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शिवरानी के प्रेमचंद : कुछ चिन्हे कुछ अनचिन्हे

नीतू परिहार
प्रेमचंद का नाम हिंदी साहित्य में नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत में जाना-पहचाना है। भारतीय जीवन का जैसा सुंदर और सटीक चित्रण प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। प्रेमचंद की तत्त्कालीन प्रसिद्धि के बारे में बनारसीदास चतुर्वेदी का यह कथन भी उल्लेखनीय है-प्रेमचंदजी के सिवा भारत की सीमा का उल्लंघन करने की क्षमता रखने वाला कोई दूसरा हिंदी कलाकार इस समय हिंदी जगत में विद्यमान नहीं है और आज भी जब उनकी रचनाएँ अंतर्राष्ट्रीय कीर्ति प्राप्त कर चुकी हैं, मुझे यही वाक्य दोहराना पडता है।1
प्रेमचंद को उनके लिखे साहित्य के आधार पर तो सभी जानते हैं, किंतु वे अपने घर में अपने परिवार में कैसे रहते हैं और परिवार के प्रति उनका व्यवहार कैसा है यह सारी बातें उनके साथ रहने वाला ही ज्यादा अच्छी तरह से बता सकता है। प्रेमचंद की पत्नी द्वारा रचित पुस्तक प्रेमचंद घर में प्रेमचंद को बिल्कुल एक नए नजरिए से प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक संस्मरणात्मक विधा में लिखी गई है। सुमन राजे अपने हिन्दी साहित्य आधा इतिहास में लिखती हैं- अपने प्रारंभिक रूपों में शिवरानी प्रेमचंद संस्मरणकार के रूप में हमारे सामने आती हैं और उल्लेखनीय बात यह है कि वे एक कथाकार पत्नी के द्वारा कथासम्राट पति के संबंध में लिखे गए हैं।2
शिवरानी देवी प्रेमचंद के साथ रही अपने जीवन के सुख-दुख उनके साथ साझा किए। उन्होंने प्रेमचंद के साथ बिताए अपने जीवन के अनमोल क्षणों को पुस्तक के रूप में लिखा पत्नी के लिए पति पहले पति है, फिर चाहे बडा लेखक हो या किसी बडे पद पर हो। शिवरानी के लिए भी प्रेमचंद उनके पति ही है, लेखक बाद में हैं। शिवरानी की शादी बचपन में हो गई थी जब वे शादी का मतलब भी नहीं समझती थी। 11 वर्ष की उम्र की बच्ची क्या समझेगी कि शादी क्या होती है। इस पर यह कहर कि चार-पाँच माह में विधवा हो जाए, जिसका वह अर्थ नहीं समझती। विधवा का जीवन जीना भी कोई आसान नहीं है। शिवरानी को विधवा रूप में देखना उनके पिता के लिए बहुत कष्टपूर्ण था। वे अपने बच्ची को पूरी जिंदगी विधवा का जीवन नहीं जीना देना चाहते थे। वे उनका विवाह फिर से करना चाहते थे जिससे उनकी बेटी सामान्य जीवन जी सके उन्होंने अपनी बेटी के विवाह के लिए इश्तिहार निकलवाया। कईं लडके देखे, पर उन्हें कोई नहीं समझ आया। इस विज्ञापन को प्रेमचंद ने भी देखा और उन्होंने शिवरानी के पिताजी को खत लिखा और बताया कि वे यह विवाह करना चाहते हैं।
किसी विधवा स्त्री से विवाह आज भी सामान्य बात नहीं है तो उस जमाने में तो बिल्कुल भी नहीं थी फिर भी प्रेमचंद ने शिवरानी से विवाह किया। यह उनका सच्चे अर्थ में प्रगतिशील होना सिद्ध करता है। प्रेमचंद अपनी पत्नी से प्रेम भी बहुत करते थे। वे चाहते थे कि उनकी पत्नी पर्दा ना करें, घर में अपने अस्तित्व को पहचाने और प्रेमचंद के साथ सरकारी दौरों पर साथ चलें। प्रेमचंद ने अपने साहित्य में भी स्त्री के अधिकारों की, स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व की बात कही है। शिवरानी ने अपने पति की कई ऐसी बातें बताई हैं जो उन्हें एक खुले विचारों का व्यक्ति सिद्ध करती है। वे बताती हैं- बच्चे के बीमार हो जाने पर जब वे खाना नहीं बना पा रही थी तब खाना प्रेमचंद ने स्वयं बनाया। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि वह पुरुष है और खाना बनाने का काम उनका नहीं है। बच्चे के सिर पर चोट लगी तीन दिन तक तो वह चारपाई पर सिर तक ना रख सका। इसलिए तीन-चार दिनों तक उन्हें ही रोटी पकानी पडी।3 प्रेमचंद ने पत्नी बच्चों की हमेशा बीमारी में सेवा की शिवरानी कहती है सेवा उनका मूल मंत्र था। किसी को भी बीमार नहीं देख सकते थे।4
पति-पत्नी में साथ-साथ रहते लगाव तो हो जाता है, पर प्रेमचंद को भी अपनी पत्नी से बेहद प्रेम था। यही कारण था कि वह घर के कामों में अपनी पत्नी का हाथ बटाते थे। घर का सामान लाना, बच्चों के लिए खिलौने लाना आदि कई काम वे सहर्ष करते। पत्नी के बीमार हो जाने पर खाना भी खुद बना लेते और बर्तन भी स्वयं धो लेते। एक बार पत्नी को अत्यधिक दस्त होने पर बहुत कमजोरी आ गई। करीब सुबह 4:00 बजे स्नानघर जाते हुए कमजोरी से गिर गई और बेहोश हो गई। प्रेमचंद दौडे बेहोश पत्नी को उठाकर चारपाई पर लेटाया। होश आने पर आँखों में पानी भरकर बोले-तुम्हारी जब ये हालत थी, तो मुझे क्यों न जगाया।
मैं- आपको क्यों तकलीफ देती?
तो तुम मर जाने पर अपनी लाश ही दिखाना चाहती थी।
मैं-मरने का क्या अंदेशा था। कमजोर थी गिर पडी।
मरना कैसे होता है? बेहोश तो थीं ही तुम। 5
प्रेमचंद को पत्नी के साथ ही घर से भी बहुत लगाव था। उनको घर, बच्चे और पत्नी के बिना अच्छा नहीं लगता। बच्चों को पढाने के साथ-साथ खेलते भी। अमूमन यह देखा जाता है पत्नी के या बहू के बीमार हो जाने पर उसे पीहर भेज दिया जाता है। जो बहू दिन भर घर वालों की सेवा कर रही होती है, जो ससुराल वालों को ही अपना समझ रही होती है, बीमार होते ही वह पुनः पराई हो जाती है। ससुराल वाले यह मानते हैं कि जब बहू काम ही नहीं कर सकती तो यहाँ रखने का क्या औचित्य है अर्थात बहू है, तो उसे घर की सारी जिम्मेदारी निभानी है वरना उस घर में उसके लिए कोई स्थान नहीं है।
इस दृष्टि से प्रेमचंद की सोच बहुत प्रगतिशील है या उससे भी बहुत आगे है। एक बार शिवरानी जब बीमार हो गईं और लंबे समय तक बीमारी प्रेम की दीवानी के भाई को बहन की बीमारी का पता चला, तो उन्हें लेने आ गए ना चाहते हुए भी प्रेमचंद को भेजना पडा, प्रेमचंद अपने साले से पत्नी का ख्याल रखने का कहने लगे, तो पत्नी बोली इससे आप बेफिक्र रहिए जब तक आफ पास थी तब तक आप की ड्यूटी थी, अब भाई की ड्यूटी है।6
तभी प्रेमचंद ने कहा - मेरी ड्यूटी हमेशा है। शरीफ भाई है, इसलिए उन पर ड्यूटी लगा रही हो। प्रेमचंद को लगता है कि पत्नी का ध्यान उसका ख्याल रखने का दायित्व पति का ही होता है उस जमाने में ऐसी सोच रखने वाले विरले ही थे। प्रेमचंद जब भी कभी बाहर जाते उन्हें पत्नी की चिंता बनी रहती, लेकिन लोग उन्हें इतना पसंद करते थे जल्दी से जाने नहीं देते एक बार की बात है शिवरानी बतातीं हैं कि प्रेमचंद चार दिन का कहकर सात दिन तक नहीं आए जिससे वह परेशान और चिंतित हो गई, यह सोच कर कि कहीं प्रेमचंद बीमार ना हो गए हों, परेशान होती रही। जब सात दिन बाद वे लौटे, तो बहुत नाराज हुई, तो प्रेमचंद ने उन्हें बहुत प्रेम स्नेह से समझाया कि कोई पंजाबी सज्जन बहुत आग्रह कर अपने घर ले गए। उनकी बीवी भी मुझसे मिलने के लिए व्यग्र थी। प्रेमचंद बोले मैंने बहुत चाहा कि भाग कर निकलूँ, पर भागना मुश्किल हो गया मैं उनके यहाँ चलने को राजी हो गया, उस बेचारी को कैसे निराश करता, मैं उनके लिए रुक गया इसके बाद जो चाहो तुम सजा दे लो, अपराधी तुम्हारे सामने खडा है।7
अपने आप को शिवरानी का अपराधी मानते हैं दोनों का एक-दूसरे के प्रति प्रेम और चिंता ही है जो एक स्वयं को अपराधी तो दूसरा क्रोध करता है शिवरानी को लगता भी है कि एक बडे लेखक की पत्नी होने में कैसी आफत है- लेखकों की बीवियों पर सबसे ज्यादा आफत आती है उनके घर के आदमी भी पूरे के पूरे उनके नहीं होते यही आफत हमेशा लगी रहती है।8
शिवरानी आजादी के बाद के आंदोलनों में भी बहुत सक्रिय रहीं, वे जेल भी गईं। सन 1931 में सी क्लास आंदोलन की बात करते हुए वे बताती हैं कि जब वे जेल गईं, तो प्रेमचंद उनसे मिलने जेल में आते तो उनकी आँखें आँसुओं से भर आती। जितने दिन मैं जेल में रही प्रेमचंद ने ना तो भरपेट खाना खाया, ना ही खुलकर हँसे इस दौरान उनका वजन भी बहुत घट गया, प्रेमचंद शिवरानी से बहुत प्रेम करते थे, उनके जेल जाने पर घर में प्रेमचंद को बडा खालीपन लगता। जब शिवरानी जेल घर आईं तो उन्हें देखकर मुस्कुरा दिए- मैंने उठ कर उनके पैर छुए, मुझे उठाकर सीने से लगाते हुए बोले- क्या तुम बीमार थी? गला तो मेरा भी भर आया था, मैं बोली- मैं तो काफी अच्छी हूँ आप बीमार थे क्या?9
शिवरानी की अनुपस्थिति में प्रेम ठीक से कुछ लिख भी नहीं पाए। जेल में शिवरानी का वजन सात पौंड घटा जबकि प्रेमचंद का घर में चौदह पौंड घट गया। यह अंतर ही बताता है कि प्रेमचंद का पत्नी के प्रति लगाव और प्रेम कितना था। पत्नी ने जब पूछा- कैसे हुआ ये तो कहते हैं- वैसा कैसे रह सकता था। तुम उधर जेल में थी, इधर में जेल का अनुभव कर रहा था।10
भारतीय संस्कृति वार-त्यौहार की संस्कृति है। यहाँ बारह माह में तेरह त्यौहार आते हैं क्योंकि प्रेमचंद भारतीय संस्कृति की जडों से जुडे हैं। वे हर त्यौहार बडे उत्साह से मनाते। उनके उत्साह के बारे में लिखतीं है कि घर में कई लोग उनको रंग लगाने आते हैं, भले ही बीमार हों या खाँसी हो पर कभी छुपते नहीं, बल्कि लोग आते रहते आराम से खडे रहते, बडे बेटे और दामाद बासुदेव प्रसाद के रंग खेलने पर बोले- तुम लोगों के दिल में उत्साह होना चाहिए मुझे तो लडकपन में जिस तरह का उत्साह था, आज भी ज्यों का त्यों वैसा ही है तुम लोग लडकपन में ही उत्साह खो बैठे।11
होली पर प्रेमचंद अपने गाँव जाना पसंद करते थे, तो पत्नी को कहते गाँव चलेंगे। गाँव में बडा अच्छा रहेगा गाँव पहुँच कर आप दरवाजे पर बैठकर भांडू का नाच होने के लिए इंतजार कर रहे थे। शाम को मैंने देखा गाँव भर की काश्तकार आदि सभी दरवाजे पर जमा हैं लोगों ने उठकर भांडू का नाच देखा। लोगों के लिए भांग वगैरह का भी प्रबंध किया गया था। ऐसा उत्साह छाया था कि क्या कहूँ।
प्रेमचंद अपने कामों में बहुत व्यस्त रहते थे, फिर भी घर को बच्चों को पूरा समय देते थे, एक बार जागरण और हंस पत्रिका निकालने में इतने व्यस्त हो गए कि दीपावली के त्यौहार को भूल गए। बाजारों की चहल-पहल देख उन्हें ध्यान आया कि आज तो धनतेरस है, घर पहुँच कर पत्नी को उलाहना देने लगे कि उन्हें क्यों याद नहीं दिलाया गया कि दीपावली आ रही है। गाँव के मकान की सफाई करवानी है अब सब 2 दिन में कई मजदूर लगवा कर काम करना होगा, प्रेमचंद में त्यौहार मनाने के प्रति उत्साह के कारण ही एक ही दिन में मकान की सफाई रंग रोगन हो गया, यह भी उनकी विशेषता ही कही जाएगी कि दिनभर मजदूरों के साथ काम करते हुए भी शाम को गाँव वालों के साथ बैठकर उनकी भाषा में बातें करते। ग्रामीणों के साथ उनकी भाषा में बातें करना ही उन्हें एक अनुभव समृद्ध लेखक बनाता है। राजेन्द्र यादव के शब्दों में- ग्रामीण क्षेत्र प्रेमचंद के अपने अनुभव संसार का हिस्सा है वे वहाँ अधिक आश्वस्त और सहज महसूस करते हैं, इसलिए अपने कथानक, पात्र और परिस्थितियाँ भी वहीं से चुनते हैं। 12
शिवरानी कहतीं हैं- जब रोशनी कर चुके, तब दरवाजों पर बहुत से काश्तकार और लोग आकर बैठ गए, तब आप दीपावली त्यौहार मनाने का महत्त्व लोगों को समझाने लगे, इसके मनाने के कायदे क्या है, इस तरह की बहुत-सी बातें लोगों को उन्हीं की भाषा में बता रहे थे। क्या इस तरह का उत्साह को आप मामूली कहेंगे।13
प्रेमचंद इस बात की भी चिंता निरंतर करते कि आज की पीढी के बच्चों में त्यौहारों के प्रति उत्साह नहीं है। उन्हें क्यों होली-दिवाली मनाना अच्छा नहीं लगता। क्या लिखने पढने से अपनी संस्कृति से दूर हो जाते हैं? वे कहते- कुछ नहीं जी, आजकल के लौंडो में उत्साह नहीं है। त्यौहारों व खुशी के मौके पर खुश होना जीवन के लक्षण हैं, जिनमें जितना ही जीवन रहता है, वह उतना ही खुश रहता है।14
प्रेमचंद पर गाँधीवादी प्रभाव तो था ही साथ ही वे स्वावलंबी थे। घर में नौकरानी होने पर भी खुद का काम खुद ही करते बच्चे भी आलसी ना हो जाए, इसलिए नौकर भी घर में कम रखते। शिवरानी देवी के कामों में हाथ भी बताते और उन पर कोई ना कोई जिम्मेदारी भी डालते रहते उनको यह विश्वास था कि उनकी पत्नी हर जिम्मेदारी को बडी बखूबी से पूरी कर लेगी। एक बार एक कहारिन पानी भरते हुए कुएँ में गिरते-गिरते बची उसने प्रेमचंद से कहा आज तो मैं बच गई बाबूजी वरना कुएँ में गिर जाती। यह सुन प्रेमचंद तुरंत भट्टे पर ईंटों का आर्डर देने चले गए। नाश्ता बना हुआ छोडकर पहले उस कुएँ को ठीक से बनाना उन्हें अधिक जरूरी लगा, पत्नी के नाराज होने पर और यह कहने पर कि कुआँ तो पंचायती था। वे बोले- सब को न दिखाई पडे, तो मैं भी अंधा हो जाऊं? और कहीं आज तुम्हारी महरी कुएं में गिरी होती, तो सबसे पहले तुम ही रोती मैं तुमसे पूछता कि सब औरतें तो है ही, तुम ही क्यों रो रही हो।15
उनकी चिंता दर्शाती है कि उन्हें अपनी या अपने घर की ही नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की चिंता है उसका ख्याल है और साथ ही वह अपना पैसा खर्च करने में भी पीछे नहीं हटते प्रेमचंद ने खूब लिखा मेरा यह मानना है खूब वही लिख सकता है जिसने पढा भी बहुत खूब हो। प्रेमचंद अपने लेखन के प्रति बहुत इमानदार थे। सारी व्यवस्थाओं के बावजूद भी वे रात में लिखते दिन भर मिलने जुलने वालों के कारण न लिख पाते थे, तो सवेरे जल्दी 3-4 बजे उठकर लिखने लगते। कई बार शिवरानी तबीयत का हवाला देकर आराम करने को कहती थी उनका कहा मान एक बार सो भी जाते, लेकिन पत्नी के सोने पर फिर से उठकर लिखने बैठ जाते शिवरानी कहती है- जिस दिन 10:00 बजे लौटते उस दिन रात को काम ना कर पाते, उस दिन 3:00 बजे रात को ही जाकर काम में लग जाते मगर इतना आहिस्ते से उठते कि मैं जाग ना पाती।16
ऐसे पढने लिखने वाले व्यक्ति का गाँधीजी स मिलने का मन होना स्वाभाविक है। वे गाँधी का लिखा हुआ, तो कहीं ना कहीं पढ लेते थे, प्रेमचंद ने सुन रखा था कि महात्माजी जैसे और सब बातों में निपुण है उसी तरह बात करने में भी बहुत कुशल हैं। 17
महात्माजी से सैकडों लोग मिलना चाहते थे। उनके इर्द-गिर्द हमेशा भीड लगी रहती थी। सैकडों चिट्टियाँ भी उनके पास आती। उन्हें भी वे देखते सन 1928 में प्रेमचंद जब हिंदुस्तानी एकेडमी की मीटिंग में प्रयाग गए तब महात्माजी वहीं थे, लेकिन उनसे भेंट नहीं हो पाई। मीटिंग से दो दिन पहले और मीटिंग के दो दिन बाद तक रुकने पर भी मिलना नहीं हुआ। प्रेमचंद सिर्फ दर्शन के अभिलाषी नहीं थे, इसलिए भी नहीं मिल पाए, जब 1935 में हिंदी परिषद की मीटिंग वर्धा में हुई, तब प्रेमचंद हंस के विषय में बात करने वर्धा गए उस समय महात्माजी भी वर्धा में ही थे। वर्धा में हिंदी और हिंदुस्तानी के विषय में सलाह मशवरा करना था। हंस की बातचीत के साथ-साथ तब तक महात्माजी भी प्रेमचंद को जान गए थे, उनके लेखन से परिचित हो गए थे। उन्होंने प्रेमचंद को बुलाया और उनसे बातचीत की प्रेमचंद ने स्वयं कहा कि महात्माजी को जितना भी समझते थे वे उनसे अधिक मिल। शिवरानी के शब्दों में- जितना मैं महात्मा जी को समझता था, उससे कहीं ज्यादा वह मुझे मिले महात्माजी से मिलने के बाद कोई ऐसा नहीं होगा जो बगैर उनका हुए लौट आए या तो वे सबके हैं या वह अपनी ओर सब को खींच लेते हैं। उनकी शक्ल सूरत और बातों में इतना खिंचाव है कि उन्हें जो भी देखता है उनकी तरफ खामखा खिंच जाता है, मैं कहता हूँ की बुरे से बुरा आदमी भी जो उनके समीप जाए, तो उनका ही होकर लौटेगा महात्मा गाँधी के समीप कोई कितना ही झूठा जाए, मगर उनके सामने उसे सच बोलना ही पडेगा।18
शिवरानी के पूछने पर कि क्या वे महात्मा गाँधी के तरफदार हो गए हैं, तो उनका जवाब था कि मैं तो उनका चेला ही हो गया हूं प्रेमचंद का मानना था कि चेला होने का मतलब यह कतई नहीं कि उनकी पूजा करने लगे, बल्कि उस व्यक्ति के गुणों को अपनाएँ प्रेमचंद का 1922 में प्रेमाश्रम उपन्यास छपा था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम झाँकी और भगनागत राम राज्य की स्थापना का स्वप्न प्रेमाश्रम की विशेषता है सामने सिद्धांत इस उपन्यास का उद्देश्य है प्रेमचंद ने जो प्रेमाश्रम में लिखा महात्मा जी वैसा ही भारत में करना चाहते थे प्रेमचंद कहते हैं मैं महात्माजी का बना बनाया कुदरती चेला हूँ क्योंकि वे जो बात कराना चाहते हैं, उसे मैं पहले ही कर देता हूँ। वे दुनिया में महात्माजी को सबसे बडा मानते थे। सन् 1920 में गाँधीजी का भाषण सुनने सरकारी नौकरी छोडने का मन बना लिया था। सरकारी के प्रति उदासीनता तो पहले से ही थी गाँधीजी के प्रभावी भाषण सुनकर उनके मन को और पक्का कर दिया और कुछ समय बाद नौकरी छोड दी। बहुत-सी ऐसी बातें हैं जो शिवरानी ने प्रेमचंद के बारे में कही। दांपत्य जीवन के कई अनुभव शिवरानी ने प्रेमचंद घर में साझा किए हैं कुछ खट्टी कुछ मीठी यादें भी हैं उनकी जिन्हें वे बार-बार याद कर वे प्रेमचंद को महसूस करतीं हैं। कई बार वे यह भी सोचतीं हैं कि उन्होंने अपने पति को ध्यान से नहीं सुना या कि उनका ख्याल नहीं रखा, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था। शिवरानी प्रेमचंद का खूब ख्याल रखती। प्रेमचंद को दाल में घी बहुत पसंद था। एक बार जब खाना खाने बैठे तो दाल में घी नहीं देखकर पूछा दाल में घी क्यों नहीं है, पत्नी ने कहा घर में हो, तब ना यह जानकर उन्हें बुरा लगा कि घर में घी नहीं है। कभी तरकारी, कभी दाल, कभी घी कुछ-कुछ चलता ही रहता है। नाराज हो वे बिना खाए उठ गए घर में सब ने खाया, पर प्रेमचंद ने नहीं। शिवरानी चिंता में परेशान रही कि आखिर वे क्या खाएँगे और उन्होंने आठ आने का घी मँगवा कर मूँग की दाल पीसकर हलवा और पकौडी बनाई- मैंने कहा बडी मेहनत से अभी मैंने तैयार किया है और मैंने भी अभी तक कुछ नहीं खाया है।19 यह सुनकर प्रेमचंद को खाना खाना पडा और पत्नी को भी साथ ही खिलाया।
प्रेमचंद की विशेषता थी कि वे जिस विषय को दिल से चाहते थे जितने वे शिवरानी के थे, उतने ही साहित्य के भी थे। प्रेमचंद को हिंदी साहित्य में जो स्थान प्राप्त है उसका कारण उनका निरंतर साहित्य सेवा में रत होना है। साहित्य में वे कालजयी लेखक हैं। राजेन्द्र यादव का यह कथन उल्लेखनीय है उनके कालजयी और महान लेखक के रूप में- वह आत्मा क्या है जो प्रेमचंद या किसी भी लेखक को महान, कालजयी और विशिष्ट बनाती है....? मेरी समझ में वे तत्त्व हैं - यातना और संघर्ष...सफरिंग और उससे निकलने की झटपटाहट, प्रयास, अपनी नियत के आगे असहाय होकर घुटना टूटना और मरना या उससे लडना, उससे समझने की कोशिश, बेचैनी, समझी या अनसमझी नियत के घेरे को लाँघ सकने की कोशिश।20
संदर्भ ग्रंथ
1. राजेन्द्र यादव, प्रेमचंद की विरासत, एक सपने की कथा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2006।
2. सुमन राजे, हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, छठा संस्करण, 2011 ।
3. शिवरानी देवी प्रेमचंद, प्रेमचंद घर में, आत्माराम एंड सन्स, दिल्ली, संस्करण 2015।
4. शिवरानी देवी प्रेमचंदर् प्रेमचंद घर में, भूमिका
5. सुमन राजे, हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, पृष्ठ 298
6. शिवरानी देवी प्रेमचंद, प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 81-82
7. वहीं, पृष्ठ 87
8. शिवरानी देवी प्रेमचंद, प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 77
9. वहीं, पृष्ठ 102
10. शिवरानी देवी प्रेमचंद, प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 184
11. वहीं, पृष्ठ 184
12. वहीं, पृष्ठ 153
13. शिवरानी देवी प्रेमचंद, प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 154
14. वहीं, पृष्ठ 130
15. राजेन्द्र यादव, प्रेमचंद की विरासत, पृष्ठ 9
16. शिवरानी देवी प्रेमचंद, प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 177
17. वहीं, पृष्ठ 177
18. शिवरानी देवी प्रेमचंद, प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 108
19. वहीं, पृष्ठ 82
20. वहीं, पृष्ठ 116
21. शिवरानी देवी प्रेमचंद, प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 116
22. शिवरानी देवी प्रेमचंद, प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 76
23 राजेन्द्र यादव, प्रेमचंद की विरासत, एक सपने की कथा यात्रा, पृष्ठ 19

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