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संवाद निरन्तर

पहली बार कोई पत्रिका आद्यन्त फोन में पढी। मधुमती का जून 2021 का अंक वैसे तो दार्शनिक साहित्यकार यशदेव शल्य पर एकाग्र है, किंतु उन तक सीमित नहीं है।
दरअस्ल किसी भी पत्रिका को पठनीय बनाना काफी कला कौशल की माँग करता है। मधुमती में यह दीख रहा है। रमेश चंद्र शाह का लेख, सख्य भाव का आत्मविनिमय, प्रचंड प्रवीर का लेख, शल्य और भारतीय चिंतन परंपरा, आलोक टंडन का लेख, शल्य की दृष्टि में गाँधी, पढ लिए गए। गाँधीजी को हम भारतीय, देवता अथवा नेता की तरह नहीं, वरन मनुष्य की तरह देखते समझते हैं। प्रभात त्रिपाठी का आलेख, गाँधी-डायरी में नोट्स, इस भाव को मुखर करता है। इसी तरह प्रभात का बेहद मर्मस्पर्शी लेख है,नरसी की गाडी। ईशमधु तलवार की कहानी कोरोना महामारी को समेटते हुए भी उदास नहीं है। चीन का पंछी उड उड आए में हज़ार चिडियों, जलपाखियों का कलरव है। लेखक उनके संवाद भी गढता है। एक पक्षी कहता है मनुष्यों के क्रूर मुखों पर मास्क लगा रहे अच्छा है। दूसरा कहता है मास्क इतना बडा है कि इसमें घोंसला बन जाए। पंछी चाहे चीन के हों या पाकिस्तान के। हम उनकी उडान नहीं रोक सकते। पंछी हैरान हैं कि मानसागर झील इतनी स्वच्छ कैसे हो गयी।
दूसरी तरफ प्रमोद कुमार शर्मा की कहानी मुआवजा मनुष्य की लिप्सा दिखाती है।
प्रयाग शुक्ल अपने आत्मीय सृजन के कारण अलग पहचाने जाते हैं। कलाकार,निदेशक रामगोपाल बजाज पर लिखते हुए वे हमें 1965 से ले कर अब तक की यात्रा करवा रहे हैं। यह भी आज पता चला कि रंगप्रसंग पत्रिका का आविर्भाव और नाम, सब बज्जू भाई की देन थी।
कविताओं की कमान विमलेश शर्मा, मुदित श्रीवास्तव और श्रुति गौतम ने संभाल रखी है।
और इस सब पर नगीने की तरह जडे हुए हैं दो लेख;प्रियदर्शन और चंद्रकुमार की पुस्तक समीक्षाएँ। आज समीक्षा को लोग संस्तुति की तरह लेने लगे हैं जबकि आज का सुधी समीक्षक ही कल का आलोचक बनता है। प्रियदर्शन ने अनिरुद्ध उमट की पुस्तक, वैदानुराग पर विस्तार से लिखा है। कैसे दो लेखकों के बीच संवेद के सेतु निर्मित होते हैं, युवतर लेखक अपने अग्रज से प्रभाव ग्रहण कर स्वाधीन विकास पाता है। कृष्ण बलदेव वैद के व्यक्तित्व, कृतित्व, उनकी पत्र संपदा, उनसे हुए संवाद, उनकी हस्तलिपि तक,सब उमट ने अपने संस्मरण में समेट ली है। प्रियदर्शन स्वयं रचनाकार हैं,उसी संवेदना के साथ वे इस पुस्तक के अंतस्तल तक पहुँचते हैं। इसी प्रकार, युवा रचनाकार चंद्रकुमार ने पारुल पुखराज की डायरी पुस्तक, आवाज़ को आवाज़ न थी की गहन समीक्षा की है। वे एक रसज्ञ और मर्मज्ञ की तरह पढते हैं। वे कवि, डायरी कार पारुल के गद्य में पद्य की नमी ढूंढ लाते हैं। चंद्रकुमार, कोमल और विकल सन्नाटों को सुनते हैं और रचना पढने की मौलिक विधि गढते हैं। संपादक ब्रजरतन जोशी के परिश्रम का अंदाजा इसी से लगाइए कि पढते-पढते मेरी आँखें भर आईं, पर में मधुमती छोड न पाई।
(प्रख्यात कथाकार ममता कालिया की वाल से साभार)