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रमजान में मौत

वंदना राग
क्या लेखक नजूमी भी हो सकता है? खासतौर से ऐसा लेखक जो घोर नास्तिक हो और भाग्यवादी बिल्कुल नहीं। कैसे उसकी पहली बहुचर्चित कहानी रमजान में मौत बनती है और वह रमजान के महीने में ही इस फानी दुनिया को अलविदा कह देता है। एक बार उनसे जो पूछा था कि लेखक अपना कितना प्रतिशत अपनी रचना में डालता है, तो संजीदा होकर कहा था उन्होंने-अपना ही तो निकाल कर रखता है, कतरा -कतरा, रेशा -रेशा। आज लिखते हुए सब सुर्रीयल लग रहा है। अविश्वसनीय! ऐसी इन्टरस्टेलर लगती थी नहीं उनकी छवि। फिर उनका जीवन और लेखन साँसों की अंतरयात्रा कैसे हो गया? जैसे तारों के बीच झूला झूलती एक सुकून भरी रोशनी।
उनकी लिखी कोई भी किताब उठा लीजिए, सबकुछ इतना नजदीकी लगने लगता है कि एक अजीब सी बेचैनी मन में घर करने लगती है। लगता है वे पास ही हैं मेरे, मुझे प्यार से कमबख्त बुलाते हुए।जैसे उनके पास बैठी सुन रही हूँ उनके रचना संसार के अनजाने सच। जो कहते थे, वही तो उनकी किताबों से अनुगुंजित होता है।
वे अपनी रचनाओं में चीजों की पडताल अपने जीवन से, अपने तजुर्बों से करते हैं। और कईं बार यह असमंजस पेश आता है कि कैसे अलग करें उनको, उनके लिखे हुए से? ना,नहीं कर सकते हम। कत्तई नहीं कर सकते। और यदि उनको याद करती हूँ तो निश्चित हो जाता है, शायद वे कभी चाहते भी नहीं रहे होंगे कि ऐसा किया जाए। और शायद यही जायज और न्यायसंगत भी होगा। कि लोग उसे पहचानें, तो उसके लिखे हुए से और उसमें और उसके लिखे हुए में बारीक सूत भर का फरक हो बस! उन सरीखे बडे लेखकों को शायद हम ऐसे ही इज्जत अता फरमा सकते हैं। ऐसे लेखक भी इसी कामना के साथ जीते हैं और जीते चले जाते हैं, हमरे संग अपनी किताबों की मार्फत, शरीर छोडने के बाद भी।
सोचती हूँ,उन्होंने क्या सोचकर दास्तान-ए-लापता शीर्षक से उपन्यास लिखा होगा और आज मैं उनके इस शीर्षक के संग उनकी खोज कर रही हूँ। उन्होंने तो बताया नहीं कभी- क्यों दास्ताने लापता? जिंदगी के उत्कर्ष पर ऐसा आत्मकथ्यात्मक उपन्यास लिखने का ख्याल क्यों आया उन्हे? लेकिन उनसे हजारों तरह की बातें करते -करते जान लिया था मैंने। यह एक ऐसे लेखक, ऐसे इंसान की कहानी थी जो भीड में भी खुद को अकेला पाता है। उस दौर में भी मैं सोचा करती थी, क्या इंसान और लेखक दो अलग लोग होते हैं?और उनके इस उपन्यास ने मुझे इस प्रश्न के उत्तर के दोराहे पर खडा कर दिया था। फिर जैसे -जैसे समय गुजरता गया उत्तर मिलता चला गया। बेजोड तार्रूफ हुआ उस बडे लेखक और उतने ही बडे इंसान से।ऐसा बडा लेखक जिसके अंदर नैसर्गिक शर्मीलापन था जो उसके रचना संसार में भी दिखलाई पडता था। जिस लेखक की यात्रा एक अंतर्मुखी यात्रा थी जो सिर्फ संकेतों में व्यक्त होती थी। ज्यादा शब्द खर्च करने का उतावलापन कहीं नहीं दिखता था बल्कि एक किस्म की ऐसी नफीस मितव्ययिता दिखती थी, कि पढने वाला हैरान रह जाता है। पढने वाले का सामना एक ऐसे धीमे दुख से भी होता है जो अंदर ही अंदर उतराता रहता। आपको ऐसे गिरफ्त में ले लेता है, जहाँ से आजीवन छूटने के उपाय नहीं। दास्ताने लापता व्यक्तिगत संसार को छीलता है, चुपचाप से। सालता रहता है खामोशी से। यह उपन्यास भारत से ज्यादा अमेरिका में चर्चित हुआ। उसका अनुवाद The Tale of the Missing Man शीर्षक से हुआ और उसे ग्लोबल ह्यूमैनिटीज ट्रांसलेशन प्राइज मिला, जो हर भारतीय के लिए फख्र की बात होनी चाहिए थी, हिन्दी पट्टी के लिए एक शानदार बडी खबर होनी चाहिए थी, लेकिन अफसोस कुछ लेखक के चुप रहने की आदत और कुछ सकीर्ण मिजाज साहित्यिक परिदृश्य की वजह से, यह खुशी चंद दोस्तों में सिमट कर रह गयी।
वे खुद अमेरिका गए थे इस पुरस्कार के मिलने पर। यह 2018 की बात है। यह उन दिनों की बात भी है, जिसकी स्मृति इस महामारी ने क्षीण कर दी है। वे खौफ और अंदेशों से आजाद, खूबसूरत से दिन थे जब वे पुरस्कार लेकर लौटे थे और दिल्ली में मेरे घर पर जश्न हुआ था। अंतिम जश्न की अमीर स्मृतियाँ हैं मेरे मानस में लेकिन अब वे नहीं हैं। स्मृतियाँ ही उनकी प्रतिछायाएँ हो गईं हैं।
उसी वर्ष दिल्ली से लौटने के बाद वे बीमार हो गए थे। और साहित्य जगत से उनका नाता कटने-सा लगा था। उनकी बीमारी की खबर एक झटके की तरह आई थी हम सबके पास। वे क्लांत और चुप हो गए थे।पहले की अपेक्षा और भी कम बोलने लगे थे। उनका इलाज चल रहा था। और उनसे जुडे सभी प्रियजनों को बहुत चिंता हुई थी उनके लिए। हम सब आपस में बात करते थे और सोचा करते थे कि कैसे उन्हें अमरता से मंत्रविद्ध कर दिया जाए। जिससे वे कभी हमसे अलग ना हों।
जब वे थोडे ठीक हुए थे तो मैं उनसे मिलने गयी थी भोपाल। लेकिन उन दिनों ऐसा लग रहा था कि वे अंदर से जीने का हौसला खोते जा रहे हैं। एक इतने प्यारे इंसान का बीमारी के आगे यूँ धीरे-धीरे बीतते-रीतते जाना कलेजे पर चोट जैसी बात थी।उनकी आधारस्तम्भ, उनकी पार्टनर सरवरजी ने मुझे उनका हौसला बढाने को कहा था, उनको प्यार से डाँट-डपट करते रहने को कहा था, जिस पर वे हँस दिए थे, लेकिन फिर एक निराशा भरी चुप्पी उन्हे घेरने लगी थी और उन्होंने दुलार से भरकर कहा था, आया करो लडकी! और बस! उनसे मिलने वाले उन्हें प्यार करने वाले कितने ही यार दोस्तों ने कोशिश की थी उन्हें, फोन कर, उनसे मिलकर उन्हें हँसाने की, लेकिन इसके बाद ना तो वे हँसे, न हमें हँसने का मौका दिया। यूँही चले गए, बिना दुआ सलाम के। बेरहम कोरोना की वजह से उनके अंतिम दिनों में मुलाकात भी असंभव थी। उनकी रचनाओं का धीमा दुख, उनके भीतर ही रहनवारी कर रहा था। वे रोज उससे याराना बढा रहे थे।
यह बात लिखते हुए, उनकी रचनाओं के मजमून कौंधने लगते हैं। कैसे बाहरी परिदृश्य के दुख चोरी से भीतर घर करने लगते हैं और नितांत निजी बन जाते हैं। उनकी रचनाओं के दुख भी ऐसे ही हैं। उनके यहाँ दुख होने या न होने की विडंबना से पस्त व्यक्ति के दुख नहीं है। ये अलग किस्म के दुख हैं। इसमें जो अस्तित्ववाद की पेचीदा-सी झलक है, वह खुद से ज्यादा, सामाजिक संरचना और रिश्तों के बीच उभरने वाले तनावों से उपजने वाली तकलीफों के बयान हैं। यह खामोशी से बहुत सारे सवाल खडे करने की धीरज भरी जुझारू प्रवृत्ति है।ऐलान करने वाले क्रांतिकारी ढंग की अपेक्षा यह एक लेखक के कलम की ताकत का शांति से किया गया प्रहार है जिससे खुद लेखक भी नहीं बच पाता है। यह अद्भुत गद्य रचने का ऐसा पुरजोर प्रमाण है, कि मुझ जैसे नए लिखने वालों को यह न सिर्फ राह बतलाता है, बल्कि एक अबूझ हौसले से भी भर देता है, कि मंजिलें बिना प्रपंच, साजिशों और ड्रामों के भी हासिल हो सकती हैं, बशर्ते आप में अनुशासन हो, इंतजार करने की कुव्वत हो और एक ग्लोबल विजन हो। यह सब कुछ उनके अंदर बहुत गहराई से धँसा हुआ था। वे ताजीवन भोपाल में रहे और उनकी कहानियाँ भोपाल की आबोहवा में रची बसी रहीं। वे भोपाल में रहने वालों की या उनके आस-पडोस की ही कहानियाँ कहते रहे और फिर भी पूरी दुनिया में जाने गए। उन्होंने लोकल इज ग्लोबल वाली कहावत को सच कर दिखया। तभी उनकी रचनाओं का फलक दुनिया के हर देश की धडकन की अनुगूँज हो सकता है।यदि कोई समर्पित प्रयास करे, तो इसकी शिनाख्त कर ही लेगा।
वे अपने रचना संसार को जीते थे। एक बार मैंने उनसे कहा था-पता नहीं लोग यह क्यों कहते हैं, फलां आपकी ही कहानी है, क्या? वे ठठा कर हंस पडे थे और कहने लगे थे-मानने दो जिसको जो मानना है। अपनी लिखी चीज को कभी एक्स्प्लेन नहीं करना चाहिए। खुशी से डूब कर लिखना चाहिए। फिर जो समझना चाहे तो ठीक नहीं तो भी ठीक। उस वक्त उनके अंदर एक खिलंदडा-सा भाव चकमक करने लगता था। जैसे एक प्यारभरी शिकायत कर रहे हों इस हिन्दी पट्टी से।
रचनाकार वे पक्के किस्म के थे। इंजीनियरिंग की पढाई अधूरी छोड लिखना चुना था उन्होंने। ता-जीवन वे फुलटाइम लेखक होकर रहे। उन्होंने अपने जीवन में इतना बडा रिस्क लिया लिखने के जुनून की खातिर। पैसे कमाने के बदले मुश्किलात में रहते हुए लिखने को अपनाया। वे खुशकिस्मत थे कि उनके परिवार ने उनका सहयोग किया। उनके परिवार के सभी सदस्य जानते थे कि इस मुलायम तबीयत वाले संजीदा इंसान के पास उतने ही मुलायम जज्बात हैं जिन्हें किसी तरह की पाबंदी गवारा नहीं होगी। उसको स्वछन्द छोडना होगा। रोजमर्रा की रूटीन से मुक्त करना होगा। और परिवार ने हिम्मत से, मोहब्बत से, वही किया। वे एक तरह से स्वतंत्र हुए और लिखते रहे।उनके करीने से सजे कमरे में एक वाईटबोर्ड था जिसपर हालिया लिखी चीजें या उपन्यास के चैप्टरस के ब्योरे दर्ज होते थे। एक छात्र की तरह जिन्हे वे रोज देखकर पिछला लिखा दुरस्त करते थे।
सुबह की सैर के बाद वे लिखते थे घंटों। पहले शिल्पकार हाउस में जो उनके परिवार का साझा फर्नीचर शोरूम था और बाद में बेटी के शोरूम में अपने घर की बिल्डिंग के निचले तले में। मैं सोचा करती थी, इतने ग्राहकों के आने -जाने से क्या इनका ध्यान भंग नहीं होता होगा? लेकिन नहीं होता था। एक बार उन्होंने इसकी पुष्टि भी कर दी थी। बताया था- नहीं होता, हाहाहा समाज से कटकर लिखूँगा तो क्या खाक लिख पाऊँगा? ये सारे लोग, ये शोर, ये गाडियों का धुआँ, इनके दुख और सुख। यही तो मेरी कहानियाँ हैं।
कितनी सुंदर बात थी यह।
शाम का वक्त वे दोस्तों की सोहबत में गुजारना पसंद करते थे।उनको देख कर कभी लगता ही नहीं था कि वे कभी कुछ और हो सकते हैं। वे सिर्फ जिंदगी और साहित्य की यात्रा करने के लिए बने थे।और उनकी महफिलों में यही सब बातें हुआ करती थीं।जैसे ही उनको अपने अजीज दोस्तों का साथ मिलता था, उनकी शामें चहकने लगती थीं। उनके अंदर से एक बेहद बिंदास,विनोदी बाहर आ जाता था और परिहास करने लगता था। उनके विट का कोई सानी नहीं था। वे अपने ऊपर सबसे ज्यादा हँसते थे। अपनी तथाकथित अक्षमताओं को बढा- चढा कर पेश करते थे, जैसे वे एक अदना से कलम नवीस हैं, बडे लेखक कत्तई नहीं। वे हमेशा कहते थे- कुछ अच्छा लिखूँ, तो समझूँ कुछ किया। हम सब जानते हैं कि ऐसी विनम्रता बिरले ही देखने को मिलती है और वे ऐसे ही मासूम और विनर्म बने रहे, हर महफिल और मंच पर।
अच्छी किताबों और लेखकों से हमेशा ही अपने मिलने-जुलने वालों का परिचय करवाते थे। ओरहान पामुक को जब नोबेल पुरस्कार नहीं मिला था, तब उन्होंने मुझे My name is Red पढने को दी थी और कहा था-देखना इसे तो एक दिन नोबेल पुरस्कार मिलेगा। और उनके कहे के चंद महीनों बाद ही पामुक को पुरस्कार मिल गया था।इतनी तीक्ष्ण साहित्यिक दृष्टि थी उनकी। उनकी पसंदीदा किताबों में The Brothers Karamazov और Ulysses शामिल थीं जो उन्होंने मुझे विशेषतौर पर पढने को कहा था और ठीक से पढने का, टेक्स्ट को जज्ब करने का सलीका भी बतलाया था। अनचीन्हें योरोपिय लेखकों को मैंने उनकी मार्फत ही जाना था। उनका पढना इतना व्यापक था कि इस आलेख में उस सूची का जिक्र हो नहीं सकता। ऐसी अद्भुत चीजें पढने को देते थे..
उनके पास बैठने पर अपना भी विजन खुलता था। उनसे मिलने वाला इतना कुछ उनसे सीख कर अपनी झोली में भरकर लाता था क्या कहूँ! देखा है, महसूस किया है सब। भोपाल में हिन्दी, अंग्रेजी वालों के अलावा उर्दू पढने वाले भी उनके मुरीद थे। उन्हें उर्दू, हिन्दी, अंग्रेजी सब भाषाएँ बहुत अच्छे से आती थीं। लेकिन लेखक वे खालिस हिन्दी के ही थे। कई बार यह कहते भी थे।
उनकी किताब सूखा बरगद को इतनी प्रशंसा मिली। उन्होंने उसमें आजादी के बाद के भारत की सच्ची तस्वीर कितने ताजे ढंग से पेश की थी। मध्यवर्गीय मुसलमान के विरोधाभासों को और उस समाज के पिछडेपन का साहसी क्रिटीक किया था। सच तो यह है कि वे निजी जीवन में भी कट्टरता और पिछडेपन के कट्टर विरोधी थे और उनकी दृष्टि इतनी आधुनिक थी कि वे मिसाल बन गए हैं बहुतों के लिए। उनकी दोनों बेटियाँ सदफ और समर उनके फलसफे की तस्दीक करती हैं।
हिन्दी पट्टी ने सूखा बरगद के लिए उन्हें बहुत सराहा, लेकिन मुझे उनकी किताब बशारत मंजल सबसे अधिक प्रिय है। दिल्ली, भोपाल और विस्थापन का इतना सूक्ष्म, कोमल चित्रण और उतना ही गहन भाषाई खेल है उस उपन्यास में कि सबकुछ जहन से चिपक जाता है। जब छपा था तभी पढ लिया था, लेकिन आजतक भूल नहीं पाई अनेक पात्रों को।उनमें से एक खद्दर भी है। यूँ तो खद्दर पात्र है, लेकिन है जब डिकोड किया जाए, तो कितना बडा मेटाफॉर! उसकी त्रासदी इस मुल्क की बदलती जीवन शैली की त्रासदी से कितना मेल खाती है। इसी तरह गाँधी और पार्टिशन, सबकुछ किस कदर महीन और सांकेतिक ढंग से उकेरा गया है कहन में। लगता है एक बेहद महीन रेखाओं वाली पेंटिंग सामने पसर गई है, जिसके भीतर वही दुख भरे खेल हैं, ठगे जाने वाली कहानियाँ हैं और एक पर्यवेक्षक उसे कबीराई धुन में धागा-धागा बुन रहा है।आप उसमें से अपनी पसंद और तर्क के रंग चुन सकते हैं। लेखक आपको यह अख्तियार सौंपता है।
रूमी कहते हैं-आधी जिंदगी दूसरों को प्रभावित करने में बीती, आधी उन मसलों को सुलझाने में जो दूसरों ने प्रस्तुत किए। अब जाने भी दो इस खेल को। अब तुमने बहुत खेल लिए यह खेल! अपने हो जाओ । वह करो वह लिखो बे रोक टोक जो तुम्हारा जी करे। है कितनी जिंदगानी तुम्हारी वही कुछ लम्हों की ना?
सच है! उन्होंने वही किया जो उन्हें रुचा।एक सूफी समान हँसते बोलते हुए मगर सूफी की अवधारणाओं को पूर्णतः नकारते हुए, वे कलम को साधते रहे, एक संगतराश की तरह। लिखते रहे,आबाध, निर्बाध, विचारधारा से परिपूर्ण, विचारधारा से परे, आगामी पीढियों के लिए, भविष्यगामी, सम्पूर्ण और भरापूरा सबकुछ। और मुझ जैसे अनेक आशावादी लेखक सीखते रहे, अनुगृहीत होते रहे बिना शुऋना अदा किये हुए, क्योंकि शुऋाना उनकी तमाम अफगानी, ईरानी विरासतों के बावजूद एक अश्लील अभिव्यक्ति होती। खासतौर से उनके लिये जो मुझ जैसे अपने प्रशंसकों के लिए विराट थे। याद आ रहा है कैसे उनसे पहली बार यूँही मिली थी, बतौर प्रशंसक। स्वराज भवन में हुए एक कार्यक्रम के दरम्यान। हुलसते हुए कहा था उस दिन-मैं आपकी फैन हूँ। सकुचाते हुए कहा था उन्होंने-मेरा भी कोई फैन हो सकता है क्या? और मैं इस विनम्रता और दुलार की मुरीद हो गयी थी।
उनके यूँ अचानक जाने के बाद उनकी कमी, हर रोज धीमे -धीमे टीसती है। उनके ना होने का दुख गहराता है। जी करता है, पुराने दिन लौट आएँ और हम फिर उनके साथ अड्डा जमाएँ, गप्प का सिलसिला हो और खूब हँसे। गोकि इस सच को स्वीकारना असंभव लगता है, फिर भी स्वीकारती हूँ यह सब के अब याद में ही संभव है सबकुछ। यादगरी में ही सुभीता खुलने और बतियाने का। नहीं जाने हुए आयामों को समझने और बूझने का। यादों के उस जखीरे को ही गले लगाकर घूमना होगा अब तो।
कोई और चारा भी नहीं।
भूल जाती हूँ कई बार- वे पद्मश्री भी तो थे। अपने महबूब शहर- भोपाल की शान, भोपाल टाकीज के आस -पास के इलाके की धडकन, जिनके बिना अब सब बेनियाज लगता है। लगता है क्यों जाऊँ उस शहर में अब? क्या बचा है उनके जाने के बाद वहाँ ?
फिर दिल को दिलासा देती हूँ, हाँ एक चीज तो है बची हुई जो उन्हें इस दुनिया से बिसराने नहीं देगी; उनकी शानदार किताबें हैं, जिन्हे जीते जी कोई हमसे अलग नहीं कर सकता है।
लिहाजा आजकल जब भी वे याद आते हैं, मैं उनकी किताबों को अलट -पलट लेती हूँ और महसूस कर लेती हूँ, कि वे अपने लिखे हर्फों के बीच से मुस्कुराते हैं हरदम और अपनी कोई मजेदार-सी बात कहने लगते हैं। मैं भी फिर एवज में कोई नई बात सीख लेती हूँ और अपने इस गाढे रिश्ते को सहेज लेती हूँ। हौसलामंद होकर सोचती हूँ -आखिर कहाँ जा सकते हैं वे? कोई और जहान में कहाँ बस पाएंगे वे? वे तो बस यहीं रहा करेंगे हमारे दिलों में; दास्ताने लापता के बावजूद। रमजान में हुई मौत के बावजूद। दुख में भींजे, फिर अचानक से हँसते मुस्कुराते, लिखते, सँवारते और दुलराते, बेहद मोहब्बत के साथ अपने चिरपरिचित डायलॉग के साथ-कमबख्त कोई माने या माने हम तो लेखक थे, लेखक ही बन, मरेंगे और जिएँगे।

सम्पर्क -सी II/43,तिलक लेन,
तिलक मार्ग,
नयी दिल्ली.110001
मो. 9953944658