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बॉस को गुस्सा क्यों आता है?

सुरेश अग्रवाल
जीवन संघर्ष का पर्याय है। प्रत्येक व्यक्ति विभिन्न प्रकार के संघर्षों का सामना करता हुआ अपने गन्तव्य तक पहुँचने का प्रयास करता है, किन्तु इनमें से कुछ ही इस गन्तव्य तक पहुँच पाते हैं; ज्यादातर लोग बीच में ही काल के गाल में समा जाते हैं। महेश कुछ इसी तरह से सोच रहा था- ईश्वर ने कितना कुछ दिया था उसे। वह बिना कुछ ज्यादा मेहनत किए अपनी कक्षा में सदैव फर्स्ट क्लास फर्स्ट आता रहा। दसवीं कक्षा से उसने टॉप करना शुरू किया था और यह सिलसिला अन्तिम कक्षा तक चला- ऐसा लगता था कि सफलता और महेश एक दूसरे के पर्याय हो गए हैं। इसके बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा में भी तो वह शीर्ष पर रहा था वह। प्रशासनिक सेवा में प्रथम प्रयास में सर्वोच्च स्थान हासिल करना जैसी सफलता असंभव नहीं, तो दुर्लभ अवश्य होती है। सफलताओं की इन सब सीढियों को उसने बिना ज्यादा संघर्ष किए प्राप्त कर लिया था, किन्तु अब उसकी जिन्दगी में जैसे एक ठहराव-सा आ गया था, जिन्दगी भार लगने लगी थी उसे। कलम का धनी एवम् नियमों का जानकार था वह। पैसों का मोह उसे छू तक नहीं गया था। कार्य की नियमितता, एवम् निरन्तरता बनाए रखने में उसका कोई शानी नहीं था। समाज में भी उसका सम्मान था। अगर वह चाहता तो इन सब गुणों का त्याग कर, केवल एक पैसे कमाने के गुण को धारण कर, सब जगह से वाही-वाही लूट सकता था। कइयों ने उसे जमाने के साथ चलने की सलाह भी दी थी, किन्तु....। अब उसके सेवाकाल के मात्र आठ वर्ष शेष थे। प्रशासनिक सेवा अधिकारी के रूप में ज्वाईन करने के बाद, आज वह अतिरिक्त प्रमुख सचिव के पद तक पहुँच गया था।
महेश भूतकाल में झाँक रहा था; किस तरह उसे यह कथन कि जवीन संघर्ष का ही नाम है- मजाक लगता था क्योंकि संघर्ष से उसका कभी वास्ता ही नहीं रहा। उसने जो चाहा - वह उसे स्वाभाविक रूप से मिल गया, किन्तु पिछले तीन वर्षों ने उसे भली-भाँति समझा दिया था कि जीवन और संघर्ष एक-दूसरे के समानार्थी है। आदमी जिन्दगी भर संघर्षों का ही तो सामना करता है-विचारों का संघर्ष, सिद्धान्तों का संघर्ष, गन्तव्य तक पहँचने का संघर्ष, उच्चता एवम् निम्नता का संघर्ष, सत्य एवम् झूठ का संघर्ष, नैतिकता एवम् अनैतिकता का संघर्ष, प्राचीनता एवम् नवीनता का संघर्ष, मान और अपमान का संघर्ष, और सबसे बडा लक्ष्मी और सरस्वती के बीच का संघर्ष। इन संघर्षों ने तीन वर्ष में ही उसे थका दिया था। वह आवश्यक सेवानिवृत्ति लेना चाहता था। किन्तु अभी तक उसने एक भी सांसारिक दायित्व पूरा नहीं किया था। बेटी की शादी भी उसे अभी करनी थी। बेटा भी अभी कुँवारा था और उसकी नौकरी भी नहीं लगी थी। और तो ओर लगभग 30 वर्ष के सेवाकाल के उपरान्त आज तक भी उसका अपना घर नहीं था। सरकारी आवास में ही रह रहा था वह किन्तु इन सब को कभी उसने संघर्ष माना ही नहीं। वह हमेशा सोचता था कि इन सबका एक समय निर्धारित होता है और ईश्वर स्वतः ही उन्हें पूर्ण कर देता है। बडा सुखी एवम् भरा पूरा परिवार था उसका। पत्नी भारतीय संस्कृति का प्रतिरूप एवम् बेटा-बेटी ऐसे मानो ईश्वर ने उन्हें मानवीय गुणों की मूर्त के रूप में इस दुनिया में भेजा हो। सभी पडौसियों से भी परिवार का अच्छा रिश्ता था, किन्तु कार्यालय उसे खाने दौडता था। वही कार्यालय जिसे वह चार वर्ष पूर्व अपनी रोजी की दुकान समझता था। उसके समर्पण एवम् कर्त्तव्य परायणता में आज भी कहीं कमी नहीं आई थी किन्तु अब कार्यालय का सम्पूर्ण परिवेश ही बदल गया था। उसका बॉस सैद्धान्तिक रूप से एक नौकरशाह अथवा शिक्षाविद् ही हो सकता था। नौकरशाह को तो कभी-कभार ही इस तरह का अवसर मिलता था। प्रायः कथित शिक्षाविद् ही इस पद पर मनोनीत होता था। यह एक ऐसा शिक्षाविद् होता था जो शिक्षा का जानकार कम और राजनीतिज्ञ ज्यादा होता था। विगत तीन वर्षों में उसके विभाग का स्तर इस कदर गिरा था कि रसातल भी उसके लिए कम नजर आएगा। यह सब देखकर महेश को बहुत निराशा होती थी। विगत तीन वर्षों में महेश की दुनिया ही बदल गई थी- आशा से निराशा में, प्रसन्नता से पीडा में, सकारात्मकता से नकारात्मकता में। विपदा होती ही ऐसी चीज है जो मित्र को शत्रु में, मानव को दानव में परिवर्तित कर देती है। महेश के साथ भी ऐसा ही हुआ। नियमानुसार काम करने की उसकी प्रवृत्ति ने मित्रों को शत्रुओं में परिवर्तित कर दिया। काश! उसने भी यश बॉस कहना सीख लिया होता। बॉस के ड्राईवर मोहन ने भी कितनी बार समझाया था उसे। ड्राईवर मोहन की यह बात आप हाँ में हाँ मिलाना सीख क्यों नहीं लेते साहबजी; आप के गुणों की साहब भी बहुत प्रशंसा करते हैं, अक्सर महेश के दिमाग में घूम जाती थी। दिमाग कहता था ऐसा करने में बुराईं क्या है, किन्तु दिल नहीं मानता था। दिल और दिमाग की यह लडाई सदैव रही है। महेश एक प्रशासक के रूप में इस बात को भली-भाँति जानता था कि सफल प्रशासन का आधार दिल ही होता है, दिमाग नहीं। पर अब इस दिल ने ही उसे कामचोर, घमण्डी, पूर्वाग्रही इत्यादि नामालंकरणों से विभूषित करवा दिया था। महेश इस बात को कदापि समझ नहीं पाया कि दुनिया आब्लीगेशन्स से चलती है और बॉस में ऑब्लाइज करने का सामर्थ्य था। इस सामर्थ्य ने ही बॉस को अधिकतर का चहेता किन्तु महेश जैसे निष्ठावान एवम् समर्पित कार्यकर्ता का विरोधी बना दिया था।
महेश का इमीडियेट बॉस ही उस विभाग का सबसे बडा अधिकारी भी था। इमीडियेट बॉस होने के कारण किसी न किसी कार्यवश उससे प्रतिदिन मिलना हो ही जाता था, न मिलने की स्थिति में बॉस उसे स्वयं बुला लेता था। बॉस को निर्माण कार्य का बहुत शौक था। बॉस का यह भी मानना था कि किसी संस्थान की बिल्डिंग व इन्फरास्ट्रक्चर ही तो उसकी दुनिया में इमेज को डिसाइड करता है। इस बिल्डिंग की मजबूती भी इस कदर हो कि आने वाली शताब्दियों में भी इसकी इमेज खराब न हो। अतः इन भवनों की मजबूती बनाए रखने हेतु इनका सिंचन देशी घी से किया गया। इस देशी घी का प्रयोग केवल कागजों में ही दिखता था, अन्यत्र नहीं। बॉस को इस कार्य में इतनी दक्षता प्राप्त थी कि वह किसी भी अधीनस्थ को इसके लिये राजी कर लेता या यों कहें कि किसी भी अधीनस्थ में ना कहने का साहस नहीं था।
महेश के इमीडियेट बॉस की नौकरी एक निर्धारित समय के लिए होती थी। महेश इस विभाग में पहले से ही कार्यरत था और उसे तो रिटायरमेंट तक इसी विभाग में सेवाएँ देनी थी। बॉस ने दो वर्ष पूर्व ही ज्वाईन किया था, जबकि महेश इस विभाग में विगत सात-आठ वर्षों से कार्यरत था। महेश को यह देखकर आश्चर्य होता था कि ज्वाइनिंग के समय यह इमीडियेट बॉस कर्मचारियों एवम् शिक्षाविदों के लिए किसी तानाशाह से कम नहीं था। महेश के स्मृति पटल में आज भी वे दृश्य उभर आता हैं, जब यही इमिडियेट बॉस एक-एक कर्मचारी को बुलाकर उनकी गलतियाँ निकालता था एवम् प्रायः कहता था आपको कुछ आता-जाता नहीं है। ज्वाइनिंग के दो महीने बाद तक किसी भी फाइल को अप्रूव नहीं किया था उसने, किन्तु उसके बाद उसमें एक अभूतपूर्व परिवर्तन आया। महेश इस बात को समझ नहीं पाया कि वह इस तरह सबकी कमजोरियाँ ढूँढकर अपनी दुकान चलाना चाहता था। यह दुकान भी विचित्र ही थी - इसमें लेन-देन नहीं होता था। इसमें केवल लेना ही होता था। कितनी खरीददारियाँ हुई थीं? कितने निर्माण कार्य चल रहे थे? पहले से निर्मित भवनों को रिस्ट्रक्चर करने के नाम पर भी पैसा पानी की तरह बहाया गया था। विभाग के विशाल कैम्पस में निर्माण कार्य ही नजर आते थे- ऐसे निर्माण कार्य जिनका कोई औचित्य ही नहीं था। विभाग स्टेक होल्डर्स की संख्या नगण्य ही थी। इमीडियेट बॉस के भी अपने आका थे जो हमेशा इमीडियेट बॉस के लिए सुरक्षा कवच का काम करते थे।
महेश नियमानुसार ही कार्य करता था- स्टेक होल्डर्स की संख्या बढाने के लिये इमीडियेट बॉस ने उसको कई बार कहा था - वह चाहता था कि महेश किसी भी तरह स्टेक होल्डर्स की संख्या बढाए, नियमों की पालना किए बिना ही स्टेक होल्डर्स की संख्या बढाए- किन्तु महेश को यह कहने का साहस उसमें नहीं था। अगर वह कह भी देता, तो महेश फाइल पर उसकी अप्रूवल के बगैर यह काम नहीं करता। इस तरह महेश बॉस का पक्का दुश्मन बन गया। महेश के विरूद्ध पब्लिक को भी भडकाया गया- उसके कार्यालय में घुसकर कुछ असामाजिक तत्त्वों ने बदत्तमीजी भी की थी, किन्तु उनके विरूद्ध कोई कार्रवाही नहीं की गई। यह बात अलग है कि इमीडियेट बॉस स्वयं भी अनेक बार अपने कारनामों की वजह से इन असामाजिक तत्त्वों की हरकतों का शिकार हुआ था।
कलयुग है; इसमें पापी ही पल्लवित होता है, किन्तु यह भी सत्य है कि पापी को दण्ड भी यहीं मिल जाता है- अगले जन्म तक इंतजार नहीं करना पडता। कलयुगी पापी भी अजीब होते हैं; उन पर एक धुन सवार होती है येनकेन प्रकारेण अपना लक्ष्य पूरा करने की। इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु वे एक मार्ग तय करते हैं - ऐसे दुराचारी अगर वे सरकारी सेवा में है, तो ज्वाइनिंग करते ही अधिकारियों एवम् कर्मचारियों में एक खौफ पैदा करते है कि सब कुछ नियमानुसार होना चाहिये। आरोप भी लगाए जाते हैं कि उन्हें कुछ नहीं आता या फिर वे काम को करना नहीं चाहते। जब एक अनुकूल माहौल निर्मित हो जाता है, तब वे अपने लक्ष्य पूर्ति हेतु उसी तरह से उतावले हो जाते हैं जिस तरह से एक गिद्ध खाद्य सामग्री देखकर झपट पडता है। ईश्वर ने भी सोच समझकर एक परिवेश निर्मित किया है जिसमें पापी को दण्ड मिलना अवश्यम्भावी होता है; यद्यपि कई बार इस प्रक्रिया में अति विलम्ब हो जाता है। इमीडियेट बॉस का एक ही उद्धेश्य था लक्ष्मी को प्रसन्नकर घर में कुबेर जैसे भण्डार भरना। वह अपने इस उद्धेश्य में किसी हद तक सफल भी हुआ था। लोग उसके बारे में कहते थे कि राज्य की राजधानी में उसके पास अनगिनत भूखण्ड थे; इस बेनामी सम्पत्ति को इंगित करते हुए ही किसी ने महेश को कहा था कि कहीं भी एक पत्थर का टुकडा जोर से उछालों, जहाँ गिरेगा वहीं बॉस का भूखण्ड होगा। महेश सोच भी नहीं सकता था कि किसी व्यक्ति के पास अनाप-शनाप पैसा होने के बावजूद भी वह इतना कंजूस हो सकता है। बॉस का सारा खर्च सरकारी खर्च में ही सम्मिलित होता था। इतना पैसा होने के बावजूद भी पारिवारिक प्रसन्नता जैसी कोई चीज नहीं थी बॉस के जीवन में। गृह क्लेश और इमिडियेट बॉस समनार्थक हो गए थे। महेश को जैसा बॉस के नजदिकियों ने बताया था कि वह घर में भी एक किरायेदार की जिन्दगी जीता था। दुराचार तक के आरोप लगाए थे महिला परिवारजन ने उस पर। मामला न्यायालय तक पहुँचा था, किन्तु समाज के कुछ बडेरों ने बीच-बचाव कर समझौता करवाया था।
बॉस पर इस सब का ज्यादा प्रभाव नजर नहीं आता था। पैसा कमाना उसका एकमात्र उद्धेश्य था। महेश आज तक भी वह दिन नहीं भूला है कि किस तरह से वह एक अन्य अधीनस्थ अधिकारी के गम्भीर रूप से बीमार होने के बावजूद उसके दस्तख्त करवाने हेतु फाइल लेकर अस्पताल पहुँच गया था। किस तरह से एक अधिकारी को बॉस का वांछित काम नहीं करने हेतु, भयंकर रूप से डाँटा गया था। यद्यपि वहाँ करीब तीन कनिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे, किन्तु किसी ने कुछ भी नहीं कहा था- महेश भी उनमें से एक था। महेश आज तक इस जघन्य पाप के लिए अपने आप को क्षमा नहीं कर पाया है।
तानाशाही और पैसा एक-दूसरे को पोषित करते हैं। पैसे से तानाशाही को खरीदा जाता है और फिर इस तानाशाही तंत्र का प्रयोग कुबेर की तिजोरियाँ भरने में किया जाता है। बॉस इस उक्ति का अक्षरशः पालन करता था। एक तानाशाह के रूप में वह कर्मचारियों और अधिकारियों का सार्वजनिक अवसरों पर अपमान करने में भी चूक नहीं करता था। सभी का विश्लेषण करने का अधिकार उसे था; वह एक वरिष्ठतम अधिकारी को भी यहाँ तक कह देता था कि आपको अधिसंख्य लोग पसंद नहीं करते, किन्तु स्वयं का आकलन कभी नहीं करता था वह। एक बार महेश ने उसे स्वयं का विश्लेषण करने की सलाह क्या दी थी कि वह उसके कोप का शिकार हो गया था।
तानाशाही सत्य से परे होती है; झूठ ही इसका आधार होता है। आपस में दो व्यक्तियों को लडाकर तानाशाही की इस नींव को पल्लवित करने की कोशिश भी होती है, यही तो बॉस का एजेण्डा था। इस एजेण्डे का अन्तिम लक्ष्य अकूत धन अर्जित करना था। जो भी इसमें बाधक होता था, बॉस के गुस्से का शिकार उसे होना पडता था। बॉस जानता था कि तानाशाही हेतु कुछ लोगों को आब्लाइज भी करना पडता है, वह इसे बखूबी करता था।
इतिहास के पन्नों का अवलोकन करें, तो ज्ञात होता है कि इन तानाशाहों के अन्तिम दिन अच्छे नहीं निकलते। आज बॉस के रिटायरमेंट का दिन था- किन्तु बॉस के चेहरे पर गुस्सा बिल्कुल नहीं था क्योंकि गुस्सा तो आता ही तब है, जब हम हमारी कामनाओं की तृप्ति हेतु अपने आप को खुला छोड देते हैं। बॉस के लिए कामना पूर्ति के सभी रास्ते आज बंद हो चुके थे। बॉस के चारों तरफ अटूट सन्नाटा था, अटूट सन्नाटा।

सम्पर्क अंग्रेजी विभाग
महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय,
बीकानेर (राज.)