fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

पेरियार का वैचारिक सृजन

संजय जोठे

भारत की बहुजन चिंतन परंपरा के अग्रणी चिंतक एवं क्रांतिकारी नेता ई.वी. रामासामी नायकर पेरियार बीसवीं शताब्दी के महानतम चिन्तकों और विचारकों में से एक माने जाते हैं। उनकी तुलना यूरोप के महान दार्शनिक वोल्टेयर से की जाती है। आधुनिक भारत में जिन चिंतकों क्रांतिकारियों ने भारत की ब्राह्मणवादी संस्कृति की बजबजाती गंदगी का विश्लेषण किया उनमें पेरियार को सबसे बोल्ड एवं गैर-समझौतावादी माना जाता है। उनकी वक्तृता और लेखनी में एक जैसी आक्रामकता और तार्किक स्पष्टता नजर आती है जो बुद्ध से लेकर कबीर एवं ज्योतिबा फूले की महान बहुजन पम्परा की याद दिलाती है। आधुनिक भारत के निर्माण में स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान एवं स्वतंत्रता पश्चात भारत के बौद्धिक व वैचारिक निर्माण में पेरियार के लेखन ने न केवल एक नई राजनीति के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है, बल्कि उन्होंने ब्राह्मणवादी संस्कृति एवं ब्राह्मण धर्म को नकारते हुए भारत की मूल द्रविड-बहुजन संस्कृति को बहुत शक्ति एवं स्पष्टता के साथ उजागर भी किया है।
उनके लेखन की एक झलक हमें हाल ही में राजकमल प्रकाशन से आई दो किताबों में देखने को मिलती है। ये किताबें उनके प्रसिद्ध लेखनों और भाषणों के अनुवादों का संकलन हैं, धर्म एवं विश्वदृष्टि एवं जाति व्यवस्था और पितृ-सत्ता टाइटल के साथ आई ये दो किताबें पेरियार के वैचारिक एवं सृजन जगत की सिर कराती हैं। इन किताबों से गुजरते हुए पता चलता है कि पेरियार को स्वीकार करना विशेष रूप से उत्तर भारत के हिन्दी भाषी राज्यों के लिए इतना कठिन क्यों रहा है। हिन्दी पट्टी में पेरियार को अदृश्य एवं अछूत बनाए रखने की साजिश किस भय से उपजी है वह भी इन किताबों से जाहिर होता है। यहाँ हम इन दोनों किताबों की अंतर्वस्तुओं का संक्षेप में अनुमान लेने का प्रयास करेंगे।
धर्म और विश्वदृष्टि
पेरियार जब भारतीय धर्म एवं संस्कृति में रची बसी शोषक एवं भेदभाव से भारी वर्ण एवं जाति व्यवस्था का विश्लेषण करते हैं, तो आरंभ से ही धर्म, ईश्वर और मानव समाज के जटिल अंतर्संबंध उनके लिए महत्त्वपूर्ण हो उठते हैं। धर्म और ईश्वर उनके चिन्तन का केन्द्रीय बिंदु बन जाता है और वे मनुष्य समाज में बनी हुई समस्याओं को समझने और सुलझाने के नजरिये से इनका विश्लेषण करते हैं। वे साफ कहते हैं की कोई नहीं जानता कि ईश्वर का विचार पहले किसने दिया था, लेकिन इतना जरुर पक्का है कि द्रविडों के बीच ईश्वर का विचार आर्यों की देन है। पेरियार के इस एक वक्तव्य से स्पष्ट होता है कि आर्य ब्राह्मण संस्कृति के परे भारत की मूलनिवासी द्रविड बहुजन संस्कृति एवं समुदायों में ईश्वर व धर्म, आत्मा, पुनर्जन्म एवं जातिभेद से जुडी समस्याओं के उद्गम पर पेरियार का नजरिया क्या है। महामना ज्योतिराव फूले एवं बाबा साहब आंबेडकर की ही तरह पेरियार भी भारत की सामाजिक समस्याओं की जड में ब्राह्मणवादी धर्म एवं ईश्वर की धारणा को केन्द्रीय कारक मानते हैं। इसी निष्कर्ष से प्रेरित पेरियार के विचार विभिन्न लेख इस किताब में संकलित किए गए हैं।
इन लेखों में पेरियार के सामाजिक, दार्शनिक एवं राजनीतिक चिन्तन की स्पष्ट झलक भी मिलती है जिसका परिणाम हम उनके द्वारा आरंभ किए गए विविध आन्दोलनों एवं संस्थाओं की वैचारिकी एवं शैली में देख सकते हैं। दार्शनिक व्यक्तित्व के विविध आयामों को पाठकों के सामने रखते हैं। वैचारिक रूप से झकझोर देने वाली इस किताब के दो खंड हैं। पहले खंड की शुरुआत में वी.गीता और ब्रजरंजन मणि के दो लेखों में पेरियार के सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक विश्लेषण एवं समाधान की प्रस्तावना के आक्रामक अनूठेपन को रेखांकित किया गया है। साथ ही पेरियार के अपने मौलिक लेख के जरिये हमें पता चलता है कि वे अपने समय में अपने विराट सामाजिक राजनीतिक अनुभव के साथ ईश्वर और धर्म की सामाजिक भूमिका के मद्देनजर किस तरह की वैचारिकी का निर्माण कर रहे थे।
इस किताब के पहले खंड में संकलित लेख ईश्वर की अवधारणा, ईश्वर और धर्म, हिन्दू धर्म, एवं ईश्वर का उन्मूलन जैसे विषयों पर केन्द्रित हैं। इनमें हिन्दू धर्म एवं इस धर्म में ब्राह्मण वर्ग के वर्चस्व को बहुत तीखे शब्दों में चुनौती दी गयी है। आज के भारत में श्रमशील समुदायों के पतन एवं उनकी सामाजिक आर्थिक समस्याओं को पेरियार ब्राह्मण धर्म द्वारा मानव श्रम की निंदा से जोडते हैं। वे मानते हैं कि जब तक इस ब्राह्मण संचालित हिन्दू धर्म की मूल मान्यताओं को चुनौती नहीं दी जाएगी तब तक भारत के करोडों मजदूरों और किसानों के जीवन में सार्थक बदलाव नहीं आ सकता है। इन कुछ उदाहरणों से इन सभी लेखों की शैली एवं अंतर्वस्तु का कुछ अनुमान होता है।
किताब के दूसरे खंड में पेरियार की विश्वदृष्टि का अनुमान उपलब्ध कराने वाले लेख संकलित किए गए हैं। इन लेखों के जरिये हम दर्शन क्या है?, अज्ञानता का साहित्य, क्या शोषित वर्ग हिन्दू है?, समाज का पुनर्निर्माण एवं भविष्य की दुनिया जैसे लेखों में पेरियार की खंडनात्मक अंतर्दृष्टि के समानांतर बहती हुई नव-निर्माण की अंतर्दृष्टि को भी देख पाते हैं। वे केवल पुराने शोषक धर्म एवं ईश्वर सहित शोषण के पूरे ढाँचे को गिरा ही नहीं रहे हैं, बल्कि एक नए समाज और जीवन के निर्माण के सूत्रों की रचना भी कर रहे हैं। इस दूसरे खंड में हमें पेरियार के वैचारिक जगत में स्त्रियों की स्वतन्त्रता एवं नारीवाद से जुडी मान्यताओं एवं प्रस्तावनाओं के दर्शन होते हैं। भविष्य की कल्पना वे एक नास्तिक के नजरिये से करते हैं। स्वाभाविक रूप से इसमें ईश्वर एवं धर्म सहित मनुष्य की लोभ वृत्ति एवं परिग्रह करने की अनंत वासना से मुक्त एवं तार्किकता व सहज मानवीय संवेदनाओं पर खडे मानव समाज की कल्पना दी गयी है। इस प्रस्तावना से गुजरते हुए हम न केवल ईश्वर एवं धर्म बल्कि पूँजीवाद की नकारात्मक प्रवृत्तियों के निषेध या उन्मूलन की प्रेरणा भी पेरियार की वैचारिक पूँजी में साफ तौर से देख पाते हैं।
जाति व्यवस्था और पितृ-सत्ता
दूसरी किताब पहली किताब से अपने विषय की अंतर्वस्तु एवं शैली में पूरी तरह जुडी हुई है। ठीक से कहा जाए, तो बहुत हद तक ईश्वर व धर्म के अमूर्त स्वरूप एवं उसके सामाजिक राजनीतिक परिणामों के विश्लेषण जो वर्ण-सत्ता एवं पितृसत्ता के विषय में प्रस्तावनाएँ निकल सकती हैं वे इस किताब में संकलित की गयी हैं। एक अर्थ में ये दोनों किताबें आपस में इस तरह जुडती हैं कि पहली किताब वर्ण सत्ता और पितृ सत्ता के गर्भ स्वरूप ईश्वर व धर्म का पहले ही विश्लेषण दे देती है। हालांकि इस बात पर बहस हो सकती है की ईश्वर व धर्म, वर्ण सत्ता व पितृ-सत्ता के कारण हैं या परिणाम हैं?
इस किताब में बुद्धिवाद, महिलाओं के अधिकार, पति-पत्नी नहीं, बनें एकदूसरे के साथी, ब्राह्मणों की आरक्षण से घृणा क्यों, जाति व्यवस्था का क्षय हो जैसे लेखों में पेरियार विचारों में जमीनी समस्याओं के विश्लेषण की शैली और अधिक उभरकर सामने आती है। पेरियार की वैचारिकी एवं मुक्तिकामी आन्दोलनों की शैली को ध्यान में रखकर बात की जाए तो यह किताब उनकी वैचारिक प्रेरणाओं एवं एक वैकल्पिक भविष्य के निर्माण की केन्द्रीय मान्यताओं को और अधिक स्पष्ट करती है। इन लेखों में इन प्रेरणाओं को सामाजिक व राजनीतिक प्रक्रियाओं की ठोस भूमि पर कैसे लागू किया जाए- इस बात की भी स्पष्टता निर्मित होती है। पेरियार की स्पष्ट मान्यता है की जाति एवं पितृ-सत्ता भारत की सभी समस्याओं की जड है। ईश्वर एवं धर्म अमूर्त कारकों की तरह अदृश्य बने रहते हैं लेकिन असल में ये ज़हरीले तत्व जाति एवं पितृसत्ता के रूप में अमल में आते हैं और नज़र आते हैं। इन लेखों के विस्तार में जब पितृसत्ता का विश्लेषण आरंभ होता है तो स्त्री जीवन की समस्याओं का विश्लेषण एवं ईश्वर धर्म व जाति जैसी सामाजिक संस्थाओं से उनका संबंध उजागर होता है। पेरियार इन विश्लेषणों में बहुत ही साहसी एवं आक्रामक ढंग से स्त्री स्वतंत्रता का पक्ष लेते हैं। वे स्त्री पुरुष संबंधों के बारे में समानता व सम्मान पर आधारित अपनी स्वयं की अनूठी प्रस्तावना सामने लाते हैं।
दूसरी किताब के अंतिम हिस्से में पेरियार के जीवन एवं घटनाक्रम से जुडे कुछ महत्त्वपूर्ण पडावों का जिक्र आया है जिनसे हमें उनकी जीवनी का कुछ अनुमान होता है। इन तारीखों व विवरणों के आईने में हम तत्कालीन समाज में चल रही अन्य घटनाओं एवं व्यक्तियों आदि से पेरियार के संबंधों की प्रकृति पर भी विचार कर पाते हैं।
इन दोनों किताबों का प्रकाशन भारत की हिंदी पट्टी के पाठकों के लिए महत्त्वपूर्ण घटना है। हिंदी क्षेत्र में ब्राह्मणवाद के विषैले वर्चस्व की तीव्रता दक्षिण भारत की तुलना में कहीं अधिक है। इसीलिये दक्षिण में आंबेडकर को पढने समझने की जितनी सुविधा है उतनी सुविधा उत्तर भारत में पेरियार को पढने के लिए उपलब्ध नहीं है। एतिहासिक रूप से पेरियार के विचारों के सन्दर्भ में हिंदी पट्टी में जो शुन्य बना हुआ है उसे भरने में इन दो किताबों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होने वाली है। इसके लिए प्रकाशक एवं सम्पादक सहित सभी अनुवादकों को साधुवाद दिया जाना चाहिए।

पुस्तकों के नाम : धर्म और विश्वदृष्टि
: जाति व्यवथा और पितृसत्ता
लेखक का नाम : पेरियर ई.रामासामी
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2020
विधा : अनूदित निबंध
मूल्य : 199/- व 160/-

सम्पर्क - 92, बजरंग नगर, मुख्य मार्ग, किंग जार्ज स्कूल के पास, जिला देवास (म.प्र.) - ४५५००१
मो. ९९२६५०२०२७