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कॉमरेड की हवेली

अशोक सक्सेना
इंटरनेशनल साइंस कांग्रेस में भाग लेने के लिए मैं दिल्ली आया था। तीन दिन यहाँ रहकर मैं प्लेन से जयपुर आ गया। यह मेरे बचपन की यादों का शहर है। मैंने अपनी जिंदगी के शुरूआती तीस वर्ष इसी शहर में बिताए थे। यहाँ की गली-मोहल्ले, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, छोटी-कडी चौपड, चाय की थडियाँ, पान की दुकानें, कॉफी-हाउस......सभी याद आ रहे थे।
ज्यादा समय नहीं गुज़रा है, जब हमारा एक घर हुआ करता था। हमारा घर जयपुर के गणगौरी बाज़ार की एक नामचीन हवेली में था। हवेली तो अब भी होगी लेकिन घर अब कहीं नहीं है। होटल के इस आरामदेह कमरे में बैड पर पडे-पडे मैं अतीत की यादों में खो गया।........
दादाजी को हम लोग बाऊजी कहते थे। वे डाकखाने में पोस्ट-मास्टर हुआ करते थे। चालीस वर्षों की अपनी लम्बी नौकरी में उनके दो-तीन तबादले हुए अन्यथा उनकी सारी जिंदगी ब्रह्मपुरी के सिटी पोस्ट ऑफिस में गुजरी थी।
रिटायरमेंट के बाद बाऊजी ने डाकखाने के बरामदे में एक तख्त डलवा लिया था। उस पर दरी बिछी होती। वे दीवार के सहारे तकिया लगाकर बैठते। सामने लकडी की छोटी-सी डेस्क थी जिस पर कलम दवात रखे होते। डेस्क की दराज़, हिसाब की कॉपी और रुपये पैसे रखने के काम आती थी।
लिफाफे-पोस्ट कार्ड खरीदने वाले कई लोग उनसे चिट्ठियाँ लिखवाते थे। उनकी हैण्ड राइटिंग लाजवाब थी। उर्दू और अंग्रेजी में उन्हें महारथ हासिल थी, लेकिन लोग कहते तो वे हिंदी में भी उनकी चिट्ठियाँ लिख देते थे। एक चिट्ठी लिखने की उजरत एक पैसा थी।
बाऊजी की कमाई ठीक ही थी। उन्हें पाँच रुपया महीना पेंशन मिलती थी। चार-पाँच आने रोज़ वह डाकखाने से कमा लेते थे। अइया, बाऊजी और चाचा के लिए इतना पैसा काफी था मगर ताऊजी के घर की माली हालत खराब थी। आटा दाल खत्म होने की नौबत आ जाती तो बाऊजी को उनकी मदद करनी पडती थी।
बाऊजी इलाके के मोतबिर लोगों में से थे। लोग उनकी शराफत और ईमानदारी के कायल थे। यहाँ तक कि कुछ लोग अपना रुपया पैसा उनके पास रखवा जाते और ज़रुरत पडने पर ले जाते। हिसाब की कापी में उन्होंने बाकायदा लोगों के नाम से खाते खोल रखे थे। इस काम के लिए वे किसी से कोई पैसा-पाई नहीं लेते थे।
बाऊजी का पूरा नाम बाबू शिवनारायण निगम था। लोग उन्हें मुखबिर साहब भी कहा करते थे। यह शब्द हमारे खानदान से किसी पदवी की तरह चिपका हुआ था। बाऊजी से पहले उनके पिता और दादा मुखबिर कहलाते रहे होंगे। उनके बाद हम लोग मुखबिर कहलाएँगे, इसमें कोई शक नहीं था।
उधार या कज़र् लेने से बाऊजी को सख्त ऐतराज़ था। बाज़ार से जो कुछ मँगवाना होता, वे नकद पैसे देकर चाचा से मँगवा लिया करते थे। एक बार ताऊजी के यहाँ किराने की दूकान से कुछ सामान उधार मँगवाया गया था। उनका हाथ कुछ ज्यादा ही तंग रहता था लिहाज़ा काफी समय तक वे उधार नहीं चुका पाए थे। हालांकि दुकानदार को उधार पट जाने का पूरा भरोसा था, लेकिन वह भला आदमी कब तक इंतज़ार करता ? चाचा मुझे साथ लेकर उस दुकान पर कुछ सामान खरीदने गए थे। सामान देकर दुकानदार ने कहा- मुखबिर साब नै म्हांकौ सलाम अरज कर देया।
चाचा को इस शब्द से ही नफरत थी। उन्होंने गुस्से में कहा- लाला जबान संभाल कै बात करौ, बाऊजी मुखबिरी करकै थांकी दूकान पै छापौ डलवायौ काईं।
दुकानदार सकपका गया। उसने तो अपनी समझ से बाऊजी के लिए बहुत अदब से मुखबिर साहब कहा था। चाचा के तेवर देखकर उसने कहा- भाईजी, थे तो बेमतलब ही बैराजी होग्या, म्हैं तो फगत सलामी अरज करी छी।
घर आकर मैंने अइयाजी को सलाम वाली बात बता दी। अगले रोज़ डाकखाने से लौटते वक्त बाऊजी ने किराने वाले का हिसाब चुकता कर दिया। उन्होंने अइयाजी से कहा- विश्नू की माँ, बडी बहू से कहना, बाज़ार से उधार सामान न मँगवाया करे। मजबूरी में कभी मँगवा भी लिया था तो महीने पर दुकानदार का हिसाब चुकता करना चाहिए था.......कडी, पता नहीं कैसे गृहस्थी चलाती है। तनख्वाह में इन लोगों की गुज़र ही नहीं होती। लडकियाँ बडी हो रही हैं। उनके शादी ब्याह करने हैं। समझ में नहीं आता विश्नू की नैया कैसे पार लगेगी?
अइयाजी ने कुछ नहीं कहा। ताई की घर-गृहस्थी के हालात से वे अच्छी तरह वाकिफ थीं। महीनें के आखिरी दिनों में उनकी हालत पतली हो जाती थी।
अइयाजी एक कटोरदान आटा दे दीजिये। माँ कहती हैं गेहूं पिसकर आएगा तब लौटा देंगे। अन्नू दी कहतीं और वे कटोरदान में आटा भरकर उन्हें दे देतीं। अगले दिन वहाँ से कोई चीनी या चावल लेने आ जाता। अइया जी होते-सोते कभी किसी चीज़ को मना नहीं करती थीं।
उनसे माँगकर लिया हुआ सामान कभी लौटता था या नहीं, मुझे नहीं मालूम लेकिन माताजी इस मामले में चौकस थीं। ताई के यहाँ दिया गया सामान या रुपया पैसा माँगने में उन्हें कोई संकोच नहीं था। वे मुझसे कहतीं- तेरे ताऊजी की तनख्वाह मिल गई होगी। ताई से कहना वह फलां चीज़ वापस कर दें।
इस तरह एक ही घर में साथ-साथ रहते हुए भी हम अलग-अलग थे। तीन गृहस्थियाँ, तीन चूल्हे, तीनों का अपना खाना कमाना, लेकिन दुनिया की नज़रों में मुखबिर साहब का खानदान मुट्ठी में बंद उँगलियों की तरह था।
हमारा घर काफी बडा था। जयपुर में वह मुखबिर की हवेली के नाम से मशहूर था। हवेली आने के लिए रेल्वे-स्टेशन या बस स्टैंड से रिक्शा या ताँगा लेकर सिर्फ मुखबिर की हवेली कहना होता था। घर की डाक भी मुखबिर की हवेली, जयपुर के पते पर आ जाती थी। डाक की निश्चित पहुँच के लिए पते में गणगौरी बाज़ार जोडा जा सकता था।
सुना था, हमारे पूर्वज किसी अन्य रियासत से आकर यहाँ बस गए थे। उस रियासत की फौज में वह ऊंचे ओहदे पर थे। तब अंग्रेज़ भारत में अपने राज का विस्तार करने में लगे थे। अंग्रेजों ने दुश्मन को पनाह देने का इल्ज़ाम लगाकर रियासत पर हमला कर दिया। अंग्रेजों ने उनसे फौज और किले के राज़ हासिल कर लिए। बदले में जयपुर महाराज से कहकर यह हवेली उनके नाम करवा दी।

अंग्रेजों के दबाव में महाराज ने हवेली तो दे दी, लेकिन किसी मुखबिर को अपने राज में बसाना उन्हें खल रहा था। उनके आदेश पर हवेली के सामने एक शिला-पट्टिका लगवा दी गई। जिस पर खुदवाया गया था- मुखबिर की हवेली। बाद में कभी वह पत्थर वहाँ से हटवाकर कुँए में फिंकवा दिया गया। ज़ाहिर है यह काम मुखबिर साहब या उनके सुपुत्रों के हुकुम से हुआ होगा।
तीन चौक की दो मंजिला हवेली के पहले चौक में हम लोग ऊपर की मंजिल में रहते थे। नीचे लम्बा-चौडा आँगन था जिसके तीन तरफ बरामदे थे। बरामदे के बाद कमरे थे जिनके दरवाज़े मुद्दत से बंद थे। ऊपर आने के लिए आँगन में दो तरफ चकडी सीढियों वाले जीने थे। एक ज़ीना जिस छज्जे पर खुलता था वहाँ ताऊजी रहते थे। दूसरे ज़ीने वाले छज्जे के भीतर वाले कमरों में माताजी-पिताजी और हम दोनों भाई-बहन थे। हवेली के मेन गेट के ऊपर वाला पोर्शन अइया-बाऊजी के पास था। इस पोर्शन में एक बडा हॉल था जिसके बाँए-दाँए खूब बडे कमरे थे। इसके अलावा रसोई घर, गुसलखाना और खुली छत थी। हवेली का यही हिस्सा अब तक सही सलामत बचा हुआ था।
पीछे के हिस्से में बनी दो चौक की इमारत की छत और दीवारें गिर चुकी थीं। हवेली की ड्योडी कई जगह से टूट गई थी और वहाँ मलबा बिखरा हुआ था।
मैं सात भाई-बहनों में सबसे छोटा था। संतो जीजी मुझसे तीन साल कडी थी। ताई के यहाँ मेरी तीन बहनें उनसे भी कडी थीं। दोनों भाई उनसे छोटे लेकिन मुझसे बडे थे। अन्नू दी और सल्ला दी के अलावा सब स्कूल जाते थे। उर्दू मिडिल करवा कर ताई ने उन दोनों का स्कूल जाना बंद करवा दिया था।
मेरे भाई-बहन घर के पास वाले सरकारी सिटी मिडिल स्कूल में पढने जाते थे। जब वे घर से तैयार होकर निकलते तो मैं भी उनके साथ स्कूल जाने की ज़द किया करता था। माताजी मुझे किसी तरह बहला लेतीं और वे मुझसे नज़रें बचा कर निकल जाते। स्कूल से लौटकर जीजी आल्मारी में बस्ता रख देती। मैं मौका पाकर उसका बस्ता खंगाल डालता। कई बार मेरा उनसे झगडा हो जाता लेकिन जीत मेरी होती थी क्योंकि माताजी हमेशा मेरी हिमायत लेती थीं।
इस साल स्कूल में मेरा नाम लिखवाया जाना था इससे पहले मक्तब की रस्म हुई। घर में दिन भर खूब चहल-पहल रही। मुझे चौकी पर बिठाकर पंडितजी ने पूजा-पाठ करवाया। औरतों ने तिलक लगाकर मुझे रूपये-पैसे और खिलौने दिए।
पूजा-पाठ खत्म हुआ तो मैं दोस्तों के साथ खेलने लगा। मेरा कमरा खिलौनों से भर गया था। संतो जीजी बार-बार कमरे में आतीं। उन्हें डर था कि कमरे में जमा बच्चों का हुजूम पपेरमेशी के खिलौने तोड देगा लिहाज़ा वे खिलौने उठाकर आल्मारी में रखने लगीं। मैं गुस्से में भरकर रोने लगा। चीख पुकार सुनकर माताजी कमरे में आईं। मैं तो खैर क्यों मानने लगा पर वे जीजी को समझा कर ले गईं। जाते हुए उन्होंने खिलौने मेरे सामने रखकर कहा- ले मर। एक भी खिलौना टूटा ना, तो मैं तेरी हड्डी-पसली एक कर दूँगी।
उनकी बात सही निकली। दोस्तों के साथ खेलते हुए कई खिलौने टूट गए। मुझे थोडी उलझन हुई। मैंने टूटे हुए खिलौनों को ऐसी जगह छुपा दिया जहाँ किसी की उन पर नज़र नहीं पड सकती थी।
शाम को चाचा आए। उनका नाम देवनारायण था, लेकिन घर में सब उन्हें देबू कहते थे। वे बहुत मस्त-मौला इंसान थे। अपने तीनों भाइयों में वह सबसे हैंडसम लगते थे। लम्बा कद, छरहरा बदन, गोरा रंग और घुंघराले बाल। उम्र में मुझसे तकरीबन दस साल बडे थे। वे मैट्रिक पास कर चुके थे और अब कॉलेज पढने जाते थे।
मेरे दोस्त जा चुके थे क्योंकि दावत शुरू हो गई थी। चाचा ने मुझे कंधे पर बिठा लिया। मेरी टाँगें पकड कर घुमेर लेते हुए उन्होंने कहा- कल से तू स्कूल जाएगा। कल तेरा दाखिला करवाना है। मैं चलूँगा तेरे साथ। चलेगा स्कूल ?
हाँ ज़रूर चलूँगा। मैं तो पहले से स्कूल जाना चाहता था, पर आप लोग जाने कहाँ देते थे।
पहले तू छोटा था। छोटे बच्चे स्कूल नहीं जाते।’ कंधे से मुझे उतारते हुए उन्होंने कहा- अब तू बडा हो गया है।
- तो मैं अब छत पर पतंग उडा सकता हूँ ?
- नहीं।
- गणगौर का मेला देखने जा सकता हूँ ?
- नहीं। अभी तू इतना बडा नहीं हुआ है। पतंग तू मेरे साथ ही उडाएगा। मेला देखने भी तुझे मेरे या बाऊजी के साथ ही जाना होगा।
- तो फिर मैं बडा कहाँ हुआ ? कल बाज़ार में अन्नू दी सारे रास्ते मेरा हाथ पकडे रहीं। मैं कब बडा होऊँगा चाचा।
- कल से स्कूल जाना शुरू कर दे। पढ-लिख लेगा तो बडा आदमी बन जाएगा।
- आफ जैसा?
- मुझसे भी बडा। अपने पिताजी जितना बडा।
मेरी नज़र में पिताजी सचमुच बडे आदमी थे। उनके पास बाइसिकल थी और वे उस पर चढ कर दफ्तर जाते थे। छुट्टी वाले दिन चाचा मुझे बाइसिकल पर बिठाकर घुमाने ले जाते थे। डंडे पर उन्होंने एक छोटी-सी सीट कसवा ली थी। वे मुझे उस पर बिठा लेते। सडक पर हमारी बाइसिकल लहराते हुए चलती। मुझे बहुत मज़ा आता। जब हम घर लौटते तब मेरी शर्ट की छोटी सी जेब लेमनचूस या टॉफी से भरी होती थी। चाचा मुझे गोद में लिए ऊपर आ जाते। चाहता तो मैं यह था कि अपनी टॉफियाँ कहीं छुपा कर रख दूँ मगर यह मुमकिन नहीं हो पाता। एक-दो टोफियाँ संतो जीजी को देकर बाकी मैं हज़म कर जाता।
चाचाजी की गोद में चढकर मैं नीचे आ गया। आँगन में दावत चल रही थी। बिजली बार-बार आ-जा रही थी इसलिए खूंटियों पर पेट्रोमैक्स टंगे थे। बरामदे में हलवाई की भट्टी लगी थी। एक हंडा वहाँ तख्त पर रखा था। कडाई में पूरियां छन रहीं थीं। मिठाइयाँ, साग, रायता वगैरह कोठार से लाकर बरामदे में एक दूसरे तख्त पर लाकर रख दिए गए थे।
मैं चाचा के साथ पंगत में बैठ गया। परोसगार ने मेरे सामने पत्तल नहीं रखी। मैंने चाचा के कान में अपने बडे होने की बात कह दी। उन्होंने हँसते हुए उसे आवाज़ देकर मेरी पत्तल भी बिछवा दी।
दावत का मज़ा लेकर पंगत उठ गई। मैं भी चाचा के साथ ऊपर आ गया। मुझे नींद आ रही थी, लेकिन माताजी को अभी फुर्सत नहीं थी। मैंने जबरन चाचा को रोक लिया। बिस्तर में घुसकर मैंने पूछा- चाचा हड्डी-पसली एक कैसे होती है ?
जब कोई किसी की खूब जोर से पिटाई कर देता है तब मारने वाला कहता है, मैंने मार-मार कर उसकी हड्डी-पसली एक कर दी। चाचा ने पूछा- क्या हुआ ? तुझे किसने कहा ?
जीजी कह रही थी- खिलौने टूटे तो वह मेरी हड्डी-पसली एक कर देगी। दो-तीन खिलौने तो टूट भी गए।
कौन-सी जीजी ?
संतो जीजी ने कहा।
संतोष ने ! अरे तू उसकी फिक्र न कर। मैं चोटी पकडकर उसे कठपुतली की तरह नचा दूँगा। चाचा ने मुझे दिलासा देते हुए कहा।
कठपुतली क्या होती है ?
तूने नहीं देखी? किसी दिन तुझे कठपुतली का तमाशा दिखाने ले चलूँगा। आज मैं तुझे कठपुतली की एक कहानी सुनाता हूँ। उन्होंने सिंहासन-बत्तीसी की कहानी सुनाना शुरू कर दिया। सुनते-सुनते मैं उनसे चिपक कर सो गया।
सुबह जब मैं सोकर उठा, भाई-बहन स्कूल जा चुके थे। कमरे में दीपा दी पौंछा लगा रहीं थीं। उन्होंने अपनी धोती को पिंडलियों से उठाकर कमर में खोंस रखा था। वे हमारे घर काम करने रोज़ सुबह आती थीं। उनकी उम्र तकरीबन पंद्रह-सोलह साल थी। खाट से उतर कर मैंने पूछा - दीपा दी संतो जीजी कहाँ हैं ?
उन्होंने कहा- वा तौ स्कूल गई छै।
मैं रोने लगा। आज तो मुझे भी स्कूल जाना था। वे मुझे चुप कराने लगीं। मुझे बहलाकर वह माताजी के पास छोड आयीं।
एक घंटे बाद चाचा मुझे लेकर स्कूल आए। दर्जा एक में न भेजकर मास्टर जी ने मुझे संतो जीजी के सुपुर्द कर दिया। चाचा मेरा दाखिला करवा कर जा चुके थे। मैं रेस्ट की घंटी लगने तक जीजी के साथ दर्जा चार में बैठा रहा।
स्कूल से लौटा तो घर में अजीब किस्म की खामोशी छाई हुई थी। माताजी अपने कमरे में थीं और ताई अपने कमरे में। मुझसे किसी ने कुछ नहीं पूछा। मैं अइया-बाऊजी के पास आ गया। बाऊजी मसहरी पर लेटे थे और अइया जी उनके पायताने बैठीं संरौंते से सुपारियाँ कतर रहीं थीं। सामने मूढे पर चाचा गुमसुम बैठे थे।
यहाँ भी किसी ने मुझसे कुछ नहीं पूछा। मैं उछलकर मसहरी पर चढ गया। बाऊजी की बगल में लेटकर और उनका चेहरा अपनी तरफ घुमा कर मैंने कहा- बाऊजी आज स्कूल में बडा मज़ा आया। रेस्ट की घंटी के बाद बालसभा हुई। मैंने आपकी वाली पोयम सुनाई- श्रीकृष्ण जी बोर्न एट गोकुल ग्राउंड; बेस्टोड नंदन थाउजेंड पाउंड.....मुझे ईनाम में रंग की डिब्बी मिली। आपको लाकर दिखाऊं ?
अरे वाह, राजा बेटा ईनाम लाया है......शाबास। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- वो मैं बाद में देखूंगा। अभी तू जाकर खेल। मैं थोडी देर आराम करता हूँ।
मैं मसहरी से उतर गया। अइया जी और चाचा ने भी ईनाम वाली बात पर कोई खुशी ज़ाहिर नहीं की। मेरा हौंसला पस्त हो गया। मैं अपने कमरे में आया। जीजी नाश्ता कर रही थी। मैं उनके साथ नाश्ते में शरीक हो गया।
शाम को पिताजी दफ्तर से लौटे। उनसे पहले ताऊजी घर आ चुके थे। थोडी देर बाद देखा माताजी-पिताजी बडे हॉल की तरफ जा रहे थे। मैं उनके साथ लगा वहाँ आ गया। पिताजी मूढा खींचकर बैठ गए और माताजी माथे तक पल्ला सरका कर अइयाजी के पास खडी हो गईं। बाऊजी ने कहा, तो मैं ताऊजी को बुलाने के लिए दौड गया। उन्हें शायद ताई ने पहले ही बता दिया होगा क्योंकि मेरे कहते ही वे दोनों मेरे पीछे-पीछे हॉल में आ गए।
बाऊजी हमेशा की तरह मसहरी पर पैर मो?कर बैठे थे। पीठ के पीछे मसनद जैसा मोटा तकिया था। उनके सामने मूढों पर पिताजी और ताऊजी बैठे थे। माताजी और ताई हॉल के बाहर वाले झरोखे से पीठ लगाकर खडी थीं। मैं मसहरी पर बाऊजी के पास जाकर बैठ गया। मैंने घर में लोगों को इतना चुप पहले कभी नहीं देखा था।
कुछ दिनों पहले हमारे पडौस में एक बुज़ुर्ग की मौत हुई थी। वे शबाना दी के दादाजी थे। लोग उन्हें हउआजी कहते थे। लुका-छुपी खेलते हुए हमारी बच्चा पार्टी पौरी-आँगन में होते हुए पूरे घर में धमा-चौकडी मचाती रहती थी। कभी-कभी शब्बो दी भी हमारे खेल में शामिल हो जाती थीं।
हउआजी पौरी में बिछे तख्त पर आराम फरमा रहे होते। वे गेहुएं रंग के दुबले-पतले बूढे आदमी थे। लम्बे कद की वजह से उनकी कमर थोडी झुक गयी थी। सिर पर बाल नहीं थे लेकिन सफेद दाढी खूब लम्बी थी। उनकी भोंह और कानों पर भी घने सफेद बाल थे। चकडी मोहरी का पाजामा और घुटनों तक लम्बा कुरता- घर में यही उनका पहनावा था। उनके झकाझक सफेद कपडों से साबुन की भीनी-भीनी खुशबू आती थी। अक्सर हम उनसे छुपने की जगह पूछते और वे हमें घर में छुपने के गुप्त ठिकाने बता देते।
हम बच्चों की उनसे खूब निभती थे। वे थे ही इतने मजेदार। उनके कारनामे देखकर हैरत होती थी। वे पानी मुँह में भरकर नाक से निकालकर दिखाते। हम कहते तो दोनों कान हिलाकर दिखाते। आँखों की पुतलियाँ चढा, जब वे भेंगा बनकर दिखाते तब हमें बडा मज़ा आता। सबसे ज़ोरदार बात यह थी कि वे कभी भी पाद सकते थे। जब कभी हम ज़द करते तो थोडी ना-नुकुर के बाद वे छाती पर मुक्का मारते और हमें उनके पादने की तेज़ आवाज़ सुनाई देती। यह आवाज़ भी तरह-तरह की होती- जैसा पाद वैसी आवाज़। वे हमें पाद-कला की बारीकियाँ बताते। हँसते-हँसते हमारे पेट में बल पड जाते।
और फिर एक दिन हउआजी मर गए। मैंने पहली बार जाना कि मरना क्या होता है ! हमें उस घर में जाने से मना किया गया था, लेकिन खेलते वक्त ये ध्यान कहाँ रहता था। हमारी तो आदत थी, घरवालों की सीख भूलकर हम उस घर में घुस जाते।
अब हउआ जी की पौरी सूनी थी। आँगन में फर्श बिछा होता एक चौकी पर उनकी तस्वीर रखी रहती। फर्श पर लोग आकर बैठ जाते। कोई कुछ नहीं बोलता था। फिर वे चले जाते।
कुछ इस तरह की खामोशी यहाँ हॉल में भी थी। हउआजी की याद अभी मेरे मन में ताज़ा थी। सब को गुमसुम देखकर मैंने पूछ ही लिया -बाऊजी कोई मर गया है क्या ?
हाँ बेटा ! तेरा चाचा मर गया है। बाऊजी ने कहा तो मैं हैरत में पड गया। चाचा तो सामने खडे थे।
दोनों वक्त मिले ऐसी अशुभ बातें मुँह से क्यों निकालते हो जी। अइया जी ने रुआँसे स्वर में कहा।
और क्या कहूँ। अनपढ औलाद से बेऔलाद होना अच्छा। बाऊजी ने तटस्थ भाव से कहा।
बात क्या है बाऊजी? ताऊजी ने पूछा।
बात ये है विश्नू उन्होंने चाचा की तरफ इशारा कर कहा- साहबज़ादे कॉलेज छोड बैठे हैं। इनके सिर पर देशभक्ति का भूत सवार है। कहते हैं गाँधीजी का फरमान है।
देबू ! चाचा की तरफ मुडकर ताऊजी ने कहा-मैं यह क्या सुन रहा हूँ........न तो हमारे पास खेती-बाडी के लिए ज़मीन है और न बिज़नेस करने के लिए पूँजी है। ये काम हम लोग कर भी नहीं सकते। हमें सिर्फ नौकरी का सहारा है और इसके लिए आगे पढना ज़रूरी है।
बडे भैया बेअदबी की मुआफी चाहता हूँ, लेकिन मैं कॉलेज नहीं जाऊँगा। आप इस मामले में मुझसे ज़द न करें तो बेहतर है।
मैं ज़द नहीं कर रहा हूँ। मैं तो तुझे समझा रहा हूँ, पगले ! अपने हरि भैया को देख। पिताजी को इंगित कर उन्होंने कहा- इसकी सरकारी नौकरी है। आज मजिस्ट्रेट का पेशकार है, कल को तरक्की होगी तो नाज़र भी बनेगा। शहर में इसकी इज्जत है और इसकी वजह से हमारी इज्जत है....तू पढ-लिख कर अफसर बना तो खानदान की इज्जत में इज़ाफा ही होगा।
इज्जत ! इज्जत में इज़ाफा !! क्या बात कर रहे हैं भैया? हम लोग मुखबिर की हवेली के बाशिंदे हैं। दुनिया जानती है यह हवेली हमारे पुरखों को मुखबिरी करने के एवज़ में अंग्रेजों से बतौर ईनाम मिली थी.... सदियों पहले किसी धर्मेश्वर दयाल निगम ने यह कारनामा किया था। आप लोगों से ही सुना है कि अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें रायबहादुर का खिताब भी अता फरमाया था। लोग रायबहादुर के खिताब को भुला बैठे। उन्हें सिर्फ यह याद रहा कि वे अंग्रेजों के मुखबिर थे। कितनी शर्मनाक बात है? हमारे पुरखे मुखबिर थे और हम आज तक उनका पाप ढो रहे हैं।
चाचा की बातें सुनकर पिताजी भडक गए- अपने बुजुर्गों के बारे में ऐसी बातें करते तुझे शर्म आनी चाहिए। उस ज़माने के हालात, हमें क्या मालूम ? बुजुर्गों को तब जो ठीक लगा, वही उन्होंने किया। आज उन्हीं की बदौलत हम इस शहर की शानदार हवेली के वारिस हैं।
माफ कीजिये भाई साहब, हम लोग हवेली के अकेले वारिस नहीं नहीं हैं। अगर मुमकिन होता तो हवेली अब तक बिक गई होती और हम लोग इतनी मुफलिसी में नहीं होते.....हमारे ज्यादातर खानदानी दूसरे शहरों में जा बसे हैं। हवेली का पिछला हिस्सा ढह गया है। क्या आप नहीं जानते इन खण्डहरों में लोग सुबह-शाम फारिक होने आते हैं। पीछे वाले अहाते और आँगन में आवारा जानवर लोट लगाते हैं। बरामदों की दीवारों में सूअरों ने खोंण बना लिए हैं। क्या शानदार हवेली है! पीछे सूअरों का कुनबा, आगे हम!! ..मुखबिर साहब की औलादें !!! चाचा ने घृणा भरे स्वर में कहा।
हॉल में चुप्पी छा गई। चाचा की बातें शायद सही थीं लेकिन थीं बहुत कडवी। किसी ने उनसे ऐसी बातें सुनने की आशा नहीं की होगी। ज़ाहिर है सभी लोग परेशान ही नहीं हैरान भी थे।
अइया जी मसहरी के पायताने बैठी थीं। वह बहुत शांत स्वभाव वाली थीं। अक्सर माताजी का ताई से छोटी-छोटी बातों पर झगडा होता रहता था। झगडे की वजह हम बच्चे होते थे। बच्चों के झगडे में बात बढ जाती और दोनों के बीच अबोला ठन जाता। अइया जी इस सबसे अनजान रहतीं। उन्हें खबर तब होती जब हम बच्चों में से कोई जाकर उन्हें झगडे की बात बताता। सुनकर वह चुप लगा जाती थीं लेकिन चाचा की बातें सुनकर वह चुप न रह सकीं। उन्होंने कहा- देबू, बडे भाइयों से इस तरह पेश आते हैं ? तुम्हारे भाइयों ने आज तक बाऊजी के सामने मुहं नहीं खोला और एक तुम हो, भाइयों से जुबानदराज़ी किए जाते हो।
अइयाजी मैंने कोई ज़ुबानदराज़ी नहीं की है। जो कहा, वह सच नहीं है क्या? -उन्होंने दबी ज़ुबान से कहा।
वह सब मैं नहीं जानती। कल से तुम कॉलेज जाओगे। समझ गए न?
अपनी बात पर जोर देते हुए अइया जी ने दुबारा कहा- सुना तुमने? तुम कॉलेज जाना जारी रखोगे।
जी! चाचा ने सिर हिलाकर सहमति जता दी।
तभी संतो जीजी हॉल में आईं। सभी को वहाँ मौजूद देखकर वह लौटने को हुईं। दरवाज़े पर खडे होकर उन्होंने चाचा को बुलाने का इशारा किया। मैं मसहरी से कूद कर भागा। मेरा ख्याल था कि वह उनसे मेरी शिकायत करने आई होंगी।
छज्जे पर खडी जीजी ने चाचा को शबाना दी का नाम लेकर कुछ कहा था। पूरी बात मेरी समझ में नहीं आ सकी। वह लौट गईं और मैं चाचा के साथ हॉल में वापस आ गया।
माफ कीजिएगा, मुझे एक ज़रूरी मीटिंग में जाना है। इतना कहकर वे हॉल से बाहर निकल गए।
जुलाई महीने की रात थी। खूब ज़ोरों का पानी बरस रहा था। बिजली गुल हो जाने से कमरे में लालटेन जल रही थी। चाचा अभी तक नहीं आए थे। चौके का काम निपटा कर माताजी कमरे में आ गईं। आतिशदान के ऊपर रखी लालटेन की बत्ती को उन्होंने नीचे कर दिया। मेरी चारपाई पर लेटकर उन्होंने मुझे चादर उढा दी। मैं उनसे चिपका हुआ था। वह मेरे लम्बे बालों में उंगलियाँ फिराती रहीं। न जाने कब मुझे नींद आ गई।
अगले दिन इतवार था। स्कूल की छुट्टी थी। मैं कमरे में खेल रहा था। जीजी की चोटी बनाते हुए माताजी कह रहीं थीं- हउआजी के घर जाना बंद कर दे। इस कमबख्त शबाना ने तेरे चाचा को बिगाड कर रख दिया है। मुझे डर है वह चुडैल कहीं तुझे भी उल्टी-सीधी पट्टी न पढा दे।
आप उन पर क्यों नाराज़ होती हैं? जीजी ने कहा- वे सभा-सोसायटी में जाती हैं। देश सेवा करती हैं तो इसमें गलत क्या है। चाचा अपनी मज़ीर् से कांग्रेस में गए हैं। कांग्रेस देश की आजादी के लिए लड रही है। गाँधीजी कहते हैं इस लडाई में औरतों को भी आगे आना होगा।
औरतें धरना और जुलूस में जाने लगीं तो घर-गृहस्थी कौन संभालेगा?......दरअसल गलती शबाना की नहीं, माँ-बाप की है। बेटी जवान है और वे लोग आंखे बंद किए बैठे हैं। इतना कहकर माताजी चौके में चली गईं।
दोपहर को कांग्रेस पार्टी का जुलूस निकला। जुलूस में शामिल वालिंटियर जोशीले नारे लगाते चल रहे थे। हवेली के झरोखे में खडे हम लोग तमाशा देख रहे थे। जीजी ने भीड की तरफ इशारा करते हुए कहा- देख ! वह रहे चाचा।
कहा हैं? मैंने पूछा। मुझे वह दिखाई नहीं दे रहे थे।
वहाँ, उस तरफ .......देख......पीछे। उन्होंने हवा में हाथ घुमाते हुए कहा।
मुझे चाचा दिखाई दे गए। वे भीड से निकलकर सडक किनारे आ गए। हमें देखकर उन्होंने हाथ में लिए झंडे को कई बार लहराकर दिखाया। हम लोगों ने हाथ हिलाकर उनका खैर मकदम किया। अइया और बाऊजी ने भी उन्हें देख लिया था। धीरे-धीरे जुलूस आगे बढ गया और हम झरोखे से उतर कर भीतर आ गए।
देर शाम तक चाचा घर नहीं लौटे। रात को खबर मिली कि सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। यह सुनकर घर में मातम छा गया। घर के सब लोग हॉल में जमा थे। अइयाजी रो रहीं थीं। बाऊजी ने खाना नहीं खाया था। पिताजी ने उन्हें भरोसा दिलाया कि कल वे चाचा को जेल से रिहा करवा लाएँगे। जैसे-तैसे रात कट गई।
अगले रोज़ मैं स्कूल नहीं गया। उस दिन हमारे घर पर बहुत-से लोग आए। वे चाचा की गिरफ्तारी पर अफसोस जता रहे थे। दोपहर तक नजदीकी रिश्तेदारों को छोड कर बाकी लोग चले गए। उस दिन पिताजी दफ्तर नहीं गए। पहले चाचा को रिहा करवाना ज़रूरी था।
मैंने सुन रखा था कि पुलिस जिन्हें पकड कर ले जाती है उनकी जेल में खूब पिटाई करती है। चाचा को याद करके मैं सारे दिन गुमसुम-सा रहा। शाम को जब माताजी चौके में थीं, मैंने पूछा चाचा को पुलिस ने जेल में क्यों बंद किया है?
तेरे चाचा ने कानून तोडा है इसलिए परात में आटा छानते हुए उन्होंने कहा।
कानून क्या होता है ?
मेरा सिर मत खा। उसे जब आना होगा आ जाएगा। ये लडका न खुद चैन से रहता है, न हमें रहने देता है।
जेल में क्या बहुत मार पडती है ?
अरे नहीं रे ! कॉलेज जाने से बचने के लिए वह जानबूझ कर जेल गया है। तेरे पिताजी गए थे उसे छुडाने। सरकार तो आज ही छोड देती पर वह माफी माँगने को तैयार ही नहीं हुआ। माताजी ने कहा- तेरे पिताजी हॉल में बाऊजी के पास बैठे हैं। उनसे कहना खाना तैयार है। मैं उन्हें बुलाने चला गया।
कई दिनों तक चाचा घर नहीं आए। मैंने स्कूल जाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे मैं उन्हें भूलने लगा। घर में उनकी चर्चा बहुत कम होती। बाऊजी हमारे सामने अइयाजी से उनकी बातें नहीं करते थे फिर भी एक दिन मैंने सुन ही लिया। चाचा को छः महीने की सज़ा हुई थी।
नया साल लग चुका था। जनवरी का महीना और कडाके की ठण्ड थी। मैं स्कूल की छुट्टी के बाद घर आया, तो देखा चाचा हॉल में बाऊजी के पास बैठे थे। ताऊ-ताई के अलावा, माताजी-पिताजी और कडी बहनें भी थीं। मैं दौडकर चाचा से लिपट गया। जैसा कि उनकी आदत थी, वे कंधे पर बिठाकर मुझे घुमाने लगे। उनके आने से यूं तो सारा घर खुश था, लेकिन मेरी खुशी बेहिसाब थी। ये पतंगों का मौसम था। उनके बिना मैं पतंगबाजी से महरूम था। अब वे आ गए थे। पतंग उडाने से अब मुझे कौन रोक सकता था।
मकर-संक्रांति का पर्व था। बाऊजी व औरतों को छोडकर हमारा पूरा घर छत पर पतंगबाजी का लुत्फ उठा रहा था। आस-पास की छतें भी लोगों से भरी थीं। पूरा शहर ही जैसे छतों पर उमड आया था।धीमी-धीमी हवा और कुनकुनी धूप से मौसम खुशहाल बना हुआ था। आकाश में चारों ओर पतंगें ही पतंगे दिखाई दे रहीं थीं। पतंगों के पेंच लड रहे थे। शह देकर पेंच लडाना आम बात थी। चाचा को यह तरीका पसंद नहीं था वे खेंचामार स्टाइल से पेंच लडाते। इस स्टाइल में दूसरी पतंग के ऊपर अपनी पतंग को लाया जाता फिर उसे नीचे घुमाकर बहुत तेज़ी से खींचा जाता था। चार-पाँच हाथ खींचते ही झटके में पतंग कट जाती। पेंच लडाते वक्त उनका ये हुनर देखते ही बनता था। वे एक पतंग से आठ-दस पतंगें काट डालते।
छतों पर ये काट्टा......वो काट्टा.....का शोर था। थालियों में भर-भर कर दाल के गरम-गरम बडे-मंगौडे ऊपर छत पर भिजवाए जा रहे थे। कभी एक थाली ताई के यहाँ से आती तो कभी दूसरी थाली माताजी भिजवातीं। मर्द और बच्चों को खुश रखना घर की औरतों का काम था और वे अपना फज़र् निभा रही थीं।
त्यौहारों पर त्यौहार निकलते गए। मैं दर्जा पाँच पास कर मिडिल स्कूल में दाखिल हो चुका था। पढने में मेरा मन खूब लगता था। चाचा हालांकि कॉलेज छोड चुके थे, लेकिन उनकी आल्मारी किताबों से पहले से ज्यादा भरी हुई थी।
मुझे चाचा बदले-बदले से लगते। हमारे खेल-कूद में अब वे कम शामिल होते। कभी-कभी तो दिन भर गायब रहते। कई बार खाना खाने भी नहीं आते। अइया जी पूछतीं तो कहते-मैंने पार्टी ऑफिस में खा लिया था। घर में होते तो किताबें पढते रहते।
अगस्त का महीना शुरू हुआ ही था। वे बिना बताए घर से कहीं चले गए। रात को भी नहीं लौटे तो पिताजी ने मुझे हउआजी के घर भेजा। मैंने लौट कर बताया, शब्बो दी भी कल से घर नहीं आई थीं। उस दिन घर में बडा बावेला मचा। बाऊजी ने शबाना दी के अब्बू को बुलवा लिया। वे सवाई मानसिंह अस्पताल में डॉक्टर थे।
थोडी देर बाद डॉक्टर साहब आए-सईदा ताई साथ थीं। हॉल में घर के सभी लोग उनका इंतज़ार कर रहे थे। उनके आने पर बच्चों को बाहर भेज दिया गया।
डॉक्टर साहब को ड्यूटी पर जाना था इसलिए शायद बातचीत जल्दी खत्म हो गई। वे दोनों बाहर निकले। मैं आँगन में खेल रहा था। मैंने देखा डॉक्टर साहब कुछ बडबडा रहे थे। उनके पीछे आ रही सईदा ताई साडी के पल्ले से अपने आँसू पोंछ रही थीं।
अगस्त की उमस भरी रात थी। मैं छत पर जीजी के पास लेटा था। माताजी नीचे चौके में खाना बना रहीं थीं। छत पर हम दोनों ही थे। जीजी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा- किसी से कहना नहीं। शबाना अपने चाचा को भगा कर ले गई है।
अरे आप शब्बो दी का नाम ले रही हैं? मैंने अचरज से कहा।
काहे की शब्बो दी। मैट्रिक क्या पास कर लिया सारी शर्म-हया घोलकर पी गई है। -जीजी अब माताजी की भाषा बोल रहीं थीं।
मैं ग्यारह साल का हो चुका था और इस तरह भगा ले जाने का मतलब समझने लगा था। आवारा लडके भोली-भाली लडकियों को भगा ले जाते हैं यह तो मैं जानता था, लेकिन कोई लडकी किसी लडके को भगा ले जाए, यह बात मेरी समझ के बाहर थी। मैंने कहा- हो सकता है चाचा ही उन्हें भगा कर ले गए हों।
तू उसे नहीं जानता। वह कोई मासूम लडकी नहीं है। पता है, इसकी वजह से हमारी कितनी बदनामी हो रही है? उस दिन माताजी सही कह रहीं थीं। अब पता चला यह वाकई बहुत वाहियात लडकी है। संतो... - माताजी ने जीने में आकर आवाज़ दी तो वह उठ खडी हुईं। जाते हुए उन्होंने ये बातें किसी को न बताने की ताकीद की।
घर में कुछ दिन मायूसी छाई रही। तकरीबन एक हफ्ते बाद चाचा लौट आए। शबाना दी पर क्या गुज़री मैं नहीं जानता, लेकिन हमारे यहाँ खूब हंगामा हुआ। नालायक, नामाकूल, पाजी, रास्कल, इडियट.....बाऊजी के शब्दकोष की गालियाँ थीं जिनकी बौछार वे चाचा पर कर रहे थे। कभी पिताजी कोई चुभती-सी बात कह देते तो कभी ताई या माताजी उन्हें लपेटने लगतीं।
झरोखे की दीवार से सटकर खडे चाचा सारी लानतें चुपचाप झेलते रहे। काफी उकसाए जाने पर भी उन्होंने किसी बात का जवाब नहीं दिया। हार-झख मारकर ताई वगैरह हॉल से चली गईं।
शाम को चाचा छत पर लेटे कोई किताब पढ रहे थे। मैं उनके पास लेट गया। उन्होंने किताब बंद कर दी और मुझसे पढाई-लिखाई के बारे में पूछने लगे। सारी बात बताकर मैंने कहा- चाचा अब आपको इम्तिहान में तो बैठना नहीं है। फिर आप इतनी किताबें क्यों पढते हैं।
सिर्फ इम्तिहान के लिए ही नहीं पढा जाता। किताबें इल्म का खज़ाना होती हैं। उनसे हमारी समझ बढती है। मैं तो कहता हूँ तू अभी से पढने की आदत डाल ले। शबाना को देख कितनी काबिल लडकी है।
मेरे मन में छिपा जिन्न उछलकर एकाएक मेरी ज़ुबान पर आ गया। मैंने पूछा- शबाना दी आपको कहाँ भगाकर ले गईं थीं ?
गलत ! वह मुझे भगाकर नहीं ले गई थी।
तो आप उन्हें भगाकर ले गए थे ?
बिलकुल गलत ! किसने ऐसी फिज़ूल बातें तेरे दिमाग में डाल दी हैं ? कोई किसी को भगाकर नहीं ले गया था। बम्बई में कांग्रेस का अधिवेशन था। हम दोनों के अलावा काफी लोग गए थे। शबाना तो अपने घर पर कहकर गई थी। मुझसे गलती यह हुई कि मैं बिना कहे चला गया था। कहकर जाता तो अइयाजी मुझे हरगिज़ बम्बई नहीं जाने देतीं। मैंने लौटकर उनसे माफी माँग ली है।
चाचा क्या आपने उनसे शादी कर ली है ?
वह ज़ोर से हँस पडे। मेरी पीठ पर धौल जमाकर बोले- अबे गधे ! शादी कर ली होती, तो लौटकर जयपुर क्यों आते? बिना कुछ बात के तो इतना हंगामा हो गया। शादी कर लेते तो जूते खाकर यहाँ से निकाले जाते।
मेरा भी यही ख्याल था लेकिन जीजी मेरी बात मानती न थी। मैंने अपनी सफाई देते हुए कहा।
संतोष का कुसूर नहीं है। वह अभी बच्ची है, जैसा उसने बडों से सुना वही उसके दिमाग में बैठ गया।... खैर अब तू मुझे पढने दे। मुझे आज किताब खत्म कर शबाना को लौटानी है। यह कहकर उन्होंने किताब उठा ली। मैं उन्हें पढता छोड नीचे आ गया।
देश में आजादी की लडाई चरम पर थी। फिज़ा में अंग्रेजों भारत छोडो का नारा गूँज रहा था। गाँधीजी के करो या मरो के सन्देश ने देश में उथल-पुथल मचा दी थी। चाचा भी रात-दिन सियासी हलचल में मसरूफ रहने लगे। दिवाली से पहले उन्हें सरकार ने गिरफ्तार कर, पता नहीं किस जेल में भेज दिया।
हवेली में हमारे यहाँ सभी त्यौहार अइया-बाऊजी की छत्र-छाया में मनाए जाते थे। इस बार की दिवाली पर घर का जवान बेटा जेल में था। दिवाली की चमक हमारे चेहरों से गायब थी। खील-बताशे, मिठाई, जुए की रस्म, अज्जा-झाज़ा, पटाखे, रोशनी वगैरह सारी रस्में उठाकर बालाए ताक रख दी गई। पूजन के नाम पर लक्ष्मी-गणेश को रोली के छींटे देकर हम लोग उठ गए। कडी मुश्किल से अइया-बाऊजी को खाना खिलाया गया।
दिन, महीनें और साल गुज़रते गए। मैं हाई-स्कूल पास कर चुका था। देश और दुनिया में हुए बदलाव के साथ हमारे घर में भी काफी बदलाव आ चुका था। सन् चवालीस में आए भूकंप से हवेली में दरारें तो पहले ही आ चुकी थीं। अब ताऊजी के हिस्से वाली दीवार ढह गई। छज्जे के कई पत्थर निकल गए जिससे वह हिस्सा हवेली से अलग हो गया। ठीक उसी तरह जैसे कि आज़ादी के बाद पाकिस्तान अब भारत से टूटकर अलग मुल्क बन गया था।
आज़ादी मुल्क का बँटवारा साथ लेकर आई थीं। दोनों तरफ के हजारों परिवार नेस्तनाबूद हो गए। लाखों बेगुनाहों का बेरहमी से कत्ल कर दिया गया था। बहुत- से मुसलमान भागकर पकिस्तान चले गए। डॉक्टर ताबिश हुसैन, सईदा ताई और शबाना दीदी भी एक दिन पकिस्तान के लिए निकल गए।
मुल्क की तरह हमारा परिवार भी सिकुड गया था। अइया और बाऊजी गुज़र चुके थे। बहनों की शादियाँ हो गईं। ताऊजी, ताई और उनके दो बेटे, हमारे पोर्शन में शिफ्ट हो गए। पिताजी ने एक नई बसी कॉलोनी में मकान खरीद लिया था। चाचा हवेली के अपने बाऊजी वाले पोर्शन में टिके थे। आजादी मिलने से पहले ही उन्होंने कांग्रेस से नाता तोड लिया था। अब वे कम्युनिस्ट पार्टी के होलटाइमर थे। उनका ज्यादातर वक्त पार्टी के कामों में गुज़रता था।
होली-दिवाली जैसे बडे त्यौहार पर हम हवेली आ जाते। वह बडा घर था क्योंकि ताऊ-ताई जी वहाँ रहते थे। त्यौहार पर बचा-खुचा परिवार इकठ्ठा हो जाता। बीते दिनों की यादें ताज़ा कर ली जातीं। त्यौहार कर हम अपने घर लौट आते।
जब हम नए घर में आए तब शुरू में मेरा मन यहाँ नहीं लगता था। कहाँ गणगौरी बाज़ार इलाके की घनी आबादी और कहाँ इस नई बसी कॉलोनी में फैला सन्नाटा। गाहे-बगाहे मैं हवेली पहुँच जाता। चाचा कभी दरवाज़े पर ताला नहीं लगाते थे क्योंकि बाजू वाले पोर्शन में ताऊजी का परिवार था। हॉल का दरवाज़ा बाहर से बंद होने का मतलब था चाचा घर में नहीं हैं। मैं तो वहाँ आता ही उनकी वजह से था। उनकी गैरमौजूदगी मुझे मायूस कर देती। धीरे-धीरे मेरा हवेली जाना तकरीबन बंद हो गया।
सन् सत्तावन का साल उथल-पुथल भरा रहा। देश में दूसरे चुनाव हुए। नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत हासिल किया। कम्युनिस्ट पार्टी की लोकसभा सीटें सोलह से बढकर सत्ताईस हो गईं। कांग्रेस के तीन सौ इकहत्तर के मुकाबले यह काफी कम थीं, लेकिन लोकसभा के नतीजों से हमारे देबू चाचा खुश थे। उन्हें यकीन था कि आने वाले वक्त में यहाँ किसान-मजदूरों की सरकारें बनेंगीं।
मेरी निजी ज़न्दगी में भी इस साल ने अजीब गुल खिलाए। अक्तूबर के महीने में मुझे राजस्थान यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति मिली। एमएससी में दो साल पहले कर चुका था। तब इसे राजपूताना यूनिवर्सिटी कहा जाता था। मेरे दो साल पीएच.डी के रजिस्ट्रेशन में बर्बाद हुए थे।
मैं जिस सब्जेक्ट पर रिसर्च करना चाहता था, सुपरवाइजर उस कांसेप्ट से असहमत थे। साल भर हमारे बीच बहसें होती रहीं, लेकिन में उन्हें कन्विंस नहीं कर सका था। इस दरम्यान चाचा का घर आना हुआ। बातों-बातों में मैंने समस्या उन्हें बताई। अगले रोज़ जर्मनी से प्रकाशित एक साइंस मैगज़ीन देते हुए उन्होंने कहा कि मैं अपना रिसर्च पेपर प्रकाशन के लिए यहाँ भेज दूं। मैंने पेपर तैयार किया और इस पत्रिका को भेज दिया।
अगले महीने मेरी शादी हो गई। पिताजी इकतीस जुलाई को रिटायर हो चुके थे। घर में खुशी का माहौल था। माताजी-पिताजी खुश थे ही, चाचा उनसे भी ज्यादा खुश नज़र आते थे। मुँह दिखाई की रस्म में वे उर्मि के लिए किताबों का एक सैट लाए थे। खुशियों की खुमारी अभी उतरी भी न थी कि एक हादसे ने सारी खुशियों पर पानी फेर दिया।
दरअसल अन्नू दी के देवर की शादी में शामिल होने के लिए माताजी-पिताजी लखनऊ गए थे। लौटती दफा भयानक एक्सीडेंट हुआ। सैंकडों लोग मारे गए। वे दोनों भी मरने वालों में शामिल थे।
इस भयानक हादसे ने मुझे भीतर तक हिला दिया। माता-पिता सदा किसके बैठे रहे हैं ? जाना तो उन्हें भी था, लेकिन वे असमय गए थे। उनके क्षत-विक्षत देह की वीभत्स तस्वीर मन से न उतरती थी। शादी को अभी एक महीना भी नहीं हुआ था। कुछ बेवकूफ लोगों ने उर्मि को लेकर अभद्र बातें कह दीं। यह लोग हमारे रिश्तेदार ही थे। चाचा के कानों में बात आई तो वे बहुत बिगडे। उसके बाद उर्मि को अपशब्द कहने का साहस कोई न कर सका।
हवेली छोडकर चाचा कुछ समय के लिए मेरे पास आ गए। यह हम दोनों के लिए सुकून की बात थी। धीरे-धीरे ज़न्दगी की गाडी वापस पटरी पर लौटने लगी। सुबह नाश्ता कर मैं यूनिवर्सिटी निकल जाता। चाचा का कोई टाइम-टेबल नहीं था। आमतौर पर मुझसे भी पहले घर से निकलते और देर रात गए घर लौटते। उनके लौटने तक हम दोनों खाने की टेबल पर उनका इंतज़ार किया करते।
माँ-पिताजी को गुज़रे एक साल हो चुका था। उनकी बरसी हो चुकी थी। चाचा थे पक्के नास्तिक, लेकिन माताजी-पिताजी के तेरहवीं से लेकर छमाहीं-बरसी तक के अनुष्ठानों का उन्होंने कभी विरोध नहीं किया। अब वे हवेली वापस लौटना चाहते थे। हम दोनों ने उन्हें रोकने की काफी कोशिश की लेकिन हम रोक नहीं सकते थे। उनका स्वभाव ही ऐसा था। हमें प्यार से रहने की नसीहत देकर वे चले गए।
अगले रोज़ यूनिवर्सिटी से लौटने पर उर्मि ने बधाई देते हुए वह मैगज़ीन मुझे दी जिसमे मेरा रिसर्च पेपर छपा था। उस पर एक सरसरी नज़र डालकर मैंने साइकिल उठाई और हवेली जाने की कहकर मैं भाग छूटा।
यह इत्तेफाक ही था कि चाचा मुझे हवेली के बडे हॉल में मिल गए। मैगज़ीन उन्हें थमाकर मैं उनके कदमों में झुक गया। उन्होंने मुझे बाहों में भरकर उठाया और सीने से लगा लिया। मेरी आँखों में अविरल आँसुओं की झडी लग गई। काश अभी माताजी-पिताजी जीवित होते। वे ही क्यों अइया-बाऊजी भी होते.......। मेरे मनोभावों को वे समझ गए। पीठ पर थपकियाँ देकर उन्होंने मुझे चुप किया जैसा कि वे मेरे बचपन में करते थे।
मैं करीब दो-ढाई घंटे हवेली में रहा। ताई का परिवार भी हॉल में आ गया। मुझे शाबासी देकर ताऊ-ताईजी चले गए। मैं चाचा से अपने करियर की चर्चा करता रहा। उनका कहना था कि यूरोप या अमेरीका की किसी यूनिवर्सिटी से मुझे जल्दी ही कोई फेलोशिप या प्रोजेक्ट मिलने वाला है। मुझे खुद भी यह लग रहा था। उनकी बातों से मेरा होंसला काफी बढ गया।
महेंद्र, आज मैं बहुत खुश हूँ। अहमियत पोस्ट या पैसे की नहीं है। वह तो तेरे पास यहाँ भी है। यूरोप या अमेरीका जाकर तू साइंस की बेहतर स्टडी कर सकेगा। तेरी रिसर्च से अगर साइंस में बाल भर भी इज़ाफा होता है तो यह बडी बात होगी। इतना कहकर वह कडाई में मछली के पीस फ्राई करने लगे। उस रात मैं उनके साथ खाना खाकर घर लौटा।
तीन महीनें और गुज़र गए। मैं कुछ अच्छी खबर मिलने की उम्मीद में रोज़ डाक का इंतज़ार करता रहा। आखिरकार मेरे सपने सच होने का दिन आ गया। केलिफोर्निया इंस्टिट्यूट ने मुझे पाँच साल की फेलोशिप दी थी। मेरी उम्मीदों को नए पंख लग गए। मैंने राजस्थान यूनिवर्सिटी की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। चाचा से विदा लेकर मैं और उर्मि अमेरिका आ गए।
.......और अब तीस साल बाद जयपुर लौटा हूँ। ये शहर और यहाँ के लोग कभी मेरे अपने हुआ करते थे। चांदपोल पर शंकर पंसारी की दुकान होगी या नहीं? मिसरी-लाल - जिसकी पान की दुकान छोटी चौपड पर थी और उससे मैं अइयाजी के लिए खाली पान लेकर आता था - अब शायद जीवित ही न हो। बापू बाज़ार में पंडित जी पतंग वाले की मशहूर दुकान थी। हम भी उस दुकान से पतंगें-माँझा खरीद कर लाते थे।
गुजरा हुआ बचपन शिद्दत के साथ ज़ेहन में उभरता रहा। असंख्य स्मृतियाँ हैं और अनगिनत चेहरे......एक चेहरा चाचा का था जो बार-बार उभर रहा था। ताई-ताऊ के देहांत की खबर उन्होंने दी थी, लेकिन घोर व्यस्तता के कारण मैं जयपुर नहीं आ सका था। मुझे तो खत लिखने की आदत ही नहीं थी, धीरे-धीरे चाचा के भी पत्र आने बंद हो गए। बीस-बाईस साल से हमने एक-दूसरे की खबर-सुधि नहीं ली थी। यदि इस कांफ्रेंस में भाग लेने का मौका नहीं मिला होता तो मैं शायद कभी जयपुर नहीं आता।
सज़र की थकान उतारकर मैं बैड छोडकर उठ बैठा। बैरे से कॉफी मँगवाई। शाम के पाँच बजने को थे। तैयार होकर मैं होटल से बाहर निकला। सामने जयपुर का रेलवे जंक्शन था। स्टेशन के बाहर रिक्शे-तांगे-ऑटो वगैरह खडे थे। मैंने एक रिक्शा-पुलर को बुलाकर कहा- मुखबिर की हवेली चलना है।
ये कहाँ है साहब? सिर पर लपेटे मफलर को खोलते हुए उसने कहा।
मुझे कुछ अजीब लगा। कैसा रिक्शा-पुलर है। जयपुर में रिक्शा चलता है और मुखबिर की हवेली नहीं जानता।
आप बैठो साब ! रिक्शे की गद्दी पर हाथ मारकर उसने कहा - आप बता देना....मैं आपको लेकर चलता हूँ।
नहीं, मैं दूसरा रिक्शा कर लेता हूँ - यह कहकर मैं आगे बढ गया। पास में खडे एक दूसरे रिक्शे पर बैठकर मैंने कहा- मुखबिर की हवेली।
मुखबिर की हवेली ! मुझे तो नहीं मालूम...... कौनसी रोड पर है..... रिक्शा खींचने के लिए वह पैडल मारने वाला था कि मैं रिक्शे से उतर गया।
क्या हुआ साब। मैं चल तो रहा हूँ.....आप जी में आए सो दे देना। उसने चिल्ला कर कहा तो मुझे शर्म महसूस हुई। आप-पास खडे लोग सोचते होंगे कि मैं उससे भाडे की सौदेबाज़ी कर रहा था।
मैं एक ताँगे की तरफ बढ गया। पहले भी ताँगे सिन्धी कैंप, चांदपोल होते हुए चौपड तक जाते थे। मैंने कहा- मुझे मुखबिर की हवेली जाना है?
वह कुछ क्षण मुझे उजबक की तरह देखता रहा फिर उसने वही सवाल किया जो रिक्शा-पुलर कर चुके थे। तंग आकर मैंने कहा- छोटी चौपड तो देखी है? मुझे गणगौरी बाज़ार जाना है और मैं ताँगे का पूरा भाडा दूँगा।
वह तुरंत तैयार हो गया। ताँगे की पिछली सीट पर बैठकर मैं उन रास्तों और दुकानों में पुराने परिचय के सूत्र खोजने लगा। ज़यादातर दुकानों में बडे-बडे शोरूम खुल गए थे। बाजारों में काफी भीड-भाड थी। पैदल चलने वाले लोग कम ही थे। फुटपाथों पर रखे सामान ने बाजारों को संकरा कर दिया था। एक ही सडक पर रिक्शे, तांगे, टेम्पो, टैक्सी, मिनी-बस, ऊँट-गाडे बेतरतीब दौ? रहे थे।
गणगौरी बाज़ार पहुँचकर मैंने ताँगा रुकवाया। मैं उतरा तो उसने कहा- आप इस हवेली की कह रया छ काईं? या तो कॉमरेड देबू की हवेली छै।
यह सुनकर मैं हतप्रभ रह गया। मैंने उससे पूछा- तू जानता है उन्हें ?
अरे साब जी, वै तो म्हांकी यूनियन का लीडर छै। आप तो पैले ई बोल देता, कॉमरेड की हवेली जाणों छै।
मुखबिर की हवेली अब कॉमरेड की हवेली कहलाने लगी थी। यह मेरे लिए सुखद आश्चर्य था- कॉमरेड और हवेली! यह दो शब्दों की विसंगतियों का अद्भुत संयोग था। मुझे मन ही मन हँसी आ गई। ताँगे का भाडा देकर मैं हवेली में दाखिल हुआ।
मेरा दिल धडक रहा था। जीने से चढकर मैं ऊपर हॉल के सामने आ गया। मेन गेट बंद था। मैंने धीरे से खटखटाया।
कौन है? गेट खुला है.......अन्दर आ जाओ। ये चाचा थे। पहचान के लिए आवाज़ काफी थी। मैंने हल्का-सा पुश कर गेट खोला। वे बाईं तरफ मसहरी पर ओवरकोट पहने बैठे थे। मैंने आवेश में चिल्लाकर कहा- चाचा।
मेरी आवाज़ सुनकर वे खडे हो गए। मुझे क्षणभर घूर कर देखा......और बाहें मेरी तरफ फैला कर बोले - महेंद्र।
मैं उनकी और वे मेरी बाँहों में थे। इस भावुक क्षण में हमारे कंठ अवरुद्ध हो गए थे। फिर उन्होंने ही कहा- अरे महेंद्र! कैसा है रे तू? कब आया? अकेला आया है? बहू-बच्चे कैसे हैं......? उन्हें क्यों नहीं लाया....? उन्होंने सवालों की झडी लगा दी।
बताता हूँ। साँस तो लेने दीजिए। मैं तो आया ही आपकी वजह से हूँ। मैंने कहा तो वे मुतमईन होकर मसहरी पर पैर मोडकर बैठ गए जैसे कि बाऊजी बैठा करते थे। वहीं से आवाज़ लगाकर उन्होंने कहा - दीपा, देखो तो कौन आया है ? किचिन से निकल एक बुज़ुर्ग औरत हॉल में आई। उनका कद मंझोला रंग साँवला और चेहरा गोल था। कडी-कडी आँखें.....तरलता लिए हुए जिनसे स्नेह की धारा फूट-सी रही थी। वह नज़दीक आई तो चाचा ने फिर कहा- देखो तो कौन आया है ?
महेंद्र! उन्होंने मुस्कुराकर कहा। मैं हतप्रभ-सा खडा उन्हें पहचानने की कोशिश करता रहा। लगता था जैसे पहले उन्हें कहीं देखा था; कब और कहाँ? दिमाग पर बहुत जोर देने पर भी याद नहीं आया। उन्हें लेकर मन में भारी कौतूहल पैदा हो गया।
माई वाइफ.....दीपा....
वंडरफुल! आप तो सरप्राइज़ पर सरप्राइज़ दिए जा रहे हैं। मैंने उमंग में हुलस कर कहा।
वह हँस कर बोले - सरप्राइज़ ! दीपा यू आर अ सरप्राइ? गिफ्ट टू महेंद्र !
मैंने उनके पाँव छूकर कहा लेकिन चाची आपने पहले मुझे कभी देखा नहीं फिर पहचाना कैसे? पिछांणूगी क्यूं नीं, जद हवेली पर काम करण नै आया करती छी, तद तू नानौ सौ टाबर हुया करतौ, म्हारी आंगली पकड नै चाल्या करतौ, म्हैं तनै गली की दूकान सूं मिठाई की गोलियां दिरवा कर ले जावती।
ओ !.....दीपा दी !! ये आप हैं !!! मैं तो जैसे आसमान से धरती पर आ गिरा था। बचपन की बंद किताब का एक पेज और खुल गया था। मुझे उनकी हर बात याद आ रही थी। उनसे यहाँ और इस रिश्ते में मुलाकात होगी, यह अकल्पनीय था।
मुझे हैरान देखकर चाचा ने कहा महेंद्र तुझसे अभी बहुत बातें करनी हैं। पहले तू होटल से अपना सामान उठा ला। तब तक मैं तेरे लिए पॉपलेट फिश लेकर आता हूँ। पॉपलेट दीपा को भी बहुत पसंद है।
हम दोनों हवेली से निकले। वे फिश-मार्केट की तरफ बढ गए और मैं ऑटो-रिक्शा लेकर होटल चल दिया। रास्ते भर मैं उनके बारे में सोचता रहा। चाचा से मिलने से पहले मेरे मन में उनके लिए सिर्फ करुणा भाव था। मेरा ख्याल था कि वे असहाय और अकेले हवेली में अपना बुढापा गुज़ार रहे होंगे। इस उम्र में उन्हें कोई एक गिलास पानी देने वाला भी नहीं होगा लेकिन उनसे मिलकर मेरी आशंकाएं निर्मूल सिद्ध हुईं। बहत्तर वर्ष की उम्र में भी वे चुस्त-दुरुस्त बने हुए थे। बावन वर्ष की उम्र में एक दलित विधवा से उन्होंने शादी की थी। एक साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादक थे और दिन भर पार्टी के कामों में स्वयं को व्यस्त रखते थे। सबसे कडी बात यह कि अपनी क्रियाशीलता से उन्होंने हमारे खानदान पर लगे मुखबिर होने के कलंक को मिटा दिया था।
होटल के सामने ऑटो से उतरकर मैं रिसेप्शन काउंटर पर आया। अपना सूटकेस मैंने वहीं मँगवा लिया। होटल के बिल का पेमेंट किया। एक कॉफी पीकर मैं बाहर निकला। होटल का बैरा सूटकेस उठाकर मुझे बाहर तक छोडने आया। एक ऑटो रोककर उसने सूटकेस रखा और गुडनाइट सर कहकर लौट गया। सीट पर बैठकर मैंने कहा - कॉमरेड की हवेली।
ड्राइविंग सीट पर बैठे लडके ने क्लिच दबाकर गीयर बदला। सर्दी की रात थी। सडकें खाली होने लगी थीं। ऑटो-रिक्शा खाली सडक पर फर्राटे भर रहा था।


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