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केशव शरण की कविताएँ

केशव शरण
उमस

न बहते-बहते भी
नदी इतना बह गई
कि उतने सारे पानी से
कितने पोखर पुरवे की तरह छलक उठें
कितने वीरान बाग-बागीचे
कितने सूखे खेत लहक उठें

घने बादलों में छुपा सूर्य भी
इतना उजाला किये हुए है कि
गर्भगृह में देव टोली दिखायी दे रही है
इस चबूतरे से
प्रांगण के उस कोने में
स्वेद भीगी श्वेत चोली दिखायी दे रही है

लेकिन हवा जो थिर है तो थिर है
एक भी पत्ते का हिल रहा न सिर है

आ ही गया पानी

आखिर,
आ ही गया पानी!

भींगते हुए भागा कोई
पेड के नीचे
कोई किसी शेड के नीचे
फिर भी छींटे मार रही बौछार

सिर्फ एक साँड है इस दृश्य में बीच बाजार
जो अविचल भाव से खडा है
और भींग रहा लगातार

सबको पानी रुकने का इंतजार
लेकिन , उसे ऐसा भी नहीं

और उन लडकों को तो कतई नहीं
जो चले आ रहे हैं
नाचते-गाते, छप-छप करते

कागज़ की नाव

कहाँ तक तैरी
कब तक तैरी
कैसे-कैसे तैरी
आनंद इसका लेता हूँ

कागज़ की नाव तो ही होती है
डूबने के लिए
जब धक्का मारती हों गाडियाँ
सीधे या जलधार से
वह क्या तैरेगी
एक छोर से दूसरे छोर

पर मैं इस ओर
ध्यान नहीं देता हूँ
बारिश के पानी में
सडक पर

आनंद इसका लेता हूँ
कैसे-कैसे तैरी
कब तक तैरी
कहां तक तैरी


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