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महात्मा गाँधी और आचार्य धर्मानंद कोसंबी

शुभनीत कौशिक
बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में जिन भारतीय विद्वानों ने बौद्ध दर्शन के अध्ययन में अप्रतिम योगदान दिया, उनमें धर्मानंद कोसंबी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं । धर्मानंद कोसंबी वर्ष 1876 में गोवा के सारस्वत गौड परिवार में पैदा हुए। युवावस्था में एडविन आर्नाल्ड की प्रसिद्ध पुस्तक लाइट ऑफ एशिया पढने के बाद वे भगवान बुद्ध के जीवन और दर्शन की ओर गहराई से आकृष्ट हुए। बौद्ध दर्शन के अध्ययन के लिए आचार्य धर्मानंद कोसंबी (1876-1947) ने पूना, ग्वालियर और बनारस जाकर संस्कृत की पढाई की। आगे चलकर वे त्रिपिटक और पालि ग्रन्थों के अध्ययन के लिए पहले नेपाल और फिर वहाँ से श्रीलंका भी गए, जहाँ उन्होंने महास्थविर सुमंगलाचार्य से बौद्ध ग्रन्थों का अध्ययन किया। इसी क्रम में, वे बर्मा भी गए और बाद में कलकत्ता स्थित नैशनल कॉलेज और कलकत्ता यूनिवर्सिटी में पालि के प्राध्यापक भी रहे। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेम्स एच. वुड्स के आमंत्रण पर वे अमेरिका गए, जहाँ उन्होंने बुद्धघोषाचार्य कृत विसुद्धिमग्ग का संपादन किया और बौद्ध धर्म और दर्शन पर बुद्ध धर्म आणि संघ, बुद्ध-लीला-सार-संग्रह जैसी पुस्तकें भी लिखीं। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के चातुर्याम धर्म पर एक पुस्तिका लिखने के साथ ही, उन्होंने शांतिदेवाचार्य की पुस्तक बोधिचर्यावतार का मराठी और गुजराती में अनुवाद भी किया था।
आचार्य कोसंबी की अप्रतिम विद्वत्ता और उनकी सत्यनिष्ठा के विषय में काका कालेलकर ने आचार्य कोसंबी की पुस्तक भगवान बुद्ध : जीवन और दर्शन की प्रस्तावना में ठीक ही लिखा है कि बुद्ध भगवान के प्रति अनन्य निष्ठा होते हुए भी धर्मानंदजी ने असाधारण सत्यनिष्ठा से निर्भय होकर, जो कुछ सही मालूम हुआ वही इसमें लिखा है। और चूंकि बहुजन के कल्याण के लिए उन्हें लिखना था, इसलिए धर्मानंदजी ने यह चरित्र और अपनी दूसरी किताबें भी, सामान्य मनुष्य के समझने लायक सीधी सरल भाषा में लिखीं। सत्य की खोज आचार्य कोसंबी के लिए किसी भी विश्वास, मत या आस्था से कहीं बढकर थी। अकारण नहीं कि भगवान बुद्ध : जीवन और दर्शन की भूमिका में कोसंबी ने लिखा था कि यह पुस्तक लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए नहीं लिखी गई है, केवल सत्यान्वेषण बुद्धि ही इसके मूल में है। 1
आचार्य धर्मानंद कोसंबी बौद्ध दर्शन के गंभीर अध्येता होने के साथ-साथ श्रमिकों के बीच काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता भी रहे। वे बुद्ध के विचारों के साथ ही महात्मा गाँधी, कार्ल माक्र्स और बोल्शेविक क्रांति से भी गहरे प्रभावित थे। महात्मा गाँधी से धर्मानंद कोसंबी की पहली मुलाकात 1916 में पुणे में आचार्य जे.बी. कृपलानी के माध्यम से हुई थी, जब गाँधी भारत भ्रमण के दौरान पुणे गए हुए थे। तब आचार्य कोसंबी फर्ग्युसन कॉलेज में पालि के प्राध्यापक थे।
असहयोग आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने लोकमान्य तिलक की स्मृति में तिलक स्वराज फंड की स्थापना की थी। तिलक स्वराज फंड के लिए विदेशों में रह रहे भारतीयों ने भी चंदा भेजा था। तब अमेरिका में रह रहे ऐसे ही भारतीयों में से एक थे बौद्ध दर्शन के अधिकारी विद्वान आचार्य धर्मानंद कोसंबी। धर्मानंद कोसंबी उस वक्त हार्वर्ड विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज़ (मेसेचुसेट्स) में कार्यरत थे। तिलक स्वराज फंड के लिए धर्मानंद कोसंबी ने वहाँ रह रहे भारतीयों से चंदे की राशि के रूप में 156 डॉलर जमा किए। यह चंदा अधिकांशतः अमेरिका में पढाई कर रहे भारतीयों छात्रों से इकट्ठा किया गया था, जो अधिकांशतः अपने श्रम और छात्रवृत्तियों पर निर्भर थे। गाँधी को लिखे एक पत्र में धर्मानंद कोसंबी ने लिखा कि बोस्टन टी पार्टी और बंकर हिल की लडाई के समय से लेकर आयरलैंड के सिन फेन आंदोलन तक, पृथ्वी की सभी जातियों ने देशी या विदेशी तानाशाही से मुक्त होने के लिए शक्ति के ही हथियार का प्रयोग किया था। किन्तु भारत ने आफ नेतृत्व में स्वाधीनता के लिए एक नया साधन खोज निकाला है। उन्होंने यह भी लिखा कि अमेरिका के प्रायः सभी अखबार, चाहे उनकी विचारधारा रैडिकल हो या कंजरवेटिव, वे सभी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और महात्मा गाँधी की सराहना कर रहे हैं, जोकि भारत की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी है। चंदे की राशि के संदर्भ में उन्होंने यह जोडा कि राशि का उपयोग किस मद में हो, इसका निर्णय लेने के लिए गाँधी और कांग्रेस स्वतंत्र होंगे। अंततः अमेरिका से भेजी गई चंदे की यह रकम दलित वर्गों से जुडे काम के लिए दी गई।2
बाद में, अगस्त 1922 में भारत वापस लौटने पर आचार्य कोसंबी राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आंदोलन से जुड गए। महात्मा गाँधी के बुलावे पर आचार्य कोसंबी गुजरात विद्यापीठ के प्राच्य विभाग यानी पुरातत्त्व मंदिर से जुडे। यह बुलावा गाँधी ने आचार्य कोसंबी को मुनि जिनविजय के माध्यम से भेजा था। उल्लेखनीय है कि गुजरात विद्यापीठ से सम्बद्ध पुरातत्त्व मंदिर द्वारा ऐतिहासिक महत्त्व की अनेक प्राचीन साहित्यिक एवं धर्म-दर्शन से जुडी पुस्तकों का प्रकाशन किया गया। विद्यापीठ की इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना में आचार्य कोसंबी के साथ मुनि जिनविजय और पंडित सुखलाल भी शामिल थे। धर्मानंदजी ने तीन वर्षों तक पुरातत्त्व मंदिर में अध्यापन किया। इस दौरान उन्होंने अपनी आत्मकथा निवेदन (1924) के अलावा जातककथा, समाधि-मार्ग और बौद्ध संघाचा परिचय जैसी किताबें भी लिखीं। बौद्ध संघाचा परिचय पुस्तक उन्होंने अपने मित्र काका कालेलकर के अनुरोध पर लिखी थी, जो उस वक्त जेल में थे। काका कालेलकर विशेष रूप से विनयपिटक पढना चाहते थे, जिसका उल्लेख उन्होंने आचार्य कोसंबी से किया था। इसी को ध्यान में रखकर आचार्य कोसंबी ने बौद्ध संघाचा परिचय3 किताब लिखी और इसे काका कालेलकर को ही समर्पित किया।
दूसरी ओर, असहयोग आंदोलन के वापस लेने के बाद गाँधी पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया, जिसमें उन्हें छह वर्षों की सजा हुई। किन्तु बीमारी के कारण उन्हें दो वर्ष बाद ही 1924 में रिहा कर दिया गया। जेल से रिहा होने के बाद महात्मा गाँधी ने अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया मई 1924 में। यह भाषण बुद्ध सोसाइटी द्वारा बंबई में आयोजित बुद्ध जयंती समारोह में दिया गया था। भाषण के आरंभ में ही उन्होंने एडविन आर्नाल्ड की प्रसिद्ध कृति द लाइट ऑफ एशिया की चर्चा की, जो उन्होंने इंग्लैंड में रहते हुए पढी थी। उन्होंने इस पुस्तक के संदर्भ में आचार्य धर्मानंद कोसंबी का मत भी उद्धृत किया। जिनके अनुसार आर्नाल्ड की वह पुस्तक बुद्ध के जीवन का बहुत धुँधला चित्र ही दे पाती थी, और उसमें कुछ घटनाएँ तो ऐसी भी वर्णित की गई थीं, जिनका उल्लेख किसी अन्य बौद्ध ग्रंथ में नहीं मिलता। गाँधी ने यह उम्मीद जताई कि भविष्य में आचार्य कोसंबी भगवान बुद्ध की जीवन-कथा आम भारतीय पाठकों के लिए अपने अथक परिश्रम से प्रस्तुत करेंगे।
उक्त समारोह में बुद्ध के विषय में अपने विचार प्रकट करते हुए गाँधी ने कहा कि बुद्ध ने संसार को धर्म की एक नई व्याख्या दी। उन्होंने हिन्दू धर्म को जीवन की बलि लेने की बजाय जीवन की बलि देना सिखाया। अन्य जीवों पर बलि देना सच्चा बलिदान नहीं, अपनी बलि देना सच्चा बलिदान करना है। उन लोगों को जवाब देते हुए, जिनका कहना था भारत ने जिस दिन बुद्ध के उपदेशों को स्वीकार किया, उसी दिन से भारत का पतन शुरू हुआ। गाँधी ने कहा कि मेरा अडिग विश्वास है कि भारत का पतन इसलिए नहीं हुआ है कि उसने बुद्ध की शिक्षा स्वीकार कर ली, बल्कि इसलिए हुआ कि उसने गौतम के उपदेशों के अनुसार आचरण नहीं किया। पुजारियों ने सदा की तरह अपने पैगंबर को सूली पर लटका दिया। वेदवाक्य ईश्वरीय वचन तभी हो सकता है जब वह जीवंत हो, सदा विकासशील बना रहे और सभी परिस्थितियों में मार्गदर्शन करता, फलता-फूलता चले। बुद्ध की शिक्षा के बारे में गाँधी ने कहा कि उन्होंने हमें सिखाया कि आकार या रूप को महत्त्व न दो और सत्य तथा प्रेम की अंतिम विजय पर भरोसा रखो। भारत समेत सारे संसार को यही उनकी अनुपम देन थी। गाँधी ने यह भी कहा कि बुद्ध इसलिए भी अनुकरणीय हैं क्योंकि बुद्ध जो शिक्षा देते हैं, वे खुद भी उस पर सबसे पहले अमल करते हैं। यही उनकी शिक्षाओं की व्यावहारिकता और बौद्ध धर्म के प्रसार का कारण है। बकौल गाँधी, प्रचार का सबसे अच्छा साधन पर्चेबाजी नहीं; बल्कि स्वयं भी अपना जीवन उसी तरह का बनाना है जिस तरह का जीवन हम चाहते हैं कि संसार अपनाए।4
इस समारोह के दो वर्ष बाद, आचार्य धर्मानंद कोसंबी जनवरी 1926 में तीसरी बार अमेरिका गए, जहाँ उन्होंने हावर्ड ओरिएंटल सीरीज के अंतर्गत विसुद्धिमग्ग के संपादन का कार्य पूरा किया। यह महत्त्वपूर्ण कार्य पूरा कर वे सितंबर 1927 में भारत वापस लौटे। 1928 में वे सोवियत रूस गए, जहाँ उन्हें लेनिनग्राद विश्वविद्यालय और लेनिनग्राद अकादमी ऑफ साइंसेज़ में पालि का प्राध्यापक नियुक्त किया गया। रूस में रहते हुए वे बोल्शेविक और माक्र्सवादी विचारों से गहरे प्रभावित हुए। वर्ष 1930 के आरंभ में वे भारत लौटे और गाँधी जी द्वारा शुरू किए गए नमक सत्याग्रह से जुड गए। सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने की वजह से आचार्य कोसंबी अक्तूबर 1930 में गिरफ्तार किए गए। गिरफ्तारी के छह महीने बाद मार्च 1931 में गाँधी-इरविन समझौते के बाद अन्य राजनीतिक कैदियों के साथ ही वे रिहा हो सके। उसी वर्ष वे आखिरी बार अमेरिका भी गए। अमेरिका से लौटकर 1934-35 के दौरान उन्होंने बनारस में प्रवास किया। जहाँ काशी विद्यापीठ में रहते हुए उन्होंने अपनी महत्त्वपूर्ण किताब हिंदी संस्कृति आणि अहिंसा5 लिखी।
बौद्ध दर्शन और ज्ञान के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से धर्मानंद कोसंबी ने बिडला बंधुओं की सहायता से वर्ष 1936-37 में मुंबई के मिलों वाले इलाके परेल में बहुजन विहार की स्थापना की। जहाँ वे दो वर्षों तक रहे। आचार्य कोसंबी नायगाँव स्थित विहार में बुद्ध मंदिर के निर्माण से भी जुडे हुए थे, जिसके लिए घनश्याम दास बिडला ने सहायता राशि दी थी। दिसंबर 1938 में महात्मा गाँधी को एक पत्र लिखकर कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने आचार्य कोसंबी की सेवाएँ भारतीय विद्या भवन के लिए लेने की अनुमति माँगी थी। अपने जवाबी खत में गाँधी ने लिखा था कि अगर बुद्ध मंदिर का काम शिथिल किए बिना धर्मानंद कोसंबी विद्या भवन का काम कर सकते हों, तो अवश्य करें।6 वर्ष 1937-38 में ही धर्मानंद कोसंबी ने कुछ आत्मकथात्मक लेख खुलासा शीर्षक से लिखे थे, जो मराठी साप्ताहिक प्रकाश में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुए थे।
वर्ष 1940 में धर्मानंद कोसंबी विसुद्धिमग्ग की एक विशेष पांडुलिपि की तलाश में आखिरी बार बर्मा गए और उसी साल उन्होंने विसुद्धिमग्ग का देवनागरी संस्करण प्रकाशित किया था। 1940-41 के दौरान ही उन्होंने अपनी सर्वाधिक प्रसिद्ध किताब भगवान बुद्ध दो भागों में लिखी, जिसमें उन्होंने प्राचीन बौद्ध ग्रंथों के आधार पर भगवान बुद्ध के जीवन और दर्शन का विस्तृत विवरण दिया था। आज़ादी के बाद साहित्य अकादेमी द्वारा इस पुस्तक का अनुवाद अनेक भारतीय भाषाओं में करवाया गया। जून 1945 में लिखे एक खत में महात्मा गाँधी ने आचार्य कोसंबी से गुजरात विद्यापीठ में रहने का अनुरोध करते हुए लिखा था जो चीज आफ दिल में है, वही मेरे में भी है। अगर ईश्वर जैसी कोई भी शक्ति इस जगत में है तो हमें चिंता करने का कोई कारण नहीं है। गुजरात विद्यापीठ में आ गए हैं। तो वहीं रहो और सेवा करो।7 इसी वर्ष धर्मानंद कोसंबी ने बोधिसत्त्व : नाटक पुस्तक लिखी। जो उनके मरणोपरांत 1949 में धर्मानंद स्मारक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित की गई। उनकी लिखी आखिरी पुस्तक थी पार्श्वनाथ चातुर्याम धर्म जो उन्होंने जून 1946 में समाप्त की थी और जो उनकी मृत्यु के बाद ही प्रकाशित हो सकी।8
सितंबर 1946 में जब महात्मा गाँधी नई दिल्ली में थे, तभी उन्हें स्वामी सत्यानंद से जानकारी मिली कि आचार्य धर्मानंद कोसंबी अनशन कर रहे हैं। कोसंबीजी उस वक्त डायबिटीक और एक असाध्य चर्म रोग से पीडित थे और उन्होंने आहार लेना त्याग दिया था। महात्मा गाँधी ने 15 सितंबर 1946 को आचार्य कोसंबी को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि वे ऐसा न करें। साथ ही गाँधी ने लिखा कि गाय का दूध जितना आराम से ले सकें उसमें भी कोई भी फल का आधा रस डालकर चार बार पी लेवें, तो अच्छा होगा। इसके साथ कच्ची भाजी जैसे सलाद, मूली, लौकी, गाजर वगैरह खाना है, तो उबाली हुई खाएँ। यह भी एक व्रत होगा और जो सेवा हो सकती है करें। गाँधी ने आचार्य कोसंबी से अनुरोध किया कि वे उनकी बात मानकर अनशन खत्म कर दें और उसकी सूचना तार से उन्हें दे दें। जब कोसंबीजी अनशन खत्म करने से इंकार किया, तब गाँधीजी ने सत्यानंद जी को दो तार भेजे कि वे आचार्य कोसंबी को समझाएँ कि वे जिद न करें और स्वस्थ होकर गाँधी के पास आ जाएँ।
आखिरकार कोसंबी जी ने 4 मई, 1947 को अन्न त्यागकर स्वेच्छा से मृत्यु का वरण करने की इच्छा जता दी। यह खबर पाकर अगले ही दिन आचार्य कोसंबी को लिखे एक खत में महात्मा गाँधी ने लिखा तुम्हारा कार्ड मिला। मृत्यु हमारी सच्ची और अचूक मित्र है। सबको अपने समय पर साथ ले जाती है। इसलिए जाना ही पडे तो शांति से और दिल में राम को रखकर हँसते चेहरे उससे भेंट करना। महात्मा गाँधी ने आग्रह कर कोसंबीजी से उनका अनशन तुडवाया, लेकिन तब तक उनका पाचन तंत्र पूरी तरह अशक्त हो चुका था। अंततः उन्होंने केवल जल ग्रहण करना शुरू किया। 16 मई 1947 को धर्मानंद कोसंबी को लिखे अपने खत में गाँधी ने लिखा तुम्हारा सब अहवाल हमेशा मिलता है। तुम्हारा पैगाम भी बलवंत सिंह ने दिया है। तुम्हारे आश्रम में रहने से मुझको बडा आनंद होता है। शांति से ही जाओगे इसमें मुझे शक नहीं है।9 बलवंत सिंह ने गाँधी को विस्तार से कोसंबीजी मानसिक एवं आत्मिक शांति के बारे में लिखा था। गाँधी ने बलवंत सिंह को जवाबी खत में लिखा कि आचार्य कोसंबी के बारे में जानकर उन्हें आनंद होता है और वे मानते थे कि उनके आश्रम में रहने से आश्रम (सेवाग्राम आश्रम) पवित्र होता है।
अपने अंतिम दिनों में धर्मानंद कोसंबी ने यह इच्छा व्यक्त की थी कि उनकी मृत्यु के बाद कुछ विद्यार्थियों को हर साल लंका भेजा जाए, जो पालि सीखकर भारत में बौद्ध धर्म का प्रचार करें। इस संबंध में गाँधीजी ने पटना से बलवंत सिंह को लिखे एक खत में लिखा कि पालि भाषा सीखने के लिए विद्यार्थी भेजने के संबंध में कोसंबीजी की जो इच्छा है, उसे ज़रूर पूरा किया जाएगा। कोसंबीजी ने इस संबंध में गाँधीजी को 1100 रुपए भी दिए थे। उन्होंने यह भी जोडा कि मेरी उनसे प्रार्थना है कि अब ऐसी बातों को भूल जाएँ और अंतर्ध्यान होकर देह छूटना है तो छूटें, रहना है तो रहे। बलवंत सिंह ने धर्मानंद कोसंबी के अंतिम संस्कार के विषय में भी गाँधी से पूछा था। इसके जवाब में गाँधी ने लिखा कि यदि कोसंबी जी अंतिम निर्णय हम पर छोडते हैं, तो दाह-संस्कार करना ही उचित होगा।10
आहार त्यागने के ठीक एक महीने बाद 4 जून, 1947 को धर्मानंद कोसंबी की मृत्यु हो गई। आचार्य कोसंबी के निधन के अगले दिन दिल्ली में आयोजित प्रार्थना-सभा में महात्मा गाँधी ने उनकी मृत्यु की चर्चा करते हुए कहा कि वैसे किसी मृत्यु पर हमें दुख नहीं मानना चाहिए, लेकिन इंसान का स्वभाव है कि वह अपने स्नेही या पूज्य के मरने पर दुख मनाता ही है। कोसंबीजी को गाँधीजी ने ऐसा मूक कार्यकर्ता कहा जो उपेक्षित रहकर भी सेवा के पथ से डिगता नहीं है। महात्मा गाँधी का कहना था कि हम लोग ऐसे बने हैं कि जो काम की डुग्गी पिटवाता फिरता है और राज्य-कारण में उछालें भरता है, उसको तो हम आसमान पर चढा देते हैं लेकिन मूक काम करने वालों को नहीं पूछते। कोसंबी जी ऐसे ही मूक कार्यकर्ता थे।
बौद्ध धर्म में कोसंबीजी की अगाध निष्ठा और ज्ञानार्जन की उनकी ललक की चर्चा करते हुए गाँधीजी ने कहा कि जन्म से वह हिन्दू थे, पर उनको ऐसा विश्वास बैठ गया था कि बौद्ध धर्म में अहिंसा, शील आदि जितने बढे-चढे हैं, उतने दूसरे धर्मों में, वेद-धर्म में भी नहीं हैं। इसलिए उन्होंने बौद्ध-धर्म स्वीकार किया और बौद्ध शास्त्रों के अध्ययन में लग गए और उसमें इतने बडे विद्वान हो गए कि शायद ही हिंदुस्तान में उनकी बराबरी का और कोई हो।11 तीन दिन बाद प्रार्थना-सभा में गाँधी ने पुनः आचार्य कोसंबी को याद करते हुए कहा कि सेवाग्राम आश्रम के संचालक बलवंत सिंह ने उन्हें लिखा है कि उन्होंने ऐसी मृत्यु आजतक नहीं देखी। इस संदर्भ में गाँधी ने कबीर के दोहे को भी उद्धृत किया - दास कबीर जतन करि ओढी, ज्यों-की-त्यों धर दीनी चदरिया। गाँधीजी आचार्य कोसंबी की अंतिम इच्छा यानी पालि सीखने के लिए छात्रों को श्रीलंका भेजने की बात को पूरा करने के लिए भी समर्पित रहे। 9 जून 1947 को इसी संदर्भ में लिखे एक पत्र में उन्होंने लिखा कि कोसंबीजी के निधन के बाद पालि सीखने और बौद्ध धर्म के अनुशीलन हेतु हमें भारतीयों को लंका भेजना चाहिए। साथ ही, गाँधी ने सुझाव माँगे कि ऐसे विद्यार्थियों का चयन किन नियमों के आधार पर हो और उन पर कितना व्यय होने की संभावना होगी।12 आखिरकार धर्मानंद कोसंबी की इच्छा को पूरा करते एक युवा विद्यार्थी पद्मनाभ जैनी को पालि के अध्ययन के लिए श्रीलंका भेजा गया था।13
महात्मा गाँधी ने धर्मानंद कोसंबी स्मारक के लिए धन जुटाने में भी सहयोग किया। इस कार्य में कमलनयन बजाज और काका कालेलकर ने योगदान दिया। आरंभ में कमलनयन बजाज ने ही स्मारक को एक हजार रुपए दिए। सितंबर 1947 में गाँधीजी ने इस संदर्भ में कमलनयन बजाज को लिखे एक खत में कहा कि कोसंबी स्मारक को ठीक चलाने के लिए पच्चीस हजार की दरकार है। वह तुम्हें इकट्ठा करना चाहिए। इसी आशय का एक पत्र गाँधीजी ने काका कालेलकर को भी लिखा कि वे धर्मानंद-स्मारक के काम में जुटे रहें। पच्चीस हजार रुपए इकट्ठा करने में वे पूरा सहयोग करेंगे।14 धर्मानंद कोसंबी से महात्मा गाँधी के जुडाव ने उन दोनों के जीवन को गहरे प्रभावित किया। महात्मा गाँधी से प्रभावित होकर जहाँ आचार्य कोसंबी राष्ट्रीय आंदोलन से जुडे, जेल गए। वहीं महात्मा गाँधी ने भी आचार्य कोसंबी को बौद्ध दर्शन के गंभीर विद्वान के साथ-साथ एक पवित्रात्मा, अभिन्न मित्र और निश्छल सत्याग्रही के रूप में देखा। अपनी प्रार्थना-सभाओं में भी गाँधी ने आचार्य कोसंबी को अत्यंत आत्मीयतापूर्वक याद किया।
संदर्भ -
1. धर्मानंद कोसंबी, भगवान बुद्ध : जीवन और दर्शन, (इलाहाबाद : लोकभारती, 2009), पृ. 5.
2. सम्पूर्ण गाँधी वांङमय, खंड 22, पृ. 241.
3. मीरा कोसंबी (संपा.), धर्मानंद कोसंबी एसेंशियल राइटिंग्स, (रानीखेत : परमानेंट ब्लैक, 2010), पृ. 24-26.
4. सम्पूर्ण गाँधी वांङमय, खंड 24, पृ. 87-89.
5. धर्मानंद कोसंबी एसेंशियल राइटिंग्स, पृ. 28-30.
6. सम्पूर्ण गाँधी वाङमय, खंड 68, पृ. 210.
7. सम्पूर्ण गाँधी वांङमय, खंड 80, पृ. 375.
8. धर्मानंद कोसंबी, पार्श्वनाथ का चातुर्याम-धर्म, (बंबई : हेमचन्द्र मोदी पुस्तकमाला ट्रस्ट, 1957).
9. सम्पूर्ण गाँधी वांङमय, खंड 87, पृ. 495.
10. सम्पूर्ण गाँधी वांङमय, खंड 87, पृ. 525.
11. सम्पूर्ण गाँधी वांङमय, खंड 88, पृ. 70.
12. वही, पृ. 99. मुन्नालाल शाह को लिखे एक पत्र में भी महात्मा गाँधी ने इसकी चर्चा की थी.
13. देखें, रामचन्द्र गुहा, डेमोक्रेट्स एंड डिसेंटर्स, (गुडगाँव : पेंगुइन, 2016).
14. सम्पूर्ण गाँधी वांङमय, खंड 89, पृ. 227-228.

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