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चेतावनी

भगवान अटलानी
चन्दनजी आश्वस्त थे कि मई के प्रथम सप्ताह में दो दिनों के लिए माउन्ट आबू में महिला सम्मेलन और समिति सम्मेलन कराना सम्भव हो सकेगा। मार्च के प्रथम सप्ताह में बलदेव भाई से चर्चा करने के बाद उन्होंने जयपुर की प्रमुख संचालिका से मिलकर सम्मेलन का प्रस्ताव रखा। उद्घाटन मुख्य प्रशासिका या सुविधापूर्वक किसी अन्य से कराया जा सकता था।
सूचित किया गया कि प्रदेश के विभिन्न स्थानों से लगभग तीन सौ स्त्री-पुरुष बसों से माउन्ट आबू पहुँचेंगे। पहले दिन उद्घाटन के बाद समितियों के सदस्यों के सम्मेलन में अधिकरण के वर्ष भर के कार्यक्रमों को अन्तिम रूप दिएा जाएगा। दूसरे दिन महिला सम्मेलन के उद्घाटन के बाद भोजन पूर्व एक और भोजन पश्चात् दो सत्रों में समाज के उत्थान, कुरीतियों के निवारण और यथार्थ का सामना करने की तैयारी पर चर्चा होगी। पहले दिन समिति सम्मेलन के दौरान महिलाएँ और दूसरे दिन महिला सम्मेलन के दौरान पुरुष माउन्ट आबू व निकटवर्ती स्थानों का उन बसों से भ्रमण करेंगे, जिनसे वे अपने स्थान से आएँगे। प्रधान संचालिका को इस आशय का एक पत्र भी चन्दनजी ने सौंपा।
वार्षिकोत्सव का चटकीला रंग, भाषा रत्न सम्मान की मोहक आभा, आध्यात्मिक संस्था की मुख्य प्रशासिका को दिए गए आदर की उज्ज्वलता ज्यों की त्यों बरकरार थी। प्रमुख संचालिका के हृदय में अधिकरण व चन्दनजी के प्रति अभिभूति जन्य आभार का भाव मन्द नहीं हुआ था। माउन्ट आबू से स्वीकृति के प्रति सम्भवतः वे पूर्णतः आश्वस्त थीं। इसलिए उन्होंने केवल इतना ही कहा, आयोजन कराएँगे, तो भाग लेने वालों को सुबह सत्संग में शिरकत करने के लिए जरूर कहिएगा।
चन्दनजी मुस्कराए, हम सत्संग में बैठने की बाध्यता रखें इसकी सचमुच आवश्यकता है क्या? कौन होगा जो अमृत की वर्षा के बावजूद मुँह को नहीं खोलेगा?
प्रमुख संचालिका सहमत थीं, मदिरा आदि का सेवन न हो, आप सुनिश्चित करेंगे।
आश्रम परिसर में जो सात्विक तरंगें प्रवाहित होती हैं, उनका आनन्द मैं स्वयं ले चुका हूँ। दैनिक जीवन की आपाधापी से बाहर निकलकर अन्दर से बडा होने की बात सोचें, वहाँ सम्मेलन कराने का एक उद्देश्य यह भी है। आप आश्वस्त रहें, न कोई उद्दंडता करेगा और न हम किसी को अवांछित कुछ करने देंगे।
अप्रैल में कार्यकारिणी और फिर सामान्य सभा के सदस्यों की बैठक से पूर्व माउन्ट आबू में दो दिवसीय आयोजन की स्वीकृति आ गई। साहित्य में रुचि रखने वाले माउन्ट आबू के एक होटल व्यवसायी को दोनों सम्मेलनों के संयोजन का दायित्व सौंपा गया। अधिकरण के नवनियुक्त सचिव हेमन्तजी माउन्ट आबू जाकर संयोजक के साथ आश्रम में आवास, भोजन, सभागार, फूल मालाओं आदि के साथ पूरे एक दिन में देखने योग्य स्थानों की सूची व विवरण लेकर आए। शेष सब उपलब्ध था, किन्तु माउन्ट आबू में फूल मालाएँ तलहटी में बसे शहर आबू रोड से मँगवाई जाती थीं। आवश्यकता-नुरूप फूल मालाएँ मँगवाने का संयोजक से आश्वासन लेकर हेमन्तजी लौटे।
माउन्ट आबू में महिला सम्मेलन के लिए प्रत्येक अधिकरण एवं समिति सदस्य को एक महिला को नामांकित करने का अनुरोध किया गया था। महिला की योग्यता के सम्बन्ध में अधिकरण की ओर से कोई निर्देश नहीं दिए गए थे। पत्नी, माँ, बहन, बेटी, भाभी, मित्र की पत्नी, समाज सेविका, अध्यापिका, डॉक्टर, नर्स, कार्यालय कर्मी, खेतीहर किसी भी महिला को अनुशंसित करने की स्वतन्त्रता थी। एक सदस्य ने मजाक में जब पूछा कि क्या प्रेमिका को भी नामांकित किया जा सकता है, तो उनका भी मजाक में दिएा गया उत्तर था, सार्वजनिक रूप से घोषित करने का साहस हो, तो जरूर कर सकते हैं।
आश्रम में पुरुषों और महिलाओं की आवास व्यवस्था अलग-अलग भवनों में की गई थी। चन्दनजी और उनकी पत्नी के लिए आश्रम के एक कोने पर बने विशिष्ट अतिथि कक्ष में साथ रहने की व्यवस्था थी। अधिकरण के सचिव व पत्नी के साथ चन्दनजी व्यवस्थाओं को देखने के लिए उन सभी भवनों में गए जहाँ आवास की व्यवस्था थी। भोजनालय, सभागार में बैठकों आदि के लिए निर्धारित स्थानों पर भी वे गए।
अधिकांश सहभागी अपने स्थान से बसों से रात्रि को चलकर सुबह माउन्ट आबू पहुँचने वाले थे। इसलिए आवास स्थलों पर कम लोगों से भेंट हुई। साफ-सुथरी और आरामदायक आवास सुविधा देखकर चन्दनजी विस्मित और प्रसन्न दोनों महसूस कर रहे थे। विस्मित इसलिए क्योंकि कर्मचारियों और कार्यकर्ताओं की, व्यवस्थाओं की पलक-नोक सँवार कर रखने की प्रवृत्ति विशेष रूप से उन आश्रमों व संस्थाओं में कम दिखाई देती है, जहाँ आगन्तुकों से शुल्क नहीं लिया जाता है। आवास और भोजन के नाम पर शुल्क लेने की परम्परा वैसे भी आश्रम में नहीं थी। अधिकरण के लगभग तीन सौ आमन्त्रितों को निःशुल्क सुविधा देकर जो अनुग्रह किया गया था, चन्दनजी कृतार्थ थे, किन्तु जिससे व्यापार अनुभव हो ऐसा कोई भी आर्थिक लेन-देन अन्यथा भी आश्रम में नही ंहोता था।
कमरों में गीजर, हीटर, संयुक्त शौचालय, पंलग आदि की सारी मगर स्वच्छ सुविधा तो थी ही, मगर आगन्तुक यदि स्वास्थ्य के कारणों से सीढियाँ चढने की स्थिति में नहीं है, तो निचले तल पर आवास उपलब्ध कराना भी सुनिश्चित किया जाता था। प्रत्यक्ष रूप से हुए पूर्व अनुभवों के कारण ही तो चन्दनजी ने प्रयत्नपूर्वक माउन्ट आबू आश्रम का चयन किया था। सुखद व्यवस्थाओं के सन्दर्भ में उनके मानस में बनी छवि में परिवर्तन नहीं आया था। अधिकरण की सीमाओं के बावजूद सुव्यवस्थाएँ हो सकी हैं, इस तथ्य को लेकर प्रसन्न होना तो स्वाभाविक था ही।
सन्तुष्टि साथ लेकर सचिव और पत्नी के साथ चन्दनजी मुख्य प्रशासिका के आवास स्थल की ओर गए। सौजन्य और शिष्टाचार के नाते पहुँचने के बाद उनके दर्शन करना चन्दनजी को उचित लगा। प्रवेश करते ही वे आश्रम की व्यवस्थाओं को देखने इसलिए गए थे कि आवश्यक होने पर मुख्य प्रशासिका के ध्यान में ला सकें। अन्यथा आगे बढने से पहले मुख्य प्रशासिका के पास जाकर आशीर्वाद अवश्य लेते।
संयोग से वे उपस्थित थीं। चन्दनजी से व्यक्तिगत रूप से परिचित थीं। अधिकरण की ओर से आश्रम परिसर में दो दिन का कार्यक्रम है, यह जानकारी उन्हें थी। सचिव बहन से सूचना मिलते ही वे आवास स्थल की बैठक में आ गईं। बाबा ब्रह्मा की सुन्दर मुस्कराती आदमकद तस्वीर से सुसज्जित बैठक में आते ही तीनों ने खडे होकर उन्हें प्रणाम किया। आश्रम की व्यवस्थाओं, रखरखाव और सुविधाओं की चन्दनजी ने सराहना की, तो मुख्य प्रशासिका को अच्छा लगा। औपचारिक बातचीत हुई। चाय पी।
अधिकरण की समस्त कार्यकारिणी व सदस्यों को कृतार्थ करने का अनुरोध किया तो सम्मलन के दूसरे दिन प्रातः नौ बजे का समय निर्धारित हुआ। सचिव बहन ने उनके सामने ही समय डायरी में दर्ज कर लिया। मुख्य प्रशासिका को बैठक में आते ही प्रणाम करने के साथ चन्दनजी ने मिठाई का दो किलो का उदयपुर से लाया हुआ जो डिब्बा भेंट किया था, उन्होंने स्वयं उसे खोलकर तीनों को प्रसाद दिएा।
सचिव अपने कमरे में और पत्नी के साथ चन्दनजी विशिष्ट अतिथि कक्ष में गए। आश्रम की ओर से देखरेख व आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपस्थित सेवादार ने चाय के लिए पूछा। स्नान करके ताजा होकर भोजन करने जाना था, चाय मुख्य प्रशासिका ने पिलाई थी इसलिए मना किया किन्तु प्रश्नों का एक पिटारा चन्दनजी को असहज बना रहा था।
जब आश्रम में पुरुषों और महिलाओं की आवास व्यवस्था अलग-अलग परिसरों में है, तो उन्हें पत्नी के साथ कक्ष देकर गैर-बराबरी का व्यवहार क्यों किया गया? भवनों में आवास के लिए निर्धारित कमरों में सब सुविधाएँ थीं, फिर विशिष्ट अतिथि कक्ष की क्या आवश्यकता थी? अन्य भवनों में स्वागत कक्ष बने हुए थे। शिकायत करने पर समाधान करने की व्यवस्था स्वागत कक्ष करता था। विशिष्ट अतिथि कक्ष के लिए अलग सेवादार लगाने क पीछे क्या महत्त्वपूर्ण अतिथियों को प्रसन्न रखकर आश्रम के काम कराने की मंशा नहीं थी? विशिष्ट व्यक्तियों के लिए विशिष्टता की अनुभूति कराने वाला विशिष्ट अतिथि कक्ष क्या विशिष्ट लोगों के माध्यम से अकरणीय को करणीय और अवैध को वैध बनाने की प्रवृत्ति का द्योतक नहीं था? सामान्य स्थाई शिष्य और विशिष्ट अस्थाई आगन्तुक में से दूसरे को वरीयता क्यों दी जाती थी?
प्रश्न उठाने का उपयुक्त अवसर नहीं था। अधिकरण के अध्यक्ष के नाते न सही, लेखक के नाते सही, चन्दनजी कोशिश करेंगे कि समाधान मिले। गृहस्थ अपने और परिवार के हित में सच-झूठ बोलता है, गलत-सही करता हैं, छल-छद्म के प्रपंच फैलाता है, तेर-फेर, हेरा-फेरी, ऊँच-नीच करता है। आश्रम व्यक्ति सापेक्ष लाभ के लिए नहीं, संस्था के फायदे के लिए वही सब करता है। माना कि उद्देश्य का अपना महत्त्व है, किन्तु साध्य और साधन में से किसी एक की अपवित्रता को किसी भी स्थिति में कैसे स्वीकार किया जा सकता है? निजी लाभ के लिए न सही, संस्था के लिए की गई बेईमानी को कैसे न्यायसंगत माना जा सकता है? निजी जीवन में भ्रष्ट आचरण करने वाले संस्थागत जीवन में किए जा रहे भ्रष्टाचार को शिष्टाचार का शुभ्र वेश कैसे पहना सकते हैं?
चन्दनजी जहाँ नौकरी करते हैं, घूस नहीं लेते हैं। यथासम्भव गलत काम नहीं करते हैं। अधिकरण के अध्यक्ष के नाते यदि वे अन्याय संगत कृत्य करते हैं, तो केवल इसलिए क्योंकि इससे उन्हें व्यक्तिगत स्तर पर लाभ नहीं होता तो क्या उसे क्षम्य मान लिया जाएगा? पर्दा बुरी नजर से बचने के लिए किया गया हो चाहे लज्जावश, कहलाएगा तो पर्दा ही। रिश्वत खिलाकर या चापलूसी करके प्रसन्न रखने की चेष्टा पदोन्नति प्राप्त करने के लिए की जाए चाहे मंदिर के लिए सस्ती दर पर जमीन हासिल करने के लिए, अनैतिक कहलाएगी। प्रश्नों के कांटों की चुभन शान्त करने की कोशिश जरूर करेंगे चन्दनजी। आज नहीं पूछ सकते तो कल पूछेंगे, मगर पूछेंगे जरूर।
अब तक एक अपराध बोध जैसा कुछ था जो कभी-कभी चन्दनजी के मन में जागता था। माउन्ट आबू में निःशुल्क आवास और भोजन की व्यवस्था के साथ लगभग तीन सौ प्रतिभागियों का दो दिवसीय सम्मेलन कराने के लिए साल-सवा साल पहले बनाई रणनीति पर चरणबद्ध रूप से काम किया गया। जो चाहते थे, हासिल किया। माउन्ट आबू में ही क्यों? सम्मेलन तो प्रदेश में किसी दूसरे स्थान पर भी कराया जा सकता था। प्रायोजक मिल जाते हैं। एक प्रायोजक से सम्पूर्ण व्यय की पूर्ति न होती हो तो दो, तीन, चार प्रायोजकों की संयुक्त व्यवस्था हो जाती है।
माउन्ट आबू में स्थानीय प्रायोजक नहीं मिल पाता इसलिए रणनीति बनाकर लक्ष्य तक पहुँचने की दुरभिसन्धि बनी। व्यक्तिगत लाभ नहीं हुआ माउन्ट आबू में सम्मेलन कराने से चन्दनजी को, यह कहना भी उचित नहीं है। माउन्ट आबू प्रदेश में एकमात्र पर्वतीय क्षेत्र है। गर्मियों की छुट्टियों में दो दिनों तक माउन्ट आबू में रहने और पर्यटन स्थल देखने का पूर्णतः निःशुल्क अवसर देकर आमन्त्रित किए गए लगभग तीन सौ सहभागियों की वाह-वाही लूटने का अघोषित लाभ चन्दनजी के व्यक्तिगत खाते में जमा होगा। इस तथ्य से वे भली-भाँति परिचित हैं। जो आज तक किसी अध्यक्ष ने नहीं किया, चन्दनजी ने कर दिखाया। बजट की तंगी के बावजूद कर दिखाया। किसकी छवि चमकेगी? किसको यश मिलेगा?
ऊपर-ऊपर से देखने पर लगता है, गर्मियों में दो दिन माउन्ट आबू में मात्र रहने का नहीं, पर्यटन स्थलों का पूरा दिन भ्रमण करने का सुअवसर तो सम्मेलन में भाग लेने वाले स्त्री-पुरुषों को मिला है। चन्दनजी को क्या लाभ हुआ? हुआ, चन्दनजी को लाभ हुआ। यश मिला। ख्याति मिली। छवि निखरी। जो कभी नहीं हुआ, कर दिखाने का गौरव मिला। राज्य सरकार नहीं देती है तो न दे। चन्दनजी की संकल्प शक्ति के कारण बजट, अधिकरण की उडान को रोक नहीं पाएगा। जिुबान खोलकर स्वयं चाहे कुछ न कहें, लोग तो कहते हैं। चन्दनजी की नैतिकता जो प्रश्न आश्रम के सामने खडी करती है, उनका उत्तर वे स्वयं देने की स्थिति में हैं क्या? कर्तव्य के सर्वश्रेष्ठ सम्भव निर्वहन के नाम पर अपने अध्यक्षीय दायित्व की जो पूर्ति चन्दनजी कर रहे हैं, आश्रम के कर्ता धर्ता भी तो वही कर रहे हैं।
होगी सुप्त भावना यश प्राप्ति की मगर प्रत्यक्ष रूप से तो दायित्व पूरा करने के नाम पर यथासम्भव वही सब कुछ करते हैं, चन्दनजी जो आश्रम के मार्गदर्शक कर रहे हैं। खुशबू यदि वितरित करेंगे, तो क्या वितरक अछूता रह सकता है? चन्दनजी के कार्यों का सुयश मुख्य धारा के समानान्तर चलने वाली अन्तर्धारा की तरह चाहे-अनचाहे उन्हें मिलेगा। आश्रम की अध्यात्म आधारित विचारधारा के विस्तार का श्रेय शिखर नियन्ता को मिलेगा। कैसे रोक सकता है कोई इसे? सचेत भाव से किए गए योजनाबद्ध प्रयत्नों को निजी हित लाभ से जोडकर यश और प्रसिद्धि रूपी अन्तर्धारा को मुख्य धारा मानने की गलती वे कैसे करते हैं?
कुछ देर पहले लिया गया अवसर की प्रतीक्षा का निर्णय उन्हें निरर्थक महसूस होने लगा। जगत से निरपेक्ष आध्यात्मिक संस्था यदि मनुष्यों के बीच रहगी, तो विचार के प्रसार के लिए सचेत होना ही पडेगा उसे। अन्यथा विश्व भर के देशों और नगरों में जाने के स्थान पर हिमालय की कन्दराओं का चुनाव किया गया होता। जिस तरह चन्दनजी अधिकरण के हित में प्रयत्नशील रहते हैं उसी तरह आश्रम अपनी गतिविधियों के दायरे में लाने के लिए महत्त्वपूर्ण संस्थाओं को जोडते हैं। अर्थ पक्ष अधिकरण या चन्दनजी के लिए महत्त्वपूर्ण होगा, अन्तर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक संस्था के लिए अधिकरण या चन्दनजी को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाना महत्त्वपूर्ण है।
प्रश्नों के द्वन्द्वपूर्ण संजाल से मुक्त होने के बाद चन्दनजी को निद्रा के आगोश में जाने में विलम्ब नहीं हुआ। सुबह उठकर वे जल्दी तैयार हुए। पत्नी को महिलाओं के साथ पर्यटन स्थलों पर जाने के लिए तैयार होकर नाश्ते के लिए जाना था। चन्दनजी को मुख्य परिसर में छोडकर ड्राइवर वापस आ गया। चाय आदि के लिए सेवादार मुस्तैदी से खडा था।
समितियों के सदस्यों और महिलाओं से मुलाकात हुई। सभागार में व्यवस्थाओं का जायजा लिया। डाइनिंग हाल में जाकर नाश्ता किया। वहाँ भी सामान्य आगन्तुकों और विशिष्ट व्यक्तियों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएँ थीं। चन्दनजी विशिष्ट भोजन कक्ष में नहीं गए। सबके साथ अल्पाहार करते, चाय पीते बतियाते रहे।
अल्पाहार के तुरन्त बाद महिला सम्मेलन के लिए माउन्ट आबू आईं महिलाएँ बस से घूमने निकल गईं। श्रीमती चन्दन भी उनके साथ रवाना हो गईं। अधिकांश महिलाएँ उनकी या तो पूर्व परिचित थीं या अध्यक्ष की पत्नी होने के नाते आगे बढकर उनसे मिलीं। समिति सदस्यों ने महिला सम्मेलन के चयन के लिए मिली छूट का भरपूर फायदा उठाया था। माउन्ट आबू पहुँचीं लगभग सभी महिलाएँ पत्नी या बहन के नाते आयोजनों में आती रही थी और श्रीमती चन्दन से मिल चुकी थीं।
समितियों के सदस्य सभागार में एकत्र हुए। मुख्य प्रशासिका ने स्वयं उद्घाटन नहीं किया। आश्रम की अन्य प्रमुख पदाधिकारी को उन्होंने भेजा। चन्दनजी के लिए यह बात इसलिए गौण थी क्योंकि एक तो मुख्य प्रशासिका भाषा रत्न सम्मान ग्रहण करने जयपुर आ चुकी थीं और दूसरा माउन्ट आबू में प्रचार की दृष्टि से यह बात अर्थ नहीं रखती थी। सदैव की भाँति उद्घाटन के उपरान्त समितियों के सदस्यों की अपने-अपने संयोजकों के साथ बैठक हुई। सभागार में ही समूह में बैठकर सबने बैठकें कीं। वर्षभर के कार्यक्रम, कार्यकारिणी व सामान्य सभा के सदस्य पहले ही अनुमोदित कर चुके थे। कहाँ कार्यक्रम होगा, कब कार्यक्रम होगा, कार्यक्रम का संयोजन दायित्व कौन वहन करेगा, कार्यक्रम के नियम क्या होंगे, इस विषयक प्रस्ताव समिति संयोजकों को उपलब्ध करा दिए गए थे। परिवर्तन, परिवर्द्धन, संशोधन करके समितियों ने कार्यक्रमों को अन्तिम रूप दिएा। निर्धारित कार्यक्रमों से हटकर समिति किसी कार्यक्रम को जोडने या न करने का प्रस्ताव विचारार्थ रखने के लिए अधिकृत थी।
दोपहर का भोजन भी चन्दनजी ने विशिष्ट व्यक्तियों के लिए निर्धारित स्थान पर नहीं किया। अधिकरण के सदस्यों और समिति सदस्यों को खुद से अलग या कमतर होने की अनुभूति वे नहीं देना चाहते थे। यद्यपि थालियों में काउन्टरों से डलवाकर किसी भी मेज पर बैठकर भोजन करने की व्यवस्था थी, किन्तु जिस मेज पर जिन लोगों के साथ चन्दनजी बैठे उनसे अनौपचारिक बातचीत हो पाई। यदि किसी को कुछ कहना है, शिकायत, सुझाव या प्रशंसा के दो शब्द बोलने हैं, तो सुविधा थी। अलग डाइनिंग हाल में काउन्टर से थाली में भोजन लेने की जगह मेज पर परोसगारी की व्यवस्था थी, मगर भोज्य सामग्री में कोई अन्तर नहीं था। यदि अन्तर होता तब भी सबके साथ होने का प्रतीकात्मक सुयोग खोना नहीं चाहते चन्दनजी।
भोजन के बाद आयोजित सत्र की अध्यक्षता चन्दनजी ने की। लेखक सम्मेलन के बाद होने वाले खुले सत्र के अलावा यही एक मात्र सत्र था जिसकी अध्यक्षता उन्हें और संचालन सचिव को करना होता था। प्रत्येक समिति के संयोजक ने अपनी बैठक का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। सभी समितियों के सदस्यों में से जिसने उचित समझा प्रतिवेदन पर विचार रखे। अन्तिम स्वरूप का निर्णय संयुक्त रूप से हुआ।
सचिव संचालन के साथ-साथ टिप्पणियों पर किए गए निर्णय नोट कर रहे थे ताकि प्रत्येक समिति के संयोजक से प्राप्त प्रतिवेदन में सत्र में हुए निर्णयानुसार संशोधन किया जा सके। समस्त समितियों की ओर से निर्णीत कार्यक्रमों, स्थान, नियमों व संयोजक का विवरण प्रत्येक समिति सदस्य के पास भेजा जाना था। इसलिए आवश्यक था कि चर्चा के बाद हुए निर्णयों का समावेश करते हुए रपट तैयार करने की सम्पूर्ण प्रक्रिया में सचिव सम्मिलित हों। कुछ बिन्दुओं पर तीखी बहस हुई, ऊँची आवाज में बोलने वाली बात हुई, किन्तु अध्यक्षता करते हुए चन्दनजी ने वातावरण को विस्फोटक बनने नहीं दिए।
समितियों की बैठक समाप्त होने के बाद चाय पान और रात्रि के भोजन के बीच का समय खाली रखा गया था। कुछ सदस्य घूमने चले गए और कुछ ने आराम करने के लिए कमरों की ओर प्रस्थान किया। अल्पाहार के बाद सचिव ने समिति सदस्यों और महिलाओं को प्रपत्र दे दिए थे। भरकर लौटाए गए प्रपत्रों के आधार पर चैक जारी किए जाने थे। लगभग तीन सौ चेक जारी करने के लिए पर्याप्त समय की आवश्यकता थी। इसलिए सुबह मिले प्रपत्र भरकर शाम तक लौटने वाले सहभागियों के चैक तैयार करने का काम पहले ही दिन आरम्भ करने की बात सोची गई थी।
कुछ सदस्यों ने प्रपत्र भरकर दोपहर को ही दे दिए थे। याद दिलाने के बाद सीमित संख्या में सदस्यों को छोडकर प्रपत्र आ गए थे। महिलाएँ अभी वापस नहीं आईं थीं। इसलिए सामान्यतः उनके प्रपत्र अन्तिम दिन दोपहर तक आने की उम्मीद थी। भोजन के बाद भोजन कक्ष में या कमरों में जाकर याद दिलाकर तकाजा करने का सचिव का इरादा देखते हुए महिला सम्मेलन का उद्घाटन होने से पहले अधिकांश महिलाओं के प्रपत्र आ सकते थे। ऐसी स्थिति में दोपहर के भोजन से पूर्व चैक बन जाने की सम्भावना थी।
प्रातः अल्पाहार के बाद कोटा के अधिकरण सदस्य सचिव के पास आए। एक महिला के नाम का प्रपत्र देते हुए उन्होंने सचिव से कहा कि बैंक में खाता न होने के कारण महिला को बीयरर चैक दिएा जाए। नियम विरुद्ध होने के कारण अक्षमता व्यक्त करने पर सदस्य उग्र हो गए। सचिव विनम्र बने रहे, सदस्य आक्रामक होते गए। बाद में पता लगा कि महिला के छद्म नाम से वे सदस्य एक कम उम्र की बालिका को साथ लेकर आए थे और चाहते थ कि अधिकरण भुगतान दे। सचिव हेमन्तजी ने आकर चन्दनजी को सारी बात बताई, तो चन्दनजी ने सदस्य को मिलने के लिए हेमन्तजी के माध्यम से संदेश भेजा।
शाम को महिला सम्मेलन समाप्त होने के बाद कोटा के अधिकरण सदस्य चन्दनजी से मिलने आए। उस समय वे महिलाओं से बातचीत कर रहे थे। सदस्य को उन्होंने अपने साथ खडा कर लिया और महिलाओं से उनका परिचय कराया। प्रशंसा की। कोटा में कार्यक्रमों के एकजुट संचालन और समिति सदस्यों के साथ टीम बनाकर काम करने, नेतृत्व प्रदान का श्रेय दिएा। वर्तमान संरचना का स्तम्भ करार दिएा। उन्हें पाकर गौरवान्वित अनुभव करते हैं, महिलाओं को बताया। सदस्य को चन्दनजी की तारीफ स्वाभाविक रूप से अच्छी लगी। एकान्त मिलते ही वे दोनों कुछ दूर रखे सोफे पर आकर बैठे, तो चन्दनजी ने पूछा, हेमन्त जी बता रहे थे, भुगतान को लेकर आप असन्तुष्ट हैं?
सदस्य ने खाता न होने के कारण बीयरर चैक से भुगतान को विवाद का बिन्दु बताया, तो उन्होंने बिना लाग-लपेट के सपाट लहजे में कहा, मुझे जानकारी मिली है कि जिस महिला के सन्दर्भ में आप बीयरर चैक की बात कहते हैं, वास्तव में वह बालिका है, महिला नहीं। कल किसी ने सूचना के अधिकार के अन्तर्गत प्रश्न खडा कर दिएा कि अमुक नाम की महिला की आयु कितनी थी तो हमारे पास कोई उत्तर नहीं होगा। अधिकरण न अकाउन्ट पेई चैक देगा और न बीयरर चैक देगा। हम-आप छोटी-सी रकम के कारण कठघरे में खडे किय जाए, निश्चय ही आप नहीं चाहेंगे। इस नाम का प्रपत्र ही स्वीकार नहीं किया जा सकता। मैं अपनी जेब से नकद भुगतान दे सकता हूँ, मगर इस तरह आपका अपमान करना मुझे अच्छा नहीं लगेगा। बेहतर होगा, हम इस प्रकरण को बन्द कर दें।
सदस्य को कुछ कहने का अवसर दिए बिना चन्दनजी उठ खडे हुए। कुछ भौचक्के, कुछ विस्मित, कुछ निरुत्तर, कुछ पराजित सदस्य को साथ लेकर वे प्रशासनिक भवन की ओर बढ गए, आश्रम के प्रचार प्रमुख के साथ मिलने का समय तय है। आप भी साथ चलिए।
प्रचार प्रमुख से भेंट के आरम्भ में चन्दनजी ने सदस्य की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए परिचय कराया। चाय पान के साथ चली लगभग आधे घण्टे की अनौपचारिक चर्चा के दौरान चन्दनजी ने सदस्य की बातचीत में सहभागिता सुनिश्चित करते हुए उन्हें यथेष्ट सम्मान दिए। आश्रम के अधिकरण को मिले सौजन्य के लिए प्रचार प्रमुख का आभार जताते हुए सदस्य के सहयोग के कारण कार्यक्रमों की कोटा क्षेत्र में विशिष्ट पहचान का उल्लेख किया। लौटने के बाद सदस्य से जुदा होने तक न हाव से, न भाव से और न वाणी से चन्दनजी ने भुगतान प्रकरण की चर्चा की। सदस्य को संभवतः चन्दनजी का रुख स्पष्ट रूप से समझ में आ गया था। उन्होंने भी इस मुद्दे पर मौन बनाए रखा। सचिव को चन्दनजी ने भोजन से पूर्व मात्र इतना कहा, विवाद ग्रस्त भुगतान प्रपत्र सदस्य को लौटा दीजिएगा। इस पर कोई कार्यवाही नहीं करनी है।
सदस्य ने सचिव को भुगतान प्रपत्र वापस दिए, तो कुछ कहे बिना लेकर, मोडकर उन्होंने जेब में डाल दिएा। भ्रष्टाचार के साथ समझौता न करके चन्दनजी ने मौजूदा दौर की मुखालफत की धारा के विरुद्ध नाव चलाने की कोशिश की थी। विरोध की चिन्गारी को भडकने दिएा या शुद्धतावादी होने का प्रमाण दिएा, कौन कर सकता है इसका निर्णय? चन्द रुपयों के कारण दिखाई गई सख्ती, दौर की बेवकूफी कहलाएगी या उचित के साथ खडे होने की दृढता, कौन निकाल सकता है निष्कर्ष? चन्दनजी ने विवेक की दस्तक को सुना, मजबूती के साथ उसको स्वीकार किया और डगमगाये बिना उसके पक्ष में खडे रहे, इससे बडा आन्तरिक सुख शायद ही हो सकता था उनके लिए।
महिला सम्मेलन से पूर्व नाश्ता करने के उपरान्त अधिकरण के पदाधिकारी, कार्यकारिणी और सामान्य सभा के सदस्य मुख्य प्रशासिका के कार्यालय में उपस्थित हुए। श्रीमती चन्दन समूह में शामिल थीं। ठीक नौ बजे मुख्य प्रशासिका आगन्तुक कक्ष में आईं। चन्दनजी ने सभी का मुख्य प्रशासिका से परिचय कराया। परिचय के साथ प्रत्येक सदस्य ने उनके चरण स्पर्श किए।
भाषारत्न सम्मान की कुछ स्मृतियों को साझा करते हुए मुख्य प्रशासिका ने अधिकरण के सदस्यों में एकजुटता और आत्मीयता की प्रशंसा की। चर्चा के दौरान कितने सदस्य माउन्ट आबू पहली बार आए हैं, जैसे प्रश्न पूछने के बाद वार्तालाप करत हुए आध्यात्मिक विकास और सात्विकता के अन्तर्सम्बन्धों पर उन्होंने प्रकाश डाला। उठते समय प्रत्येक सदस्य को अपने पास बुलाकर मुख्य प्रशासिका ने प्रसाद का एक-एक पैकेट आर्शीवाद स्वरूप अपने हाथों से दिएा। प्रसाद ग्रहण करते समय प्रत्येक सदस्य ने पुनः चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लिया।
लौटते समय प्रसन्नता और प्रफुल्लता सदस्यों के अंग-अंग से नुमायां थी। मुख्य प्रशासिका की स्नहेमय मुस्कान, आत्मीय स्पर्श के साथ प्रदत्त आशीर्वाद, अपने हाथों से दिएा गया प्रसाद और कम समय में भी व्यक्तिगत एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विशिष्ट दिशा दर्शन से सब सदस्य अभिभूत थे।
जिनकी रुचि थी, ऐसे सदस्य पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार माउन्ट आबू के पर्यटन स्थलों को देखने के लिए बसों से रवाना हो गए। लगभग सभी कार्यकारिणी, सामान्य सभा व समिति सदस्य भ्रमण के लिए तो गए, किन्तु एक अफसोस सबके मन में था। साथ आईं महिलाएँ सामान्यतः उनके परिवार से थीं। वे अकेले पिछले दिन और ये अकेले अब, घूमने जा पा रहे थे। मात्र यही विकल्प था, सब जानते थे। इसलिए अफसोस त्रास का रूप नहीं ले पाया। या तो व्यक्त नहीं किया और अगर किया भी तो दुखी होकर नहीं हँसते हुए किया। निःशुल्क माउन्ट आबू यात्रा बिना किसी समझौते के हो भी कैसे सकती थी भला?
महिला सम्मेलन के उद्घाटन के लिए आश्रम की एक वरिष्ठ बहन आईं। प्रथम सत्र के पश्चात् जब सब लोग भोजन कर रहे थे, चन्दनजी को जानकारी मिली कि उस दिन अधिकरण के जयपुर के एक सदस्य के विवाह की वर्षगाँठ थी। कुछ सुयोग थे जो आकार ले रह थे। सुयोग से उनकी पत्नी महिला सम्मेलन के निमित्त साथ आई हुई थीं। दोनों के संज्ञान में शुभ दिवस रहा होगा, निश्चय ही इसलिए पति-पत्नी उपस्थित थे। सुयोग से अधिकरण सदस्य माउन्ट आबू भ्रमण के लिए नहीं गए थे। सम्भव है, इस सुयोग की निर्मिति भी दोनों ने मिलकर की हो। वैवाहिक जीवन के माधुर्य की प्रतीति यही तो होती है।
चन्दनजी को सूचना अन्य लोगों ने दी थी। पति या पत्नी ने बताया होता तो सुबह मुख्य प्रशासिका से इस अवसर पर आशीर्वाद दिलाने से वे कतई नहीं चूकते। हेमन्तजी को सूचना देकर चन्दनजी ने दो फूल मालाओं की व्यवस्था कराने के लिए कहा। उद्घाटन समारोह के लिए आई मालाओं में से केवल एक माला बची हुई थी। उपयोग में लाई जा चुकी फूल मालाओं को पुनः पहनाना चन्दनजी को सख्त नापसन्द था। आवश्यकतानुसार गिनती की मालाएँ आबू रोड से माउन्ट आबू प्रतिदिन सुबह आती थीं। दोपहर के समय माउन्ट आबू में फूल माला की व्यवस्था करने में साहित्य में रुचि रखने वाले स्थानीय संयोजक ने असमर्थता व्यक्त कर दी।
चन्दनजी ने विवाहित युगल की वर्षगाँठ के अभिनन्दन को भिन्न स्वरूप देने का निर्णय लिया। भोजनोपरान्त दूसरे सत्र के लिए महिलाएँ साभागार में एकत्र हुईं। संख्या में कम मगर कुछ पुरुष भी सभागार में थे। सत्रारम्भ होता, अध्यक्षता व पत्रवाचन के लिऐ मंच सुसज्जित किया जाता। इससे पहले चन्दनजी मंच पर पहुँचे।
हाथ में माइक लेकर उन्होंने बोलना शुरू किया, क्या आप जानते हैं कि महिला सम्मेलन में भाग लेने वाली एक महिला ने आज के दिन एक पुरुष को जीवन की डोर इस अंदाज में सौंपी थी कि वह स्वेच्छा से उसमें लिपटने के नये-नये उपाय ढूँढता गया। माँग में सिन्दूर भरने से हुई शुरूआत ने उनके जीवन को सम्पूर्ण सिन्दूरी बना दिएा। यहाँ तक कि माउन्ट बाबू के पर्यटन स्थलों का आकर्षण उस डोर से बहुत पीछे रह गया है जिसमें बँधकर भी वे स्वतन्त्र हैं। कृपया अपने स्थान पर खडे होकर उन्हें शादी की वर्षगाँठ की बधाई दें।
इसके साथ ही नीचे उतरकर पति को बाएँ और पत्नी को दाहिने हाथ से पकडकर चन्दनजी मंच पर ले आए। हेमन्तजी से माला लेकर उन्होंने दोनों के गले में एक ही माला डाली, कामना है कि आप दोनों सदैव एक ही माला में एक दूसरे से बँधे रहें, एक ही माला के फूल आप दोनों को एक साथ एक जैसी मन भावन खुशबू से सराबोर करते रहें। तालियों की गडगडाहट, बधाई के समवेत स्वरों और शुभेच्छाओं की बौछारों के बीच प्रफुल्लित पति-पत्नी मंच से नीचे उतर गए।
दूसरे और तीसरे सत्र में पत्रवाचन हुए, चर्चा हुई, प्रश्नोत्तर हुए। शाम को एक साथ चाय पीते हुए प्रत्येक चेहरे पर आनन्द की आहट को दूर-दूर तक सुना जा सकता था। रात के भोजन से पूर्व बसों में भ्रमणार्थ गए समितियों के सदस्य लौट आए थे। एक घण्टा पहले या एक घण्टा बाद सब सहभागियों के अपने मूल स्थानों पर लौटने के कार्यऋम थे। चन्दनजी और उनकी पत्नी का उसी रात कार से चलकर जयपुर लौटने का कार्यक्रम था। चैक देकर, रहा-सहा समेटकर हेमन्तजी का सबके जाने के बाद जयपुर लौटने का कार्यक्रम था।
जयपुर पहुँचे, तो मन का मुदित जायका चन्दनजी को आह्लादित कर रहा था। माउन्ट आबू में दो दिवसीय कार्यक्रम करा पाए, सफलतापूर्वक करा पाए, अधिकरण के लिए विशिष्ट आत्मीय भाव का सृजन करा पाए, अधिकरण के साथ अपनी छवि बेहतर बना पाए और अनैतिकता का सहारा लिए बिना करा पाए, क्या चाहते हैं चन्दनजी इससे अधिक? तभी दूसरे दिन बासमती चावल से बनी सुस्वादु खीर और मनभावन मिठाई में एकाएक आए कंकड की तरह वे अचकचा गए।
एक मध्यम प्रसार संख्या वाले दैनिक समाचार पत्र ने भाषा अधिकरण की ओर से माउन्ट आबू में सम्पन्न महिला सम्मेलन को केन्द्र में रखकर कुछ आरोप लगाए थे। लिखा गया, माउन्ट आबू में सम्मेलन बाकायदा रणनीति बनाकर किया गया। अन्तर्राष्ट्रीय संस्था की मुख्य प्रशासिका को भाषारत्न सम्मान देकर संस्था क परिसर सहित अन्य सुविधाओं का निःशुल्क उपयोग करने की सोची समझी सुविचारित साजिश उसी रणनीति की कडी थी। भाषा अधिकरण के कार्यक्रमों को परिणति तक पहुँचाने के लिए समितियाँ बनाई गईं। समितियों के सदस्यों को इच्छानुसार एक महिला को माउन्ट आबू ले जाने की अनुमति देकर उन्हें अनुग्रहित किया गया। अनुग्रह वर्षा का परिणाम यह निकला कि महिला सम्मेलन में भागीदारी करने वाली महिलाएँ समितियों के सदस्यों की पत्नियाँ, माताएँ या बहनें थीं। मिली छूट का लाभ उठाकर कुछ सदस्य अपनी प्रेमिकाओं को साथ ले गए और गर्मियों में बिना कुछ खर्च किए प्रेमिका के साथ माउन्ट आबू घूम आए।
प्रेमिका को साथ ले जाने वाली बात की सच्चाई किसी को समझ में आए, यह संभव नहीं था। माउन्ट आबू आश्रम में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग आवास व्यवस्था थी। जिन बसों में घूमने गए उनका उपयोग एक दिन महिलाओं ने और दूसरे दिन पुरुषों ने किया। महिलाएँ-पुरुष न साथ रहे और न साथ घूमे। आरोप स्पष्ट रूप से निराधार था। मगर समाचार पत्र का प्रत्येक पाठक इस अन्तर्कथा से परिचित नहीं था। सम्भव था, आरोप लगाने वाले पत्रकार को भी तथ्य की जानकारी न रही हो। किन्तु चन्दनजी जानते थे कि शेष दो आरोप तो ठीक थे ही।
चन्दनजी को आश्रम के विशिष्ट अतिथि कक्ष की व्यवस्थाओं को देखकर पहली रात को जिन प्रश्नों के हजूम से जूझना पडा था, याद आ गया। अधिकरण के अध्यक्ष के नाते चन्दनजी ने जो काम किया वह मात्र कर्तव्य निर्वाह था। रणनीति बनाकर करणीय के लिए मार्ग प्रशस्त करने में क्या बुराई है? आनन्दपूर्वक की गई कार्यसिद्धि को अनुग्रह या तुष्टिकरण की संज्ञा कैसे दी जा सकती है? महिला सम्मेलन में भाग लेने वाली महिलाओं की अर्हता कुछ भी क्यों न निर्धारित की जाए, प्रश्नों के दायरे में आ सकती है। घर या परिवार की महिलाएँ सहयोग न दें, तो शायद फालिज हो जाए पुरुषों को। समाज के लिए कुछ कर ही न पाए। ऐसी महिलाओं का सम्मेलन सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक गतिविधियों के प्रोत्साहन की दृष्टि से कम महत्त्वपूर्ण कैसे हो सकता है? अनुग्रह और पक्षपात कैसे माना जा सकता है इसे? सहयोग की स्वीकृति के सार्वजनिक पर्व को गलत कैसे कहा जा सकता है? समाचार में चन्दनजी को विवाद में उलझने जैसा कुछ भी महसूस नहीं हुआ।
सफलता या उपलब्धि मिलने के बाद जब भी विनम्रता व आभार के स्थान पर अहंकार का बीज अंकुरित हुआ है कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है, जिससे चन्दनजी जमीन पर उतर आते हैं। माउन्ट आबू में दो दिवसीय आयोजन मेरे कारण सम्भव हो सका है, यह भाव पिछले कुछ दिनों से चन्दनजी के मानस की ऊपरी सतह पर आ गया था। सच है कि व्यक्ति के प्रयत्न परिणाम के आधार होते हैं। किन्तु अनेक लोगों का सहयोग, परिश्रम, सदेच्छा, आशीर्वाद कम महत्त्वपूर्ण या गौण नहीं होता। प्रयत्न निष्फल या फलीभूत अकारण नहीं होता। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान देने वालों का सफलता और उपलब्धि प्राप्ति में निश्चित महत्त्व है।
जब जब चन्दनजी इस तथ्य को भूलकर अंहकार ग्रस्त होने लगते हैं, कुछ न कुछ ऐसा घट जाता है जिससे उन्हें अंहकार मुक्त होने में मदद मिलती है। चन्दनजी को महसूस हुआ, अधिक प्रसार संख्या वाले नहीं, मध्यम श्रेणी के समाचार पत्र में प्रकाशित आलेख सजा नहीं चेतावनी बनकर सामने आया है। परेशान, दुखी और व्यथित होकर उत्तेजित होने का सधा अर्थ उस अंहकार का पोषण करने जैसा होगा जिसे ध्वस्त करने के लिए यह सुअवसर मिला है। प्रतिक्रिया व्यक्त न करके प्रकारान्तर से वे प्रकृति का आभार व्यक्त करेंगे। यही आलेख अगर बडे अखबार में छपता, विपुल संख्या में पाठक पढते। चन्दनजी की बदनामी होती। बदनामी से बेचैन होकर वे प्रतिक्रिया देते। आरोपों को विस्तार मिलता। मन में उपजा अहंकार मजबूत होता। आभार, केवल आभार, एकमात्र प्रतिक्रिया हो सकती थी।
(शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास कामनाओं का कुहासा का अंश)

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