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भरत व्यास की कालजयी रचनाएँ

एम.डी.सोनी
कौन इसे कौन कहता उजाड
मरुधरा रही उर्वरा धरा...
चूरू के मूल निवासी भरत व्यास का यह गीत, वीर प्रसूता राजस्थान के वीरों ही नहीं, यहाँ की विभूतियों के अवदान का भी गुणगान करता है। विभूतियों में इसके रचनाकार का नाम भी सगर्व लिया जा सकता है। भरतजी ने साहित्य और सिने जगत में उच्चकोटि का काव्य रचा। उर्दू वर्चस्व वाले हिंदी सिनेमा में हिंदी का मान बढाया, राष्ट्रभाषा की पताका को शिखर पर पहुँचाया। उनके रचे अनेक गीत कालातीत बन गए। भरतजी की बेजोड कलम से निकली ऐसी ही कालजयी रचना है, सिने महारथी वी. शांताराम की क्लासिक फिल्म दो आँखें बारह हाथ (1957) की यह अनूठी प्रार्थना-
ऐ मालिक तेरे बंदे हम
ऐसे हों हमारे करम
नेकी पर चलें, और बदी से टलें
ताकि हँसते हुए निकले दम
ऐ मालिक तेरे बंदे हम

बडा कमजोर है आदमी
अभी लाखों है इसमें कमी
पर तू जो खडा, है दयालु बडा
तेरी किरपा से धरती थमी
दिया तूने हमें जो जनम
तू ही झेलेगा हम सबके गम
नेकी पर चलें, और बदी से टलें
ताकि हँसते हुए निकले दम
ऐ मालिक तेरे बंदे हम

ये अंधेरा घना छा रहा
तेरा इन्सान घबरा रहा
हो रहा बेखबर, कुछ न आता नजर
सुख का सूरज छुपा जा रहा
है तेरी रौशनी में जो दम
तू अमावस को कर दे पूनम
नेकी पर चलें और बदी से टलें
ताकि हँसते हुए निकले दम
ऐ मालिक तेरे बंदे हम

जब जुल्मों का हो सामना
तब तू ही हमें थामना
वो बुराई करें, हम भलाई करें
नहीं बदले की हो कामना
बढ चले प्यार का हर कदम
और मिटे बैर का ये भरम
नेकी पर चलें, और बदी से टलें
ताकि हँसते हुए निकले दम
ऐ मालिक तेरे बंदे हम
राजकमल कला मंदिर बैनर पर निर्माता-निर्देशक वी.शांताराम ने दो आँखें बारह हाथ में अद्भुत, मर्मस्पर्शी और प्रेरक थीम प्रस्तुत की थी। किसी अपराधी को सजा देकर नहीं, प्रेम-करुणा और सहानुभूति से सुधारा जा सकता है। प्रायश्चित के लिए प्रेरित करके उसका हृदय परिवर्तन किया जा सकता है। आदर्शवादी जेलर आदिनाथ और पाँच दुर्दांत कैदियों पर केंद्रित इस फिल्म में वी. शांताराम, संध्या, उल्हास, बी.एम. व्यास, बाबूराव पेंढारकर, पाल शर्मा, एस.के. सिंह, गजेंद्र और जी. इंगावले ने अहम भूमिकाएँ निभाई थीं।
वी. शांताराम ने आत्मकथा शांतारामा में इस प्रार्थना की परिकल्पना और सृजन के बारे में दिलचस्प वर्णन इस तरह से किया है- कैदियों के मन में अच्छे संस्कार डालने के लिए आदिनाथ हर रोज काम शुरू करते समय और भोजन के पहले उनमें प्रार्थना करने की आदत डालता है। मेरी राय थी कि उनकी प्रार्थना का गीत न तो किसी भजन जैसा हो, न ही यूं करो, ऐसा आचरण करो ऐसा आदेश देने वाला। भरतजी द्वारा रचित गीत परमात्मा की स्तुति करने वाला था। केवल एक अच्छे गीत के नाते वह ठीक था, किंतु प्रार्थना-गीत की मेरी अपनी जो कल्पना थी, उससे व्यक्त नहीं हो रही थी। मैंने भरतजी को बताया- देखिए, जीवन के बारे में मेरा अपना एक आदर्श विचार है कि आदमी को जीवनभर अच्छे काम करते रहना चाहिए, ताकि मरते समय उसके चेहरे पर संतोष की लहर निखर आए। यही बात, इस प्रार्थना-गीत में कही जाए। ऐसा न लगे कि यह प्रार्थना किसी एक मजहब की है। प्रत्येक को लगे कि उसके अपने ही भगवान की, सभी धर्मों के श्रेष्ठ मूल्यों की, यानी मानवता-धर्म की प्रार्थना है! भरतजी सुनकर गम्भीर हो गए। उनके मन में मची खलबली उनके चेहरे पर मुझे साफ दिखाई दे रही थी। दूसरे दिन भरतजी ने नई प्रार्थना सुनाई- ऐ मालिक तेरे बंदे हम। वाह! भरतजी वाह, क्या कहने! मालिक और बंदे शब्द इतने माकूल हैं कि क्या बताऊं? बस, आफ काव्य की पहली पंक्ति से ही जी भर गया है। भरतजी के चेहरे पर उत्साह दिखाई दिया। उन्होंने कहा, कल आपने बताया, तभी से मन बडा बेचैन था, छटपटा रहा था। रातभर कुछ लिख नहीं पाया। अचानक मुझे जमीन मिल गई। आगे सुनिए, पेश है- ऐ मालिक तेरे बंदे हम / ऐसे हों हमारे करम / नेकी पर चलें, और बदी से टलें / ताकि हँसते हुए निकले दम! उस कवि मानस को किन शब्दों म सराह, समझ में नहीं आ रहा था। मझे जो अर्थ अभिप्रेत था, उसे इतने माकूल शब्दों में उन्होंने व्यक्त किया था कि मैंने तत्काल उनसे कह दिया, आपका यह गीत अमर होने वाला है। मेरी यह भविष्यवाणी एकदम सही साबित हो गई। आज भारत की कई पाठशालाओं में, जेलों में यह गीत प्रार्थना के रूप में गाया जा रहा है। इतना ही नहीं, यह गीत हमारे देश की सरहद पार कर अपने ही एक पडोसी देश में राष्ट्रीय गीत का सम्मान प्राप्त कर चुका है।
फिल्म में दो भागों में इस्तेमाल की गई इस प्रार्थना के पहले भाग में मुख्य स्वर स्वयं वी. शांताराम का है, जबकि दूसरा बहुप्रचलित भाग लता मंगेशकर और साथियों ने गाया है। यह और बात है कि शांताराम और साथियों के गाए वर्शन के गायक के रूप में रिकॉर्ड पर कोरस ही दिया जाता रहा है!
बहुत कम लोग जानते हैं कि इस कालजयी प्रार्थना की धुन भी भरत व्यास ने ही बनाई थी। वे संगीतज्ञ भी थे। निजी गोष्ठियों, सार्वजनिक मंचों और कवि सम्मेलनों में भरतजी प्रायः अपनी कविताएँ और गीत सस्वर ही सुनाते थे। वी. शांताराम को भरतजी की बनाई ऐ मालिक तेरे बंदे हम... की मूल धुन भा गई। प्रार्थना की भावभूमि और फिल्म की सिचुएशन के हिसाब से भरतजी की धुन को शांतारामजी ने परफेक्ट पाया। हालाँकि, फिल्म के संगीत निर्देशक वसंत देसाई भरतजी की बजाय अपनी धुन रखना चाहते थे। उन्होंने दो-चार धुनें शांतारामजी को सुनवाई भी, लेकिन शांतारामजी को एक भी धुन रास नहीं आई। आखिर, भरतजी की धुन ही कुछ सुधार के साथ रखी गई।
-बुद्धम् शरणम् गच्छामि...
दुनियाभर में अशांति, अनाचार, आपाधापी, चिंता और घबराहट का माहौल है। ऐसे विकट समय में भगवान बुद्ध के मानवता, प्रेम, दया, करुणा, अहिंसा, शांति और सदाचार के संदेश, पहले से *यादा प्रासांगिक, उपादेय और कारगर हैं। बुद्ध के जीवन और संदेशों को हमारे देश में मूक सिनेमा से अब तक यदा-कदा उजागर किया जाता रहा है। 1960 में बनी फिल्म अंगुलिमाल में मन्ना डे के धीर-गम्भीर स्वर से सजा और अनिल विश्वास के दिलकश सुरों में ढला थीम गीत घबराए जब मन अनमोल, हृदय हो उठे डावाँडोल, तब मानव तू मुख से बोल, बुद्धम् शरण् गच्छामि बुद्ध के जीवन दर्शन और मानव कल्याण के संदेश को असरदार ढंग से प्रस्तुत करता है। भरत व्यास की यह सरस रचना हमें शांति, शक्ति और युक्ति देती है। संबल एवं दिशाबोध प्रदान करती है। निर्मल आनंद की अनुभूति करवाती है। भरतजी ने मानो, तथागत के उपदेश को गागर में सागर की तरह सरल, सहज, सारगर्भित शब्दों में उतार दिया है-
बुद्धम् शरणम् गच्छामि
धम्मम् शरणम् गच्छामि
संघम् शरणम् गच्छामि
घबराए जब मन अनमोल
हृदय हो उठ डावाँडोल
तब मानव तू मुख से बोल
बुद्धम् शरणम् गच्छामि...
जब अशांति का राग उठे
लाल लहू का फाग उठे
हिंसा की वो आग उठे
मानव में पशु जाग उठे
ऊपर से मुस्काते नर
भीतर जहर रहे हो घोल
तब मानव तू मुख से बोल
बुद्धम् शरणम् गच्छामि...
जब दुख की घडियाँ आए
सच पर झूठ विजय पाए
इस निर्मल पावन मन पर
जब कलंक के घन छाए
अन्यायियों की आँधी से
प्राण उठें जब तेरे डोल
तब मानव तू मुख से बोल
बुद्धम् शरणम् गच्छामि...

जब दुनिया से प्यार उठे
नफरत की दीवार उठे
माँ की ममता पर जिस दिन
बेटे की तलवार उठे
धरती की काया काँपे
अम्बर डगमग उठे डोल
तब मानव तू मुख से बोल
बुद्धम् शरणम् गच्छामि...
रूठ गया जब सुनने वाला
किससे करूँ पुकार
प्यार को ना पहचान सका
यह निर्दय संसार
निर्दयता जब लेवे तान
दया हुई हो अंतर्ध्यान
जब ये छोटा-सा इंसान
भूल रहा अपना भगवान
सत्य तेरा जब घबराए
श्रद्धा हो जब डावाँडोल
तब मानव तू मुख से बोल
बुद्धम् शरणम् गच्छामि...
दूर किया जिसने जन जन के
व्याकुल मन का अंधियारा
जिसकी एक किरण को छूकर
चमक उठा ये जग सारा
दीप सत्य का सदा जले
दया अहिंसा सदा पले
सुख शांति की छाया में
जन गण मन का प्रेम पले
भारत के भगवान बुद्ध का
गूँजे घर घर मंत्र अमोल
हे मानव नित मुख से बोल
बुद्धम् शरणम् गच्छामि
धम्मम् शरणम् गच्छामि
संघम् शरणम् गच्छामि
थाई इन्फॉर्मेशन सर्विसेज कॉपरेटिव लि. के बैनर पर निर्मित फिल्म अंगुलिमाल का निर्देशन, विख्यात फिल्मकार विजय भट्ट ने किया था। भारत भूषण ने इसमें शीर्षक भूमिका निभाई थी, नायिका थीं निम्मी और अन्य प्रमुख अदाकार- अनिता गुहा, उल्हास, चंद्रशेखर, अचला सचदेव, मनमोहन कृष्ण, हेलन और प्रेम अदीब। उल्लेखनीय है कि फिल्म के संवाद, मूर्धन्य कवि और साहित्यकार भवानीप्रसाद मिश्र ने लिखे थे।
- प्रेम की गंगा बहाते चलो...
तेरहवीं सदी के महान संत-कवि ज्ञानेश्वर ने महाराष्ट्र में विचरण करके लोगों में प्रेम, करुणा और मैत्री का प्रसार किया। घर-घर में अध्यात्म की अलख जगाई। ज्ञान और भक्ति की गंगा बहाई। जन-जन में समता, समभाव एवं सदाचार का संदेश दिया। संत ज्ञानेश्वर पर मराठी और हिंदी भाषा में बनी फिल्मों ने अपने दौर में दर्शकों को बहुत प्रभावित किया। इनमें रंगलोक के बैनर पर 1964 में रामराज नाहटा निर्मित और मणिभाई व्यास निर्देशित फिल्म संत ज्ञानेश्वर सुपरहिट साबित हुई। सुधीर कुमार, बबलू, सुरेखा जैसे नए कलाकारों को लेकर बनी इस फिल्म की लोकप्रियता और सफलता में भरत व्यास के सरस, सार्थक गीत तथा लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के कर्णप्रिय संगीत का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। लता मगशकर, मुकेश और साथियों का गाया जोत से जोत जगाते चलो... सदाबहार तराना बन गया। भरतजी ने इस गीत में ज्ञानेश्वर के उपदेश को इतने सरल शब्दों में पिरोया कि यह आम आदमी को आकृष्ट करता है, उसके मन को छूता है, हृदय में उतरता है।
जोत से जोत जगाते चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो
राह में आए जो दीन दुखी
सबको गले से लगाते चलो
जिसका न कोई संगी साथी, ईश्वर है रखवारा
जो निर्धन है, जो निर्बल है, वो है प्रभु का प्यारा
प्यार के मोती लुटाते चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो

आशा टूटी, ममता रूठी, छूट गया है किनारा
बंद करो मत द्वार दया का, दे दो कुछ तो सहारा
दीप दया का जलाते चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो
छाया है चहुँ ओर अँधेरा, भटक गई हैं दिशाएँ
मानव बन बैठा है दानव, किसको व्यथा सुनाएँ
धरती को स्वर्ग बनाते चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो
भक्ति शक्ति है, कर्म धर्म है, ज्ञान मुक्ति का पथ है
आत्मा की अनंत यात्रा में, यह तन तो बस रथ है
पथ अनेक हैं, रथ अनेक हैं
एक ही लक्ष्य दिखाते चलो
उस विराट में हो विलीन तुम
नित्य ही अलख जगाते चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो
कौन है ऊँचा, कौन है नीचा, सबमें वो ही समाया
भेदभाव के झूठे भरम में, ये मानव भरमाया
धर्म ध्वजा फहराते चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो
सारे जग के कण कण में है,
दिव्य अमर इक आत्मा
एक ब्रह्म है, एक सत्य है,
एक ही है परमात्मा
प्राणों से प्राण मिलाते चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो
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