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मेरा जिगरी दोस्त : नवलकिशोर

रणजीत
नवलकिशोर को मैं निसंकोच राजस्थान के समकालीन हिन्दी समीक्षकों में शीर्षस्थ कह सकता हूँ। इसकी तस्दीक मेरे दूसरे मित्र-समीक्षक मोहनकृष्ण बोहरा का ये कथन भी करता है, जिसने मुझे यह सूचना देते हुए की, उसे इस वर्ष का बिहारी पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है, तत्काल कहा कि वैसे कायदे से तो मुझसे पहले यह पुरस्कार नवलकिशोर को मिलना चाहिए था। जब मैंने यह सूचना नवलकिशोर जी को दी, तो वह बोले -बोहराजी न्याय प्रिय और भले आदमी हैं।
उनकी दोनों मुख्य पुस्तकें मानववाद और साहित्य तथा आधुनिक हिंदी उपन्यास और मानवीय अर्थवत्ता फिर-फिर पढने लायक महत्त्ववपूर्ण पुस्तके हैं और उन्हें मैंने उसी रुचि और मनोयोग से पढा था जिस से नामवर जी की कविता के नये प्रतिमान को पढा था।
हेतु भारतद्वाज का यह कथन एकदम सही है कि इन पुस्तकों के प्रकाशन के बाद उसके और मेरे आलावा डॉ शिवकुमार मिश्र , रमेश कुंतल मेघ, श्यामचरण दुबे, परमानन्द श्रीवास्तव, मणिमधुकर, जगदीश गुप्त, तारा प्रकाश जोशी, आनंद प्रकाश दीक्षित ,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी और मधुरेश जैसे लेखकों - समीक्षकों ने उन पर प्रशंसात्मक स्वर में लिखा। आनंदप्रकाश दीक्षित के शब्दों से ये सभी लोग सहमत होंगे कि ये हिंदी में अपने ढंग की नयी पुस्तकें हैं और आज की मुख्य दिशा के सम्बन्ध में न केवल प्रामाणिक परिचय ही प्रस्तुत करती हैं, बल्कि विषय पर आपकी पकड और अभिव्यक्ति सुकरता भी उपस्थित करती हैं। आप एक साथ विदेशी साहित्य तथा भारतीय राजनीति, अर्थतंत्र और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में विषय का विवेचन करने में सफल हुए हैं।
नवल मेरे, जुगमंदिर, हेतु भारद्वाज तथा तारा प्रकाश जोशी आदि मित्रों के साथ ही वामपंथी रुझान में पढाकू, रहे। विस्तृत अध्ययन -मनन ने ही उसे यह रुझान दिया। वह गजब का पढाकू था। हम में से किसी ने भी लाइब्रेरी में इतना समय नहीं बिताया होगा जितना उसने आखरी दिनों तक बिताया। उसने माक्र्स के नज़रिये को लेनिन आदि के तथा हिंदी के माक्र्सवादी लेखकों के माध्यम से नहीं, पश्चिमी नवमाक्र्सवादी चिंतको के माध्यम से प्राप्त किया- राजनीतिकों से कम, संस्कृतिकर्मियों से ज्यादा। समाजवाद के सोवियत मॉडल से मोह भंग मेरा भी हुआ और उसका भी। मेरा एक के बाद एक मिले राजनीतिक झटको से हुआ, उसका मंथर गति से चलने वाले अध्ययन-मनन से। पहले उसने भी विश्वम्भरनाथ उपाध्याय आदि की तरह मुझ पर सवाल उठाए, पर 2010 में जब उदयपुर में मेरी पुस्तक रणजीत : प्रतिनिधि कविताएँ का लोकार्पण समारोह संपन्न हुआ, उसने पहली बार किसी सार्वजनिक मंच पर मेरे स्टैंड का समर्थन किया। तब मैंने उससे कहा - तुम मेरी कविता में आए इस बदलाव पर लिखो। उसने काफी देर से ही सही, लिखा और उसका लेख आलोचना तथा पहल में बरसो धूल खाता रहा। अपने गृह नगर की पत्रिका मधुमती उसे वेद व्यास के समय भी और उसके बाद तो उस लेख के लिए और भी अनुपयुक्त लगती रही - आखिर राजस्थान में सत्ता परिवर्तन के बाद ब्रजरत्न जोशी के संपादक होने पर वह उसे मधुमती में भेजने पर सहमत हुआ और पार्टीशाही से बगावत करता एक कॉमरेड कवि : रणजीत मधुमती के अगस्त 2019 के अंक में प्रकाशित हुआ।
मार्च 2019 में जब में अपने भाईयों से मिलने सपत्नीक ,भीलवाडा गया 6 वर्ष में एक बार उनसे मिलने हम जाते ही रहे है, सुधा की बीमारी ने और कोरोना के कहर ने ही इस क्रम को तोडा है, तो लौटने की बुकिंग यह सोच कर उदयपुर बैंगलोर की उडान से ही करवायी की एक दिन के लिए नवल परिवार से मिलते आएँगे। मिले और खूब बातें हुई, थोडी साहित्य चर्चा भी। मैंने उसके सामने रणजीत का रचना संसार सम्पादित करने का प्रस्ताव रखा और उसने उसे सहर्ष स्वीकार किया। इससे पहले एक बार फोन से ही मानववाद सम्बन्धी उसकी दोनों अनुपलब्ध पुस्तकों के पुनर्प*काशन की अपनी योजना पर उससे चर्चा कर चुका था। इस प्रवास में उसने बताया कि दिल्ली के बनास संपादक श्री पल्लव के प्रयत्न से ये पुस्तकें अब फिरसे प्रकाशित हो रही है। मैं प्रसन्न हुआ।
उसके एकाएक चले जाने से मेरा तो जैसे एक हाथ ही कट गया। मेरे सगे भाई को भी इस बीच कोरोना ने ही लीला है। पर वह बीमार रहता था। उसकी मृत्यु अप्रत्याशित नहीं थी। पर नवल स्वस्थ था। थोडा पाँव घिसटते हुए चलते हुए भी दीर्घ काल से अपनी रोगिणी पत्नी की सेवा कर रहा था। उसके जाने ने दुखी कर दिया। लगभग हर रोज फोन पर बात हो जाती थी। देश दुनिया की दारुण स्तिथयों पर और व्हाट्सएप्प पर भेजी हुई उसकी पुस्तकों पर उससे बात कर कोरोना कारवास से थोडी मुक्ति मिलती थी। अब एक कोना पूरी तरह खाली हो गया है- उसका सूनापन अखर रहा है।
अपनी विशिष्ट वैचारिक स्थिति के प्रति, उसके सूक्ष्म ब्योरों के प्रति, वह इतना संवेदनशील और जागरूक था कि जब कभी मैं उसकी किसी बात से सहमति व्यक्त करता, वह घबरा कर कहता- नहीं, मेरा मतलब यह नहीं है, और मेरी सहमति से कोई और बारीक-सी असहमति निकाल लेता। तब मैं हँस कर कहता- असल में तुम सहमति से आतंकित व्यक्ति हो। मैंने उसकी मानवीय अर्थवत्ता पर अपने लेख का शीर्षक दिया था दायित्त्वपूर्ण आलोचना की विरल कृति - दायित्वपूर्ण वह हद से ज्यादा था। अपने लिखे एक एक शब्द के प्रति जिम्मेदार। इतना सोच समझ कर लिखने वाले लेखक हिंदी में कम ही होंगे।
नवलकिशोर एम.ए . में मेरा सहपाठी था, महाराजा कॉलेज जयपुर में। उसकी जन्म तिथि से मालूम पडता है कि वह उम्र में मुझसे 3 साल बडा था। मेरी स्मृति अगर सही है (इधर उस पर मेरा विश्वास निरंतर कम हो रहा है) तो में जब जुलाई में इंदौर से बी.ए. करने के बाद महाराजा कॉलेज जयपुर में एम.ए प्रथम वर्ष में भर्ती हुआ, वह मेरा सहपाठी था। क्योंकि एम.ए प्रीवियस और फाइनल की कक्षाओं के कई प्रश्न-पत्रों की पढाई कॉमन पीरियड में होती थी, एम.ए. द्वितीय वर्ष का जुगमंदिर भी हमारा सहपाठी रहा। डॉ. सरनाम सिंह उस समय हिंदी के विभागाध्यक्ष हुआ करते थे। डॉ. मोती लाल गुप्ता, डॉ करुणाशंकर त्रिपाठी, सत्येंद्र चतुर्वेदी भी हमारे अध्यापक थे अगले ही वर्ष डॉ. देवराज उपाध्याय भी आ गए थे। मैं कॉलेज के पास ही स्थित गरीब छात्रों के द्वारा ही चलाये जाने वाले एक हॉस्टल स्वाधीन छात्रावास में नाम मात्र के रूम रेंट पर रहता था। छात्रावास की बिजली और नल कभी भी स्वाधीन हो जाते थे। और कोई सीनियर छात्र कटिया लगाकर फिर से बिजली जोड देता था। जहाँ तक मुझे याद है नवलकिशोर तब तक एक गृहस्थ था और किसी प्राइवेट स्कूल में पढा रहा था। वैसे तो हम दोनों ही निम्न मध्यम वर्ग से ही आते थे, पर लगता है आर्थिक अभाव उसे अपनी गृहस्थी के कारण अधिक सताते थे- जैसा की उन दिनों सामान्य था अन्य कई जागरूक विद्यार्थियों की तरह हम दोनों भी साम्यवादी दर्शन से प्रभावित थे और लेखन कर्म में रुचिशील भी। मई जून अट्ठावन तक मेरी पहली कविता भवानीप्रसाद मिश्र की टोन में मैं प्यार बेचती हूँ धर्मयुग में पूरी सज-धज के साथ छप चुकी थी। और शहर की कवि गोष्ठियों में मैं आमंत्रित किया जाने लगा था। इन दिनों मुझे यूनिवर्सिटी हॉस्टल में कमरे के अर्थव्यवस्था के लिए सरनामसिंह जी ने अपनी एक शोधछात्रा के अवशिष्ट शोध प्रबंध लिखने का काम दिलवाया और फाइनल में मैं स्वाधीन छात्रावास छोड कर यूनिवर्सिटी होस्टल में आगया।
कक्षा की एक दिलचस्प घटना मुझे अब भी याद है। प्रोफेसर करुणाशंकर त्रिपाठी हमें मध्यकालीन काव्य पढाते थे, विषय पर कम ही बोलते थे, पर अन्य विषयों पर लच्छेदार धाराप्रवाह भाषण देते थे। ऊब कर मैंने कुछ दिन बाद सब से पीछे की कुर्सियों पर बैठकर कुछ पढना शुरू कर दिया। एक दिन मुझ पर ध्यान देते हुए बोले- तुम क्या पढ रहे हो रणजीत? मुझे लगा अब वे मुझे बुरी तरह डाटेंगे। सकुचाकर मैंने पत्रिका दिखाई और कहा ज्ञानोदय । वे सहज स्वर में बोले- ठीक है, ठीक है , मैं जो बोल रहा हूँ वह भी ज्ञानोदय है और तुम जो पढ रहे हो वह भी ज्ञानोदय है। मेरी जान में जान आयी।
अपनी विचारशीलता में वह माक्र्स, गाँधी और सार्त्र से, विशेषतौर पर परवर्ती क्रांतिकारी सार्त* से प्रभावित था- यथा स्तिथि पर प्रहार करने वाले कर्मठ सार्त्र से। पर उसके जीवन क्रम पर उसका कोई प्रभाव नहीं दिखाई पडता था। अपने नागरिक जीवन में उसने कोई प्रगतिशील-मानवीय उन्मुखता नहीं दिखाई। मेरी नज़र में यह उसके व्यक्तित्व की सबसे बडी कमज़ोरी थी। मैंने लेखक-पत्रकार राजकिशोर और समाज राजनीति कर्मी संदीप पांडेय आदि के साथ मिलकर लखनऊ में मानववादी दर्शन के अनुकूल एक संगठन मानवीय समाज का स्थापना सम्मलेन किया, उसे बुलाया, पर उसने कोई रुचि नहीं ली। जबकि कमलेश्वर ने समर्थन में पत्र लिखा और विश्वम्भरनाथ उपध्याय ने सदस्यता प्रपत्र भर कर भेजा, 100 रूपए का मनीओर्डर भी किया। उससे पहले 1973 में मैंने केदार बाबू के साथ मिलकर बाँदा में अखिल भारतीय प्रगतशील सहित्यकार सम्मलेन आयोजित किया था। भारत के कोने कोने से 100 के करीब साहित्यकार इकट्ठे हुए। वह न आया। जुगमंदिर तायल ने बताया है कि जब जयपुर में राजस्थान प्रगतशील लेखक संघ का स्थापना सम्मेलन हुआ, राजस्थान साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष प्रकाश आतुर ने अकादमी के पदाधिकारियों की सुगम उपस्थिति की सुगमता के लिए उन्ही तारीखों में उसकी कार्यकारिणी की बैठक भी रख ली। कार्यकारिणी के सदस्यों के रूप में अकादमी से मार्ग व्यय लेकर नवलकिशोर और नंद चतुर्वेदी जयपुर पहुँचे, सम्मेलन स्थल पर भी दिखाई दिए, पर सम्मेलन हॉल में नहीं घुसे। नागरिक सक्रियता के प्रति उसका यह संकोच या भय मुझे हमेशा अखरता रहा। यही सब देख कर विश्वम्भरनाथ उपाध्यायजी उसके मानववाद को पिलपिला मानववाद कहते थे। उसके आदर्श क्रन्तिकारी लेखक ज्याँ पाल सार्त्र के इस कथन के प्रकाश में कोई भी पाठक सहेजही क्रांति के प्रति उसके केवल ओष्ठ्य समर्थन के पीछे छिपी साहस हीनता के त्रासद अनुभव से खिन्न हो सकता है। सार्त्र कहता है -
एक वामपंथी बौद्धिक के लिए इतना ही ज़रूरी नहीं है कि वह सर्वहारा के लिए लिखे , उनके अधिकारों को शब्दों में अभिव्यक्ति दे, बल्कि यह भी ज़रूरी है कि वह उनके साथ खडा होकर लडे। यहाँ फ्रांस में जब युवक पुलिस का मुकाबला करते हैं, तो हमारा काम केवल इतना ही दिखाना नहीं है कि पुलिस हिंसक है, वरन हिंसा के विरुद्ध हिंसक कार्यवाही में शामिल होना भी हमारा कर्त्तव्य है। जब राजनैतिक कैदी भूख हडताल करते हैं, तो हम सभी को, जो शारीरिक रूप से समर्थ है, उस भूख हडताल में शामिलहोना चाहिए।
ऐसा था मेरा जिगरी दोस्त नवलकिशोर !
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