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मीठी बात / - पैट वाटसन

मधु बी. जोशी
पैट वाटसन एक व्यावसायिक दास्तानगो और लेखक हैं। वे शैनॅनसाइड नॉर्दर्न रेडियो पर नियमित रूप से दास्तानें सुनाते रहे हैं। उनकी रचनाओं का विषय खासतौर पर दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान आयरलैण्ड के गाँवों-कस्बों के लोगों का जीवन और उन इलाकों की जनश्रुतियाँ है।
नदी किनारे के समतल गोचर में दिनभर गायों की निगरानी करना *यादा मुश्किल काम नहीं था लेकिन जर्मन बमवर्षक हवाईजहाजों का डर बडी समस्या था। पता नहीं कब आ जाएँ और आप को छिपने का वक्त तक न मिले। मैंने तय किया कि हवाईहमले की सूरत में बमबारी से बचने के लिए एक बच्चे के लायक छोटा-सा शरणस्थल बना लिया जाए। मैंने जंगली घास के घने झुरमुट के बीच एक फुट चौडी राह बना ली फिर उस के दोनों ओर उगी घास के छोरों को बाँध कर एक सुरंग-सी बना ली जिसमें हवाईजहाज की आवाज सुन कर मैं सरक कर अंदर जा सकता था। मैं उन्हें दिखूँगा नहीं, तो वे मुझ पर बम नहीं बरसा पाएँगे।
समस्या यह थी कि सडक से नदी तक जाता दस एकड का यह गोचर लम्बा और संकरा था। घास के घने झुरमुट उस के बीच में थे और मेरा काम वार्बल माखी के हमले की सूरत में गायों को सडक पर जाने से रोकना था। वार्बल माखी बस तभी हमला करती थीं जब सूरज चमकता हो, इसलिए धूपीले दिन में तो वे कभी भी हमला कर देतीं, लेकिन बादल घिरे हों, तो उनके दर्शन ही नहीं होते। फुहार पडती तो सूरज के निकलते ही वे हमला करतीं और आम उन्हें देख सकते थे।
वार्बल माखी बहुत चतुर जीव है और गायें बेवकूफ होती हैं। बात यह है कि गाय के पिछवाडे में अपने अण्डे देने के लिए वार्बल माखी को अपने इंजैक्शन जैसे पिछवाडे का इस्तेमाल करना होता है। गाय की पूँछ माखी पर फटकारे जाने के लिए बिलकुल सही जगह पर होती है। पूँछ के वार से बचने के लिए माखी जोर से भनभनाती है मैं आई, मैं आई, मैं आई और बेवकूफ गायें पूँछ ऊपर उठाए, जान बचाने को, जहाँ सींग समाएँ वहाँ दौड पडती हैं। माखी फटाक से आ कर वहाँ अण्डे दे देती है जहाँ पूँछ को होना चाहिए था। अब अगर गाय उसे पूँछ से मार भी दे, तो कोई मतलब नहीं होता क्योंकि वह तो अपना काम कर चुकी और अण्डे अगले बरस तक गाय की खाल के नीचे बने रहेंगे। यही वजह है कि मुझ जैसे छोटे-से लडके को अपना दिन बेवकूफ गायों को उन के मैदान में ही बनाए रखने में बिताना होता था। बूढा जेम्स कहता था कि परमेश्वर ने वार्बल माखी इसलिए बनाई ताकि बछडे दौडते रहें और उन के फेफडे निमोनिया से बचे रह सकें। लेकिन लोग कहते थे कि उस का दिमाग चल गया है।
रोज सुबह मैं अपने कुत्ते ब्रूनो को संगत के लिए साथ लाता, लेकिन छोटे बच्चों की मां खरोगशनी तीन पैरों पर लंगडाती आती और वह मूरख कुत्ता बस उस के पीछे दौड पडता, वह हमेशा बडे घुमावदार रास्ते से हमारे घर तक का आधा मील का रास्ता तय करती और फर्राटा भरने लगती, फिर कुत्ता उस का पीछा छोड देता, मुझे भूल जाता और दिनभर घर पर बना रहता। मैंने उस का भरोसा छोड कर एक घूस के साथ खेलने की कोशिश की। कईं दिन तक मैं उसे पकडने का जतन करता रहा और आखिर एक दिन मैंने उसे झाडियों के नीचे दबोच ही लिया। मैं उस की पीठ देख पा रहा था, लेकिन मैं उसे अच्छी तरह देखना चाहता था। मैंने तय किया कि उसे पूँछ के सिरे से पकडा जाए ताकि जब वह उल्टा लटका हो, तो उसे अच्छी तरह देखा जा सके। वह तो बिजली की तरह मुडा और मेरी तर्जनी को काट खाया, मेरी उंगली के दूसरे पोर से नाखून तक उसके दाँतों के सफेद निशान पड गए। दर्द से डर कर मैंने उसे छोड दिया, दाँतों के सफेद निशानों से खून बह रहा था। मैं उसे पैर से कुचल भी नहीं पाया और वह भाग निकला। खैर अगली बार मैं होशियारी से काम लूँगा। अगले ही दिन मैंने उसे घास के नीचे जकड लिया। मैंने कस कर उसकी गर्दन पकडी और उसे अपने चेहरे के सामने ले आया। यह बच्चों को दूध पिला रही घूसनी थी, उसके पेट के दोनों ओर ताजा चुसे थनों की कतारें थीं।
उसकी डरी हुई आँखों, मूँछों से घिरी नाक और काट लेने को खुले नन्हें दाँतों को देखते मैंने उससे कहा, अब तू मेरे कब्जे में हैं और कुछ नहीं कर सकती। मैं जब तक चाहूं तुझे पकडे रहूँगा। उसने तुरंत अपने शरीर को मोडा और अपनी आँतों और पेशाब की थैली में भरा सबकुछ मेंरी कमीज पर उंडेल दिया।
चिहुँक कर मैंने उसे छोड दिया और बेवकूफ लडकों को उल्लू बनानेवाले गंदे, दुष्ट, मँगतों को खूब गालियाँ दीं। फिर मैंने घूसों के बजाय लार्कों का मुआयना करना तय किया। मुझे पता था कि लार्कनी का घोंसला कहाँ पर है, वह चार अण्डे से रही थी। रोज ही वह कुछ देर अपने साथी के साथ उडान भरने, मँडराने और गाने के लिए उन्हें छोड कर निकल जाती थी। मैं पीठ के बल लेटा उन्हें ऊपर आकाश में किलोल करते देखता और जब वह लौटती, तो प्यार से मुझे देखती जैसे कहती हो, शुक्रिया, तुमने मेरे अण्डे नहीं छुए। स्नाइप के घोंसले में भी अण्डे थे लेकिन वह गोता मारते हुए जिस तरह चीखती उससे लगता था कि वह खतरनाक है, उससे दूर रहना ही भला! कर्ल्यू और स्नाइप लम्बोतरे अण्डे देती हैं ताकि उनके चूजों की लम्बी चोंचों के लिए जगह रहे।
सडक से करीब सौ गज की दूरी पर व्हाइटथॅर्न की झाडी में थ्रश का घोंसला था जिसमें चार चूजे थे जिनके पंख अभी नहीं आए थे। उसकी दिक्कत यह थी कि वह उन्हें ताजा छिले घोंघे खिलाती थी लेकिन घोंघों के खोल तोडने के लिए जरूरी पत्थर सडक पर थे। एक दिन मैंने सडक से एक पत्थर उठाया और उस के घोंसले के पास धर दिया। वह उसे इस्तेमाल करने लगी और फिर सडक पर नहीं गई। जल्दी ही चूजों के पर निकल आए और वे उड गए।
स्टॉर्क नदी के छिछले हिस्से में एक टाँग पर खडा मछलियों का इंतजार करता है। वह मछलियों को सिर की ओर से निगलता है, आप उसकी लम्बी गर्दन में निगली जाती मछली को गुजरते देख सकते हैं। लोग जो ये कहते हैं न कि स्टॉर्क बच्चे लाते हैं, बिलकुल बेवकूफी की बात है क्योंकि वह तो बिना वजन सँभाले ही मुश्किल से उडान भर पाता है।
खेलने के लिए सब से बढिया थे गुबरैले। अपनी छडी और हाथों से मैंने एक छह इंच गहरा और चार इंच चौडा गड्ढा खोदा। भुरभुरी मिट्टी नम और काली थी तो मैंने गड्ढे की दीवारों को हाथ से थपथपाकर समतल कर दिया और उन पर सूखी चिकनी मिट्टी छिडक दी। फिर मैंने गड्ढे में गुबरैले डाल दिए-काले, हरे, मोटे, पतले और कुछ बहुत लंबे भी जो अपने सिर उठा सकते थे। जब वे बाहर निकलने की कोशिश करते, तो सूखी मिट्टी झडने लगती और वे गिर जाते। हरे गुबरैले छोटे- छोटे और बहुत तेजी से दौडनेवाले थे और साफ था कि वे समझते थे कि रफ्तार उन्हें ऊपर ले जाएगी, कभी-कभी वे अपने पैर इतनी तेजी से चलाते कि सारी सूखी मिट्टी गिर जाती और उन्हें कदम टिकाने की जगह मिल जाती। फिर वे गड्ढे से निकल भागते। बडे काले गुबरैले धीमे-धीमे और सम्हल कर काम करते, लेकिन बस कभी-कभी ही गड्ढे से निकल पाते थे। खेल खत्म होने पर मैं गड्ढे में एक मुठ्ठी घास डाल देता ताकि गुबरैले उसे सीढी की तरह इस्तेमाल कर लें।
मेरा एक और खेल घोंघों की दौड था। मुझे सडक पर एक लकडी का टुकडा मिल गया था, उस के बीच घोंघों को रख कर मैं देखता कि कौन अपने रूपहले रस पर चलता सबसे पहले उस के छोर से नीचे फिसलता है। घोंघों के नन्हें से सींग होते हैं जिन्हें वे खतरा पडने पर अंदर खींच सकते हैं। लगता है उन की आँखें इन सींगों के ऊपर ही होती हैं क्योंकि सींगों को अंदर खींच लेने के बाद वे चलते नहीं। बाहर निकले एक सींग पर उँगली रख कर घोंघे को किसी भी ओर ले जाया जा सकता है। तो इस तरह आप उनकी तख्ते पर या सीधी लाइन में, कैसी भी दौड करवा सकते हैं। अगर दो लोग हों, तो उन के घोंघों के बीच मुकाबला भी हो सकता है लेकिन मैं तो हमेशा ही अकेला होता था, मुझे अपने दांए और बांए हाथों के बीच ही मुकाबला करवाना पडता था।
दोपहर में खाना खाने घर जाते और लौटते हुए पैकी बस सायकिल चलाते-चलाते ही दुआसलाम कर लेता था लेकिन शाम को काम से लौटते हुए कभीकभार वह बात करने को रूकता। एक दिन मैंने उसे हवाईजहाजों के अपने डर और हवाई हमले से बचने के लिए बनाए शरणस्थल के बारे में बताया।
वह हँसा और बोला, तुझे लगता है जर्मनों को गोचर में फिरते, बहती नाकवाले छोकरे पर बम गिराने के अलावा और कोई काम नहीं है?
मैंने इससे मीठी बात कभी नहीं सुनी।
सम्पर्क - ए-गोविन्दपुरम,
गाजियाबाद (यू.पी)- २०१०१३