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शान्तिपूर्ण क्रान्ति का आग्रह : बिपिनचन्द्र पाल

नन्दकिशोर आचार्य
महात्मा गाँधी के तत्त्व-दर्शन में जिस प्रकार सत्य और अहिंसा सहजात बीज अवधारणाएँ हैं, उसी प्रकार उनके सांस्थानिक व्यवहार-दर्शन की सहजात बीज अवधारणाएँ स्वराज्य और स्वदेशी हैं। हिन्द स्वराज का समापन करते हुए वह लिख देते हैं कि स्वराज्य का तात्पर्य स्वशासन है अपने मन का राज्य, जिसे सत्याग्रह, आत्मबल या करूणा-बल से पाया जा सकता है और उसके प्रयोग के लिए स्वदेशी को पूरी तरह अपनाने की जरूरत है। लेकिन इन दोनों शब्दों का प्रचलन बंग-भंग के खिलाफ हुए आन्दोलन में किया गया था तथा कुछ लोगों ने उनकी व्याख्या करने का उपक्रम भी किया था। यह ठीक है कि महात्मा गाँधी ने इन पदों की अपनी व्याख्या दी, जो कहीं पूर्व में की गई व्याख्या का अर्थ-विस्तार करती थी, तो कहीं उससे भिन्नता भी रखती थी। लेकिन उनका मूल बीज तो बंग-भंग के खिलाफ आन्दोलन के दिनों में ही बो दिया गया था।
बंग-भंग के दिनों में कांग्रेस दो भागों में बँट गई थी- नरमपंथी और गरमपंथी। नरमपंथ का नेतृत्व गोखले कर रहे थे, जिन्हें महात्मा गाँधी अपने नेता के रूप में देखते थे, जबकि गरमपंथ में बाल-पाल-लाल त्रयी का बोलबाला था। श्री अरविन्द भी गरमपंथ के साथ थे। उपर्युक्त त्रयी में बिपिनचन्द्र पाल भी थे, जिन्होंने 1907 में मद्रास में स्वराज और स्वदेशी की अवधारणाओं की व्याख्या करते हुए पाँच व्याख्यान दिए थे और ये व्याख्यान उसी वर्ष स्वदेशी और स्वराज्य नामक गं*थ के रूप में प्रकाशित हो गए थे। महात्मा गाँधी की गुजराती में लिखी पुस्तिका हिन्द स्वराज का प्रकाशन 1909 के नवम्बर में हुआ था और उसका स्वयं उनका किया हुआ अंग्रेजी अनुवाद मार्च 2010 में सामने आया। लेकिन यह उद्घाटक बात है कि गोखले से प्रभावित होते हुए भी महात्मा गाँधी की स्वदेशी और स्वराज की धारणा, कुछ भिन्नता के बावजूद, कईं मूल बातों में बिपिनचन्द्र पाल की व्याख्या के आस-पास ही ठहरती है।
बिपिनचन्द्र पाल स्वदेशी की व्याख्या करते हुए पश्चिमी उद्योगवाद की आलोचना करते और पूछते हैं कि इंग्लैंड, जर्मनी और अमेरिका के अनुदान में विशाल कारखाने स्थापित करना क्या राष्ट्र के सर्वोच्च शुभ के लिए सहायक होगा। वह कहते हैं कि - यूरोप और अमेरिका में वस्तुओं के उत्पादन के लिए प्रत्येक औद्योगिक केन्द्र पर मानवता का निर्ममतापूर्वक बलिदान किया जा रहा है.... हमारा औद्योगिक आदर्श यूरोप और अमेरिका द्वारा अपनायी गई पद्धति नहीं होनी चाहिए... क्या आप इस देश में भी वे ही समस्याएँ पैदा करना चाहते हैं? अन्य क्षेत्रों की तरह इस मामले में भी हमारे औद्योगिक विकास को हमारी अपनी जातीय प्रतिभा का मार्ग-दर्शन स्वीकार करना चाहिए, अतीत में अपने ऐतिहासिक विकास द्वारा संकेतिक मार्ग को अपनाना चाहिए, अपने पूर्व अनुभवों से प्रेरणा और सामर्थ्य पाना होगा और सर्वोपरि इस महान तथ्य को सदैव ध्यान में रखना होगा कि जैसे मनुष्य केवल रोटी पर नहीं जीता, वैसे ही केवल विक्रय योग्य वस्तुओं के उत्पादन पर ही राष्ट्र का जीवन और समृद्धि निर्भर नहीं करते।
इसी तरह बॉयकाट भी उनके लिए केवल आर्थिक ही नहीं, राजनीतिक आयाम भी रखता है। वह भी उसे सरकार से असहयोग का रूप भी मानते हैं। वह सत्याग्रह शब्द का तो इस्तेमाल नहीं करते, लेकिन कानून की मर्यादाओं में रहते निष्क्रिय प्रतिरोध का आग्रह करते हैं। स्वयं महात्मा गाँधी ने हिन्द स्वराज के अपने अंग्रेजी अनुवाद में सत्याग्रह के लिए पैसिव रेजिस्टेंस पद का प्रयोग किया है। पाल बहिष्कार के लिए प्रमुख रूप से जिन वस्तुओं का उल्लेख करते हैं, उनमें विदेशी कपडों के साथ विदेशी नमक और चीनी भी प्रधानता के साथ शामिल है।
स्वदेशी की अपनी अवधारणा की व्याख्या करते हुए महात्मा गाँधी का स्पष्ट कथन है- मेरा यह विचार कभी नहीं रहा कि विदेश में बनी हर चीज को हर हालत में त्याज्य समझना है। स्वदेशी की मोटी परिभाषा यह है कि हमें देशी उद्योगों को संरक्षण प्रदान करने के लिए विदेशी वस्तुओं का त्याग कर के देशी वस्तुओं का इस्तेमाल करना चाहिए; यह बात उन उद्योगों पर भी लागू होती है, जिनके नष्ट होने पर भारत कंगाल हो जाएगा। इसलिए मेरी राय में, स्वदेशी का यह अर्थ लगाना उसकी व्याख्या को संकुचित करना होगा कि हमे प्रत्येक विदेशी वस्तु का त्याग कर देना चाहिए, भले ही वह कितनी ही फायदेमंद हो और उसके कारण देश के किसी काम-धन्धे को हानि न पहुँचती हो। लगभग यही बात बिपिनचन्द्र पाल भी विदेशी माल के बहिष्कार और स्वदेशी के संदर्भ में कहते हैं। बहिष्कार शीर्षक वाले अपने व्याख्यान में वह कहते हैं : .... हमें अपने द्वार अन्य के लिए भी खुले रखने पडेंगे क्योंकि आयात और निर्यात में आवययिक सम्बन्ध है.... संसाधनों के आधार पर हमें अपने उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक संभावनाओं का निर्णय करना होगा और उन्हीं चीजों पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हुए, उन चीजों को अपने बाजार से बाहर करना होगा, जो हमारे देशी उद्योगों के अवसरों के लिए हानिकारक हो सकती है- अन्य चीजों को नहीं।
महात्गा गाँधी स्वराज प्राप्ति के लिए अहिंसात्मक साधनों का आग्रह करते हैं। साधन अहिंसात्मक तो हों लेकिन उनका कानून की मर्यादा के अन्तर्गत होना आवश्यक नहीं है। सविनय अवज्ञा का तात्पर्य ही अनुचित कानूनों को अहिंसात्मक तरीकों से भंग करना है। सविनय अवज्ञा का घोषित कदम नमक कानून को भंग करना था। इसी लिए सविनय अवज्ञा आन्दोलन को नमक- सत्याग्रह के नाम से भी जाना जाता है। विपिनचन्द्र पाल भी आन्दोलन की कानूनी मर्यादा को मानते हुए शांतिपूर्ण तरीको पर आधारित रखना चाहते हैं। बारिसाल की घटना का विवरण देते हुए वह बताते है; जब पुलिस ने लाठियाँ बरसायी, तो एक भी व्यक्ति अपने स्थान से नहीं हिला; प्रत्येक व्यक्ति अपने स्थान पर डटा रहा....... पुलिस ने मेरी आँखों के सामने उन पर प्रहार किया। एक व्यक्ति के माथे पर लाठी लगी, वह पुलिया पर ही गिर गया, दूसरे लोग हिले तक नहीं। केवल एक व्यक्ति आगे बढकर दो अन्य व्यक्तियों की सहायता से उसे उठा ले गया। बीच के खाली स्थान को भर दिया गया। वहाँ न कोई कायरता थी और न ही पिटाई से बचने की रंच मात्र भी ईच्छा। केवल बहादुरी थी, ज्वालामुखी में सुप्त शक्ति की तरह का साहस और सरकार हक्की-बक्की रह गयी। क्या यह विवरण पढते हुए सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दिनों में नमक डिपो पर धरने देने वालों पर पुलिस के निर्मम लाठी प्रहारों को गरिमापूर्ण ढंग से झेल रहे सत्याग्रहियों का स्मरण नहीं हो आता?
कभी किसी अध्येता को बंग-भंग के दिनों में प्रसारित स्वदेशी और स्वराज की अवधारणा तथा अनन्तर महात्मा गाँधी की तत्संबंधी अवधारणाओं तथा कार्यक्रमों का तुलनात्मक अध्ययन करना चाहिए। यह देखा जाना चाहिए कि किन बातों में वे समान अथवा भिन्न हैं तथा कैसे महात्मा गाँधी इन अवधारणाओं का अर्थ-विस्तार और उन्हें व्यावहारिक स्तर पर लागू करने का प्रयत्न करते हैं और क्या आज भी वे प्रासंगिकता रखते हैं।
सम्पर्क : सुथारों की बडी गुवाड, बीकानेर-३३४००४, मो. ९४१३३८१०४५