fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

सह-सा

गीतांजलि श्री
डटकर पडी।
अम्मा उस घडी शम्भु की जिज्जी को डाँट रही थीं नहीं, मैं कुछ नहीं खाऊँगी, कुछ खाने का मन नहीं है, आज पेट भी साफ नहीं हुआ है खाने का तो नाम मत लो मुझसे।
कुछ मत खाइए, सूप पीजिए। भूले सामने के कमरे से उठ आए, हाथ में कुछ-करने-वाला-काम लिए। पालक का सूप बनाओ। पेट साफ हो जाएगा। और क्या उसमें डलवाती थीं जो आपका खास टच था? लौंग?
जायफल, अम्मा बोलीं। खटर-खटर अपनी पटरा-गाडी में बढती। काठ के पटरे पर बैठीं, अपने मुडे-तुडे बेकार घुटनों को उसपर मुडा-तुडा चढा के, हाथों से उसके पहियों को तेज़ तेज़ चलाती हुई।
सर जी, शम्भु की जिज्जी बोली, पेट भी साफ हुआ है और सब ठीक है। अम्मा मैडमजी से गुस्सा हैं क्योंकि वो जो मीनू बना गयी हैं उसमें से अम्मा की फरमाइश निकाल दी है।
मीनू मीनू क्या? भूले पुरजोर डपटे।
मेन्यु सर, शंभु ने जीरो-जीरो सेवन स्टाइल में कहा।
जो अम्मा कहें बनेगा। उनकी पसंद सर्वोपरि। भूले ऊँची आवाज में बोले।
वो कहती हैं आपकी पसंद सर्वोपरि। शम्भु हँसते चिल्लाया।
जेम्स बॉड हो कि डफर? भूले ने झेंप-छिपा गुस्सा किया। उन्हें मध्य में रखा जाए, उन्हें रुचता नहीं। मेरी कोई अलग पसंद है?
शम्भु की जिज्जी हँसने लगी। अम्मा जी कहती हैं आपको ढुस्का पसंद है, वो बनेगा, चटनी के साथ खाएँगे। मैडम कहती हैं अम्मा का मन करता है वो सरजी का नाम लगा देती हैं।
अम्मा को ऐसा करने की जरूरत नहीं, भूले गुस्साए। हँसते हुए।
मैडम कहती हैं कोई नहीं खाएगा और सर जी भी नहीं खाते। अम्मा कहती हैं मैडम अपनी और बच्चों की पसंद देख रही हैं, जबकि आपकी देखनी चाहिए।
मेरी पसंद सबकी पसंद एक, भूले फिर झेंप-चिल्लाए। अम्मा - वे कहने जा रहे थे - की सुनो। मुडे उनकी तरफ और वे एक तरफ को झूल रही थीं, तन अस्थिर हिलहिलाता, अपनी जानी पहचानी अदा में, कैरोटिड आर्टरी की अदृश्य मार में। वे लफ और चिल्लाए, इसलिए नहीं कि अम्मा की गर्दन गिर गयी थी, जो जितनी बार होता वे अविचलित उसे उठा देते, बल्कि इसलिए कि अम्मा बाथरूम से खुद खटर-खटर करती बिस्तर तक आ गयीं, उचक के बिस्तर पर कूद गयीं और अब जाकर, जब वे गिरती मुद्रा में लटक रही थीं, उन्होंने देखा। न मुझसे कहा, न शम्भु या उसकी जिज्जी को आवाज दी, या हमने सुना नहीं, और अम्मा भी और हम भी, उनका गुस्सा सब पर कि किस पर, गुस्से-सा गुस्सा था।
चिल्लाए और चिल्लाते हुए अम्मा तक गए। यह क्या नया तमाशा, चिल्लाए और चिल्लाते गए और उनके शीष को उठाने झुके, पर जैसे ही अम्मा के सिर को हाथ लगाया कि स्वर शांत हो गया। शांति से उन्हें सम्भाला, बल्कि स्नेह से, होंठों-होंठों में कुछ ममतामय बुद-बुद की बस-बस धीरे-धीरे। अम्मा का सिर बचाके तकिये पर ऐसे रखा जैसे टूटे खिलौने को और न टूटे, रखते हों। मगर खुद यों तुडे-मुडे हो गए कि चटक के छिटकने को हों। झुके हुए, आडे-तिरछे, अम्मा को सँम्भालने में खुद गिरे-गिरे।
अम्मा को लिटा दिया। अम्मा निस्पंद पडीं रहीं। उनके माथे पर हाथ फेरा, गर्दन के नीचे तकिए पर अपने हाथ का तकिया बनाया, गर्दन को प्राणित करने की गरज से गुदगुदाया। पाँव के नीचे तकिया लगाया और तलवों को मला, पाँव की उँगलियों को मसला, हल्का दोहर तन पर डाला और तन को सहलाने गरमाने आरामा-ने छूते रहे। जितना छुएँ उतने शांत होते गए, मानो छूने में यह सिफत। कि न छुओ तो चिल्लाओ और छू दिया, तो चिल्लाना छू मन्तर।
अम्मा ने आँखें खोलीं जैसे अब तक नाटक कर रही थीं। क्या हुआ, पूछा। बहुत थकी भी नहीं लग रही थीं।
भूले अलग हो गए। अलग होते ही चिल्लाए, क्या हुआ, सब अपने से करना है तो क्यों बात बेबात सबको पुकारती हैं, गिरने का शौक चर्राया है, सबका शांत भंग करने में कोई विशेष सुख है?
बुड्ढी से सब ऐसे ही पेश आते हैं, चिल्लाती बुलाती रहे, बुड्ढी है क्या पडी, सबको तंग करती है बस। अम्मा ने बुड-बुड शुरू की।
कोई ऐसा नहीं करता। सब दौडे आते हैं। भूले चिल्लाए।
एक जरा-सा ढुस्का तो बनाने को तैयार नहीं हुए। वह भी तुम्हारे लिए। अब भी तुम्हारी पसंद न चलेगी, तो किस दिन? अम्मा बडबड मूड में बडबडायीं।
और कस के भूले चिल्लाने लगे, जब बात उन पर और उनकी पसंद पर आ गयी।
अम्मा बज़द रहीं। हफ्ते में एक बार पूडी दो कहा, मिलती है वही उबली सब्जी, उबली खिचडी। खीर कहो, तो ब्रेड के टुकडे डाल कर पनियल दूध।
भूले को बुरा तो लगा पर चिल्लाते रहे, जो पचा नहीं सकतीं वह क्यों माँगती हैं?
तुम तो पचा सकते हो और दिन तो तुम्हारा है, मैं तो बुड्ढी ठीक।
बुड्ढा-बुड्ढी मत करिए। सत्तर के बाद सब बुड्ढे। मैं भी। रिटायरर्मेंट के बाद घर में झक मारता हूँ। हँसने लगे।
तुम सत्तर के होने वाले हो, मुझे बता रहे हो! सबका काम अपने पर ओढ लेना झक मारना है, तो हाँ जरूर झक मारते हो। सुबह मक्खन कौन मथ रहा था? सुशीला मर गयी थी?
वाह! सब याद है और कर रही हैं बुड्ढा बुड्ढी। चिल्लाए पर मुस्काए भी। कूद कर अपने से गाडी पर चढ गयीं और हवा की तरह घर में सनसनाती फिरे हैं, पर हैं बुड्ढी।
अपने से मैं कुछ नहीं कर पाती। अम्मा ने तुनक कर कहा।
तो आफ भूत आए थे जो बाथरूम तक ले गए फिर बिस्तर में उँडेल दिया।
गिरने वाली थी। तुम न पकडते तो।
वाह-वाह! यह भी याद है, भूले ने आँखें तरेरीं।
कुछ नहीं याद, अम्मा ने पस्त स्वर में कहा और आँखें छिपा गयीं। मुडीं कि साइड टेबल से अपना खुजली वाला पाउडर निकालें और बिस्तर के एकदम कोने पर पलटी मारी, ज्यों दिखाने कि गिरना अनजाने हो जाता है।
भूले फिर चिल्लाए - जानबूझ कर, क्या चाहिए?
पाउडर, अम्मा रूठ कर बोलीं।
भूले ने बढ कर डब्बा निकाला और डाँटते थे कि हाथ अम्मा के हाथ में गया और चुप शांत बोले, मैं हूँ यहीं, शम्भु है।
अम्मा कंधे और बाँह खुजाने लगीं। भूले ने फिर डाँटा, पर फिर जैसे ही हाथ अम्मा के कंधों पर लगाया कि स्वर नरम हो गया, लाइए मैं लगा दूँ, नाखून से घाव मत करिए।
अम्मा के कंधे और बाँह खुजाने लगे। जरा भी नहीं चिल्ला रहे थे अब। किसी को बुला लिया करिए, पाउडर मलवा लिया करिए। मैं हूँ, अगर दूसरे बिजी हैं। सरक्यूलेशन अच्छा नहीं हो, खून ठीक से न दौडे, तो खुजली होती है, और कोई बात नहीं, हर बात पर परेशान मत हुआ करें, ओहो, बाल है खिंच गया।
सुशीला ने आकर खुजाना शुरू किया तो वे फिर अलग हो गए।
देखिए, सरजी कैसे अपने को नोच देती हैं।
भूले ने फिर डाँटना शुरू किया। ऐसे करेंगी, तो वह जो ऐस्ट्रोनॉट्स को सूट पहनाते हैं वह पहनना पडेगा कि हाथ अंदर जा ही न सके। उनकी आवाज ऊँची।
मगर जैसे ही अम्मा के पाँव के नीचे का तकिया हटाने को झुके और हाथ अम्मा के टखनों को छू गया तो उनकी आवाज में ममत्व पुनः छलक पडा। यह छूने का कौन-सा करिश्मा खुल रहा था!
यथार्थ में लम्बा समय न रहा हो पर अनुभूति में हो गया और देर तक वे इस करिश्मे की पडताल करते रहे - किसी बहाने अम्मा को हाथ लगाते और नरम बोलते और हाथ हटाते और अपनी जानी पहचानी अदा में हुंकारते। नए खेल के नए नियम सीखते हों, ऐसे। हाथ हटा गला चिल्ला, हाथ छुला गला नर्मीला। कभी तो वाक्य का शुरू चिल्लाहट, जब हाथ अलग था, और धप्प अम्मा पर छुआ दिया और बाकी वाक्य शीरा।
जैसे वही चिल्लाते हैं जो छूने से वंचित हों और जो छूते हैं, वे पिघलने लगते हैं।
बहाने से छूने लगे भूले जैसे छूने और शांत चित्त होने का जुडाव मन में दबे पाँव घुस आया। कभी अम्मा का कुछ सीधा करते हों, कभी उड आया बाल या कोई कतरा हटाते हों, कभी कान हँसी से उमेठ देते।
बोले, बदमाशी करेंगी, तो ऐसे करना पडता है। कान उमेठने से सीधे दिमाग की शिराओं में खून दौड जाता है।
चिल्लाना बिलकुल बंद हो गया।
पता न चला कि छूने से उन्हें ज्यादा आराम मिलने लगा या अम्मा को।
क्रीम ही तो निकाल रही थी। अपना काम खुद करना चाहिए। और भुलवा तुम्हारा कान कौन उमेठे, हुँह!
भूले ने उनके माथे से काल्पनिक सिलवट चपटायी। यह क्या है, मुलायम बोले।
माथे की लकीरें, अम्मा मुसकायीं। और यह क्या है, उन्होंने भूले की हथेली थामी।
हाथ की लकीरें, भूले ने कहा। हाथ अम्मा के टखनों पर टिका रहा ज्यों समझता हो कि हटा नहीं कि गला चिल्लाएगा।
ज्यों चिल्लाना गुहार है कि छुओ छूते क्यों नहीं।
*****
बात हाथ से निकलती रही। हाथ छूने चले जाते। शांति मिलती।
प्रेमिला को प्रणयक्रीडा के दिनों बाद से और चिया को कंधे पर उछालने के दिनों के बाद से छूना बंद था। यों भी दोनों जब इतनी व्यस्त थीं और उनके हो हल्लड से अप्रसन्न, तो उन्हें कैसे छू के आजमाते। शम्भु और उसकी जिज्जी को भी कहाँ छुआ जाता। सो अम्मा रहीं। वन प्रांगण के पौध गच्छ पर तो छुअन फेरते ही थे। पर यह भी जा जुडा कि दीवार, मेज़, चम्मच, लैम्प जो सामने आए उस पर भूले हाथ फेर दें। दीवार को सहलाता हाथ उसके शीतल को छू रहा है, उसमें से झरती हल्की-सी भरभरी को हथेली में भर रहा है, बर्तन के धातु की फिसलन महसूस करता है, शीशे को हल्के-हल्के टीपता है, लकडी और कागज के दरदरेपन का उँगलियों की पोरों को आनंद देता है।
झाडते,पोंछते,चमकाते पहले से पाए जाते थे, तो कुछ अलग, नया होता हो, कोई क्यों सोचे। गर देखे।
पर शांति की यह नयी आजमाइश भी उन्हें अशांत कर देती। उन्हें संदेह था कि यह नयी क्रियाएँ उसी फिक्र से जुडी हैं कि क्या वे भूत हैं, घर में अदृश्य फिरते? यह छूने की नयी लत अपने होने को ढूँढती हैं क्या? उधर छू के ठोसपन का आभास अपने ठोसपन की आश्वस्ति है। उसकी त्वचा से अपनी त्वचा मिल गयी। भूत का कुछ ठोस नहीं हो सकता, न उसकी त्वचा होगी। यही है पडताल क्या? बात उन्हें खिजा देती और थका भी।
****
उस दिन हवा व्यर्थ सनसन कर रही थी। हैपी बर्थडे कानों में पडा। भूले समझ गए शाम डिनर है और लोग आएँगे। अक्सर किसी न किसी का बर्थडे मनाया जाता है। प्रेमिला या चिया की सखी मंडली से भी किसी का।
भिंडी लानी है, शम्भु चिल्लाया।
इस मौसम में पागल हो निकलोगे? अम्मा चिल्लायीं।
चिल्लाती क्यों हैं अम्मा, प्रेमिला चिल्लायी। आप ही ने कहा था कुरकुरी भिंडी, हैपी बर्थडे है।
मैंने कहा था ढुस्का, अम्मा ने शिकायत की।
ढुस्का किसे आता है बनाना। तब आपने कहा था कुरकुरी भिंडी।
कुरकुरी भिंडी में क्या है।
भिंडी है।
चलो, भूले ने गाडी की चाभी उठा के चिल्ला मारा।
सूरज ने उनके खोपडे पर रेगिस्तान से आते थपेडे मारे।
दुनिया वैसी थीं, जैसी उसे बना दिया था। सब्जयिाँ सब्ज रंग में रंगी, गंदे पानी में धुली, खिलौनों-सी दमकती। भूले भिंडी छाँट रहे थे, डाँटते हुए कि सब रंगी हैं रगड रगड के धोना कि रंग तो उतरे, अपनी जिज्जी से भी कह देना।
आपकी प्रिय भाजी है इसलिए क्या करें। शम्भु को भिंडी का दाम नहीं रूच रहा था।
तुम्हारी चिया दीदी की, भूले ने डपटा, मगर संतुष्टि से-चिया का नाम उचार कर और कि उसकी पसंद उनकी।
गरमी के थपेडे खाकर लौटे, तो अम्मा की बगल में जाकर सो गए, कुछ असंतोष से कि फिर काम धरा रह जाएगा । पर नींद ऐसी गुपगहरी आयी कि शाम तलक न जगे।
आवाजों ने जगाया जो उस भूत बेला में घर को भुतैला खोखला गुँजा के चुपिया गयीं। कोई बर्तन टनटना के गिरा और टन-टन गूँज के चुप हो गया। अम्मा पहियों वाली पटरा गाडी पर घिसटती परले कमरे में नजर आयीं, फिर अंतध्यान हो गयीं। धुँधली रोशनी में धुँधली आकृति - बौनी-सी, न इंसान-सी, न जानवर-सी। नहीं-सी। वे खुद सूखे-सूखे खाली-खाली महसूस कर रहे थे और कोई कहता तो मान लेते नहीं हैं।
आँखें मलते उठे और कुछ गफलत में जो गलत समय पे सोने और गलत समय पे उठने में होती है, जहाँ अम्मा की छवि आयी और गयी थी, वहाँ निकल आए। रोशनी में निकलने से आँखें चुँधियायीं और और धुँधला दिखा। धुँधली निरी छवियाँ जो कुछ गाती-सी गूँज रही थीं भूतैली लगीं। जन्मदिन का गाना। हैपी बर्थडे टू यू। गफलत और तारी होती गयी।
कुछ झेंप में खडे रहे कि वे सबके बीच पहुँच गए हैं या कि किनारे खडे हैं? तो मुसकाएँ, या जागने का उपक्रम चुपचाप बढाएँ? जो भी थे - प्रेमिला चिया के यूजुअल सस्पेक्ट्स - कुछ धौलधमाल कर रहे हैं, उन्हें प्रतीत हुआ। तभी ऊँची आकृतियों के बीच से बौनी आकृति उनकी तरफ आती दिखी, पटरा गाडी पर घिसटती। उन्होंने हाथ दिया और अम्मा को उनके बिस्तर तक ले जाकर उसपर बिठाल दिया। अम्मा कुछ अतिरिक्त प्यार से खुश रहो खुश रहो कर बैठीं।
वे अभी भी गडबड नींद से पूरे न निकले थे। उनके अंग ढंग मरियलाए हुए। दूर से किसी चेते मन-बिंदु में उन्हें शहर के धौलधप्प का अहसास हुआ। जो असली में बगल के कमरे में घिरे लोगों से आ रहा था। वही शहर की बेकार-सी आवाजें, आपस में आलिंगनबद्ध, जिनका कोई स्वरूप न बने।
पर यह क्या, शहर उनके पीछे चला आया, यह क्या। या अम्मा के पीछे। कुछ ताँता-सा लगाए और कुछ पकवान भी बिखरे छितरे, उसी कमरे में जहाँ वे अम्मा के संग थे। अम्मा के पलंग पर ही पूरे शहर का फैलाव फैल गया।
पेपर नैपकिन पर तली भिंडी उठाए लोग और आलू रायता पूडी आ रहे थे, जा रहे थे। जनमदिन मुबारक हवा में उडाते।
वे आँखें बंद करना चाह रहे थे और खोले रहे।
चिया की सहेली ने खिलखिला के अम्मा के मुँह में एक निवाला बना के डाल दिया।
अंधेरे से निकलो, अम्मा ने भूले को अपने पास बैठने को कहा। ऐसा उस भकभक रोशनी में चुँधियाती भीड में उन्हें समझ में आया।
अम्मा खुश लगीं। ढुस्का भूल गयी होंगी। उनके खानों की तारीफ चल रही थी। अम्मा ने भूले को परोसी प्लेट दी। उनका सर गलत नींद से भारी था, पर उन्होंने प्लेट ले ली। उनकी सोने की जगह पर प्लास्टिक का मेज़पोश बिछ गया था जिस पर खाना-वाना रखा जा सके। भूले अम्मा के पायताने बैठे थे, कुछ कठियाए से, बेआराम से। हिलती आकृतियों से घिरे हुए और अब जबरन रोशनी के जलते बल्बों की जकड में।
उन्हें मन हुआ उठ के निकलें, मगर अम्मा ने पास बैठा लिया था और शम्भु ने और कुरकुरी भिंडी परोस दी थी कि आफ लिए है। चिया खा रही होगी, यह भिंडी उसकी पसंद है, उन्होंने सोचा, मगर भीड में उन्हें ठीक से सूझ नहीं रहा था, चिया है भी वहीं या नहीं। लोग शोर क्यों इतना करते हैं कि अलग अलग कुछ, और कोई, न सूझे। अपने को विस्मृत रखने को?
भूले मन में थ्योरी गाँठने लगे। कि जब एक अकेला होता है, तो चुप्पी होती है, जब दो आमने-सामने हों, तो शील-सुशील वार्तालाप, तीन हों तो खीखी ज्यादा होती है, बात को अपने में निगलती, और चार और उससे अधिक, तो फिर बस चीखें ठहाके उच्छृंखल उन्माद, मेरी तेरी तू-तू मैं-मैं से लैस पियक्कडपन, मदिरा हो न हो। पियक्कड किसकी सुनते हैं, सब अपनी बोलते हैं, उतना ही उनका उद्देश्य होता है।
फिर भी भूले ने बूझने की चेष्टा की। चार से बहुत अधिक थे और एक संग चाँय-चाँय करे जा रहे थे। उन्होंने अपनी छेडखानी वाली अदा में हथेली को खुलता बंद होता मुँह जताते नचाया कि वाह चाँय-चाँय। जिस पर प्रेमिला चिढ जाती थी और चिया उसे सांत्वना देती घर से निकाल ले जाती थी। पर यहाँ किसी की गरमी ठंडी नहीं पडी। रेडियो के कई चैनल्स एक संग बजते बेबूझ शोर मचाते हों। कान परेशान हो जाएँ और कान के रास्ते थकान बदन में उतरती जाए। यों ही देर शाम तक सोने से मन भूला-भूला तन सुस्त-सुस्त था। ऐसी शाम थके व्यक्ति को और थका दे।
उन्हें वैसे शायद कोई नहीं छेड रहा था। बस चूँकि वे अम्मा की बगल में थे तो लग जाता उनसे कहा क्या। वे मुस्करा देते। एक-दो बार दाएँ-बाँए अपने पीछे भी झाँक लेते। मुस्कुराहट हटाना भूल जाते।
किसी की हैपी बर्थडे चल रही थी। हो सकता है चिया की कोई दोस्त की हो, जो हॉस्टल में है तभी यहाँ घर में पार्टी दे दी। या प्रेमिला की मित्र मंडली से कोई जो अम्मा के पास आना चाहती रही। एक-दूसरे की बर्थडेज़ मनातीं आयीं हैं दोनों। अम्मा की तो नहीं होगी, वरना भूले को वे याद दिलाती।
भूले ने फिर चेतने की कोशिश की। सुनें समझें, चेष्टा की।
अरे, हम तो कब के प्रोफेसर हो गए होते, अगर हम भी सबसे मिलते जुलते रहते। आजकल अपने को विजबिल रखो, सबसे बना के रखो, सबसे मिलते-जुलते रहो, तब रास्ता खुलता चलता है।
ऐसी बातें।
आपकी दही पकौडी तो कहने ही क्या। मुँह में डाली नहीं कि मक्खन-सी घुलें। ऐसी भी।
उसे तो रिटायरमेंट के बाद वाइस चांसेलरशिप ऑफर हुई, पर बच्चे पढ रहे हैं बीवी का काम यहाँ है उसने मना कर दिया।
अरे! जज साहब के तो कहने ही क्या।
कौन और यहाँ जज साहब बैठा है, भूले ने नीम तारीकी में सोचा? कोई और नहीं मैं ही तो, उन्हें नीम तारीकी में सूझा।
आसमान छूने की कोई महत्त्वाकांक्षा नहीं।
आसमान ऐसे लोगों पर खुद झुक आता है।
भूले उठ गए। अम्मा और जनता उनकी बखान रहे हैं। जो कर रहे हैं कर रहे हैं। उसका शोर क्या मचा रहे हो। चुभती रोशनी में मत लाओ। वे अदृश्य ही ठीक।
अदृश्य, सरबसर अदृश्य क्या? भूत, घर में फिरता? मन में डर लौटा।
है तो मनुष्य का बच्चा। थकेगा नहीं। घर भर सर पे उठा रखा है कि और किसी को कोई अडचन न आवे। रुक जा बच्चे, मैं कहूँ पर मेरी कौन सुने। रुकना खुद पडे है, दूसरा रुकने को नहीं कहता। लोग ऐसे ही होते हैं कि जो करता है उसे करने देते हैं, और फिर वह जो नहीं करता वह भी उसी से अपेक्षित होता है। एक की करने की आदत पड जाती है, दूसरे की करने देने की।
देख लो चारों ओर दुनिया। जो करता है वह दिखायी नहीं पडता।
क्यों नहीं दिखायी पडता?
अरे क्यों दिखेगा?
मगर क्यों नहीं?
दिखा तो हमें हाथ बँटाना पडे, हमें बैठे रहने में अडचन होवे, हमारी शर्म हमें ललकार लगाए, इनसे सबसे बचने का आसान तरीका कि देखने की क्या आवश्यकता, अपने को अलैदा जगह व्यस्त होने दो। करने वाले को अदृश्य कर दो।
भूले में उसी पल फिर वही लहर-सी उठी खून की नली में और वही अटकन धचकी, जो उनकी एक धडकन को निगल गयी। वे चौंके। क्या हुआ कुछ हुआ? पर सब अनवरत चल रहा था। वे अनदेखे बैठे थे। बातें उनकी हो रही थीं। उन्हें फिर संदेह में डालती कि वे अदृश्य हैं।
अरे इसके माने क्या? वे हिले। बिना पूर्वनिश्चय के वे बिस्तर में फैले पकवानों के डिशेज़ को बचाते हुए सरकते आए और उनके बीच खडे हो गए। बोले कौन- से शब्द होंठों पर आए -फ्रेरेल्टी दाई नेम इज वुमन।
ऐसा कहके वे बहुत चुप हो गए। इतने चुप कि संदेह हुआ कुछ कहा क्या कहा? क्या? याद करने की प्रक्रिया में वे कुछ हैरान मुस्कान लिए चारों ओर देखने लगे। किसी ने कुछ सुना? उन्हें देख कर हँसे? हाँ लगता तो है। हँस रहे हैं। उनके मजाक पर।
उनके मजाक पर? पर हँसी तो शाम से चल रही है।
उन्होंने प्रेमिला को ढूँढा। उन से गुस्सा लग रही है? उसके चेहरे पर मुस्कान थी। पर उसे सबके साथ होने की आचार प्रणाली से जोड के भी देख सकते हैं। भृकुटि पर लकीरें हैं। पर वे तो स्थायी लकीरें हो गयी हैं।
चिया कहाँ? वह दिखी। परले कमरे में। अपनी मंडली में। उसने उन्हें सुना ही न होगा।
लोग जाने लगे। उनके अचानक बीच में बोल-तमाशे ने पार्टी छितरा दी हो, उन्हें नहीं पता। उन्हें सुना भी, उन्हें नहीं पता। देख रहे हैं, क्या मालूम।
एक-दूसरे को फिर हैपी बर्थडे करते निकलते लोग। अम्मा से विदा लेते भी हैपी बर्थडे करते लोग।
आपकी बर्थडे है, उन्होंने अम्मा से सबके चले जाने पर मजाक किया।
है क्यों नहीं, अम्मा बोलीं। तुम्हारा जन्मदिन तुम्हारी माँ का भी जन्मदिन होगा ही।
...........
लड्डू भी सर गरमी से सिकुड गया है, मंदिर चलिए ले आएँ। शम्भु लड्डू का डब्बा लिए पहुँचा।
एक लड्डू बचा है। शम्भु दिखा रहा था। सूखा और कडकडा। चलिए मंदिर, ले आएँ।
घबरा के भूले ने नजर इधर-उधर दौडायी, चिया ने सुन लिया कि वे चले लेने लड्डू, तो उधर देखेगी भी नहीं। याद आया कि जरा पहले ही वनप्रांगण में हरियाली के परदे के सरकने पर जब झाँक पडी थी, तब माँ-बेटी दिखी थीं गाडी में निकलतीं।
झट मुँह में डालो और डब्बा फेंको, वे फिर भी हडबडाए स्वर में बोले, कि जुर्म का सबूत झटपट मिटाना हो कि उनका लड्डू से क्या वास्ता कभी। और अपनी जिज्जी से कहो इधर आए अम्मा के पास, हम मंदिर के लिए निकल लें।
वे अम्मा को बाथरूम की तरफ ले जा रहे थे, उनके पहियों पर लुढकाते, झुके, थामे, साथ साथ चलते।
अम्मा को गुस्सा आया कि क्यों जलती धूप में निकलते हो? तुम्हारा माथा कितना गरम हो जाता है। खाँसने लगीं।
वे चिंतित हुए, पर चिल्लाए नहीं। हाथ अम्मा को सम्भालने में उन्हें छू जो रहे थे। देर तक अम्मा खाँसती गयीं, सूखी तकलीफदेह खों-खों। भूले ने पीठ ठोंकी, सीना थपथपाया, बाँह पकडी कि संतुलन न गडबडाए, न अम्मा का न उनका। बाँह गरम लगी। सरकाया और माथा छुआ। वह भी गरम लगा। बुखार तो नहीं, मन में चिंता उठी और बोले, आप गरम क्यों हैं?
तो क्या ठंडी हो जाऊँ? अम्मा ने खाँसियों के कुछ सम्भलने पर लताडा। मेरी बात और है। मैं लिहाफ में ढकी रहती हूँ, मैं तो हर समय गरम रहती हूँ। तुम नींद पूरी लो, बेवक्त सोने लगे हो, गरमी से थक रहे हो। चेहरा देखो झुलस गया है।
शम्भु की जिज्जी ने आकर अम्मा को अपने हाथों में ले लिया। भूले अपने हाथों को लेकर खडे हो गए, अम्मा की सटन से अब अलग, और जोरों से चिल्लाए, ऐसी बातें नहीं कहते।
कि सर की सूखे सिकुडे लड्डू की-सी शक्ल हो रही है, शम्भु ने ठहाका लगाया। चश्मा, चाभी, वॉलेट ले आया था।
सूरज और तपाने की धमकी से चमक रहा था। मंदिर में गणेशजी अभी परदे के पीछे निद्रामग्न थे। बाहर लम्बी लाइन थी और भक्तगण दोनों में लड्डू लिए ठेलमठेल में लगे थे। भूले को पंडितजी पहचानते थे, उनके घर में सारी कथा पूजा करने वे ही बुलाए जाते। दोनों फुर्सत की घडी में बैठ के धर्म और राजनीति पर लम्बी बातें करते। मगर आज कोई पर्व था और ठस्समठस्सा का जोग। जैसे चींटियाँ एक पीताम्बरी कतरा थामे व्यस्त अभ्यस्त एक कतार में बढती जा रही हैं, पीछे से और आती चली जा रही हैं, अनवरत कतार है, वैसे पत्तल के दोनों में लड्डू लिए भक्तगण। भूले भी पीले लड्डू लिए कतार में लग गए।
उसी पल गणेशजी के दर्शन का समय हो गया और भीड ने गगनचुंबी जय गणेशा के स्वर उठाए। एक में अनेक जुडे तन और स्वर और भूले भी उसी में, कि तभी पंडितजी ने उन्हें देख लिया। उन्हें अलग बुलवाया और परली तरफ से गणेशजी की तरफ बढाया। उमडते सागर के बीच भूले बहते आए और लहरों की भक्तिपूर्ण गरजन से उनके भीतर हर रंग के आशीर्वाद भँवरने लगे, जैसे जीवन भर की सुनी दुआएँ एक पर एक चली आती हों - श्री गणेशाय नमः, हर हर महादेव, जय हनुमान, अल्ला हू अकबर, जो बोले सो निहाल सतश्रीअकाल, लीड काइंड्ली लाइट, सदैव सुखी रहो, ब्लेस यू, जुग जुग जियो, बडे से हो जाओ, मस्त रहो स्वस्थ रहो, लड्डू पेडे खाओ खूब नाम कमाओ, रब भला करे, वसुंधरा गमके बेटा शुभाशिष बेटी ब्लेस यू चिया ओ बिटिया।
सामने भगवानजी पर पडा दुपट्टा हटा दिया था। सिंदूरी गर्भ-गृह में गेंदे की मालाओं और चढावे के लड्डूओं में रतमग्न गणेशजी। भक्ति की मस्ती और गरमी में हवा सिंदूरी हर पुकार सिंदूरी हर दुआ सिंदूरी और भूले का सर घूमा हुआ। लाली देखन मैं गयी जित देखूँ तित लाल सा चक्कर। भूले ने चिया के प्रिय लड्डू चढावे में दिए। आशीर्वचन बरसते रहे। आरती की घंटी बजायी, पुजारी से भोग लगे लड्डू के डब्बे लिए और मुडे।
चप्पल पहनीं, परशाद पाने को बैठी भिखमंगों भक्तों की कतार को लड्डू बाँटते हुए पार किया। गाडी तक पहुँच गए थे जब नमस्ते बाबूजी कान में पडा।
नमस्ते बाबूजी, भीड को चीरती एक औरत गाडी की तरफ आयी। हाथ में लाठी थी, उम्र में बूढी-सी, वही जो शायद अभी दिखी थी मंदिर के बाहर सबके चप्पलों जूतों की रखवाली करती, लाठी से उन्हें सीधा करती, दूर हो गए हों, तो उसी से पास खींच उसके जोडीदार से मिलाती।
भूले गाडी में बैठ गए थे। उन्हें लगा औरत परशाद से वंचित रह गयी है। उन्होंने लड्डू के डब्बों में खुला वाला उठाया और लड्डू निकालने लगे।
नमस्ते बाबूजी, औरत उनकी खिडकी के शीशे से झुक कर झाँकती फिर बोली।
माथे पर बिंदी, सौम्य चेहरा, सुगंधित फूलों की वेणी बालों में।
बाबूजी आप मुझे नहीं पहचानते? मैं आती थी कमरा ढूँढती। लोग जिसे पगली कहते थे।
अरे यह तो बेघरी है, भूले ने पहचाना। अरे हाँ, वे मुस्कुराए।
बाबूजी कल ही आप मेरे सपने में आए और आज सामने! मुझे करेंट लगा।
क्या हुआ सपने में? भूले मुस्कराए, उसे परशाद दिया।
सपने में आपने मुझे गुड्डू की खोली की आखिरी किस्त के लिए कर्जा दिया। वह हमारी हो जाएगी तब मैं चैन से उसके साथ रहूँगी, कोई सडक पर न फेंक सकेगा।
भूले ने स्त्री के पीछे खडे युवक को हाथ बढा के लड्डू दिया।
गुड्डू है बाबूजी, पोता मेरा, गुड्डू बाबूजी को प्रणाम करो।
कितना देना बाकी है? भूले ने बटुआ निकाला।
ऐसा मैंने नहीं कहा, बुढयिा सिटपिटायी।
गुड्डू? भूले ने उधर देखा।
गुड्डू ने बताया।
बटुए से उन्होंने विस्मृत औरत के हाथ में ढेर सारे सौ दो सौ पाँच सौ की गड्डी रख दी।
औरत अपने हाथ पर रखा लड्डू और रुपया देखे और जब तक ऊपर देखे भूले ने गाडी स्टार्ट कर दी थी और उसे बैक करके सडक पर निकाल चुके थे और निकलने को थे।
शून्य में चेतना आयी, ऐसे औरत हिली, और गाडी के पीछे दौडी। अरे बाबूजी कर्जा कब लौटाऊँगी बाबूजी सुनिए कहाँ लौटाऊँगी?
भूले ने शीशे से हल्का-सा चेहरा बाहर को किया और बोले - उसी सपने में।
***
घर में उस दिन भूले घुसे जैसे सपने में और लड्डू और सारी खरीदारी भूल, बिस्तर पर एक सैंडल बिना उतारे आधे लुढक गए और सो गए।
दूसरा सैंडल नीचे पडा था, हसरत से अपने जोडीदार को बीच अधर में लटके देखता। देर तक वह उसे देखता रहा और आखरिकार जस्टिस भूलेराम के पाँव में आधा अटका सैंडल धप्प से नीचे गिर गया। पट्ट जमीन पर पडा।
किसी को नहीं पता था कि अगला दिन कैसा होने जा रहा है। यानी आज का दिन। भूले अच्छे से नहीं सोए थे। वैसी नींद जो करवटें बदलवाती रहती है, हालांकि आप जागे हुए नहीं हैं। सपना भी आया, जो उन्हें बाद में याद रहा या नहीं किसे मालूम हो सकता है जब तक वे खुद न बताते कि अजगर उनींदा धीमा धीर गति का, ठहरा-ठहरा-सा, पुरातन चिरंतन महाकाव्य सा, अपने जीवन को अपने अति प्रिय वृक्ष की डाल पर लपेटे, गतिशील होने की प्रक्रिया में तन को तानता है और धरती की तरफ लटक आया है, आसमान में पडी डाल से नीचे पृथ्वी तक खिंचता और सहसा तेंदुआ है लटका वहाँ, अजगर-सी ही खिंची उसकी काया, और पलक-झपक फुर्ती से चंपत हो जाता है। डाल से धरा तक पहुँचा और गायब।
भूले देर तक सोते रहे।
अम्मा ने पुकारा भूले भुलवा और वे सकपका के उठे चिल्लाने को तत्पर। मगर जीभ सूजी थी, सम्भव है नींद से, और आवाज कडक होना चाह रही थी पर लटपटा गयी।
लेट जाओ अम्मा ने डाँटा। वे उनपर झुकी हुई थीं, उन्हें जैसे देर से जाँचती रही हों।
वे इस तरह सोते पकडे जाने पर झेंप गए और आँखें टमाटर-सी लाल, गोल, करते उठे और अबके कुछ-कुछ फटकार निकली - आप क्या कर रही हैं, टेढी होकर, लेट जाइए।
अम्मा ने वापस डाँट शुरू की कि खाँसी का दौरा पडा और लेट जाओ खाँस कर लेट गयीं।
वे लेट गए और बोले जैसे इरादे से लेटे हों - लेट ही तो रहा हूँ और क्या कर रहा हूँ।
नींद सच पूरी नहीं हुई थी और वे खाँसने लगे पर नींद में।

अम्मा की बडबडाहट नींद में उन तक आती आती न आती-सी थी। सुनना तो है नहीं। सबके ये बाप। सब के सब इनके बच्चे। एक जज साहब ही तो हैं। जो करें जज साहब करें। अवकाश प्राप्त हैं न। इनके पास समय है। दूसरों को अवकाश कहाँ? वे कैसे करें? जो हो सके ये करें। जो न हो सके वह भी ये करें। अवकाश अच्छा कटेगा। ये तो बस अवकाश काट रहे हैं। वरना कैसे कटे। अवकाश! ठेंगे से। वाह जजजी यही आपकी लॉर्डशिपी।
भूले खाँसने लगे। सोते-सोते। जाग भी रहे हों तो खाँसी ने किसी और विस्फोट की अनुमति नहीं छोडी।
प्रेमिला दरवाजे पर आयी। पीछे झुक कर साडी हील से दबायी कि ऊँची न रह गयी हो, चारों ओर से बराबर हो। हल्लागुल्ला किस बात का मच रहा है, अभी आधा संसार सो रहा है। चिया देर से आकर सोयी है। और अपने को देखिए कितनी बुरी खाँसी हो गयी है आपको, मगर ऐंटी बायोटिक को मना कर रही हैं।
इसको देखो। मेरी खाँसी मैं संग लेती जाऊँगी बेफकिर रहो। और शम्भु को बोलो मेरी चादर बदल दे।
एक हफ्ता तो होने दें। चादरों का धोबीघाट बन जाता है।
साडी को हील से नुचते देख कर अम्मा की बडबड और बढी। अच्छी-अच्छी सिल्क साडयिाँ काट देती है यह बहू। पुरानी बदमजगी थी। जिस पर बहू ने कह दिया था ठीक है, आपकी नहीं पहनूँगी। बात ट्विस्ट क्यों करते हैं सब, ये कह रही हूँ मैं, अम्मा ने तान उठायी थी और भूले चिल्लाते आए थे कि क्या मछली बाजार बना रही हैं आप दोनों। काटिए साडियाँ, साडी ही तो है। लाओ शम्भु कैंची दो मैं सबका काम आसान कर दूँ, मेमसाहब क्यों कमर मोडें तोडें, मोच न आ जाए। हँसी फूटी पर न अम्मा की न प्रेमिला की। कहाँ ले जाते हो मजाक, अम्मा ने डाँट दिया। इनका तो यही है, प्रेमिला भन्ना दी, हँसी उडाएँ या चिल्लाएँ।
कितने हफ्तों में एक हफ्ता होगा, अम्मा बडबडायीं। भज़ो किसी को यहाँ। अकेले कैसे होगा।
कह देती हूँ ध्यान रखें, आप सोइए थोडा और। शम्भु या उसकी जिज्जी उधर निपटा के खुद आ जाएँगे।
प्रेमिला ने सोते भूले को देखा या नहीं, उसने कहा नहीं, पर जिस लयकारी से उनकी नाक से खर्राटे निकल रहे थे, उसे वह गहरी नींद जान कर, हो सकता है सोची हो कि अभी जरूरी नहीं, शम्भु या उसकी जिज्जी खुद आ जाएँगे जब तक आपलोग जागेंगे, अभी वहाँ जरूरत है, वहाँ कर लें।
प्रेमिला ने सलेटी साडी पहनी थी जिसका चौडा पर्ल पिंक बॉर्डर था। उसने कमर तक के लम्बे बाल खोले थे और माथे पर भवों के बीच से उठती गाढे सिंदूरी रंग की बिंदी लगभग माथे के पार उसके बालों में लपक रही थी, दोनों तरफ ज्वाला का गुबार सा मचाती। भूले देखते, तो जान जाते आज किसी पॉवरफुल इंसान के संग मीटिंग है, सिर्फ टीचिंग के लिए ऐसा रोब नहीं निखारा जा रहा है।
अभी नहीं देख रहे थे, पर जिस तरह वे नींद में उसी पल सिकुडे, अपनी काया को अल्प से अल्प-तम बनाते, जिस पल प्रेमिला ने बाल झटक के सिर फेरा, अपनी बिंदी में रुआबी तेज भरती, ऐसा था जैसे किसी अदृश्य नली से इधर का रुआब उधर लपका, इधर दुबक लिया, उधर उछल गया।
जरूरत है। अम्मा बडबडाती रहीं। है क्यों नहीं। शम्भु और उसकी जिज्जी की तुम्हें नहीं, तुम्हारे इन्हें।
बड-बड भुन-भुन बजती नाक।
***
चिडियाँ आ के चली गयीं। आज बिस्कुट का चूरा नहीं मिला। गिलहरियाँ भी।
अम्मा की भुन-भुन नहीं गयी। वे भूले को उसकी नाक से छूटती, अटकी घुटी आवाजों पर पलट-पलट के सुनाती रहीं कि जो करता है वही करता है और दूसरे जो न करें वह भी करता है और कह गयी बहू कि सो जाओ अभी पर कैसे सो जाऊँ इस तुम्हारे गले में कि फेफडे में कानफाड मशीन जो फिट कर ली है तैने।
भूले ने उन्हें नहीं सुना।
कौवों की काँव-काँव सुनी। जो चिलचिलाते सूरज के बढ आने पर वन प्रांगण में आ जमे थे।
कभी नहीं, अम्मा बाथरूम से दहाडीं, भूले के बिस्तर की कराह सुनकर। कोई इस धूप में नहीं जाएगा, चाय बिस्तर में आएगी। शम्भु की जिज्जी को खदेडा कि अभी मैं बैठी रहूँगी जाओ भुल्ले की चाय दे आओ।
आप हिलना नहीं, मैं अभी गयी अभी आयी, शम्भु की जिज्जी उन्हें बीच गुसल में छेद वाले नीचे प्लास्टिक स्टूल पर बैठा छोड, गीले हाथ अपने कपडे पर पोंछती चाय बनाने भागी। हिलना नहीं, रसोई घर से चिल्लायी।
अम्मा के पास रहो, हिलना नहीं, भूले की अभी-जागों की मरियल डाँट आयी।
हिलना नहीं, अम्मा की देर से जागों की तेज़ डाँट आयी।
चाय वहीं आयी। अखबार वहीं आया। अम्मा वहीं आयीं। बाल वहीं बनवाया। मालिश रहने दो, वे बोलीं। मैं हट जाता हूँ, भूले बोले। कि अम्मा ऐसे चिल्लायीं जैसे मुकाबला हो कौन सबसे तेज़।
जिस पर, अम्मा का बदन दबा दो, भूले थके बोले।
नाश्ता करो, अम्मा ने आदेश दिया, आज उनके आदेशों का दिन जैसे। और गिनाती चली गयीं भूले की खामियाँ। बडबड भुन भुन। सुनते नहीं बस अपनी सुनते हो। अपने पर ध्यान नहीं, औरों का क्या ध्यान दोगे। खाने, नहाने, सोने सब की मनमानी। बाहर निकलना नहीं। क्लब तुम्हारा, न गॉल्फ न टेनिस न स्विमिंग। पंखे साफ करेंगे, गमले रंगेंगे। गरमी, सर्दी बढ जाए तब हाट जाएँगे। बारिश होने लगे, चलो गाडी की चाभी लाओ। सब हीटर से चिफ हैं, चलो बैंक कर आओ। तुम न करो तो काम न होगा। तुम न करो तो ब्रह्मांड थम जाएगा। सबको आलसी बना दो। कोई करना भी चाहे मत करने दो। क्यों कोई फिर करे? चिल्ला-चिल्ला तूफान मचा दो। क्यों कोई कुछ करने चले? जो करता है उसे करने दो, क्यों हम रोकें। भगवान हो न। भगवान से सबको चाहिए, और दो, और देते क्यों नहीं, तुम तो भगवान हो, तुम तो सब कर सकते हो, हम गुस्सा करेंगे भगवान कर क्यों नहीं रहे। अरे चिल्ला क्यों नहीं रहे? तुम तो सबको चुप कर देते हो। कूदूँ अपनी गाडी पे तब चिल्लाओगे? या चिल्ला के थक गए हो?
जाता हूँ। भूले बोले।
कहाँ?, अम्मा लडने को तैयार मुडीं।
पानी दे दूँ।
पानी भी कोई नहीं दे सकता। तुम्हीं दो तो पत्ते हरे होते हैं। दूसरे देंगे तो नीले बैंगनी हो जाएँगे। धूप है। धूप में पानी नहीं दिया जाएगा।
वहाँ साया है, भूले बोले। अम्मा की भुनभुन और नींद की बेवक्ती ने थका रखा था।
शाम होने दो, अम्मा बोलीं।
होने दो, भूले ने अप्रत्याशित कहा। सोने दीजिए, कहा कि अम्मा चुप तो हों।
जिस पर अम्मा चुप हो गयीं।
उस दिन जब भूले सुबह वन प्रांगण में नहीं गए थे और चिडियों को नहीं देखा था, उस दिन यह भी हुआ कि उन्होंने यह भी नहीं देखा कि एक छोटी चिडिया छोटी-छोटी कूद मारती बरामदे तक आयी, फिर दरवाजा खुला पा कमरे में ही फुदक आयी, जहाँ वे सोते थे अम्मा के पास। उस वक्त वे सो रहे थे और अम्मा की भी आँख लग गयी थी अपनी भुनभुन बीच। खासी पास फुदक आयी चिडिया, जहाँ भूले अपनी बाँह पर सिर दिए सोए पडे थे। जैसे अपनी डाल की हसरत में। लग वही रोज वाली चिडिया थी, यानी गौरय्या, भूरी धारियाँ नाजुक तन पर, जिसे देख अम्मा ने कहा था गौरय्या, और भूलेरामजी ने कहा गौरय्या कहाँ अब दिखती है, और अम्मा ने फिर कहा गौरय्या, गर्दन में देखो भूरी धारी है। गौरय्या उनकी लेटी बाँह पर नहीं बैठी, जिस बाँह को देख कर उसे डाल मान कर कभी बैठ गयी थी। या हवा जान, अगर बाँह अदृश्य थी, उसपर सवार फुर्र फुर्र कर गयी थी। भूलेजी को पशोपेश में डालकर कि वे दिखते भी हैं? वैसे यह कोई और गौरय्या भी हो सकती थी जो पहली बार वन प्रांगण में फुदक आयी थी और नादान आस में खुले दरवाजे से भीतर कमरे में भटक आयी और नयी उमंग नयी तलाश से दुनिया को देखती हो और पलंग पर पडे जीवों को। अनाडी आँखों से आस-पास को परखती रही और अम्मा या भूले के करवट बदलने या नाक या मुँह से नींद में कोई स्वर करने पर दुम दबा के जिधर से आयी थी उसी राह जा भगी। अच्छा ही था क्योंकि शम्भु की जिज्जी दबे पाँव आकर वन प्रांगण का द्वार बंद कर गयी और चिडिया फँसने से बच गयी।
न अम्मा ने देखा न भूले ने। शम्भु की जिज्जी को आते और चिडिया को आके जाते।
जो भूले ने देखा वह चिया थी, कमरे के बाहर वन प्रांगण की तरफ खुलने वाले दरवाजे पर नहीं, अंदर बीच वाले कमरे के दरवाजे के पार जाती हुई। दरवाजे पर वह ठिठकी, नाम मात्र अम्मा के कमरे में घुसी और कुछ कठोर कुछ चिंतित स्वर में बोली, क्या हुआ दादी क्यों शिकायत करे जा रही हैं, जब से उठी हूँ सुन रही हूँ, मेरे कमरे के बंद दरवाजे से भी आपकी झकझक आ रही है, और ऐसी गंदी खाँसी कि सुनकर डर लगता है, गरारे नहीं करेंगी, एँटी बायोटिक नहीं लेंगी, क्यों ज़द करती हैं।
भूले उस क्षण लेटे थे, आँखें मूँदे। उन्होंने चिया को सुना। जैसे ही वह बोल चुकी और आगे बढने को पलटी उन्होंने एहतियात से आँखें खोलीं और झपाक से उठे और अम्मा के हडकाने के लिए खुले मुँह को किया चुप चुप और बाथरूम की तरफ इशारा किया कि बस वहीं जा रहा हूँ।
बाथरूम के दरवाजे पर वे खडे थे, पीठ अम्मा की तरफ, कपाट के दोनों ओर की दीवार को थामे और पैर थर थर लडखडाते रहे थे और घुटने बेदम हुए पैरों पर मुडते से होने लगे थे, कि अब नहीं सम्भालेंगे, नीचे सरकते जाएँगे।
जैसे भूले के चकराए मस्तिष्क को मंदिर में सारी सुनी दुआएँ एक संग याद आयीं, अम्मा को उनके उनको दिए सारे नाम ताबडतोड याद आए - ऐ भूले रे भुलवा भूलेराम जी ओ बचवा ऐ जस्टिस ओ भैया रे भुल्ला हो भुल्लु एज़ी ऐ लॉर्ड भुल सुनो सुन रहे हो सुनते नहीं और भूले ने सुनी एक चीख पापा।
वे धीरे-धीरे लडखड-लडखड मुडे। चिया दिखी।
फिर सब धुँधला।
.........
धुँधले के पहले भूले ने चिया को पापा चीखते सुना। अकेलेपन और दुःख की किसी बहुत दूर की जगह से आयी उस चीख में इतनी चिंता और डर और टूटन थे कि भूले के खडबडाते घुटने और लडखडाते लहू अपने को भूल गए और पालक और संभालक भाव उमडा। दिल में दर्द की तीव्र मसोस उठी और भूले पूरा घूमे कि सम्बल दें।
चिया अम्मा के कमरे के दरवाजे को पूरा खोल पूरा अपने को भीतर ले आयी। भूले ने उसे अपनी तरफ वेग से बढते देखा। उसका चेहरा जैसे कोई उसका गला दबा रहा हो। बच्ची बेचारी। उन्हें उस तक पहुँचना है उसे सांत्वना देनी है सब ठीक है थपकना है।
उनके भीतर इतनी पीडा भरी कि हृदय दर्द से ठुँस गया और साँस उखडने लगी।
उस एक पल में भूले ने अपने पूरे जीवन की शक्ति लगा दी और बीच को डाकने को उछाल लगायी।
कि सारा दरमियान लाँघ कर बेटी के पास पहुँचें जो इतनी घबरायी हुई है।
वह भी उछली कि एक पल न गवाएँ और बीच का लम्बा फासला लाँघ जाए पहले कि उसके पिता गिर जाएँ।
दोनों हवा में टकराए।
सह-सा।
***
टक्कर से सितारे पैदा होते हैं जो हर तरफ बिखरते हैं और थमना भूल जाते हैं। दूर सदियों से, दूर ग्रहों से, आकाश से बरसते जाते हैं। एक उल्का गिरती है, तो आँख बंद करके एक इच्छा कर लो। अनवरत सितारे फूटते हैं, तो वे इच्छाओं का मखौल बना देते हैं।
अम्मा बिस्तर में यों उचकीं ज्यों खडी हो गयी हों और ऐ भूले ऐ भुलवा करते करते चिया चिया ऐ बिटिया चिल्लायीं।
जिसकी बाँहें बढी हुई थीं, खुली हुई, और वे लफ उसे थामने और छू पे छू मंतर हुआ।
हवा में। टक्कर। चकनाचूर।
धुँधले के पहले।
हाँ, दोनों हवा में टकराए और इतने जोर से कि चकनाचूर हो गए। कौन किसको बाँहों में उठा ले, सम्भाले, समझ नहीं आया। ओ माई बेबी दोनों के मन में आया और उस एक पल में दोनों यतीम हो गए।
***
दिल में छोटी-सी कूद कूदती है कूदती है कूदती है और कूदना थाम नहीं पाती। छोटा-सा घाव राह में बिछ जाता है जिसको लहू बह के पार नहीं कर पाता। लहू अटक जाता है।
समय रुकता है। भूले का संसार रुकता है। उन्हें सुनायी पडता है पापा और वही सुनायी पडता जाता है। बेटी छूती है। वही छुअन छूती चली जाती है।
छुअन होती है। गाल पे, पाँव पे, बाँह पे। माथा गरमा दे त्वचा थपथपा दे। मगर दिल को छू दे। हो गयी पूरी।
छुले हृदय से सितारों की लडी उठी और ऊपर तोरण बनके तिरने लगी तिर-तिर तिर-तिर और भूले रोके न रुक पाए, लफ उसके पार और दिल थम गया लहू रुक गया साँस चुप हो गयी।

सम्पर्क - वाई-ए-3, सहविकास,
68, आई.पी.विस्तार, दिल्ली-११००९२
मो.८८५१८२५२३०



(राजकमल प्रकाशन से आने वाले गीतांजलि श्री के आगामी उपन्यास सह-सा से कुछ अंश।)