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भरत व्यास के गीत

भरत व्यास
उर्वराधरा
है कौन इसे कहता उजाड ?
मरुधरा रही उर्वरा-धरा

इसने उपजाया है प्रताप
गोरा-बादल, चुण्डा हमीर
इस ही मिट्टी से निपजे हैं
जयमल-पत्ता औ अमर वीर

पद्मनी प्रलय बन पल भर में
हो गई भस्म का ढेर यहीं
कह रहा खडा चित्तौड स्तम्भ
कुम्भ से जन्मे शेर यहीं

कर दिया नवोढा ने भी तो
बलिदान, स्वयं शशि-मुख का ही
झुक गया वीरता के आगे
श्ाृंगार, सहज पथ का राही

वीरों की फसल यहाँ होती
रहता नित आँगन हरा-भरा
इसने उपजाया सुकवि चन्द
रासो के विद्युत भरे छन्द
स्वच्छन्द-छन्द उन कवितयों की
कब रही लेखनी यहाँ बन्द?

मीरां मतवाली की ममता
कविता बन बहती है कल-कल
गिरधर के रंग में जग-रंगती
गीला करती भू का अँचल

दादू की दर्द भरीवाणी
हो जाती दिल के आर-पार
अब भी घर-घर में गली-गली
वैरागी का बजता सितार

वे एक-दक से बढे-चढे
हो गये सैकडों वीर यहीं
जग देख चुका वैभव इसका
इस मिट्टी की तासीर यही

बालू के गोरे-गोरे कण
उन्नत टीलों के दल विशाल
वीरों का शोणित निगल-निगल
बन गये गुलाबी लाल-लाल

हड्डियाँ अनेकों वीरों की
मिल गईं खाद बन माटी में
वीरों की खेती यहाँ हुई
उपजाऊ हल्दी-घाटी में

दीवानों के बलिदान से
मरु का प्राङ्गण है आज भरा

थी नहरों की दरकार नहीं
पानी से था कुछ प्यार नहीं
वैज्ञानिक पूर्ण तरीकों का
इस भू में था संचार नहीं

फिर भी फूले हैं फूल यहाँ
हर उपवन के अनुकूल यहाँ
जिनके सौरभ से सिंच-सिंच कर
बन गई उर्वरा धूल यहाँ

अब इसी पुरानी मिट्टी में
होते नित नूतन फूल यहाँ
मादक मरंद से लद जाते
शोणित झरनों के कूल यहाँ

जंगल भी मंगल होता
रहता निज जीवन खरा-खरा

सौरभमय सघन दु*मों का था
इस मरु में नाम निशान नहीं
माना रेतीले जंगल में
पत्तों का मर्मर गान नहीं

पर किसे चाहिये छाँह यहाँ
पाना किसको आराम यहाँ
फुर्सत कब थी उन वीरों को
लेते जो क्षण विश्राम यहाँ

आये थे लेकर एक काम
दिन रात दोपहर सुबह शाम
श्री एक लगन थी एक रटन
बस, स्वतंत्रता, बस स्वतंत्रता-

कहते-कहते चल बसे वीर
गर्वित हो फूली वसुंधरा
उस चिर अतीत की कथा लिए
यह खडा हिमालय है साखी
गंगा-यमुना से पूछो तो
किसने माता की सुध राखी

आये थे वे कुछ करने को
माता का बन्धन हरने को
माँ! बोल तुम्हारे बेटे क्या
जन्मे थे केवल मरने को?

वे मरे, किन्तु इतिहास बना
वे गये, किन्तु मधुमास बना
सिसमें लोहू की फाग बना
माँ का आँचल भी रक्त सना

क्या-क्या इसने नर रत्न दिये
विदु*म-मणि से आँगन निखरा
-मरुधरा


केसरिया पगडी
इसमें शत-शत श्ाृंगार भरे
नवजीवन के उपहार भरे
सुन्दरता के संसार भरे
बलिदान और बलिहार भरे

केसरिया पगडी बनी रहे

यह मुकुट हमें विस्मृत-युग के
वीरों की याद दिलाता है
इन संज्ञाहीन रंगों में भी
क्यों रक्त उफन सा आता है

इसकी सब जग में धाक रही
मानवता थी आवाक रही
सबसे ऊँचा मस्तक इसका
सबसे ऊँची यह नाक रही

हा, खेद! आज इस पगडी को
हँस कर जग आँख दिखाता है
कायरता का श्ाृंगार समझ
यह क्यों ठुकराया जाता है?

ये सडी गली सब्जी वाले
भी बुरा भला बक जाते हैं
गाडी ठेले वाले तक भी
मुँह फट हो कर बतलाते हैं

उफ! रक्त नहीं, क्यों रोष नहीं?
अपनेपन का कुछ होश नहीं?
ओ वीर भूमि के दीवानों
आता है क्या अब जोश नहीं?
भारत माँ के अभिमान तुम्हीं
आँधी, बिजली, तूफान तुम्हीं
रण में दहाडने वाले उन
सिंहों की हो संतान तुम्हीं

क्या भूल गए, सब भूल गए,
किस उलझन में तुम झुल गए?
क्या मिला तुम्हें है आज नया
जिसको पाकर तुम फूल गए?

भूना उचित तो था उनका
जो मातृभूमि हित भूल गये
जग का भूले अस्तित्व, और
अपनेपन को भी भूल गये

जो होना था सो हुआ खैर!
अब भी मौका है सँभल चलो
क्या हुआ भोर के भटके हो
अब भी संध्या है लौट चलो

प्राणों में जब तक प्राण रहे
निज स्वाभिमान की आन रहे
जग को कम्पित करने वाला
मारू का गुञ्जित गान रहे

पगडी की अविचन शान रहे
हम भी कुछ हैं, यह ध्यान रहे
राणा कुम्हा, साँगा, प्रताप
भामाशा का अभिमान रहे

अपनेपन की कुछ आन रहे
जग में अपना भी स्थन रहे
जब तक मरु की संतान रहे
इस पगडी का सम्मान रहे

सदियों तक बना समाज रहे
स्वर में बिजली की गाज रहे
मरुधर के बच्चे बच्चे को
बाँकी पगडी पर नाज रहे

इसके धागों की लाज रहे
संगठित एक आवाज रहे
हर भाई के सर पर शोभित
सुन्दर केसरिया ताज रहे

कुछ लाल, कसूमल, केसरिया
कुछ सौरंगी कुछ सावनियाँ
कुछ पीली हो कुछ चन्दनिया
कुछ चुन्दरी सी मन-भावनियाँ

प्रति मस्तक का अभिषेक रहे
भाई-भाई हम एक रहें
ये प्राण जाए परवाह नहीं
प्यारी पगडी की टेक रहे

कितनों के सर कुर्बान हुए
कितनों के महल मसान हुए
इस पगडी की लौ में कितने
परवाने थे बलिदान हुए

इस ओर हमारे राणा ने
शोणित के सागर बहा दिए
उस ओर खडे भामाशा ने
चाँदी के झरने चला दिए

चाँदी लोहू दोनों ने मिल
सब देश-दस्यु थे दबां दिए
लोहे के चने शहीदों ने
अकबर को नाको चबा दिए

यह पगडी वही पुरानी है
सब ही की चिर पहचानी है
बीते गौरव की गाथा-सी
केवल यह बची निशानी है

इससे ही अभिमानी मुख की
भौंहें अराल हो तनी रहे
यह गगन-ग्रहों में गंगा-सी
मरु के गण-कण में सनी रहे

केसरिया पगडी बनी रहे।
-मरुधरा

मारवाड का ऊँट सुजान
जहाँ रेलगाडी अड जाती
पटरी हो जाती बेकाम
फोर्ड साब की मोटर के,
भी चक्के हो जाते हैं जाम।

जहाँ रूठती बैल गाडियाँ
रथ पथ में ही फँस जाते
जहाँ फिटन के भी पहिये
लाचार घरा में धँस जाते

जहाँ दूर से ही बेचारा
हाथ जोड लेता विज्ञान
वहाँ हवा होकर उडता है
मारवाड का ऊँट सुजान ।।

थल- सागर का है जहाज यह
रेतीले जंगल की शान
मोटर, रेल यान सब कुछ यह
मरु भूमि का है अभिमान

नहीं चाहिये तेल-कोयले
ना पानी की है दरकार
एक ग्रास चारे पर यह
सौ मंजिल जाने को तैयार

जहाँ लगी दो एड, और
जो हुआ इशारे का कुछ भान
फगग-फगग चल पडा देख लो
मारवाड का ऊँट सुजान ।।

सुन्दरता की रूप-राशि
लम्बी गर्दन शोभित छविमान
चंचल-मुख को गति विचित्र
मैं भूल रहा क्या दूँ उपमान,

शुतुर्मुग के जेष्ठ भ्रात हे
गज-पद-तल, सम छविधारी
इन बंकिम टाँगों पर पूगल
की पद्मिनी भी बलिहारी
पिउ मयूरों की मिट जाती
कोकिल के रुक जाते गान
खरज स्वरों में जब अलापता
मारवाड का ऊँट सुजान ।।

है स्वभाव के सीधे पर
भोजन प्रेमी है भट्ट महान,
सफा चट्ट कर गये मरुस्थल
रहा न अब फल फूल निशान,

नहीं रहे स्वादिष्ट शाक जब
नहीं कहीं मिलते फल-फूल
तो ये प्रेम सहित खाते अब
नीम, थोर अरु बेर चबूल।

खारा-मीठा, तिक्त-प्रमल
सब कुछ पच जाता, हे भगवान !
धन्य हुए तुम भी उपजाकर
मारवाड का ऊँट सुजान।।

यदि कोई अडचन वश चढता
तुझ पर बाबू परदेशी
हो जाता व्यायाम खरा
बन जाती पुष्ट माँस पेशी

खाया पिया उथल पुथल हो
कण्ठों में आ जाता है
ऊँटासन पर बैठा बाबू
कत्थक नाच दिखाता है

थिरक-थिरक कर, उछल-उछल कर
दोनो हाथों से ले तान
ऊपर नाचे ढुल-मुल बाबू
नीचे नाचे ऊँट सुजान ।।

वाय-शूल हो पेट दर्द हो
कब्ज, खून में हो अन्तर
इसकी एक सवारी से ही
हो जाते सब छू मन्तर

करे ऊँट की सदा सवारी
जिन्हे जुलाब बताई है
पेट-रोग के लिये यही
अव्वल अक्सीर दवाई है

रोगी को जीवन देता है
निर्बल को देता है प्राण
मूर्ख को शिक्षा देता है
मारवाड का ऊंट सुजान।।

कलियुग के वाहन मरुथल के
दु*तगामी हे उडन-विमान
धुँआ धार हो जाता है नभ
भरते हैं जब आप उडान


दीर्ध-काय तब डील डौल पर
शोभित है लघु पूँछ सुजान
पाँव फटे बन गई पगरखी
चले जा रहे हैं श्री मान

या तो नंगे पाँव गये थे
भक्त काज हित श्री भगवान
या नंगे पाँवों धाता है
मारवाड का ऊँट सुजान।।

भू पर उछल रहे अंगारे
ऊपर हो अम्बर जलता
ताती तप्त लुएँ चलती हों
तो भी यह कर्मठ चलता

ग्रीष्म काल के व्याकुल दिन हों
ठिठुर रही हो ठण्डी रात
कर्मवीर यह चल पडता है
करता हुआ हवा से बात

यदि कोई नर जग में आकर
बनना चाहे मनुज महान्
उसके हित आदर्श हमारा
मारवाड का ऊँट सुजान।।
-मरुधरा
.....जवान हूँ !

जब तक जिंदा हूँ जवान हूँ!
जब तक तन में प्राण, प्राण में कम्पन,
कम्पन में गति डोले
जब तक तन में श्वास,
श्वास में आश, आश में जीवन बोले

तबतक पथ-विघ्नों को दलने
वाला मैं विधि का विधान है।
जब तक जिन्दा हूँ जवान हूँ !!

जब तक रवि में किरण, किरण में ज्योति,
ज्योति में नवजीवन है।
जब तक घन में वज्र, वज्र में प्रलय,
प्रलय में उद्वेलन है।

तब तक धरती के सर पर
अँगडाई लेता आसमान हूँ !
जब तक जिन्दा हूँ जवान हूँ !!
-रिमझिम

गीत गीले हो रहे हैं !

कल्पना के घन बरसते,
गीत गीले हो रहे हैं !

शुष्क जीवन के गगन पर
सिक्त सावन की घटायें
मोतियों-सी गोल हिमकण
श्वेत बूँदों की छटायें
युग-युगों से प्राण सूखे-
आज फिर लहरा रहे हैं
श्वस, आशा के स्वरों पर
मुक्त सरगम गा रहे हैं

भाव रिमझिम कर रहे हैं,
स्वर रसीले हो रहे हैं !

धन्य पावन ऋतु तुम्हें,
जो सिन्धु से सरिता मिली है
विरह से सूखी विरहिनी,
प्रेम जल पाकर खिली है
द्रुमदलों के प्रिय गलों में,
प्रेम से लिपटी लताये
आज लज्जा छोडकर
पावस-प्रणय के गीत गायें

गगन चुम्बन से धरा के
गाल नीले हो रहे हैं
कल्पना के घन बरसते,
गीत गीले हो रहे हैं !
-रिमझिम