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समानांतर मराठी कहानी

सूर्यनारायण रणसुभे
समानांतर मराठी कविता के संकलन, संपादन और अनुवाद के बाद श्री प्रकाश भातम्बे*क हिंदी पाठकों के लिए समकालीन मराठी के 14 कहानीकारों की 14 कहानियों के अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछले करीब 40 वर्षों से प्रकाश पूरी निष्ठा के साथ मराठी की करीब-करीब सभी विधाओं में लिखी 70 से अधिक प्रातिनिधिक रचनाएँ हिंदी पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर चुके हैं। इस अर्थ में वे मराठी साहित्यिक के सांस्कृतिक दूत हैं।
उनके द्वारा प्रस्तुत समानांतर मराठी कविता का स्वागत हिंदी पाठकों, संपादकों, कवियों और समीक्षकों ने किया है। उसी से प्रेरणा लेकर उन्होंने अब समानांतर कहानी विधा की प्रातिनिधिक रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। इन दोनों संकलनों को पढते समय मुझे यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि ये समानांतर विशेषण का प्रयोग क्यों कर रहे हैं क्योंकि समानांतर का अर्थ होता है मुख्य धारा के विरोध में की गई अभिन्यक्ति। इस दोनों संकलनों में प्रस्तुत कवि और कहानीकार साहित्य की मुख्य धारा से कटे हुए नहीं है और न मुख्य धारा ने इन्हें अस्वीकार किया है। खैर, मैं समानांतर का अर्थ समकालीन ही ले रहा है। समकालीन अर्थ में यह विशेषण पूर्ण रूप से औचित्यपूर्ण है।
सन् 1960 के बाद भारत की उन सभी भाषाओं में (जिन्हें संविधान की आठवीं सूची में दर्ज किया गया है) साहित्य के विभिन्न विधाओं में लिखने की एक होड-सी शुरू हो जाती है। शिक्षा का प्रचार-प्रसार जितना अधिक हो रहा है, उसी के अनुपात में प्रत्येक भाषा में साहित्यिक-गैर साहित्यिक दोनों पत्रिकाएँ निकलने लगती हैं। परिणामतः प्रत्येक भाषा में लिखनेवालों की, पढनेवालों की संख्या में बढोत्तरी होने लगती है। इस कारण कुछ विशिष्ट रचनाकारों की विशिष्ट रचनाएँ ही प्रातिनिधिक हैं- इस प्रकार का दावा करना किसी को भी संभव नहीं ये रचनाएँ कितनी प्रातिनिधिक हैं या नहीं हैं- यह तो काल ही निश्चित करनेवाला है। रही बात समकालीनता की। 21वीं सदी में प्रवेश करते -करते भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक स्थितियों में इतनी तेजी से परिवर्तन शुरू हुआ है कि संवेदनशील स्त्री-पुरुष हक्के बक्के हो गए हैं। जिस तेजी से साथ मूल्यों में गिरावट आनी शुरू हुई है और जिस तेजी के साथ अर्थ ही जीवन के केंद्र में आ चुका है इसे देखते हुए संवेदनशील मन समझ नहीं पा रहा है कि इस बदलते मनुष्य को शब्दों में किस रूप में पकडा जाए। मनुष्य मन की इसी जटिलता के कारण अभिव्यक्ति के सामने अनेक संकट खडे हो गए हैं। परिणामतः प्रत्येक भाषा के लेखक अभिव्यक्ति के पारंपरिक पद्धति को नकारते हुए, उसमें नये-नये प्रयोग करने के लिए मजबूर हो चुका है। मराठी के लेखक/कल भी इसके लिए अपवाद नहीं है। इस संकलन में इस प्रकार के नये-नये प्रयोग मिलते हैं। संग्रह की चौदह कहानियों में व्यक्त संवेदना या आशय को लेकर किसी भी प्रकार के विवेचन का उद्देश्य यही नहीं है। इन कहानियों के कथ्य का परिचय देने की आवश्यकता नहीं है।
इस संग्रह की कहानियों से गुजरने के बाद ही पाठक इस संकलन के अंतरंग में जा सकता है। इस अंतराल को मुंबई के श्री शैलेशकुमार सिंह ने लिखा है। श्री सिंह पिछले 30-40 वर्षों से महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में रहते हैं । मुंबई अर्थात् महाराष्ट्र ही इनका स्थायी निवास हो चुका है। मराठी भी जानते हैं। श्री सिंह ने बहुत संक्षेप में मध्यकालीन मराठी साहित्य का परिचय देते हुए इस संकलन की प्रत्येक कहानी की संवेदना को विस्तार से समझने-समझाने का प्रयत्न किया है। उनकी साहित्यिक सूझ-बूझ तथा समझा इन कहानियों में व्यक्त संवेदना को न्याय देनेवाली ही है। अलबत्ता उनके कुछ वक्तव्य यथार्थ के विरोध में जानेवाले हैं पूरी विनम्रता से में उनके ध्यान में लाना चाहूँगा कि वास्तविकता ऐसी नहीं है। जैसे उन्होंने आरंभ में (पृष्ठ 11) में यह लिखा है कि संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, बहिणाबाई के बाद रामदास आदि ने किसी न किसी रूप में ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती देते हुए उसे न केवल शिथिल किया, बल्कि दरकाया भी। इस पूरी प्रक्रिया में रामदास कहीं नहीं बैठते। उल्टे मराठी के संत साहित्य के सभी अध्येताओं ने (उसमें ब्राह्मण और ब्राह्मणेतर) अनेक प्रमाणों द्वारा यह साबित किया है कि रामदास ब्राह्मणवादी व्यवस्था के दृढ समर्थक थे। महाराष्ट्र में दो परंपराएँ मध्यकाल से चली आ रही है या कहें पूरे देश में प्राचीन काल से ही- प्रगतिकामी (वर्णवर्चस्ववादी व्यवस्था के विरोध में जानेवाली) तथा प्रगतिविरोधी या प्रतिगामी (वर्णवर्चस्व-वादी व्यवस्था के समर्थन में सक्रिय)। रामदास प्रतिगामी परंपरा का प्रतिनिधित्य करते हैं। उनके सूचनार्थ यह जानकारी दे रहा हूँ।
रत्नप्रभा जाधव का अखबारी खबर बन जाता- नीरजा की इस मार्मिक कहानी का विवेचन करते हुए श्री सिंह लिखते हैं कि भारतीय समाज में स्त्रियों की निर्धनता अविवाहित रहने का एक बडा कारण है। ...कभी-कभी जातिगत भिन्नता के कारण (जातिगत श्रेष्ठता) भी विवाह का युग्म बन नहीं पाता। खास कर यदि माता-पिता विजातीय हैं तो इस तरह की मुश्किलें आती हैं। (पृ. 20) उनका यह मत भी यथार्थ की भीती पर टिक नहीं पाता। पहली बात देहातों में निर्धन, अशिक्षित वर्ग में विवाह बहुत कम उम्र में किए जाते हैं। वहाँ निर्धनता कभी बाधा रूप में खडी नहीं होती। दूसरी बात माता पिता विजातीय हैं, तो विवाह में मुश्किलें आती हैं- यह भी महाराष्ट्र का तो यथार्थ नहीं है। संभव है कि हिंदी पट्टी का यथार्थ है। मेरे इस लातूर शहर में पिछले 30-40 वर्षों में 150 से अधिक अंतरजातीय (विजातीय) विवाह हो चुके हैं। इसके पूर्व मराठवाडा में (जहाँ से मैं और प्रकाश आए हैं) आज से करीब 70-80 वर्षों पूर्व आर्यसमाज ने दर्जनों नहीं सेकडों विजातीय विवाह- करने से लेकर देहालों तक- संपत्न किया हैं उनकी किसी भी संतति को. यह विवाह बाधा नहीं बना है। जाति अंत के विनाश के लिए अंतरजातीय विवाह पही एकमात्र रास्ता है। श्री सिंह इस प्रकार की मुश्किलें का भय बतलाकर अंतरजातीय विवाह का विरोध ही कर रहे हैं। कम-से-कम पाठकों तक ऐसा ही संदेश जाने की संभावना है। उनके इन दो निष्कर्षों को छोड दें, तो संकलन की 14 कहानियों का जो विवेचन-विश्लेषण उन्होंने किया है वह निश्चित ही काबीले तारिफ है। उनके इस विवेचन से स्पष्ट है कि उनके भीतर एक तटस्थ समीक्षक बैठा है। ये कहानी के पात्रों के काफी भीतर उतरकर वहीँ की उपल- पुथल को समझ लेने का प्रयत्न करते हैं । इस संकलन में महानगरीय बोध की कहानियाँ संख्या में अधिक है। और श्री सिंह महानगरीय बोध को न केवल समझते हैं, अपितु वे इसके भुक्तभोगी भी हैं। मूल लेखक की संवेदना तक पहुंचना और उन्हें सटीक शब्दों में व्यक्त करना- इसमें उन्हें बेहद सफलता मिली है। भूमिका में उन्होंने महाराष्ट्र और हिंदी पट्टी की मानसिकता का जो विश्लेषण किया है वह पूर्ण रूप से यथार्थ है। हिंदी मानसिकता अभी भी सामंती वृत्ति से बाहर निकल नहीं पाई है, इसे वे स्पष्ट करते हैं। विशेष रूप और हिंदी में स्त्री-विमर्श से संबंधित जो कहानियाँ लिखी हैं, उसकी बात संक्षेप में उन्होंने जो तुलना की है, वह बहुत महत्वपूर्ण यथार्थ और हिंदी के लेखक और लेखिकाओं के लिए पचदर्शक है मराठी की तुलना में हिंदी में कहानी विधा अधिक लोकप्रिय है। अत्यंत प्रतिभासंपत्र लेखक और लेखिकाएँ भी हिंदी में हैं। बावजूद इसके दोनों की जीवन दृष्टि में जो गुणात्मक अंतर है उसे श्री सिंह ने रेखांकित किया है।
इन कहानियों के चुनाव को लेकर मराठी के कहानीकारों समीक्षकों में विवाद भी हो सकता है। क्योंकि प्रत्येक का अपना नजरिया होता है फिर हिंदी की तरह मराठी में भी गुटबाजी भी तो है। इन कहानियों को प्रकाशजी ने अपनी पद्धति से चुना है इतना तो निश्चित है कि इनमें प्रत्येक लेखक-लेखिका मराठी में प्रतिष्ठित है नई पीढी के तीन कहानीकार इसमें लिए गए हैं- प्रशांत बागड, किरण गुरव और कृष्णा किंवहने। आश्चर्य कि इन तीनों की कहानियाँ अभिव्यक्ति के नये प्रयोग से युक्त हैं। तीनों कहानियों में कथ्य नहीं के बराबर है। तीनों कहानियाँ फंतासी के निकट जाती हैं।
श्री सिंह की भाषा में अंग्रेजी शब्दों की भरमार बहुत खटकती है। उन अंग्रेजी शब्दों के लिए हिंदी में पर्यायी सुंदर शब्द होते हुए भी वे अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग क्यों करते हैं ऐसा प्रल मेरे मन में उठता है। पर हिंदी में अंग्रेजी शब्दों के प्रति मोह बढता जा रहा है।
प्रकाश के अनुवाद को लेकर पाठक बेहद खुश रहते हैं। क्योंकि इनके अनुवाद पढते समय पाठक को यह महसूस ही नहीं होता कि वह अनूदित रचना पढ रहा है। एक सफल अनुवादक स्त्रोत भाषा के कई शब्द लक्ष्य भाषा में ले जाता है। इससे लक्ष्य भाषा समृद्ध होती जाती है। यह वहाँ तक ठीक होता है जब लक्ष्य भाषा में उस संवेदना या वस्तु को व्यक्त करने के लिए ठीक से कोई शब्द नहीं होता। अगर वैसे शब्द उपलब्ध होते हुए भी वह अगर स्त्रोत भाषा के मूल शब्दों का उपयोग कर रहा हो तो उसका समर्थन करना कठिन हो जाता है। यहाँ मराठी के ऐसे कई शब्द आए हैं जो हिंदी में खप नहीं पाते। संभवतः मुंबई महानगर की हिंदी में ये शब्द जायज ठहराए जा सकते हैं। परंतु मानक हिंदी में ये शब्द खटकते हैं। जैसे- काठी (लाठी), प्रायोगिक (प्रयोगशील), निष्ठुर (अगतिकता (असहजता) तंद्रा (ध्यान) दांभिकता (पाखण्डीपन) शक्तिपात (शक्तिक्षय, खाने-अलारी के खाने (खाने-दराज) औ
ऐसे कुछ शब्दों का अपवाद छोड दें, तो कहीं पर शब्दों या वाक्य रचना के कारण पाठकों को आशय या संवेदना के आकलन में किसी भी प्रकार बाधा महगूस नहीं होती। चूँकि में दोनों भाषाओं में लिखता, पढता और बोलता हूँ, इसलिए मैं पूरे अधिकार से कह सकता हूँ कि अनुवाद की दृष्टि से प्रकाश को अत्यधिक सफलता मिली है। पिछले चालीस-पचास वर्षों से प्रकाश ने अनुवाद के क्षेत्र में जो ठोस काम किया है, उसका मूल्यांकन अभी तक किसी ने नहीं किया है, अपने अनुवाद कार्य से प्रकाश ने हिंदी भाषा और साहित्य को जो योगदान दिया है, उस पर शोध परक काम वि. वि. के अनुवाद विभाग द्वारा होना चाहिए। विशेष रूप से म. गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी वि.वि. के से मुझे काफी उम्मीद है। दुर्भाग्य से हिंदी और मराठी में अनुवाद की समीक्षा विकसित नहीं हो पाई है। इन रचनाओं को मैंने मूल मराठी में पढा है। उनके अनुवाद पढते समय कहीं पर भी ऐसा अहसास नहीं होता कि ये किसी मूल रचना के अनूवाद हैं। स्त्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा के आशय और संवेदना में यहाँ अद्भूत अद्वैत है।
शैलेंद्र कुमार सिंह ने जहाँ इन कहानियों की संवेदना ही परत दर परत खोलते जाते हैं तो दूसरी ओर श्री रणजीत साहा ने समकालीन मराठी कहानी की रचनात्मक विकलता को स्पष्ट किया है। अपने इस संक्षिप्त, परंतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण लेख में वे इस संकलन की प्रत्येक कहानी में व्यक्त संवेदना के स्वर को, रचनाकार की रचनात्मक विकलता से पाठकों को रूबरू कराते हैं। उनके इस मत से प्रत्येक पाठक सहमत हो जाएगा कि यह कहने में कोई कठिनाई नहीं है कि प्रस्तुत कहानी संकलन का प्रकाशन मराठी कहानीकारों क सुविस्तृत अनुमान के माध्यम से बतर पाठक वर्ग को परिचित कराने का एक यशस्वी और स्पृहणीय आयोजन है।

पुस्तक का नाम : समानांतर मराठी कहानी
संकलन-अनुवाद : प्रकाश भातम्ब्रेर
प्रकाशक : विजया बुक्स, दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2019
विधा : कहानी
मूल्य : 695/-

सम्पर्क - 1/10753, सुभाष पार्क/ गली नं. 3
नवीन शाहदरा/ दिल्ली 110032/ पृष्ठ 344 मूल्य 695/