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नई वाली हिंदी : हिंदी का प्रसार या भाषा का व्यापार

रसाल सिंह
आखिर क्या है नई वाली हिंदी?
हिंदी जगत में पिछले एक दशक से नई वाली हिंदी नामक नए पद की काफी धूम है। नई वाली हिंदी इस पद की बात करें, तो यह चर्चा में उस समय आया जब हिन्द युग्म प्रकाशन ने साल 2015 के पुस्तक मेले में अपनी किताबों के लिए इस आकर्षक (ष्टड्डह्लष्द्ध4) पद का प्रयोग किया। उसके द्वारा साल 2015 के पुस्तक मेले में एक ब्रान्ड प्रमोशन के तहत या कहें कि भूमण्डलीकरण और बाजारवाद के बढते दबाव/प्रभाव के चलते पाठकों को हिंदी साहित्य की तरफ खींचने के लिए इस पद का प्रयोग किया गया। यह पद हिन्द युग्म प्रकाशन ने अपने प्रकाशन से छपी किताबों के लिए प्रयोग किया है, तो इस भ्रम में न रहें कि सिर्फ हिन्द युग्म से छपने वाली किताबें ही नई वाली हिंदी की श्रेणी में आएँगी। दरअसल नई वाली हिंदी पद का प्रयोग उन युवा लेखकों की रचनाओं के लिए किया गया, जिन्होंने हिंदी को पण्डिताऊ और तत्सम शब्दावली से मुक्त कर आम बोलचाल की भाषा में ही किताबों में उतार दिया। इन लेखकों ने अपने पाठकों की नब्ज पकडी और फिर उस नब्ज को पकडकर साहित्यिक विधाओं में रचनाएँ करते गए। कहने का अर्थ है कि इन लेखकों ने अपने पाठकों की परिपक्वता का अंदाजा लगाकर उसी शैली में रचनाएँ करी जो उनके पाठकों को पसंद आए। नई वाली हिंदी का एक बडा पाठक वर्ग 18 से 30 की उम्र का है मसलन इन युवा लेखकों ने कॉलेज की प्रेम कहानियाँ लिखीं, अंग्रेजी के शब्दों का धडल्ले से प्रयोग किया, गालियों का प्रयोग बेहिचक किया, प्राइवेट सेक्टर की कहानियाँ लिखी अर्थात युवा वर्ग के आसपास के सामाजिक परिवेश को अपनी रचनाओं का आधार बनाया। नई वाली हिंदी के लेखकों को यह भली-भाँति मालूम है कि वे जिस पाठक वर्ग के लिए लिख रहे हैं उन्होंने हिंदी विषय से कोई शैक्षिक योग्यता नहीं ली या फिर विश्वविद्यालय स्तर पर हिंदी नहीं पढी, इसलिए वे अपनी रचनाओं में ऑफिस शब्द का प्रयोग करते हैं न की कार्यालय। इन लेखकों ने हिंदी भाषा को अभिजात्यवाद के पिंजरे से निकाल खुले आसमान में ला दिया है जहाँ वह अंग्रेजी के शब्दों के साथ उड रही है। नयी वाली हिंदी की भाषा में कहूँ, तो इन लेखकों ने युवा वर्ग के लिए हिंदी को कूल बना दिया। ये लेखक अपनी रचनाओं की समीक्षा करवाने के लिए हिंदी के बडे-बडे आलोचकों और प्रकाशकों की गुटबंदी में शामिल नहीं हुए या यूँ कहा जाए कि ये लोग हिंदी आलोचकों के आगे सरेंडर नहीं हुए, वरन सेल्फ पब्लिशिंग और मीडिया प्रमोशन के दम पर यह खुद पाठकों तक पहुँचे। अंग्रेजी में जो काम चेतन भगत ने किया हिंदी में वही काम नई वाली हिंदी के लेखकों ने किया। यहाँ यह बताना बेहद जरुरी हो जाता है कि पाठक वर्ग इस भ्रम में भी न रहे कि नई वाली हिंदी पद हिन्द युग्म प्रकाशन का दिया हुआ है क्योंकि वर्ष 2004 में ही सुधीश पचौरी भूमंडलीकरण बाजार और हिंदी नामक पुस्तक में नई वाली हिंदी पद का प्रयोग कर चुके थे।

नई वाली हिंदी के संदर्भ में सुधीश पचौरी लिखते हैं इतिहास में हिंदी पहली बार एक बडे एशियाई बाजार की भाषा बन रही है। तमाम चैनल हिंदी में कार्यक्रम देने को बाध्य हो रहे हैं। पचास साठ करोड लोग सिनेमा, रेडियो तथा टी.वी की मेहरबानी से हिंदी बोल बतला रहे हैं। लेकिन यह नई हिंदी है, बाजार की हिंदी है, उसी ने इसे बनाया है, जिसमें अंग्रेजी के प्रति झगडा नहीं है, बल्कि अंग्रेजी के शब्दों का जरूरती प्रयोग शामिल है। वह बातचीत की मण्डी की भाषा है, किताबी भाषा नहीं है। इसे बाजारी शक्तियाँ बना रही हैं। यह हिंदी लोगों को रोजगार भी दे रही है, रोटी भी दे रही है। पत्रकारिता में, विज्ञापन में, सिनेमा में, सीरियलों में लोग हिंदी से रोटी कमा रहे हैं। यह हिंदी नई है और शुद्धतावादी नहीं है और अंग्रेजी से इसकी दुश्मनी नहीं है। यह ग्लोबल हिंदी है जो भारतभर में बोली समझी जाती है।1
पॉपुलर साहित्य, लुगदी साहित्य और नई वाली हिंदी का साहित्य
नई वाली हिंदी पर बात करते समय पॉपुलर साहित्य व लुगदी साहित्य पर भी बात कर लेनी चाहिए क्योंकि कहीं न कहीं इनके तार आपस में जुडे हुए हैं। पाश्चात्य साहित्य और भारतीय साहित्य में पॉपुलर साहित्य की अलग अलग अवधारणाएँ हैं। पाश्चात्य अवधारणा में लोकप्रिय साहित्य तात्कालिक संवेगों पर आधारित है, लेकिन भारतीय और पाश्चात्य साहित्य के बीच अगर तुलना की जाए, तो पाश्चात्य साहित्य का लोकप्रिय साहित्य भारतीय लोकप्रिय साहित्य जितना छिछला नहीं है। पाश्चात्य लोकप्रिय साहित्य में विचारों की प्रधानता नहीं रहती, लेकिन वहाँ विचार उपस्थित जरुर रहता है और भारतीय लोकप्रिय साहित्य में विचार नगण्य ही होता है। भारतीय अवधारणा में लोकप्रिय साहित्य वह होता है जिसके पाठक बडी संख्या में मौजूद हों और सस्ती लुगदी पर छपने के कारण ही पॉपुलर साहित्य को लुगदी साहित्य की संज्ञा दी गयी है। हिंदी साहित्य में पॉपुलर साहित्य व लुगदी साहित्य को नकारात्मक ढंग से देखा जाता है। हिंदी के कई आलोचक लुगदी साहित्य को अछूत की दृष्टि से देखते हैं और इस प्रकार की रचनाओं को साहित्य मानने से ही इंकार करते हैं। दरअसल लुगदी साहित्य एक बने बनाए ढर्रे पर लिखा जाता है जिसमें हत्या के वीभत्स दृश्य होंगे, बलात्कार होगा, स्त्री-पुरुष के बीच काम क्रीडा के कुछ दृश्य होंगे, पात्रों में बदला लेने की भावना होगी, परत दर परत हत्यारे को खोजा जाएगा, दुश्मन देश को नेस्तनाबूद करने के लिए जासूस भेजे जाएँगे, रॉबिन हुड जैसे पात्र होंगे जो एक वर्ग के लिए खलनायक और गरीबों के लिए नायक की भूमिका में होते हैं आदि आदि। इन उपन्यासों को जासूसी और अपराध संबंधी उपन्यासों की श्रेणी में रखा जाता है। लोकप्रिय साहित्य की लोकप्रियता पर विचार करते हुए मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं प्रायः जासूसी और अपराध संबंधी उपन्यासों की लोकप्रियता के कारणों पर विचार करते हुए मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ये उपन्यास मनुष्य के स्वभाव में मौजूद आक्रामकता या मृत्यु से भय की अभिव्यक्ति करते हैं, इसलिए लोकप्रिय होते हैं।2
मैनेजर पाण्डेय आगे लिखते हैं लोकप्रिय साहित्य के अधिक पढे जाने का एक कारण यह है कि उसमें मानवीय भावों की तात्कालिकता होती है जो पाठकों के मन को जल्दी छूती है। दूसरा कारण आधुनिक समाज में जीवन की स्थितियाँ हैं। प्रायः लोग जीवन की व्यवस्थाबद्धता जकड-बंदी और आरोपित अनुशासन से मुक्त होने के लिए फैण्टेसी और सपनों का सहारा लेते हैं जो इन उपन्यासों में बहुतायत से मिलते हैं। कुछ लोग जीवन में अनिश्चय और आशंका का सामना करते हैं, तो साहित्य में आश्वासन और स्थिरता की खोज करते हैं। यही नहीं, जीवन में भद्दी और अश्लील साहसिकता का सामना करने साहित्य में सुंदर साहसिक अभियानों की कथाओं में रस लेते हैं।3
गुलशन नंदा, सुरेन्द्र मोहन पाठक, वेद प्रकाश शर्मा, इब्ने सफी, गुरुदत्त आदि ऐसे बडे नाम हैं जिन्होंने लुगदी साहित्य को अब तक जिंदा रखा है। नई वाली हिंदी और लुगदी साहित्य के मध्य समानताएँ ढूँढी जाएँ, तो दोनों ही धाराएँ बाजारवाद से बहुत अधिक प्रभावित लगती हैं। लुगदी साहित्य के अंतर्गत जो उपन्यास लिखे जाते हैं उनके केंद्र में विचार नहीं होता, उनके केंद्र में पाठक होता है। पाठक की रुचियों और उनकी मानसिक परिपक्वता को ध्यान में रखते हुए इन उपन्यासों की रचना की जाती है। लोकप्रिय साहित्य के कथानक के विषय में राजेंद्र यादव लिखते हैं साहित्यिक उपन्यास में फार्मूला नहीं होता। जैसे दारू का एक फार्मूला होता है। आप बार-बार उसे पीते हैं, उसके एडिक्ट हो जाते हैं। रोमांस और अपराध, ये चीजें जासूसी उपन्यासों के मूल में है। इस दुनिया में इश्क भी है, अपराध भी। जासूसी उपन्यास मनुष्य की बेसिक इंस्टिंक्ट यानी आदिम वृत्तियों को लेकर लिखे जाते हैं। हाँ, अच्छे-बुरे का द्वंद्व होता है। मूलतः यह व्यक्तिगत या सामाजिक सत्ता-संघर्ष है। उस पर आधारित है। जासूसी उपन्यासों में उदात्तता नहीं होती। आदमी, बेसिक इंस्टिंक्ट की तरफ भागता है। आदिम भावनाओं की तरफ यानी हत्या, खून, बदला, प्रतिशोध जैसी। प्रतिशोध और विश्वासघात ये दो चीजें जासूसी उपन्यास के मूल में होती हैं। दुनिया का सारा साहित्य अन्याय के विरुद्ध न्याय की पुकार है और जासूसी साहित्य में वह अपने सबसे नंगे रूप में मौजूद है।4
नई वाली हिंदी की अधिकतर रचनाओं के केंद्र में भी पाठक ही है विचार नहीं। जिस प्रकार लुगदी साहित्य के साहित्यकारों को यह ज्ञात था कि उनका पाठक निम्नमध्यम वर्ग से आता है और वह जीवन के गूढ पक्षों को समझने के लिए नहीं, वरन दोपहरी का खाली समय या ट्रेन के रात्रि सफर में मनोरंजन की दृष्टि से उनके उपन्यासों को पढ रहा है। इसलिए उन्होंने पाठकों के मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए अपने उपन्यासों का कथानक वैसा ही रखा जिसे पढकर तात्कालिक संवेग उत्पन्न हो। उसी प्रकार नई वाली हिंदी के लेखकों ने भी अपने पाठक वर्ग की नब्ज पकड ली है। उन्हें मालूम है कि उनका पाठक वर्ग 18 से 30 वर्ष का युवा है जिसे ऐसा साहित्य पढना है जो तात्कालिक संवेग उत्पन्न करे रचना के वैशिष्ट्य और कथानक की गंभीरता समझने के लिए न ही उन युवाओं के पास समय है और न ही साहित्य की इतनी गहरी समझ। यहाँ यह बताना आवश्यक हो जाता है कि नई वाली हिंदी के जिन लेखकों की बात यहाँ की जा रही है उन सभी लेखकों पर यह बात फिट नहीं बैठती। नई वाली हिंदी के लेखकों में भी कुछ लेखक अपवाद हैं, कुछ लेखक ऐसे भी हैं जिनकी रचनाएँ वैचारिक रूप से समृद्ध हैं और जो बाजारवाद के चंगुल से अभी तक बचे हुए हैं।
मानवीय प्रवृत्ति है कि मनुष्य सामाजिक रूप से वर्जित चीजों के प्रति हमेशा से आकर्षित रहता है भारतीय समाज में सेक्स पर खुलकर बात नहीं की जाती इसलिए सेक्स संबंधित चीजों को पढने के लिए पाठक हमेशा लालायित रहता है। लोकप्रिय साहित्य लिखने वाले लेखक इसी मानवीय प्रवृत्ति के आधार पर काम करते हैं और उपन्यासों के शीर्षक ऐसे रखते हैं कि पाठक शीर्षक देखकर ही पुस्तक खरीद ले। यहाँ कुछ उपन्यासों के नाम देने से यह बात स्पष्ट हो जाएगी। दुल्हन एक रात की, बीवी का नशा, मैं अकेली, बदनाम, पाप की नगरी, मौत के मुँह में, अनोखी रात आदि ऐसे ही उपन्यास हैं जिनका शीर्षक आकर्षित करता है। नई वाली हिंदी के लेखक इतने निचले स्तर पर तो अभी तक नहीं उतरे हैं, लेकिन वह भी शीर्षक इस प्रकार रखते हैं कि वे आई कैचिंग हों और पाठक उनकी किताब एक बार तो हाथ में जरुर ले। नई वाली हिंदी की कुछ किताबों के नाम देखिये सोनम गुप्ता बेवफा है, वेश्या एक किरदार, ऐसी वैसी औरत, बकर पुराण, लौंडे शेर होते हैं, लूजर कहीं का, ञ्जद्धद्ग चिरकुट्स, भली लडकियाँ बुरी लडकियाँ, मसाला चाय आदि।
कथ्य के स्तर पर नई वाली हिंदी और लोकप्रिय साहित्य में काफी अंतर है। लोकप्रिय साहित्य का एक फॉर्मूला है, लेकिन नई वाली हिंदी में लेखकों ने अभी तक ऐसा कोई एक फॉर्मूला नहीं बनाया।

नई वाली हिंदी के प्रमुख लेखक और उनकी रचनाओं का यूएसपी
नीलोत्पल मृणाल (उपन्यास-डार्क हॉर्स, औघड), दिव्य प्रकाश दुबे(उपन्यास-मुसाफिर कैफे, अक्टूबर जंक्शन, इब्ने बतूती; कहानी संग्रह- शर्तें लागू, मसाला चाय), सत्य व्यास(उपन्यास-दिल्ली दरबार, बागी बलिया, बनारस टॉकीज, उफ्फ कोलकाता, चौरासी), मानव कौल(उपन्यास-अंतिमा; कहानी संग्रह- तुम्हारे बारे में, प्रेम कबूतर, चलता फिरता प्रेत, ठीक तुम्हारे पीछे, बहुत दूर कितना दूर होता है), अंकिता जैन(कहानी संग्रह- ऐसी वैसी औरत, बहेलिये), ऋषभ प्रतिपक्ष(कहानी संग्रह- क्रिक पाण्डा पों पों), गौरव सोलंकी(कहानी संग्रह- ग्याहरवीं-ए के लडके), निखिल सचान(कहानी संग्रह- नमक स्वादानुसार, जिंदगी आइस पाइस, यूपी 65), अणु शक्ति सिंह(उपन्यास- शर्मिष्ठा), नवीन चौधरी (उपन्यास- जनता स्टोर, ढाई चाल), अनुराधा बेनीवाल (यात्रा वृत्तांत- आजादी मेरा ब्रांड), नीलिमा चौहान(स्त्री विमर्श- ऑफिशियली पतनशील, पतनशील पत्नियों के नोट्स) आदि आते हैं।
नई वाली हिंदी की रचनाओं के कथ्य में विविधता है इन लेखकों ने मनुष्य के दैनिक जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को अपनी रचना का केंद्र बनाया। पाठक वर्ग जब इन रचनाओं को पढता है, तो स्मृति के पिंजरे में कैद उनका अतीत पंख फडफडाने लगता है। कहानियाँ हमारे आस-पास ही तो होती हैं, बस आवश्यकता होती है घटनाओं को शिल्प में पिरो कर कलमबद्ध करने की और इन लेखकों ने यही किया है। दिव्य प्रकाश दुबे की कहानी लोलिता के केंद्र में एक ऐसी लडकी है जिसके बारे में हम सभी ने अपने विद्यालयी जीवन में कुछ अफवाहें सुन रखी होती हैं और उस लडकी को हम वैसी लडकी के नाम से जानते हैं। यहाँ वैसी लडकी की कोई परिभाषा नहीं दी जा सकती, लेकिन वैसी लडकी अपरिभाषित होकर भी युवा पीढी के अनुभव का हिस्सा है। वैसी लडकियों के बारे में किस प्रकार की अफवाहें किस प्रकार फैलती हैं यही लोलिता कहानी का कथ्य है।
नयी वाली हिंदी की कहानियों में घटनाओं की अधिकता दिखती है जिससे कहानियाँ भागती हुई प्रतीत होती हैं। भाषा को चटपटा बनाने के लिए कई जगह ये लेखक नंगे यथार्थवाद और अश्लीलता के झीने परदे को तार-तार करते हुए अश्लीलता की तरफ झुक जाते हैं। इन लेखकों के यूएसपी में भाषा ही सबसे यूनिक पॉइंट है। आज की मिलेनियल पीढी जिस भाषा का प्रयोग करती है उसे अंग्रेजी में स्लैंग(स्द्यड्डठ्ठद्द) कहा जाता है। इन लेखकों ने युवाओं को आकर्षित करने के लिए इसी स्लैंग का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया। सत्य व्यास के उपन्यास दिल्ली दरबार की भाषा का नमूना देखिए-
Are you Gay?
Mmm! Well...Not e-actly! But you can say. Yes. इमरान हाशमी मुझे भी पसंद है। लडके ने अब पूरी नजाकत से कहा।
Fine. तो भैंचो, तू मेरे साथ क्या कर रहा था? बीबी का मिजाज बबूल और जुबान नीम हुयी जा रही थी।
You know na! ममा ये सब लाइक नहीं करती। So old faishoned. उन्होंने कहा कि लडकियों से दोस्ती कर। लडके ने अपना दुखडा सुनाया।
तेरी माँ की... बीबी ने अपनी हद पार नहीं की बस बीच की ऊँगली दिखा दी।5
इन कहानियों और उपन्यासों के पात्रों की बात की जाए, तो ये पात्र कालजीवी हैं कालजयी नहीं। इन लेखकों की रचनाओं के कथ्य में विविधता तो है, लेकिन बाजारवाद के चलते ये लेखक हिट फॉर्मूला नाम की बीमारी से ग्रसित भी होते जा रहे हैं। साल 2015 में नई वाली हिंदी के अग्रणी लेखक नीलोत्पल मृणाल को उनके उपन्यास डार्क हॉर्स के लिए साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उपन्यास के केंद्र में दिल्ली का मुखर्जी नगर है। वही मुखर्जी नगर जहाँ देश भर के युवा विद्यार्थी आँखों में यूपीएससी का सपना लिए आते हैं उपन्यास का कथानक इन्ही युवाओं की जिंदगी और संघर्ष को लेकर चलता है। डार्क हॉर्स की प्रतियाँ हजारों में बिकीं। नए लेखकों को इसमें एक फॉर्मूला मिल गया। डार्क हॉर्स की सफलता के बाद मुखर्जी नगर और यूपीएससी की तैयारी करते विद्यार्थियों के जीवन संघर्ष को केंद्र में रख कर उपन्यास लिखने वालों की बाढ-सी आ गयी। शशिकांत मिश्रा(नॉन रेजिडेंट बिहारी), ललित मोहन रयाल(अथश्री प्रयागकथा), संजीव कुमार गंगवार (B-vzB फोर्थ फ्लोर), अनुराग पाठक(ट्वेल्थ फेल) इन सभी उपन्यासों के केंद्र में यूपीएससी की तयारी करता छात्र है। प्रचण्ड प्रवीर का (अल्पाहारी गृहत्यागी) उपन्यास भी इसी प्रकार का उपन्यास है बस कथानक के केंद्र में यूपीएससी के विद्यार्थी न होकर आई आई टी की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहे विद्यार्थी हैं। नई वाली हिंदी के लेखक अगर ऐसे ही हिट फॉर्मूला के आधार पर या फिर अपने पाठकों को ध्यान में रखते हुए रचना कर्म करने लगे, तो एक दिन इनके द्वारा अश्लील साहित्य लिखा जाने लगे, तो अचंभित मत होइएगा क्योंकि बाजार और पाठक कभी भी अश्लील साहित्य की माँग कर सकता है।
नई वाली हिंदी की रचनाओं के बारे में बात की जा रही है, तो यहाँ कुछ किताबों के बारे में बात करना बेहद जरुरी हो जाता है। नीलोत्पल मृणाल के औघड उपन्यास को इक्कीसवीं सदी के राग दरबारी की संज्ञा दी जा सकती है। उपन्यास की भूमिका में नीलोत्पल मृणाल लिखते हैं आप चाहें किसी भी धारा के हों, किसी भी वाद के वादी हों, किसी भी समुदाय से हों, किसी भी वर्ग से हों, किसी भी जाति के हों...मैं जानता हूँ आप मुझे छोडेंगे नहीं। और मैंने भी पूरी कोशिश की है, किसी को न छोडूं।6 नीलोत्पल अपने कहे अनुसार सही में इस उपन्यास में किसी को नहीं छोडते।
ऋषभ प्रतिपक्ष के कहानी संग्रह क्रिक पांडा पों पों के बारे में सुबोध मिश्रा कहते हैं ऋषभ की कहानियों में कितनी ही जगह मनोविज्ञान के वो अँधेरे कोने चमकते हुए नजर आते हैं, जिनका होना भी हम, नॉर्मली, स्वीकार नहीं करना चाहते। मनुष्य की साइकी की भयावहता बहुत ईमानदारी से डिस्प्ले पर रख दी गयी है। ऋषभ की कहानियों की खासियत है कि ऐसी कितनी ही जगहें हैं जहाँ आप रुकते हैं, दोबारा पढते हैं, एक पल ठहरते हैं, फिर आगे बढते हैं। ये कहानियाँ सिर्फ स्टोरी टेलिंग नहीं हैं, ये रिएक्शन हैं। पॉलिटिकल और सोशल डिस्कोर्स के प्रति गुस्से, असंतुष्टि और विरोध की कहानियाँ हैं। ऋषभ की कहानियाँ हमारे समाज का फ्रंट कैमरा हैं जिसमें छोटी से छोटी बारीकियों को भी जूम कर के दिखाया गया है।
अणुशक्ति सिंह का उपन्यास शर्मिष्ठा पौराणिक कथाओं को समेटे हुए है, तो नीलिमा चौहान की दोनों किताबें पतनशील पत्नियों के नोट्स, ऑफिशियली पतनशील और अनुराधा बेनीवाल का यात्रा वृत्तांत आजादी मेरा ब्रांड आधुनिक स्त्री विमर्श की बेहद जरुरी किताबें हैं। पाठकों को अगर राजनीति पर केंद्रित उपन्यास पढने हैं, तो वे नवीन चौधरी के उपन्यास जनता स्टोर, ढाई चाल की तरफ रुख कर सकते हैं।
नई वाली हिंदी उर्फ क्षणभंगुरता का फटाफट साहित्य
नयी वाली हिंदी के अंतर्गत आने वाली कुछ रचनाओं के लिए एक टर्म जो एकदम फिट बैठता है वह है ट्रेन साहित्य।
नई वाली हिंदी की रचनाओं को ट्रेन साहित्य इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इन रचनाओं के साथ ठीक ऐसा है कि पाठक ट्रेन में सफर करते वक्त इन पुस्तकों को पढना शुरू करता है और सफर के अंत तक पुस्तक खत्म कर चुका होता है। जैसे ही पाठक का सफर खत्म होता है साथ ही साथ रचना का सफर भी खत्म हो चुका होता है। पाठक जब ट्रेन से उतरता है, तो पुस्तक के विचार भी वहीं ट्रेन की सीट पर पानी की खाली बोतल के साथ छोड आता है क्योंकि इन रचनाओं में विचार इतने उथले या छिछले हैं कि पाठक के जीवन पर बहुत गहरा असर नहीं डाल पाते। अभिषेक सूर्यवंशी की एक किताब है जिसका शीर्षक है किस्सों की सडक इस किताब में कुछ छोटे-छोटे किस्से हैं। एक किस्सा पढिए
उस दिन जब मैं तुमसे मिलने तुम्हारे हॉस्टल के बाहर आया, तो तुम स्कर्ट में आयी थी। तुम्हारे पैर दिख रहे थे। मैंने देखा तो देखता ही रह गया और फिर मुझे गुस्सा आ गया था। बस इसलिए कि मैं नहीं चाहता था कि मेरे अलावा कोई और उन्हें देखे।
अब बताइए आखिर इस रचना का वैशिष्ट्य क्या है? इस रचना में तो तात्कालिक संवेग भी उत्पन्न नहीं होते। ऐसे किस्सों को तो सडक में ही दफन हो जाना चाहिए। साहित्य यूनिवर्सल होता है, लेकिन क्या नई वाली हिंदी की रचनाओं में ऐसी कोई रचना है जिसका अनुवाद कर विदेशी भाषा के पाठकों तक वह रचना पहुँचायी जा सके? क्या किसी रचना का कथानक इतना उदात्त है?
ट्रेन साहित्य के साथ साथ इसे झटपटिया साहित्य भी कहा जा सकता है क्योंकि कुछ रचनाओं को पढकर ऐसी ही अनुभूति होती है कि यह झटपट लिखा गया है और झटपट संवेग उत्त्पन्न कर शेल्फ के सबसे नीचे वाली रैक को अपनी कब्र बना लेता है।
नई वाली हिंदी : हिंदी का प्रसार या हिंदी का व्यापार
एक सवाल यह उठता है कि नई वाली हिंदी आखिर में हिंदी का प्रसार है या फिर हिंदी का व्यापार? अगर आप पिछले कुछ सालों का अध्ययन करेंगे, तो पाएँगे कि तमाम मुश्किलों का सामना करने के बावजूद हिंदी के पाठकों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई है। हिंदी भाषा के प्रति पाठकों के इस बढते रुझान का एक बडा कारण नई वाली हिंदी के लेखकों की भाषा में छुपा हुआ है। इन लेखकों ने हिंदी पर पण्डिताऊ और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के चढे हुए आवरण को उतार कर उस पर हिंग्रेजी या हिंग्लिश का आवरण चढा दिया। ऐसा करके उन्होंने उन पाठकों को अपनी तरफ खींचा जिन्होंने हिंदी को विश्वविद्यालय स्तर पर तो नहीं पढा, लेकिन साहित्य में उनकी रूचि थी। अब आई आई एम और आई आई टी के बच्चे भी हिंदी साहित्य पढ रहे हैं क्योंकि इन लेखकों की रचनाएँ पढते समय उन्हें हिंदी के भारी-भरकम शब्दकोष लेकर नहीं बैठने पडते। नई वाली हिंदी का पाठक वर्ग वह है जो नौकरी पाने के लिए पढता तो अंग्रेजी है, लेकिन सोचता हिंदी में है। यह पाठक वर्ग निम्न मध्यमवर्ग का वह व्यक्ति है जिसे न तो क्लिष्ट हिंदी ही आती है और न ही शेक्सपियर के नाटकों की मूल कृति पढ सकता है। इस प्रकार मिलेनियल पीढी के बीच हिंदी के प्रसार में इन लेखकों की बहुत बडी भूमिका है, लेकिन हिंदी का यही प्रसार तब व्यापार में बदल जाता है जब लेखक अपनी रचनाओं के केंद्र में विचार की जगह पाठक को रख दे। लेखक लिखते समय जब यह दृष्टि रखने लगे कि मुझे रचना इस प्रकार से लिखनी है कि उस पर फिल्म भी बनायी जा सके तब वह बाजारवाद के तिलिस्म में फँस चुका होता है क्योंकि साहित्य लिखना और फिल्म स्क्रिप्ट लिखना दो अलग अलग चीजें हैं। साहित्य का मूल उद्देश्य पाठक के विचारों को परिष्कृत करना होता है अपनी कहानी को बडे पर्दे पर देखना नहीं।
जब लेखक जानबूझकर हर दूसरी कहानी में बनारस की चटपटी भाषा का प्रयोग करने लगे क्योंकि उनके पाठकों को चटपटापन पसंद है, तब वह लेखक कम दुकानदार ज्यादा हो जाता है।
नई वाली हिंदी के लेखकों को मार्केट में लाने का कार्य हिन्द युग्म प्रकाशन ने बडे स्तर पर किया। हिन्द युग्म किताबों को कम रेट पर छापकर हिंदी के प्रसार में अपना योगदान तो दे रहा है, लेकिन रेड हिंद युग्म और ब्लू हिन्द युग्म का प्रपंच भी फैला रहा है। नई वाली हिंदी के अंतर्गत लिखने वाले वे लेखक जो इस जगत में स्थापित हो चुके हैं उनकी किताबें तो रेड हिन्द युग्म से छपती हैं लेकिन जिनकी पाण्डुलिपियाँ रिजेक्ट हो जाती हैं, अगर वे धनराशि देकर अपनी किताब छपवाना चाहें, तो उनकी किताब ब्लू हिन्द युग्म से छपती है। रेड हिन्द युग्म से छपने वाले कुछ लेखकों की कुछ किताबें बिक्री के मामले में लाख का आँकडा भी पार कर जाती हैं यही सोचकर तथाकथित लेखक धनराशि देकर ब्लू हिन्द युग्म से किताबें छपवा लेते हैं जिसके चलते हिंदी साहित्य में कूडे-करकट का पहाड एवरेस्ट को मात देने की कगार पर है। दिल्ली में स्थित दरियागंज की सडक पर जाकर देखिए हिंदी साहित्य दो सौ रूपये किलो बिक रहा है इसके जिम्मेदार सिर्फ वही प्रकाशक हैं जो हिंदी को व्यापार की दृष्टि से देखते हैं।
नई वाली हिंदी का भविष्य और हिंदी आलोचना/साहित्य में उसका स्थान
नई वाली हिंदी के भविष्य की बात की जाए, तो हमें लुगदी साहित्य और पॉपुलर साहित्य के इतिहास और वर्तमान पर भी दृष्टिपात करना होगा क्योंकि नयी वाली हिंदी और लुगदी साहित्य व पॉपुलर साहित्य में काफी समानताएँ हैं जिनका जिक्र ऊपर किया जा चुका है। जिस प्रकार लुगदी साहित्य क्षणभंगुरता और मनोरंजन का साहित्य बनकर रह गया है उसी प्रकार अगर नई वाली हिंदी के लेखक बाजारवाद की दृष्टि से ही रचनाएँ करते रहे, तो उनकी रचनाएँ ट्रेन साहित्य तक सीमित होकर रह जाएँगी। नई वाली हिंदी का भविष्य हिंदी के पाठकों, आलोचकों और नई वाली हिंदी के लेखकों के कन्धों पर ही यात्रा करेगा।
नई वाली हिंदी का लेखक वह अबोध शिशु है जिन्हें इतना तो मालूम है कि चलते वक्त पैरों में चप्पल पहननी जरुरी है, लेकिन उन्होंने चप्पल उल्टी पहन ली है। उल्टी चप्पल पहनकर आप थोडी दूर तो चल सकते हैं, लेकिन दौडने के लिए आपको सीधी चप्पल पहननी पडेगी। हिंदी साहित्य के आलोचकों और सजग पाठकों का यह दायित्व बनता है कि वह इन शिशुओं को प्यार से, फटकार से सीधी चप्पल पहनना सिखाए क्योंकि ये अनाडी लोग नहीं हैं इनके पास कहानी है, शिल्प है, अनुभव है, पाठकों के विचारों को परिष्कृत करने की क्षमता है, बस दरकार है उचित मार्गदर्शन और उचित आलोचना की। सोशल मीडिया के इस दौर में हिंदी की दो किताबें पढकर चार कविताएँ लिखने वाला कोई चिंटू भी अपने आप को लेखक और आलोचक कहने समझने लगता है। यही चिंटू नई वाली हिंदी के लेखकों को उनकी भाषा के आधार पर आए दिन ट्रोल करते हुए दिख जाएगा। यहाँ यह याद रखिए कि आलोचना और ट्रोलिंग में अंतर है।
एक दूसरी बात यहाँ समझने लायक यह है कि जो लोग नई वाली हिंदी के लेखकों की इस बात पर ट्रोलिंग करते हैं कि वे हिंदी में अंग्रेजी के शब्द मिला रहे हैं और हिंदी भाषा को क्षति पहुँचा रहे हैं। गंभीर साहित्य पढने वाले लोगों को तो यह हिंदी भाषा का बलात्कार लगता है। यहाँ यह समझना आवश्यक हो जाता है कि ये लेखक जिस भाषा का प्रयोग कर रहे हैं वह भाषा इनके द्वारा नहीं बनायी गयी है वह भाषा मीडिया और बाजार ने मिलकर बनायी है। आपने और हमने मिलकर बनायी है। आज हिंदी विषय का विद्यार्थी ही यह कहता हुआ दिख जाएगा कि मैं हिंदी से मास्टर्स कर रहा हूँ, वह नहीं कहता कि मैं हिंदी विषय से स्नातकोत्तर कर रहा हूँ। अगर साहित्यकार जनता की भाषा में नहीं लिखेंगे, तो साहित्यकारों के विचार आम जनता तक कैसे पहुँचेंगे? वर्तमान युग में अंग्रेजी रास्ते में पडने वाला वह पुल है जिसके सहारे हिंदी के साहित्यकार आम जनता तक पहुँच सकते हैं अगर यह पुल नहीं होगा, तो हिंदी पट्टी के साहित्यकारों और आम जनता के मध्य की खाई चौडी होती जाएगी फिर साहित्य सिर्फ साहित्यकारों तक ही सीमित रह जाएगा। हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों की मिलावट पर सुधीश पचौरी लिखते हैं हिंदी ने ने अंग्रेजी से ले कर के क्षतिपूर्ती की है चाहे वह वाणी में की हो, चाहे शब्द ग्रहण करने में की हो, तो क्यों की है? अपने को अभिव्यक्ति-सक्षम करने यानी सरवाइव करने के लिए की है। किसी भाषाविज्ञानी स्कूल में नहीं कहा गया है कि तुम ऐसा कर लेना। जिंदा रहने की जरूरतों ने करवाया, एम्पॉवरमेंट की जरूरतों ने यह करवाया।8
भूमण्डलीकरण और वैश्वीकरण के चलते भारतीय समाज में व्यापक स्तर पर बदलाव हुए। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में कदम रखे और कॉरपोरेट सेक्टर का जन्म हुआ। कॉरपोरेट सेक्टर ने एक नए कल्चर को जन्म दिया। इस कल्चर में रहने वाले लोग हर वाक्य में अंग्रेजी का कोई न कोई शब्द बोलते ही हैं। अब ऐसे में अगर लेखक कॉरपोरेट दुनिया की कोई कहानी लिख रहा है, तो अंग्रेजी के शब्द प्रयोग करना उसकी मजबूरी बन जाती है और वर्तमान समय में आप कहानियों की दुनिया से कॉरपोरेट वर्ल्ड को नहीं निकाल सकते। दिव्य प्रकाश दुबे की कहानी बेड टी का एक अंश देखिए डील क्यों नहीं हुई इसका कोई जवाब नहीं था गौरव के पास। उसने दिन भर ऑफिस का कोई फोन नहीं उठाया और रात में कंपनी के Chairman को फोन कर के बताया। Chairman ने फोन पर बहुत ही उल्टा सीधा बोला। उल्टा सीधा में माँ-बहन की गाली भी Included थी। Corporate world एक मामले में बडे ही Democratic होते हैं। यहाँ छोटे-से-छोटे Level से लेकर बडे-से-बडे Level तक गालियाँ दी जाती हैं और वो भी अपने Purest form में। जो ये सब झेल नहीं पाते वो अक्सर अपना रास्ता अलग ढूँढ लेते हैं, फिर पूरे Corporate world को माँ-बहन की गालियाँ देने लगते हैं। जो झेल पाते हैं वो आगे बढते जाते हैं। हाँ, एक तीसरी Category भी होती है जो गालियाँ झेल तो सकते हैं, लेकिन कंपनी नहीं चाहती कि वो और गाली झेलें। उनको Pink slip, Golden handshake जैसे Fancy शब्दों के मतलब सही-सही समझ में आने लगते हैं।9
पिंक स्लिप, गोल्डन हैंडशेक कुछ ऐसे शब्द हैं जो कॉरपोरेट सेक्टर में धडल्ले से प्रयोग में लाए जाते हैं। ऐसे शब्दों का हिंदी भाषा में अभी अनुवाद आया नहीं है इसलिए कहानीकार की यह आवश्यकता बन जाती है कि वह उन शब्दों को ठीक उसी फॉर्म में प्रयोग करे।
हिंदी का एक बडा लेखक वर्ग क्लिष्ट और पण्डिताऊ भाषा लिखकर आपस में ही एक दूसरे की पीठ सहलाता रहता है और फिर पाठकों की कमी का रोना रोता है । साहित्य साहित्यकारों के लिए नहीं लिखा जाता वह जनता के लिए लिखा जाता है। विचार अगर संप्रेषित ही नहीं होगा तो वह कितना ही उदात्त विचार क्यों न हो वह एकदम व्यर्थ है। इसे ऐसे समझें कि किसी कक्षा में अगर अध्यापक किसी विद्यार्थी से यह कहेगा कि मेरी मेज से खडिया ले आओ, तो विद्यार्थी पूरे विद्यालय में घूम लेगा तब भी वह खडिया नाम की चीज अध्यापक को नहीं दे पाएगा। वहीं अध्यापक कहे कि मेरी मेज से चाक ले आओ, तो विद्यार्थी अपनी ही बैग से चाक निकालकर दे देगा। वैश्वीकरण के इस युग में बदलती हुई हिंदी के भविष्य और वर्तमान पर बात करते हुए करुणाशंकर उपाध्याय कहते हैं इसमें किंचित संदेह की गुंजाइश भी नहीं है कि जो भाषाएँ उतरोत्तर तकनीकी आविष्कृतियों के अनुरूप अपने आपको पूरी तरह ढाल नहीं पाएँगी अथवा उन्हें स्वीकार करने में हिचकिचाहट का अनुभव करेंगी, उनका भविष्य अच्छा नहीं कहा जा सकता। जो भाषाएँ बहुभाषिक कंप्यूटर, इन्टरनेट एवं सूचना प्रौद्योगिकी की एकदम नवीनतम आविष्कृतियों में अपने संपूर्ण शब्दकोष, व्याकरण, साहित्य तथा ज्ञान विज्ञान के सम्पूर्ण क्षेत्र की तमाम उपलब्धियों के साथ दर्ज होंगी और कंप्यूटर लाइब्रेरी में अपनी उपस्थिति का गहरा अहसास कराएँगी, उनकी प्रगति निर्विवाद है। हिंदी इस दिशा में अपेक्षित गति से बढ रही है, लेकिन उसके समक्ष आने वाली चुनौतियाँ अभी समाप्त नहीं हुई हैं। उसे अभी लम्बा सफर तय करना बाकी है।10
नयी वाली हिंदी की रचनाओं को इस बात पर भी ट्रोल किया जाता है कि इन रचनाओं में गालियों का प्रयोग किया जाता है। साहित्य में गाली होनी चाहिए या नहीं यह विचार का मुद्दा है। अगर आप भारतीय क्लासिक साहित्य परंपरा को देखेंगे, तो ऐसी न जाने कितनी ही किताबें आपको मिल जाएँगी जिनमें प्रचुर मात्रा में गालियाँ हैं। काशीनाथ सिंह का काशी का अस्सी तो इस हिसाब से गालियों का शब्दकोष है। साहित्य में गाली का प्रयोग कथ्य, पात्रों और परिस्थितयों पर निर्भर करता है। अगर आपकी रचना के केंद्र में कोई वेश्या है, तो संवाद के स्तर पर उसके मुँह से माननीय शब्द पचेगा नहीं। दलित रचनाकारों की रचनाओं में भी आपको गालियाँ प्रचुर मात्रा में मिलेंगी क्योंकि उनके केंद्र में दलित हैं और उनकी जीवन शैली में गालियाँ व्यापक रूप में मौजूद हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो जाता कि आप प्रति दो पेज चार गालियाँ लिखकर उसे कथ्य, पात्र और परिस्थितियों की जरूरत बताने लगें। युवा वर्ग के पाठक जब किसी किताब में गाली पढते हैं, तो तात्कालिक सवेगों के चलते वह उन्हें आकर्षित करती है, इसलिए कुछ लेखकों ने गालियों के प्रयोग को भी एक जरूरी तत्त्व मानकर अपने फॉर्मूले में घोल लिया है। सोशल मीडिया पर एक बडा वर्ग नयी वाली हिंदी के रचनाकारों और क्लासिक साहित्य के रचनाकरों की कृतियों की तुलना कर नयी वाली हिंदी की रचनाओं को क्लासिक साहित्य से कमतर ठहराता है। चार किताबें पढकर खुद को आलोचक कहने वाले इस प्रबुद्ध वर्ग को यह समझना चाहिए कि जब तक आपका क्षेत्र तुलनात्मक अध्ययन न हो, तब तक आप साहित्य में दो रचनाओं की तुलना कर के एक को साहित्य से बाहर नहीं कर सकते, क्योंकि तुलना करने पर तो सर्वश्रेष्ठ साहित्य भी किसी न किसी रचना के आगे कमतर ही ठहरेगा। नयी वाली हिंदी की रचनाओं की क्लासिक साहित्य से तुलना न कर के उन रचनाओं को साहित्य के मापदण्ड यानी भाषा, शिल्प, चरित्र चित्रण, कथ्य आदि के आधार पर तौलना चाहिए।
नई वाली हिंदी के लेखक अभी अपने लेखन के शैशवकाल में हैं, जाहिर सी बात है कि सभी लोगों की शुरूआती रचनाएँ ही एकदम उदात्त के स्तर पर नहीं होंगी अगर इन रचनाओं की साहित्यिक आलोचनाएँ लिखी जाएँ, तो ये लेखक और बेहतर हो सकते हैं, लेकिन हिंदी आलोचना जगत ने इनसे बिलकुल वैसे ही किनारा कर लिया है जैसे इन्होने लोकप्रिय साहित्य से किनारा किया हुआ है। नई वाली हिंदी को आए हुए पाँच साल हो चुके हैं और ऐसा भी नहीं है कि यह बिलकुल गुमनाम है। इस हिंदी को पढने वाले पाठकों की संख्या इतनी है कि किताब के छपने से पहले ही किताब की पाँच हजार प्रतियों की प्री-बुकिंग हो जा रही है, लेकिन हिंदी जगत के आलोचक तो गुटबंदी करके उसी को लेखक का तमगा देते हैं जो जितना अधिक उम्रदराज होगा और उन्ही की रचनाओं पर समीक्षाएँ लिखने में व्यस्त हैं। नई वाली हिंदी के लेखक साहित्यिकी आलोचना में लावारिस की तरह घूम रहे हैं और हिंदी के आलोचक अपने ही परिवार से आने वाले इन लेखकों की शिनाख्त करने से बच रहे हैं। बडे आलोचक तो इन्हें हिंदी जगत में घुसपैठिये की नजर से देखते हैं। तात्कालिक समय में हिंदी के आलोचक साहित्यिकी की हत्या पर उतर चुके हैं और संप्रेषणीयता जैसे बडे साहित्य मूल्य को नकारते हुए जो जितना असंप्रेषणीय होगा उसे उतना ही बडा लेखक मानते हैं। अगर असंप्रेषणीयता को ऐसे ही साहित्यिक मूल्य माना जाता रहा, तो साहित्य की आवाज इतनी मंद हो जाएगी कि वह लाइब्रेरियों के दरवाजे से बाहर ही नहीं जा पाएगी और हिंदी साहित्य दीमकों का भोजन बनकर रह जाएगा। वैश्वीकरण के इस युग में साहित्य को अपने संविधान में संशोधन करने की आवश्यकता है। जब जीवन जड और स्थिर नहीं है तो साहित्य के मानदण्ड क्यों स्थिर हैं?
नई वाली हिंदी लोकप्रिय साहित्य और क्लासिक साहित्य के बिलकुल बीचों-बीच खडी है अब इन लेखकों और हिंदी के आलोचकों को यह तय करना है कि इनका भविष्य लोकप्रिय साहित्य की तरह सडकों और प्लेटफॉर्म तक सीमित होकर रह जाएगा या विश्वविद्यालयों के कोर्स तक पहुँचेगा।
संदर्भ ग्रंथ
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संख्या- 63
2. पाखी पत्रिका, अप्रैल, 2015, पृष्ठ संख्या 45
3. पाखी पत्रिका, अप्रैल, 2015, पृष्ठ संख्या 48
4. पाखी पत्रिका, अप्रैल, 2015, पृष्ठ संख्या 51
5. सत्य व्यास, दिल्ली दरबार, हिन्द युग्म प्रकाशन, प्रथम संस्करण-2016, पृष्ठ संख्या-28
6. नीलोत्पल मृणाल, औघड, हिन्द युग्म प्रकाशन, प्रथम संस्करण-2019, भूमिका
7. अभिषेक सूर्यवंशी, किस्सों की सडक, सन्मति पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर, प्रथम संस्करण-2018,
पृष्ठ संख्या-54
8. सं. अभय कुमार दुबे, हिंदी-आधुनिकता एक पुनर्विचार- खंड 3, वाणी प्रकाशन, प्रथम
संस्करण-2014, पृष्ठ संख्या-583
9. दिव्य प्रकाश दुबे, मसाला चाय, हिंद युग्म प्रकाशन, प्रथम संस्करण-2014,
पृष्ठ संख्या-75
6. डॉ करुणाशंकर उपाध्याय, हिंदी का विश्व संदर्भ, राधाकृष्ण प्रकाशन, प्रथम संस्करण-
2008 पृष्ठ संख्या-66

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