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हे राम!

मनुबहन गाँधी
नियमानुसार बापू प्रार्थना के लिए जगे, मुझे भी जगाया।... आजकल सुशीला बहन नहीं हैं, इसलिए गीता-पाठ मुझे ही करना पडता है। भाई साहब और प्यारेलालजी जागते रहते हैं, तो वे आवाज में आवाज ही मिलाते हैं।... तो गीता के श्लोक बोल ही नहीं पाते।...उठे नहीं, इसलिए बापू ने दातुन करते हुए आज भी एक बात कही- मैं देख रहा हूँ कि मेरा प्रभाव मेरे निकट रहने वालों पर से भी उठता जा रहा है। प्रार्थना तो आत्मा को साफ करने की झाडू है। मैं प्रार्थना में अटल श्रद्धा रखता हूँ। ऐसी प्रार्थना करना... जैसी को पसन्द नहीं पडता, तो फिर उसे चाहिए कि मेरा त्याग ही कर दे। इसी में दोनों का भला है। यदि तुझमें इतनी हिम्मत हो, तो मेरी ओर से उसे यह कह देना। समझा देना कि ये सब बातें मुझे अच्छी नहीं लगतीं। यह सब देखने के लिए भगवान अब मुझे अधिक न रखे, यही चाहता हूँ। आज मैं तुझसे यह भजन सुनना चाहता हूँ।
थाके न थाके छतांय हो,
मानवी न लेजे विसामो
आश्चर्य की बात है कि आज पहली बार बापू ने यह भजन पसन्द किया! मुझे खुद को बापू के बारे में कुछ विलक्षण-सा ही लग रहा है। कभी-कभी यह भी आशंका होने लगती है कि कदाचित् ये पुनः अनशन तो नहीं करने जा रहे हैं? आज दोपहर को सरदार दादा विशेष रूप से मिलने के लिए आने वाले हैं। वे और बापू एकान्त में बातचीत करेंगे। उसके बाद कल-परसों मंत्रिमण्डल की बैठक बुलाकर सारा निर्णय किया जाएगा। देखें, ईश्वर इसे कहाँ तक सफल करता है? कल सुबह भाई भी आ रहे हैं।
प्रार्थना के बाद में बापू को बरामदे से भीतर ले आयी। उन्हें कपडा ओढाया। बापू कल रात तैयार किए हुए कांग्रेस संविधान के मसविदे का संशोधन करने बैठ गये। नियमानुसार पौने 5 बजे गरम जल, शहद और नीबू और पौने 6 बजे सन्तरे का रस 16 औंस लिया। अभी उपवास की कमजोरी तो है ही। लिखते-लिखते थक जाने से बापू बीच ही में सो गए और मैंने उनके पैर भी दबाए।
पू. किशोरलाल भाई को कल जो पत्र लिखा था, नकल न हो सकने के कारण वह बापू के कागजों में ही पडा रह गया। बापू को यह अच्छा नहीं लगा। मैंने सहज ही पूछा कि इसमें एक पंक्ति यह लिख दूँ कि हम लोग दूसरी को वर्धा जानेवाले हैं?, तो बापू ने कहा- कल की कौन जानता है? अगर जाना तय ही हो जाएगा, तो आज प्रार्थना में कह दूंगा। फिर रात में रेकार्ड रिले होगा, तो उसमें वह आ ही जाएगा। फिर भी इस तरह चिट्ठी पडी रहनी नहीं चाहिए थी। भले ही यह काम बिसेन का हो, लेकिन तू मेरे किसी भी काम से मुक्त नहीं हो. सकती। दूसरों की गलती होने पर भी मैं उसे तेरी ही गलती मानता हूँ, अगर तू उसे स्वीकार करे। मैंने कहा ः मुझे तो स्वीकार करना ही होगा। प्रसन्न हो गए। बापू प्रसन्न हो गए।
टहलते समय श्रीमती राजेन नेहरू आयीं। मैं घूमने के लिए जानेवाली नहीं थी, पर मुझे जबर्दस्ती चलने के लिए कहा।
आठ बजे नियमानुसार मालिश और स्नान हुआ। मालिश के समय अखबार देखे। बंगाली पाठ किया। फिर मालिश के कमरे से बाथरूम में लाया गया। उस समय उन्होंने प्यारेलालजी से कहा- कल रात मैंने कांग्रेस का मसविदा (संविधान) हरिजन में भेजने के लिए बना रखा है। उसे ठीक से देख लें और विचारों की जो कमी रह गयी हो, उसे पूरी कर दें। बहुत ही थके-माँदे मैंने उसे तैयार किया है।
नियमानुसार मैं बापू को बाथ देती रही। मुझसे कहने लगे कि तू हाथ की कसरत करती है या नहीं? मैंने ना कहा। इस पर कहने लगे- यह तो मुझे जरा भी पसन्द नहीं। मैंने कहा- फिर तो करना ही होगा। बापू ने कहा अवश्य! तेरा वजन नहीं बढता और तबीयत नहीं सुधरती, इससे मुझे बहुत ही दुःख होता है। जब तू अपने बाप के यहाँ से नोआखाली आयी, तो कितनी तन्दुरुस्त थी! तेरा शरीर नहीं सुधरता, इसका कारण तेरा भावुक और संवेदनशील स्वभाव ही है। कभी किसी के दुःख से अधिक दुःखी या किसी के सुख से अधिक प्रसन्न न होना चाहिए। दोनों में सन्तुलित स्वभाव रखने पर ही भगवान का सानिध्य पाना आसान होता है। यह कानून मेरा नहीं, अनादिकाल से चला आ रहा है। और सभी धर्म-ग्रन्थों में लिखा है। स्थितप्रज्ञ होने के उपायों में इसे भी एक माना गया है। तू 18 वर्ष की उभरती छोकरी है। मैंने तेरा मन कितना गढा है, इसका खयाल तुझे आज नहीं हो सकता। नोआखाली से लेकर आज तक मैंने तुझे खूब तपाया है और तरह-तरह के विलक्षण अनुभवों से गढा हैं। भले ही आज तुझे इसका मूल्य न मालूम पडे, लेकिन मेरे ये शब्द लिख रखना कि तेरे भावी जीवन के लिए यह बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगा, कदाचित् मैं जिन्दा रहूँ या न रहूँ।

तू जानती ही है कि... आज सुबह प्रार्थना के समय नहीं उठी। इसलिए मैं सोच रहा हूँ कि आखिर मुझमें कहाँ खामी है? दूसरी लडकियाँ या और कोई इस यज्ञ में मेरा साझीदार नहीं। अकेली तू ही मेरी सेवा और मेरे कार्मों की जिम्मेदारी उठा रही है। इसमें तनिक भी भूल नहीं होने देती। लेकिन अपनी तबीयत सँभाल रखना भी मेरी सेवा का एक अंग है। अतः यह जिम्मेदारी भी तुझे अदा करनी ही चाहिए।-बाथ के समय बापू ने बडे ही प्रेम से ये बातें कहीं और मेरी पीठ सहलायी।
बाथ से निकलने के बाद वजन किया गया- साढे 1॰9 पौण्ड हुआ। भोजन में उबाला हुआ शाक, बारह औंस दूध, एक-आध मूली और करीब चार-पाँच फ टमाटर और चार सन्तरों का रस लिया। खाते समय प्यारेलालजी के साथ नोआखाली के विषय में बातें हुईं। उन्होंने आबादी की अदला-बदली के बारे में बापू से पूछा, जिस पर बापू ने साफ-साफ कह दिया ः
हम लोगों ने तो करेंगे या मरेंगे यह मंत्र लेकर ही नोआखाली का वरण किया है। भले ही आज मैं यहाँ बैठा हुआ हूँ, पर काम तो नोआखाली का ही चल रहा है। हमें जनता को भी इसके लिए तैयार करना चाहिए कि वह अपनी इज्जत और सम्मान बनाए रखने के लिए बहादुरी के साथ वहीं रहें। भले ही अन्ततः वहाँ गिने-गिनाये लोग ही रह जाएँ, लेकिन जहाँ दुर्बलता से ही सामर्थ्य पैदा करनी हो, वहाँ दूसरा उपाय ही क्या है? आखिर सशस्त्र युद्ध में भी साधारण सिपाहियों का सफाया होता ही है। फिर अहिंसक युद्ध में उससे भिन्न और हो ही क्या सकता है? -और उन्हें नोआखाली जाने का ही सुझाव दिया।
फिर पैरों में घी मलवाते हुए बापू ने थोडा आराम किया। थोडी देर सोकर पुनः उठे और बाथरूम में जाने के लिए बाहर के पटरे पर से आ रहे थे। मैंने कहा- बापू! अकेले ही अकेले आ रहे हैं, तो कैसे लग रहे हैं? (कमजोरी के कारण इधर वे बिना किसी का सहारा लिए चलते नहीं थे) बापू ने कहा- क्यों, अच्छा दीखता है न? एकला चलो!
साढे 12 बजे डॉ. भार्गव को नर्सिंग होम बनाने के लिए एक मकान चाहिए, यतीमखाने की बात कही गयी। बापू ने कहा कि जब स्थानीय मुसलमान यहाँ आते हैं, तब मुझे इसके लिए याद दिलाएँ। उन्होंने यह भी कहा हुकूमत मुझसे डर-डरकर कब तक चलेगी? मेरे डर से नहीं, बल्कि अपने मन से करना चाहिए। जब नियोगी यहाँ आएँ, तो पूछ देखें। बापू के पास मुसलमान लोग आए, तो उन्हें याद दिलायी गयी। लेकिन उन्होंने कहा कि अभी उसे दिया जाए, तो अच्छा है। बापू ने कहा- अच्छा, मैंने तो वैसे ही पूछ लिया। इसके पीछे हमें वक्त देने की जरूरत ही क्या है?
उसके बाद मौलाना रहमान ने सेवाग्राम के बारे में पूछते हुए कहा कि आप वहाँ जा सकते हैं, पर 14 को वापस लौट ही आएँ। बापू ने कहा ः हाँ, चौदह को तो मैं यहीं रहूँगा। फिर वह सब तो खुदा के हाथ में है। वह तो आसमानी सुलतानी बात है।
महादेव भाई की जीवनी लिखने का डायरी-संपादन करने का काम व्यवस्थित होने जा रहा था। उस बारे में शान्तिकुमार भाई के साथ बातें कीं। शान्तिकुमार भाई की शिकायत थी कि चन्द्रशंकर भाई और नवजीवन के बीच झगडा चल रहा है। अधिक पैसा लेने की बात है।
बापू ने कहा ः जहाँ देखता हूँ, वहीं जैसे यादव आपस में कट मरे, वही स्थिति हमारी है। हम लोग आपस में झगडा कर समाज की कितनी हानि कर रहे हैं, इसका खयाल किसी को भी नहीं आता। इसमें आप या और कोई कर ही क्या सकता है? इन सबमें मेरी ही खामी है। ईश्वर ने ही मुझे अन्धा बना दिया हो, तो कोई क्या कर सकता है? फिर भी अपने जीते जी यह सब अपनी आँखों देखकर जितना सुधार सकूँ, उतना सुधार लूँगा, जिससे भावी पीढी की गाली न खानी पडे; इतना ही भगवान का आभार मानिये।
यह काम मुझे ही करना चाहिए। डायरी को अच्छी तरह ग्रन्थरूप में बनाना ही होगा। नरहरि की तबीयत साथ नहीं देती और अब?...इसने तो मेरे सभी काम से छुट्टी पा ली है। लेकिन वह बिना समझे-बूझे ली है, यह कैसे कहा जा सकता है? क्योंकि सभी अपने-अपने विचार के लिए स्वतन्त्र हैं। यदि चन्द्रशंकर यह बोझ उठाता है, तो वह अपनी कमाई खर्च करेगा। इन दोनों के अक्षरों में कितना साम्य है? मैं उसे लिखूँगा।
डॉ. सिल्वा और उसकी लडकी लंका में मुख्य प्रतिनिधि थे। अपना आटोग्राफ दिया।
दोपहर में बिसेन भाई के साथ चिट्ठियों का रुका हुआ काम पूरा करने के लिए कहा। 2 बजे मिट्टी ली। पैर दबाये। बापू ने मिट्टी उतारी। हम लोग बापू से छुट्टी लेकर शहर में एक सम्बन्धी के यहाँ मिलने गए। वहाँ से सवा 4 बजे लौटे।
यदि जीवित रहा तो...
बापू और सरदार दादा बातचीत कर रहे थे।... काठियावाड के बारे में भी चर्चा हुई। इसी बीच काठियावाड के नेता रसिक भाई पारीख और ढेबर भाई भी आ गए। उन्हें बापू से मिलना था। लेकिन आज तो एक क्षण खाली नहीं है। फिर भी मैंने उनसे कहा कि बापू से पूछकर समय तय किए देती हूँ। बापू और सरदार दादा बातों में एकदम तल्लीन थे। मैंने पूछा तो कहने लगे ः उनसे कहो कि यदि जिन्दा रहा, तो प्रार्थना के बाद टहलते समय बातें कर लेंगे। मैंने उनसे प्रार्थना के लिए रुक जाने को कहा। कारण यदि वे प्रार्थना के बाद तत्काल न मिल लेंगे, तो और कोई घुस ही जाएगा और फिर बातें न कर पाएँगे। वे रुक गए और बापू के कमरे में जा बैठे।
* इसके बाद की डायरी मैं पहली फरवरी की रात में दो बजे लिख रही हूँ। क्या लिखूँ। समझ में ही नहीं आता! पूरे बिरला भवन में रोने के सिवा कुछ भी नहीं है। अरे! क्या बापू सोये हुए तो नहीं हैं? मुझे इतनी देर तक लिखती देख उलाहना देने के लिए उठकर तो नहीं आएँगे? नहीं, नहीं, बापू! आप मेरी भूल क्षणभर भी क्षमा नहीं करते थे और आज इतने उदार हो गए? हाय, मुझ पर गजब ढा गया! मुझसे कहते थे ः इस यज्ञ में तू और मैं दो ही हैं। तू मुझे छोड सकती है, पर मैं तुझे नहीं छोड सकता। लेकिन आज तो बापू ! आप ही मुझे छोड गये! भाई कल आने वाले हैं। क्या मुझे सौंप देने के लिए ही तो चार दिन पहले उनको चिट्ठी नहीं लिखी? कुछ भी नहीं सूझता!... पण्डितजी का यह बुक्का फाड-फाडकर रोना अच्छे-अच्छे धीर-गम्भीर लोगों का भी हृदय विदीर्ण कर देता है। नन्हा गोपू कह रहा है ः मनु बहन! दादा क्यों सोये हैं?....
थाके न थाके छताये हो!
.... बापू सरदार दादा के साथ बातचीत में इतने तन्मय हो गए थे कि दस मिनट देर हो गयी। इस गम्भीर वातावरण में उन्हें विक्षेप करने की किसी को भी हिम्मत नहीं हुई। आखिर मणि बहन ने हिम्मत की ही, क्योंकि यह सभी जानते थे कि यदि बापू को समय का ध्यान न कराया जाए, तो बाद में हम लोगों पर नाराज हो जाएँगे। बातें करते हुए ही बापू ने भोजन भी कर लिया। भोजन में चौदह औंस बकरी का दूध, चार औंस शाक का रस और तीन सन्तरे थे। बातें करते हुए उन्होंने कताई भी कर ली। बिना यज्ञ किए खाना चोरी का खाना माना जाता है। अतः वे बिना कताई किए रह ही कैसे सकते हैं? आज ब्राह्म मुहूर्त कभी न कहलवाया हुआ यह भजन कि थाके न थाके छताये हो, मानवी न लेजे विसामों मुझसे गवाया। क्या बापू उसे साकार करना चाहते रहे हैं? चाहे जो हो, पलभर भी विश्राम लिए बगैर अपनी ज्वलंत प्रवृत्ति का वेग और भी बढा दिया। वे एकदम उठ खडे हुए।
नर्सों का धर्म
मैंने अपने हाथ में रोज की तरह कलम, बापू की माला, पीकदानी, चश्मे का केस और जिस पर प्रवचन लिखती हूँ, वह नोटबुक ले ली। दस मिनट देर हो जाने के लिए बापू ने रास्ते में नापसन्दगी जाहिर की ः आप लोग ही तो मेरी घडी हैं न? फिर मैं घडी के लिए क्यों रुका रहूँ? खासकर आजकल बापू घडी देखते ही नहीं। समयानुसार एक के बाद एक सारा काम यों ही कर लिया करते हैं। घडी को चाबी भी हम लोगों में से कोई दे दिया करता था। इसीलिए उन्होंने यह कहा। मैंने कहा कि बापू! आपकी घडी बेचारी उपेक्षा से दुबली होती होगी। इसी के उत्तर में उन्होंने यह बात कही। विनोद तो किया ही, पर साथ ही यह भी कहा कि मुझे ऐसी देरी बिलकुल पसन्द नहीं।
-चाँद बहन को दिल्ली में ही रखने की बात कही। अभी खुराक की मात्रा थोडी-सी ही बढायी है। यद्यपि अनशन के बाद अनाज तो अभी शुरू करना ही नहीं है, पर अब प्रवाही (तरल खाद्य) कम करना है ये बातें करते हुए प्रार्थना-स्थल की सीढियाँ चढे। कहने लगे ः प्रार्थना में दस मिनट देर हो गयी, इसमें आप लोगों का ही दोष है। सरदार दादा दो-चार दिनों बाद आए थे और ऐसे गम्भीर प्रश्नों पर चर्चा कर रहे थे कि टोकने की हिम्मत ही नहीं हुई, यह भी बापू को पसन्द नहीं पडा। उन्होंने कहा ः नर्सों का तो धर्म है कि साक्षात ईश्वर भी बैठा हो, तो भी वे अपना धर्म, अपना कर्तव्य पूरा करें। किसी रोगी को दवा पिलाने का समय हो गया हो और किसी भी कारण यह विचार करते रहें कि उसके पास कैसे जाया जाए, तो रोगी मर ही जाएगा। यह भी ऐसी ही बात है। प्रार्थना में एक मिनट की देर भी मुझे खल जाती है।
यह नियम-सा बन गया था कि प्रार्थना में जाते समय हम लोग ही बापू की लाठी का काम करती थीं। कभी हम लोग नाराज हो जाएँ और इस नियम के अनुसार लाठी बनना न चाहें, तो बापू हम लोगों को जबरदस्ती पकडकर लाठी बना लेते थे। लौटते समय दूसरी लडकियाँ रहती थीं।
हे राम!
बापू चार सीढियाँ चढे और सामने देख नियमानुसार हम लोगों के कन्धे पर से अपने हाथ उठाकर उन्होंने जनता को प्रणाम किया और आगे बढने लगे। मैं उनके दाहिनी ओर थी। मेरी ही तरफ से एक हृष्ट-पुष्ट युवक, जो खाकी वर्दी पहने और हाथ जोडे हुए था, भीड को चीरता हुआ एकदम घुस आया। मैं समझी कि यह बापू के चरण छूना चाहता है; रोज ऐसा ही हुआ करता था। बापू चाहे जहाँ जाएँ, लोग उनका चरण छूने और प्रणाम करने के लिए पहुँच ही जाते थे। हम लोग भी अपने ढंग से उनसे कहा करते कि बापू को यह ढंग पसन्द नहीं। पैर छूकर चरण-रज लेनेवालों से बापू भी कहा ही करते कि मैं तो साधारण मानव हूँ। मेरी चरण-रज क्यों लेते हैं? इसी कारण मैंने इस आगे आनेवाले आदमी के हाथ को धक्का देते हुए कहा ः भाई! बापू को दस मिनट देर हो गयी है, आप क्यों सता रहे हैं? लेकिन उसने मुझे इस तरह जोर से धक्का मारा कि मेरे हाथ से माला, पीकदानी और नोटबुक नीचे गिर गयी। जब तक और चीजें गिरी, मैं उस आदमी से जूझती ही रही। लेकिन जब माला भी गिर गयी, तो उसे उठाने के लिए नीचे झुकी। इसी बीच दन-दन... एक के बाद एक तीन गोलियाँ दगीं। अँधेरा छा गया! वातावरण धूमिल हो उठा और गगनभेदी आवाज हुई। हे राम! हे राम... कहते हुए बापू मानो सामने पैदल ही छाती खोलकर चले जा रहे थे। वे हाथ जोडे हुए थे और तत्काल वैसे ही नीचे जमीन पर आ गिरे। कितने ही लोगों ने उस समय बापू को पकडने का यत्न किया। आभा बहन भी नीचे गिर गयीं। एकदम उन्होंने बापू का सिर अपनी गोद में ले लिया। मैं तो समझ ही नहीं पायी कि आखिर यह क्या हो गया? यह सारी घटना घटते मुश्किल से 3-4 मिनट लगे होंगे। धुँआ इतना घना था। गोलियों की आवाज से मेरे कान बहरे से हो गए। लोगों की भीड उमड पडी।
हम दोनों लडकियों का क्या हाल हुआ होगा, यह तो शब्दों में लिखा ही नहीं जा सकता। सफेद वस्त्रों पर से रक्त की धार छूट पडी। बापू की घडी में ठीक 5 बजकर 17 मिनट हुए थे। मानो बापू जुडे हुए हाथों से हरी घास में पृथ्वी माता की गोद में अपार निद्रा में सो रहे हों और हमारे अनुचित साहस पर नाराज न होने पर माफ कर देने के लिए कह रहे हों।
उन्हें कमरे में ले जाने तक दस मिनट तो लग ही गए। दुर्भाग्य से वहाँ कोई डॉक्टर भी नहीं मिला। सुशीला बहन की प्राथमिक चिकित्सा (फर्स्ट एड) की पेटी में खोजने पर भी कोई खास दवा नहीं मिली। वे कहते ही थे कि मेरा सच्चा डॉक्टर तो रामजी है। हम अल्पात्मा लोग अपने स्वार्थ के लिए उन्हें जिलाने के निमित्त उनके अपने मात्र के लिए स्वीकृत इस सिद्धान्त को भ्रष्ट कर, शायद इसीलिए हमें उस समय कुछ सूझ नहीं पाया हो! सरदार दादा तो अभी अपने घर भी नहीं पहुँचे होंगे कि पीछे लौटे। हम लोग तो बुक्का फाड फाडकर रो रहे थे, पर बापू को आज दया नहीं आ रही थी! किसी समय मुझ जैसी को उदास देखते, तो उसका कारण जानने के लिए पिल पडते और उसे जानकर ही छोडते थे। लेकिन आज तो बापू सब कुछ सहन किए जा रहे हैं!
सात बोर की ऑटोमेटिक पिस्तौल की पहली गोली मध्य रेखा से साढे तीन इंच दाहिनी ओर नाभि से ढाई इंच ऊपर पेट में लगी। दूसरी मध्य रेखा से एक इंच दूर और तीसरी दाहिनी ओर छाती में मध्य रेखा से चार इंच दूर लगी थी। पहली और दूसरी गोली शरीर के आर-पार हो गयी थी और तीसरी फुफ्फुस में समा गयी थी। उसका ऊपर का कवच बाद में कपडों में मिला और आर-पार निकली हुई गोलियाँ तो प्रार्थना स्थल पर ही मिलीं। अत्यधिक रक्त बहने के कारण चेहरा तो करीब दस मिनट में ही सफेद पड गया।
बापू नहीं रहे!
भाई साहब ने तो कलेजे पर पत्थर रखकर अस्पताल में फोन का ताँता ही लगा दिया। बाहर तो हजारों मानवों की भीड उमड पडी थी। भाई साहब बडी मुश्किल से सरदार के बंगले से होकर विलिंगटन अस्पताल में पहुँचे। लेकिन वहाँ से भी निराश होकर वापस लौट आए। इस बीच कन्हैयालाल मुंशी आ गए। सरदार दादा भी तुरन्त पहुँच गए। मणिबेन ने हम लोगों को ढाढस बँधाया। मुझे गीता-पाठ शुरू करने के लिए कहा। मणिबेन के आने से और उनके तथा सरदार दादा के आश्वासन की ममताभरी मदद मिलने से मैं अपने को थोडा-सा सँभाल पायी और गीता-पाठ शुरू कर दिया। मुंशीजी ने पाठ में पूरा साथ दिया। इसी बीच कर्नल भार्गव आ पहुँचे और उन्होंने बापू का परीक्षण शुरू कर दिया। दो मिनट तो सरदार दादा से लेकर हम सभी उत्सुकताभरी आश्वासन की एक लहर का अनुभव करने लगे। ऐसा लगा कि राहत की कुछ खबर सुनायी पडे। किन्तु उन्हें तो देखते ही मालूम पड गया कि शरीर में अब कुछ जान नहीं। लेकिन कहावत है न कि डॉक्टर तो अन्त तक कुछ कहता ही नहीं। महापुरुष के प्रयाण का यह भयंकर समाचार देना इस डॉक्टर के लिए बापू को बेधने वाली भीषण गोली से भी कठोर था। इन्होंने मेरा तो ऑपरेशन बडी ही सावधानी से किया था। आज सुबह ही इनके और इनके नर्सिंग होम के बारे में बातें हो चुकी थीं। समय बिताने के लिए इन्होंने दस-पन्द्रह मिनट लगा दिए और अन्त में कह ही दिया ः मनु बेटी! अब बापू नहीं रहे!... वज्रप्रहार-सा यह समाचार सुनने के साथ ही जिस कमरे में रात में हम बच्चे और बापू किलकारियाँ भरते थे, वहीं भयंकर विलाप छा गया। देवदास काका, गोपू, दोनों सबसे छोटे लडके और नन्हा पौत्र सभी बापू की छाती पर कठिन वेदना से विलाप करने लगे। और पण्डितजी तो... ओहो!.. भगवन्, ऐसा दिन तो दुश्मन को भी देखने को न मिले! नन्हे बच्चे की तरह सरदार दादा की गोद में मुँह छिपाकर, बिलख-बिलखकर रोने लगे। फिर हम जैसों की तो बात ही क्या थी?
अन्तिम स्मृति की प्रसादी
देखते-देखते लाखों की भीड जुट गयी। करीब घण्टेभर तक यह सब चलता रहा। आखिर सरदार दादा ने अपने लौहपुरुष के बाने के अनुरूप इस कठोरतम परीक्षा को भी पास करने में कोई कोर-कसर नहीं दिखायी। अकेले वे ही सभी को ढाढस बँधा रहे थे। बापू के चश्मे और चप्पल का कहीं पता न था। तारीख 3॰ को प्रार्थना में जाने से पूर्व बातचीत करते हुए बापू ने खुद ही अपने नख काटे और मुझे फेंकने के लिए दिए थे। लेकिन मैं रसिक भाई और ढेबर भाई से बातें करने में उलझी रही, इसलिए वे कागज पर के नख वैसे ही रह गए। मैंने उन्हें अनमोल रत्न की तरह उठाकर सन्दूक में रख दिया (उनमें एक अंगूठे का, एक उँगली का और एक छोटी उँगली का भी नख था।)। इसे मैंने आज उनके शरीर का अन्तिम स्मृति की प्रसादी के रूप में अपने पास सुरक्षित रख लिया।
हमारे बापू !
अन्त में लार्ड माउण्टबैटन सभी को शान्त करने लगे। बाहर की भीड पूज्य बापू का समाचार सुनने के लिए आतुर है, इसलिए सरदार दादा ने रेडियो पर सारी बातें प्रसारित कर दीं। पण्डितजी तो बोल ही नहीं पाते थे। सारी हिम्मत बटोरकर बोले ः हमारे बापू... फिर एक गहरी साँस छोडकर सिसकते हुए कहा ः बापू अब हमारे पास नहीं रहे।...उस समय तो धरती भी काँप उठे, इस तरह जनता बिलख उठी।
अब कैसे करना!
आखिर जनता की असाधारण भीड देख छत पर से ही बापू का दर्शन कराने की व्यवस्था होने लगी। उस समय मैं किसी काम से बाहर निकली। पण्डितजी ने एकदम मुझे पकड लिया और क्षणभर भूल गए, कहने लगे ः मनु! आओ बापू को पूछो, अब कैसे करना! हे भगवन्!...ऐसे विद्वान, अपने देश और दुनिया के इस महापुरुष...! मैं तो उनके साये में खुलकर रो पडी। वे भी उतने ही रोये। उस समय हम दोनों की स्थिति में इतनी एकतानता थी कि इतने बडे पण्डितजी भी मुझे जैसी नादान बालिका को आश्वस्त करने में असमर्थ सिद्ध हुए।
शायद बापू जाग जाएँ!
..इसी बीच विभिन्न देशों के राजदूत आते हुए दीख पडे। उनके साथ पण्डितजी भीतर आए। सतत गीता पाठ करने में मैं ही प्रमुख थी। भाई साहब और काका सारी व्यवस्था करने के निमित्त बार-बार बाहर आते-जाते थे। सुशीला बहन तो थी ही नहीं। और सबसे श्लोक कहते नहीं बनते थे। प्यारेलालजी भी व्यवस्था में लगे हुए थे। फिर पण्डितजी कहने लगे ः मनु! और जोर से गीता-पाठ करो, शायद बापू जाग जाएँ! इतने वैज्ञानिक विद्वान होकर भी वे क्षणभर सब कुछ भूलकर बार-बार आते और बापू के शरीर पर हाथ फेरकर जाते थे, मानो स्वयं भूल तो नहीं कर रहे हों कि बापू सचमुच नहीं हैं।
महात्मा गाँधी की जय!
और कैमरे वालों का तो पूछना ही क्या है? छत पर मंच बनाया गया और बापू का शव लाया गया। उसे देख छोटे-बडे, आबाल-वृद्ध सभी की आँखों से अविरल अश्रुधाराएँ बह पडीं, मानो चारों ओर से बारिश ही हो रही हो। महात्मा गाँधी की जय के नारों से आकाश गूँज उठा। देखते-देखते जनता की श्रद्धांजलियों के साथ फूलों और पैसों का ढेर ही लग गया। सर्वधर्मों की समानतापूर्वक प्रार्थना जारी थी।
दो बजे बापू की देह को नहलाने के लिए बाथरूम में ले जानेवाले थे। लेकिन अच्छा हुआ कि पूज्य शान्तिकुमार भाई आ पहुँचे। वे पूज्य बा के अन्तिम समय में भी उपस्थित थे और आज बापू के भी! उन्होंने हिन्दूधर्मानुसार अन्त्यविधि करायी, याने अर्थी बनाना, गाय के गोबर से सारी जमीन लीपना आदि। यदि वे यह सब न बतलाते, तो साधारणतः हममें से कोई भी यह नहीं जानता था।
यह घडी भी उतनी ही भयंकर थी। बापू की देह बाथरूम में लायी गयी। एक-एक कपडा उतारा गया। बापू की आस्ट्रेलियन ऊन की शाल गोली से छिद गयी थी और तीन जगह जल भी गयी थी। धोती और चादर भी खून से सराबोर थीं।
बापू की देह पटरे पर सुलायी गयी। रक्त बहते हुए चरण भाई एकलो जाणे रे गीत की इस कडी को साकार कर रहे थे। काका और हम सब इस तरह आर-पार बिंधे हुए बापू के शरीर को देख फूट-फूटकर रो रहे थे, फिर भी क्रूर विधाता को दया नहीं आयी! हमारी हृदय विदारक चीखों से किसे क्योंकर दया आए? कारण हम लोग अत्यन्त पापी थे, फिर विधाता की दया की आशा कैसे रख सकते हैं? कडकडाती सर्दी और हिम-सा ठण्डा पानी बापू की देह पर छोडने की कौन हिम्मत करेगा?...
बापू को नहलाकर पटरा कमरे के बीच रखा गया। उस पर सफेद खादी की चादर बिछायी गयी और बापू की देह को सुलाया गया।
कर ले सिंगार!
भाई साहब ने उनके गले में सूत का हार और उनकी रामनाम जपने की माला पहनायी। गले में और छाती पर चन्दन-केसर का लेप किया गया। मस्तक पर कुंकुम तिलक लगाया गया। सिर की बाजू पत्तियों से हे राम और पैर की बाजू ॐ लिखा गया। सारा कमरा गुलाब और अन्य सुगन्धित फूलों से इतना सुवासित हो उठा था, मानो अर्थी सिर्फ फूलों से ही बनी हो। देखते-देखते साढे 3 का घण्टा बजा। आज मुझे जगाने के लिए बापू के प्रेमभरे हाथ का स्पर्श न हो पाया। आज भाई साहब को उठाते हुए ब्रजकिशन की पुकार सुनायी नहीं पडती थी। सभी ने कहा ः नियत समय पर ब्रह्म मुहूर्त में प्रार्थना की जाए। आज हम लोगों को आदेश देकर नम्यो कहनेवाले बापू की आवाज नहीं थी। दो मिनट की शान्ति कौन कहेगा?
और ईशावास्यमिदं सर्वम् से आरम्भ कर सारी प्रार्थना बडी मुश्किल से शुरू की। कर ले सिंगार भजन गाया और फिर वहाँ से नहीं आना होगा...। क्या बापू के इस पवित्र और तेजस्वी चेहरे का पुनः कभी भी दर्शन न होगा? प्रेमभरी आँखें! यह आश्रयदायी वात्सल्य! यह मुक्त हास्य! अजीब निडरताभरी विशाल छाती और इस चमकते श्वेत चर्म वाले बापू का कभी भी दर्शन न होगा? राग तो है आसावरी, पर है तो भयंकर निराशा ही!
फिर लोगों की असह्य भीड हो जाने से बापू की देह ऊपर लायी गयी। देश-विदेश के दूत एवं प्रतिनिधि और सरकारी नौकर भारतीय शान्ति के सम्राट के अन्तिम दर्शन के लिए पहुँच गये थे।
(यह मनुबहन गाँधी की सर्व सेवा संघ से प्रकाशित चर्चित पुस्तक बापू की अंतिम झाँकी से साभार)

भरत व्यास ः कुछ यादगार पल
घनश्यामदास बिडला से जुडा प्रेरक और यादगार संस्मरण
मेरे भामाशाह!
उन दिनों मैं बम्बई के फिल्म-क्षेत्र में पदार्पण कर चुका था। कुछ योजनाएँ थीं, जिनके समाधान के लिए मैं श्री घनश्यामदासजी से मिलना चाहता था। मैं उनके कार्यालय पहुँचा और चपरासी को चिट देकर पाँच मिनट मिलने का आग्रह किया। चपरासी वापस आया और बोला कि बाबूजी इस समय व्यस्त हैं। आप फिर कभी आइएगा।
मुझे थोडी झुंझलाहट हुई। मैंने एक और चिट लिखकर चपरासी से कहा कि वह इसे बाबूजी को दे आए। चिट पर मैंने लिखा था कि आप तभी तक व्यस्त हैं, जब तक लोग आपसे मिलने आते हैं।
पत्र लिखकर मैं लिफ्ट से नीचे उतर आया। लेकिन क्या देखता हूँ कि चपरासी मेरे पीछे-पीछे भागा चला आ रहा है। वह मुझसे बोला- चलिए, बाबूजी आपको बुला रहे हैं। यह उनके साथ मेरा दूसरा साक्षात्कार था। उन्होंने मीठे स्वर में कहा कि तुमने बहुत सुन्दर बात लिखी है, मैं जीवन पर्यन्त इस बात का ध्यान रखूँगा।
ऐसे थे, बाबूजी!
- भरत व्यास
(साप्ताहिक हिन्दुस्तान* से साभार)
प्रस्तुति - मुरली