोना कहा जाता ह। दूध में वसा उत्पादन के लिए मुर्रा सबसे अच्छी नस्ल है। नानी का रंग काला स्याह, सिर छोटा व सींग छल्ले के आकार के हैं। उसके सिर, पूँछ और पैर पर सुनहरे रंग के बाल हैं। उसकी पूँछ लम्बी तथा पिछला भाग सुविकसित है तथा अयन भी सुविकसित है। उसकी पतली चमडी है । इसके मुडे हुए सींगों के कारण स्थानीय बोली में इसे कून्हीं भैंस कहते हैं। नानी सुबह-शाम मिलाकर अट्ठारह किलो दूध देती है जिससे सरवण प्रतिदिन एक किलो घी तैयार करती है। सुबह-सुबह गाँव से निम्न जाति के बच्चे महावीर की ढाणी में छाछ लेने के लिए आते हैं। यह एक विचित्र बात है कि भूरा ढाणी में छाछ लेने आने वालों तथा पानी भरने आने वालियों को काटना तो दूर उन पर भौंकता भी नहीं है।
महावीर की ढाणी के घी की सभी प्रशंसा करते हैं। एक दिन गाँव के स्कूल में पढाने वाले एक बाहरी गाँव का अध्यापक महावीर के पास घी लेने के लिए उसके पहाड के पास वाले खेत में आ गया। जब वे दोनों ढाणी की तरफ चलने लगे, तो आधे रास्ते में ही जोर की आँधी आ गई। आँधी इतनी तेज थी कि हाथ को हाथ नही सूझ रहा था। अँधेरे में चलते हुए महावीर और वह अध्यापक रास्ता भटक गए। खतरे को भाँपते हुए भूरा ने उनकी गन्ध के आधार पर भौंक-भौंक कर उन्हें आगे बढने से रोका। उसके बाद उसने आगे - आगे चलते हुए अपनी आवाज के सहारे उन्हें ढाणी पहुँचाया। आँधी रुकने के पश्चात महावीर ने देखा कि अगर उस दिन भूरा नहीं होता, तो वह तथा अध्यापक दोनों एक कुएँ में गिर जाते।
महावीर की बडी बेटी माया विवाहित है। उसका पति सरकारी नौकरी में बडा अफसर है। वह जब भी अपने मायके आती है तो उसे रिवाडी शहर से जीप छोडने आती है। आते हुए वह अपने उपयोग के लिए बहुत से सौंदर्य प्रसाधन भी अपने साथ लाती है। एक दिन उसने नहा कर अपना महँगा साबुन साबुनदानी में ही छोड दिया। गाँव की पानी भरने वाली किसी बच्ची या महिला ने उसकी खुशबू के लालच में उसे चुरा लिया। साबुन को सभी जगह ढूँढा, लेकिन नहीं मिला। अपनी बडी बहन के आने के कारण महेंद्र भी कॉलेज से गाँव आया हुआ था। उसने कहा कि साबुन मैं अभी ढूँढता हूँ। उसने भूरा को साबुनदानी सुंघाई, तो भूरा गाँव की तरफ भागने लगा। उसके बाद वह एक घर के बाहर जाकर जोर-जोर से भौंकने लगा। महेंद्र ने उस घर में जाकर कहा कि भाभी गलती से आप हमारा साबुन ले आए हो, उसे लौटा दो। कुत्ते को लगातार भौंकता हुआ देख उस महिला ने चुपचाप साबुन लौटा दिया।
अभी गाँव तक बिजली नहीं पहुँची थी, तो महावीर ने सिंचाई के लिए इंजन लगा रखा था। सिंचाई तो इंजन से हो जाती है, लेकिन बाकी कामों के लिए महावीर के दोनों बैलों ने खेती का पूरा बोझ सँभाल रखा है। उसका बैल भोला नागौरी नस्ल का है। वह स्वभाव से बहुत ही नरम है। उसे कुछ भी खिला दो। उसने कभी किसी को परेशान नहीं किया। चितकबरा देसी नस्ल का बैल है, जो भोला को तो परेशान करता ही है, कभी-कभी उसमें और भूरा में ठन भी जाती है। चलते हुए किसी आदमी या पशू को सींग अडाना उसकी सामान्य आदत है। खाने में भी जब तक भोला की नाँद में मुँह ना मारले उसे चैन नहीं मिलता। उसकी शरारतों के कारण ही सरवण और उसकी बेटी नाथी भोला पर अधिक स्नेह लुटाती हैं। उसके चारे में अधिक गुड मिलाना, दाल - चना डालना लेकिन चितकबरा उसे भी छीन कर खा जाता। भोला फिर भी संतोषी जीव, उसे लडना ही नहीं आता। भोला सच में अपने नाम को चरितार्थ करता है।
एक दिन भूरा को खलियान की रखवाली छोडकर महावीर, उसकी पत्नी, बेटी, बैलों और अपनी भैंस के साथ पहाड वाले खेत से ढाणी में आ रहे थे कि अचानक बहुत तेज आँधी आ गई। कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। घबराहट में महावीर ने अपनी बेटी से कहा कि नाथी नानी की पूँछ पकड ले और सभी एक-दूसरे का हाथ पकड लो। चलते रहो वरना कोई पेड सिर पर आ गिरेगा। आगे- आगे बैल चल रहे थे और पीछे अपनी भैंस नानी की पूँछ पकडकर महावीर का परिवार। एक जगह आकर बैल रास्ता भटक गए, तो उनके गले में बँधी घण्टी की आवाज सुनकर भैंस रंभाई और उन्हे आगे बढने से रोका। उसके बाद भैंस ही अपने हिसाब से सभी को ढाणी तक लेकर गई। उस दिन आँधी और तूफान इतना तेज था कि उसकी चपेट में आकर शीशम का पेड टूट गया। पेड के टूट जाने का महावीर के परिवार को आदमी के मरने जैसा दुख हुआ। पेड से घरवालों और पशुओं को तो आराम था ही, सैकडों परिंदों का आशियाना भी उजड गया। इस पेड के टूटने की चर्चा थमती ही नही थी। आखिर पडोसी गाँव के बिरजू खाती को उसे बेच दिया। बिरजू उसे ले गया तब कहीं उस शीशम को भूलने में आसानी हुई, लेकिन फिर भी किसी ना किस प्रसंग में शीशम का नाम आ ही जाता।
अपनी भैंस की सुन्दरता और उसके दुधारूपन के कारण सरवण उसकी नजर उतारती रहती थी और उसने किसी फकीर से उसके लिए नजर ना लगने का काला धागा भी बनवा रखा था जिसे वह हमेशा उसके गले में बाँधे रखती थी। नानी के तीसरी बार ब्याणे का समय नजदीक था। सरवण ने देखा कि इस बार उसकी प्रसूति में कुछ जटिलता आ रही है। उसने अपने पति से कहा कि बगल के हरियाणा के गाँव से पशुओं के डॉक्टर को बुला कर लाओ, मुझे लगता है इस बार नानी का बच्चा उलझ गया है। हरियाणा छोटा राज्य होने के कारण वहाँ सडक, बिजली और पशु चिकित्सालय बहुत जल्दी खुल गए थे।
महावीर दौड कर डॉक्टर को बुलाने चला गया। डॉक्टर ने आते ही भैंस को देखा और जल्दी से उसे दो टीके लगाए। डॉक्टर रामसिंह पूरे इलाके में बहुत अच्छा डॉक्टर माना जाता था उसने बहुत प्रयास किए, लेकिन प्रसूति में ऐसी पेचीदगी आई कि भैंस ने आँखें मूँद ली। ढाणी में तो रोता पड गया। महावीर की बेटी नाथी दहाडें मारकर रो रही थी। ढाणी ही क्या सारे गाँव को इस भैंस के मरने का दुःख था। घर में दो दिन तक चूल्हा नहीं जला। तीसरे दिन खाना बना, लेकिन किसी ने मुँह में कोर नही डाला। बैलों की सानी में चूरी यूँ की यूँ पडी रही, दोनों ने मुँह भी नहीं मारा। सरवण ने भूरा को दूध पीने के लिए बहुत मनाया, लेकिन घरवालों का हाल देखकर उसने दूध की तरफ देखा भी नहीं। उन दिनों भी उस भैंस की कीमत बाईस हजार रुपये लग चुकी थी।
महावीर की लडकी नाथी थी तो सत्रह वर्ष की लेकिन लगती बीस की थी। उसे खेलने के लिए किसी साथी की जरूरत नहीं होती। खेलने के लिए भूरा, नानी और उनके बैल ही उसकी दुनिया थे। वह हमेशा दिल से सोचती थी तथा किसी बात में अनावश्यक दिमाग नहीं लगाती थी। हमेशा घर में भैंस रहने के कारण उसका रूप - रंग दमकने लगा। वह बरसाती नाले से होकर अपने पहाड की तलहटी वाले खेतों में अकेली चली जाती थी। उसने कई बार देखा कि गाँव का राजपूतों का आवारा लडका हरपाल उसे नाले में या उसके किनारे अक्सर मिल जाता था। इस अल्हड और बेपरवाह लडकी ने इस तरफ कभी ध्यान ही नहीं दिया। वह उसकी तरफ देख कर हँसता, तो यह भी हँस देती। एक दिन शाम को अँधेरा होने वाला था और वह अकेली अपने खेत से ढाणी की ओर जा रही थी। अँधेरे को देखते हुए हरपाल में नाथी को पकड लिया। वह कहने लगी...अरे भाई यह क्या कर रहा है? मैं तो तेरी बहन लगती हूँ। हरपाल ने जब अपनी पकड मजबूत की तो उसने भूरा भूरा भूराह्ह चिल्लाना शुरू कर दिया। नाथी की आवाज सुनते ही भूरा तो पलक झपकते ही वहाँ आ गया और उसने हरपाल पर हमला बोल दिया। बडी मुश्किल से वह अपनी जान बचाकर भागा।
वक्त हरेक जख्म भर देता है। बेटी का दुख देखकर सरवण की माँ ने अपने यहाँ से उसके भाई के हाथ अपनी एक और पडिया उसके यहाँ भिजवा दी। सरवण उसकी टहल में लग गईं। जिंदगी अपनी गति से चल रह थी।
रवि की फसल के बाद सावन में सभी की नजर आसमान की ओर थी। इंद्रदेव की मेहरबानी हुई और महावीर अपने बैलों को लेकर बाजरे की बुवाई में लग गया। अच्छे दिन कहकर नही आते उसी तरह बुरे दिनों का भी किसी को कहाँ पता चलता है। महावीर जैसे कुशल हाली की चूक से हल का लोहे का फाल भोला के बाएँ पैर में लग गया। भोला ठान बैठ गया। अब एक बैल से कैसी खेती। समय पर बुवाई जरूरी थी। महावीर को पैसे देकर दूसरों से खेत बुवाने पडे। किसान माटी में माटी होकर चार पैसे कमाता है उसके लिए एक - एक पैसे का क्या महत्त्व होता है वही समझ सकता है। भोला की दवा- दारू में सारा परिवार लगा था। भैंस के दुःख से घर अभी उबरा भी नहीं था कि एक दिन भोला ने पैर ऊपर कर दिये। भोला की मौत से महावीर की रीढ टूट गई। किसान के लिए उसके बैल की मौत से बडा दुख क्या हो सकता है। भोला तो गया ही, लेकिन उसकी मौत के लिए सरवण अपने पति को जिम्मेदार ठहराती। इस बात को लेकर दोनों में आये दिन झगडा होता। महावीर को भी भोला की मौत का दुख भीतर से खाये जा रहा था।
खरीफ की फसल कटकर खलियान के ढेर लगे थे। इधर महावीर की बेटी माया के यहाँ उसे जामणा लेकर जाना था। उसके ससुराल वाले जन्मोत्सव की खुशी में डसोटन कर रहे थे तो उसका लत्ते - कपडे देना जरूरी था। बेटे की वार्षिक परीक्षा थी, तो ऐसे में भरे खेतों को छोड कर कैसे जाया जाए। लेकिन जाना तो जरूरी था। महावीर ने भूरा पर भरोसा करके खलिहान उसके हवाले कर दिए और एक रात के लिए बेटी की ससुराल चला गया। चोरों को हर बात की खबर रहती है। उस रात महावीर के नहीं रहने से बावरियों ने खलियान में चोरी करने की योजना बनाई। भूरा के होते हुए यह कैसे संभव था। भूरा ने उनका जमकर मुकाबला किया और उन्हें उनके घर तक घुसाकर आया। अगले दिन चिंतित महावीर खेतों में पहुँचा, तो भूरा उसे पकड कर भौंकता हुआ बावरियों के घर तक ले गया। महावीर समझ गया कि रात में बावरियों ने कोई वारदात जरूर की है, लेकिन वह उन्हीं कुछ कह नहीं पाया क्योंकि कुछ नुकसान तो हुआ नहीं था।
भूरा की मुस्तैदी से बावरियों को दूसरी जगह भी चोरी करने में मुश्किल हो रही थी। उन्होंने मिलकर भूरा को ठिकाने लगाने की योजना बनाई। एक दिन महावीर हमेशा की तरह शाम को रोटी खाने और भूरा के लिए लाने के लिए ढाणी में चला गया और पीछे से घात लगाकर बैठे किसी लडके ने भूरा को माँस में मिलाकर जहर दे दिया। महावीर जब भूरा का खाना लेकर खेत में पहुँचा, तो देखा कि भूरा के मुँह से झाग निकल रहे हैं और वह तडप रहा है। जहर इतना असरदार था कि महावीर कुछ करने की सोचता तब तक भूरा नें प्राण त्याग दिए। इस तरह बहादुर भूरा को कायरता से मार दिया गया।
मार दिया रे!
मार दिया रे मेरे बेटे को जालिमों ने!
अपने पति का रुदन सुनकर सरवण और नाथी दोनों माँ- बेटी खेतों की ओर भागी। रो - रो कर तीनों का बुरा हाल था। रोने की आवाज सुनकर गाँव और ढाणियों से बहुत से लोग एकत्र हो गए। सभी ने देखते ही एक ही बात कही कि कुत्ते को जहर दिया गया है।
शक तो बावरियों पर था ही । सुबह उठते ही महावीर ने थाने जाकर इसकी रिपोर्ट लिखवाई। पुलिस ने छानबीन की और दलिपिया बावरिया के लडके पप्पू को गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में उस लडके ने कहा कि उसने कुछ भी नही किया है। हमेशा हम छोटी जाति के लोगों पर ही क्यूँ शक किया जाता है। ठाकुरों का हरपाल तो इस कुत्ते के खून का कबसे प्यासा था। उसको मैंने कई बार उस कुत्ते को मारने की बात कहते सुना है। कल भी मैने उसे महावीर की खेतों की तरफ जाते हुए देखा था। पुलिस ने इस लडके के कहने पर हरपाल से पूछताछ की । मामूली पूछताछ के बाद ही हरपाल टूट गया और उसने अपना अपराध कबूल कर लिया। उसने कहा कि वह कुत्ता आए दिन उसे काटने के लिए उस पर झपटता था। पुलिस ने जब ठीक से पूछताछ की तो पता चला कि बावरिये तो यूँ ही बदनाम है। सबसे बडा चोरों का गिरोह तो क्षेत्र में हरपाल का ही है। भूरा उसकी चोरियों में तो बाधक था ही उसके दिमाग में नाथी से छेडछाड के दिन से ही भूरा को लेकर गुस्सा था। पुलिस ने हरपाल से पूछताछ करके चोरी की कईं वारदात सुलझाई। पुलिस ने उस पर मुकदमा दर्ज करके अपनी कार्रवाई शुरू कर दी। कहने को हरपाल गाँव के बडे ठाकुर मंगतू सिंह की औलाद है जो गाँव की सभी फैसलों का ठेका लेता है।
भूरा को भुलाना महावीर के लिए आसान नहीं था। महावीर को तो लगता जैसे बराबर का बेटा चला गया। उसकी बाँह टूट गई। उधर चितकबरा बैल अकेला रह गया था। अकेला बैल किस काम का। आखिर महावीर ने कलेजे पर पत्थर रखकर उसे एक गाडिया लोहार को बेच दिया।
नाथी अब अट्ठारह बरस की हो गई थी और उसका रूप और यौवन सोने सा दमकता था। महावीर को उसकी पत्नी हमेशा उसके लग्न की याद दिलाती रहती। खेती में खाने के अनाज के अलावा किसान को बचता ही क्या है। घर में पैसे- टके का कोई इंतजाम नही था। सरवण का टूम - छल्ला बडी बेटी माया के विवाह में काम आ गया था। दिन तो खेतों में खटते हुए बीत जाता, लेकिन रात में सोते हुए दोनो के पास नाथी के विवाह की बात करने के अलावा कोई और विषय नहीं होता। उसके विवाह की चिन्ता में दोनों पति- पत्नी घुले जा रहे थे। कहीं से भी कोई सहारा नही देखकर महावीर को पहाड के पास वाला पाँच बीघा खेत बेचना पडा। खेत बिकने से भी बुरा सरवण को यह लगा कि खेत परिवार वालों को ही बेचना पडा, लेकिन जिसके खेत पास लगते होंगें वही तो ठीक पैसे देगा।
खेत बिक गया, नाथी अपने घर - बार की हो गई। धीरे - धीरे सभी महावीर और सरवण को छोड कर चले गए। कॉलेज के बाद बेटा घर बैठकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था। सरकारी नौकरी इतनी आसानी से कहाँ मिलती है। डेढ साल एडियाँ रगडने के बाद उसने भिवाडी औद्योगिक क्षेत्र में एक निजी कम्पनी में नौकरी कर ली है और फैक्ट्री में ही रहता है। जो थोडा बहुत वक्त उसे मिलता है उसे वह अपनी किताबों को देता है। घर दोनों पति- पत्नी को काट खाने दौडता है।
गाँव में बिजली आई, तो महावीर ने मोटर लगवा ली । बिजली आने से दो साल तक इंजन से तो अच्छी स्थिति ही रही, लेकिन दो साल के बाद एक नई समस्या खडी हो गई। कुएँ का पानी नीचे चला गया। जो मोटर पंद्रह से सत्रह नोजल पानी बनाती थी वह मुश्किल से नो नोजल बनाने लगी। इतने पानी से सारे खेतों की सिंचाई करना संभव नहीं था, लेकिन एक साल तो पडोसियों से पैसे देकर कुछ पानी लिया। उसके अगले बरस पानी की कमी के कारण खेती करना संभव नहीं रहा। मजबूरी में खेत दूसरों को बँटाई पर देने पडे। खेत बँटाई पर देने से महावीर के पास कोई काम नही रहा। बाप जेलदार था तो परिवार की मर्यादा के कारण महावीर इस उम्र में किसी के यहाँ कोई काम तो कर नहीं सकता था। वक्त काटने के लिए स्कूल के पीछे पेडों के नीचे बने गट्टे पर सारा दिन लोगों के साथ तास पीटता है। महावीर के बाप जेलदार ने लम्बे समय तक गाँव को शराबमुक्त करने की मुहीम चलाई थी, लेकिन अब इन तास पीटने वाले लेंगदों की संगत में उसका अपना बेटा महावीर भी शराबी हो गया है। सरवण सारा दिन घर और भैंस में ही लगी रहती है और साँझ ढलने के बाद अपने शराबी पति के साथ माथाफोडी करती है।
एक दिन महेंद्र की फैक्टरी से महावीर के यहाँ तार आया जिसमें लिखा था जल्दी पहुँचो। सरवण ने अपनी एक चमारी भायली(मित्र) के यहाँ अपनी भैंस छोडी और आनन - फानन में पति- पत्नी भिवाडी के लिए निकले। उस दिन से उनकी कोई खबर नही है। दोनों कमरों पर ताले लटक रहे हैं।

सम्पर्क - 172, स्टेट बैंक नगर, पश्चिम विहार, नई दिल्ली-११००६३