fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

रमेश चन्द्र शाह का भारतबोध

कौशल्या नाई
रमेशचन्द्र शाह हिन्दी के मूर्धन्य रचनाकरों में अग्रणी हैं। इस समय वे हिन्दी परिदृश्य के उन गिने-चुने लेखकों में हैं जिन्होंने हिन्दी की तीन पीढियों को देखा, भोगा और अपने रचनात्मक ताप से उसे नयी अर्थवत्ता और सृजनात्मक ऊर्जा देने की कोशिश की है।
उनका लिखा अर्थ बहुलता और अर्थ समृद्धता का उदाहरण है। उन्होंने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं को अपनी लेखनी के स्पर्श से आगे बढाने की सार्थक कोशिश की है। उनके सृजन संसार का केन्द्रीय विचार है आत्मलोचन के माध्यम से आत्मपूरित होने की रचनात्मक संभावनाओं का उत्खनन।
उपनिवेशवाद के धुँधलके में लिपटी हमारी विश्वखण्डित आत्मविभाजित संस्कृति के भीतर एक सांस्कृतिक आत्म की तलाश करना उनके सृजन का मूल है।
भारतबोध इस समय हमारी ज्ञान राजनीति का सबसे चर्चित पद है। शाह का शालीन रचनाकार बिना कनफाडू शोर-हाहाकार के भारतीय स्वभाव के साथ चित्त की प्रकृति के अनुकूल होकर सहजता से अपनी साहित्यिक वैचारिकी में एक ऐसे भारतबोध से अपने पाठक को संसकारित करते हैं कि बिना किसी अकादेमिक विमर्शों के आल-जात में उलझे वह आसानी से इस तथ्य से रूबरू हो जाता कि भारतबोध या कहलें भारतीय होने का मर्म क्या है?
शाह का भारतबोध राष्ट्रवाद जैसे हिंदुत्वी बोध से उपजा सायास विचार नहीं है। उनके यहाँ तो भारताबोध का विचार महात्मा मंगतराम और अनिर्वाणजी के अध्यात्म चेतना की धारा से सिंचित है। जिसकी जडे उनके बचपन में ही पड चुकी थीं।
आगे बढने से पूर्व हम यहाँ यह भी जान लेते हैं कि भारतीयता जो कि एक भाववाचक संज्ञा है, उसकी व्युत्यपति मूलक अर्थ क्या है?
भारतीयता में मूल शब्द भारत है और भारत में मूल शब्द है- भा । यह दो शब्दों से मिलकर बना है भा+रत। भा का अर्थ- तेज, चमक, प्रकाश, प्रखरता, ज्ञान, ज्योति, प्रकाश आदि से है। वहीं रत से तात्पर्य है- भरा हुआ या ले जाने वाला। अर्थात् ज्ञान, ज्योति, प्रकाश की ओर ले जानेवाला या ज्ञान, ज्योति, प्रकाश आदि से भरा हुआ है, वह भारत कहलाता है।1
भारत शब्गद में ईय, प्रत्यय लगने से भारतीय विशेषण बनता है व भारतीय विशेषण में ता प्रत्यय लगाकर भारतीयता (भाववाचक संज्ञा) रूप में परिणत हो जाता है। भारतीयता से तात्पर्य उस विचार भाव से है, जिसमें भारत से जुडने का बोध होता हो, भारतीय तत्त्वों की झलक हो या सहभाव की सांस्कृति से सम्बन्धित हो। आजकल भारतीयता शब्द राष्ट्रीयता व्यक्त करने के लिए प्रयोग होता है। भारतीयता हमें हमारे भारतीय होने का बोध कराती है। भारत शब्द से अर्थ हमने लिया कि जो प्रकाश, ज्ञान आदि की ओर ले जाए वह भारत है। तो यहाँ पश्न उठता है कि क्या दुनिया में भारत ही इकलौता ऐसा देश है जो शेष विश्व को ज्ञान की तरफ ले जाता है? क्या विश्व की अन्य सभ्यताएँ हमें ज्ञान की तरफ नहीं ले जाती? क्या अन्य सभ्यताओं का ज्ञान से सम्बन्धित ऐसा इतिहास नहीं रहा है? नहीं, अन्य सभ्यताओं ने भी ज्ञान का सम्मान किया हैं, तथा इसके बारे में विशेष चर्चाएँ की हैं। उन सभ्यताओं की भी मनुष्य जाति उतनी ही ऋणी है, जितनी कि भारत की। लेकिन इस क्षेत्र में भारत की भूमिका इसलिए भिन्न है क्योंकि भारत ने विश्व को ज्ञान की प्रथम पुस्तक ऋग्वेद दी, दुनिया को पहला काव्य रामायण दिया, भरत जैसा राजा यहाँ हुआ और महात्मा बुद्ध, विवेकानंद, गाँधी जैसे विचारक भारत ने दिए। इसलिए शायद इसका नाम भारत पडा तथा इसी कारण भारत को ज्ञान, ज्योति, प्रकाश की ओर ले जाने वाला माना जाता है।
हम पाते हैं कि दुनिया के विभिन्न धर्म, मजहब दुनिया के विभिन्न वर्गों से सम्बन्धित लोग नालन्दा, तक्षशिला आदि महाविद्यालयों में हजारों की संख्या में अध्ययन करने के लिए भारत आते रहे हैं। जब भारतीयता को लेकर विमर्श खडा होता है, जो हमारे लिए चिन्तन का विषय है कि आज इस विषय की प्रासंगिकता क्या है? और हमारे समय का सर्वश्रेष्ठ सृजक इस शब्द के साथ कैसे सम्बन्ध बनता है तथा इसे वह किस प्रकार से व्याख्यायित करता है।
रमेशचन्द्र शाह गहरे आध्यात्मिक रचनाकार हैं। दर्शन उनका प्रिय विषय रहा है। हालांकि उनकी विशेषज्ञता विदेशी साहित्य में रही और आजीवन उन्होंने उसी को पढाया भी, पर उनकी अपनी जडे अपनी संस्कृति में हैं। हर रचनाकार के व्यक्तित्व में एक चिंतक, विचारक और आलोचक होता है। शाह का विचारक महर्षि अरविन्द, गाँधी, अज्ञेय, निर्मल वर्मा की विचार सरणि का है।
अपनी डायरी अकेला मेला में वे अपने संस्कृति चिंतन में महर्षि अरविन्द, गाँधी से तेज लेकर आगे बढते हैं, वे लिखते हैं कि श्री अरविन्द ने भारतीय संस्कृति के बारे में कहा है- भारतीय संस्कति एक ऐसे सिद्धान्त को लेकर अग्रसर हुई, जिसमें एकता में ही अपना आधार पाने की चेष्टा की और उससे आगे किसी महत्तर एकत्व तक पहुँचने का प्रयास किया। उसका ध्येय एक ऐसे स्थायी संगठन का निर्माण था, जो संघर्ष तत्त्व को कम से कम कर दें। किन्तु अंत में वह वर्ण और विभाजन द्वारा तथा एक प्रकार की शान्ति और गतिहीन व्यवस्था ही ला सकी। उसने अपने चारों और एकसुरक्षा का घेरा बना लिया और अपने को सदा के लिए बंद कर दिया। जो सांमजस्य सििातिशील और सीमाबद्ध होता है, वह एक कारागार बन जाता है।2
भारतभूमि तो गाँधी जैसे अहिंसावादी पुत्रों की भूमि रही है। गाँधी ने इस भारत भूमि पर एकबार फिर रामराज्य की कल्पना की थी तथा अपनी संस्कृति के लिए आर्थिक असमानता को सबसे बडा खतरा बताया था। गाँधी ने नवजीवन पत्रिका में स्वराज और रामराज्य शीर्षक से एक लेख में लिखा था- रामराज्य को मैं धर्म-राज्य कहूँगा... हम तो रामराज्य का अर्थ स्वराज्य, धर्मराज्य, लोकराज्य करते है।3
शाह के भारतीयता सम्बन्धित विचारों को समझने साथ-साथ हमें उनके समकालीन लेखक व उनके मित्र रहे लेखकों के इस विषय पर क्या विचार हैं, उसकी ओर भी ध्यान देना आवश्यक प्रतीत होता है। उनमें मुख्यतः हम अज्ञेय व निर्मल वर्मा के विचारों की ओर दृष्टि कर सकते हैं।
यह सभीको विदित है कि शाह के जीवन व साहित्य दोनों पर श्री अरविन्द, गाँधी, अज्ञेय व निर्मल वर्मा का अत्यधिक प्रभाव पडा है। शाह अपने विचारों को व्यक्त करते समय इनके विचारों पर भी ध्यानाकृष्ट करना-कराना कभी नहीं भूलते हैं।
सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय भारतीयता पर कहते हैं कि भारत की आत्मा सनातन है, भारतीयता केवल एक भौगोलिक परिवृत्ति की छाप नहीं, एक विशिष्ट आध्यात्मिक गुण है जो भारतीय को सारे संसार से पृथक करता है। भारतीयता मानवीयता का निचोड है, उस की हृदय की मणि है, उस का शिर सावंतस है, उसके नाक के बेसर है..... भारतीयता का दूसरा विशिष्ट गुण है स्वीकार की भावना....। हमें चाहिए वह बेलाग सचित्त जिज्ञासा जो परिवृत्ति से घिरी हुई भी आगे देखें। जो अपने देश में रहकर भी आगे देखें, आगे दूसरे देशों को नहीं हम से आरम्भ होने वाली आगे की दिशा को, आगे को जो अपने काल में रहकर भी आगे देखें, न इधर अनादि को, न उधर अनन्त को, वरन् हम से आगे के उस काल को जो हमारे काल से प्रसूत है और जिस से हम स्रष्टा है। वह अपरिबद्ध जिज्ञासाद भारतीयता है कि नहीं......।4
वहीं दूसरी ओर निर्मल वर्मा अपने विचारों से अवगत करवाते हुए लिखते हैं - भारतीय संस्कृति का अमृतनाभ उसका आत्मपूरित होना है और उसका लक्षण यह है कि वह अन्य के सन्दर्भ में अपने को परिभाषित नहीं करता। भारतीय सभ्यता की यह अद्भुत विशेषता रही है- जो उसके जीवन्त होने की मर्यादा है- कि वह अतीत को व्यतीत न मानकर उसे समकालीन की प्रतीक व्यवस्था में संयोजित कर पायी है जो आज भी उतनी ही अर्थवान और संस्कार सम्पन्न है, जितनी पहले कभी थी।5
इन विद्वानों के विचारों से रूबरू होने के बाद, हम भारतीयता को भली-भाँति समझ सकते हैं। पूर्णतः नहीं भी तो शायद थोडा बहुत, भारतीयता को समझने में ये विचार एवं विचारक सहायक अवश्य प्रतीत होते हैं, किन्तु भारतीयता को किसी परिभाषा में रूपान्तरित करना थोडा कठिन जान पडता है। भारतीयता तो भारत के प्रत्येक जन के हृदय में विराजमान है। बहरहाल इस कडी में डॉ. रमेशचन्द्र शाह का लेखन बहुआयामी एवं अत्यन्त समृद्ध है। डॉ. शाह की कईं रचनाओं में उन्हें भारतीयता पर विचार करते हुए देखा जा सकता है, जिसमें डायरी भी महत्त्वपूर्ण है।
डॉ. शाह जब किसी विषय पर बात करते हैं, तो एक खोजी भ्रमर की तरह चारों तरफ से रसपान करते हुए अपने विचारों को प्रस्तुत करते हैं। इसका अभिप्राय यह कतई नहीं है कि शाह साहब रस लोभी या उनके पास उसकी कमी है, बल्कि शाह साहब तो उन रसों को एकाकार करते हुए शहद रूपी सार तत्त्व लेकर हमारे सामने उपस्थित होते हैं और यह मधु कई रस पिपासुओं की प्यास बुझाने में बहुत ही सहायक सिद्ध भी होता है।
शाह कईं परम्पराओं से रस ग्रहण करते हैं, लेकिन फिर भी शाह के चिन्तन के केन्द्र का फैलाव बहुत अधिक दूरी भी तय करता है। शाह भारत के बारे में विचार करते हुए नैमेतिक में लिखते हैं - भारत विश्व का सर्वाधिक विश्वचेतस राष्ट्र है और इसका कारण उसका राजनीतिक महाशक्ति होना या अपनी सभ्यता दृष्टि को लेकर एक विश्वविजयी साम्राज्यवादी दर्प से परिचालित होना नहीं है। भारत इसलिए स्वभावतः विश्व-चेतस है कि वह विश्व की सर्वाधिक आत्म-चेतस संस्कृति का अधिष्ठन है। उससकी चेतना मानवतावादी से भी आगे बढकर चराचरवादी और ब्रह्माण्डव्यापी चेतना है।.... इस प्रकार जो उत्कृष्ट काव्य की प्रेरणा और प्रक्रिया है, विरूद्धों के सांमजस्य कीप्रक्रिया- वही भारतीय सभ्यता और संस्कृति के उद्भव और विकास की भी प्रेरणा और प्रक्रिया रही है। यही कारण है कि यह भूमि अनायास ही धर्मचेनता की, यानी अध्यात्म विज्ञान की भी सबसे बडी प्रयोगशाला की तरह विकसित हुई है। यही विशेषता धर्म के भारतीय स्वरूप को बाकी सारे तथाकथित विश्व धर्मों से अलग वैशिष्ट्य प्रदान करती है।6
उपर्युक्त पंक्तियों पर शाह पर श्री अरविन्द का प्रभाव स्पष्ट दिखायी देता है। शाह भारतीयता को अरविन्द की परम्परा में ही व्याख्यायित करते नजर आते हैं। शाह पर जितना प्रभाव अरविन्द का रहा है, उतना ही गाँधी का और उनकी रचना हिन्दी स्वराज का भी रहा है। शाह उन्हीं की परम्परा का निर्वहन करते हुए आज भारतीय संस्कृति किस ओर उन्मुख हो रही है, पर भी चिन्ता व्यक्त करते हुए दिखायी देते हैं। शाह कहते भी हैं कि भारतीय संस्कृति का इतिहास क्या रहा है?.... और अब उसका वर्तमान और भविष्य कैसा, क्या है? कोई भविष्य है भी कि नहीं? क्या अब पश्चिमी विश्व दृष्टि के प्रगति-पथ में जुतकर ही उसे अपने को कृतकार्य समझ लेना होगा? या कि अब भी उसकी कोई प्रासंगिकता शेष बची है? इस सर्वग्रासी वात्याचक्र में अब हमारी भूमिका क्या एक निरीह भोक्ता-दर्शक या आत्महीन नकलची की हो सकती है? या कि इस मूल्यमूढता एवं मूल्य-विपर्मम को मूल्यों के पुनर्वास की ओर मोडने की अभी कोई गुंजाईश है।
शाह ने भारतीय समाज से कटे बौद्धिक वर्ग और शैक्षिक दुनिया के सच से लेकर भाषाई गुलामी को अपनी कसौटी पर पूरी तरह कसा है। शाह ने अपनी डायरी में भारतीय संस्कृति पर हावी हो रही पाश्चात्य संस्कृति पर भी ध्यानाकृष्ट करते हुए गहरा चिन्तन व्यक्त किया है- शाह ने स्वराज इन आइडियाज की समीक्षा पढने के बाद उन्होंने डायरी में लिखा है कि इसको पढकर मेरी आँखे खुल गयीं। उन्हीं के शब्दों में- हमारा सारा शिक्षा तंत्र ही इस समय ऐसा है कि पाश्चात्य संस्कृति ही हमारे भीतर पहले पैठ जाती है। अपनी प्राचीन संस्कृति को हम इस तरह आत्मसात नहीं करते। महज कुतूहल की तरह उसमें ताक-झाँक भर करते हैं। हमारे शिक्षित लोग वैसा कतई नहीं सोचते-महसूसते, जैसा उन्हें अपनी प्राची न संस्कृति के निरन्तर सम्पर्क के फलस्वरूप अपनी स्वयं की आत्मा का आविष्कार कर रहे हैं। पाश्चात्य संस्कृति हम पर लादी तो गई, किन्तु हमने खुद भी उसकी चाहना और माँग की थी। उसे हमने खुली आँखों, खुले होशो-हवास में आत्मसात नहीं किया- अपनी परम्परागत मन हम शिक्षित भारतीयों की पहुँच से बाहर हमारी चेतना के अचेतन स्तरों में जा डूगा हैं। अब वह सिर्फ हमारे कुछ पारिवारिक, धार्मिक रीति-रिवाजों, अनुष्ठानों में ही सक्रिय होता है, पर उन अनुष्ठानों, संस्कारों का भी कोई जीवन्त अभिप्राय हमारे भीतर नहीं धडकता। जब अपनी ही विरासत के साथ हमारे रिश्तों का यह हाल है तो जो हम पर आरोपित की गई है, उन संस्कृति के जीवन्त आत्मसात्करण का प्रश्न ही कहाँ उठता है? पाश्चात्य प्रतिमानों के साथ अपने स्वदेशी प्रतिमानों का संश्लेषण करना हर जगह जरूरी लगे वहाँ भी प्रक्रिया यह होनी चाहिए कि पाश्चात्य प्रतिमानों का अनुकूल समायोजन हमारे प्रतिमानों द्वारा हमारे प्रतिमानों के आधार पर हो, न कि इसके उल्टा।7
शाह का यह वक्तव्य कहीं न कहीं उद्वेलित करने वाला है। यह सत्य है कि भारतीय संस्कृति ने अन्य सब संस्कृतियों को अपनी ओर आकर्षित किया है। आज आधुनिकता, वैश्वीकरण और औनिवेशिकता के नाम पर हावी होती नजर आ रही है, लेकिन भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे पुरातन संस्कृति है। इतना सब कुछ होते हुए भी भारतीय संस्कृति और सभ्यता विश्व के इतिहास पटल पर आज भी मूल से जुडी और स्थापित है और उसका आलोक मानवता को प्रकाशित करने में अपनी अहम भूमिका निभा रहा है। क्योंकि भारतीयता की सबसे बडी पूँजी, उसका प्राण अपने धर्म में है, उसकी आध्यात्मिकता में है। और यही भावना उसे अपने ऊपर अन्य संस्कृतियों को हावी होने पर अंकुश भी लगाती नजर आती है। शाह कहते हैं कि आधुनिक विश्व पर पाश्चात्य मनोवृत्ति का प्रभुत्व है और हम इस प्रभुत्व का प्रतिकार करते हुए भारतीय मूल्य दृष्टि का महत्त्व पुनः स्थापित करना चाहते हैं; उन्हीं ने हमारी सभ्यता की एक अपनी ऐतिहासिक दुर्बलता या कमी को भी यथार्थतः देखने और समझने की कोशिश भी साथ-साथ की थी। वह कोशिश गाँधी की कोशिश की तरह ही इसलिए मूल्यवान है कि वह समूचे विश्व की हितचिंता से परिचालित है। अंततः दुनिया की सारी सभ्यताओं की उपलब्धियाँ मानव मात्र की उपलब्धियाँ हैं और पश्चिमी दृष्टि की आलोचना करने का अर्थ पश्चिम की उपलब्धियों को नकारना कदापि नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय संस्कृति और सामाजिक परम्परा का सर्वाधिक दृढ और अक्षय नाभिकेन्द्र धर्म ही है, उसका यह दृढ विश्वास कि धर्मों रक्षति रक्षितः।
सच्ची भारतीयता वही है जो स्वयं प्रकाशित होती है। भारत का जन जो हर परिस्थितियों में मुस्कुराना जानता है, यूरोप के लोगों की तरह तनाव या अवसाद के घेरे में नहीं जीता और भारतीय संस्कृति अपनी इसी विशेषता की वजह से ही संसार को अपनी ओर आकर्षित करती रही है। पर इतना सब कुछ होते हुए भी कहीं न कहीं आज पाश्चात्य संस्कृति भारतीयता पर हावी होती नजर आ रही है। आधुनिकीकरण के नाम पर पाश्चात्य संस्कृति भारतीय संस्कृति को अपने आगोश में कैद करती जा रही है। हमें अपने भारतीय होने का सही अर्थ समझना होगा। भारतीय होने का मतलब भारत भूमि में रहना या उसकी जीवन शैली में शामिल होना, उसे अपनाना मात्र नहीं है। भारतीय होने का अर्थ निरन्तरता, प्रवाह, सातत्त्य, आत्मपूरित होने की राह का निरन्तर संवाद अन्वेषण, सहकार, सहनशीलता आदि से है।
शाह के भारतबोध की बुनियाद में सभ्यताओं से संवाद, समभाव, सर्वभाव के साथ सांस्कृतिक आत्म की तलाश है। क्योंकि यूरोपीय साहित्य एवं संस्कृति के विशद् अध्ययन से उन्हें भली-भाँति यह बोध हो चुका है कि यूरोप की संस्कृति आत्मखण्डित संस्कृति है। वे आत्मविभाजित भारत से संतुष्ट नहीं है। उन्हें आत्मसम्पन्न भारत की तलाश है जिसे वे अपने साहित्य में अनेक स्तरों पर अन्वेषित करने की यथासंभव रचनात्मक कोशिशें करते हैं।
शाह ने अपनी डायरी में समय-समय पर देश, समाज व भारतीयता पर अपने विचारों को गति प्रदान करते रहे हैं। शाह ने डायरी के माध्यम से सभ्यता के नाम पर हो रहे संघर्ष से लेकर भारतीय समाज से कटे देसी बौद्धिक वर्ग, शैक्षिक दुनिया के सच से लेकर भाषायी गुलामी को अपनी कसौटी पर पूरी तरह कसा है। शाह आज की वैश्विक परिस्थितियों में आत्मविस्तार के बिना जीवन रक्षा तक को असम्भव मानते हैं।
शाह के अनुसार मनुष्य का मनुष्यत्व उसकी यथास्थिति में नहीं, उसके अतिक्रमण में प्रकट होता है किन्तु इस प्रक्रिया में एकतरफा आदान खतरनाक है। अतः वे सामूहिकता के साथ सद्भाव के मार्ग आगे होने के अनेक उदाहरण देते हुए संस्कृति की निरन्तरता को संवाद निरन्तरता तक लाते हैं। यही उनका अपना भारतबोध है।
संदर्भ -

1. मोनियर विलियन्स डिक्षनरी, पृ.७४३
2. अकेला मेला, रमेशचन्द्र शाह, पृ. १४५
3. https : satyagrah.scvoll.in – pg.743
४. Hindisamay.com
5. भारत और यूरोप, निर्मल वर्मा पृ. 15
6. नैमित्तिक, डॉ.रमेशचन्द्र शाह, पृ. १५६-१५७,
प्रकाशन सस्ता साहित्य मण्डल।
7. अकेला मेला, रमेशचन्द्र शाह, पृ. १५६-१५८,
प्रकाशन किताबघर प्रकाशन

सम्पर्क : हाऊस नं.5, मुरली कॉलोनी,
उदासर फाँटे के सामने, जयपुर रोड,
बीकानेर पिन - ३३४००१
मो. ९९५०६३८१४३