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हिन्दी सिनेमा और थर्ड जेंडर्स का जीवन

राकेश कुमार
ईश्वर ने मनुष्य को एक समान बनाया। एक ही धरती पर समान रूप से रहने का अवसर दिया, परंतु ऐसा क्यों है की समान रंग रूप, देह भी समान, परंतु एक शरीर के अंग विशेष के कारण किन्नरों साथ इतना अमानवीय बर्ताव? घर- परिवार और समाज में उसके लिए कोई जगह ही नहीं । क्या उसका ऐसा होना (लैंगिक विकृति) उसकी अपनी गलती है या फिर समाज का वह दोगलापन? घर की उदार संस्कृति में सदैव वसुधैव कुटुम्बकम् की परंपरा का निर्वहन रहा है। उसी समाज में थर्डजेंडर्स अर्थात किन्नरों साथ ऐसा बर्ताव। कहीं ना कहीं आज भी मनुष्य को, इस समाज को सोचने को मजबूर करता है।
किन्नर, हिजडा , छक्का ये शब्द तो गाली से किसी भी रूप में कम नहीं लगते। कितने ही मुहावरे (हिजडा) इन पर बने हैं, जो समाज की सामाजिक परंपरा में किन्नरों को नपुसंक ठहराते हैं। कितनी गलत सोच है ना समाज की!! सवाल बडे गहरे हैं। पर आज के उन्नत और विकसित परिवेश में इसका विश्लेषण होना चाहिए।
जिस समाज (किन्नर समाज) को देखकर व्यक्ति अपने भाग्य को सराहतें हैं, जिसका आगमन, आफ घर की खुशियों को दोगुना कर देता है। घर का कोई मंगल कार्य हो या फिर शादी - ब्याह या घर में नन्हे बालक का जन्म (लडकियों के जन्म कदापि नहीं) किन्नरों की मंडली अपनी जीवनभर की दुवाओं के साथ, हमारी खुशियों और मांगलिक उत्साह को नाचते गाते औद अधिक कर जाते हैं। यह इनकी सामाजिक और परंपरागत मजबूरियाँ हैं जो उन्हें अपने पेट से (आजीविका की खातिर) जोडे रखती हैं।
बदले में इन्हें मिलती है फटकार और गालियाँ। दुत्कार और अपमान।
डॉ. शरद सिंह अपनी पुस्तक थर्ड जेंडर विमर्श में इनकी स्थितियों पर चर्चा करते हुए लिखती हैं -
यह एक ऐसा प्राणी है जो मनुष्यों की तरह है, किंतु उसे सामान्य मनुष्यों की तरह जीने का अधिकार नहीं, उससे उम्मीद की गई है कि वह यदि घरों में आता है, तो तालियाँ बजाते हुए आए। भडकीले मेकअप से पुता रहे और दुआएँ देकर जाए। 1
थर्ड जेंडर्स के अनसुलझे सवालों, अधिकारों, जीवन की सामाजिक विषमताओं को विश्लेषित करता मेरा यह विश्लेषण मुख्य रूप से हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों पर केंद्रित है जो ट्रांसजेंडर्स या किन्नरों के जीवन यथार्थ की सवेदनाओं को चित्रित करती हैं। यह समाज की वह सच्चाई है जिस पर अब बेबाकी से चर्चा की जानी चाहिए क्योंकि किन्नर भी तो हमारे समाज का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें समाज का महत्त्वपूर्ण अंग मानते हुए कहा कि ट्रांसजेंडर समुदाय को वो सभी न्यायिक एवं संवैधानिक अधिकार मिलें जो देश के आम नागरिकों को प्राप्त हैं।

जनजीवन का आलेखन हो या फिर सामाजिक यथार्थ का चिंतन, फिल्में सदैव समय और परिवेश की नब्ज टटोलती हैं। ये सच है- सिनेमा कलाओं का वह पक्ष है जिसने आम जनजीवन को बहुत गहरे से प्रभावित किया। समाज के ज्वलंत मुद्दे हों या लघुमानव की पक्षधरता या स्त्री विमर्श की बारीकियाँ या फिर दलित जीवन की सम्वेदनाएँ सिनेमा ने सदैव इन मुद्दों और प्रसंगों को आवाज दी। वह आवाज जो समाज में कहीं दब गई थी, जिसका उठना सामाजिक संतुलन का गहरा और सार्थक आभास हो सकता है। सिनेमा की इसी चिंतनशीलता ने उसे कई बार तो साहित्य से कहीं आगे लाकर खडा कर दिया।
प्रसिद्ध फिल्म आलोचक प्रह्लाद अग्रवाल लिखते हैं -
जनमानस को इस कला रूप ने जितने गहरे से ही स्पर्श किया है उतना किसी और माध्यम ने नहीं। 2
ट्रांसजेंडर का आरंभिक उल्लेख हिंदी सिनेमा में बतौर नाचने गाने वालों रूप में ही किया गया या फिर बधाईगान गाने हुए किन्नर समूह में परंपरागत कार्य के रूप में, जिसे समाज द्वारा सदैव हेय समझा गया । किन्नरों के जीवन यथार्थ को मुख्य विषयवस्तु के रूप में कभी उठाया ही नहीं।
हम यहाँ उन्हीं फिल्मों का जिक्र करेंगे, जिनमें किन्नरों की जीवन परिस्थितियों को प्रमुखता से उठाया गया। कल्पना लाजमी की दरम्यान महेश भट्ट की तमन्ना, विश्वास पाटील की रज्जो, श्याम बेनेगल की वेलकम टू सज्जनपुर , योगेश भारद्वाज की शबनम मौसी विकास खन्ना की दी लास्ट कलर , एक ही आशा आदि उल्लेखनीय फिल्में हैं जिनमें किन्नर संवेदनाओं को आकार मिला।
यह समाज आज भी अपने अस्तित्व और सामाजिक वजूद के लिए लडखडा रहा है। अपने मनुष्य होने की दुहाई देता, तो कहीं न्यायालय में अपने जीवन के वे अधिकार माँगता है जो उन्हें मनुष्य के रूप में मिलने चाहिए। उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं था। बिना डॉक्यूमेंट के किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं उठा पाता-
2019 में आई इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चार लाख से भी ज्यादा ट्रांसजेंडर्स को वोटर आईडी कार्ड नहीं मिला है। यानी चुनावी डेटाबेस में वो वोटर के तौर पर रजिस्टर नहीं हैं। 3
समाज में उन्हें हेय नजरों से देखा जाता है। अपने ही घर परिवार में उसके साथ गैर-सा बर्ताव होता है। सामान्य मनुष्य की भाँति वह भी समाज में इज्जत से रहना चाहता है। प्रसिद्ध किन्नर एक्टिविस्ट लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी अपनी आत्मकथा मैं हिजडा मैं लक्ष्मी मैं अपने समाज की गहन बारीकियों का जिक्र करते हुए लिखते है -
अपनी तिरस्कृत जिंदगी को मरते दम तक ढोते रहना और मन ही मन समाज के सामने जिंदगी को रहस्य बना कर रखना । बाल बच्चे सम्मान सहित समाज में घूमने जैसी बातों के बारे में तो सपनों में भी नहीं सोच सकते।4

किन्नरों का यह जीवन यथार्थ सोचने को मजबूर करता है। मानव के नर और मादा रूप के बीच अपने अस्तित्व को तलाशता यह समाज आज भी न जाने कितने ही सवाल खडे करता है । कुछ ऐसी ही जीवन परिधियों और संवेदनाओं आकलन करता है।
कल्पना लाजमी की बेहद सार्थक और मार्मिक फिल्म दरमियाँ (1997) जिसमें मनुष्य के दो रूपों (स्त्री और पुरुष) के दरमियाँ (मध्य) एक ऐसा इंसान है जिसे हिजडा कहा जाता है। इम्मी एक ऐसे ही पात्र के रूप में उपस्थित है जो शारीरिक विकृति के कारण किन्नर बनने पर मजबूर है, बचपन में बच्चे उसे लिंग विशेष के कारण चिढाते हैं, युवावस्था में शरीर के कुछ लक्षण और आदतें जब स्त्रियों के स्वभाव में मिलती हैं, वह खुद नहीं समझ पाता कि ऐसा क्यों और कैसे हुआ-
तू हिजडा है मेरी तरह हिजडा
बावली मत बंद जीनत
हिजडा हिजडो के बीच में ही जी सके है। 5
फिल्म का यह संवाद समाज के उस दबाव और असंगति को उजागर करता है जिसमें इम्मी जैसे कितने ही अबोध बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार होता होगा। यद्यपि एक माँ अपने कलेजे के टुकडे को (भले ही वह कुछ भी) अपने से दूर नहीं होना देना चाहती परंतु समाज की परिधि का यह सच उसे मजबूर करता है।
परंपरागत तौर पर आज भी बधाई देते हुए, भीख माँगते हुए किन्नर अपनी उदर पूर्ति करता है। इसके साथ ना जाने कैसे-कैसे बर्ताव होते हैं । मारपीट पर ये पुलिस में रिपोर्ट नहीं कर पाते। डाक्यूमेंट्स की कमी के कारण यह सरकारी योजनाओं का भी लाभ नहीं ले पाते। बैंक में इनका खाता नहीं होता। सन 2014 से पहले चुनाव में वोट करने का भी अधिकार भी नहीं था इनके पास।
यह वो सच्चाईयाँ हैं जो कदम कदम पर इनके साथ चलती हैं। फिल्म का एक दृश्य देखिए जिसमें चंपा हिजडे के पैसे चोरी हो जाते हैं
खून पसीने की कमाई है ना कहाँ रखूँ । यूँ मुए बैंक वाले भी हमारा खाता नहीं खोलते । खाता ही क्या हम ट्रेन में बैठ नहीं सकते । वोट नहीं दे सकते । हम तो जैसे इंसान ही नहीं सब जगह थू-थू करते हैं लोग। 6
कैसा गम है क्या मजबूरी है
पास है जो ,उनसे भी दूरी है।
दिल यूँ धडके जैसे गूंगा बोलना चाहे
लेकिन सब है अनजाने
अपने देश में हम परदेसी
कोई ना पहचाने, दुनिया परायी हम हैं बेगाने
जिस पर बीते वही जाने। 7
दरमियाँ फिल्म का यह गीत ट्रांसजेंडर्स की उन संवेदनाओं को दिखलाता है जो सदियों से उसे घेरे जा रही है। यह फिल्म इस रूप में भी उल्लेखनीय है क्योंकि एक माँ अपनी उस संतान को पालना चाहती है जो किन्नर है। परंतु सामाजिक दबाव व ताने-बाने उसे वह सब करने को मजबूर कर देते हैं जिसके लिए वह और उसकी माँ कभी तैयार नहीं होते। जीवन की परिस्थितियाँ उसे एक ऐसे मोड पर ले आती हैं जहाँ पैसों की खातिर उसे नाचना पडता है। किन्नर मंडलियों में शामिल होना पडता है। बिगडैल बाप के अमीर शहजादे उसका यौन शोषण करते हैं। उसके साथ मारपीट करते हैं। हालात इतने बदतर हो जाते हैं कि अंत में उसे अपनी मां के साथ जहर पीकर आत्महत्या करने पडती है।
फिल्म यहाँ सवाल खडा करती है। क्या एक किन्नर आम जिंदगी नहीं जी सकता? क्या अस्तित्व के लिए वह कुछ अलग है? समाज इतना बेपरवाह क्यों है कि इम्मी जैसे कितने ही ट्रांसजेंडर होंगे जो समाज और परिवेश से लडते-लडते हार जाते हैं।
प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक महेश भट्ट की तमन्ना (1997) भी किन्नर यथार्थ और उस मानवीय रूप को चित्रित करती है जिनमें एक किन्नर की मानवीय झलक है। अगर कहीं नहीं है तो वह है किन्नर का अपना दर्द। उसके ममत्व की चाह । वह संतान सुख तो उसे प्रकृति द्वारा मिला ही नहीं। वह अफसोस जो परिणय को बाँधे के रखता है। यह फिल्म कहीं ना कहीं किन्नरों के उस दर्द को रेखांकित करती है जहाँ वह माँ -बाप के रूप में समाज में जीना चाहते हैं।
एक सच्ची घटना पर आधारित इस फिल्म में जहाँ कन्या भ्रूण हत्या के अशोभनीय पक्ष को चित्रित किया है, वहीं आम किन्नर के मानवीय पक्ष और मातृत्व भाव को समझने और समझाने का भी प्रयास किया।
टिक्कू हिजडे (परेश रावल) को रमज़ान के दिन कचरे के डिब्बे में एक अबोध बच्ची मिलती है जिसे उसने अल्हा मियां का प्रसाद समझा। घर परिवार मोहल्ले के लाख ताने सहे। विपरीत परिस्थितियों में उसे पाला। मोहल्ले का असर उस पर ना पडे इसलिए उसे बोर्डिंग स्कूल में पढने भेजा। इस बीच उसे कितनी मेहनत करनी पडी होगी यह यह उस किन्नर चरित्र की उदात्तता का महान पक्ष कहा जा सकता है।
आज तो मैं दो घंटे नाचा। खूब ठुमके लगाए। लोगों ने खूब नोट फेंके। ऐसी दो-तीन शादियाँ महीनों में मिल जाए, तो खोली का सारा खर्च निकल जाएगा। बच्ची की पढाई भी अच्छे से हो पाएगी। 8
परंतु जब यह बात तमन्ना को पता लगती है, तो वह अपने बाप से घृणा करती है। पराकाष्ठा तो जब होती है जब अपने अब्बू को, अब्बू कहने से भी शर्म महसूस होती है -
बहुत घिन्न आ रही है ना बेटा। दुनिया में किसी ने जो नहीं किया वह तेरे लिए इसने किया। फेंक दिया था कचरे के डिब्बे में। तुझे बचाया। नंगे पाँव रहा। खुद भूखा रहकर तुझे खिलाया। 9
विश्वास पाटिल की रज्जो में किन्नरों की उस लाइफ को उकेरा गया है जिसमें उनकी आर्थिक विपन्नता दिखलाई पडती है। परंपरागत बधाई गान के अलावा ये लोग अपनी देह बेच कर अपना जीवन यापन करते हैं। यद्यपि यह नितांत अप्राकृतिक है, परंतु इनकी मजबूरियाँ इन्हें इस गहरे दलदल तक ले आती हैं। बकौल किन्नर एक्टिविस्ट लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी -
स्टेज को तो छोड दीजिए भीड में भी उनके लिए जगह नहीं है उन्हें तो जोर-जोर से तालियाँ बजाते हुए कार की खुली खुली खिडकियों पर जाकर भीख माँगते या शरीर बेचकर हर दिन रोटी रोजी कमानी पडती है रात में यहाँ जहाँ जगह मिल जाए किसी कोने में सो जाना अपने अपने ग्रुप और गुरु के आदेश को बिना ना नूकुर किए मानना और हर तरह से अपमान झेलना।10
इस फिल्म में महेश मांजरेकर ने हिजडे बेगम का किरदार निभाया है जो कोठा चलाती है । हिजडा बेगमजान भले ही कोठे की प्रमुख है, परंतु उसकी भावनाएँ सापेक्ष है। कोठे की तवायफ रज्जो जब चंदू से प्रेम करने लगती है तो वह खुशी-खुशी अपने हाथों से उसकी शादी कराती है।
फिल्म की विषयवस्तु में मुंबई महानगर का वह सच भी सामने आता है जिसमें लाला पठान के गुंडे गरीब बस्तियों में जाकर उन झुग्गी झोपडियों को तोडते हैं। किन्नर सहित तमाम वे औरतें जो अपनी देह को बेच कर अपने घर परिवार का पेट पालती हैं। उनके घर तोड दिए जाते हैं
हम सब बर्बाद हो गए बेगम
एक जमाना था जब मुंबई भूखे प्यासों के लिए प्याऊ थी। हम बेसहारों के लिए सहारा थी। अब तो हम रंडियों के रहने लायक नहीं रही है मुंबई। 11
योगेश भरद्वाज के निर्देशन में बनी शबनम मौसी एक महत्त्वपूर्ण फिल्म है जो भारत की पहली निर्वाचित किन्नर विधायक शबनम मौसी के जीवन वृत्तांत को उठाती हुई किन्नरों के संवैधानिक अधिकारों की पैरवी करती है। पुलिस अफसर के घर में जन्मी नन्हीं बालक जो लैंगिक विकृति के कारण परिवार द्वारा अस्वीकृत कर दी जाती है। बधाई देने आए किन्नर उसे ले जाते हैं। बच्चे को बिरादरी में ले जाने के बाद हलीमा उसका पालन पोषण करती है।
-हलीमा को आज तुमने वह दर्जा दिया, जो दर्जा खुदा भी देने में बेबस्ता है। माँ का दर्जा ।12
फिल्म यहाँ किन्नरों के उस प्राकृतिक अधूरेपन की ओर संकेत करती जो इनके जीवन की हकीकत भी है और टीस भी-
मुझे भगवान से एक ही शिकायत है।
सब कुछ कर सकता था। उसने मुझे पूरा क्यों नहीं बनाया।
मैं भी एक संतान को जन्म दे पाती।
सपने देखना बुरी बात नहीं है लोलो, पर यही हमारी हकीकत है।13
फिल्म का एक मोड शबनम को ऐसी ही जगह ला खडा करता है, जहाँ वह गाँव - बस्ती वालों के लिए सहारा बनती है- फिल्म का एक अंश देखिए जिसमें वह ठाकुर के अत्याचारों के खिलाफ गाँव वालों को प्रेरित करती है- मैं अपनी बिरादरी छोडकर आयी थी यह सोचकर कि तुम जैसे इंसानों के बीच रहूँगी, मगर मुझे क्या पता था कि मेरी किस्मत में हिजडों के बीच रहना ही लिखा था। अगर मैं तन से हिजडा हूँ, तो तुम मन से हिजडा हो। तन का हिजडा तो फिर भी ताली पीटकर जीवन जी लेता है, लेकिन मन का हिजडा ताली पीटते हुए भी डरता है।14
शबनम की निस्वार्थ सेवा भावना से गाँव वाले प्रभावित होते हैं। वे सब वर्तमान विधायक से परेशान हैं। अतः सब गाँव वाले मिलकर शबनम को चुनाव में अपना प्रत्याशी चुनते हैं। विधायक के आदमी उसे धमकाते हैं, डराते हैं चुनाव से हटने को कहते हैं, परंतु शबनम उन सब का डटकर मुकाबला करती है। जब यह बात उसके साथी किन्नरों को पता लगती है, तो वो सब न केवल तन मन और धन से उसकी सहायता करते हैं, अपितु समाज के सामने अपनी एकता और सामूहिकता नज़ीर भी पेश करते हैं
श्याम बेनेगल की वेलकम टु सज्जनपुर भी इस समाज के अस्तित्व और अधिकार को रेखांकित करती हैं। शबनम मौसी की भाँति यहाँ भी ट्रांसजेंडर अपने संविधानिक अधिकार के लिए एकजुट होते हैं। मुन्नी चुनाव लडना चाहती है, परंतु गाँव का सरपंच उसे इस रूप में कदापि स्वीकार नहीं करता । गाँव में उसके खिलाफ कोई खडा नहीं हो पाता। ऐसे में मुन्नी चुनाव लडने का ऐलान करती है।
ऐ मुन्नीबाई चुनाव छोड दे नहीं तो तुम्हारा ढोलक फोड कर रख देंगे।

चाचा मैं तो ऐसी की तैसी नहीं डेमोक्रेसी जानती हूँ। 15
स्थिति यहीं नहीं सुधरती जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता है। सरपंच उसे डराता है। धमकाता है। मारपीट करता है। उसके साथ जो भी लोग खडे हैं उन्हें प्रताडित करता है। ऐसे में वह अपने अधिकार एवं अस्तित्व के लिए जिला कलेक्टर को एक पत्र लिखती है -
हम हिजडे भी इंसान होत हैं हुजूर। पुराण उठाकर देख लीजिए हम किन्नरन् ने मेहनत मशक्कत का काम किया। आज आफ राज में चारों तरफ अत्याचार हो रहे हैं हुजूर। हमें कहत हैं तू जन्मजात हिजडा है। तोहार चुनाव मं खडे होने का हक नाहीं। काहे हुजूर । का हमारे दिल नहीं धडकता। का मारे आँसू नहीं गिरते हुजूर। काहे हमसे इतनी नफरत करत हैं ,हम भी तो उस परमात्मा की देन हैं।16
भारत के प्रसिद्ध शैफ विकास खन्ना की एक बेहतरीन फिल्म दी लास्ट कलर भारतीय समाज के उस कठोर पक्ष को रेखांकित करती है जिसमें विधवा स्त्रियों की जीवन परिधियों का मार्मिक जिक्र है। फिल्म का एक हिस्सा किन्नर के उस जीवन दर्द को रेखांकित करता है जिसमें उसके मानसिक व शारीरिक शोषण की यातनाएँ दिखती हैं बनारस के घाट पर भीख माँगते किन्नर की अभाव भरी ज़न्दगी सोचने को मजबूर करती है। घाट के किनारे हर छोटा बडा आदमी उसकी इज्जत से खेलता है। इंस्पेक्टर राजा और उसके गुंडे जब चाहे तब उसे उठा लेते हैं उसका सामूहिक शारीरिक शोषण करते हैं । उसके साथ मारपीट करते हैं
जब तक झुकती रहेगी, जिंदा रहेगी।
राजा है हम राजा।.. नहीं मानी तो
गंगा में डूबा कर मार देगे।17
और एक दिन राजा सचमुच गोली मार उसे गंगा में डुबो देता है ।
2020 में आई लक्ष्मी बम फिल्म भी किन्नरों के प्रति होते अत्याचारों को व्यक्त करती है। लक्ष्मी बम फिल्म की ऐसी ही किन्नर पात्र है जिसके मकान पर कब्जा करने के लिए भू माफिया उसका मर्डर कर, उसे वहीं दफना देते हैं। वैसे तो फिल्म कॉमेडी के रूप में उपस्थित होती, परंतु फिल्म का टाइटल किन्नर समाज की संवेदनाओं को समझने के लिए काफी है।
फिल्म में दिखाया गया है कि किन्नर भी आम मनुष्य की तरह मनुष्य है और मनुष्य के रूप में ही समाज को, उसे स्वीकार करना चाहिए-
लोग हमें किन्नर छक्का हिजडा कह कर बुलाते हैं। मेरे बाप को जब पता लगा मैं औरों से अलग हूँ। घर से निकाल दिया। अनाथ बना दिया । मुझे इतनी बडी सजा दी । अरे यह तो भगवान का बनाया हुआ है इसमें मेरी क्या गलती । लेकिन आप लोगों के घर में ऐसा बच्चा पैदा हो उसे अनाथ मत बनाना। उसे भी बाकी बच्चों की तरह पढाना - लिखाना। आसमां में उडने के लिए पर और ऊँचाई से गिरने का डर , बच्चों को माँ बाप से ही मिलता है।18
बहरहाल इन फिल्मों के अतिरिक्त एक आशा, ट्रांसजेंडर संध्या, हंसा एक सहयोग, किन्नर मुस्कान आदि लघु और डॉक्यूमेंट्री फिल्में हैं जो ट्रांसजेंडर के जीवन बोध को बखूबी उठाती हैं
अस्तु, आज भी थर्ड जेंडर की स्थितियाँ बदली जरूर हैं, परंतु व्यवहारिक रूप से कहीं ना कहीं आज भी प्रश्नचिन्ह खडी करती हैं। समाज आज भी उसे अच्छी नजर से नहीं देखता। बौद्धिक वर्ग चाहते हुए भी उनके लिए कुछ नहीं कर पाता। कुछेक फिल्मकारों ने अपने- अपने प्रयासों से इनके यथार्थ जीवन को चित्रित करने की कोशिश की परंतु विषयवस्तु की गहनता कभी उन भावो नहीं छू पाई, जिन पर यह विमर्श टिका है। हिंदी साहित्य में इस विमर्श पर काफी कुछ काम हुआ, परंतु सिनेमा की स्थितियाँ थोडी गौण ही रहीं।
यूरोपीय देशों की तुलना में भारत की स्थिति अभी कुछ-कुछ वैसी ही है। यहाँ नाचने, गाने, बधाई लेने, भीख माँगने, जिस्मफरोशी करने वाले के रूप में समाज द्वारा इनकी छवि स्थापित की जा चुकी है। परंतु क्या कभी समाज का इस ओर ध्यान गया कि यह भी तो समाज का एक अभिन्न अंग है। भगवान ने इन्हें भी भूख दी है। रोने के लिए आँसू दिए हैं। इनकी आर्थिक मजबूरियों का अंदाजा इस रूप में लगाया जा सकता है कि क्या ये मजदूरी कर सकते हैं? क्या छोटा-मोटा काम या ठेला लगाकर अपनी उदर पूर्ति कर सकते हैं? क्या स्कूल - कॉलेज में सहज सरल रूप में दाखिला ले सकते हैं ? क्या कभी बस या ट्रेन में उन्हें आम यात्री की भाँति यात्रा करते देखा है? नहीं नहीं !!
इन सब आर्थिक परिस्थितियों के बीच कुछ सामाजिक कंटक इनका-सा वेश धारण करके गली मोहल्ले या फिर हाईवेज पर ज़बरदस्ती लोगों को लूट, इन्हें बदनाम करते हैं जो कहीं ना कहीं आज समाज की आम धारणा बन भी चुकी है। अतः इन्हें वे सब अधिकार मिलने चाहिए जो एक आम व्यक्ति को मिलते हैं। सरकारों को इनके भविष्य व विकास हेतु सार्थक योजनाएँ लानीं चाहिए। अब वह समय आ गया जब घर-परिवार आगे बढकर इन्हें अपनाए। इनके सम्बन्ध में समाज अपनी बनी-बनाई पूर्व धारणाओं को बदले।

सन्दर्भ -

1. शरद सिंह, थर्ड जेंडर विमर्श, 2020 ,सामयिक पेपर बैक्स ,नई दिल्ली
2. प्रह्लाद अग्रवाल, हिंदी सिनेमा बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक,2009, साहित्य भंडार, इलाहाबाद
3. www.thelallantop.com/oddnaari/
4. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी , मैं हिजडा.. मैं लक्ष्मी, 2018 वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
5. दरम्यान, कल्पना लाजमी, 1997
6. वही
7. वही
8. तमन्ना, महेश भट्ट, 1998, मुंबई
9. तमन्ना, महेश भट्ट, 1998, मुंबई
10. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी, मैं हिजडा.. में लक्ष्मी, पृ. 22 वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
11.रज्जो, 2013, विश्वास पाटील मुंबई
12. शबनम मौसी , 2005 ,योगेश भारद्वाज
13. शबनम मौसी , 2005 ,योगेश भारद्वाज
14. शबनम मौसी , 2005 ,योगेश भारद्वाज
15. वेलकम टू सज्जनपुर, 2008, श्याम बेनेगल, मुंबई
16. वेलकम टू सज्जनपुर, 2008, श्याम बेनेगल, मुंबई
17. दी लास्ट कलर, 2019, विकास खन्ना, जी स्टूडियो
18. लक्ष्मी बम, 2020 , राघव लॉरेंस ,फॉक्स स्टार स्टूडियो

सम्पर्क - एफ-2, रॉयलकैसल,
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