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रिश्तों की ऑक्सीजन

ज्ञानचंद बागडी
हैल्लो अंकित!
हाँ अंकल !
बेटा भाई साहब की तबियत बहुत खराब है। वे कोरोना से संक्रमित हैं। कल आफ गंगा चाचा का फोन आया तो मैंने उन्हें पंजाबी बाग के सैन्टम हॉस्पिटल में भर्ती कराया है। मैंने अंशुल और रश्मि बिटिया को भी फोन किया था लेकिन दोनों का जबाब कुछ ठंडा ही लगा। भाई साहब की हालत बहुत खराब है बेटा। आपस में बात करके कम से कम एक जन तो जल्दी से आ जाओ।
बात आपकी सही है अंकल, लेकिन एक दम से आना तो संभव नहीं है ना!
देख लो भाई! इससे अधिक मैं कैसे समझाऊँ। आप तीनों को फोन कर लिए मैंने तो।
आप तो जानते हैं अंकल आजकल जॉब्स का कैसा चल रहा है। नौकरी बचाना बहुत मुश्किल हो रहा है।
अब मैं क्या बोलूँ बेटा। देख लो बेटे, आप खुद समझदार हैं। जो मुझसे बनेगा वो तो करूँगा ही, बाकी ईश्वर मालिक है।
अंकल आपसे पहले भैय्या का फोन आया था। मैंने भैय्या और दीदी से बात कर ली है । फिलहाल हम तीनों पाँच- पाँच लाख रुपये भेज रहे हैं।
ओय मेरे रब्बा इन बच्चों को कैसे समझाऊँ कि उनके बाप को पैसे की नहीं अपने परिवार की आवश्यकता है। पैसे तो भाई साहब के पास कम हैं क्या। खरबंदा ने अपना सर पीटते हुए अपना मोबाइल फोन एक तरफ पटक दिया।
बलजीत सिंह खरबंदा दिल्ली विश्वविधालय से अंग्रेजी साहित्य के सेवानिवृत प्रोफेसर हैं। उनके मित्र हैं सुभाष गर्ग जिन्हें वे अपना बडा भाई मानते है। गर्ग साहब भी सेवानिवृत नौकर शाह हैं। जीवन में एक से बढकर एक ओहदे पर रहे, लेकिन आजकल एकाकी जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। पत्नी पाँच साल पहले भगवान को प्यारी हो गई। बडा बेटा - बहु कनाडा में बडे विधि अधिकारी हैं। बेटी अपने व्यवसायी पति के साथ अमेरिका में पढाती हैं और सबसे छोटा बेटा अमेरिका में किसी आई टी कम्पनी में बडा अधिकारी है।
पिछले तीन दिन से खरबंदा गर्ग साहब के बच्चों को लगातार फोन कर रहा है लेकिन तीनों बच्चों ने पैसे भेजकर अपने को जिम्मेदारी से मुक्त कर लिया।
गर्ग साहब और खरबंदा का परिवार बचपन से पुरानी दिल्ली के चाँदनी चौक इलाके में पडोसी रहे हैं। दोनों परिवारों में हमेशा बहुत प्यार रहा था। ऐसा कोई दिन नहीं होता था जब एक - दूसरे के घर में बना कुछ ना कुछ दूसरे घर में ना जाता हो। गर्ग साहब की माँ, बलजीत और उसकी बहन राणो को दिलो जान से चाहती थी। सारा दिन वो इन बच्चों के मुँह में हाथ रखती थी। बच्चे भी सविता को ताईजी ना कहकर बडी मम्मी ही बुलाते थे। सुभाष और बलजीत की माँ निम्मों भी बिल्कुल सगी बहनों की तरह रहती थी और उनके पिता भी मजाल आपस में बिना मशवरा किए कोई काम कर लें। सुभाष बलजीत से उम्र में तीन साल बडे हैं। उन्होंने दसवीं तक अपनी बहन मृदुला, बलजीत और राणो को पढाया है। इन तीनों बच्चों में हमेशा सुभाष के लिए विशेष सम्मान रहा तथा वे हमेशा उनके आदर्श रहे हैं। जब सुभाष के परिवार ने पश्चिम विहार में घर लिया तो खरबंदा भी यहाँ मकान लेकर फिर से उनका पडोसी बन गया। रिश्ते भी आदतों की तरह ही तो होते हैं।
पिछले तीन दिन से खरबंदा का ठिकाना सैन्टम हॉस्पिटल ही है। अपने नौकर शिवा को भी उन्होंने घर से खाना और जरूरत का सामान लाने को लगा दिया है। उनकी पत्नी संगीता खुद हैदराबाद अपने बेटे के पास लॉकडाउन में फसी हुई है। गंगा सुभाष के यहाँ तीस बरस से काम करता है लेकिन वह घर से बाहर की दुनिया को इतना समझता नह है। खरबंदा ही सारा दिन दवाई की दुकान और जाँच की रिपोर्ट की खिडकी के चक्कर काट- काटकर बुरी तरह थक जाता हैं। थोडा - बहुत किसी दूसरे मरीज के साथ आये परिजनों से बात करके जी हल्का करना चाहता है तो और परेशान हो जाता है , क्योंकि इस बीमारी में समाज का एक से एक विभत्स चेहरा देखने को मिल रहा है। ये बीमारी सामाजिक कलंक बनती जा रही है। लोग अपनों को घर से बाहर निकाल रहे है। संक्रमित लोगों का अपमान किया जा रहा है। उनके साथ अछूत की तरह व्यवहार किया जा रहा है। जिंदा लोगों की मौत की अफवाह उडाई जा रही है।
चौथे दिन हॉस्पिटल में ऑक्सीजन सिलेंडरों की किल्लत पड गई। हॉस्पिटल प्रशासन ने अपने हाथ खडे कर दिये और उन्होंने खरबंदा से सिलेंडर का इंतिजाम करने को कहा। उधर सुभाष के अस्सी प्रतिशत फेफडे संक्रमित हो चुके हैं और उनकी सुधार की दर भी बहुत खराब है । खरबंदा हॉस्पिटल के प्रबंधकों से मिला और उन्हें खूब खरी - खोटी सुनाई कि आप हमें इतना बेशुमार लूटते हैं। इतना भारी बिल हम चुका रहे हैं और आप हमसे ही कह रहे हैं कि ऑक्सीजन लाओ। हम कहाँ से ऑक्सीजन लायें?
अब क्या करें खरबंदा जी ऑक्सीजन कहीं उपलब्ध ही नहीं है।
इस झगडे से निपटकर सबसे पहले वह सुभाष को देखने आईसीयू की तरफ बढा। शीशे के दरवाजे से उन्हें लम्बी साँसें लेते हुए हाँफते देखकर खरबंदा को वहीं गश आ गया। आधे घंटे के बाद उसकी स्थिति सामान्य हुई, तो उसने अपने सभी जानने वालों से ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए सम्पर्क किया। उसे बहुत से फोन नम्बर दिये गए। बहुत-से नम्बर फेसबुक और वॉट्सएप से भी मिले थे। सभी जगह उन्होने फोन लगाए, लेकिन उन्हें ताज्जुब हुआ उनमें से लगभग सभी नम्बर बंद थे। इतनी बडी आपदा के वक्त भी लोग कैसे झूठी सूचना साझा का सकते हैं। उस दिन सभी जगह हाथ - पैर मार लिए लेकिन कहीं से भी ऑक्सीजन की कोई व्यवस्था नहीं हो पाई। कहीं से पता चला कि मानेसर में ऑक्सीजन मिल जाएगी। खरबंदा ने अपनी बहन के बेटों को सिलेंडर लेकर मानेसर भेजा। वहाँ बहुत लम्बी लाइन लगी थी और ऊपर से किसी को कोई पुख्ता खबर नह थी कि ऑक्सीजन मिलेगी भी या नह। अचानक उनके एक मित्र मनीष भंडारी का संयोग से उनका हालचाल जानने के लिए फोन आया, तो उन्होंने उससे भी अपनी परेशानी बताई।
भंडारी ने पूछा की कहीं तो ऑक्सीजन मिल रही होगी बलजीत?
कहीं नह मिल रही है क्योंकि ऑक्सीजन तो दिल्ली के सारे एस.डी.एम. के कब्ज़े में है।
देख बलजीत अगर एस.डी.एम कुछ मदद कर सकते हैं फिर तो शायद मैं कुछ कर सकता हूँ , क्योंकि दिल्ली में मेरे बहुत स्टूडेंट आई.ए.एस हैं। मैं तेरे को थोडी देर में फोन करता हूँ।
फोन काटते ही भंडारी ने अपने पढाए हुए एक आई ए एस अमित यादव को फोन किया। अमित ने हॉस्पिटल का नाम - पता पूछा और कहा कि सर, मैं आपको दस मिनट में फोन करता हूँ। अमित ने उस एरिया के एसडीएम को फोन किया, तो वह पहुँच से बाहर बता रहा था।
पंद्रह मिनट के बाद भंडारी ने फिर अमित को फोन किया, तो उसने बताया कि गुरुजी उसका फोन नोट रीचेबल आ रहा है। मेरी बात होते ही मैं आपसे बात करता हूँ। इसके बाद एक घंटे बाद अमित की एसडीएम से बात हुई, तो उसने खरबंदा को उसका नंबर दिया कि आप एसडीएम आशीष कुमार से बात कर लें। खरबंदा ने मोबाइल मिलाया तो बात नह हुई तो उन्होंने मैसेज भेजा। मैसेज के बाद एसडीएम का फोन आया। उसने कहा कि आप मुझे हॉस्पिटल या डॉक्टर का लिखा हुआ ईलाज का पर्चा, गाडी का नम्बर, ड्राईवर का नाम और मोबाइल नम्बर भेज दो।
खरबंदा ने उसी समय ये सारी सूचनाएँ एसडीएम को वॉट्सएप पर भेज दीं।
आधे घंटे के पश्चात एसडीएम ने खरबंदा को फोन करके बताया कि मुंडका के पैरामाउंट गैस सेंटर पर छह बजे ऑक्सीजन आ रही है, लेकिन आप थोडा पहले ही वहाँ पहुँच जाना सर। वहाँ इन सूचनाओं के ऊपर एस.ओ.एस. लिखकर अन्दर दे देना। वहाँ पर आपको नरेन्द्र तोमर मिलेगा जिसको मैंने आफ लिये लिखवा भी दिया है। एसडीएम ने खरबंदा को तोमर और वहाँ व्यवस्था में लगे पुलिस इंस्पेक्टर का नम्बर भी वॉट्स एप कर दिया।
खरबंदा पहले तो नह, लेकिन छह बजे अपने ड्राईवर साकिब फारूकी के साथ वहाँ पहुँच गया। वहाँ जाकर देखा, तो वहाँ कम से कम हजार लोग पहले ही लाइन में लगे है। लोगों से पता लगा कि कुछ लोग तो दो दिन से लाइन में लगे हैं। खरबंदा ने संबंधित इंस्पेक्टर से पूछा तो उसने बताया कि अभी ऑक्सीजन नह आई है। खरबंदा ने तोमर को भी फोन किया, लेकिन उसने भी यही जबाब दिया।
सात बजे एक ट्रक आया तो एकदम से शोर हुआ कि ऑक्सीजन आ गई। ट्रक से सिलेंडर उतरने ही लगे थे कि उन्हें फिर से ट्रक में लादा जाने लगा। देखते ही देखते वह ट्रक जैसे आया था वैसे ही लदा हुआ वापिस चला गया। चारों तरफ अफरा- तफरी मच गई। खरबंदा ने पूछताछ कि तो पता चला कि क्षेत्र के सरकारी अस्पतालों मंगोलपुरी के संजय गाँधी अस्पताल और रोहिणी के राजीव गाँधी कैंसर हॉस्पिटल में ऑक्सीजन की आपात जरूरत का देखते हुए ये ऑक्सीजन वहाँ भेज दी गई है। यहाँ कुछ समय बाद फिर से ऑक्सीजन भेजी जाएगी। उधर भंडारी भी खरबंदा से लगातार सम्पर्क में था, उसने खरबंदा को सख्ती से सलाह दी कि उसे वहीं इंतजार करना है।
खरबंदा ने उससे कहा कि मैं ही यहाँ रुकता हूँ क्योंकि साकिब को तो भेजना पडेगा। वह रोजे से है और इफ्तारी का समय भी हो गया है।
उधर मानेसर में बच्चे सुबह से लाइन में खडे- खडे थककर चूर हो गए थे और ऑक्सीजन मिलने की कोई संभावना भी नह दिख रह थी। परेशान होकर खरबंदा ने अपने भांजों को भी मुंडका ही बुला लिया। मुंडका पहुँचने पर खरबंदा ने अपने छोटे भांजे को अपने साथ रख लिया और बडे को घर भेज दिया।
वे लोग वहाँ इंतजार कर रहे थे कि एसडीएम का फिर फोन आया। उसने बताया कि खरबंदा साहब आप श्याम गैस सेंटर पर चले जाएँ क्योंकि वहाँ पैरामाउंट से पहले बारह बजे ऑक्सीजन पहुँच रही है। श्याम भी इनकी ही कम्पनी है जो इस जगह से बस केवल दौ सौ मीटर पीछे है।
खरबंदा ढूँढता हुआ श्याम कम्पनी में पहुँचा, तो देखा कि वहाँ भी उतनी ही भीड थी। शिफ्ट बदल गई थी तो अब रात में पैरामाउंट पर कोई फणीन्दर और श्याम पर सतीश की इंचार्ज ड्यूटी थी। एसडीएम ने श्याम में भी खरबंदा के लिए लिखवा दिया था और साथ ही दोनो जगह के इंचार्ज और पुलिस के अधिकारियों के नम्बर भी साझा कर दिए थे।
बारह बज गए, एक भी बज गया, लेकिन ऑक्सीजन का कुछ पता नहीं था। एक बजे भंडारी ने खरबंदा से बात की, तो उसने अपने को चक्कर आने की शिकायत की। भंडारी ने उनके भांजे को फोन पर कहा कि अपने मामाजी को गाडी में सुला दो। कहीं ऐसा ना हो कि बेहोश होकर ये ही ढेर हो जाएँ। खरबंदा ने कोई घण्टे भर ही आराम किया था कि उसके बडे भांजे ने फोन पर बताया कि मामा जी खबर आई है कि लाजपत नगर गुरुद्वारे में ऑक्सीजन मिल रही है। उधर ताजा स्थिति जानने के लिए भंडारी ने खरबंदा को फोन किया तो उसने लाजपत नगर का असमंजस बताया। भंडारी ने उसे कहा कि एसडीएम उससे लगातार सम्पर्क में है, खुद जगा हुआ है, दूसरे लोग सकारात्मक हैं, इसलिए ऑक्सीजन जरूर मिलेगी। वैसे भी गुरुद्वारे तो चैरिटी करते हैं। उन्हें तो सभी को ऑक्सीजन देनी होती है तो अपने को एक छोटा सिलेंडर ही मिलेगा, उससे अपना क्या होगा। इसलिए यहीं इंतजार करो।
ढाई बजे एसडीएम ने भंडारी को फोन किया कि आफ ड्राईवर का नम्बर बंद आ रहा है। उसने खरबंदा के भांजे को फोन किया कि तुम्हारा नम्बर बंद क्यों है ? नह मामा जी, मेरा नम्बर तो चालू है। भंडारी को याद आया कि पहले तो साकिब का नम्बर दिया था। उसने एसडीएम को खरबंदा के भांजे का नम्बर भेज दिया। एसडीएम ने उसे किसी नये पुलिस अधिकारी का नम्बर भेजा क्योंकि पुराना अधिकारी टीकरी बॉर्डर चला गया था जहाँ उसे अगले दिन किसानों के किसी कार्यक्रम के इंतजाम भी देखने थे।
खरबंदा के भांजे ने इस नये पुलिस अधिकारी को फोन किया तो उसने उन्हें मुख्य द्वार पर बुलाया। जब उस अधिकारी ने खरबंदा की गाडी को भीतर घुसाना चाहा तो लाइन में लगी भीड बेकाबू हो गई कि इनसे पैसे लेकर अंदर ले रहे हो। अधिकारी ने समझाया कि दो गाडियाँ एस ओ एस के लिए रजिस्टर्ड हैं। ताज्जुब की बात थी कि इतनी भीड में किसी को भी सरकारी प्रक्रिया का पता ही नह था। बडी जद्दोजहद के बाद पुलिस अधिकारी ने भीड को समझाकर खरबंदा की गाडी को भीतर लिया। दूसरा एस ओ एस वाला भी हार - थककर जा चुका था। सबसे पहले क्षेत्र की एँबुलेंस गाडयिों को ऑक्सीजन भरी गई और उसके बाद कई दिन से खडी गाडयिों को दी गई। करीब पाँच बजे खरबंदा का एक बडा और दो छोटे ऑक्सीजन सिलेंडर भरे गए। समय अच्छा था अगर खरबंदा के पास और सिलेंडर होते तो आज तो वो भी भर जाते।
ये ऑक्सीजन के सिलेंडर नह, सुभाष के लिए नया जीवन थे।
अगले दिन भंडारी ने आभार प्रकट करने के लिए एसडीएम को फोन किया तो उसने कहा कि ऑक्सीजन का किफायत से प्रयोग करना सर, क्योंकि हर रात कल की तरह भाग्यशाली हो जरूरी नह।
जी, एसडीएम साहब।
खरबंदा ने भंडारी को फोन किया कि भाई एसडीएम साहब को धन्यवाद बोल देना। और हाँ भाई तेरा भी बहुत- बहुत शुक्रिया।
ओय मोटे, खरबंदा, यारों को कबसे शुक्रिया बोलने लगा साले बुढहू।
नहीं, यार भंडारी वक्त वाकई बहुत खराब है मेरे यारा।
वक्त तो खराब ही है खरबंदा। व्यवस्था और सरकार पूरी तरह असफल हो गई है। लोगों को मरने के लिए उनके हाल पर छोड दिया है। सरकार का मजाक तो देखो। एक तरफ गरीब आदमी से मास्क नह पहनने पर दो हज़ार का ज़ुर्माना वसूला जा रहा है, लॉकडॉउन लगा रहे हैं, तो दूसरी और सारे शहर में बडे - बडे होर्डिंग लगाकर लोगों को कुम्भ में आमंत्रित किया जा रहा है,जगह - जगह चुनाव कराये जा रहे हैं। मैंने तो अखबार पढना और टीवी देखना ही छोड दिया है। नह देखा जाता यार। मोबाइल को हाथ लगाते ही किसी ना किसी के मरने का समाचार मिलता है।
एक तरफ लोग अपनी जान पर खेलकर और अपना सब कुछ लुटाकर दूसरों की मदद कर रहे हैं। अस्पताल कर्मियों के लिए सारा दिन पीपीटी किट पहने रहना कितना कष्टदायी है। ये लोग पानी भी नहीं पीते, ताकि इन्हें टॉयलेट नह जाना पडे। बेचारे लघु और दीर्घ शंका को रोक कर रखते है। दूसरी ओर बहुत-से लोग इस आपदा में भी अवसर तलाश रहे हैं। ऑक्सीजन गैस सिलेंडरों को रिफिल कर ब्लैक में बेचा जा रहा है। बाजार में पहले से ही ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी थी। अब ऑक्सीजन सिलेंडर में उपयोग होने वाली ऑक्सीजन किट बाजार में नह मिल रही है। अपने परिजनों के लिए किसी प्रकार ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था करने वाले लोग अब सिलेंडर से साँस लेने के लिए जरूरी ऑक्सीजन किट के लिए दुकान-दर दुकान भटक रहे हैं। दुकानदारों के आगे गिडगिडा रहे हैं। लेकिन उन्हें सिलेंडर के लिए जरूरी किट नह मिल रही है। इस किट के भाव इतने बढ गए हैं कि लोग खरीद नहीं पा रहे हैं। एक सप्ताह में ऑक्सीजन सिलेंडर और किट की मांग में लगभग एक हजार प्रतिशत का इजाफा हो गया है बलजीत।
बिल्कुल सही बात है मनीष। ऑक्सीजन सिलेंडर के अलावा पल्स ऑक्सीमीटर और थर्मामीटर की भी बहुत कमी हो गई है। आठ सौ से एक हजार रुपये में बिकने वाला पल्स ऑक्सीमीटर मैं खुद ढाई हजार रुपये में ब्लैक मार्केट से खरीद कर लाया हूँ। मरीजों को पहले ही ना समय रहते अस्पताल में बेड मिल पा रहा है और ना ही ऑक्सीजन की पुख्ता सप्लाई हो रही है। अब तो जगह-जगह से रेमडेसिविर के इंजेक्शन बरामद किए जा रहे हैं। रेमडेसिविर और मेरोपेनम जैसे जरूरी इंजेक्शन बीस से पचास हजार रुपये तक ब्लैक में बिक रहे हैं।
समय पर ऑक्सीजन मिलने से सुभाष की जान बच गई और उसकी हालत में निरंतर सुधार होने लगा। लेकिन हर कोई सुभाष की तरह भाग्यशाली नह था क्योंकि खरबंदा ने ऑक्सीजन के अभाव में कितने है लोगों को अस्पताल में दम तोडते हुए देखा है।
पच्चीस दिन के बाद सुभाष को हॉस्पिटल से छुट्टी मिली। खरबंदा को इन दिनों में प्रतिदिन ऐसा लगता था जैसे वह बरसों से अस्पताल में ही रहता है। छुट्टी मिली तो खरबंदा सुभाष को अपने घर ही ले गया। इस कमजोरी की हालत में उसे सुभाष को केवल नौकर के हवाले छोडना उसे ठीक नह लगा। पंद्रह दिन उसने और दोनों के नौकरों ने सुभाष की खूब सेवा की। उसके बाद सुभाष अपने घर चला गया।
घर जाने के बीस दिन बाद एक दिन सुभाष के यहाँ से गंगा का घबराये हुए खरबंदा को फोन आया कि बाबूजी की तबियत बहुत खराब हो गई।
खरबंदा लगातार दिन में सुबह - शाम दो चक्कर सुभाष के घर के लगाता ही था और उसे ऐसी कोई आशंका नह थी। वह भागता हुआ वहाँ पहुँचा और जल्दी से लेकर सुभाष को फिर से सैन्टम हॉस्पिटल में भर्ती करवाया। डॉक्टरों ने दिल का दौरा पडने की बात कही। साथ ही बताया कि ये कोविड के बाद के ही लक्षण हैं। खरबंदा ने एक बार फिर सुभाष के तीनों बच्चों को फोन किया, लेकिन इस बार भी तीनों के पास कोई ना कोई बहाना था।
भीतर आई.सी.यू में किसी को मिलने नहीं दिया जाता। पाँच दिन बाद डॉक्टरों ने सुभाष को मृत घोषित कर दिया। एक अन्य भर्ती मरीज के परिजन ने खरबंदा को बताया कि भाई साहब इनकी मृत्यु तो उसी दिन हो गई थी। हॉस्पिटल ने बीमा की सीमा की सारी राशि हडपने के लिए इन्हें बिना बात हॉस्पिटल में रखा है।
खरबंदा ने अपना सर पकड लिया। उसे विश्वास ही नह हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है। ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि ऐसा होगा तो अस्पताल की अपने यहाँ कार्यरत कर्मचारियों की नजरों में क्या ईज्जत रहेगी। जब तक दिल धडकना बंद नह होता डॉक्टर तो प्रयास करते ही हैं। वैसे भी लाश को पाँच दिन रखेंगें तो वह सड नह जायेगी।
खरबंदा ने सुभाष के मरने की खबर उसके बच्चों को दी। गर्ग साहब की मृत्यु कि खबर सुनकर सिंघवी ने अपने मित्र खरबंदा को फोन किया।
देख बलजीत ! तूने एकदम योद्धाओं जैसा काम किया है। तू बहुत भावुक है मेरे भाई, किसी बात को दिल से मत लगाना। लोगों में इस बीमारी का इतना खौफ है कि आज मेरी सोसाइटी में रह रहे कोविड बचाव में लगे एक डॉक्टर दंपति को सोसाइटी छोडने के लिए धमकाया जा रहा है। दूसरे कारण भी रहे होंगें बलजीत लेकिन गर्ग साहब के बच्चों के नहीं आने का कारण भी ये डर ही है। लोगों की सवेंदना का ये हाल है कि घर में बंद बैठे लोगों को फोन करके छुटकारा पा लेते हैं। ऐसे में जो लडाई तूने लडी है, तेरा दोस्त होने के नाते मुझे तेरे पे गर्व है।
दूसरी तरफ से सिसकियों की आवाज सुनाई दी।
नहीं बलजीत रोना नह यार। अपने को संभाल भाई।
ठीक है ! अपना ध्यान रखना।
अगले दिन सुबह तक अपने - अपने समयानुसार तीनों बच्चे पहुँचे तो उनके पिता का दाह संस्कार हुआ। खरबंदा ने कहा कि तीन दिन बाद आप लोगों को भाई साहब की अस्थियाँ विसर्जित करने हरिद्वार जाना है। लगता है तीनों सलाह करके ही आए हैं क्योंकि तीनों बच्चों ने एक ही सुर में कहा कि अंकल हम तो केवल तीन दिन के लिए ही आए हैं। समय खराब करने से क्या फायदा। हम आज ही हरिद्वार चले जाते हैं। खरबंदा ने भी चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी।
हरिद्वार से वे लोग उसी दिन रात में लौट आए थे। सुबह उठते ही उन्होंने खरबंदा अंकल को बुला लिया। सुभाष के पास पश्चिम विहार के घर के अलावा यहीं पर एक फ्लैट, नोएडा में भी एक प्लॉट और फ्लैट तथा बहादुर गढ के पास एक फार्म हॉउस था। तीनों बच्चों का प्रस्ताव था कि अंकल हमारे तीनों का अब इंडिया आने का कोई मानस नह है। आप इस सारी प्रोपर्टी को जल्द से जल्द बेच दीजिये। हम में से किसी के पास समय नहीं है। हम आफ नाम पॉवर ऑफ एटॉर्नी कर देते हैं। इस काम को जल्दी से करें अंकल।
खरबंदा ने कहा कि पॉवर ऑफ एटॉर्नी की कोई आवश्यकता नह है। जरूरत पडने पर आपकी फोन पर बात या वीडियो कांफ्रेंसिंग करवाई जा सकती है। ये बातें तो हम बाद में भी कर सकते हैं। फिलहाल तो हमें भाई साहब के कल के कर्मकांड की तैयारी करनी चाहिए। आप लोगों को जाने की भी तो जल्दी है।
अगले दिन सुबह दस बजे हवन और शुद्धीकरण चल रहा था तो पूजा में ध्यान ना देकर सुभाष का छोटा बेटा अंकित अमेरिका में अपने कुत्तों को लेकर परेशान था और लगातार किसी नौकर या साथी टॉम को उनका ध्यान रखने के निर्देश दे रहा था।
उसी दिन सारे कर्मकांड करके सुभाष के तीनों बच्चे वापस चले गए। खरबंदा सोच रहा था कि अस्पतालों से ही क्या, लगता है रिश्तों में भी ऑक्सीजन खत्म हो रही है। खरबंदा वहीं सुभाष के कमरे में बैठा अतीत की स्मृतियों में चला गया। बचपन में सुभाष भाई साहब ही हम बच्चों को रामलीला और रामलीला की शोभायात्रा दिखाने ले जाते थे। इस यात्रा में जिया बैंड को छोडकर बाकी सारे मुस्लिम बैंड होते थे। जामा मस्जिद पर इस शोभायात्रा को हिन्दू - मुस्लिम सभी देखने को अटे रहते थे। आस - पास की छतों पर लोगों के सर ही सर नजर आते थे। उन दिनों रामलीला का यह आयोजन भी कोलकत्ता की दुर्गा पूजा की तरह हिन्दू - मुस्लिम एकता की मिसाल और दिल्ली की शान होता था।
चाँदनी चौक में गली के बच्चों के साथ झगडा होने पर कैसे सुभाष भैया उसके लिए सारे बच्चों की खबर लेते थे, अपने जेब खर्च के पैसे से उसे पुल के नीचे से सीताराम का मूँग की दाल का हलवा और गोवर्धन की चाट- पापडी खिलाते थे। चौरसिया का पान भाई साहब ने ही उसे सबसे पहले खिलाया था। रंगीला की कंचे वाली बोतल पिलाना और ऐसी ही बहुत सी स्मृतियाँ उसके मस्तिष्क में घूम रही थी और उसकी दोनों आँखें झर - झर बहकर गंगा- जमुना हो रही थी।

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