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आलमशाह खान का रचना संसार व्याख्यानमाला सम्पन्न

-डॉ. तराना परवीन
सुप्रसिद्ध लेखक डॉ.आलम शाह खान की कहानियाँ वर्तमान समय में बहुत प्रासंगिक हो गई हैं। भारतीय सामाजिक जीवन का गहराई से अनुसंधान करके, पाठक की जडता को तोडते हुए उसे परिवर्तन के लिए उद्वेलित करती हैं - यही उनकी विशिष्टता है जो उनको वक्त से आगे का रचनाकार बनाती है तथा उनकी रचनाओं को कालजयी बनाती है। ये विचार आलमशाह खान यादगार समिति द्वारा आलमशाह खान की पुण्य तिथि के अवसर पर आयोजित चार फेसबुक कार्यक्रम -आलमशाह खान : व्यक्तित्व एवं कृतित्व विषयक चार दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला में उभरकर आए।
कार्यक्रम की संयोजक डॉ तराना परवीन ने बताया कि पहले दिन सत्रह मई को कहानी एवं डाक्टर आलमशाह खान विषय पर सम्पादक,आलोचक और दिल्ली विश्वविद्यालय में व्याख्याता डा. पल्लव और वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने फेसबुक लाईव पर विषय प्रवेश कराते हुए प्रो. आलमशाह खान के संस्मरण सुनाए और वर्तमान समय में साहित्य की भूमिका के साथ ही आधुनिक कहानी के विकास में खान साहब की महती भूमिका की चर्चा की।
इसके पश्चात दिनांक अठ्ठारह मई को आलम शाह खान : व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रथम व्याख्यान श्रृंखला फेसबुक पर लाइव की गई। इस प्रथम कडी में श्री विजय रंजन पूर्व आईएएस एवं फिल्म क्रिटिक ने कहा कि किराए की कोख कहानी, जिस पर कोख नामक फिल्म बनी है को पढने के बाद आप इतने विचलित हो जाते हैं कि आसानी से नींद नहीं आ सकती। वे हिंदी के प्रथम कहानीकार हैं जिनकी कहानियों में वीभत्स अन्त तक वीभत्स ही रहता है तथा जो लिखते हैं कि उन्हें इतिहास के साथ-साथ भूगोल भी परेशान करता है।
इसी सत्र में जयपुर के वरिष्ठ साहित्यकार श्री ईश मधु तलवार ने एक और मौत कहानी पर चर्चा करते हुए कहा कि इस कहानी में आलम शाह खान इतनी खूबी से उपेक्षित तबके की तस्वीर शब्दों के ज़रिए सामने लाते हैं कि उसका दर्द सीने में सीधा उतरता है।
प्रोफेसर हेमेंद्र चंडालिया ने मौत का मजहब कहानी को आज की कहानी बताते हुए कहा कि आज के दौर में जब मौत का तांडव कोरोना की वजह से चारों ओर फैला है और धार्मिक उन्माद तथा निराशा छाई है तब यह कहानी हमें अँधेरे में प्रकाश देती है और यह निराशा के दौर में उम्मीद की किरण बनकर सामने आती है। कहानी भोपाल गैस त्रासदी की तर्ज पर लिखी गई है। तब भी हवाओं में जहर घुल गया था और आदमी एक साँस के लिए तडप रहा था, आज भी हवाओं में जहर है और आज भी आदमी एक साँस के लिए तडप रहा है। चौथे वक्ता डॉ. आशीष सिंह ने उन्हें साठोत्तर के दशक के बाद के महत्वपूर्ण कहानीकार बताते हुए कहा कि उनकी भाषा, चरित्र गठन, तकनीक और परिवेश चित्रण उनको समकालीन लेखकों से अलग ही स्थान प्रदान करता है ।
कार्यक्रम की दूसरी श्रृंखला में उन्नीस मई को जयपुर की डॉ. प्रणु शुक्ला ने डा. आलमशाह खान को एक चेतनावादी रचनाकार बताते हुए कहा कि उनकी कहानी अबला जीवन का गणित स्त्री विमर्श की प्रतिनिधि कहानी है। डॉ. इन्दिरा जैन ने डॉक्टर आलम शाह खान के व्यक्तित्व पर बोलते हुए कहा कि वे यथार्थवादी व्यक्ति थे जो बात जैसी है उसे वैसी कहने में उन्हें कोई झिझक नहीं होती थी। डॉ. गोपाल सहर ने उन्हें एक प्रतिबद्ध लेखक बताते हुए कहा कि उनका व्यक्तित्व पहाड जैसा था, जिसमें ऊँचाई एवं गहराई दोनों थी। डॉ. प्रमिला चण्डालिया ने मेहंदी रचा ताजमहल को मानवीय प्रेम की अनमोल कहानी बता कर कहा कि उदात्त मानवीय प्रेम के वैश्विक प्रतीक ताजमहल को मेहंदी की भीनी भीनी खुशबू और सुर्ख रंग में जनसामान्य दुलारी के की हथेली पर उकेरने का साहस सिर्फ डॉक्टर आलम शाह खान ही कर सकते थे ।
चौथे दिन इक्कीस मई को सम्पन्न तीसरी कडी मे वरिष्ठ पत्रकार श्री उग्रसेन राव ने बाँधो ना नाव इक ठाँव और तिनके का तूफान कहानियों का विश्लेषण कर बताया कि शिल्प, कथावस्तु, भावभूमि और प्रभाव-प्रेरणा की कसौटी पर डा.आलमशाह खान की सभी कहानियां निस्संकोच उच्च कोटि के साहित्य में स्थान बनाती हैं। उक्त दोनों ही कहानियों में विवाह के बंधन की नये सिरे से व्याख्या की गई है। डा. हेमेंद्र पानेरी ने एक ओर सीता तथा मुरादो भरा दिन कहानियों को श्रेष्ठ रचनाएँ बताते हुए कहा कि यह कहानियां पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों के दैहिक शोषण, उनकी व्यथा और उनकी आवाज को मुखरित करने वाली , उनके अंदर छिपे दर्द की वास्तविकता से रूबरू कहानी कराने वाली मार्मिक कहानियां हैं, जो पाठक को सोचने पर मजबूर कर देती हैं।
अन्तिम वक्ता के रूप में प्रो. श्रीनिवासन अय्यर ने अ-नार कहानी का विश्लेषण कर कहा कि इसमें रचनाकार द्वारा थर्ड जेन्डर की पीडाओं को बखूबी सामने लाया गया है।सत्तर के दशक में लिखी यह कहानी अपने समय से बहुत आगे की कहानी है। फेसबुक लाईव की कडयिों के अन्त में आलमशाह खान यादगार समिति के अध्यक्ष व मशहूर शायर आबिद अदीब ने आलमशाह खान के संस्मरण सुनाते हुए कहा कि वे खुश तबीयत अदीब थे जो किसी भी छोटे कहलाने वाले आदमी से बात करते ,उसकी व्यथा सुनते तथा कहानियों में भी बेबाकी से उसे बयान करते। कार्यक्रम का तकनीकी संचालन अफ्शां खान और ज़हीन खान ने किया। कार्यऋम संयोजक डा. तराना परवीन ने सभी भागीदारों, आयोजन में सहयोग करने वालों तथा यादगार समिति के सदस्यों को धन्यवाद अर्पित किया। सभी कार्यक्रम आलम शाह खान यादगार समिति के फेसबुक पेज पर उपलब्ध है।