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राजस्थान का भरत

महेन्द्र लालस
खुद की प्रतिभा और मेहनत के साथ विश्वास की गठरी काँधे पर लिए भरत व्यास माया नगरी मुम्बई तक की यात्रा एक सृजनात्मक रोमांच की यात्रा है। यात्रा की यह यशोगाथा हमारी अखूँट प्रेरणा का आधार है।
1943 की सबसे सफल फिल्मों में से एक दुहाई के जरिये उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा। सर्वश्रेष्ठ बाँसुरी वादकों में से एक पण्डित पन्नालाल घोष ने इसमें भरत व्यास के गीतों की धुनें बनाईं, यहीं स्पष्ट हो जाता कि भरत व्यास को शब्दों के साथ संगीत , खासतौर पर शास्त्रीय संगीत की गहरी समझ थी, फिल्म घर की ही थी, मगर फिल्म भी चली और गाने भी।
नौ गीत इसमें थे जिनमें बडे बेवफा हैं मर्द, इनपे भूल है मरना और मत छेडो हमें गिरधारी लोगों की जबान पर चढ गए। भरत व्यास को अब लोग उनके हुनर से जानने लगे।
संगीतकार एस के पाल और भरत व्यास की लय ताल मिल गयी। इसी साल स्कूल मास्टर में उन्होंने पाल के लिए एक गीत लिखा फिर प्रेम संगीत में एक गीत में खुद की आवाज भी दी। पाल के साथ उनकी जोडी बनी रही मन की जीत (1944) का मशहूर गीत ऐ चाँद न इतराना, छिप छिप कर मत देखो रेडियो के जरिये खूब लोकप्रिय हुए। गुलामी (1945) के पाँच गीत व्यास ने लिखे,1946 की फिल्म पृथ्वीराज संयुक्ता में व्यास ने गीत भी लिखे और खुद पर्दे पर भी नजर आए। पृथ्वीराज कपूर ही इसमें पृथ्वीराज बने थे।
यहीं से भारतीय फिल्मों को भरत व्यास की सबसे बडी देन की बिस्मिल्लाह हुई। ये थी गाथाएँ। फिल्म में गीत के रूप में गाथा का चलना । बाद में इसके कई नायाब नमूने भरत व्यास ने पेश किए, सम्पूर्ण रामायण में निरंतर चलतीं चौपाईयाँ। दर्शक उन्हें तुलसी की ही समझते रहे, लेकिन थीं वे इस अनूठे लेखक की लिखीं। जय चित्तौड तो भरत व्यास के मन से जुडी थी, इसमें प्रताप की गाथा, ये संग्राम अनोखा था के रूप में पूरी फिल्म में पिरोई गई ।
आजादी मिलने वाले साल में मीरां बाई आयी। ये सुब्बुलक्ष्मी वाली मीराँ से अलग थी। प्रताप के साथ राजस्थान की इस भूली बिसरी नायिका को भी अपनी आवाज बनने के लिए शायद भरत व्यास की प्रतीक्षा थी।
1948 में एस राजेश्वर राव की धुनों पर अनजाना के लिए व्यास ने दो गीत लिखे और इसी फिल्म में पंडित इंद्र का लिखा एक गीत गाया भी।
राजस्थान शायद हर वक्त उनके जेहन में रहता। इसी सपने को पूरा करने 1949 में उन्होंने खुद एक फिल्म बनाई रंगीला राजस्थान। आजाद भारत में इस अनूठी धरती की शायद यह पहली फिल्मी पहचान थी। इसके गीत भी उन्होंने लिखे, और दो गीतों की धुन भी खुद ने बनाई। बाकी गीतों का संगीत एस.के. पाल और बी.एस.कल्ला ने दिया। आवाजें थीं राजकुमारी, सितारा कानपुरी (जो पहले ताराबाई नाम से जानीं जातीं थीं) और स्नेहल भाटकर कीं।
राजस्थान प्रेम की इसी श्रृंखला में खेमचंद प्रकाश भरत व्यास के सम्पर्क में आए। इनकी पहचान तो पहल के जरिये बन चुकी थी। लेकिन व्यास को अपने इलाके का एक जादुई संगीतकार मिल गया था। दोनों ने कुछ अमर गीत बनाए। 1949 की रिमझिम और सावन आया रे इसके नायाब नमूने। प्रकाश असमय चले गए और तमाशा के कुछ गीत फिर उनके निधन के बाद मन्ना डे ने कंपोज किए। किशोर कुमार ने शायद भरत व्यास के लिखे सबसे कम गीत गाए, लेकिन तमाशा का उनका गीत खाली पीली काहे को अख्खा दिन बहुत चला।
फिल्म संगीत में गजलों की जगह मुकम्मल करने वाले मदन मोहन ने आँखें से शुरुआत की और वे व्यास के मुरीद हो गए। धुन के लिए भी व्यास ने ही गीत लिखे। संगीतकार अनु मलिक के पिता सरदार मलिक शायद व्यास के सबसे बडे कर्जदारों में से एक रहें। सारँगा के गीत सारँगा तेरी याद में ने उन्हें अमर कर दिया।
लेकिन राजस्थान बिना भरत व्यास कहाँ और भरत व्यास बिना राजस्थान कहाँ ? राजस्थानी लोक संगीत की परंपरा के अनूठे संवाहक पंडित शिवराम अब व्यास से जुडे। फिल्मों और उनके सुरीले गीतों की झडी लग गयी। ऊँची हवेली, नया कदम, श्रवण कुमार, सती अनसूया, कण कण में भगवान, महासती बेहुला, सती रेणुका जैसी मिथक फिल्मों में खूब सुन्दर गीत बने। इन्हीं के साथ सम्राट चंद्रगुप्त में 1952 में कल्याण जी वीरजी शाह (कल्याणजी आनंदजी वाले कल्याण जी) भरत व्यास के सम्पर्क में आए। इस फिल्म का भर भर आएं अँखियाँ और बेदर्द जमाना क्या जाने का लता रफी का गाया गीत क्यों मिले हम तुम बेहद लोकप्रिय हुए।
हेमन्त दा, रोशन, एस.एन.त्रिपाठी, सतीश भाटिया, वसन्त देसाई, अनिल बिश्वास, सी.रामचन्द्र, चित्रगुप्त, अविनाश व्यास, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, ऊषा खन्ना, सुधीर फडके जैसे अनेक संगीतकारों के लिए भरत व्यास ने गीत कलमबद्ध किए। कुछ चले कुछ नहीं चले लेकिन संगीतकारों को व्यास के गीत प्रिय थे। इसकी कई वजहें थीं। पहली ये कि व्यास मीटर के बडे पक्के थे। धुन बनाना *यादा मुश्किल नहीं। दूसरा वे शब्दों का वजन जानते थे। एकदम नपा तुला लिखना, अच्छा लिखना, लय ताल में लिखना। इसीलिए व्यास का लिखा कोई भी गीत फालतू नहीं गया न उसमें *यादा रद्दोबदल हुए ।
ओ पवन वेग से उडने वाले घोडे, ओ निर्दयी प्रीतम, जोत से जोत, तुम गगन के चन्द्रमा, आधा है चन्द्रमा, तेरे सुर और मेरे गीत, आ लौट के आजा, ऐ मालिक तेरे बन्दे हम, कुहू कुहू बोले कोयलिया, क्यों मिले हम तुम, बढे चलो बढे चलो,जरा सामने तो आओ छलिये जैसे अमर गीत राजस्थान का ये विनम्र शब्द सेवक लिख गया।
उनकी भक्ति रचनाएँ, तो अमर हो गईं। ऐ मालिक तेरे बंदे हम तो हम सबने स्कूल की प्रार्थना में गाई, कितनों को पता ये मारवाड में जाए जन्मे भरत व्यास लिख गए। और तो और पाकिस्तान के स्कूलों में भी ये गाई जाती। जोत से जोत के शब्दों ने असंख्य लोगों के भीतर के प्रेम और अध्यात्म को जगाया?
लेकिन भरत व्यास की प्रतिभा अनूठी थी। रॉक एंड रोल भी वे लिख गए, झूमो-झूमो रे (1959 की फिल्म फैशनेबुल वाइफ में गीता दत्त और महेंद्र कपूर का गाया गीत सुनिये। नारी सशक्तीकरण का जिक्र हो, तो इसी फिल्म का गीत बदल रही जमीन सुनिये।
महानायकों को अमर करने का एक बहुत बडा काम भी व्यास की देन। हमारे देवी देवताओं के अलावा, महाराणा प्रताप, मीरा, संत ज्ञानेश्वर, सती सावित्री, श्रवण कुमार, पृथ्वीराज, अमर सिंह राठौड, रूपमती, बाज बहादुर, बाबा रामदेव जैसे कितने किरदारों को उन्होंने शब्दो के जरिए अमर किया।
प्रदीप के सम्पर्क में आकर उन्होंने शुद्ध हिंदी के शब्दों को गीतों में डाला, लेकिन कितने संस्कृत के शब्द भी वे गीतों में पिरो गए। और राजस्थान तो जाने अनजाने आ ही जाता था। प्रदीप जहाँ अपने गीतों में मालवा ले आते थे, भरत व्यास राजस्थान ले आते थे। म्हारे मन रे तंदुरे, कानूडे थारी बाट जैसे लफ्ज चुपचाप उनके गीतों में आ जाते।
शब्दों में ओज, माधुर्य, तुक, लालित्य, अध्यात्म, सरलता सहज ही आ जाती थी। और फिर प्रकृति, धोरा धरती के बाशिंदे से ये कैसे छूटती। फिल्मों में लिखे अगर श्रेष्ठ गीत चुने जाएँ, तो ये कौन चित्रकार है को कौन पीछे छोड सकता। शब्द देखें ये किस कवि की कल्पना का चमत्कार है? परमात्मा और प्रकृति के मेल का इतना सुंदर निरूपण शायद भरत व्यास ही इतनी सहजता सुगमता से कर गए।
40 साल तक वे मुम्बई में रहे। 1986 कि कृष्णा कृष्णा उनकी आखरी फिल्म थी। चन्द्रकान्त की इस फिल्म का संगीत शंकर जयकिशन ने दिया था। निर्मोही नटवर जैसा प्यारा गीत इसी फिल्म में था।
राजस्थान से वे आखरी साँस तक जुडे रहे। नाथद्वारा भी आते थे, बीकानेर भी। कभी भूले भटके कोई कवि सम्मेलन में बुला ले, तो खुशी-खुशी आते।
कहते भी थे, अपनी धरती अपना ही आकाश पैदा कर, अपनी मेहनत से अपना जहान तैयार कर। अपनी धरती और अपनी मेहनत दो चीजों पर ही उनका विश्वास था। मेहनत के जरिये ही वे अमर हुए और अपने शब्दों के जरिये अनंश्वर हो गए।
उनके मित्र महिपाल के साथ उनकी रचनाओं का प्रकाशन ठीक से नहीं हुआ। भरत व्यास की रचनाओं का ससम्मान प्रकाशन जरूरी है। शब्दों में ही तो वे बोलते शब्दों से ही मौजूद हैं।
सम्पर्क - कार्यक्रम प्रमुख,
आकाशवाणी, उदयपुर ३१३००१
मो. ९४१४४-१८२१३