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चन्दप्रकाश देवल की कविताएँ

चन्दप्रकाश देवल
घोषणा
प्रभु!
गीता में आप भूल गए
यह कहना-
कि पहडों में अरावली और
खेलों में कबड्डी हूँ।
जानवरों में बाघ और
पखेरुओं में फाख्ता हूँ

कभी-कभी छोटी चीजें भी कहनी चाहिए।
भूल गए प्रभु आप कहना-
कि मेवों में बादाम हूँ और
विधाओं में कविता हूँ
कि व्याकरण में पूर्ण विराम और
ग्रहों में सविता हूँ।

यह कहना भी याद नहीं आया प्रभु-
कि हाथियों में ऐरावत और
नगीनों में कोहिनूर हूँ।
कि तलवारों में सिरोही वाली और
मिठाइयों में मोतीचूर हूँ।

वैसे तो और भी कई चीजें थीं
गिनाने योग्य
मैं सब के लिए नहीं कहता,

काश प्रभु!
आप एक जुमला और बोल देते-
कि मैं भाषाओं में मातृभाषा हूँ।
तो हम भी मुक्ति पा जाते।
बरसों लंबा मौन तोडते और
गूंगों की बही से अपना नाम कटवाते।


मेरी भाषा

मुझे बचपन में
न किसी गुरुकुल अथवा पाठशाला में
सिखाई गई मेरी भाषा,
मेरी भाषा चाहती रही
पूरे उत्साह से सिखाना उच्चारण
पर किसी विद्यालय में जगह नहीं थी
मेरे प्रांत में हर तीसरे वर्ष
पडता था अकाल
पर अकाल से भला भाषा का
क्या रिश्ता हो सकता है
मेरी समझ में नहीं आता था
बाद में जाना गोळ1 जाना दूसरी भाषा के क्षेत्र में
अपनी भाषा खोना था
यही हाल परदेश कमाने जाने वालों का था-
हम उन दिनों दुविधा में थे
कि क्या रखें?
खुद का जीवित रहना या भाषा का मरना?
हमने उन दिनों अपना जीवित रहना चुना
अब मैं चाहता हूँ
अपनी भाषा को जीवित रखना
जैसे कंगारु रखते हैं अपनी थेली में बच्चे
बंदर रखते हैं अपनी छाती से चिपका कर बच्चे
बिगी रखती है अपनी डाढों से पकड कर बच्चे

कंगारू, बंदर और बिगी की पकड में रहते बच्चे
और कुछ नहीं
उनकी भाषाएँ हैं

1. अकाल की स्थिति में अपने जानवरों को लेकर चारे वाले क्षेत्र में जाने की क्रिया।

निशानी
जब मेरी माँ मरी
उस समय वह नहीं जान रही थी
कि वह मरने वाली है
जैसे प्रत्येक जीवित व्यक्ति को नहीं जान पडता
कि अन्तिम घडी आ गई है।
उसका ध्यान परलोक सुधारने में ज्यादा था
पर उसके मन में
अपने जाये के लिए ज्यादा जगह थी
जैसी कि होती आई है
वह इतनी पवित्र थी
कि उसे पवित्रता का पता ही नहीं था
वह जो कुछ करती
पवित्र से इतर कुछ हो ही नहीं सकता था तब
वह प्रकाश का अर्थ नहीं जानती थी
पर मेरे अँधेरे के सामने
छाती तान कर खडी हो जाती थी
उसके वश में होता
तो वह अपने जाए पर
आफत नहीं आने देती
वह साक्षात नारी थी।
जाते जाते
मुझे एक निशानी दे गई भाषा की
जिसकी गुटकी उसने अपने दूध के साथ दी थी
जिसे मैं जान ही नहीं पाया
वह जानती नहीं थी थोडा भी
कि अब वह थोडे समय की मेहमान है
पर वह जानती थी साफ-साफ
कि बाकी सभी कुछ मर जाए
पर मनुष्य जाया बचा यदि
तो उसके गले में
जीवित रह जाएगी भाषा।
भाषा कभी मानव देह से
अन्तिम साँस की तरह नहीं निकला करती।


पहचान


उसने मेरी आँखों में
आँख गडाकर पूछा-
क्या पहचान है तुम्हारी
बताओगे नहीं क्या

मैंने उससे नजरें मिला कर कहा-
मेरी पहचान
वियोग और प्रतीक्षा का बाना
मेरी पहचान
मृत्यु और मौन की बुनावट का ढाँचा

मैं स्मृति से भी पहचाना जा सकता हूँ
और एक सतत बिसुरते जीव की तरह भी
उदासी में भी देख सकते हैं आप
मेरी झांईं हताश में भी पडती है थोडी

मेरी पहचान का सबब
बाएँ भुहारे में मंडा चोट का निशान नहीं
नहीं आंख के नीचे वाला मुस
न बाएँ कान के पास वाला तिल
नहीं आधार कार्ड वाली आँख की पुतली भी नहीं
न अंगूठे का निशान मेरी पहचान है
मैं उनसे पहचाने जाते हुए भी
नहीं पहचाना जाता मेरा पतियारा करो,

हाँ, एक परख से मुझे कोई पहचानता है
कि मैं बहुत देर तक
पूर्णिमा के चाँद को नहीं ताक सकता
मेरी आँखों के पानी में ज्वार आ जाता है
और पहली प्रीत का दृश्य धुँधला जाता है।

आँसुओं के परिंडे की भीनास में
दो खाली कुर्सियों के काठ ने जो की
एक दूसरे से
वे शिकायतें भी पहचान नहीं मेरी
मैं इस छवि में नहीं चाहता पहचाना जाना


मेरी आत्मा की ध्वजा पर
कोई ऐंबलम नहीं
न धर्म का कोई निशान
वह तो एक कोरी पाटी लगती है
इसका यह अर्थ नहीं
कि मेरी कोई पहचान नहीं

मैं मरा नहीं, पर मर सकता हूँ
अपनी एक मनचाही पहचान के लिए
मैं चाहता हूँ
जगत मुझे पहचाने
कि एक आदमी था दो हाथ पैरों वाला
जो यहाँ जीया
वह चाहता था एक अलग पहचान

उसकी यह एक निराली पर प्रबल इच्छा थी
कि उसके न रहने पर
लोग उसे पहचाने उसके दूध से
मतलब कि वह जाना जाए मातृभाषा से
यह बात भी अजीब
कि वह मरा नहीं था मातृभाषा के लिए
पर जी भी कहाँ सका मातृभाषा के बिना

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इन्द्रधनुष के सातों रंगों के लिए लडो

प्रतीकों, प्रतिबिम्बों और आदेशों की
बंद कोठरी में
छवियों के लिए मत लडो
शब्दों की सीमा पर
कोहराम मचाते ठहरो लोगों!

तुम्हें पुरानी नहीं
एक नई चीज के लिए लडना है
कब जानोगे
कि फासीवाद आसीवाद
एक पुराना जुमला है
जो कभी का खत्म हो चुका

हवा में कान लगाकर सुनो
ध्वनिहीन मंसूबे
जो अभिलाषी नहीं होते बोलने के
पर भीतर ही भीतर
गुपचुप भाषा में
सूर्योदय के समय पेड की फुनगी पर
फूटती शाखा में
उन्हें फकत भगवा रंग नजर आता है
सावधान हो जाओ,
लोगो!
तुम्हे इन्द्रधनुष के सातों रंगों के लिए लडना है।

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सम्पर्क - 74, बलदेव नगर,
माकडवाली रोड, अजमेर
मो.: 9928140717