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यायावरी के तीन छन्द

कृष्ण बिहारी पाठक
(संदर्भ - राजेश कुमार व्यास के यात्रावृत्त )
यह एक स्वीकृत तथ्य है कि कथेतर विधाओं में गद्य अपने संपूर्ण पराक्रम के साथ अवतरित होता है। पराक्रम की स्वीकृति एक ओर जहाँ कथेतर का विशेषक है वहीं दूसरी ओर कथेतर के लेखन की चुनौती भी है।
लेखन की इस चुनौती का सामना कथेतर विधाओं के लेखक जैसे रचना कौशल और कला दृष्टि के साथ करते हैं, वह कौशल और दृष्टि ही कृति और कृती के मूल्यांकन की आधार रेखा खींचती है।
रचना का कौशल जितना सजीव और स्वाभाविक होगा, कला की दृष्टि जितनी संपूर्ण और सम्यक होगी रचना उतनी ही सर्वांगपूर्ण सिद्ध होगी।
जीवन्त वर्णन शैली, स्वाभाविक लेखन और सम्यक कला दृष्टि के इस प्रीतिकर समन्वय और विधागत समग्रता को राजेश कुमार व्यास के यात्रा साहित्य में अनुभव किया जा सकता है। समन्वय और समग्रता यात्रा साहित्य के अनिवार्य लक्षण हैं। यात्रा साहित्य के इन विशेषकों को लक्ष्य करते हुए सुधी विद्वान रेवती रमण ने इसे परिभाषित किया है -
यात्रावृत्त ही सर्वोपरि एकमात्र साहित्य विधा है। शेष विधाएँ उसी के निमित्त भेद हैं। रचना मात्र एक मानस यात्रा है।.. पलायन और मुठभेड के समानांतर यात्रा और यात्रावृत्त बन्धन - मुक्ति के रचनात्मक उपक्रम हैं। यात्रावृत्त में लेखक किसी स्थान विशेष के भौगोलिक - सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को सर्जनात्मक अभिव्यक्ति देता है।1
राजेश कुमार व्यास के यात्रा लेखन की बडी विशेषता यह है कि, इनकी यात्राओं में अंतर्निहित गति, त्वरा, परिवर्तनशीलता, जिज्ञासा, रोचकता, रोमांच, और साहस, आदि प्रवृत्तियाँ, यात्रावृत्त की लेखन संरचना में कुछ वैचारिकता, कुछ चिंतन, कुछ किस्सागोई, कुछ सूचना, कुछ संवाद, कुछ आत्मकथ्य, कुछ आलोचना, और कुछ वर्णनात्मकता में ढलकर आतीं है। स्मृति, चेतना और सौंदर्यबोध की विमाओं का स्पर्श इनकी कृतियों में अर्थप्राण भरता है। यात्रा लेखक की इन विमाओं को रेखांकित करते हुए रेवती रमण लिखते हैं -
इसमें स्मृति और चैतन्य की मैत्री कारगर होती है।.. सभी लेखक यायावर नहीं होते न सारे घुमक्कड सर्जक। किन्तु यात्रा वृत्त वही बेहतर लिख पाते हैं जो लेखक होने के साथ यायावर भी होते हैं।.. सौंदर्य भावना यात्रावृत्त को साहित्य का दर्जा दिलाती है। 2
शारीरिक, मानसिक और शाब्दिक यायावरी की एकरस होती भूमि पर चलता पाठक इस यात्रा लोक में यात्रा के आलोक से साक्षात करता है। यात्रा में बटोरे गए अनुभवों को व्यास ने मौलिकता, सजीवता और संवेदनशीलता के साथ इस ढब से संजोकर संप्रेषित किया है कि यात्रा में लगने वाले शारीरिक, आर्थिक श्रम को बचाकर भी पाठक यात्रा का उतना ही या उससे भी अधिक आनंद अनुभव करता है जितना कि लेखक ने स्वयं स्थान - स्थान पर जाकर किया है।

व्यास के यात्रालोक की एक अन्यतम उल्लेखनीय विशेषता यह भी है कि ये यात्रा वृत्तांत केवल मनोरंजन या रोमांच की किस्सागोई पर आकर चुक नहीं जाते। यात्रा का यह समृद्ध संसार मनोरंजन से आगे बढकर प्राकृतिक संपदाओं के संरक्षण और संवर्धन की प्रस्तावना बनाता है। सांस्कृतिक परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहरों के मान, सम्मान और गौरव - गरिमा को वाणी देता है। धार्मिक आस्थाओं का आदर इसमें है, तो नकारात्मक रूढियों के निषेध का प्रबल आग्रह भी। पर्यटन से सँवरती विरासतों पर आनंद भरी दृष्टि इसके पास है, तो पर्यटन की आड में नष्ट होती परंपराओं पर क्षोभ भरी निगाहें भी।
लेखक के पास पथ में मिलने वाले हर फूल, पत्थर, नदी, पर्वत, दर-दीवार के बाहरी आवरण को भेदकर उसके अंतस में निहित सौंदर्य के साक्षात्कार की अद्भुत दृष्टि है। यात्रा से जुडी हर संज्ञा से जुडे पौराणिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, प्राकृतिक, सौंदर्यात्मक और कलात्मक सरोकारों से जैसे यह सैलानी चिर-परिचित है। परिचय की इसी प्रगाढता को वर्णन में साथ लेकर वह पाठक के समक्ष आता है।
सायास - अनायास, कभी उद्देश्य के लिए, कभी आनंद के लिए, कभी जिज्ञासावश, कभी कुतूहलवश, कभी ज्ञान के लिए, कभी संज्ञान के लिए, कभी आस्था से, कभी आत्मीयता से निभाई गई यात्राओं और उनके अविस्मरणीय पडावों को राजेश कुमार व्यास ने अपनी यात्रा संस्मरणों की तीन पुस्तकों में सहेजा है।
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, से प्रकाशित यह यात्रा त्रिवेणी लेखक और पाठक दोनों के श्रम तम को दूर करने वाली सिद्ध होती है। यायावर के पास कण-कण में बिखरे सौंदर्य को सहेजने की अद्भुत दृष्टि है।
कश्मीर से कन्याकुमारी शीर्षक पुस्तक में, मातृभूमि से आत्मीयता रखने वाले इस पथिक की, भारतभूमि की विस्तीर्ण परिधि में बिखरे कण-कण के दर्शन और स्पर्श की सात्विक लालसा है। इस संग्रह की यात्राओं में जैसे सैलानी आत्मचेतना को देश की सनातन मूल्य चेतना से एकाकार करने निकला है। मन-मस्तिष्क के श्रम-तम और क्लान्ति- भ्रान्ति को तिरोहित करती ये यात्रा स्मृतियाँ लेखक और पाठक दोनों को शीतल विश्रान्ति प्रदान करती हैं।
इस यात्रा पुस्तक को पढकर सुप्रसिद्ध यात्रावृत्तकार अमृत लाल वेगड ने एक स्थान पर लिखा है कि इस संग्रह के यात्रावृत्त मनुष्य की भाव छवियों और रूप चेतना से साक्षात्कार कराते हुए भारत की भावात्मक एकता को रेखांकित करते हैं।
उगते - छिपते सूर्य के भास्वर आलोक में संस्कृति और सरोकारों की आभा को, समय के पार झाँककर राही देखता, दिखाता है। इधर कन्याकुमारी की मूर्ति की नथ पर पडती सूर्य की पहली किरण, उधर कोणार्क में सूर्य देव की प्रतिमा में विलीन होतीं अनेक अनेक रश्मिमालिकाएँ। यहाँ धरती के स्वर्ग कश्मीर में दूर दूधिया पर्वत शिखरों पर सूरज की ढलती किरणों की मनमोहक सिंदूरी आभा, वहाँ पाण्डिचेरी में सागर से उदित सूरज में जीवन के उदय होने का अहसास -
मन में सूर्योदय के साथ जीवन की नई शुरुआत का उत्साह.. लो पौ फटी।.. अमृत बूँदें ही तो हैं सूर्य की ये रश्मियाँ।3
सिक्किम में सूर्य की ही अनेक रूप छवियों और क्रीडाओं से मुग्ध सैलानी लिखता है -
लम्बे-लम्बे पेडों से झाँकते सूरज की किरणों का सम्मोहन इस कदर मोहता है कि मन करता है यहीं कहीं बस जाएँ।.. कंचनजंघा की पहाडियाँ.. सूर्य की रजत रश्मियों से दैदीप्यमान होती पहाडियों की सुन्दरता।4
सूर्य हमारी सनातनता का अविरत गतिमान बिम्ब है। सूर्य की बहुल अर्थ भरी छवियों में लीन होता पथिक संस्कृति, परम्पराओं में लीन होता चलता है।
हिमाच्छादित पर्वत शिखरों को समाधिस्थ शिव का प्रतीक मानता हुआ मन उस शान्ति का आभास पाता है जिसकी तलाश में मानव निरन्तर लगा हुआ है -
दुनिया-जहान के विचारों की उथल-पुथल, बनावटीपन और जीने की ऊहापोह में एक-दूसरे को बनाने के दुश्चक्र का चक्रव्यूह लगता है यहाँ टूट रहा है।5
इस पुस्तक में वर्णित यात्रा संस्मरणों को पढते - पढते यह आसानी से समझा जा सकता है कि यायावर राजेश व्यास ने तमाशबीनों की तरह यूँ ही वाह-वाह करते हुए यात्रा स्थलों की चामत्कारिकता का लुभावना वैभव नहीं संजोया है। यात्रा की प्रत्येक संज्ञा को ऊपर से देखकर ही वह आगे नहीं बढता है। पथ और गंतव्य की तह में जाकर, उसके अंतस से संवाद करते हुए, कितने ही ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, पौराणिक और पारंपरिक आयामों को वह स्पर्श करता है।
लेखक की एक और विशेषता जो आकर्षित करती है, वह है यात्रा के गद्य में संरचनात्मकता का सहज विधान। यात्रा में देखी गई घटना, वस्तु या व्यक्ति की वैचारिकता से लेखक तादात्म्य बना लेता है। सरिस्का के अभय अरण्य में एक बाघिन की मुक्ति या पुनर्वास से लेखक अपने जीवन की औपचारिकताओं से मुक्ति की राह खोजता है और संसार के इस रमणीय अरण्य में अभय होने की चाह रखता है। जिस ढब से घुमक्कड यात्रा के सरोकारों से एकरस होकर स्मृतियों को संजोता है, ऐसा प्रतीत होता है वह यात्राओं के बीच से जीवन को नवीन अर्थों से भरता रहा है।
यात्रा के आनंद के बीच ही चिंता और क्षोभ की रेखाएँ तब उभरती हैं जब पर्यटन की आड में विरासत और प्रकृति के हाशियाकरण को सैलानी लक्ष्य करता है-
जैसलमेर दुर्ग की प्राचीरें निरन्तर ढहती जा रहीं है और इसके साथ ही ढहती जा रही है किले के अन्दर संजोई हमारी संस्कृति की अमूल्य धरोहरें भी।.. अन्दर के सच को छिपाए बाहर से किला फिर से अपने सौंदर्य का गान करने लगा है। मानों उसे उम्मीद है, उसके इस रूप पर रीझकर कोई उसे सँभालने की पहल करेगा!.. रेत, रेत, और रेत। बीच में खिला गुलाब। कल्पना नहीं हकीकत। मन में विचार आता है, आखिर कब तक?6
जैसलमेर की इस यात्रा को लेखक ने रेत में गुलाब नाम दिया है। कितना सजीव शीर्षक है। रेत में गुलाब जैसे होकर भी होते रहने के प्रति संशयग्रस्त रहता है, वैसे ही यह धरोहर है, छीजती हुई, बिखरती हुई। होकर भी होते रहने के लिए संशयग्रस्त।
यही चिंता वैशाली के यात्रा संस्मरण में फिर से उभरती है। सिकुडती हुई गंगा को देखकर मन बैठ जाता है। -
गंगा ही क्यों सभी नदियाँ निरंतर सूख ही तो रही हैं। यही चलता रहा तो नदियाँ भी एक दिन इतिहास हो जाएँगी।7
धर्म, संस्कृति और राजनीति की सीमाएँ कैसे एक दूसरे को काटती छूती चलतीं हैं, इसे राही ने धर्मशाला और कश्मीर की यात्राओं में जिया है। धर्मशाला में लामाओं की संस्कृति, बौद्ध धर्म का वैभव और तिब्बती शरणार्थियों के इर्द-गिर्द खिंचती भारत चीन की राजनीतिक रेखाएँ। कश्मीर में आतंक के साये में भयभीत पर्यटन, उदास प्रकृति।
लाहौल स्पीति और रोहतांग की चुनौतीपूर्ण, दुर्गम बर्फीली यात्रा में घुमक्कड अपनी यात्रा की दीठ को परिभाषित करता है -
हर यात्रा मनुष्य को भीतर से भरती है। अगर मनुष्य अपने घर में ही बैठा रहता, तो बैठा ही रहता। एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरियाँ क्या फिर कभी कम होतीं। स्थान की ही नहीं मन की दूरियों को भी पाटती है यात्रा।.. यदि व्यक्ति चले नहीं, तो उसके होने की किसी प्रकार की सार्थकता नहीं है। 8
वेदव्यास से कालिदास तक, चम्बा से वैशाली तक, केरल, पांडिचेरी और श्री नगर, अनेक स्थल, अनेक व्यक्ति, वस्तु और विचार, अनगिनत स्मृतियाँ, किस्से, किंवदंतियाँ, पुराण, इतिहास, विज्ञान, भूगोल, सबको समेटता, सहेजता यायावर का यात्रा संसार, बहुआयामी, विविधतापूर्ण दीठ। वैशाली को देखें..
विश्व का पहला बडा लोकतंत्र वैशाली। गौतम बुद्ध की रमणीय, अभिराम, आनंदप्रदा वैशाली। घुमक्कड शास्त्री राहुल सांकृत्यायन कृत सिंह सेनापति में महिमामण्डित वैशाली। विश्व बौद्ध नगरी वैशाली। शांति स्तूप की धरा वैशाली। लोकभाषा पालि से गुंजित वैशाली।
केरल को देखें। देवभूमि केरल। हरीतिमा का आश्रय केरल। गरम मसालों का कोषागार केरल। बैक वाटर्स माने सागर में मिलने की बजाय वापस लौटने वाले जल की भूमि केरल। चाय के बगान, जंगल और बियाबान। पेरियार माने विहंगम भूमि केरल। कोवलम माने नारियल के कुंजों की धरा केरल। परशुराम द्वारा प्रक्षिप्त फरसे से नापी गई, ऊर्ध्व भूमि केरल।
नर्मदे हर राजेश कुमार व्यास के यात्रावृत्तों की दूसरी पुस्तक है। पुस्तक को पढकर सबसे पहला अनुभव इस बात का होता है कि लेखक ने इन यात्राओं के माध्यम से भ्रमण की भारतीय संस्कृति को जिया है। चर- अचर, जड - चेतन से अभिन्न एकात्मकता प्रदान करती भारतीय संस्कृति, लोक और वेद के समन्वित मिठास की संस्कृति, तप और त्याग की संस्कृति, परोपकार, प्रेम और करुणा की संस्कृति, नदी- नाव संयोग की संस्कृति।
नर्मदे हर भावात्मक, विचारात्मक और संवेदनात्मक उत्कर्ष के साथ उदात्त सांस्कृतिक चेतना की कृति है, यही कारण है कि साहित्य जगत में इसका मुक्त कण्ठ स्वागत हुआ है। प्रसिद्ध साहित्यकार अमृत लाल वेगड ने लिखा है -
यात्रा वृत्तांत के बहाने व्यास व्यापक संस्कृति विमर्श करते हैं। उनकी पर्यवेक्षण शक्ति विलक्षण है।.. प्रकृति तो मानो उनकी अंतरंग मित्र है।.. मानवता का सांस्कृतिक विकास उनके समस्त लेखन की आधारशिला है।.. उनका पाण्डित्य देखते हुए मैं तो इस पुस्तक का नाम व्यास पर्व रखना चाहूँगा।9
चार हजार किलोमीटर में विस्तीर्ण, नर्मदा और उसकी सहायक नदियों की पदयात्रा करने वाले तथा नर्मदा के वैभव पर, सौंदर्य की नदी नर्मदा, अमृतस्य नर्मदा और तीरे-तीरे नर्मदा शीर्षकों से विशद, और कालजयी यात्रावृत्त लिखने वाले वेगड की इन पंक्तियों में व्यास की यायावरी समग्रता और लेखकीय प्रतिबद्धता दोनों को समझा जा सकता है।
संस्कृतिकर्मी उदयन वाजपेयी ने नर्मदे हर की यात्राओं को एक सच्चे यात्री की अनुभव गाथा कहते हुए लिखा है -
यह संग्रह किसी सैलानी की आँख से देखे गए स्थानों का विवरण न होकर एक जिज्ञासु व्यक्ति का विभिन्न स्थानों पर जाकर वहाँ जमे हुए समय को अपने भीतर बहाने का प्रयास जान पडता है।10
नर्मदे हर में कुल इकत्तीस यात्रा वृतांत हैं जिन्हें लेखक ने दो खण्डों में सहेजा है। प्रथम खंड में भारतभूमि के अनेक स्थलों से जुडे बीस यात्रा वृत्त हैं जिनमें लेखक ने उन स्थानों से जुडी संस्कृति, परिवेश, अध्यात्म और इतिहास को अंतर्मन की संवेदनाओं से एकरस करते हुए सहेजा है। लोक विश्वास और मान्यताओं को, दर्शन, पुराण और आख्यानों को गद्य के वैभव के साथ सरस अभिव्यक्ति दी है।
खजुराहो के वैभव से साक्षात्कार करता सैलानी काम मूर्तियों में पैठे कला के सर्वांग को देखता है। केवल काम नहीं, काम के स्थूल आवरण के भीतर धर्म, अर्थ और मोक्ष के चारों पुरुषार्थों की चार विमाएँ -
खजुराहो में मंदिरों पर उत्कीर्ण मूर्तियाँ जगत- वस्तुस्वरूप नहीं, आत्मवस्तुस्वरूप हैं। पाषाणों में जैसे यहाँ व्यष्टि और समष्टि को जोडने वाली संधि रेखा खींची गई है।11
खजुराहो देह का गान है, दृश्यभरा संगीत है। यही दृश्य भरा संगीत केन नदी के कलकल पारदर्शी निनाद में सुनाई पडता है और साथ में है जल स्रोतों की स्वच्छता के प्रति आनंद भरी दृष्टि -
गौर करता हूँ, चट्टानों में जमा पानी इस कदर साफ है कि उसमें आप अपनी छवि तक को देख सकते हैं।12
यात्रा के मार्ग की छोटी-छोटी, किंतु महत्त्वपूर्ण घटनाओं पर अर्थभरी दृष्टि से इस यात्रावृत्त को लेखक ने संग्रहणीय बना दिया है।
जटाशंकर के मार्ग में कैसे खेतिहर किसानों ने खेतों की रक्षा के लिए जंगली सुअरों के गले में बाँस के त्रिकोण ब्रेकर बना रखे हैं। कैसे भोरमदेव में निरंतर पूजित शिव शोभायमान हैं। कैसे तानसेन की तान और श्रुतियों का अक्षयकोष ग्वालियर में अविरत गुंजायमान है। कुशीनगर, गोरखपुर, काशी, भानगढ, उज्जैन, हरिद्वार और अयोध्या से जुडी अनगिनत विमाओं को हृदय में रचाता बसाता लेखक सच्चा यात्री है।
एक ओर त्रिपुरसुंदरी के नाम से सुरभित त्रिपुरा में अध्यात्म की बहार तो दूसरी ओर अलग अलग स्थानों पर दादू, तुलसी, कबीर, गोरखनाथ और मीरां की स्मृतियों में गुनी-बुनी भक्ति की रसधार में सैलानी ओतप्रोत है।
दूसरे खण्ड में नर्मदा नदी से जुडे हुए एकादश स्मृति छंद हैं। शिव के स्वेद से उत्पन्न नर्मदा। शिवजा, शंकरा नर्मदा। नर्मदे हर के अभिवादन से ध्वनित - प्रतिध्वनित नर्मदा। शंकराचार्य कृत नर्मदाष्टकम से अर्चित नर्मदा। चाँद की रोशनी में कलछल करती नर्मदा। सूर्य की रोशनी में चमचम चमकती नर्मदा। पापनाशिनी नर्मदा, धुरप्रलय के बीच भी अक्षय अमोघ नर्मदा। दुग्धधार नर्मदा। पथ के कंकर - कंकर को शंकर बनाती वरदा, शुभदा, प्रमदा नर्मदा।
नर्मदा और शिव के दर्शन की चाह में अमरकण्टक की राह बनाता राही। अमरकण्टक.. नर्मदा का उद्गम स्थल.. सर्वतीर्थनायकम्।
नर्मदा विश्व की अकेली नदी जिसकी पदयात्रा का विधान है। नर्मदा से जुडी कथा, किंवदंतियों में भारतीयता और संस्कृति की अक्षय कीर्ति को सैलानी वैचारिकता के चश्मे से पढता है -
राम ने ही कहा कि नर्मदा के कंकड, सब शिव- शंकर।.. यह कथा भले मिथक है.. पर नदी संस्कृति का दिग्दर्शन इसमें है। एक तरह से ज्ञानानुभव की खरी, ओजस्वी और प्रामाणिक मंजुषाएँ हैं नर्मदा से जुडी यह कथाएँ।13
यायावर लेखक ने ऊपर जिस नदी संस्कृति की बात की है वह आज के समय की सर्वोच्च प्राथमिकता है। प्रकृति और प्राकृतिक स्रोतों से एकात्मकता, अभिन्नता और श्रद्धा भाव विकसित करने वाली भारतीय तीर्थाटन मिश्रित पर्यटन की संस्कृति ही प्रकृति,और विश्व को बचा सकती है। प्रकृति और संस्कृति बची रहेंगी तो मानव और मानवता के बचे रहने की आशा रहेगी।
राजेश व्यास का यात्रा भव मानव, प्रकृति और समाज से अलग-थलग कोई यूटोपिया नहीं है। वह जीवन और जगत से बेपरवाह नहीं है। व्यास की इसी संबद्धता को मनोज वार्ष्णेय ने लक्ष्य किया है -
नर्मदे हर.. सिर्फ यायावरी की गवाही ही नहीं देती, वह समाज में क्या चल रहा है, इसके सफे भी खोलती है।.. किसानों की पूरी जिंदगी का खाका इसमें आ मिला है। घूमते फिरते किसी स्थान की दुनिया दिखा देना और सामाजिक परिस्थितियों को बताना ही असली घुमक्कडी है। इसमें राजेश पारंगत है और नर्मदे हर इसकी प्रत्यक्ष गवाह।14
सद्य प्रकाशित पुस्तक आँख भर उमंग में राजेश कुमार व्यास ने यात्रा की संस्कृति को आत्मा के सौंदर्यबोध और मस्तिष्क की वैचारिकता की समन्वित दृष्टि प्रदान की है। दृष्टि के इस उल्लसित वैभव को वे शब्दों में बहुत सजगता और सजीवता से उतारते हैं। व्यास के गद्य की सुगंध से मुग्ध होकर ही साहित्यकार दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने ये पंक्तियाँ लिखीं हैं -
वे जो लिखतें हैं वह उस स्थान का मात्र पर्यटकीय वर्णन न होकर, उस स्थान से उनके भीतर उत्पन्न होने वाली काव्यात्मक और कुछ-कुछ आध्यात्मिक अनुभूतियों की सरस अभिव्यक्ति होती है। व्यास ने अपने गद्य को भी एक भिन्न साँचे में ढाला है, और उनके गद्य का अनूठापन उनके वृत्तांतों को और अधिक आकर्षक बनाता है।15
यात्रा के प्राथमिक और स्थूल उद्देश्यों से आगे जाकर धरोहर, संस्कृति, प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण, और संवर्धन को लेकर पथिक गंभीर वैचारिकता की राह तैयार करता है। पर्यटन की आड में छिपे अर्थतंत्र और परंपराओं में छिपे आडम्बरों को देख वह चुप नहीं रह जाता, यात्रा की स्वस्थ और स्वच्छ संस्कृति के लिए वह वातावरण बनाता चलता है।
बढते - चढते भौतिकवाद और अर्थोन्माद में दबी पडी, सुप्त या मृतप्राय, सुरुचि की सुकुमार भावनाओं को, यायावर प्रत्येक यात्रा संज्ञा के आंतरिक सौंदर्य के स्पर्श से सहलाकर जगाना जानता है, जगाना चाहता है ।
गुलमर्ग, पहलगाम और सोनमर्ग की हिमराशि में प्रकृति की स्निग्ध शीतलता और राजस्थान में मरुथल की रेत की तपन में आत्मीयता की गर्माहट का स्पर्श, तन पर ही नहीं मन पर भी छाया है।
यात्रा की पहली जिल्द कश्मीर से कन्याकुमारी में जहाँ राही ने सूर्य से जुडे बिम्बों की दृश्यमाला सहेजी है वहीं आँख भर उमंग में जल से जुडे बिम्बों का भव है। इस दृष्टि से इसे जल संस्कृति का यात्रावृत्त भी कह सकते हैं। नर्मदे हर इन दोनों कृतियों के बीचोंबीच है, कुछ सूरज से चमकती, कुछ जल से निखरती।
जल तथा जल स्रोतों में आप्लावित सौंदर्य पर मुग्धता, प्रसारित - विस्तीर्ण उर्वरता का आदर, पालित-पोषित हरीतिमा के प्रति कृतज्ञता , जल स्रोतों के संरक्षण - संवर्धन की चिंताएँ, प्रदूषण पर क्षोभ, मानव की स्वार्थवृत्ति पर अमर्ष और इन सब भाव-अभावों के केंद्र में सृष्टि का अमृत.. जल। जीवन का पर्याय.. जल।
चैडविक फाल के यात्रा संस्मरण में चीड, देवदार के वृक्षों के बीच, झरने के पास, चट्टान पर बैठा सैलानी इस मेघराग की गूँज सुनता है -
मन ने कहा, कितना अच्छा होता, बरखा होती और झरना वेग से बहता! हरियाली के जंगल में पहाड की ऊँचाई से आता पानी दूधिया होता झरना बनता तो जंगल का मौन भी यहाँ जैसे प्रकृति का मधुर राग बन जाता। जी भर तब प्रकृति की उस रम्य छटा को गुनता!16
शिमला की बर्फीली वादियों में सहेजे हुए गंधक, एवं अन्य औषधीय वनस्पतियों से समृद्ध तत्तापानी की ऊष्मिल आत्मीयता से स्नात लेखक जब इस स्मृति को लिपिबद्ध करता है, तो पृष्ठ के अक्षरों में इन प्राकृतिक संन्निधियों की उदार, स्नेहिल, आत्मीयतापूर्ण गरमाहट का अनुभव एक सामाजिक भी करता है। पर्वत, पाषाणों पर गिरती वर्षा की बूँदों में, पुलिन से टकराती झील और नदियों की लहरों में उसे प्रकृति का अनहद नाद निनादित होता सुनाई पडता है।
आँखों में विधाता की कूची से बने जलबिम्बों की अनेक रूप छवियाँ उमंग भर देती हैं। उमंग का अतिशय आनंद कलम से उतरता है स्मृति का छन्द बनकर -
बरखा के पानी को जैसे धरित्री ने.. छोटी सी अंजुरि में.. समेट लिया है।.. बूँदें ताल में.. बूँदों से मिल जैसे हिलमिल उत्सव मना रहीं थीं।.. झमाझम बरसता पानी धुंध रच रहा है।17
धरती की अंजुरि में सिमटता जल, बूँद और जलराशि का मिलनोत्सव, धुंध रचता पानी प्रकृति के कितने मनोहारी दृश्य उत्सव हैं। इन्हें देखने, दिखाने के लिए हृदय की आँखें चाहिए। इन यात्रा संस्मरणों का रचयिता ऐसा ही भावुक प्रकृति प्रेमी है।
जिनकी आँखों को स्वार्थी महत्त्वाकांक्षाओं ने संकुचित कर दिया है, उन्हें प्रकृति की यह सुकुमारता दिखाई नहीं पडती।
प्रतिदान की किसी भी आशा और अपेक्षा से विमुक्त अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाली प्रकृति और पर्यावरण के प्रति, अपने कर्तव्य बोध और कृतज्ञता बोध से शून्य मानव समुदाय के सामने यायावर ने यात्रा के ऐसे प्रसंग उपस्थित किए हैं जिन्हें पढकर पाठक के हृदय में कुछ हिल्लोल अवश्य होगा।
करणी माता की ओरण भूमि का हृदय स्पर्शी वर्णन हृदयहीन लोगों की संवेदनाओं को न केवल जगाता है, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण की के संरक्षण के प्रति तत्परता का संकल्प भी बनाता है -
यह करणी माता की ओरण (देवस्थान) भूमि है।.. ओरण भूमि से कभी पेड नहीं कटते।.. राजा के कारिन्दे पेड काटने की कुल्हाडी लिए खडे हैं।.. अमृता देवी पेडों से लिपट गई है। कुछ भी हो जाए, पेड नहीं कटने दूँगी।.. एक के बाद एक लोग पेडों से लिपटते रहे और सिर कटते रहे।.. आखिर राजा को झुकना पडा। पेड काटने की प्रथा बंद करनी पडी। 18
प्रकृति के प्रति आदर, कृतज्ञता, और आत्मदान का यह अभूतपूर्व दृष्टांत है। ग्लोबल वार्मिंग, सेव अर्थ, के नारे लगाने वाले विश्व समुदाय को भारत भूमि की ऐसी उदात्त सांस्कृतिक परंपराओं के अनुकरण की आवश्यकता है।
घुमक्कड लेखक राजेश व्यास का भारतबोध इन यात्रावृत्तों में भारतीय सभ्यता, संस्कृति, और ज्ञान परम्पराओं के कितने ही अनकहे, अनदेखे, अनसुने प्रसंगों को उभारता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि लेखक की ये यात्राएँ भारतीय अस्मिता के पुनरुत्थान और पुर्नस्थापना की संकल्प यात्राएँ हैं।
सदानीरा, देवपगा, वर्षपयस्विनी, शुभप्रदा, शिवप्रदा गंगा और उससे जुडी भारतीय मनीषा की अभिन्न एकात्मकता की सरस अभिव्यंजना में सैलानी लिखता है-
उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ..अमेरिका के एक संस्थान ने उनकी शहनाई के माधुर्य को अपना बनाने, अपने यहाँ ही बसने का आग्रह किया था।.. उनसे कहा गया, ऐसे के ऐसे (काशी जैसे ) घाट.. अमेरिका में बनवा दिए जाएँगे। शहनाई के शहंशाह का जवाब था, आप घाट तो बना देंगे, पर गंगा और बाबा विश्वनाथ को कहाँ से लाएँगे?19
भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर मान, अभिमान करने के कितने ही अवसर ये यात्राएँ देती हैं। चम्बल के बीहडों के बीच मितावली की यात्रा में इकोत्तरसा के महादेव मंदिर को देखता, दिखाता यायावर सप्रमाण यह सिद्ध करता है कि इसी मंदिर के वास्तु शिल्प के अनुकरण से हर्बट बेकर और लुटियंस ने भारत के संसद भवन को मूर्त रूप दिया था।
पश्चिम की अंधभक्ति करते हुए उसका महिमामण्डन करने वाले, सारे ज्ञान विज्ञान का अग्रदूत पश्चिम को मानने वाले, लोगों की आँखें खोलने वाले ऐसे कितने ही प्रसंगों से यह कृति भरी पडी है।
विश्व मानव जब गति में लडखडाहट और वाणी में तुतलाहट लिए भौचक्का था, भारतीय मनीषा ने प्रकृति की अमूल्य निधियों जल आदि के संरक्षण, संवर्धन की परम्पराओं को स्थापित किया, विकसित किया और विश्व के सामने आदर्श प्रतिष्ठित किया।

भीमताल के सौंदर्य से अभिभूत राही को तालों के निर्माण और संरक्षण की संपूर्ण गाथाएँ याद आती हैं। अनुपम मिश्र की पुस्तक, आज भी खरे हैं तालाब में लिखा याद आता है -
सैंकडों, हजारों तालाब अचानक शून्य से प्रकट नहीं हुए थे। इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की, तो दहाई थी बनाने वालों की। यह इकाई, दहाई मिलकर सैंकडा, हजार बनती थी। मन ने कहा, इस तरह के ताल बनाने वाले अनाम हैं। पर चेतना सदा आस्था का दामन थामती है। 20
नाहरगढ में प्राकृतिक जल के संरक्षण की अद्भुत तकनीक से आकर्षित होकर यात्री लिखता है -
जल संग्रहण की भी यहाँ गजब व्यवस्था है। पता चला, वर्षा के दौरान पहाडियों में निर्मित नालियों से बहता जल नालियों के मध्य बनी छोटी-छोटी हौदियों से शुद्ध होता बावडियों में एकत्र होता है। लहरदार सीढियाँ.. अद्भुत स्थापत्य की बावडी।21
बादलों से गिरती बूँद - बूँद से भरते धरती के अमृत कोषों पर राही की प्रीत भरी दीठ जाती है, इसीलिए यह बहुत सांयोगिक नहीं है कि वह अपनी यात्रा की प्रथम स्मृति का शीर्षक रखता है - सिमिटि - सिमिटि जल भरहिं तलावा।
बाबा तुलसीदास कृत रामचरितमानस के किष्किं-धाकाण्ड की यह पंक्ति इस संपूर्ण पुस्तक के साथ यात्रा की संस्कृति और यात्रा के व्यक्तित्व का चित्र भी खींचती है। जैसे अमृत रूपी जल सिमट सिमट कर ताल-तालाबों में एकत्र होता जाता है, वैसे ही सज्जन पुरुष में सद्गुण निष्प्रयास ही एकत्र होते जाते हैं। लेखक राजेश व्यास ने अपने प्रत्येक गंतव्य में इस सौजन्य को सहेजा है।
किसी स्थान विशेष के संदर्भ में कैसे सिमट सिमट कर ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, पौराणिक, आध्यात्मिक, लौकिक, और प्राकृतिक परिप्रेक्ष्य लेखक के स्मृति कोष में भरते जाते हैं। स्मृति का यह अक्षय कोष ही युगपत रूप से लेखक और पाठक की आँखों में उमंग भरता है।
अमृता देवी ही नहीं, कितने ही नामवर, गुमनाम हाथों ने प्रकृति और उसकी सम्पदाओं के महत्त्व को समझते हुए उसके प्रति कृतज्ञ होते हुए उसके संवरण की मुहिम चलाई होगी। लेखक उन सबके प्रति अगाध श्रद्धा से भर जाता है। वहीं दूसरी ओर स्वार्थी मानव के हाथों विपद में पडी विरासत और नष्ट होती प्रकृति को देखकर राही करुणार्द* हो उठता है। भीमताल, शिमला, काशी और घोडा कटोरा के प्रसंगों में यह क्षोभ मुखरित होता है-
ऐसे ही होता रहा तो इतने सुन्दर ताल कभी क्या अतीत नहीं हो जाएँगे।22
दूषित होती वायु, गंदली होती नदियों, कटते हुए पेडों, भग्न होते शिल्पों और नष्ट होती संस्कृति से क्षुब्ध लेखक की वाणी में वेदना से कवित्वपूर्णता आ गई है। कहीं वह इन संज्ञाओं और स्थलों को सहेजने, सँवारने की रीतियाँ देखता है, तो रोम-रोम से आशीर्वाद देता है। धुंआँ छोडते वाहनों का प्रवेश निषेध देख वह हर्ष विभोर आश्वासन से कह उठता है कि- सुखद यह है कि यहाँ प्रदूषण करने वाले वाहन नहीं आ सकते।
तीर्थ स्थानों की यात्रा में घुमक्कड ने तीर्थ मनोविज्ञान में निहित प्रकृतिवाद और मानवतावाद को रेखांकित किया है। लेखक के माने धर्म और तीर्थ की परिभाषा के मूल में सदाचार और मूल्य दृष्टि है। ज्ञान, आनंद और कल्याण का निलय होते हैं तीर्थ। चित्त की उदात्तता के पोषक और प्रवर्तक हैं तीर्थ।
आँख भर उमंग में गौतम बुद्ध से जोडने वाले एकाधिक यात्रा संस्मरण हैं जिनमें बुद्धत्व की सूक्ष्म व्याख्या के साथ - साथ लेखक ने अपने आत्म का भी संधान किया है। ये यात्राएँ जितना बाहर घुमाती हैं उतना ही स्व की खोज भी करवाती हैं।
बुद्ध व्यक्ति नहीं जीवन दर्शन है। बुद्ध माने वह जिसे संबोधि प्राप्त हो गई है, वह जो भी कहता है, अपने अनुभव से प्रेरित होकर कहता है।23
बुद्ध के साथ - साथ शिव से जुडे स्थलों से भी लेखक का कुछ अधिक मोह है। शिव के संप्रत्यय को लेखक ने जाति, धर्म की संकीर्णता से ऊपर उठकर ध्यान और परमार्थ की विमाओं से जोडा है। शिव के परमार्थी व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धावनत पथिक जहाँ कहीं शिवलिंग पाता है, अभिषेक के लिए चंचल हो उठता है। नर्मदे हर में वर्णित मोरली, बाणलिंग तथा अमरेश्वर के यात्रा संस्मरण हो, या आँख भर उमंग में निहित ओंकारेश्वर की यात्रा। नर्मदे हर की यात्राओं में व्यास की शिव भक्ति को पत्रकार ज्ञानेश उपाध्याय ने मुग्ध होकर रेखांकित किया है -
नर्मदे हर, यात्रा वृत्तांत नाम की जो यह पुस्तक है, उसके भी देवता हैं महादेव शिव। कई बार तो ऐसा लगता है कि शिव को खोजते हुए ही यह पुस्तक लिखी गई है। सदैव शिव सूचना को आकुल राजेश व्यास को कोई भी बता देता है, तो अल्पज्ञात स्थान पर वे शिव को खोजते हुए पहुँच जाते हैं।.. भारतीय परम्परा में थोडी थोडी दूर पर शिव की उपस्थिति है, वे संस्कृति के सबसे सहज देवता हैं, आध्यात्मिक हैं तो बहुत कलात्मक भी, बहुत शक्तिशाली हैं तो, बहुत भोले और दयावान भी हैं।.. जहाँ कहीं भी वे शिव को खोज निकालते हैं.. खुशी दोहरी हो जाती है। 24
पूर्वजों और परंपराओं के प्रति आदर, श्रद्धा और कृतज्ञता से भरकर लेखक ने यात्रा के उन स्थलों को जिया है जो ऐसी स्मृतियों से परिपूर्ण हैं। गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की हवेली, शांति निकेतन या महादेवी वर्मा से जुडे मल्ला रामगढ और गाँधीजी से जुडे आगा खाँ स्मारक की यात्रा स्मृतियाँ अमिट छाप छोडती हैं।
जिन खोजा तिन पाईया, की तुक पर यह घुमक्कड कहीं से छूँछे हाथ नहीं लौटता है। उसकी यात्रा का संसार व्यापक और समृद्ध है। नदी, तालाब, झीलें, हैं। किले, महल, खण्डहर, हैं। मेले और त्योहार हैं। लोक जीवन और परंपराएँ हैं। संग्रहालय और संस्थान है। अवतार, महापुरुष और लोक देवी-देवता हैं। गाथा और इतिहास हैं।
रोमांच, साहस, कुतूहल, आस्था, आत्मगौरव, श्रम, रोचकता, जिज्ञासा और सौंदर्य से समृद्ध इस अद्भुत यात्रालोक में लेखक का सहयात्री बना पाठक सबकुछ भूल कर लेखक के साथ रम जाता है। अनगिनत भाव, रूप छवियों विचरण करता पाठक अपलक पढता जाता है, पढता जाता है।
हर यात्रा से वह लेकर आता है देखे - अदेखे, कहे - अनकहे यथार्थ, इतिहास के, पुराणों के प्रसंग, लोक और वेद में प्रचलित गाथाएँ, जिन्हें सुनकर, पढकर कोई भी पाठक यात्रा का शत-प्रतिशत आनंद लेता जाता है।
लेखक के पास एक कला दृष्टि है जिसके चलते वह यात्रा स्मृतियों को अद्भुत लालित्य के साथ वर्णित करता है। चितेरे के चित्रों को, शिल्पकार के स्थापत्य को, कलावन्त के संगीत को, मूर्तिकार की मूरत को और कविपुंगव विधाता की कविता को वह अपनी इन्द्रियों से आत्मसात करता है।
पाठक को अपने लिखे से यात्राओं का सहवर्ती बनाने का अद्भुत, और सजीव लेखन कौशल राजेश कुमार व्यास को मौलिक यात्रावृत्त लेखक सिद्ध करता है। राजेश कुमार व्यास की यात्रा साहित्य संबंधी ये तीनों पुस्तकें, हिंदी के यात्रा साहित्य को निस्संदेह नई ऊँचाई प्रदान करतीं हैं।
संदर्भ -
1. रेवती रमण, हिन्दी यात्रा वृत्त का विकास, संपादक-
मिश्रा, दयानिधि, मिश्रा उदयन, उदय प्रकाश, हिन्दी
का कथेतर गद्य परंपरा और प्रयोग, वाणी प्रकाशन,
नयी दिल्ली, 2020 ई, पृष्ठ 37
2. पूर्वोक्त
3. व्यास,डॉ राजेश कुमार, कश्मीर से कन्याकुमारी,
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, 2021 ई. पृष्ठ 90
4. पूर्वोक्त, पृष्ठ 13से 15
5. पूर्वोक्त, पृष्ठ 16
6. पूर्वोक्त, पृष्ठ 36 से 38
7. पूर्वोक्त, पृष्ठ 72
8. पूर्वोक्त, पृष्ठ 49,50
9. वेगड, अमृतलाल, डॉ.राजेश कुमार व्यास का
यात्रा संस्मरण व्यास पर्व नर्मदे हर, पोथी परख
(स्तंभ) दैनिक युगपक्ष, बीकानेर, 11 अक्टूबर 2018
10. वाजपेयी, उदयन, सच्चे यात्री की अनुभव गाथा,
पुस्तक समीक्षा (स्तंभ), रसरंग-दैनिक भास्कर
11. व्यास, डॉ राजेश कुमार, नर्मदे हर, राष्ट्रीय पुस्तक
न्यास, 2021 ई, पृष्ठ 6
12. पूर्वोक्त, पृष्ठ 15
13. पूर्वोक्त, पृष्ठ 107
14. वार्ष्णेय मनोज, प्रकृति में क्षण- क्षण जीवन की
तलाश, मेरी बुक शेल्फ (स्तंभ ), दैनिक नवज्योति,
16 दिसंबर 2018 ई.
15. अग्रवाल, दुर्गाप्रसाद,कथेतर का वैभव, बनास जन,
अंक 32

16. व्यास, डॉ राजेश कुमार, आँख भर उमंग, राष्ट्रीय
पुस्तक न्यास, 2021 ई. पृष्ठ 91
17. पूर्वोक्त, पृष्ठ 5
18. पूर्वोक्त, पृष्ठ 135,136
19. पूर्वोक्त, पृष्ठ 45
20. पूर्वोक्त, पृष्ठ 6
21. पूर्वोक्त, पृष्ठ 167
22. पूर्वोक्त, पृष्ठ 7
23. पूर्वोक्त, पृष्ठ 26
24. उपाध्याय, ज्ञानेश, संस्कृति और प्रकृति गाथा सुनातीं
यात्राएँ, पुस्तक वार्ता, मई-दिसंबर 2019,पृष्ठ 41,
42

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