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प्रेमचंद का उपन्यास-दर्शन

आनंद पाण्डेय
प्रेमचंद उपन्यासकार थे, उपन्यास के आलोचक नहीं। परंतु, कई उपन्यासकारों की तरह उन्होंने भी उपन्यास पर आलोचनात्मक लेखन किया है, जो निःसंदेह आलोचना की श्रेणी में आता है। साहित्य में समालोचना नामक उनके निबंध से पता चलता है कि वे आलोचना को साहित्य के विकास के लिए बहुत जरूरी मानते थे। इसलिए, वे रचनात्मक लेखन की व्यस्तता से समय निकालकर कभी-कभार साहित्य-समालोचना भी किया करते थे। मात्रा में अल्प होते हुए भी उनका आलोचनात्मक लेखन अनुपेक्षणीय है। उनके साहित्य-चिंतन का हिंदी मानस पर व्यापक प्रभाव पडा है। उन्होंने उपन्यास पर चार लेख लिखे हैं। ये लेख उपन्यास की सैद्धांतिक आलोचना करते हैं। उपन्यास-रचना नाम से उनका पहला लेख 23 अक्टूबर, 1922 को माधुरी में छपा। दूसरा लेख उपन्यास जनवरी, 1925 को समालोचक में छपा। तीसरा लेख उपन्यास का विषय मार्च, 1930 के हंस में प्रकाशित हुआ। चौथा लेख दूसरे लेख उपन्यास का ही संशोधित एवं परिवर्धित रूप है, पर दोनों में काफी अंतर हैं। चौथे लेख का आकार भी दूसरे लेख से काफी बडा है। दोनों को स्वतंत्र लेखों के रूप में लेना ही उचित होगा। संभवतः इसीलिए जनवाणी प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित प्रेमचंद रचनावली के सातवें खंड में इन दोनों लेखों को क्रमशः उपन्यास-1 और उपन्यास-2 शीर्षकों के अंतर्गत एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप में रखा गया है। इन चारों लेखों को एक साथ पढने पर उपन्यास के बारे में प्रेमचंद की न केवल निजी मान्यताओं, उनके उपन्यास-दर्शन का पता चलता है, बल्कि उपन्यास के इतिहास, प्रकृति, स्वरूप और रचना-प्रक्रिया का भी ज्ञान मिलता है। इनके अलावा प्रेमचंद ने कई उपन्यासों की व्यावहारिक आलोचनाएँ भी लिखी हैं। इन आलोचनाओं से भी उनके उपन्यास-दर्शन की रूपरेखा तय करने में मदद मिलती है।
उपन्यास-केन्द्रित आलोचनात्मक लेखन के अतिरिक्त उन्होंने साहित्य और उसके विभिन्न आयामों और प्रश्नों पर भी यथावसर यत्र-तत्र विचार किया है। जिससे उनके गंभीर साहित्य-चिंतक रूप का पता चलता है। इनमें प्रगतिशील लेखक संघ का उनका अध्यक्षीय भाषण प्रमुख है। यह सब भले ही प्रत्यक्ष रूप से उपन्यास-केंद्रित न हों, लेकिन साहित्य पर उनके चिंतन के दायरे में एक प्रधान साहित्य-विधा होने के नाते उपन्यास भी अनिवार्यतः आता है। उन्होंने अपने साहित्य-दर्शन को व्यवस्थित करने का प्रयास नहीं किया और एक पाठक को उनके कथेतर गद्य में बिखरे पडे लेखों, भाषणों, टिप्पणियों, पुस्तक-समीक्षाओं एवं संपादकीय लेखों में अभिव्यक्त विचार-स्फुलिंगों के व्यवस्थित अध्ययन के बाद ही उनके साहित्य-चिंतन का समग्र परिचय प्राप्त होता है। फिर भी, प्रेमचंद हिंदी में उपन्यास-विमर्श की परंपरा की अपरिहार्य कडी हैं। हिंदी में उपन्यास-आलोचना की विकास-यात्रा की कोई भी पडताल प्रेमचंद की उपन्यास-आलोचना पर व्यवस्थित विचार के बिना पूरी नहीं मानी जा सकती है।
प्रेमचंद के इन लेखों के महत्त्व का पता इसी बात से चल जाता है कि ये हिन्दी में उपन्यास-दर्शन पर खूब पढे और संदर्भित किए जानेवाले सैद्धांतिक लेख हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी उपन्यास-आलोचना में प्रेमचंद के विचारों और मान्यताओं को न केवल खुले दिल से स्वीकार किया है, बल्कि उनके आधार पर उन्होंने अपने उपन्यास संबंधी विवेचन-विश्लेषण को भी आगे बढाया है। चोटी के आलोचक द्विवेदी की उपन्यास-आलोचना में प्रेमचंद को जिस तरह से उपन्यास के मर्मज्ञ, पंडित और मार्गदर्शक की तरह संदर्भित किया गया है उससे स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद की उपन्यास-आलोचना को हिंदी आलोचना में कैसी निर्विवाद स्वीकार्यता और वैधता प्राप्त है। प्रेमचंद के उपन्यास-दर्शन की लोकप्रियता के ऐसे कईं और साक्ष्य सामने रखे जा सकते हैं।
इन लेखों के माध्यम से प्रेमचंद ने हिंदी के साधारण पाठकों को उपन्यास-विधा की प्रकृति और उसकी रचना-प्रक्रिया से परिचित कराया है। ये लेख उद्धरणों और अकादमिक शब्दावली से बोझिल नहीं हैं। सीधी और पारदर्शी भाषा में साधारण पाठकों को उपन्यास की रचना-प्रक्रिया और उसके इर्द-गिर्द तैयार किए गए कुछ प्रमुख सिद्धांतों और वादों से परिचित कराना ही इनका उद्देश्य था। इसके साथ-साथ प्रेमचंद उपन्यास के संबंध में अपने सिद्धांतों और मान्यताओं को भी सामने रखना चाहते थे। इसीलिए इनमें वस्तुनिष्ठता से अधिक आत्मनिष्ठता का भाव है।
उपन्यास की रचना-प्रक्रिया पर बात करने से पहले प्रेमचंद ने उपन्यास की वैश्विक उपस्थिति, लोकप्रियता, महत्ता और प्रासंगिकता को रेखांकित किया है। वे लिखते हैं, ...आज समस्त साहित्य पर उपन्यास ही का आधिपत्य है।1 उनके समय तक हिंदी में भी उपन्यास एक केंद्रीय विधा बन चुका था। हिंदी में उपन्यास की संस्कृति विकसित करने में स्वयं उनकी बडी भूमिका थी। भारतीय मनीषा और रचनाशीलता को उपन्यास ने खूब आकर्षित किया। बाहर से आने के बावजूद जल्द ही यह भारतीय साहित्य की अपनी प्रमुख विधा बन गया। मानो उपन्यास इसी माटी की उपज हो! प्रेमचंद ने भी इस तथ्य को रेखांकित किया है, गत पचास वर्षों में भारत की साहित्यिक-शक्ति का जितना उपयोग उपन्यास-रचना में हुआ उतना शायद साहित्य के किसी और भाग में नहीं हुआ।2
प्रेमचंद उपन्यास पर अपना चिंतन-मनन उसकी परिभाषा के सवाल से जूझते हुए शुरू करते हैं। वे मानते हैं कि कविता की तरह ही उपन्यास को भी परिभाषित करना कठिन है। विद्वान अपने-अपने ढंग से उपन्यास को परिभाषित करते हैं। उनका यह कहना बिल्कुल ठीक है। असल में, किसी भी साहित्य विधा की तुलना में उपन्यास अधिक परिभाषा-विरोधी है। मानो वह जानबूझकर उपन्यास की हर परिभाषा को अपर्याप्त कहकर खारिज कर देने में सुख पाता हो। उपन्यास ही नहीं, किसी भी चीज या परिघटना को परिभाषित करते समय यह समस्या आती है। फलतः हर परिभाषा अधूरी रह जाती है। इसके बावजूद चीजों को परिभाषित करना मानव-स्वभाव का अभिन्न पक्ष है। किसी भी चीज की परिभाषा व्यक्ति की उस चीज की समझ का फल होती है। उसे परिभाषा में बाँधना एक समझ में बाँधना होता है। समझ कोई स्थिर चीज नहीं होती। नयी सूचनाओं और दृष्टिकोणों के आलोक में समझ बदलती रहती है। इसलिए, परिभाषाएँ भी बदलती रहती हैं। इस सतत और नित्य प्रक्रिया को समझे बिना किसी भी चीज की समझ और परिभाषा रूढ और स्थिर हो जाती हैं। चीज आगे निकल जाती है जबकि उसकी परिभाषा पीछे रह जाती है। जो किसी एक परिभाषा के बंदी होते हैं, वे एक जगह टिक जाते हैं। उनकी समझ स्थिर हो जाती है। यहाँ परिभाषा की कोशिश की सीमाएँ आडे आने लगती हैं, लेकिन किसी चीज को समझने और परिभाषित करने की कोशिश मानव-स्वभाव तथा उसकी सहज ज्ञान-मीमांसा के इतना निकट है कि उसे रोका नहीं जा सकता है। यह प्रवृत्ति ही ज्ञान और विज्ञान के विकास का आधार है। समस्या और निर्रथकता के दृष्टिकोण से उपराम होकर यदि हम इस प्रवृत्ति की सार्थकता को समझें, तो पाएँगे कि इसके लाभ अधिक हैं। किसी भी चीज को समझने में परिभाषाएँ बडे काम की होती हैं। उतनी ही ये स्वाभाविक भी होती हैं। ज्यों ही हम किसी चीज को समझने लगते हैं, सायास-अनायास उसे परिभाषित भी कर देते हैं। इसी मानव-प्रवृत्ति के कारण प्रेमचंद उपन्यास की परिभाषा के अधूरेपन को रेखांकित करने के बावजूद उसे परिभाषित करने का मोह संवरण नहीं कर पाते हैं। कोई कह सकता है कि अन्य परिभाषाओं की तरह प्रेमचंद की उपन्यास की भी परिभाषा अधूरी है, पर कोई यह नहीं कह सकता कि उनकी परिभाषा से हमें उपन्यास को समझने में कोई मदद नहीं मिलती है। ऐसे ही उपन्यास की अन्य परिभाषाएँ भी बहुत काम की हैं। उपन्यास की अनेक परिभाषाओं में से किसी एक को चुनने और अन्यों को खारिज करने के स्थान पर उनकी बहुलता को सकारात्मक मानते हुए उन सबकी सहायता से उपन्यास को समझने में ही समझदारी है।
प्रेमचंद उपन्यास को इन शब्दों में परिभाषित करते हैं, मैं उपन्यास को मानव चरित्र का चित्र समझता हूँ। मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्त्व है।3 यहाँ यह याद करना प्रसंगांतर नहीं होगा कि महावीर प्रसाद द्विवेदी के लिए भी उपन्यास मनुष्यों के चरित का चित्र है। वे लिखते हैं, यदि लेखक अच्छा है, तो वह अपने उपन्यास में मनुष्यों के चरित का स्वाभाविक और सर्वजनानुमोदित चित्र खींचकर पढने वालों को मुग्ध कर देगा।4 प्रेमचंद और द्विवेदी की परिभाषाओं में केवल शब्दों का अंतर है, आशय एक ही है। इसलिए, दोनों को एक साथ रखने का मोह आ गया। प्रेमचंद की उक्त परिभाषा उपन्यास को समझने में काफी दूर तक सहायक होती है। इसके लिए प्रेमचंद बार-बार याद किए जाते रहे हैं। इस परिभाषा को हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ज्यों-का-त्यों स्वीकार किया है। पर, जैसा कि प्रेमचंद स्वयं समझते थे कि उपन्यास की कोई एक निर्विवाद या सार्वभौम परिभाषा देना संभव नहीं है, उनकी यह परिभाषा भी पूर्ण नहीं है। यह उपन्यास की उनकी समझ को तो सामने लाती है, लेकिन उपन्यास की जैसी फितरत है, वह इस परिभाषा को भी अधूरी सिद्ध करता है। यह परिभाषा उपन्यास के कई तत्त्वों में से एक तत्त्व पात्र या चरित्र को केन्द्र में रखती है। लेकिन, यदि उपन्यास में पात्रों की केन्द्रीयता को देखें, तो यह उपन्यास के एक केन्द्रीय तत्त्व को समाहित करने के कारण उपन्यास की आत्मा के निकट है। अपने सद्यवहार और सद्विचार से पाठकों को मोहित कर लेने पात्रों की सृष्टि करने की उपन्यासकार की क्षमता को ही प्रेमचंद सबसे बडी विभूति मानते थे। इसीलिए, उनके लिए उपन्यास मानव चरित्र का चित्र है। निःसंदेह जीवंत और अविस्मरणीय पात्रों की रचना एक उपन्यासकार की उपलब्धि होती है, बडे उपन्यासकार बडे चरित्र-सर्जक भी होते हैं, किंतु उपन्यास को समझने में पात्र के साथ-साथ अन्य तत्त्वों का ध्यान भी रखना पडता है। पात्र केंद्रित समझ कभी-कभी उपन्यास की समग्र समझ में आडे भी आती है। पात्र उपन्यासकार के साधन होते हैं, साध्य नहीं। चरित्र प्रधान और जीवनीपरक उपन्यासों के बारे में प्रेमचंद की मान्यता उचित है, लेकिन अलेगरिकल आंचलिक, व्यंग्य और प्रयोगशील उपन्यासों के बारे में वह एकांगी हो जाती है। संभवतः स्वयं प्रेमचंद को इस अधूरेपन का बोध था। इसलिए करीब एक दशक बाद ही प्रगतिशील लेखक संघ के लखनऊ सम्मेलन में उन्होंने साहित्य को जीवन की आलोचना कहा। इसके पूर्व मार्च, 1933 में प्रकाशित एक लेख साहित्य की प्रगति में उन्होंने इस परिभाषा को संपूर्ण रूप में इस तरह रखा था, साहित्य जीवन की आलोचना है, इस उद्देश्य से कि उससे सत्य और सुंदर की खोज की जाए।5 इसी लेख में वे आगे लिखते हैं, मनुष्य में जो कुछ सुंदर है, विशाल है, आदरणीय है, आनंदप्रद है, साहित्य उसी की पूर्ति है।6 यह परिभाषा उपन्यास पर भी लागू होती है। इस तरह उनके लिए उपन्यास मानव चरित्र के चित्र के साथ-साथ जीवन की आलोचना भी है। चित्र फोटो नहीं होता है, बल्कि एक रचना होता है। चित्रकार भी अपने ढंग से जीवन की आलोचना करता है। ठीक वैसे ही जैसे साहित्यकार करता है। इस दृष्टि से चित्र और आलोचना में प्रथमदृष्टया कोई विशेष अंतर नहीं दिखता है फिर भी उपन्यास को मानव चरित्र का चित्र मानने और उसे जीवन की आलोचना कहने में गुणात्मक अंतर है।
उपन्यास एक विदेशी साहित्य-रूप है। नामवर सिंह और निर्मल वर्मा जैसे आलोचक-चिंतक इसे औपनिवेशिक विधा मानते हैं और उपनिवेशवाद के विरोध के लिए उपन्यास के विरोध को भी उचित मानते हैं। निर्मल वर्मा जहाँ इसे भारतीय रचनाशीलता की अभिव्यक्ति के लिए अपर्याप्त पाते हैं, वहीं नामवर सिंह अंग्रेजी ढंग के नॉवेल के समानांतर उपन्यास की भारतीय परंपरा को दृढ करने पर बल देते हैं। इनके विपरीत रामचन्द्र शुक्ल ने इसे विदेशी रूप तो माना, लेकिन इसके सहज भारतीयकरण को रेखांकित भी किया। वे मानते थे कि औपनिवेशिक विधा होने के बावजूद उपन्यास का न केवल भारतीयकरण संभव है, बल्कि इसके माध्यम से उपनिवेशवाद का विरोध भी किया जा सकता है। प्रेमचंद का उपन्यास-लेखन और उपन्यास के विदेशी विधा होने के सवाल पर उनके विचार रामचंद्र शुक्ल की मान्यता को न केवल सही सिद्ध करते हैं, बल्कि उसका अपने ढंग से विस्तार भी करते हैं। शुक्ल की तरह प्रेमचंद ने भी इसे यूरोपीय विधा तो माना पर उपनिवेशवाद के विरोध के लिए उपन्यास के भी विरोध के तर्क को स्वीकार नहीं किया। उनके लिए उपन्यास को स्वीकार करना, उपनिवेशवाद के तर्कों को स्वीकार करना नहीं है और न ही उपनिवेशवाद का विरोध करने के लिए उपन्यास का भी विरोध जरूरी है। वे इस बात का समर्थन करते दिखते हैं कि उपन्यास भारतीय समाज पर थोपा नहीं गया, बल्कि भारतीयों ने इसे सहर्ष स्वीकार किया है और इसे भारतीय जरूरतों के अनुकूल ढाल भी लिया है। इस प्रसंग में उनका यह वाक्य याद रखना होगा, भारत-निवासियों ने यूरोपियन साहित्य के किसी अंग को इतना ग्रहण नहीं किया जितना उपन्यास को।7 स्पष्ट है, प्रेमचंद के लिए उपन्यास विदेशी साहित्य-रूप होते हुए भी ग्राह्य है और उपनिवेशवाद का विरोध करने के लिए उपन्यास का विरोध जरूरी नहीं है। प्रेमचंद ने अपनी रचनाशीलता के माध्यम से शुक्ल की मान्यता को सही सिद्ध किया। उन्होंने उपन्यास के औपनिवेशिक अस्त्र से उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष की बेजोड मिसाल कायम की। उनके लेखन का उद्देश्य ही स्वराज प्राप्ति की इच्छा का प्रतिपादन था। इस इच्छा के प्रतिपादन के लिए उनकी रचनात्मक प्रतिभा ने उपन्यास के अस्त्र को चुना था। वे उपन्यास को भारतीय रचनाशीलता के प्रतिकूल नहीं, बल्कि अनुकूल मानते थे। इस बात को रेखांकित करते हुए उन्होंने लिखा, गत पचास वर्षों में भारत की साहित्यिक शक्ति का जितना उपयोग उपन्यास-रचना में हुआ उतना शायद साहित्य के और किसी भाग में नहीं हुआ।8 रामचंद्र शुक्ल ने यह भी कहा था कि उपन्यास का ढाँचा पश्चिम से तो आया, लेकिन भारतीय उपन्यासकारों को इसके ढाँचे तक ही रहना चाहिए। उनका आशय था कि हमें पश्चिम के उपन्यासों की अंतर्वस्तु, मूल्यबोध और शैली की नकल नहीं करनी चाहिए, बल्कि उपन्यास के पश्चिमी ढाँचे में भारत को भरना चाहिए। प्रेमचंद ने तत्कालीन भारत की सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप उपन्यास के भारतीयकरण की सुदृढ परंपरा डाली। यह संतोषजनक है कि आगे चलकर उपन्यास-विमर्श और उपन्यास-लेखन का विकास शुक्ल और प्रेमचंद की मान्यताओं के अनुरूप हुआ।
उपन्यास अपनी पठनीयता और मनोरंजकता के कारण ही सबसे अधिक लोकप्रिय साहित्य रूप बन सका है। उपन्यास पर विचार करते समय लगभग सभी विद्वान इस बात पर एकराय हैं कि उपन्यास एक मनोरंजक विधा है। महावीर प्रसाद द्विवेदी उपन्यासों की इस विशेषता पर प्रकाश डालते हुए लिखते हैं, उपन्यासों के पढने में मन को परिश्रम नहीं करना पडता। बुद्धि की भी संचालना नहीं करनी पडती। अतएव सब लोग, मनोरंजन के लिए उपन्यासों को प्रेम से पढते हैं।9 हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उपन्यास को पॉकेट का थियेटर कहा है। लेकिन ये लोग मनोरंजन को ही उपन्यास का उद्देश्य नहीं मानते हैं। उनके अनुसार मनोरंजकता इसका गुण है और इसका निर्वाह भी उपन्यासकार को करना चाहिए, लेकिन केवल मनोरंजन के उद्देश्य से उपन्यास नहीं लिखा जाना चाहिए। लोक-कल्याण और सामाजिक परिवर्तन ही साहित्य-उपन्यास लेखन के लक्ष्य होने चाहिए। द्विवेदी की बात सन्तुलित और काम्य है, लेकिन प्रेमचंद इस संतुलन पर जोर देने के बजाए उपन्यास की मनोरंजकता की रक्षा करने पर बल देते हैं। उपन्यास की मनोरंजकता पर बात करते समय किसी और उद्देश्य को वे नहीं मानते, हाँ, उपन्यासकार यह कभी नहीं भूल सकता कि उसका प्रधान कर्तव्य पाठकों का गम गलत करना, उनका मनोरंजन करना है। और सभी बातें इसके अधीन हैं। जब पाठक का जी ही कहानी में न लगा तो वह क्या लेखक के भावों को समझेगा?10 प्रेमचंद उपन्यास की मनोरंजकता और रोचकता पर कितना बल देते हैं, इसका पता उनके उस कथन से लगता है जिसमें वे कहते हैं कि हिन्दी के वर्तमान उपन्यासकारों ने उबाऊ और बोझिल उपन्यास लिखकर उपन्यास के मुख पर बदनामी का दाग लगा दिया है। वे नये उपन्यासकारों से उम्मीद करते हैं कि वे उपन्यास में मनोरंजन के तत्त्व को बढाएँ और उसे बोझिल और उबाऊ बनाने की प्रवृत्ति का प्रतिकार करें। उन्होंने लिखा,नये उपन्यास-लेखकों का कर्तव्य है कि वे उपन्यास-साहित्य के मुख को उज्ज्वल करें, इस बदनामी के दाग को मिटा दें।11 यानी, उनके अनुसार, हिंदी उपन्यासकारों को अधिक-से-अधिक मनोरंजक उपन्यास लिखने चाहिए।
प्रेमचंद ने पाठक के मनोरंजन को उपन्यास का प्रमुख धर्म तो कहा और अन्य सभी तत्त्वों के इसके अधीन माना, पर उन्होंने मनोरंजन की कोई व्याख्या नहीं की। मनोरंजकता कोई निरपेक्ष अवधारणा नहीं है, और न ही वह समाज और रचना विरोधी है। जो उपन्यास किसी साधारण पाठक के लिए मनोरंजक हो सकता है वही किसी परिष्कृत रूचि के व्यक्ति के लिए भौंडा व अरुचिकर हो सकता है। इसके विपरीत जो उपन्यास किसी सुरुचिसंपन्न व्यक्ति के लिए मनोरंजक हो सकता है वही किसी साधारण पाठक के लिए बोझिल, उबाऊ व अपठनीय हो सकता है। यदि मनोरंजकता को सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों से च्युत करके देखा जाएगा, तो उसके अलग-अलग स्तरों की पहचान नहीं हो सकती और न ही प्रेमचंद के आशय को ठीक से समझा जा सकता है, बल्कि हर कोई इस आशय को अपने-अपने ढंग से ग्रहण करेगा। प्रेमचंद का मनोरंजकता से क्या आशय है, यह उन्होंने स्पष्ट नहीं किया है, लेकिन वे इतना जरूर कहते हैं कि साहित्यकारों का काम केवल पाठकों का मन बहलाव नहीं है। यह मदारियों, मसखरों और विदूषकों का काम है। इससे स्पष्ट होता है कि मनोरंजन उनके लिए कोई हल्की चीज नहीं है। बल्कि एक उदात्त भावना है जो पाठक के मनोभावों और संवेदनाओं का परिष्कार और संस्कार करती है। मनोरंजन गंभीर-से-गंभीर भाव और विचार को इस तरह से प्रस्तुत करना है, जिससे पाठक उपन्यास की कथा से तादात्म्य बैठा सके और बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के सहज रूप से उसको पढ सके। इसीलिए वे मानते हैं कि साहित्यकार मनोरंजन के साथ आत्मपरिष्कार के उद्देश्य से लिखता है। इसका अर्थ यह है कि प्रेमचंद की दृष्टि में मनोरंजन का भी अपना सामाजिक उद्देश्य और नैतिकता होती है। उनके लिए मनोरंजकता उद्देश्यविहीन नहीं है। उनके इस कथन को सामने रखे बिना मनोरंजन से उनके आशय को ठीक से नहीं समझा जा सकता है, हमारा प्राचीन साहित्य केवल मनोरंजन के लिए न था। उसका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के साथ आत्म-परिष्कार भी था। साहित्यकार का काम केवल पाठकों का मन बहलाना नहीं है। यह तो भाटों और मदारियों, विदूषकों और मसखरों का काम है। साहित्यकार का पद इससे कहीं ऊँचा है। वह हमारा पथ-प्रदर्शक होता है, वह हमारे मनुष्यत्व को जगाता है, हममें सद्भावों का संचार करता है, हमारी दृष्टि को फैलाता है। कम-से-कम उसका यही उद्देश्य होना चाहिए।12 मनोरंजकता यदि आत्म-परिष्कारक तत्त्वों से संपन्न है, तो वह साधन हो या साध्य, इससे कोई विशेष अंतर नहीं पडता। हजारीप्रसाद द्विवेदी उसे उपन्यास का प्रधान उद्देश्य न मानते हुए भी लोक कल्याण और सामाजिक परिवर्तन में उसे सहायक पाते हैं तो प्रेमचंद उसे उपन्यास का प्रधान लक्ष्य मानते हुए भी उससे वही अपेक्षा करते हैं जो द्विवेदी करते हैं। यानी प्रेमचंद के लिए उपन्यास का प्रधान लक्ष्य मनोरंजन करना है तो इस मनोरंजन का उद्देश्य आत्म-परिष्कार, सद्भावों का संचार, पथ-प्रदर्शन, मनुष्यत्व का जागरण और दृष्टि का विस्तार करना है।
परंतु मनोरंजन के संबंध में प्रेमचंद के विचार बाद में बदल गए थे। अपने जीवन के आखिरी दिनों में उन्होंने मनोरंजन को साहित्य का प्रमुख धर्म और साहित्यकार का प्रधान कर्तव्य पाठकों का गम गलत करना, उनका मनोरंजन करना के अपने पुराने साहित्य-सिद्धांत से दूरी बना ली थी। 1936 में लखनऊ में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कई बार यह कहा कि साहित्य का काम मनोरंजन करना नहीं है, उसका काम उससे भी ऊँचा है, साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, उसका दर्जा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलनेवाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलनेवाली सचाई है।13 लगता है कि साहित्य को मनोरंजन से जोडने की प्रवृत्ति से वे इतना ऊब चुके थे और सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्यों पर इतना जोर देने लगे थे कि साहित्य को मनोरंजन के सिवा भी और बहुत कुछ साबित करने के बावजूद वे निश्चिंत न हुए और भाषण की अंतिम पँक्तियों में एक बार फिर दुहराया, ...हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च-चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो। जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो, जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।14
उपन्यास को अति मनोरंजक मानने से अति मनोरंजन विरोधी हो जाने तक की प्रेमचंद की यात्रा भले ही दो अतिरेकों में झूलती दिखती है, पर इससे उपन्यास का स्वभाव नहीं बदला, स्वयं उनके उपन्यासों का भी। उपन्यास मनोरंजन पर बल दे या न दे, फिर भी वह अपनी संरचना में ही कुछ इस स्वभाव का है कि उसे बिना अतिरिक्त बुद्धि खपाए आराम से पढा जा सकता है। उपन्यास हमेशा ऐसा बना रहा जिसे, महावीर प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में, मनोरंजन के लिए प्रेम से पढा जा सकता है। इसके अतिरिक्त, उपन्यास की मनोरंजकता पर बल देना किस तरह एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए सहायक है, इस बात का कुछ अंदाजा हमें मॉरजरी बॉल्टन के इस कथन से चल जाता है, मात्र मनोरंजन हमें स्वस्थचित्त रखने में, अप्रिय यथार्थ से थोडे समय का विश्राम देकर फिर से उसका मुकाबले के लिए सक्षम करने में बहुत बडी भूमिका निभाता है। पलायनवादी साहित्य भी कम-से-कम इतना तो करता है कि वह हमें दुर्व्यवहार से दूर रखता है। किसी सस्ते और मूल्यहीन साहित्य का मूर्ख-से-मूर्ख और उथला-से-उथला पाठक भी कम-से-कम किसी को आहत करता है, न नुकसान पहुँचाता है। महान साहित्य तो मानवीय यथार्थ की हमारी जानकारी को विस्तृत करता है।15
इसी मनोरंजकता के कारण उपन्यास को बौद्धिक समाज में गंभीरता से नहीं देखा गया। रोजमर्रा की बोलचाल की सरल भाषा में मनोरंजन के गुण के साथ उपन्यास-रचना को लेखक की बौद्धिकता और विचारशीलता का श्रेष्ठ रूप नहीं माना गया। कमोबेश यह स्थिति आज भी बनी हुई है। उपन्यास को हल्का-फुल्का साहित्य माना जाता रहा है। साहित्यकार को दार्शनिक, अर्थशास्त्री और वैज्ञानिक से कमतर बुद्धिमान मानने की प्रवृत्ति रही है। प्रेमचंद एक समर्पित एवं प्रगल्भ उपन्यासकार थे। उन्होंने भी अपने जीवन में इस सामाजिक पूर्वग्रह से उपजी कटुता को भोगा होगा संभवतः इसीलिए उन्होंने उपन्यास लेखन को किसी भी ज्ञान और विचार के अनुशासन के समकक्ष सिद्ध करने की जरूरत महसूस की होगी। उन्होंने उपन्यास-लेखन को कमतर बौद्धिक कर्म मानने की धारणा का खंडन करते हुए लिखा है, वास्तव में उपन्यास-रचना को सरल साहित्य (Light Literature) कहा जाता है, इसलिए कि इससे पाठकों का मनोरंजन होता है, पर उपन्यासकार को उपन्यास लिखने में उतना ही दिमाग लगाना पडता है, जितना किसी दार्शनिक को दर्शन-शास्त्र के ग्रंथ लिखने में।16 कहने की जरूरत नहीं, प्रेमचंद उपन्यास के अभिमान की रक्षा ही नहीं कर रहे थे, बल्कि उपन्यास के महत्त्व को भी प्रतिपादित कर रहे थे। साथ-ही-साथ उपन्यास के रंजक स्वभाव के साथ-साथ उसके दार्शनिक और बौद्धिक चरित्र को रेखांकित भी कर रहे थे।
प्रेमचंद के लिए साहित्य-उपन्यास का प्रमुख उद्देश्य है, मनुष्य की मानसिक और भावनात्मक प्रवृत्तियों का निरूपण। वे लिखते हैं, वह साहित्य चिरायु हो सकता है जो मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों पर अवलम्बित हो। ईर्ष्या और प्रेम, क्रोध और लोभ, अनुराग और विराग, दुख और लज्जा- यह सभी हमारी मौलिक प्रवृत्तियाँ हैं। इन्हीं की छटा दिखाना साहित्य का परम उद्देश्य है।17 पर मौलिक प्रवृत्तियों के अलावा विवेक और विचार भी मनुष्य मौलिक प्रवृत्तियाँ हैं। संस्कृति और सभ्यता के बहुस्तरीय यथार्थ भी साहित्य में आते हैं। मनुष्य का सौंदर्यबोध केवल भावनात्मक और संवेदनात्मक ही नहीं होता है, बल्कि दार्शनिक और सत्ता-विमर्शात्मक भी होता है। जैसै-जैसे सभ्यता एवं संस्कृति विकसित होती गयीं, मनुष्य का वैचारिक और सत्ता-विमर्शात्मक पक्ष प्रबलतर होता गया। इससे मानव-चरित्र बदल गया। फलतः मानव चरित्र का चित्रण भी बदला। मानव का चरित्र जटिलतर होता गया। उसको चित्रित करने की प्रक्रिया भी जटिल और दुष्कर होती गयी। रामचंद्र शुक्ल ने अपने प्रसिद्ध निबंध कविता क्या है? में इस स्थिति का बडा ग्राह्य निरूपण किया है, ज्यों-ज्यों हमारी प्रवृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण जाएँगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढती जाएगी, दूसरी ओर कवि-धर्म कठिन होता जाएगा।18 प्रेमचंद भी इसी बात को अपने ढंग से कहते हैं। वे सिद्धांततः मानते हैं कि जब साहित्य की रचना किसी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मत के लिए की जाती है, तो वह अपने ऊँचे पद से गिर जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं। आजकल परिस्थितियाँ इतनी तीव्र गति से बदल रही हैं, इतने नये-नये विचार पैदा हो रहे हैं कि शायद अब कोई लेखक साहित्य के आदर्श को ध्यान में रख ही नहीं सकता।19 इस तरह हम देखते हैं कि प्रेमचंद में साहित्य और विचारधारा के संबंध के प्रश्न पर सिद्धांत और व्यवहार का तनाव है। उनके लिए आदर्श स्थिति तो वह है जब साहित्य को विचारधारा के प्रचार का वाहन न बनाया और कला कला के लिए के सिद्धांत का पालन किया जाए पर युगीन आवश्यकताओं के दबाव में उन्होंने साहित्य और विचारधारा के संबंध को न केवल स्वीकार किया, बल्कि साहित्य को विचारधारा के प्रचार का माध्यम बनाने पर भी बल दिया। उनका मत है कि संसार में बढती विचारधारात्मक प्रवृत्तियों और संघर्षों से उपन्यासकार तटस्थ नहीं रह सकता है। वह भी अपने साहित्य के माध्यम से वाद का प्रचार कर सकता है। यही नहीं प्रेमचंद ने उपन्यास के माध्यम से विचारधारा के प्रचार को साहित्यिक मूल्यों से समझौता की स्थिति नहीं माना है। जहाँ एक ओर वे कहते हैं कि किसी मत के प्रचार के लिए लिखा जानेवाला साहित्य अपने ऊँचे पद से गिर जाता है वहीं दूसरी तरफ वे इस तर्क से सहमत नहीं हैं कि उपन्यास के माध्यम से किसी वाद का प्रचार करने से उसकी उत्कृष्टता और आयु कम होती है। इसके विपरीत वे ह्यूगो, तोल्स्तॉय और डिकेंस जैसे महान उपन्यासकारों के उदाहरण देकर सिद्ध करते हैं कि उनके उपन्यास विचार-प्रधान होते हुए भी उपन्यास की कसौटी पर खरे उतरते हैं। यहाँ प्रेमचंद में सिद्धांत और व्यवहार का अंतर्विरोध साफ दिखायी दे रहा है। शायद इसी अंतर्विरोध को संतुलित करने के लिए वे उपन्यासकारों को वाद-प्रधान उपन्यास लिखते समय सावधानी बरतने की सलाह भी देते हैं। उनका कहना है कि उपन्यासकार को अपने विचार परोक्ष रूप से व्यक्त करने चाहिए, ताकि रचना नीरस न हो। वे कहते हैं. हमारा खयाल है कि कुशल कलाकार कोई विचार-प्रधान रचना भी इतनी सुंदरता से करता है कि उनसे मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों का संघर्ष निभता रहे।20 प्रेमचंद युगीन परिस्थितियों की माँग पर राजनीति और मतवाद के प्रचार से उपन्यास को जोडते तो हैं पर यह नहीं भूलते कि तमाम सामाजिक और विचारधारात्मक आग्रहों और लिप्तताओं के बावजूद साहित्यकार का प्रधान उद्देश्य आज भी उन मानवीय मूल्यों एवं प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति, संस्कार और रक्षा है जिनको स्वयं उन्होंने मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियाँ कहा है। इस तरह, प्रेमचंद न केवल सामाजिक यथार्थ और विचारधारा को उपन्यास में रखने के पक्षधर हैं, बल्कि मानव-मन और उसकी मौलिक प्रवृत्तियों, ईर्ष्या और प्रेम, क्रोध और लोभ, अनुराग और विराग, दुख और लज्जा की छटा दिखाने को ही साहित्य का परम उद्देश्य बताते हैं। कह सकते हैं, उनका उपन्यास चिंतन मनुष्य के सामाजिक और आंतरिक पक्षों के समन्वय का पक्षधर है।
प्रेमचंद के लिए उपन्यास लेखन एक सोद्देश्य कर्म है। सामाजिक सुधार और राजनीतिक परिवर्तन उनके उपन्यास-दर्शन के प्रमुख उद्देश्य हैं। वे उपन्यास की परिवर्तनकारी और सुधारवादी शक्ति से वे बखूबी परिचित थे। इसलिए वे उपन्यास से आशा करते थे कि यदि उपन्यासकार उसको एक सशक्त अस्त्र के रूप में पहचानें और स्वीकार करे, तो वह अपनी परिवर्तनकारी-सुधारवादी भूमिका का निर्वाह अवश्य कर सकता है। वे देखते हैं कि गत शताब्दी में पाश्चात्य देशों में जितने सुधार हुए हैं, उनमें अधिकांश का बीजारोपण उपन्यासों के द्वारा ही किया गया था।21 वे मानते हैं कि उपन्यासकार अपने समाज के दुख-अन्याय और समस्याओं के प्रति उदासीन नहीं रह सकता। वह मानव-मुक्ति के प्रति समर्पित होकर सामाजिक, राजनीतिक एवं अन्यान्य प्रश्नों पर सुधार व परिवर्तन का वाहक होता है। उनका मानना है कि आज के राजनीतिक समय, जिसे वे जीवन-संग्राम का समय कहते हैं, में उपन्यासकार का धर्म है कि वह भी अपनी भूमिका चुने और अपने लेखन के माध्यम से उसका निर्वाह करे। उसके पास तटस्थता का विकल्प नहीं है। वे उपन्यासकार की राजनीतिक-सामाजिक भूमिका को रेखांकित करते हुए लिखते हैं, लेखकवृंद प्रायः अपने काल के विधाता होते हैं। उनमें अपने देश को, अपने समाज को दुख, अन्याय तथा मिथ्यावाद से मुक्त करने की प्रबल आकांक्षा होती है। ऐसी दशा में असम्भव है कि वह समाज को अपने मनमाने मार्ग पर चलने दे और स्वयं खडा हाथ पर हाथ रखे देखता रहे। वह अगर कुछ और नहीं कर सकता, तो कलम तो चला ही सकता है।22 रामविलास शर्मा ने ठीक लिखा है, प्रेमचंद ने अपने साहित्य का उद्देश्य घोषित किया था- स्वतंत्रता-प्राप्ति। वह स्वाधीनता-संग्राम के सैनिक-साहित्यकार थे।23 प्रेमचंद ने स्वयं अपने लेखन के उद्देश्य को आजादी कहा था। उन्होंने लिखा है, मेरी अभिलाषाएँ बहुत सीमित हैं। इस समय सबसे बडी अभिलाषा यही है कि हम अपने स्वतंत्रता संघर्ष में सफल हों। मैं दौलत और शोहरत का इच्छुक नहीं हूँ। खाने को मिल जाता है। मोटर और बंगले की हविस नहीं है। हाँ, यह जरूर चाहता हूँ कि दो-चार उच्चकोटि की रचनाएँ छोड जाऊँ, लेकिन उनका उद्देश्य भी स्वतंत्रता-प्राप्ति ही हो।24
लेकिन, जैसे आजादी के संघर्ष का उद्देश्य केवल सत्ता-हस्तांतरण नहीं था, बल्कि भारतवासियों की संपूर्ण मुक्ति था वैसे ही प्रेमचंद के साहित्य का उद्देश्य भारत की जनता की संपूर्ण मुक्ति था। उनका साहित्य उस समय के भारत के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन की सभी समस्याओं की पहचान और परख करता है। इन सबसे मुक्ति भी उनकी आजादी का उद्देश्य था, केवल सत्ता-हस्तांतरण नहीं। परंतु, राजनीतिक-सामाजिक सुधार और परिवर्तन के उद्देश्य से उपन्यास लेखन के अपने कुछ खतरे हैं, जिन्हें प्रेमचंद ध्यान में रखते हैं। इसलिए वे राजनीतिक और सामाजिक सुधार के उद्देश्य से उपन्यास लिखनेवाले लेखकों को कुछ सुझाव भी देते हैं। वे लिखते हैं, हाँ, कुशल लेखक का यह कर्तव्य होना चाहिए कि वह सुधार के जोश में कथा की रोचकता को कम न होने दे। वह उपन्यास और अपने चरित्रों को उन्हीं परिस्थितियों में रखे जिनको वह सुधारना चाहता है। यह भी परमावश्यक है कि वह सुधार के विषय को खूब सोच ले, और अत्युक्ति से काम न ले, नहीं तो उसका प्रयास कभी सफल नहीं हो सकेगा।25 स्वयं प्रेमचंद ने सोद्देश्य उपन्यासों की रचना की है। उनके आरंभिक उपन्यासों एवं कहानियों में सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक सुधारों की प्रवृत्ति बहुत प्रबल है। सेवासदन, प्रेमाश्रम में वे एक सुधारक के रूप में अधिक आते हैं। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी कला-दृष्टि को रूपांतरित किया और सुधार का जोश कुछ कम हुआ। परंतु, न उन्होंने अपने उद्देश्य को छोडा और न ही विषय बदले, बल्कि सुधार और समाधान पेश करने की बजाए वे समस्याओं के यथार्थपूर्ण निदर्शन और चित्रण पर ज्यादा बल देने लगे। उनकी उपन्यास-यात्रा स्वयं उनके उपन्यास और सुधार संबंधी विचारों पर एक अंतर्दृष्टिपूर्ण टिप्पणी है, और नये उपन्याकारों के लिए एक सीख भी।
उपन्यास की रचना और आलोचना में यथार्थवाद बनाम आदर्शवाद का वैचारिक संघर्ष बहुत पुराना है। यह संघर्ष आज भी किसी न किसी रूप में चलता रहता है। इसमें सबसे ज्यादा संतुलित और व्यावहारिक समझ प्रेमचंद की है। वे न यथार्थवाद के प्रति मोहांध हैं और न ही आदर्शवाद के प्रति। उन्होंने दोनों वादों की आलोचना भी की और दोनों को स्वीकार भी किया। वे दोनों की सीमाओं और शक्तियों से भली-भाँति परिचित थे। वे जहाँ एक ओर मानते थे कि यथार्थवाद हमें निराशावादी बना देता है, वहीँ दूसरी ओर वे यह भी मानते थे कि आदर्शवाद हमसे ऐसे चरित्रों की रचना करा सकता है जो प्राण-रहित और सिद्धांतों की मूर्ति मात्र हों। वे मानते थे कि समाज की सचाई दिखाने के लिए यथार्थवाद अत्यंत उपयुक्त है, तो आदर्शवाद इस सचाई की कटुताओं और चिंताओं से रहित संसार में पहुँचा देता है। उन्होंने रचनाकार के लिए आदर्शवाद का महत्त्व बताते हुए लिखा कि मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह जिस यथार्थ का हिस्सा होता है साहित्य में उसी की पुनरावृत्ति उसके चित्त को प्रसन्न नहीं कर सकती। वह ऐसे साहित्य-संसार में थोडी देर के लिए चला जाना चाहता है, जहाँ वह अपने कष्टों के परे जा सके। टैरी ईग्ल्टन के लिए यह बिडंबना की स्थिति है कि उपन्यास रोजमर्रा के जन-जीवन पर आश्रित है, पर आम आदमी स्वयं अमानवीय और राक्षसी चीजों को पसंद करता है। यानी अपना ही जीवन साहित्य में नहीं देखना चाहता है। प्रेमचंद की बातों को हू-ब-हू दोहराते हुए ईगलटन लिखते हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि यथार्थवाद अलोकप्रिय है क्योंकि साधारण पाठक को विलासिता और शाहखर्ची में आनंद आता है। बिडंबना यह है कि एक साहित्य-रूप की हैसियत से उपन्यास आमजन-जीवन से बँधा है, जबकि आमजन स्वयं राक्षसी और चमत्कारों को पसंद करता है। कला के दर्पण में आमजन अपना ही चेहरा नहीं देखना चाहते। रोजमर्रा के जीवन से उनका मन इतना भरा होता है कि मनोरंजन के समय वे उसे भूल जाना चाहते हैं। वकीलों की तुलना में मजदूर फैंटेसी की आनंद-स्थली ज्यादा पसंद करते हैं।26 प्रेमचंद दोनों की तुलना करते हुए लिखते हैं, Realism यदि हमारी आँखें खोल देता है, तो Idealism हमें उठाकर किसी मनोरम स्थान में पहुँचा देता है।27 उन्होंने दोनों में से न किसी एक को दूसरे से श्रेष्ठ साबित किया और न ही किसी एक के लिए दूसरे को खारिज किया, बल्कि एक रचनाकार के लिए दोनों के महत्त्व को स्वीकार किया और दोनों के मेलजोल से आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की अवधारणा पेश की।
उपन्यास आलोचना में प्रेमचंद का यह कालजयी योगदान है। वस्तुतः, रचनाकार के लिए न पूर्णतः यथार्थ का उल्लंघन संभव है और न ही आदर्श का। इसी तरह इनमें से किसी एक से उसका काम नहीं चल सकता है। रचनात्मक धरातल पर यथार्थ और आदर्श एक-दूसरे के उतने खिलाफ पडते भी नहीं हैं जितना कि बहसों में दिखता है। उपन्यास अपनी प्रकृति में यथार्थवादी रहा है, लेकिन आदर्शवाद से अपना पिण्ड पूरी तरह से कभी छुडा नहीं पाया। इसलिए, प्रेमचन्द का आदर्शोन्मुख यथार्थवाद आज भी बहुत-से उपन्यासकारों के लिए एक संतुलित और व्यावहारिक मार्ग है। आदर्शवाद और यथार्थवाद के समन्वय पर बल देते हुए उन्होंने लिखा है, इसलिए हम वही उपन्यास उच्च कोटि का समझते हैं जहाँ Realism और Idealism का समन्वय हो गया हो। उसे आप Idealistic Realism कह सकते हैं।28 पर आदर्शोन्मुख यथार्थवाद भी एक चुनाव है, रचना-प्रक्रिया का नैसर्गिक अंग नहीं, जबकि उपन्यास अपनी प्रकृति में एक यथार्थवाद साहित्य-रूप है। इसका साक्ष्य स्वयं प्रेमचंद की परवर्ती रचनाशीलता है। अपने बाद के उपन्यासों और कहानियों में वे आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के आदर्श से दूर खरे यथार्थवाद को अपनाते हैं। इस आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उपन्यास पर ये आलोचनात्मक लेख यदि वे दसेक बरस बाद लिखते, तो संभवतः आदर्शोन्मुख यथार्थवाद जैसी अवधारणा न देते, बल्कि यथार्थवाद की वकालत करते। पर, यह अटकल तभी तक कोई अर्थ रखती है जब तक उनके केवल परवर्ती रचनात्मक लेखन को ध्यान में रखा जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि अपने आलोचनात्मक एवं वैचारिक लेखन में वे आजीवन आदर्शवाद को महत्त्व देते रहे। अपने यथार्थवादी लेखन के समानांतर वे आदर्शवाद को भी उपयोगी मानते रहे। इसका प्रमाण जुलाई, 1936 में प्रकाशित राशिद-उल-खैरी की सामाजिक कहानियाँ नामक उनका आलोचनात्मक लेख है। इस लेख में उन्होंने यथार्थवाद और आदर्शवाद के द्वंद्व पर अपना विचार रखते हुए एक बार फिर लिखा है, वास्तविकता चाहती है कि आर्टिस्ट दुनिया को उसी तरह दिखाए जैसे वह उसे देखता है। अगर इससे उसकी मानव अनुभूतियों को आघात पहुँचता है, तो पहुँचे, इससे उसकी न्यायबुद्धि को चोट लगती है, तो लगे, पर उसे वास्तविकता से इधर उधर हटने के इजाजत नहीं। मगर साहित्यकार सब कुछ समझने पर भी आइडियलिस्ट बनने पर मजबूर है।29 आदर्शवाद को साहित्यकार की मजबूरी कहकर उन्होंने अपना साहित्य-सिद्धांत स्पष्ट कर दिया है, और आदर्शवाद के महत्त्व को भी। आदर्शोन्मुख यथार्थवाद में आजीवन अपनी आस्था को भी। उन्होंने आदर्शवाद के समर्थन में एक ऐसा तर्क दिया है जिसको आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता है। उनका यह तर्क साहित्य के उनके उद्देश्य की भूमि पर स्थित है। उनके लिए साहित्य का उद्देश्य है, एक बेहतर समाज और संस्कृति के निर्माण के लिए कृतसंकल्पित होकर प्रयास करना। हर तरह के अन्याय, दमन, विषमता और भेदभाव के उन्मूलन तथा समता, बंधुता के आधार पर समाज के नवनिर्माण के लक्ष्य को प्राप्त करना। उनके अनुसार साहित्यकार अप्रिय स्थितियों का अंत कर देना चाहता है। यही उद्देश्य प्रेमचंद के लिए आदर्शवाद है। उनका तर्क है कि जब आफ पास एक बेहतर समाज का आदर्श नहीं होगा, तो आप समाज को किस तरफ ले जाएँगे? वह आदर्शवाद ही है जो वर्तमान समाज की खामियों और सीमाओं को दिखाता है और जनता में उनके प्रति असंतोष पैदा करके उसे परिवर्तन के लिए उकसाता है। इसके लिए अधिक प्रचलित शब्द स्वप्न हो सकता है। समाज का एक खाका होना चाहिए, एक स्वप्न होना चाहिए तभी आप समाज को उस दिशा में ले जा सकते हैं। प्रेमचंद कहते हैं, अगर किसी बेहतर जिंदगी और *यादा खूबसूरत सोसाइटी की सूरत हमारे दिमाग में नहीं है, तो हम मौजूदा समाज को खींचकर सुधार के किस लक्ष्य की ओर ले जाएँगे?30
साहित्य में कल्पना का महत्त्व निर्विवाद है। निराला ने ठीक ही कविता को कल्पना के कानन की रानी कहा है। उपन्यास में कविता जैसी कल्पना की स्वच्छंद उडान कहाँ! पर कल्पना का महत्त्व उपन्यास के क्षेत्र में भी कम नहीं है। हिन्दी के कई उपन्यास-आलोचक उपन्यासकार के लिए कल्पना-शक्ति को जरूरी मानते हैं। रामचंद्र शुक्ल ने तो यहाँ तक कि ऐतिहासिक उपन्यासकार को भी कल्पना की छूट दी है। उनके अनुसार जहाँ इतिहासकार मौन हो जाता है, वहाँ उपन्यासकार कल्पना के माध्यम से जीवन भरता है। कविता और उपन्यास ही नहीं बल्कि साहित्य की अन्य विधाओं का भी कारोबार कल्पना के बिना एक पग भी नहीं चल सकता है। प्रेमचंद ने भी कल्पना को एक अपरिहार्य साधन माना है। वे मानते हैं कि अपने जीवनानुभवों के आधार पर उपन्यासकार कल्पना कर सकता है कि किसी परिस्थिति में कोई पात्र या मनुष्य कैसा व्यवहार कर सकता है। उपन्यासकार के लिए यह जरूरी नहीं कि वह हर अवस्था का प्रत्यक्ष अनुभव ही प्राप्त करे। वह कल्पना के सहारे भी उस अवस्था में अपने पात्र की मनोदशा को चित्रित कर सकता है। उन्होंने पश्चिम के उन उपन्यासकारों की खिल्ली उडाई है जो अपने वर्ण्य-विषय और पात्रों की प्रत्यक्ष जानकारी लेने के लिए अपने जीवन को पात्रों की परिस्थितियों में ढालते हैं। चोर पर लिखने के लिए चोर बनते हैं। ऐसे प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करके लिखना ही यदि लेखन की शर्त हो, तो अधिकांश लेखक जीवनभर बहुरूपिया बनकर प्रत्यक्ष अनुभव ही हासिल करने में जीवन व्यतीत कर देंगे। भोगा हुआ अनुभव ही लेखन के काम नहीं आता है, बल्कि अध्ययन, पर्यवेक्षण-अवलोकन और कल्पना के द्वारा भी लिखने की सामग्री जुटाई जाती है। लेखक अपने मनोभावों को अपने पात्रों पर आरोपित भी करता है। कल्पना के माध्यम से लेखक अपने आपको विभिन्न परिस्थितियों में रखकर काम चलाता है। प्रेमचंद लिखते हैं, लेखक अपने को कल्पना के द्वारा जितनी ही भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में रख सकता है, उतना ही सफल-मनोरथ होता है। तुलसीदास ने पुत्र-शोक कितनी सफलता से दिखाया है। विदित ही है कि उन्हें इस शोक का प्रत्यक्ष अनुभव न था। अपने को शोकातुर, वियोगी पिता के स्थान पर रखकर ही उन्होंने उन भावों का अनुभव किया होगा।31 हर बात का अनुभव अर्जित करके लिखने को प्रेमचंद कल्पना-शून्यता का फल बताते हैं। उनका कहना है कि जिस लेखक में कल्पना-शक्ति नहीं होती है वही ऐसे प्रत्यक्ष अनुभव लेने के लिए बाध्य होता है। कल्पनाशील लेखक कल्पना के साधन से काम लेते हैं। प्रेमचंद लिखते हैं, उपन्यासकार को ऐसी दशाओं और मनोभावों के वर्णन करने में अपनी कल्पना-शक्ति ही सबसे बडी मददगार है। ऐसा बिरला ही कोई प्राणी होगा जिसने बचपन में पैसे या मिठाई न चुराई हो, या चोरी से मेला या दंगल देखने न गया हो, अथवा पाठशाला में अध्यापक से बहाने न किए हों। यदि कल्पना-शक्ति तीव्र हो, तो इतने अनुभव को चोरों और डकैतों के मनोभाव चित्रित करने में कृतकार्य कर सकती है।32 इसीलिए, कल्पना-शक्ति के बारे में नामवर सिंह ने लिखा था, कल्पना-शक्ति के द्वारा मन अगम वस्तु तक पहुँच जाता है, दुर्लभ वस्तु को भी प्राप्त कर लेता है, अज्ञात और अज्ञेय वस्तु को भी जान लेता है तथा अदृष्ट वस्तु का भी रूप निर्धारित कर सकने में समर्थ हो जाता है।33 प्रेमचंद इसी कल्पना को उपन्यासकार के लिए उपयोगी मानते हैं। उनके लिए कल्पना यथार्थ से स्वतंत्र चीज नहीं है और न ही वह यथार्थ से पलायन का साधन है, बल्कि यथार्थ को प्रस्तुत करने का एक जरिया है। उपन्यासकार कल्पना की सहायता से अपना मनोवांछित कल्पनालोक नहीं रचता है, बल्कि यथार्थलोक रचता है। कल्पना की भूमिका स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं, ...घटनाओं को कल्पना द्वारा ऐसा सजीव बनाना चाहिए कि उनमें वास्तविकता झलकने लगे।34 कल्पना पर बल देने के बावजूद प्रेमचंद अनुभव को नकारते नहीं हैं। उपन्यास-लेखन में अनुभव के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए वे लिखते हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं कि कृत्रिम अवस्थाओं में जो अनुभव प्राप्त होते हैं वे स्वाभाविक नहीं हो सकते। फिर भी उपन्यास की सफलता के लिए अनुभव सर्वप्रधान मंत्र है। उपन्यास लेखक को नये-नये दृश्यों को देखने और नये-नये अनुभवों को प्राप्त करने का कोई अवसर साथ से न जाने देना चाहिए।35 उन्होंने उपन्यासकार में दिव्य कल्पना-शक्ति के साथ-साथ अवलोकन और निरीक्षण की भी प्रचुर मात्रा की जरूरत पर भी बल दिया है। उनका मानना है कि उपन्यासकार का काम इन दोनों के बिना नहीं चल सकता है। इसलिए उन्होंने कल्पना और अनुभव दोनों पर समान बल दिया और आविष्कार का भी महत्त्व समझा। लेकिन अपने जीवन के आखिरी दिनों में उन्होंने कल्पना के स्थान पर सत्य या यथार्थ पर बल दिया। उन्होंने उपन्यास का विषय नामक निबंध में यह दर्ज किया कि कल्पना कुछ भी हो, कल्पना ही है। वह यथार्थ का स्थान नहीं ले सकती।36 उनका मानना था कि भविष्य के उपन्यास कल्पना से अधिक सत्य के निकट होंगे। उपन्यास के पात्र कल्पित न होंगे, बल्कि व्यक्तियों के जीवन पर आधारित होंगे। कल्पना के बरक्स यथार्थ पर बल देते हुए वे लिखते हैं, अभी हम झूठ को सच बनाकर दिखाना चाहते हैं, भविष्य में सच को झूठ बनाकर दिखाना होगा।37 वास्तविक उपन्यास की पहचान असत्य के निदर्शन की नहीं, बल्कि सत्य के असत्यपूर्ण प्रस्तुतीकरण में है। इसी को प्रेमचंद सच को झूठ बनाकर दिखाना कहते हैं। पर काल्पनिक कथा कहना और सत्य-कथा के प्रस्तुतीकरण में कल्पना का एक रचनात्मक प्रविधि या उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना दोनों भिन्न-भिन्न बातें हैं। ऊपर के विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद ने उपन्यासकार के लिए कल्पना के उपकरण के महत्त्व का नकार नहीं किया है बल्कि कपोल-कल्पित कथा और चरित्रों की रचना का नकार किया है। जो कि उनकी उपन्यास विधा की प्रकृति की परिपक्व व वास्तविक पहचान का परिचायक है।
आधुनिकता के विस्तार के साथ-साथ उपन्यास का दुनियाभर में स्वागत हुआ। वह एक सार्वभौम साहित्य-रूप बन गया। लेकिन, जहाँ-जहाँ वह गया वहाँ-वहाँ स्वागत के साथ-साथ उसका विरोध भी खूब हुआ। प्रेमचंद ने भी उपन्यास विरोधी सामाजिक प्रवृत्ति का जिक्र किया है। वे लिखते हैं, आज भी कितने ही ऐसे व्यक्ति मिलते हैं जिन्हें उपन्यासों से चिढ है। उन्होंने व्रत कर लिया है कि उपन्यास कदापि न पढेंगे।38 उन्होंने ऐसी उपन्यास-विरोधी प्रवृत्ति का कारण केवल उपन्यास की नीरसता और उसमें मनोरंजकता की कमी माना है, जबकि उपन्यास का दुनियाभर में विरोध अन्य कारणों से अधिक होता रहा है। उपन्यास को अनैतिक और चरित्रहीन बनाने वाली विधा माना जाता रहा है। उपन्यास पढने को बुरा काम माना जाता रहा है। फलस्वरूप उपन्यास के बहुत-से पाठक इसे परिजनों और समाज से छिपाकर पढते रहे हैं। इसका कारण उपन्यास की संरचना में अंतर्निहित मूल्य-व्यवस्था है, जो परंपरावादी समाजों के यथास्थितिवाद को चुनौती देती है। उपन्यास आधुनिकता का सांस्कृतिक अग्रदूत है। वह व्यक्ति-स्वातंत्र्य और लोकतांत्रिक भावों को जगाता है, जिन्हें सामाजिक और राजनीतिक विद्रोह और सुधार के रूप में यथास्थितिवाद के आकांक्षी और संरक्षणशील प्रवृत्ति के लोग अपनी सत्ता के विरूद्ध चुनौती के रूप में देखते रहे हैं। इस कारण सामाजिक और राजनीतिक ही नहीं, बल्कि हर तरह की प्रतिगामी सत्ताएँ उपन्यास के विरूद्ध अपना निर्णय सुनाती रही हैं। आज भी कई उपन्यासकार देशनिकाला और निर्वासन भोग रहे हैं। सत्ताओं ने उनके सिर कलम करने के इनाम तय कर रखे हैं। उपन्यास संभवतः अकेली साहित्य-विधा है जिसको सबसे ज्यादा विरोध का सामना करना पडता रहा है। यह किसी एक देश और समाज का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का सच है। प्रेमचंद ने यदि उपन्यास-विरोधी संस्कृति के संपूर्ण परिप्रेक्ष्य को सामने रखा होता, तो हिंदी उपन्यास आलोचना को सामाजिक आलोचना का अस्त्र बनाने में और मदद मिलती।
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को ज्ञानराशि का संचित कोश कहा है। इसका अर्थ यह है कि साहित्य केवल भावोच्छ्वास, वाग्वैभव, शब्द-चमत्कार और रसोद्रेक ही नहीं है, बल्कि उसमें समाज के ज्ञानानुशासनों का निचोड भी होता है। प्रेमचंद भी साहित्य के ज्ञानात्मक पक्ष पर बल देते हैं। वे अपेक्षा करते हैं कि साहित्य ज्ञान-विज्ञान से समृद्ध होना चाहिए। उनके अनुसार समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था, कला, इतिहास, दर्शन और धर्म-अध्यात्म का साहित्यकार को विधिवत अध्ययन करना चाहिए। लेखक बनने की तैयारी इनके ज्ञान के बिना पूरी नहीं हो सकती है। इसलिए प्रेमचंद उपन्यासकार के ज्ञानार्जन पर बल देते हैं। नये लेखकों से वे अनुरोध करते हैं, ...यदि आप उपन्यास लिखना चाहते हैं, तो पहले तैयारी कीजिए। बिना मानव-शास्त्र का उचित ज्ञान प्राप्त किए, कभी न कलम उठाइए।...शास्त्रों का कुछ ज्ञान होना परमावश्यक है।39 प्रगतिशील लेखक संघ के लखनऊ सम्मेलन में उन्होंने साहित्य को ज्ञान-राशि का संचित कोश बनाने पर बहुत बल दिया। हिंदी के तत्कालीन साहित्य में उन्हें इस प्रवृत्ति की कमी दिखायी दी थी। इस पर किंचित दुख और व्यंग्य के साथ उन्होंने कहा, आज तो हिंदी में साहित्यकार के लिए प्रवृत्ति मात्र अलम् समझी जाती है और किसी प्रकार की तैयारी की उसके लिए आवश्यकता नहीं। वह राजनीति, समाजशास्त्र या मनोविज्ञान से सर्वथा अपरिचित हो, फिर भी वह साहित्यकार है!40 वे साहित्यकार को मानसिक पूँजीपति कहते हैं। इससे उनका आशय यह है कि साहित्यकार समाज के उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान, चिंतन और मानसिक अवस्था का प्रतिनिधि होता है। वे चाहते हैं कि साहित्यकार समाज और जीवन के सभी विभागों और आयामों का ज्ञाता हो। उनके विचार में साहित्य का मानदंड तभी ऊँचा हो सकता है और साहित्य तभी समाज की मूल्यवान सेवा कर सकता है जब जीवन के प्रत्येक विभाग की आलोचना-विवेचना कर सकने की योग्यता रखता हो। साहित्य में बुद्धिवाद नामक लेख में उन्होंने भावना और बुद्धिवाद के समन्वय पर बल दिया। उक्त भाषण में वे एक बार और हिंदी साहित्य की सोचनीय अवस्था पर दुख प्रकट करते हुए कहते हैं, अगर हम अंतर्राष्ट्रीय साहित्यकार सम्मेलनों की रिपोर्ट पढें, तो हम देखेंगे कि ऐसा कोई शास्त्रीय, सामाजिक, ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक प्रश्न नहीं है, जिस पर उनमें विचार-विनिमय न होता हो। इसके विरूद्ध अपनी ज्ञान-सीमा को देखते हैं, तो अपने अज्ञान पर लज्जा आती है। हमने समझ रखा है कि साहित्य-रचना के लिए आशुबुद्धि और तेज कलम काफी है।41
उपन्यास वर्तमान का कथा-रूप है। आज की रोजमर्रा की जिंदगी ही उसका केंद्रीय सरोकार है। उसकी दिलचस्पी भूत और भविष्य में कम है। वह वर्तमान में टिका रहता है। भूत और भविष्य में कभी जाता भी है तो उसका एक पैर वर्तमान में ही टिका रहता है। वर्तमान को साधने के लिए ही वह भूत-भविष्य की यात्राएँ करता है। वर्तमान में अवस्थित होकर भविष्य की काल्पनिक कथा या यूटोपिया-डिस्टोपिया भी कभी-कभी उपन्यास प्रस्तुत करते रहे हैं। इतिहास भी उपन्यास को आकर्षित करता रहा है। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से विद्वानों ने ऐतिहासिक उपन्यास की अलग श्रेणी भी बनायी हुई है। दुनियाभर में ऐतिहासिक उपन्यासों की धूम रही है। हिंदी में भी एक से बढकर एक ऐतिहासिक उपन्यास लिखे गए हैं। लेकिन, उपन्यास पर सोचते और लिखते समय प्रेमचंद का ध्यान हमेशा वर्तमान पर केंद्रित रहा। इसलिए उन्होंने न ऐतिहासिक उपन्यास लिखे और न ही उपन्यास पर लिखते समय ऐतिहासिक उपन्यास पर अपने विचार व्यक्त किए। कर्बला नाम से उन्होंने कर्बला के युद्ध पर एक नाटक जरूर लिखा है। इसका एक कारण तो यह है कि ऐतिहासिक विषयों पर लिखने को वे लोहे के चने चबाने के समान दुष्कर मानते थे। जयशंकर प्रसाद के उपन्यास कंकाल की समीक्षा करते हुए वे लिखते हैं, ... न जाने क्यों मेरी यह धारणा हो गयी है कि हम आज से दो हजार वर्ष पूर्व की बातों और समस्याओं का चित्रण सफलता के साथ नहीं कर सकते। मुझे यह असंभव-सा मालूम होता है।42 दूसरा कारण यह है कि इतिहास की तुलना में वे वर्तमान समस्याओं पर लिखने को अधिक उपयोगी और लाभदायक मानते थे। जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक नाटक स्कंदगुप्त की अपनी समीक्षा में वे उन्हें परामर्श देते हुए लिखते हैं, हम प्रसादजी से यहाँ निवेदन करेंगे कि आपको ईश्वर ने जो शक्ति दी है, उसका उपयोग वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं के हल करने में लगाइए। स्टेज का आज यही ध्येय माना जाता है। इन गडे मुर्दों को उखाडने में आज कोई फायदा नहीं है।43 प्रेमचंद की इतिहास की इस उपयोगितावादी समझ की अपनी समस्याएँ हैं। इतिहास की खोजबीन हमेशा अतीतप्रेम और वर्तमान की उपेक्षा के कारण नहीं होती, बल्कि ज्यादातर वर्तमानप्रेम और उसकी खोजबीन की कामना के कारण होती है। इतिहास की सार्थकता इतिहास के लिए नहीं, वर्तमान के लिए ही होती है। प्रेमचंद जिन समस्याओं के समाधान के लिए स्वयं को वर्तमान केंद्रित रखते हैं उन्हीं से प्रेरित होकर प्रसाद इतिहास में जाते हैं। प्रसाद के ऐतिहासिक साहित्य के केन्द्र में वर्तमान की चिंताएँ वैसी ही मौजूद हैं जैसी स्वयं प्रेमचंद के सामयिक साहित्य में।
उपन्यास-रचना निबंध में प्रेमचंद ने उपन्यास की रचना-प्रक्रिया का बडा विशद और बोधगम्य विश्लेषण किया है। इससे हमें उपन्यास की रचना-प्रक्रिया की जानकारी तो मिलती ही है, साथ-साथ स्वयं उनकी रचना-प्रक्रिया का भी ज्ञान मिलता है। उन्होंने उपन्यास लेखन की तैयारी के गुर साझा करने से लेकर विषय के चुनाव, चरित्र-चित्रण और कथानक तक के रचना-प्रक्रिया के सभी अंगों पर अपने विचार व सुझाव दिए हैं। इससे पाठक उपन्यास की रचना-प्रक्रिया से परिचित हो सकते हैं, तो नये उपन्यासकार उपन्यास लेखन की शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। उनके अनुसार उपन्यासकार को सबसे पहले विषय खोजना पडता है। विषय निर्धारित हो जाने के बाद उपन्यासकार को कथानक या प्लॉट की चिंता करनी पडती है। उन्होंने कथानक पर विस्तार से विचार किया है। हिंदी उपन्यास-आलोचना में कथानक पर इतना अंतर्दृष्टिपूर्ण और विशद चिंतन कम ही दिखायी देता है। सरलता, मौलिकता और रोचकता को वे अच्छे प्लॉट की विशेषता मानते हैं। उनके अनुसार शैतान की आँत जैसा उलझा हुआ प्लॉट उबाऊ और दिमाग खपानेवाला होता है। प्लॉट में नवीनता, मौलिकता और अनोखापन होना चाहिए। घिसे-पिटे विषय पर थोडा फेरफार करके प्लॉट बनाने से बचना चाहिए। पाठक का मन नये विचारों और भावों में अधिक लगता है। सरलता और मौलिकता से रोचकता भी आती है। उपन्यासकार को मनोरंजक और रोचक प्लॉट तैयार करना चाहिए तभी पाठक का मन कहानी में लगेगा। उनका मानना है कि प्लाट जितना ही सुचिंतित और लेखक की लंबी संलग्नता की उपज होगा, उपन्यास उतना ही उत्तम बनेगा। प्रेमचंद ने प्लॉट को छह प्रकारों में बाँटा है- 1. कोई अद्भत घटना, 2. कोई गुप्त रहस्य, 3. मनोभाव चित्रण, 4. चरित्रों का विश्लेषण और तुलना, 5. जीवन के अनुभवों को प्रकट करना, और 6. कोई सामाजिक या राजनीतिक सुधार।
प्रेमचंद कहते हैं कि विषय निर्धारण और प्लॉट सुनिश्चित होने के बाद उपन्यास की नींव पड जाती है। उपन्यास रूपी भवन खडा करने के लिए वे उपन्यासकार के छह साधन बताते हैं-1. अवलोकन, 2. अनुभव, 3. स्वाध्याय, 4. अंतर्दृष्टि, 5. जिज्ञासा और, 6. विचार-आकलन। संस्कृत काव्यशास्त्र में काव्यरचना के लिए प्रतिभा को बहुत महत्त्व दिया गया है। अभ्यास को गौण स्थान प्राप्त है। प्रेमचंद ने भी प्रतिभा को महत्त्व दिया है। वे लिखते हैं, यह बात नहीं कि बिना पढे कोई अच्छा उपन्यास नहीं लिख सकता। जिन्हें ईश्वर ने प्रतिभा दी है, उनके लिए पढना बहुत अनिवार्य नहीं है।44 लेकिन, प्रेमचंद प्रतिभा मात्र को उपन्यास के लिए पर्याप्त नहीं माना है। प्रतिभा के बावजूद उन्होंने अभ्यास-पक्ष यानी उक्त छह साधनों पर बल दिया है। प्रतिभा तो इन साधनों के द्वारा उपन्यास-लेखन की कला और शिक्षा अर्जित करने में ही प्रतिफलित हो सकती है।

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संदर्भ-सूची
1. प्रेमचंद के विचार, भाग-2, प्रकाशन संस्थान, नयी
दिल्ली, 2003, पृ. 13।
2. वही, पृ. 13।
3. वही, पृ. 27।
4. महावीर प्रसाद द्विवेदी प्रतिनिधि संकलन, प्रधान
संपादक- नामवर सिंह, नेशनल बुक ट्रस्ट, नयी दिल्ली,
1996, पृ. 19-20।
5. प्रेमचंद के विचार, भाग 2, पृ. 46।
6. प्रेमचंद के विचार, भाग 2, पृ. 47।
7. प्रेमचंद के विचार, भाग 2, पृ. 13।
8. प्रेमचंद के विचार, भाग 2, पृ. 13।
9. महावीर प्रसाद द्विवेदी प्रतिनिधि संकलन, प्रधान
संपादक- नामवर सिंह, नेशनल बुक ट्रस्ट, नयी दिल्ली,
1996, पृ. 19।
10. प्रेमचंद के विचार, भाग 2, पृ.ष्ठ 20।
11. प्रेमचंद के विचार, भाग 2, प्रकाशन संस्थान, नयी
दिल्ली, 2003, पृ.ष्ठ 20।
12. प्रेमचंद के विचार, भाग-2, पृ.ष्ठ 31।
13. साहित्य का उद्देश्य, प्रेमचंद रचनावली- जनवाणी
प्रकाशन, दिल्ली- 2013, पृ. 508।
14. साहित्य का उद्देश्य, प्रेमचंद रचनावली- जनवाणी
प्रकाशन, दिल्ली- 2013, पृ. 511।
15. एनॉटमी ऑफ नॉवेल, मॉरजरी बॉल्टन, रूटलेज,
यूएसए, 1975, पृ.ष्ठ 7।
16. प्रेमचंद के विचार, भाग-2, पृ. 13.
17. प्रेमचंद के विचार, भाग-2, पृ.ष्ठ 31 ।
18. चिंतामणि-1, रामचंद्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य सरोवर,
आगरा, 1992, पृ. 95।
19. प्रेमचंद के विचार, भाग-2, पृ.ष्ठ 31।
20. प्रेमचंद के विचार, भाग-2, पृ.ष्ठ 32।
21. प्रेमचंद के विचार, भाग 2, पृ. 18।
22. प्रेमचंद के विचार, भाग-2, पृ. 19।
23. प्रेमचंद और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नयी
दिल्ली, 1993, पृ. 122।
24. प्रेमचंद और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नयी
दिल्ली, 1993, पृ. 122 से उद्धृत।
25. प्रेमचंद के विचार भाग-2, पृ.ष्ठ 19।
26. द इंग्लिश नॉवेल : ऐन इंट्रोडक्शन, टैरी ईग्ल्टन,
ब्लैकवेल पब्लिशिंग, यूके, 2005, पृ. 10।
27. प्रेमचंद के विचार, भाग-2, पृ. 23।
28. प्रेमचंद के विचार, भाग-2, पृ. 28।
29. प्रेमचंद के विचार, भाग-2, पृ. 55।
30. प्रेमचंद के विचार, भाग-2, पृ. 55।
31. प्रंमचंद के विचार, भाग-2, पृ.. 14।
32. प्रेमचंद के विचार, पृ. 14।
33. छायावाद, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1955,
पृ. 84।
34. प्रेमचंद के विचार भाग 2, पृ. 15।
35. प्रेमचंद के विचार, पृ. 14।
36. प्रेमचंद रचनावली-7,जनवाणी प्रकाशन, दिल्ली,
2013, पृ. 335, ।
37. प्रेमचंद रचनावली-7, पृ. 335।
38. प्रेमचंद के विचार, भाग 2, पृ.ष्ठ 20।
39. प्रेमचंद के विचार, भाग-2, पृ. 32।
40. प्रेमचंद रचनावली- 7, जनवाणी प्रकाशन, दिल्ली-
2013, पृ. 508।
41. प्रेमचंद रचनावली-7, पृ. 509।
42. प्रेमचंद रचनावली-9, पृ. 345।
43. प्रेमचंद रचनावली- 9, पृ. 338।
44. प्रेमचंद के विचार, भाग-2, पृ. 14।