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भरत व्यास : अमर-अक्षर यशोकाय

मालचंद तिवाडी
तुम क्षमा मैं भूल हूँ, व्याकरण के नजरिये से यह दूर तक एक लिंग-निरपेक्ष वाक्य। इसमें केवल भूल एक ऐसा शब्द है, जिसे स्त्रीलिंग शब्द कहना होगा। अन्यथा दोनों प्रयुक्त सर्वनामों - तुम और मैं - के बारे में नहीं कहा जा सकता कि कौन पुरुष है और कौन स्त्री। देखना दिलचस्प है कि यह वाक्य सुप्रसिद्ध फिल्मी गीतकार भरत व्यास के एक अत्यंत ही लोकप्रिय गीत तुम गगन के चंद्रमा हो मैं धरा की धूल हूँ में एक स्त्री की स्वीकरोक्ति के रूप में आया है। लेकिन जिस किसी ने यह गीत सुना है, उसे याद होगा कि इस गीत के नायक-नायिका - स्त्री और पुरुष - इस गीत में दोनों की पारस्परिकता का एक महाकाव्य ही रच रहे हैं। भरत व्यास के फिल्मी गीतों की मौजूदा स्त्री विमर्श की कसौटी पर पडताल करें, तो पता लगता है कि वहाँ लैंगिक ऊँच-नीचता का प्रत्याख्यान प्रायः उसी सामाजिक मनोविज्ञान के स्थिर काव्य-प्रतिमानों और कवि-समयों की रोचक अदला-बदली से किया गया है जिसकी वे सब निर्मिती हैं। उनके एक और लोकप्रिय गीत हमसफर मेरे हमसफर के सारे काव्यात्मक ताने-बाने में भी आप देखेंगे कि कैसे दोनों प्रेम की पारस्परिक पूरकता को हृदयग्राही और सरल किंतु एक मार्मिक पुकार में ढालते जाते हैं। इस गीत का सार भावनात्मक अवलंबन हमसफर शब्द ही है, जो खुद एक लिंग-निरपेक्ष शब्द माना जा सकता है। इस गीत का पुरुष स्त्री के प्रति अपने प्रेम की अभिव्यक्ति में कहता है,हमसफर मेरे हमसफर/पंख तुम परवाज हम/जिंदगी का साज तुम/साज की आवाज हम। 1965 में प्रदर्शित हुई पूर्णिमा फिल्म का गीत धर्मेंद्र और मीनाकुमारी पर फिल्माया गया है। मीनाकुमारी इस दोगाने में शामिल होते हुए गाती है, हमसफर मेरे हमसफर/जिंदगी का गीत तुम/गीत का अंदाज हम। उनके एक और लोकप्रिय गीत में पुल्लिंग शब्द जीवन को काफी साहसिकता से अनूठी उत्प्रेक्षा बरतते हुए चुनरिया बनाकर नायक-नायिका दोनों ही के द्वारा इसे रंगे जाना प्रस्तावित करवाया गया है। स्त्री-पुरुष की पारस्परिक पूरकता की प्रस्तावना बिना अधूरेपन के भाव की शिद्दत के की ही नहीं जा सकती, जिसकी बानगी उनका फिल्म नवरंग का कालजयी गीत आधा है चन्द्रमा रात आधी है। यह भी एक व्याकुल पुकार है कि रह न जाए तेरी-मेरी बात आधी! यह अधूरेपन के एहसास की शिद्दत ही होती है, जो अलग-अलग लबो-लहजे में ही सही, मगर कवियों-गीतकारों से ऐसी भरी-पूरी पंक्तियाँ रचवा देती है कि वे पंक्तियाँ उस भाषा में सांस लेनेवाले लोगों की धरोहर बन जाती है। भरत व्यास के आधे चन्द्रमा के साथ मुझे हमेशा ही शमशेर बहादुर सिंह की एक अमर कविता की पंक्तियाँ याद आ जाती हैं, जिसमें मात्र एक पंखुरी के झर जाने से व्याकुल हुआ कवि उसी पंखुरी से गुहार लगाता हुआ कह उठता है,लौट आ/ओ पंखुरी/फिर फूल से लग जा! भरत व्यास हिंदी फिल्म संगीत के विराट कमल की ऐसी ही एक पंखुरी है, जिसके न रहने के अधूरेपन को महसूस तो कोई भी कर सकता है, लेकिन उसे शब्दाकार स्वयं भरत व्यास या शमशेर बहादुर सिंह जैसा कोई समर्थ काव्यपुरुष ही दे सकता है। मनुष्य की आयु उसके जैविक जीवनकाल से भले ही नापी जाती हो, पर उसके कर्म-जीवन की धडकनें उसकी यशोकाय में बसी रहती हैं। भरत व्यास 66 वर्ष की उम्र में दुनिया से चले गए, मगर उनके रचे गीत जरा-मरण से मुक्त हैं और मुक्त ही रहेंगे आखिर कितने लोग जानते होंगे कि उन्नीसवीं-बीसवीं और अब ईक्कीसवीं शताब्दी तक की समग्र स्मृति में देदीप्यमान इस भारत देश की आध्यात्मिक मशाल ज्योतिपुरुष विवेकानंद के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस इस संसार में मात्र उनचास वर्ष और आठ महीने में ही अपना लीलामय जीवन पूरा कर चले गए थे। भरतजी की अमर-अक्षर यशोकाय के प्रति विनम्र नमन।

सम्पर्क - प्रेहेलिका, सोनगिरि कुँआ,

बीकानेर-३३४००५

मो. ९४६००२२८२४,

email-malchndtiwari@gmail.com

भरत व्यास की रचनाओं के दो पुष्प
चाँदनी

आज मधुबातास डोले
मधुरिमा से प्राण भर लो!
चाँद को चुपचाप निरखो,
चाँदनी में स्नान कर लो!

यह चमेली-सी सुगंधित-
रात मधु-मुसका रही है!
झिंगुरों की वीणा की
झंकार पर कुछ गा रही है!

अरज प्राणों से प्रिये तुम
प्राण का आह्वान कर लो!

आज तुम क्यों मौन हो,
कुछ आज मुख से बोल दो ना!
आज अपनी चिर लजीली,
लाज के पट खोल दो ना!

अरुण अधरों से रूपहली
रात का मधुपान कर लो!
-रिमझिम

जग ने मरी पीर न जानी

जग ने मेरी पीर न जानी-

उसने मेरे गीत सुने हैं-
पर गमों के अन्तस्थल में-
छुपी हुई तासीर न जानी!
जग ने मेरी पीर न जानी!!

पलकों में कटु अश्रु छिपा-
अधरों में मधु मुस्काता था मैं-
उर में विष - ज्वाला सुलगा-
कल-कण्ठों से प्रिय गाता था मैं-

जग ने केवल कथा सुनी है-
किन्तु कथा के अन्तर में जो-
व्यथा छुपी थी कब पहचानी-
जग ने मेरी पीर न जानी-

-रिमझिम