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अरूण कमल के काव्य बिम्ब

केशव यादव
समकालीन हिन्दी कविता को नूतन दृष्टि प्रदान करने वाले कवियों में अरूण कमल का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। अपनी कविताओं के माध्यम से समकालीन कवियों के बीच आपने एक विशेष पहचान बनाई है। विशेष रूप से आठवें और नौवें दशक में कविता का जो मुखर स्वरूप सामने आया उसे ही समकालीन कविता का नाम दिया गया। इस कविता में जीवन की प्रत्येक अनुभूतियों का समग्र रूप से चित्रण किया गया है और यथार्थ के क्रांतिकारी रूप का उद्घाटन किया गया है। कवि अरूण कमल में यह विशेषता पूर्णरूप से पायी जाती हे। समकालीन कविता की प्रगतिशील, अनुभूतिपरक संवेदना और सर्वव्यापक चेतन-दृष्टि से आफ सभी काव्य-संग्रह ओत-प्रोत हैं। अरूण कमल की कविताएँ आम आदमी की सबल पक्षधर हैं, जिनमें सर्वहारा जन की वेदना और लाचारी को वाणी मिली है।
अरूण कमल की कविताएँ जीवन के प्रति गहरी लालसा की कविताएँ हैं। कवि ने अपने आस-पास की दुनिया को बहुत प्रेम और विश्वास के साथ अपनी कविताओं में उतारा है, अपनी सहजता, ऐन्द्रिकता और आकुलता के लिए इनकी कविताएँ एक स्वर से सराही गयी हैं। अरूण कमल का ही शब्द लेकर कहें तो ये खिच्चा कविताएँ हैं। इनकी कविताएँ जहाँ एक ओर अवसादग्रस्त, अभावों में जीवनयापन करते मनुष्यों की आत्मकता है तो दूसरी ओर उनकी गहन जिजीविषा को अनुपम परिचायक भी हैं। इनकी कविता का फलक बहुत विस्तृत है, वह हर बार नई जगहों की तलाश करती है। इनकी कविताएँ उन पात्रों, घटनाओं व उपकरणों को लेकर रची गयी हैं, जो जातीय पहचान को तीव्र व साफ बनाते हैं। वस्तुतः समकालीन हिंदी कविता में स्थानीय बिम्बों का अधिक प्रयोग देखने को मिलता है, यह बिम्ब कवि की जमीन से उठे बिम्ब होते हैं। समकालीन कवि अपनी जमीन, अपने स्थान, अपने परिवेश के अत्यधिक करीब हैं एवं वही सब जो अनुभूत करते हैं, उन्हीं को बिम्बों के रूप में कविता में प्रयुक्त करते हैं। अतः अरूण कमल के काव्य-बिम्ब पूर्ण रूप से उनकी अनुभूति के बिम्ब हैं वह जो और जैसा अनुभव करते हैं। उसी को चित्र रूप में कविता में चित्रित करते हैं। उनकी कविताओं में आए बिम्ब में उनकी जमीन के रस-रूप-गंध-स्पर्श द्रष्टव्य होते हैं। अरूण कमल की कविता में प्रचलन से बिल्कुल अलग, नये एवं अनूठे बिम्ब देखने को मिलते हैं, जो उनकी स्वयं की अनुभूति का परिणाम है। जो निम्नप्रकार से हैं-
घ्राण बिम्ब :
इस बिम्ब का सम्बन्ध हमारी नासिका की घ्राण शक्ति से है। इसे गन्ध-बिम्ब या घ्राण-बिम्ब के नाम से भी जाना जाता है। अरूण कमल ने घ्राणिक बिम्ब का बहुत सजीव वर्णन कविता में किया है। वे स्वयं गन्ध को जीवन से जोडते हुए मानते हैं कि-
पहचानो कि किस कटे खीरे की गंध है हवा में
पहचानने की कोशिश करो
शायद वह खीरा भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी का हो
जिसके लिये तुम पहली बार जगे थे रात भर 1
पुतली में संसार
यहाँ कटे खीरे की गंध से जन्म का जो चित्र उभरकर सामने आता है वह बिम्ब की सार्थकता को व्यक्त करता है। गन्ध या सुगन्ध के विषय में अरूण कमल स्वयं कहते हैं-
मुझे खीरे की, कटते खीरे की गन्ध सबसे ज्यादा परेशान करती है। यह किसी नये जन्म की गन्ध है जैसे केवडा की गन्ध किसी गहरे पैशन या आवेग की और हींग की गन्ध भूख है। शरद की रात में सप्तपर्णी की मंजरियों की गन्ध सबसे अधिक उद्विग्न करती है, लेकिन बरसात में अधसूखे कपडों की गन्ध मुझे मृत्यु की याद दिलाती है। रोशनाई की गन्ध, तुरन्त छिली पेंसिल की गन्ध और पुरानी किताबों की गन्ध...। लेकिन पढते लिखते वक्त कोई उपरी या बाहरी गन्ध न हो तो ज्यादा अच्छा, सिर्फ भीतर नाभि के कस्तूरी की गन्ध, अगर हो तो ..। 2
अभिसार कविता की पंक्तियाँ गन्ध के माध्यम से एक मध्यवर्गीय घरेलू स्त्री से सीधा सम्पर्क करती है-
प्याज की तेज गन्ध हींग जीरे की कपूर की गन्ध
मुझे किसी औरत की गन्ध लग रही है।
***
चारों तरफ परछाइयों के छाप
और संचित सुगन्ध से व्यग्र रात्रिगन्धा।3
नये इलाके में
आती है सरसों के फूलों की कौंधती गन्ध
एक ही वार में काटती मुझे
और रात भर मैं जगा रह जाता हूँ
छोटी-सी कोठरी गन्ध-भीड-भरी4
सबूत
सरसों की गन्ध के माध्यम से एक हताश, असहाय कृषक की वेदना का मार्मिक चित्रण कवि यहाँ करता है।
श्रवण-बिम्ब-
श्रव्य-बिम्ब का दूसरा नाम नाद-बिम्ब भी है। इसका सम्बन्ध कर्णेन्द्रिय से होता है ध्वनि, छन्द, लय, तुक आदि से सम्बन्धि बिम्ब श्रव्य-बिम्ब विधानान्तर्गत ग्रहण किये जाते हैं। कवि दाना कविता में गेहूँ फटकती स्त्री का वर्णन करते हुये गेहूँ की फटकार में भी कवि संगीत की ध्वनी का अनुभव कर रहा है-
वह स्त्री फँटक रही है गेहूँ
छानों हाथ सूप को उठाते गिराते
हथेलियों की थाप थाप्प
और अन्न की झनकार
***
बस एक सुख है बस एक शांति
बस एक थाप एक झनकार।5
पुतली में संसार
श्रव्य बिम्ब के माध्यम से अरूण कमल महीन ध्वनि सुनने की चेष्टा करते हैं। उनकी कविता में धरती हजारों तारों वाले वाद्य-सी बज उठती है-
बज रही है धरती
हजारों तारों वाले वाद्य-सी बज रही है धरती
चारों ओर पता नहीं कितने जीव-जन्तु
बोल रहे हैं हजारों आवाजों में
कभी मद्विम कभी मंद्र कभी शान्त 6
सबूत
मातृभूमि कविता में समुद्र की उत्ताल तरंग ध्वनि को श्रव्य बिम्ब के माध्यम से प्रकट करने का सुन्दर प्रयास किया गया है-
और मैं मेले में खोये बच्चे सा
दौडता हूँ, तुम्हारी ओर
जैसे वह समुद्र जो दौडता आ रहा है
छाती के सारे बटन खोले हहाता
और उठती है शंख ध्वनि
कंदराओं के अंधकार को हिलोहडती। 7
पुतली में संसार
आस्वाद-बिम्ब
आस्वाद बिम्ब का सम्बन्ध स्वादेन्द्रिय (जीभ) से है। इनका उपयोग रस तत्त्व की ग्राहृयता और सार भाग को ग्रहण करने वाली वृत्ति के रूप में हुआ है। अरूण कमल अपनी कविता में अमरफल की बात करते हैं। जिसकी एक काट से ही शरीर भीग जाये-
बस एक काट काटा अमरूद
कि भर गया रस से सारा शरीर
भीग गयी हड्डी तक।
यहाँ कवि जिस फल की बात कर रहा है। उससे उसका पुराना परिचय था, लेकिन जब पहली बार उसे डाल पर फूल से फल बनते देखा, उसमें जीवन रस का संचार होते देखा, तो कवि उस अमरफल के रस से अभिभूत हो उठा।
कवि को छप्पन व्यंजन की चाह नहीं है अपितु उस अमरफल की चाह है-
मुझे छप्पन व्यंजन नहीं
बस एक फल दो
सूर्य का लाल फल
अन्धकार का काला फल
जिसे एक बार काटूँ
और अमर हो जाऊ
वही अमर फल! 8
सबूत
चाक्षुष-बिम्ब
चाक्षुष-बिम्ब वे बिम्ब होते हैं, जिनमें पूरा दृश्य आँखो के सामने अपने समग्र रूपाकार में उपस्थित हो जाए। अरूण कमल की कविता में ऐसे सुन्दर दृश्य विद्यमान हैं जिनमें चाक्षुष बिम्ब समग्र रूप से देखने को मिलते हैं।
सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा खडे हों आमने-सामने
कुछ सिरफिरे तो होंगे ही जो आँख बेचकर भी
तमाशा देखें-
ढेर सारे छोटे दृश्यों को देखने से अच्छा है
बस एक बार देखना सौन्दर्य का विपुल पुंज। 9
अपनी केवल धार
इतना अनन्त प्रकाश पुंजत जो सम्पूर्ण सौन्दर्य बोधात्मक तत्वों से मिलकर निर्मित होता है, वह अरूण कमल के काव्य में विद्यमान हैं सूर्य-ग्रहण का ऐसा सुन्दर बिम्ब अनायास ही नेत्रों के सम्मुख वास्तवित सौन्दर्य की उत्पत्ति करता है- उल्लंघन कविता में चींटी के रूप को दर्शाता यह बिम्ब कितना सटीक बैठता है-
उसमें जरा-सा शहद
एक बूँद की भी बूँद
ऐसे भरना कि जरा भी जाया न जाय-
जो लोग बहुधा कला की बात करते हैं
उनसे मेरा कहना है कि हाथी बनाने से कहीं ज्यादा
बहुत ही ज्यादा मुश्किल है चींटी बनाना।
पुतल मे संसार
यहाँ कवि कला की सार्थकता की बात करता है।
स्पर्श-बिम्ब
स्पर्श बिम्ब में स्पर्श-जन्य संवेदनों के सम्न्वय से बिम्ब का निर्माण होता है। पेशल या कोमल, कर्कश, कठोर आदि विशेषण इस प्रकार के स्पर्श-बिम्बों के शब्द हैं। स्पर्श बिम्बों की संरचना स्पर्श, रोमांच, कम्प, शीतलता, उष्णता, यौन भाव, स्मृति चित्र, सात्विक भाव आदि रूपों में हुई है।
सबूत संग्रह की नींद कविता की पंक्तियाँ स्पर्श बिम्ब का अनूठा उदाहरण है-
धीरे-धीरे भारी हो रहा है
तुम्हारा शरीर
मेरी बाँह पर माथ तुम्हारा
ढल रहा है
नींद का शरीर
शीरे की तरह गाढा
शहद की तरह भारी
डूबता चला जाता
जल में
तल तक 10
सबूत
नींद में शरीर का शीरे की तरह गाढा और शहद की तरह भारी हो जाने का सुन्दर उदाहरण स्पर्श बिम्ब द्वारा व्यक्त किया गया है।
हिम दूर तक हिम
यहाँ अच्छा लग रहा है
सूख रहा है पसीना
अलग हो रहा है रोआँ रोआँ
ढेले-सा भरक रहा है शरीर।
नये इलाके में
भाव बिम्ब
भाव का सम्बन्ध हृदय से है, कविता भी हृदय का उद्गार है कवि के विचारों को पाठक का मन जिस रूप में आत्मसात करता है वैसा ही बिम्ब उसे समक्ष उत्पन्न् होता है। अरूण कमल की कविता से आम आदमी इसीलिए तादात्म्य स्थापित कर पाता है क्योंकि अरूण कमल की कविता में आम आदमी के प्रति गहरी संवेदना है।
अरूण कमल एक ऐसे संसार की इच्छा करते हैं जो सुख-सम्पन्नता से इतना अधिक परिपूर्ण हो कि थोडी भी जगह उसमें दुःख के लिये खाली न हो-
मैं जब उठूँ तो भादों हो
पूरा चन्द्रमा उगा हो ताड के फल सा
गंगा भरी हों धरती के बराबर
खेत धान से धधाए
और हवा में तीज त्योहार की गमक
इतना भरा हो संसार
कि जब मैं उठूँ तो चींटी भर जगह भी
खाली न हो।11
पुतली में संसार
समकालीन कविता में मानवीय रिश्तों से गहरा जुडाव है। कवि ने माँ की स्मृति को, थाली में रक्खे थोडे से नमक और हरी मिर्च से कितनी भावुकता से कविता में उकेरा है। कवि के मन में कितनी छोटी-छोटी चीजों से भी माँ की याद जाग उठती है।
सब कुछ यही रहता
ऐसे ही थाली
ऐसे ही कटोरी, ऐसा ही गिलास
ऐसे ही रोटी और ऐसा ही पानी;
बस थाली के एक तरफ
माँ ने रख दी होती एक सुडौल हरी मिर्च
और थोडा सा नमक।12
अपनी केवल धार
प्रकृतिपरक बिम्ब -
अरूण कमल का प्रकृति के साथ गहरा सम्बन्ध रहा है। प्रकृति चित्रण के प्रति इन की सबसे बडी विशेषता यह है कि वे उसका किसी प्रतीक के रूप में वर्णन नहीं करते, बल्कि उसके सहज नैसर्गिक स्वरूप को देखकर उल्लासित होते हैं। प्रकृति के सौंदर्य को शब्द बदृध करने में अरूण कमल सिद्वहस्त हैं-
आश्विन का साफ आकाश है
आधा चन्द्रमा से भरा
हवा ताँत से धुनी हुई हल्की
बडी अब होने लगी रात
गिरने लगी धूल पर ओंस 13
नये इलाके में
अरूण कमल ने अ पनी यात्रा अनुभवों पर लिखी कविताओं में कुछ स्थानों पर कवि ने प्रकृति का सुन्दर बिम्ब प्रस्तुत किया है। वतान्त कविता में रेल यात्रा के दौरान जिस प्राकृतिक सौन्दर्य को देखा उसे शब्दों में कुछ इस प्रकार व्यक्त किया-
दौडती है ट्रेन धृष्ट वेग से पुल पर
कट कर गिरता है चाँद का फाँक
जल में
फिर वे ही मैदान पसरते जाते ढलते 14
नये इलाके में
खेत पीले
हरा पेड
नीला आकाश
बगुले सफेद
नये इलाके में
खेत धन-धान्य से परिपूर्ण है अर्थात् पीले हैं। पेड हरे हैं, आकाश नीला और बगुलों की उडती हुयी श्वेत पंक्ति को व्यक्त करने में कितनी समर्थ सिद्ध हो रही हैं।
सन्दर्भ ग्रंथः-
1. कमल अरूणः पुतली में संसार- खीरा, नवोदय सेल्स नई दिल्ली, संस्करणः2014, पृष्ठ संख्या 56
2. कमल अरूणः कथोपकथन, आधार प्रकाशन प्राईवेट, लिमिटेड, पृष्ठ संख्या 17-18
3. कमल अरूणः नये इलाके में- अभिसार, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करणः 1996, पृष्ठ संख्या 36-37
4. कमल अरूणः कवि ने कहा सीरीज, सबूत - हक, किताबघर प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012, पृष्ठ संख्या 44
5. कमल अरूणः पुतली में संसार-दाना नवोदय सेल्स नई दिल्ली, संस्करणः 2014, पृष्ठ संख्या 82
6. कमल अरूणः कवि ने कहा सीरीज़, सबूत - ‘जीवधारा’ किताबघर प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012, पृष्ठ संख्या 34
7. कमल अरूणः पुतली में संसार - मातृभूमि नवोदय सेल्स नई दिल्ली, संस्करणः 2014, पृष्ठ संख्या 43
8. कमल अरूणः कवि ने कहा सीरीज़ सबूत - अमरफल, किताबघर प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012, पृष्ठ संख्या 41
9. कमल अरूणः अ पनी केवल धार- सूर्य-ग्रहणः1, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, आवृत्तिः 2012, पृष्ठ संख्या 22
10. कमल अरूणः कवि ने कहा सीरीज़, सबूत- नींद, किताबघर प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012, पृष्ठ संख्या 45
11. कमल अरूणः पुतली में संसार- इच्छा नवोदय सेल्स नई दिल्ली, संस्करणः 2014, पृष्ठ संख्या 100
12. समल अरूणः अपनी केवल धार- होटल वाणी प्रकाशन नई दिल्ली आवृत्तिः 2012, पृष्ठ संख्या 16
13. कमल अरूणः नये इलाके में- अभिसार, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करणः 1996, पृष्ठ संख्या 36
14. कमल अरूणः नये इलाके में - वृत्तन्त, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1996, पृष्ठ संख्या 45
सहायक ग्रन्थः-
1. डॉ. शर्मा प्राचीः अरूण कमल एवं समकालीन हिन्दी कविता, विद्या प्रकाशन कानपुर, प्रथम संस्करणः 2013
2. डॉ. सिंह केदारनाथः आधुनिक हिन्दी कविता में बिम्बविधान, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि., नई दिल्ली, छठा संस्करणः 2016

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