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भरत व्यास : तुम गगन के चंद्रमा हो

राजेन्द्र बोडा
जब कभी हिन्दुस्तानी फिल्म संगीत की बात आती है, तो सभी लोग संगीतकार और गायक को याद करते हैं। गीत लिखने वाले नेपथ्य में रह जाते हैं। श्रोता गायक की आवाज जरूर पहचान लेते हैं। कुछ सुधी लोग गाने की धुन और ऑर्केस्ट्रेशन से पहचान लेते हैं कि कौन संगीतकार होगा। परंतु जिन शब्दों को धुन मे पिरोया गया है और गाया गया है, उसके रचियता पर किसी का ध्यान नहीं जाता जबकि शब्द ही तो किसी गाने की आत्मा होते हैं।
हिन्दुस्तानी सिनेमा में शुरू से ही उर्दू का प्रभुत्व रहा। तत्कालीन लोकप्रिय व्यावसायिक पारसी थियेटर के प्रभाव के कारण शायद ऐसा हुआ। इसीलिए फिल्मों में अधिकतर शुद्ध हिन्दी में लिखने वाले गीतकार उंगलियों पर गिनने लायक ही हुए। ऐसे गीतकारों में प्रदीप, नरेंद्र शर्मा, गोपाल सिंह नेपाली, नीरज और सरस्वती कुमार दीपक के साथ भरत व्यास एक बडा नाम है। किन्तु तीन दशकों तक फिल्मों में एक से एक सफल और नायाब गाने लिखने वाले गीतकार भरत व्यास आज की पीढी के लिए तो लगभग पूरी तरह विस्मृत-से ही हैं।
हिन्दुस्तानी फिल्म जगत की यह भी अनोखी फितरत रही है कि वह कलाकारों को खाँचे में बाँध देता है। हालाँकि ऐसे कलाकार भी हुए हैं जिन्होंने खाँचों को तोडते हुए अपना विस्तार किया, किन्तु दुर्भाग्य से भरत व्यास को बहुत सी सामाजिक फिल्मों में सफल गीत देने के बावजूद धार्मिक और ऐतिहासिक फिल्मों के दायरे में सीमित मान लिया गया। उन्होंने एक बार खुद कहा, ये सच है कि मैंने अधिकतर धार्मिक, पौराणिक या ऐतिहासिक फिल्मों में ही गीत लिखे हैं, लेकिन ये फिल्में अपने समय में तो सामाजिक फिल्में ही थीं। उस वक्त ऐतिहासिक समय का समाज था और उस समाज के हिसाब से वो गीत लिखे गए, तो फिर गीत ऐतिहासिक, पौराणिक या धार्मिक कैसे हो जाते हैं? गीत तो गीत होते हैं, उनको आप सामाजिक फिल्मों में डाल दीजिए तो सामाजिक लगेंगे, ऐतिहासिक फिल्मों में डाल देंगे, तो ऐतिहासिक लगेंगे। हाँ, यह बात अवश्य है कि जिस समय मैंने चित्रजगत में प्रवेश किया था उस समय फिल्में धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक ही बनती थी और मैं उन्हीं फिल्मों के मुताबिक अपने गीत लिखता था जो सफल भी होती थीं।1
वे मूलतः चूरू के रहने वाले थे मगर उनका जन्म बीकानेर में 6 जनवरी 1918 को हुआ। तब की परंपरा के अनुसार पुष्करणा ब्राह्मणों में स्त्रियों का प्रसव उनके पीहर में होता था। इसलिए भरत व्यास का जन्म अपने ननिहाल बीकानेर में हुआ था। वे तीन भाइयों में बीच की संतान थे। उनकी एक बहन भी थी जिसका छोटी उम्र में ही निधन हो गया। उनके पिता पं. शिवदत्त व्यास ज्योतिष के ज्ञाता और वैद्य थे। प्लेग महामारी में रोगियों की सेवा करते हुए 1925 में उनका निधन हो गया। कुछ समय बाद भरत व्यास के सिर से माता का साया भी उठ गया। तीन भाइयों के परवरिश उनके चाचा गौकरण व्यास ने की। भरत व्यास के बडे भाई ने जनार्दन ने विशारद किया और परिवार की ब्राह्मण परंपरा के अनुसार अपना काम करते रहे और साथ में छोटा-मोटा व्यवसाय भी करने लगे। उनके छोटे भाई बृजमोहन व्यास (बी. एम. व्यास) ने भी अपनी शिक्षा परिवार की परंपरा के अनुसार संस्कृत विशारद के तौर पर ही पूरी की। बाद में उन्होंने हिन्दुस्तानी फिल्मों में चरित्र अभिनेता के रूप में लम्बी पारी खेलते हुए खूब यश कमाया। चाचा ने भरत जी को आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा दिलाने का फैसला किया। सच तो यह है कि भरत व्यास बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनकी प्रतिभा उनके बाल्यकाल से ही उनमें दिखने लगी थीं। छोटी उम्र में ही वे बाल प्रतियोगिताओं तथा नाटकों में भाग लेने लगे। साहित्य, संगीत और कला के प्रति प्रेम उनके बचपन से ही झलकने लगा था। दस वर्ष के होते होते वे नाट्यकला में प्रवीण होने लगे। उस उम्र में उन्हें एक नाटक में महाराणा प्रताप की प्रमुख भूमिका के लिए पुरस्कार भी मिला। मेट्रिक के बाद उन्होंने बीकानेर के डूँगर कॉलेज से इंटर किया।
भरत व्यास के छोटे भाई बी.एम. व्यास (ब्रज मोहन व्यास) के अनुसार वे बचपन से मजाकिया थे। उनके संगी साथी उन्हें भत्ता और बडे लोग उन्हें भतिया कह कर पुकारते थे। कोई 17-18 वर्ष कि आयु में उनका विवाह हो गया। वे बी. कॉम. की पढाई के लिए कलकत्ता चले गए, जहाँ ट्यूशन करके अपना खर्च निकालते थे।2 वहाँ अर्थोपार्जन के लिए वे कवि सम्मेलनों में भी भाग लेने लगे और उनका नाम होने लगा। उसी दौरान उन्होंने राजस्थानी प्रहसन तथा राजस्थानी गीत भी लिखे। उनकी ख्याति उतनी हुई कि एचएमवी कंपनी ने उनके राजस्थानी के छोटे नाटकों, प्रहसानों व गीतों की ध्वनि मुद्रिकाएँ (78 आरपीएम के रिकॉर्ड) भी जारी कीं। उनकी तब एक कविता केसरिया पगडी देश भर में प्रसिद्ध हुई।
कलकत्ते में वे नाटकों में भी अभिनय करते रहे। कलकत्ता में तब रंगमंच की बडी धूम थी और बडे-बडे नाट्यगृह भी थे। उनकी प्रमुख भूमिका वाले नाटक भक्त मोरध्वज में उनके अभिनय पर समीक्षा करते हुए मथुरा प्रसाद जोशी निर्भीक ने लिखा (उनके) रंगमंच पर आते ही ऐसा लगता था जैसे भगवान नटराज ने अपनी समस्त कलाएँ भरतजी को वरदान में दे दीं हों, श्रीकृष्ण ने अपनी कलाओं का पूरा भण्डार जैसे भरतजी को दे दिया हो।3
बंबई में रह कर सिर्फ गीत लेखन में अपने को सीमित कर लेने का फैसला करने से पहले उन्होंने फिल्म में गीत लेखन के अलावा निर्देशन, अभिनय और गायक के रूप में भी अपनी जगह खोजी। मगर उनकी गीतों की लेखनी ने ही उनके लिए सफलता की नई राह खोली। गीतकार के रूप में उनका पहली फिल्म थी गुजराती निर्देशक वीएम व्यास की दुहाई (1943) जिसमें उन्होंने कुल नौ गीत लिखे थे। उनकी बढती हुई प्रतिभा को भाँपते हुए निर्माता-निर्देशक और शालीमार पिक्चर्स, पुणे के मालिक डब्ल्यू जेड अहमद ने भरत व्यास को अपने यहाँ रख लिया। उनकी फिल्म मन की जीत (1944) में उन्होंने केवल दो गीत लिखे और एक युगल गीत गाया। फिल्म अपने लोकप्रिय संगीत के कारण सफल रही।
अगले साल 1945 में उन्होंने फिल्म गुलामी में पाँच गीत लिखे और रेणुका देवी के साथ एक युगल गीत ओह गीता के भगवान और एक एकल गीत इस नश्वर संसार में गाया। इस फिल्म में उन्होंने अभिनय भी किया।
शालीमार पिक्चर्स के डब्ल्यू जेड अहमद वे उन्हें फिल्म निर्देशन का मौका दिया यह फिल्म थी रंगीला राजस्थान जिसके लेखक, गीतकार और संगीतकार भी भरत व्यास ही थे। मगर देश के विभाजन के बाद अहमद और उनकी अभिनेता पत्नी नीना शालीमार स्टूडियो सहित सभी कर्मचारियों को भगवान भरोसे छोड अचानक पाकिस्तान चले गए। भरत व्यास को इन हालत में दक्षिण के जैमिनी स्टूडियो में नौकरी करनी पडी, जहाँ उन्हें फिल्म चंद्रलेखा के हिन्दी संस्करण के गानों के लिए गीतकार पंडित इन्द्र का सहायक बनाया गया। मगर फिल्म में उनके नाम से कोई गीत नहीं था। वे शीघ्र ही बम्बई लौटे और शालीमार की उनके निर्देशन में बन रही फिल्म रंगीला राजस्थान को किसी प्रकार पूरा किया, किन्तु फिल्म असफल रही। इसके बाद उन्होंने अपने को गीतकार तक ही सीमित कर लिया और उनके लिए सफलता की राह खुल गई।4
गीतकार के रूप में भरत व्यास का हिन्दुस्तानी फिल्मों में जितना बडा योगदान है उसे देखते हुए उनका नाम कभी हाशिये पर नहीं धकेला जा सकता। उन्होंने मायावी सिने दुनिया में चमकने वाले असंख्य सितारों में अपना विशेष बनाया। उनका आत्मसम्मान वाला चरित्र उन्हीं की एक कविता में उजागर होता है- अपनी धरती अपना ही आकाश पैदा कर, अपनी मेहनत से नया इतिहास पैदा कर/ माँगने से कब मदद मिलती है अरे भिक्षुक, अपने हर एक श्वास में विश्वास पैदा कर/ चल दिया जो चीर कर अँधेर है राह में रुकता नहीं जो शेर है/जब तलाक चलता रहे अंगार है बुझ गया जो राख का एक ढेर है/ तूं खुद अपने पाँवों को हिम्मत का बाल दे, उठाया अपना सर और आगे को चल दे/ कहाँ पूछता फिर रहा अपनी ज्योति, ग्रहों का डर, तो ग्रहों को बदल दे।5
अपने पर भरपूर विश्वास रखने वाले भरत व्यास उन चंद गीतकारों में से थे जिन्होंने हिन्दुस्तानी फिल्मी गीतों को साहित्यिक संस्कार दिए। इसका प्रमाण देखना हो तो फिल्म स्त्री (1961) के लिए लिखा उनका गीत सुनें आज मधुवातास डोले, मधुरिमा से प्राण भर लो/ चाँद को चुपचाप निरखो, चाँदनी में स्नान कर लो। सामान्य श्रोताओं में अप्रचलित शब्द मधुवातास के साथ शुरू होने वाले इस गीत का लोकप्रिय होना हिन्दी की सामर्थ्य को दर्शाता है। हिन्दी का लालित्य उनके सती सावित्री (1964) फिल्म के इस गीत में देखें तुम गगन के चंद्रमा हो मैं धारा की धूल हूँ/ तुम प्रणय के देवता हो मैं समर्पित फूल हूँ/ तुम हो पूजा मैं पुजारी तुम क्षुधा मैं प्यास हूँ। या फिर एक लता मंगेशकर का गाया भरत व्यास का वह अन्य दुर्लभ गीत भी ऐसा ही लालित्य लिए हुए है सुनें जो लोगों तक नहीं पहुँच सका क्योंकि 1970 के आस-पास बन रही फिल्म कामदेव पूरी न हो सकी। खोलो मन का द्वार, मन का प्यार लाई हूँ/ सुख का साज सपनों का सिंगार लाई हूँ जो सौभाग्य से फिल्म संगीत को सँभाल कर रखने वाले कुछ कद्रदानों के पास सुरक्षित है जिसे सुनना आल्हादकारी अनुभव है।
भक्ति, श्रृंगार और प्रेम रस के अलावा भी भरत व्यास ने कमाल के गीत लिखे। उनकी 1950 के दशक की एक और अप्रदर्शित फिल्म दोस्त में एक दुर्लभ गाना है ये सोने की दुनिया, ये चाँदी की दुनिया, यहाँ आदमी की भला बात क्या है/ ये दौलत की दुनिया अमीरों की दुनिया, यहाँ पर गरीबों की औकात क्या है। ऐसा ही गाना साहिर लुधियानवी ने गुरुदत्त की फिल्म प्यासा के लिए लिखा था ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया जिसमें शायर का गुस्सा फूट पडा दिखता है। हालाँकि भरतजी अपने गीत में साहिर से कम उग्र हैं तथा धन और शक्ति के प्रभुत्व वाली दुनिया की आलोचना में कम तीखे हैं, लेकिन वे साहिर से किसी भी तरह कम प्रभावी नहीं हैं। उनके शब्दों में अद्भुत करुणा है जो इस गीत को अप्रतिम ऊँचाई देती है।
राजस्थान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाली फिल्म जय चित्तौड (1961) के गीत ओ पवन वेग से उडने वाले घोडे, तुझपे सवार है जो, मेरा सुहाग है वो, रखियों रे आज उसकी लाज ओ में किसी क्षत्राणी के उद्गारों को जो शब्द इस गीतकार ने दिए हैं वे अद्भुत हैं। अमूमन गाने में दो या तीन अंतरे होते हैं। इस गाने में सिर्फ एक ही अम्बा अंतरा है जो विलक्षण तरीके से वीर रस के कईं भावों को एक साथ प्रस्तुत करता है। तेरे कंधों पर आज भार है मेवाड का/ करना पडेगा तुझको सामना पहाड का/ हल्दी घाटी नहीं है काम कोई खिलवाड का/ देना जवाब वहां शेरों की दहाड का/ घडियाँ तूफान की हैं/ तेरे इम्तिहान की है/ रखियों रे आज उनकी लाज ओ।
हिन्दुस्तानी फिल्मों में प्रकृति का चित्रण करने वाला श्रेष्टतम गीत भी इसी गीतकार की कलम से निकला- हरी भरी वसुंधरा पे नीला नीला ये गगन/ के जिसके बादलों की पालकी उडा रहा गगन/ दिशाएँ देखो रंग भरी, चमक रहीं उमंग भरी/ ये किसने फूल फूल पे किया सिंगार है/ ये कौन चित्रकार है ये कौन चित्रकार है (फिल्म बूँद जो बन गई मोती /1967)।
भले ही फिल्मों में सिचुएशन के हिसाब से और निर्माता निर्देशकों की माँग के अनुरूप गाने लिखे जाते रहे हैं, मगर भरत व्यास जैसे गीतकार माँग के अनुसार लिखते हुए भी कालजयी गीत रच देते थे। हिन्दुस्तानी फिल्मों में 1950 और 1960 के दशक में भरत व्यास के लिखे ऐसे गानों की फेहरिस्त बडी लम्बी है जो फिल्म संगीत के इतिहास के पन्नों पर सुनहरे हर्फों में दर्ज हुए रहेंगे।
उनका फिल्म दो आँखें बारह हाथ (1957) का गाना जिसके लिए फिल्म के निर्माता निर्देशक व्ही शांताराम ने उनके सामने माँग रखी थी कि उन्हें एक ऐसा गीत चाहिए जिसमें यह न लगे कि यह प्रार्थना किसी खास मजहब की है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को लगे कि उसके अपने ही भगवान की है। ऐसा लगे कि वह सभी धर्मों के श्रेष्ठ मूल्यों की- यानी मानव धर्म की प्रार्थना है। जब भरत व्यास ने उसका मुखडा ऐ मालिक तेरे बंदे हम, ऐसे हों हमारे करम, नेकी पर चलें और बदी से टलें ताकि हँसते हुए निकले दम लिख कर सामने रखा तो शांताराम के मुँह से यही निकला कि आपका यह गीत अमर होने वाला है।6 और ऐसा ही हुआ। इस गीत, जिसकी ताब आज भी वैसी ही बनी हुई है, को हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों मुल्कों की पूरी एक पीढी ने अपनी स्कूलों में प्रार्थना के रूप में गाया। भरत व्यास के इस गीत से ही पूरी तरह प्रेरित और उसी की भावभूमि पर बाद में 1971 में फिल्म गुड्डी के लिए गुलजार ने लिखा हम को मन की शक्ति देना मन विजय करें/ दूसरों की जय से पहले खुद को जय करें। इसके बाद एक बार फिर ऐसी ही प्रेरणा वाला गीत 1986 की फिल्म अंकुश में आया इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना/ हम चलें नेक रास्ते पे हम से भूल कर भी कोई भूल हो ना। लेकिन कोई भरत व्यास की ऊँचाई वाली भावभूमि को न छू सका।
जो कवि ऐसे श्रेष्ट मानवीय मूल्यों की बात कर सकता है वही ईश्वर को चुनौती भी दे सकता है मेरी आन भगवान, कण कण से लडी है तो तुमसे भी आज लडेगी/ मेरी बात तुम्हें रखनी पडेगी (तूफान और दीया/1956)। और यह चुनौती भी दे सकता है जरा सामने तो आओ छलिये, छुप छुप छलने में क्या राज है/ यूँ छुप नया सकेगा परमात्मा मेरी आत्मा की ये आवाज है (जनम जनम के फेरे/1957)।
एक कवि के जीवन पर आधारित व्ही शांताराम की फिल्म नवरंग (1959) उनकी श्रेष्ठ फिल्मों में एक है जिसका एक-एक गीत अनमोल मोती की तरह है। जैसे आधा है चन्द्रमा रात आधी, रह न जाए तेरी मेरी बात आधी, मुलाकात आधी तथा शामल-शामल बरन, कोमल-कोमल चरण, तेरे मुखडे पे चन्दा गगन का जडा, बडे मन से विधाता ने तुझको गढा। इसी फिल्म में हिन्दुस्तानी संस्कृति में रचा-बसा होली का अटखेली वाला अनूठा गीत क्या भी क्या खूब है यह सुन कर ही महसूस किया जा सकता है- अटक मटक झटपट पनघट पर, चटक मटक इक नार नवेली, गोरी-गोरी ग्वालन की छोरी चली, चोरी-चोरी मुख मोरी- मोरी, मुस्काये अलबेली, कंकरी गले में मारी, कंकरी कन्हैये ने पकरी बाँह और की अटखेली, भरी पिचकारी मारी सररररर । बोली पनिहारी बोली सररररर। अरे जा रे हट नटखट ना छू रे मेरा घूँघट, पलट के दूँगी आज तुझे गाली रे, मुझे समझो न तुम भोली भाली रे। सररररर। आया होली का त्यौहार उडे रंग की बौछार तू है नार नखरेदार मतवाली रे, आज मीठी लगे है तेरी गाली रे।
इसी फिल्म में खुद भरत व्यास की आवाज में अभिनेता आगा पर फिल्माया एक दिलचस्प हास्य गीत है कविराजा कविता के मत अब कान मरोडो जिस पर मशहूर लेखक, पत्रकार और फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास ने उन्हें कॉम्पलीमेंट देते हुए कहा था पण्डितजी आप इसे हास्य रस की कविता कहते हैं, मगर ये तो आपकी पैथेटिक (कारुणिक) कविता है। इस कविता की रचना के पीछे सच में कवि के जीवन की एक पैथेटिक घटना है जो उन्होंने एक रेडियो कार्यक्रम में बताई थी। एक दिन एकाएक एक बडी गाडी आ कर मेरी खोली के नीचे खडी हो गई। ड्राइवर ऊपर आया और कहने लगा कि अमुक बडे सेठ जो एक कवि सम्मेलन करा रहे हैं उसमें आपको बुलावा भेजा है। गाडी सीधे मुझे ले आई जहाँ प्रोग्राम था। वहाँ और भी कईं कवि आए हुए थे। मैंने वहाँ अपनी अच्छी-अच्छी कविताएँ सुनाई। बडी दाद मिली बडी तालियाँ मिलीं। फूलों की मालाएँ पहनाई गईं। चाय-नाश्ते सब करवाये गए। मैं खुश हो गया कि रंग भी जम गया और काम भी बन गया। अब शायद भविष्य अच्छा रहेगा। मैं फारिग होने बाथरूम में चला गया। वापस आया तो देखा कि हॉल खाली हो चुका है और वहाँ कोई नहीं है जो मुझे वापस घर पहुँचाने की व्यवस्था करता। सोचा नीचे वह गाडी खडी होगी जिसमें मुझे यहाँ लाया गया था। लेकिन वहाँ कोई गाडी-वाडी नहीं थी। लेकिन सच पूछो, तो मेरी जेब में सिर्फ एक अठन्नी थी। उस अठन्नी से मैंने किसी ताँगे वाले को पकडा और कहा यार तू मुझे दादर तक तो पहुँचा। तो दादर तक उसने मुझे छोड दिया। उसको अठन्नी मैंने दे दी। दादर से मालाड तक मैं पैदल आया। उस दिन आते आते रास्ते में जो कविता बनी वह फिल्म नवरंग (1959) में भी है।7
कविराजा कविता के मत अब कान मरोडो, धंधे की कुछ बात करो कुछ पैसे जोडो।
शेर शायरी कविराज न काम आयेगी, कविता की पोथी को दीमक खा जाएगी
भाव चढ रहे, अनाज हो रहा मँहगा दिन-दिन, भूख मरेंगे रात कटेगी तारे गिन-गिन,

इसीलिए कहता हूँ भईया ये सब छोडो, धंधे की कुछ बात करो कुछ पैसे जोडो।
अरे छोडो कलम चलाओ मत कविता की चाकी, घर की रोकड देखो कितने पैसे बाकी
अरे कितना घर में घी है, कितना गरम मसाला, कितने पापड, वडी मंगोडी मिर्च मसाला
कितना तेल, लून, मिर्च हल्दी और धनिया, कविराज चुफ से तुम बन जाओ बनिया
अरे पैसे पर रच काव्य भूख पर गीत बनाओ, गेहूँ पर हो गजल धान के शेर सुनाओ
लून मिर्च पर चौपाई चावल पर दोहा, सुगल कोयले पर कविता लिखो तो सोहे
अरे कम भाडे की खोली पर लिखो कवाली, झन झन करती कहो रुबाई पैसे वाली
शब्दों का जंजाल बडा लफडा होता है, कवि सम्मेलन दोस्त बडा झगडा होता है
मुशायरों के शेरों पर रगडा होता है, पैसे वाला शेर बडा तगडा होता है।
इसीलिए कहता हूँ इससे मत सिर तोडो, धंधे की कुछ बात करो कुछ पैसे जोडो।
भरत व्यास ने हिन्दी में गाने लिखे, किन्तु हम उन्हें कट्टर शुद्धतावादी भी नहीं कह सकते। संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में लिखने का दुराग्रह हिन्दुस्तानी फिल्मों के भरत व्यास सहित उन सभी गीतकारों में कभी नहीं रहा जिनकी लेखनी से हिन्दी की सरस सरिता बहती थी जिसमें उर्दू के लफ्ज भी सहज रूप से स्थान पा जाते थे। फिल्म के कथानक की माँग के अनुरूप उन्हें उर्दू वाली हिन्दी से भी परहेज नहीं रहा। गूँज उठी शहनाई’ में उन्होंने गीतनुमा गजल भी लिखी कह दो कोई ना करे यहाँ प्यार/ इसमें खुशियाँ हैं कम, बेशुमार है गम/ एक हँसी और आँसू हजार। इसमें उर्दू के लफ्ज होने पर भी हिन्दी की माटी की पूरी महक बसी हुई है। ऐसा कोई आत्मविश्वासी गीतकार की कह सकता था मुझे यह मंजूर है कि मैं अपने गीतों में हिन्दी का अधिक प्रयोग करता हूँ क्योंकि मेरा विश्वास है कि हिन्दी में हर तरह के भाव या रस प्रगट करने का पूरा पूरा सामर्थ्य है। इसीलिए उनके गीतों में भारतीय संस्कृति झलकती है।
उर्दू के शायर फिल्मों के लिए गाने लिखते हुए मुशायरों में अपनी अलग अदबी हैसियत भी बनाए रखते थे। अनेकों को आश्चर्य होता है कि भरत व्यास ने फिल्मों की देहरी से बाहर कवि मंचों पर बडा दखल नहीं दिया। इसका जवाब एक बार खुद उन्होंने दिया था- कवि सम्मेलनों में जब हमारे मित्र अपनी साहित्यिक रचनाएँ सुनाते हैं, तो मेरे पास अधिकतर फरमाइशें फिल्मी गीतों की आती हैं-इस धर्मसंकट के कारण मैं कवि सम्मेलनों को टाला करता हूँ।
उन्होंने परिणीता, बेदर्द जमाना क्या जाने, ऊँची हवेली, और प्यार की प्यास जैसी अनेकों सामाजिक फिल्मों के लिए भी गीत लिखे।
भरत व्यास ने कुल 210 फिल्मों के लिए गाने लिखे। इनमें 189 हिन्दी फिल्में थीं। उनके गीतों वाली हिन्दी की चार फिल्में अप्रदर्शित रही। वे राजस्थान के थे तो स्वाभाविक है कि राजस्थानी फिल्म निर्माता उनसे लिखवाते। परंतु यह जान कर अचंभा होता है कि उन्हें सिर्फ चार राजस्थानी फिल्मों में गीत लिखने का मौका मिला। लगभग दस-दस बरस के अंतराल से उन्होंने एक-एक राजस्थानी फिल्म के लिए गाने लिखे। चारों फिल्में बाबा रामदेव (1963/संगीतकार शिवराम), लाज राखो राणी सती (1973/संगीतकार चांद परदेसी), म्हारी प्यारी चनणा (1983/संगीतकार नारायण दत्त) और बाई चाली सासरिये (1988/ संगीतकार ओ. पी. व्यास) और उनके गीत खूब सफल रहे। उन्होंने एक हरियाणवी फिल्म चौ. हरफूल सिंह (1974/संगीतकार नंदू-प्यारे) तथा एक गुजराती फिल्म सती जसमा ओडन (1976/ संगीतकार महेश-नरेश) के लिए भी एक-एक गाना लिखा।8
उनके लिखे गैर-फिल्मी गीतों के 24 रेकॉर्ड्स जारी हुए और खूब लोकप्रिय हुए। उनकी लिखी और वी. बलसारा की संगीतबद्ध की रचना गीत कितने गा चुकी हूँ इस सुखी जग के लिए आज रोने दो मुझे पलकें भिगोने दो मुझे गायिका आशा भोसले के गाये श्रेष्ठतम गीतों में शुमार होता है।
रिकॉर्ड कंपनी एचएमवी ने लॉन्ग प्ले रिकॉर्ड पर भरत व्यास के गानों के दो एल्बम जारी किए - रंगीलो राजस्थान तथा म्हारा थे ही धणी हो गोपाल। दोनों में संगीत राजस्थान के ही संगीतकार बाबू सिंह का था। पहले एल्बम के लिए शोभा गुर्टू, महेंद्र कपूर, दिलराज कौर, सुलक्षणा पंडित और हेमलता ने भी अपने स्वर दिए थे, जबकि दूसरे एल्बम में सभी गीत आशा भोसले ने गाये हुए थे।
अपनी संस्कृति से गहरा लगाव रखने वाले भरत ने एक बार कहा मैं हमारी संस्कृति के तीन महान शब्द याद करने को कहूँगा - सत्यम् शिवम् सुंदरम् यानी हम अपने जीवन को सत्य बनाएँगे, शिवम् यानी कल्याणकारी बनाएंगे, सुंदरम् यानी शुद्ध, निर्दोष और सुंदरतम बनाएँगे। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि मैंने कम लिखा या ज्यादा, महत्त्वपूर्ण यह है कि जो कुछ लिखा गया उसमें लोकप्रियता की सुगंध है या नहीं। हिन्दी के कवि रहीमदास ने जीवन भर में केवल केवल सात सौ दोहे लिखे, लेकिन इतना अल्प साहित्य ही उन्हें अमर कर गया।9
बम्बई में पाँच जुलाई, 1982 को फिल्मी गीतों को साहित्यिक गरिमा देने वाला यह प्रकाश पुंज लुप्त हो गया। मगर इन पंक्तियों में अपनी ऐसी आभा छोड गया जो कभी धुँधली नहीं होगी-
जब तक रवि में किरण,
किरण में ज्योत, ज्योत में नवजीवन है
जब तक घन में वज्र,
वज्र में प्रलय, प्रलय में उद्वेलन है
जब तक धरती के सर पर
अंगडाई लेता आसमान है
तब तक जिंदा हूँ जवान हूँ।
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संदर्भ
1 अमीन सायानी को उनके रेडियो कार्यक्रम संगीत के सितारों की महफिल में दिया गया साक्षातकार।
2 राजस्थान पत्रिका के साप्ताहिक परिशिष्ट बॉलीवुड के 5 जनवरी 2008 के अंक में प्रकाशित भरत व्यास के
छोटे भाई हिन्दुस्तानी फिल्मों के मशहूर चरित्र अभिनेता बी. एम. व्यास से एम. डी. सोनी की बातचीत।
3 भरत व्यास अभिनंदन ग्रंथ 1960
4 वेबसाइट सॉन्ग्स ऑफ योर में डी पी रंगन का लेख भरत व्यास : लिरिसिस्ट एक्सट्राऑर्डिनरी।
5 आकाशवाणी पर सैनिकों के लिए भरत व्यास द्वारा प्रस्तुत विशेष जयमाला कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग।
6 निर्माता-निर्देशक व्ही शांताराम की आत्मकथा शांतारामा पृ. 512
7 आकाशवाणी के चित्रशाला का एम. व्यास कार्यक्रम के अंतर्गत हमारी संस्कृति में प्रसारित वार्ता की
रिकॉर्डिंग
8 - वही -
सम्पर्क - विराम, 60/17, रजत पथ,
मानसरोवर, जयपुर 302020

भरत- व्यास की रचनाएँ
अब तो अपने ही से मुझको प्यार हो गया,
अब तुम सपनों में भी याद नहीं आती हो!
मैंने सुमुखि तुम्हारे केवल नयन सराहे,
किन्तु न अपनी रूप-प्रशंसक दृष्टि सराही!
पीछे-पीछे भटक रहा था पागल-सा मैं,
गले लगाने अपने से अपनी परछाई!

- पं. भरत व्यास
(रिमझिम से)