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नाटककार : भरत व्यास

अभिनय सम्राट श्री पृथ्वीराज कपूर
राजस्थान के वीरों और वीरांगनाओं की कहानियाँ प्रथम-प्रथम बचपन में अपने पूज्य दादाजी और दादीजी की जिबानीसुनी। फिर जब जरा बडा हुआ तो श्री सुखरामदास चौहान की लिखी वाकये राजस्थान में पढी, मगर राजस्थान की रूमानी जिन्दगी, इश्कों मुहब्बत की पुरजोर मगर पुर कैफ दास्तानें, विचोग और विछोह की वह दिल दहलादेने वाली लम्बी-लम्बी हूकें जो बिछडने वालों के होठों तक आते-आते पुर सोजि गीतों का रूप धारण कर लेती है- पण्डित भरत व्यास के नाटकों, रंगीला मारवाड और ढोला मरवण में पाई।
तसवीर के दोनों पहलू देख लिए। एक पहलू पर वीरता, त्याग, देश प्रेम और कुल मर्यादा की वह महान छवि कुन्दा है, जिसे देखते ही नत मस्तक हो, प्रणाम करने को जी चाहे, तो दूसरी ओर अंकित है नन्हें-नन्हें दिलों की धडकने, उनके सोज, उनका गुदाज, उनके कहकहे, उनकी चीखें, गुलाब की पंखुडियों के से होठों की मासूम मुस्कराहटें, मदभरी मतवाली आँखों के छलकते हुए आँसू कि जी चाहे झुके और चूम-चूम ले।
एक ओर अरावली और हल्दीघाटी की वह सगलाख चट्टानें हैं जिस पर महाराणा प्रताप के भाले के निशान यूँ नक्श हो कर रहे गए हैं कि आज भी जब सूरज निस्फुल निहार कर पहुँचता है, तो ये दहकते हुए अंगारों की तरह प्रज्वलित हो उठते हैं, तो दूसरी तरफ बाजरे के आटे की-सी बारीक बालू के वे न खत्म होने वाले मैदान हैं- जिन पर किसी रामू और चनणा और किसी ढोला और मरवण के गारे-गोरे पाँव के निशान चाँद की शीतल किरणें पडते ही यूँ उभर आते हैं कि देखने वालों को धोखा हो कि त्यार की कडी मंजिले तय करने वाले मुसाफिर अभी-अभी इस तरफ से हो के गए हैं।
उधर दुर्गादास की तलवार बिजलियाँ गिराती हैं, तो इधर गोरी-गोरी चाँदनी चमाचम चमके, तारों छाई रात - रस की धारा बहाती है।
मैं भरतजी के इन नाटकों का स्वागत करता हूँ और आशा करता हूँ कि आगे चलकर वे राजस्थान की जिन्दगी के दूसरे पहलुओं पर भी रोशनी डालेंगे जो दुर्भाग्यवश अभी अंधेरे में ही है। दहेज और फिर उसके साथ दासियों का देना, दासी पुत्रों और पुत्रियों की समस्या- जागीरदारी और बेचारा किसान- परदा और फिर वो परदे की अबला, यूँ लगे मानो माँ दुर्गा शेर की सवारी छोड-खड्ग हाथ से फेंक-घूँघट काढे डरी, सहमी, सिकुडी, दीवारों के साये से लिपटी दबे-दबे पाँव जा रही है। और भी कई एक एक ऐसे पहलू हैं, अँधेरे में डूबे हुए पहलू, जो रोशनी के लिए पुकार रहे हैं।
जिस भरत व्यास ने अहमद नगर का दुर्ग, ताजमहल और आगाखाँ महल और महाराणा के बेटों से खिताब जैसी कविताओं की रचना की, वे क्या कुछ नहीं लिख सकते- मैं आशावादी हूँ- मैं जानता हूँ वे मुझे निराश नहीं करेंगे- मेरी दुआएँ उनके साथ हैं।
अल्लाह करे जोरेकलम और ज्यादा
(भरत व्यास अभिनन्दन ग्रन्थ से साभार)