fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

लालबहादुर वर्मा होने का अर्थ

हितेन्द्र पटेल
लालबहादुर वर्मा की ख्याति एक संस्कृति कर्मी और इतिहास के शिक्षक के रूप में थी। पिछले पचास सालों से वे हिन्दी बौद्धिक जगत में एक सुपरिचित और सम्माननीय व्यक्ति थे। 17 मई 2021 को जब यह समाचार आया कि लालबहादुरजी नहीं रहे, तो हजारों लोगों को ऐसा लगा कि कोई अपना उनके बीच से उठकर चला गया। उसके बाद उनके सम्मान में बहुत सारी शोक सभाएँ आयोजित हुईं। कोरोना काल में वेब पर ही ये सभाएँ हुईं लेकिन उन सभाओं में उपस्थित हर किसी को यह जरूर लगा होगा कि ये कोई सामान्य शोक सभाएँ नहीं थीं। एक सभा तो साढे पाँच घंटे चली और वहाँ उसमें उपस्थित लोग और भी बोलना-सुनना चाहते थे! इलाहाबाद से लेकर देहरादून तक उनके चाहने वालों ने उनको भावुक होकर याद किया। यह सम्मान ऐसे व्यक्ति के लिए था जो पिछले दो दशकों से किसी भी बडे प्रतिष्ठान या किसी बडी संस्था के साथ से जुडा हुआ नहीं था। यह सम्मान चकित कर देने वाला था।

वर्माजी इतिहास के एक शिक्षक थे। सामान्य परिवार में उनका जन्म 10 जनवरी 1938 को छपरा में अपने ननिहाल में हुआ था। अपने ग्रामीण परिवेश का, अपनी शिक्षा और अपने राजनीतिक और सामाजिक कार्यों का जो विवरण उन्होंने अपनी आत्मकथा के प्रथम खंड-जीवन प्रवाह में बहते हुए (2015) में दिया है उससे यह पता चलता है कि उनके पारिवारिक परिवेश में ऐसा कुछ भी विशेष नहीं था जिससे यह लगे कि वे बौद्धिक जगत में कोई विशेष महत्त्व की जगह पहुँचेंगे। पढने में तेज थे और धीरे-धीरे आगे बढते हुए वे कॉलेज में पहुँचे। साइंस नहीं पढ सके, आर्ट्स की ओर आए। इस स्थिति में आ गए कि वे आईएएस बनने का सपना देख सकें। पहले गोरखपुर और फिर लखनऊ विश्वविद्यालय में पढे। अब वे आईएएस बन जाएँगे ऐसा उनको लगता था। बन नहीं सके। इंटरव्यू में चयन नहीं हुआ। चयन नहीं होने का कारण उनका अयोग्य होना नहीं, बल्कि बेपरवाह होना अधिक था। जीवन निर्वाह के लिए नौकरी जरूरी थी इसलिए कोशिश की। सिफारिश से मदद मिली और उन्हें बलिया में कॉलेज में पढाने की नौकरी मिली। पाँच साल पढाया। अच्छे शिक्षक थे, मन से पढाते थे और लोकप्रिय हुए। उसके बाद उन्होंने गोरखपुर में पढाया। लेकिन उसके बाद जो हुआ उसके बाद ही उस लालबहादुर वर्मा का जन्म हुआ जिससे पूरे हिन्दी बौद्धिक समाज का परिचय है। उन्होंने एँग्लो इंडियन समाज पर कोलकाता के नेशनल लाइब्रेरी में उपलब्ध सामग्री के आधार पर शोध कार्य किया था। लेकिन एक प्रश्न उनके दिमाग में भगवतशरण उपाध्याय को सुनने के बाद (1954 के आसपास) से घुमडता रहा था कि हर देश का अपना इतिहास क्यों होता है? इस विषय पर काम करने का मौका उनको तब मिला जब उन्हें फ्रांस जाकर एक वर्ष के लिए शोध कार्य करने की फेलोशिप मिली। उस समय वे विवाहित थे और पिता बन चुके थे। उन्होंने विदेश जाने का निश्चय किया। उनकी पत्नी और बच्चों असुविधा तो हुई (इसका एक मार्मिक वर्णन उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया है), लेकिन वे फ्रांस गए। वहाँ जाकर एक दूसरे इंसान ही बन गए। गए वे एक वर्ष के लिए थे, लेकिन रेमंड आरों (उनके सुपरवाइज़र) के विशेष प्रभाव के कारण वहाँ तीन साल रहे और भारतीय इतिहास लेखन की समस्याओं पर अपना कार्य करके ही लौटे। फ्रांस में बिताए तीन सालों ने उनको इतना रूपांतरित कर दिया या यूँ कहिए उनके भीतर इतना उत्साह भर दिया कि उनको लगा कि उनका पुनर्जन्म हो गया, उन्होंने तैरना सीख लिया। पेरिस ने उन्हें कैसे बदला, 1968 के छात्र आंदोलन के दौरान के उनके अनुभवों ने उनको कितना कुछ सिखाया और वे इतिहास लेखन की समस्याओं और इतिहास दर्शन की जटिलता से कैसे जूझे इसका विषद वर्णन यहाँ संभव नहीं, लेकिन यह कहा जाना चाहिए कि सचमुच उस अनुभव ने उन्हें बडा सोचना सिखलाया, सामाजिक क्रांति के स्वप्न के साथ जोडा और उनके भीतर यह लौ जगाई कि आखिरकार दुनिया को बेहतर बनाना संभव है, वह बनकर रहेगी। क्रांति में उनका विश्वास बहुत गहराया, जो आखिरी साँस तक उन्हें प्रेरित करता रहा, उनको अगली योजना के लिए तैयार करता रहा। इस दौरान उन्होंने लंदन जाकर उस दुनिया को देखा जहाँ ज्ञान- विज्ञान से जुडे बडे लोग बहुत उन्नत प्रकार के बौद्धिक औजारों का प्रयोग कर रहे थे, एक बेहतर समझ के लिए प्रयास कर रहे थे। उन्हीं दिनों उनका सम्पर्क कुछ ऐसे विद्वानों से भी हुआ जिनके साथ जुडकर उनके व्यक्तित्व और दृष्टिकोण दोनों का विकास हुआ। उन लोगों मरीन उन्होंने सबसे पहले रेमंड आरों का जिक्र किया है। अन्य मित्रों के बारे में उन्होंने लिखा है कि लक्ष्मी कपानी, पाओला, जान्न दोमनिक, लामिया, मुन्नी, आमोद, फिरोज, लूई बोनर, सीताराम, जां फिलिप पूलें और मोनिका पामिए जैसे मित्रों के बिना वे पेरिस में अपना शोध कार्य पूरा नहीं कर पाते । एक प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जब वे लंदन में थे उनकी मुलाकात दो भारतीय विद्वानों- बी.बी. मिश्रा और एस आर मेहरोत्रा से हुई। मिश्रा भारतीय मध्य वर्ग पर काम कर रहे थे और मेहरोत्रा उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों की राजनीति पर। उनके साथ जो वर्माजी का सम्पर्क बना उसने विशेष रूप से उनको प्रभावित किया।

लालबहादुर वर्मा ने फ्रांस में रहते हुए फ्रेंच भाषा सीखी और अपनी भाषा में काम करने के महत्त्व को समझा और इतिहास को लेकर गहरे उतरकर इतिहास दर्शन की समझ बनाई । उस समय पेरिस क्रांति और नए समाज के निर्माण के स्वप्न को जी रहा था। उन्होंने बडे बडे विद्वानों को गंभीर वैचारिक संघर्षों के साथ सडक पर जनता के साथ जुडने की कोशिश करते हुए, उनके बीच जाकर अपनी छोटी-छोटी किताबों को बेचते हुए देखा। विद्वानों की दुनिया के साथ समाज के इस जुडाव को देखकर वर्माजी के भीतर भी अपनी भाषा में काम करने और अपने समाज की सांस्कृतिक चेतना को जगाने का स्वप्न पैदा हुआ भी आया। इनके सहारे सारे जीवन तैरते हुए बाकी का उनका जीवन बीता। खुद को भी झोंका और नौजवानों की एक नहीं दो पीढियों को गहरे प्रभावित किया। कहा जा सकता है कि उन्होंने बहुत सारे इंसान गढे। यही उनके सम्मान का असली कारण है। फ्रांस से लौटने के बाद जीवन के अंत तक वे इसी सांस्कृतिक मुहिम में लगे रहे।

यह कोई आसान काम नहीं था। उनके साथ काम किए हुए लोग भली-भांति जानते हैं कि उनका यह जन्म असफलताओं का एक अनवरत सिलसिला है। वे लगातार असफल होते रहे, लेकिन अदम्य उत्साह से फिर दूसरे प्रकल्प पर देवाआनंद की तरह जुट जाते रहे। इस बीच उन्होंने असफल क्रांतियों की सार्थकता और महत्त्व पर एक थीसिस भी तैयार कर ली। गोरखपुर में बहुत सक्रिय संस्कृति कर्मी के रूप में एक अच्छी टीम तैयार की, सत्तर के दशक में एक अच्छी पत्रिका भंगिमा निकाली और एक राजनीतिक कर्मी के रूप में अपना सबकुछ झोंक दिया। वे इस बात को ध्यान में रखते थे कि जो जरूरी है उसके लिए प्रतीक्षा नहीं की जा सकती। अगर उनको लगता कि किसी बात को जनता तक पहुँचाने के लिए नाटक होना चाहिए, तो वे इसके लिए जरूरी हुआ तो खुद ही नाटक लिखने लगते थे। अपने घर पर ही बहुत सारे लडकों को लेकर वे उसके रिहर्सल में जुट जाते थे और पूरी मेहनत और लगन से नाटक, कविता या पुस्तिका को लेकर जनता के बीच हाजिर हो जाते थे। वे प्रतिरोध के कुछ प्रभावी उपायों को ढूँढ लेते थे और तुरंत उसको लेकर जुट जाते थे। एक उदाहरण दिया जा सकता था जिससे उनके इस रूप के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है। पहले उनके साथी बने एक नौजवान (जो बाद में उनके जवाई बने) ने उल्लेख किया है कि कैसे उन्होंने एक नाटक लिखा और लोगों को एक आंदोलन के साथ जोडा। एक दीपू नाम का लडका पुलिस हिरासत में मर गया था और लोगों के बीच यह चर्चा थी कि उसकी हत्या पुलिस के हाथों हुई है। लेकिन कोई कुछ कर नहीं सका था। मामला दबता जा रहा था। वर्माजी ने एक नाटक किया- दीपू आपका भी बेटा था। इस नुक्कड नाटक के रूप में जनता के बीच लाया गया और इसका प्रभाव यह पडा कि उसका केस दबाया नहीं जा सका। असम आंदोलन के समय उन्होंने लोकतन्त्र की अर्थी निकाली ताकि लोगों का ध्यान खींचा जा सके। भोपाल गैस हत्याकान्ड के बाद भी उनकी सक्रियता देखने लायक थी। बिहार में जब बिहार प्रेस बिल लाया गया तो उनके साथियों ने आरा में जाकर नुक्कड नाटक किया और लोगों के बीच इस मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाया।

उनकी यूनिवर्सिटी की नौकरी गोरखपुर में थी और वे कुछ घंटे पढाने के बाद एक एक्टिविस्ट की तरह लगे रहते। वे बहुत लोकप्रिय शिक्षक थे, लेकिन उनका ध्यान इस ओर अधिक रहता था कि कैसे साधारण परिवार से आए हुए विद्यार्थियों की मदद की जाए और उन्हें समाज की चिंताओं के साथ जोडा जाए। उनके सबसे पुराने छात्रों में एक विकास नारायण राय थे जो बाद में पुलिस विभाग के बडे अधिकारी बने ने एक महत्त्वपूर्ण बात कही है कि हालांकि वर्मा जी माक्र्सवादी थे लेकिन वे किसी भी छात्र को माक्र्सवादी बनाने की कोशिश नहीं करते थे। वे उन्हें अपने प्रभा मण्डल में लेकर दल से उनको जोडने की कोशिश नहीं करते थे। इस मामले में वे अलग थे, बहुत खुले विचारों के थे। उनके सम्पर्क सभी दलों के लोगों से थे और उनके चाहने वाले अंत तक उनसे जुडे रहे यह कहना चाहिए।

पर वर्मा जी जिस बडे विजन के साथ सांस्कृतिक कर्म में जुटे थे उसको स्वीकार कर पाना किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए मुश्किल था। वर्माजी को भी कुछ ही वर्षों में समझ में आ गया कि भारत में वामपंथी दलों में काम करना कितना मुश्किल है। उनके वामपंथी दलों के साथ काम करने के अनुभवों पर न उन्होंने और न उनके साथियों ने ज्यादा कुछ लिखा है। उनकी आत्मकथा में भी इसकी डिटेल्स नहीं हैं, लेकिन यह सबको पता है कि वहाँ अपनी तमाम कोशिशों के बाद भी वे वामपंथी संगठनों के साथ मिलकर काम नहीं कर सके। 1978 में एक बडा सांस्कृतिक मोर्चा- राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा -बनाने की उन्होंने कोशिश की जिसका पहला अधिवेशन उन्होंने प्रेमचंद की जन्मस्थली लमही में किया। गोरखपुर में कई दिनों तक चला एक संस्कृतिकर्मियों का सम्मेलन भी उनके प्रयास से ही हुआ। वर्माजी की पुत्री आशु वर्मा ने इस बात का ज़क्र किया है कि 1989 के समाजवादी रूस के विघटन के बाद उन्होंने माक्र्सवाद जिंदा मंच का गठन किया था।

इस बीच उन्होंने अपने अकादमिक जीवन में उन्नति के लिए विशेष ध्यान नहीं दिया। उन्होंने अंग्रेज़ी में शोधपरक आलेख यदा कदा ही लिखे और पुस्तकें तो लगभग नहीं ही लिखे। हिन्दी में काम करके कोई कितना बडा विद्वान बन सकता है! आपसी बातचीत में वे एक प्रसंग की चर्चा करते थे। जब वे इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस में अपना पर्चा हिन्दी में पढने की बात करने के लिए खडे हुए, तो उस संस्था के सबसे सम्मानित इतिहासकार ने उनपर बहुत व्यंग्य-दृष्टि डालते हुए मानो यूं कहा कौन है ये हिन्दी का इतना बडा प्रेमी! (ये वर्माजी के अपनी ही शब्द हैं।) बाद में इलाहाबाद में अवकाश ग्रहण के बाद उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में इतिहासबोध के स्तर से चिंतित होकर उन्होंने युवाओं के सहयोग से एक पत्रिका निकाली- इतिहासबोध। पर क्या हमारे हिन्दी प्रदेश की उच्च शिक्षा का परिवेश लालबहादुर वर्मा जैसे संस्कृति कर्मी अकादेमिक के अकादमिक एक्टिवि*म को बर्दाश्त करता हुआ उन्हें सहयोग कर सकता था? वे बहुत लोकप्रिय शिक्षक थे। उनकी कक्षाओं में रणधीर सिंह की कक्षा की तरह दूसरे विषय के लोग भी आ आकर सुनते रहते थे। पर रणधीर सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक थे और वे शिमला के उच्च अध्ययन संस्थान में रहकर कई वर्षों तक शांतिपूर्वक अध्ययन करते रह सकते थे (जरूरत पडने पर डाइरेक्टर को नियम परिवर्तन भी करने के लिए कहा जा सकता था!) परंतु गोरखपुर के इस नौजवानों के बीच घिरे लालबहादुर वर्मा को यह सब नहीं मिला। राजनीतिक कर्म में विफलता के बाद उन्होंने गोरखपुर से हट जाने का निर्णय लिया होगा ऐसा लगता है। हिन्दी प्रदेश ने उन्हें प्रोफेसर नहीं बनाया। उनको प्रोफेसर बनने के लिए उन्हें गोरखपुर से मणिपुर विश्वविद्यालय जाना पडा। यह उनके लिए वरदान सिद्ध हुआ। वहाँ के वातावरण में लालबहादुर वर्मा ने अपने को फिर से लेखन से जोडा। यहाँ उन्होंने एक उपन्यास लिखा- उत्तर पूर्व । अनुवाद कर्म के लिए भी अधिक समय मिला। यहाँ से उनके जीवन में एक नया मोड आया। पेरिस के बाद मणिपुर के पाँच सालों ने उन्हें एक और नई दृष्टि और उत्साह दिया। उसके बाद 90 के दशक में लालबहादुर वर्मा इलाहाबाद आए। इस विश्व विद्यालय के साथ उनका कैसा रिश्ता रहा इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1997-98 में उन्हें अवकाश ग्रहण के बाद पेंशन नहीं मिली। कोर्ट केस में तकनीकी कारणों से उनकी पेंशन बहाल नहीं हुई और जीवन के अंत तक वे आर्थिक रूप से किंचित दबाव में रहे। वर्माजी ने अपनी पेंशन और अन्य किस्म की आर्थिक चिंताओं के लिए कभी नहीं सोचा। एक किस्म की बेपरवाही उनकी लगातार बनी रही। वो तो उनकी किस्मत थी कि उनको चाहने वाले मित्र सैकडों में रहे जिसके कारण वे ठीक से रह सके। इलाहाबाद में उनके इर्द-गिर्द नौजवानों की एक टीम बनी। वर्माजी जहाँ भी रहे हमेशा लोगों से घिर जाते थे। अकेले वे शायद रह ही नहीं सकते थे। इस दौर में इतिहासबोध पत्रिका उन्होंने निकाली। कुछ पुस्तकों का प्रकाशन हुआ और उसके प्रचार प्रसार के लिए कोशिशें हुईं। कुछ बेहतरीन किताबें अच्छी साज धज के साथ निकलीं। उनमें से एक पुस्तक की कहानी का उल्लेख करना जरूरी है। हॉवर्ड फास्ट की एक किताब अमेरिकन का अनुवाद लाल बहादुर वर्मा ने किया है। इसकी भूमिका में वर्मा जी ने इतिहास -कथा (हिस्टॉरिकल फिक्सन) के महत्त्व पर ध्यान दिलाया है। उनका कहना है कि वृंदावनलाल वर्मा और अमृतलाल नागर जैसे जिम्मेदार लेखकों के प्रयासों के बावजूद इसका हिन्दी में समुचित विकास नहीं हुआ है। इतिहासपरक कथा समाज की चेतना को विकसित करने में उर्वरक का काम करती है। इस क्रम में उन्हें फास्ट की पुस्तक का अनुवाद एक जरूरी जिम्मेदारी लगी। संभवतः वर्माजी फास्ट की इस चिंता के साथ थे कि पाठक इस तरह की इतिहास कथा को अपने समय से जोडे, इससे शक्ति प्राप्त करे। मणिपुर प्रवास में उन्होंने एक वर्ष में हर दिन दो तीन पृष्ठ का अनुवाद करते हुए अपना काम पूरा किया । लेकिन एक वर्ष के बाद अनुवाद और फास्ट की पुस्तकें खो गईं। उनकी एक मित्र ने आखिरकार रेयर बुक्स में जाकर मूल्य से कई गुना अधिक खर्च करके इसकी प्रति हासिल की। (पुस्तक अमरीका में भी अनुपलब्ध प्राय थी। ) फिर उसका अनुवाद किया गया और युवा साथियों की मदद से यह आखिरकार 1999 में छपी। यह पुस्तक दुकानों में उपलब्ध नहीं रही। ढाई बरस में इस पुस्तक की एक हजार प्रतियाँ बिक गईं शब्दशः हाथों हाथ, घरों से, साथियों के झोलों से और सांस्कृतिक आयोजनों में कुछ घंटों तक लगने वाले स्टालों से। फिर 2004 में इसका दूसरा संस्करण छपा। इस तरह से लालबहादुर वर्मा ने काम किया। सबकुछ अपने और अपनों के कंधो पर रखकर लिखा पडा उन्होंने ।

बहुत सारा अनुवाद किया और कई पुस्तकें लिखी, जिनमें कुछ पाठ्य पुस्तकें बहुत बिकने वाली सिद्ध हुईं। लेकिन वर्माजी महज लेखक और अकादमिक व्यक्ति के रूप में याद नहीं किए जाते। वे जीवन के लगभग दो दशक गर्मियों में पहाड पर और सर्दियों में थोडी कम ठंडी जगह में रहते हुए अपनी मैत्री का दायरा लगातार बढाते रहे। एक घर उन्होंने इलाहाबाद में खरीदा। कैसे इसके लिए पैसे का जुगाड हुआ इसकी भी एक लंबी कहानी है। इलाहाबाद में उन्हें आदर मिला, पर उनके साथ जुडे अधिकतर लोग ऐसे थे जो खुद उनकी ही तरह फक्कड किस्म के थे। कुछ उत्साही नौजवानों ने वर्माजी को पूरा सहयोग किया यह सच है और उन लोगों ने मिलकर इलाहाबाद और अन्य जगहों पर बहुत सफल आयोजन भी किए। उसी दौरान उन्होंने अपने मित्र रवीन्द्र शुक्ला और नेत्र वल्लभ जोशी (कुकुछिना, अल्मोडा) के सहयोग से दस दिनों का एक बडा कार्यक्रम-आनन्दोत्सव के आयोजन में बडा योगदान किया जिसमें देश के कईं हिस्सों से बडी संख्या में उत्साही लोग शामिल हुए। इलाहाबाद में प्रबोधन श्रृंखला के पीछे भी वही प्रेरणा के स्रोत रहे।

एक समय आया जब उन्होंने अपनी पत्नी और अपने स्वास्थ्य संबंधी कारणों से यह निर्णय लिया कि वे दिल्ली में रहेंगे, ताकि उनकी पुत्री उनकी देखभाल कर सके। दिल्ली का मौसम उनके लिए अनुकूल नहीं सिद्ध हुआ और आखिरकार उनको एक मनमाफिक जगह देहरादून में मिली। आखिरी पाँच साल वे वहाँ शांति से रहे और लिखते पढते रहे। बुढापे ने उनको मानसिक रूप से इतना परेशान नहीं किया। कोरोना में घर पर बंद होकर रहना उनको बिलकुल नहीं सुहाता था, शायद इसलिए जब किसान आंदोलन दिल्ली में शुरू हुआ वे अपने को रोक नहीं सके। वे दिल्ली चले गए। उनके बहुत सारे चेले-प्रशंसक वहाँ थे। इस दौरान उनके साथियों ने उनके साथ बहुत सारी लंबी बातचीत की, जिनमें से कुछ बातचीत राकेश गुप्ता के पास सुरक्षित हैं। चाहने वालों से वे मिलते जुलते रहे और खुश दिखे। योजनाएँ बनाते रहे और आंदोलनों की सफलताओं के बारे में आश्वस्त दिखे। भारतीय नवजागरण पर और एलिएनेशन दो थीम पर गंभीरता से विचार भी करते रहे। इसी बीच कहीं से कोरोना से वे संक्रमित हो गए और कुछ दिनों की चिकित्सा के बाद चल बसे। अंत अंत लालबहादुर हारे नहीं, योजनाएँ बनाते रहे मित्रों को पूछते रहे कि क्या कर रहे हो, अरे ! उतना तो करो जितना कर सकते हो !

ऐसे जीवन-रस और आशा से आप्लुत संस्कृति कर्मी जीवन एक आदर्श है। उनके जाने से कितनों के संसार का एक कोना खाली हो गया होगा! पिछले पचास सालों में अपने और अपनों के बूते जूझने वाले लाल बहादुर वर्मा हमारी यादों में और अपने लेखन में हमेशा जवान बने रहेंगे और हमें प्रेम, दोस्ती और क्रांति का पाठ पढाते रहेंगे।

गिनाने के लिए उनकी कई पुस्तकें और आलेख हैं, लेकिन सही मानों में लालबहादुर वर्मा का जीवन ही उनका संदेश है। उनकी विरासत से जुडने का अर्थ उनकी चिंताओं से जुडना है। उनको भुलाना संभव नहीं।



सम्पर्क : फ्लैट ई, ऐशिकी अपार्टमेन्ट (बोरोपोल, बैरकपुर के निकट)

36/71 ओल्ड कलकत्ता रोड, कोलकाता-७००१२३

मो. ९८३६४५००३३